
Chapter Arc: वन में जल की तीव्र आवश्यकता के बीच युधिष्ठिर नकुल को सरोवर से पानी लाने भेजते हैं—पर वह लौटता नहीं, और मौन वन में अनिष्ट की आहट फैल जाती है। → नकुल के विलम्ब पर सहदेव, फिर अर्जुन, फिर भीम—एक-एक कर उसी दिशा में भेजे जाते हैं। सरोवर-तट पर जल के संकेत (जलाश्रयी वृक्ष, सारसों का कलरव) आशा जगाते हैं, पर प्रत्येक भाई वहाँ पहुँचकर किसी अदृश्य चेतावनी-स्वर को अनसुना कर जल पीता है और अचेत होकर गिर पड़ता है। → अर्जुन दौड़ते हुए आकाशवाणी सुनता है—‘प्रश्नों का उत्तर दिए बिना मत पीओ’—पर वह अवज्ञा कर जल पीता है और तुरंत मूर्छित हो गिर पड़ता है; चारों भाइयों का एक ही सरोवर-तट पर निःशब्द पतन संकट को चरम पर पहुँचा देता है। → इस अध्याय में समाधान नहीं आता; केवल यह स्थापित होता है कि सरोवर पर कोई यक्ष-शक्ति पहरा दे रही है और उसके नियम का उल्लंघन प्राणघातक सिद्ध हो रहा है। → चारों भाई अचेत पड़े हैं; अब युधिष्ठिर स्वयं क्या करेंगे—क्या वे भी जल पीकर गिरेंगे, या यक्ष के प्रश्नों का सामना करेंगे?
Verse 1
हि >> आन (0) हि 7 आम द्वादर्शाधिकत्रिशततमो< ध्याय: पानी लानेके लिये गये हुए नकुल आदि चार भाइयोंका सरोवरके तटपर अचेत होकर गिरना युधिछिर उवाच नापदामस्ति मर्यादा न निमित्तं न कारणम् | धर्मस्तु विभजत्यर्थमुभयो: पुण्यपापयो:,युधिष्ठिर बोले--भैया! आपत्तियोंकी न तो कोई सीमा है, न कोई निमित्त दिखायी देता है और न कोई विशेष कारण ही परिलक्षित होता है। पहलेका किया हुआ पुण्य और पापरूप कर्म ही प्रारब्ध बनकर सुख और दुःखरूप फल बाँटता रहता है
ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ—ଭାଇ, ଆପଦାର କୌଣସି ନିଶ୍ଚିତ ସୀମା ନାହିଁ; ତାହାର କୌଣସି ସ୍ପଷ୍ଟ ନିମିତ୍ତ ମଧ୍ୟ ଦେଖାଯାଏ ନାହିଁ, ନା କୌଣସି ବିଶେଷ କାରଣ ପ୍ରତୀତ ହୁଏ। ପୂର୍ବକୃତ ପୁଣ୍ୟ-ପାପ ଅନୁସାରେ ଧର୍ମ ହିଁ ସୁଖ-ଦୁଃଖର ଫଳ ବିଭାଜନ କରେ।
Verse 2
भीम उवाच प्रातिकाम्यनयत् कृष्णां सभायां प्रेष्यवत् तदा । न मया निहततस्तत्र तेन प्राप्ता: सम संशयम्,भीमसेनने कहा--जब प्रातिकामीकी जगह दूत बनकर गया हुआ दु:शासन द्रौपदीको कौरवोंकी सभामें दासीकी भाँति बलपूर्वक खींच ले आया, उस समय मैंने जो उसका वध नहीं कर डाला; इसीके कारण हमलोग ऐसे धर्मसंकटमें पड़े हैं
ଭୀମ କହିଲେ—ସେତେବେଳେ ପ୍ରାତିକାମୀ ଦାସ-ଦୂତ ପରି ହୋଇ କୃଷ୍ଣା (ଦ୍ରୌପଦୀ)ଙ୍କୁ କୌରବସଭାକୁ ଦାସୀ ପରି ଟାଣି ଆଣିଥିଲା; ମୁଁ ସେଠାରେ ତାହାକୁ ବଧ କରିନଥିଲି। ସେଇ ଅପରାଧରୁ ଆଜି ଆମେ ଏହି ଘୋର ଧର୍ମସଙ୍କଟ ଓ ସନ୍ଦେହରେ ପଡ଼ିଛୁ।
Verse 3
अजुन उवाच वाचस्तीक्ष्णास्थिभेदिन्य: सूतपुत्रेण भाषिता: । अतितीव्रा मया क्षान्तास्तेन प्राप्ता: सम संशयम्,अर्जुन बोले--सूतपुत्र कर्णके कहे हुए कठोर अस्थियोंको भी विदीर्ण कर देनेवाले अत्यन्त कड़वे वचन सुनकर भी जो हमने सहन कर लिये; उसीसे आज हम धर्मसंकटकी अवस्थामें आ पहुँचे हैं
ଅର୍ଜୁନ କହିଲେ—ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ କହିଥିବା ବାକ୍ୟ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଥିଲା; ଯେନେ ଅସ୍ଥିକୁ ମଧ୍ୟ ଭେଦିଦେବ, ଏପରି ଅତ୍ୟନ୍ତ କଟୁ। ତଥାପି ମୁଁ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ସହିଲି; ସେଇ ସହନରୁ ଆଜି ଆମେ ଏହି ଧର୍ମସଙ୍କଟ ଓ ସନ୍ଦେହରେ ପହଞ୍ଚିଛୁ।
Verse 4
सहदेव उवाच शकुनिस्त्वां यदाजैषीदक्षद्यूतेन भारत । स मया न हतत्तत्र तेन प्राप्ता: सम संशयम्,सहदेवने कहा--भारत! जब शकुनिने आपको जूएमें जीत लिया और उस समय मैंने उसे मार नहीं डाला, उसीका यह फल है कि आज हमलोग धर्मसंकटमें पड़ गये हैं
ସହଦେବ କହିଲେ— ହେ ଭାରତ! ଯେତେବେଳେ ଶକୁନି ଦ୍ୟୁତରେ ଆପଣଙ୍କୁ ଜିତିଥିଲା, ସେତେବେଳେ ମୁଁ ତାକୁ ହତ୍ୟା କରିନଥିଲି। ସେଇ ଅବହେଳାର ଫଳ ଏହି— ଆଜି ଆମେ ଧର୍ମସଙ୍କଟ ଓ ଘୋର ସନ୍ଦେହରେ ପଡ଼ିଛୁ।
Verse 5
वैशम्पायन उवाच ततो युधिषछिरो राजा नकुलं वाक्यमब्रवीत् । आरुह्द वृक्ष माद्रेय निरीक्षस्व दिशो दश,वैशम्पायनजी कहते हैं--तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने नकुलसे कहा--“माद्रीनन्दन! किसी वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें दृष्टिपात करो। कहीं आस-पास पानी हो, तो देखो अथवा जलके किनारे होनेवाले वृक्षोंपर भी दृष्टि डालो। तात! तुम्हारे ये भाई थके-माँदे और प्यासे हैं!
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାପରେ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର ନକୁଳକୁ କହିଲେ— “ହେ ମାଦ୍ରୀନନ୍ଦନ! ଗଛ ଉପରେ ଚଢ଼ି ଦଶଦିଗକୁ ନିରୀକ୍ଷଣ କର।”
Verse 6
पानीयमन्तिके पश्य वृक्षांश्चाप्युदकाश्रितान् । एते हि भ्रातर: श्रान्तास्तव तात पिपासिता:,वैशम्पायनजी कहते हैं--तदनन्तर राजा युधिष्ठिरने नकुलसे कहा--“माद्रीनन्दन! किसी वृक्षपर चढ़कर सब दिशाओंमें दृष्टिपात करो। कहीं आस-पास पानी हो, तो देखो अथवा जलके किनारे होनेवाले वृक्षोंपर भी दृष्टि डालो। तात! तुम्हारे ये भाई थके-माँदे और प्यासे हैं!
“ନିକଟରେ ପାଣି ଅଛି କି ନାହିଁ ଦେଖ; ଜଳାଶ୍ରିତ ଗଛମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଚିହ୍ନ। ତାତ! ତୋର ଏହି ଭାଇମାନେ କ୍ଲାନ୍ତ ଓ ତୃଷ୍ଣାରେ ପୀଡ଼ିତ।”
Verse 7
नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा शीघ्रमारुह्म पादपम् । अब्रवीद् भ्रातरं ज्येष्ठमभिवीक्ष्य समन्तत:,तब नकुल “बहुत अच्छा” कहकर शीघ्र ही एक पेड़पर चढ़ गये और चारों ओर दृष्टि डालकर अपने बड़े भाईसे बोले--
ନକୁଳ “ତଥାସ୍ତୁ” ବୋଲି କହି ଶୀଘ୍ର ଗଛ ଉପରେ ଚଢ଼ିଲା; ଚାରିଦିଗ ନିରୀକ୍ଷଣ କରି ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ କହିଲା।
Verse 8
पश्यामि बहुलान् राजन् वृक्षानुदकसंश्रयान् । सारसानां च निर्हादमत्रोदकमसंशयम्,“राजन! मैं ऐसे बहुतेरे वृक्ष देख रहा हूँ, जो जलके किनारे ही होते हैं। सारसोंकी आवाज भी सुनायी देती है; अतः नि:संदेह यहाँ आस-पास ही कोई जलाशय है”
“ରାଜନ! ମୁଁ ଜଳାଶ୍ରିତ ଅନେକ ଗଛ ଦେଖୁଛି। ସାରସମାନଙ୍କ ଡାକ ମଧ୍ୟ ଶୁଣାଯାଉଛି; ତେଣୁ ନିଶ୍ଚୟ ଏଠାରେ ନିକଟେ ଜଳ ଅଛି।”
Verse 9
ततोअब्रवीत् सत्यधृतिः कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । गच्छ सौम्य ततः शीघ्र तूणी: पानीयमानय,तब सत्यका पालन करनेवाले कुन्तीनन्दन युधिष्ठटिरने नकुलसे कहा--'सौम्य! शीघ्र जाओ और तरकसोंमें पानी भर लाओ'
ତେବେ ସତ୍ୟଧର୍ମରେ ଦୃଢ଼ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର କହିଲେ— “ସୌମ୍ୟ! ଶୀଘ୍ର ଯାଅ ଏବଂ ତୂଣୀମାନଙ୍କରେ ପାଣି ଆଣ।”
Verse 10
नकुलस्तु तथेत्युक्त्वा भ्रातुर्ज्येछ्सल्थ शासनात् । प्राद्रवद् यत्र पानीयं शीघ्रं चैवान्वपद्यत,नकुल “बहुत अच्छा” कहकर बड़े भाईकी आज्ञासे शीघ्रतापूर्वक गये और जहाँ जलाशय था, वहाँ तुरंत पहुँच गये
ନକୁଳ “ତଥାସ୍ତୁ” ବୋଲି କହି ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭ୍ରାତାଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଳନ କରି, ଯେଉଁଠାରେ ପାଣି ଥିଲା ସେଠାକୁ ଦୌଡ଼ିଗଲା ଏବଂ ଶୀଘ୍ର ପହଞ୍ଚିଲା।
Verse 11
स दृष्टवा विमल तोयं सारसै: परिवारितम् । पातुकामस्ततो वाचमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे
ସାରସମାନେ ଘେରିଥିବା ସେଇ ନିର୍ମଳ ଜଳକୁ ଦେଖି, ପିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବା ନକୁଳ ତେବେ ଆକାଶରୁ ଆସୁଥିବା ଏକ ବାଣୀ ଶୁଣିଲା।
Verse 12
वहाँ सारसोंसे घिरे हुए जलाशयका स्वच्छ जल देखकर नकुलको उसे पीनेकी इच्छा हुई। इतनेमें ही आकाशसे उनके कानोंमें एक स्पष्ट वाणी सुनायी दी ।। यक्ष उवाच मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु माद्रेय ततः पिब हरस्व च,यक्ष बोला--तात! तुम इस सरोवरका पानी पीनेका साहस न करो। इसपर पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। माद्रीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ
ଯକ୍ଷ କହିଲା— “ତାତ! ସାହସ କରନି; ଏହି ସରୋବର ଆଗରୁ ମୋର ଅଧିକାରରେ ଅଛି। ହେ ମାଦ୍ରୀପୁତ୍ର! ପ୍ରଥମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦେ; ତା’ପରେ ପାଣି ପିଅ ଏବଂ ନେଇଯା।”
Verse 13
अनादृत्य तु तद् वाक्यं नकुलः सुपिपासितः । अपिबच्छीतलं तोय॑ं पीत्वा च निपपात ह,नकुलकी प्यास बहुत बढ़ गयी थी। उन्होंने यक्षेके कथनकी अवहेलना करके वहाँका शीतल जल पी लिया। पीते ही वे अचेत होकर गिर पड़े
କିନ୍ତୁ ଅତ୍ୟଧିକ ପିଆସରେ ପୀଡ଼ିତ ନକୁଳ ସେଇ ବାଣୀକୁ ଅଗ୍ରାହ୍ୟ କରି ଶୀତଳ ଜଳ ପିଲା; ପିଇବା ସହିତେ ସେ ଅଚେତନ ହୋଇ ପଡ଼ିଗଲା।
Verse 14
चिरायमाणे नकुले कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । अब्रवीद् भ्रातरं वीर॑ं सहदेवमरिंदमम्,नकुलके लौटनेमें जब अधिक विलम्ब हो गया, तब कुन्तीनन्दन युधिष्ठिरने अपने शत्रुहन्ता वीर भ्राता सहदेवसे कहा--
ନକୁଳ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଧରି ବିଳମ୍ବ କରିବାରୁ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶତ୍ରୁଦମନ ବୀର ଭ୍ରାତା ସହଦେବଙ୍କୁ କହିଲେ—
Verse 15
भ्राता हि चिरयातो न: सहदेव तवाग्रज: । तथैवानय सोदर्य पानीयं च त्वमानय,“सहदेव! हमारे अनुज और तुम्हारे अग्रज भ्राता नकुलको यहाँसे गये बहुत देर हो गयी। तुम जाकर अपने सहोदर भाईको बुला लाओ और पानी भी ले आओ'
“ସହଦେବ! ଆମ ଅନୁଜ—ତୁମ ଅଗ୍ରଜ ଭ୍ରାତା ନକୁଳ—ଏଠାରୁ ଯାଇ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ହେଲା। ତୁମେ ଯାଇ ତୁମ ସହୋଦର ଭାଇକୁ ଏଠାକୁ ଆଣ, ଏବଂ ପାଣି ମଧ୍ୟ ଆଣ।”
Verse 16
सहदेवस्तथेत्यक्त्वा तां दिशं प्रत्यपद्यत । ददर्श च हतं भूमौ भ्रातरं नकुलं तदा,तब सहदेव “बहुत अच्छा” कहकर उसी दिशाकी ओर चल दिये। वहाँ पहुँचकर उन्होंने देखा, भाई नकुल पृथ्वीपर मरे पड़े हैं
ସହଦେବ “ତଥାସ୍ତୁ” ବୋଲି ସେହି ଦିଗକୁ ଗଲେ। ସେଠାରେ ପହଞ୍ଚି ଦେଖିଲେ—ଭ୍ରାତା ନକୁଳ ଭୂମିରେ ହତ ହୋଇ ପଡ଼ିଛନ୍ତି।
Verse 17
भ्रातृशोकाभिसंतप्तस्तृषया च प्रपीडित: । अभिदुद्राव पानीयं ततो वागभ्यभाषत
ଭ୍ରାତୃଶୋକରେ ଦଗ୍ଧ ଏବଂ ତୃଷ୍ଣାରେ ପୀଡିତ ହୋଇ ସେ ପାଣି ଦିଗକୁ ଦୌଡ଼ିଲେ; ସେତେବେଳେ ଏକ ବାଣୀ ଶୁଣାଗଲା।
Verse 18
भाईके शोकसे उनका हृदय संतप्त हो उठा। साथ ही प्याससे भी वे बहुत कष्ट पा रहे थे; अतः पानीकी ओर दौड़े। उसी समय आकाशवाणी बोल उठी-- ।। मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा यथाकामं पिबस्व च हरस्व च,“तात! पानी पीनेका साहस न करो। यहाँ पहलेसे ही मेरा अधिकार हो चुका है। तुम पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर इच्छानुसार जल पीओ और साथ ले भी जाओ”
ଆକାଶବାଣୀ କହିଲା—“ତାତ! ସାହସ କରନି। ଏହି ଜଳ ଉପରେ ପୂର୍ବରୁ ମୋର ଅଧିକାର ଅଛି। ପ୍ରଥମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦିଅ; ତାପରେ ଇଚ୍ଛାମତେ ଜଳ ପିଅ ଏବଂ ନେଇ ଯାଅ।”
Verse 19
अनादृत्य तु तद् वाक््यं सहदेव: पिपासित: । अपिबच्छीतलं तोय॑ं पीत्वा च निपपात ह,प्यासे सहदेव उस वचनकी अवहेलना करके वहाँका ठंडा जल पीने लगे एवं पीते ही अचेत होकर गिर पड़े
କିନ୍ତୁ ପିଆସରେ ପୀଡିତ ସହଦେବ ସେହି ସତର୍କବାଣୀକୁ ଅବହେଳା କଲା। ସେଠାର ଶୀତଳ ଜଳ ପିଇବାମାତ୍ରେ ସେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲା।
Verse 20
अथाब्रवीत् स विजयं कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर: । भ्रातरी ते चिरगतौ बीभत्सो शत्रुकर्शन,तदनन्तर कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने अर्जुनसे कहा--“शत्रुनाशन बीभत्सो! तुम्हारे दोनों भाइयोंको गये बहुत देर हो गयी
ତାପରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ବିଜୟ (ଅର୍ଜୁନ)କୁ କହିଲେ—“ହେ ବୀଭତ୍ସୁ, ଶତ୍ରୁକର୍ଷଣ! ତୋର ଦୁଇ ଭାଇ ଯାଇ ବହୁତ ଦେରି ହେଲା।”
Verse 21
तौ चैवानय भद्र ते पानीयं च त्वमानय । त्वं हि नस्तात सर्वेषां द:खितानामपाश्रय:,“तुम्हारा कल्याण हो। तुम उन दोनोंको बुला लाओ और साथ ही पानी भी ले आओ। तात! तुम्हीं हम सब दुःखी बन्धुओंके सहारे हो”
“ତୋର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ସେଇ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଏଠାକୁ ଆଣ, ଏବଂ ପାଣି ମଧ୍ୟ ଆଣ। ତାତ! ଆମ ସମସ୍ତ ଦୁଃଖିତ ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କର ଏକମାତ୍ର ଆଶ୍ରୟ ତୁହିଁ।”
Verse 22
एवमुक्तो गुडाकेश: प्रगृह्म सशरं धनु: । आमुक्तखड््गो मेधावी तत् सर: प्रत्यपद्यत,युधिष्ठिरके ऐसा कहनेपर निद्राविजयी बुद्धिमान् अर्जुन धनुष-बाण और खड़्ग लिये उस सरोवरके तटपर गये
ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଏପରି କହିବା ପରେ ନିଦ୍ରାଜୟୀ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଗୁଡାକେଶ (ଅର୍ଜୁନ) ବାଣସହିତ ଧନୁଷ ଧରି, ଖଡ୍ଗ ଧାରଣ କରି ସେହି ସରୋବର ଦିଗକୁ ଗଲା।
Verse 23
ततः पुरुषशार्दूली पानीयहरणे गतौ । तौ ददर्श हतौ तत्र भ्रातरौ श्वेतवाहन:,श्वेतवाहन अर्जुनने जल लानेके लिये गये हुए उन दोनों पुरुषसिंह भाइयोंको वहाँ मरे हुए देखा
ତାପରେ ଶ୍ୱେତବାହନ (ଅର୍ଜୁନ) ପାଣି ଆଣିବାକୁ ଯାଇ ସେଠାରେ ସେଇ ଦୁଇ ପୁରୁଷସିଂହ ଭାଇଙ୍କୁ ହତ ଅବସ୍ଥାରେ ଦେଖିଲା।
Verse 24
प्रसुप्ताविव तौ दृष्टवा नरसिंह: सुदु:खित: । धनुरुद्यम्य कौन्तेयो व्यलोकयत तद् वनम्,दोनोंको प्रगाढ़ निद्रामें सोये हुएकी भाँति देखकर मनुष्योंमें सिंहके समान पराक्रमी अर्जुनको बहुत दुःख हुआ। उन्होंने धनुष उठाकर उस वनका अच्छी तरह निरीक्षण किया
ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ଗଭୀର ନିଦ୍ରାରେ ଶୋଇଥିବା ପରି ଦେଖି ମନୁଷ୍ୟସିଂହ କୌନ୍ତେୟ ଅର୍ଜୁନ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଶୋକାକୁଳ ହେଲେ। ଧନୁଷ ଉଠାଇ ସେ ତାହା ଅରଣ୍ୟକୁ ସତର୍କତାରେ ନିରୀକ୍ଷଣ କଲେ।
Verse 25
नापश्यत् तत्र किज्चित् स भूतमस्मिन् महावने । सव्यसाची ततः श्रान्त: पानीयं सो5भ्यधावत,जब उस विशाल वनमें उन्हें कोई भी हिंसक प्राणी नहीं दिखायी दिया, तब सव्यसाची अर्जुन थककर पानीकी ओर दौड़े
ସେହି ବିଶାଳ ଅରଣ୍ୟରେ ସେ କୌଣସି ପ୍ରାଣୀକୁ ମଧ୍ୟ ଦେଖିଲେ ନାହିଁ। ତେଣୁ କ୍ଳାନ୍ତ ସବ୍ୟସାଚୀ ଅର୍ଜୁନ ଜଳ ଦିଗକୁ ଧାଇଲେ।
Verse 26
अभिधावंस्ततो वाक्यमन्तरिक्षात् स शुश्रुवे । किमासीदसि पानीयं नैतच्छक्यं बलात् त्वया,दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी--“कुन्तीनन्दन! क्यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते। भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ'
ଧାଉଥିବାବେଳେ ସେ ଆକାଶରୁ ଆସୁଥିବା ଏକ ବାଣୀ ଶୁଣିଲେ—“କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ! ତୁମେ ଜଳ ନିକଟକୁ କାହିଁକି ଯାଉଛ? ବଳପୂର୍ବକ ଏହି ଜଳ ତୁମେ ପିଇ ପାରିବ ନାହିଁ।”
Verse 27
कौन्तेय यदि प्रश्नांस्तान् मयोक्तान् प्रतिपत्स्यसे । ततः पास्यसि पानीयं हरिष्यसि च भारत,दौड़ते समय उन्हें आकाशकी ओरसे आती हुई वाणी सुनायी दी--“कुन्तीनन्दन! क्यों पानीके निकट जा रहे हो? तुम जबरदस्ती यह जल नहीं पी सकते। भारत! यदि मेरे उन प्रश्नोंका उत्तर दे सको, तो यहाँका पानी पीओ और साथ ले भी जाओ'
“କୁନ୍ତୀନନ୍ଦନ! ମୋର କହିଥିବା ସେହି ପ୍ରଶ୍ନଗୁଡ଼ିକର ଯଥାର୍ଥ ଉତ୍ତର ତୁମେ ଦେଇପାରିଲେ, ତେବେ ତୁମେ ଏହି ଜଳ ପିଇପାରିବ; ହେ ଭାରତ, ଚାହିଲେ ସାଥିରେ ନେଇ ଯିବାକୁ ମଧ୍ୟ ପାରିବ।”
Verse 28
वारितस्त्वब्रवीत् पार्थो दृश्यमानो निवारय । यावद् बाणैविंनिर्भिन्न: पुनर्नैंवं वदिष्यसि,इस प्रकार रोके जानेपर अर्जुनने कहा--“जरा सामने आकर रोको। सामने आते ही बाणोंसे टुकड़े-टुकड़े हो जानेपर फिर तुम इस प्रकार नहीं बोल पाओगे”
ଏପରି ରୋକାଯାଇ ପାର୍ଥ କହିଲେ—“ରୋକିବାକୁ ଚାହୁଁଛ, ତେବେ ସାମ୍ନାକୁ ଆସି ରୋକ। ମୋ ବାଣରେ ଛିନ୍ନଭିନ୍ନ ହୋଇଗଲେ ପୁଣି ଏଭଳି କଥା କହିପାରିବୁ ନାହିଁ।”
Verse 29
एवमुक्त्वा ततः पार्थ: शरैरस्त्रानुमन्त्रितै: । प्रववर्ष दिश: कृत्स्ना: शब्दवेधं च दर्शयन्,ऐसा कहकर अर्जुनने अपनी शब्दवेध-कलाका परिचय देते हुए दिव्यास्त्रोंसे अभिमन्त्रित बाणोंकी सब ओर झड़ी लगा दी
ଏପରି କହି ପାର୍ଥ (ଅର୍ଜୁନ) ଶବ୍ଦବେଧ-ବିଦ୍ୟାର ନିପୁଣତା ପ୍ରଦର୍ଶନ କରି, ଦିବ୍ୟାସ୍ତ୍ର-ମନ୍ତ୍ରରେ ଅଭିମନ୍ତ୍ରିତ ବାଣମାନଙ୍କୁ ସମସ୍ତ ଦିଗରେ ବର୍ଷା ପରି ବର୍ଷାଇଲେ—ଏହା ଉନ୍ମତ୍ତ ହିଂସା ନୁହେଁ, ସଂୟମିତ କୌଶଳର ପ୍ରମାଣ।
Verse 30
कर्णिनालीकनाराचानुत्सूजन् भरतर्षभ । स त्वमोघानिषून् मुक््त्वा तृष्णयाभिप्रपीडित:
ଯକ୍ଷ କହିଲା—“ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ତୁମେ କର୍ଣ୍ଣିଯୁକ୍ତ ବାଣ, ନାଳିକ ଓ ନାରାଚ ଛାଡ଼ୁଛ; ତଥାପି ତୃଷ୍ଣାରେ ପୀଡ଼ିତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଅମୋଘ ଶରମାନଙ୍କର ସମ୍ପୂର୍ଣ୍ଣ ବର୍ଷା ଛାଡ଼ିଦେଲ।”
Verse 31
यक्ष उवाच कि विघातेन ते पार्थ प्रश्नानुकत्वा ततः पिब
ଯକ୍ଷ କହିଲା—“ହେ ପାର୍ଥ! ଏହି ବ୍ୟର୍ଥ ସଂଘର୍ଷରେ ତୁମର କ’ଣ ଲାଭ? ପ୍ରଥମେ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦିଅ; ତା’ପରେ ଜଳ ପିଅ।”
Verse 32
एवमुक्तस्तत: पार्थ: सव्यसाची धनंजय:
ଏପରି କୁହାଯାଇଥିବାରୁ ପାର୍ଥ—ସବ୍ୟସାଚୀ ଧନଞ୍ଜୟ ଅର୍ଜୁନ—ଉତ୍ତର ଦେଲେ; ଏବେ ପରୀକ୍ଷା ବଳର ନୁହେଁ, ବିବେକ, ଆତ୍ମସଂଯମ ଓ ଧର୍ମବୁଦ୍ଧିର।
Verse 33
अथाब्रवीद् भीमसेन कुन्तीपुत्रो युधिछ्ठिर:
ତା’ପରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଭୀମସେନଙ୍କୁ କହିଲେ; ଯକ୍ଷର ପରୀକ୍ଷା ମଧ୍ୟରେ ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭ୍ରାତା ଭୀମଙ୍କ ଦିଗକୁ ଫେରିଲେ—ଯେନ ଇଙ୍ଗିତ, ଧର୍ମରକ୍ଷା ଏବେ ବଳରେ ନୁହେଁ, ସଂୟତ ବାଣୀ ଓ ସମ୍ୟକ୍ ନ୍ୟାୟବିଚାରରେ।
Verse 34
नकुल: सहदेवश्न बीभत्सुश्च॒ परंतप । चिरं गतास्तोयहेतोर्न चागच्छन्ति भारत
ଯକ୍ଷ କହିଲା—ହେ ପରନ୍ତପ! ନକୁଳ, ସହଦେବ ଏବଂ ବୀଭତ୍ସୁ (ଅର୍ଜୁନ) ମଧ୍ୟ ଜଳ ପାଇଁ ବହୁଦିନ ପୂର୍ବରୁ ଗଲେ; ହେ ଭାରତ, ସେମାନେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଫେରିନାହାନ୍ତି।
Verse 35
तांश्वैवानय भद्ठरें ते पानीयं च त्वमानय । तब कुन्तीकुमार युधिष्ठिरने भीमसेनसे कहा--“परंतप! भरतनन्दन! नकुल, सहदेव और अर्जुनको पानीके लिये गये बहुत देर हो गयी। वे अभीतक नहीं आ रहे हैं। तुम्हारा कल्याण हो। तुम जाकर उन्हें बुला लाओ और पानी भी ले आओ” ।। ३३-३४ $ ।। भीमसेनस्तथेत्युक्त्वा त॑ देशं प्रत्यपद्यत
ଯକ୍ଷ କହିଲା—“ସେମାନଙ୍କୁ ଶୀଘ୍ର ଏଠାକୁ ଆଣ; ତୋର ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଏବଂ ତୁ ନିଜେ ମଧ୍ୟ ଜଳ ଆଣ।” ଏହିପରି କହାଯାଇ ଭୀମସେନ “ତଥାସ୍ତୁ” କହି ସେହି ସ୍ଥାନକୁ ଗଲା।
Verse 36
यत्र ते पुरुषव्याप्रा भ्रातरोडस्थ निपातिता: । तान् दृष्टवा दु:खितो भीमस्तृषया च प्रपीडित:
ଯକ୍ଷ କହିଲା—“ଯେଉଁଠାରେ ତୋର ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର ଏଇ ଆଠ ଭାଇ ପଡ଼ିଥିଲେ, ସେମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ଭୀମ ଶୋକାକୁଳ ହେଲା ଏବଂ ସେହି ସମୟରେ ତୃଷ୍ଣାରେ ମଧ୍ୟ ଭୟଙ୍କର ଭାବେ ପୀଡ଼ିତ ହେଲା।”
Verse 37
तब भीमसेन “बहुत अच्छा” कहकर उस स्थान-पर गये, जहाँ वे पुरुषसिंह तीनों भाई पृथ्वीपर पड़े थे। उन्हें उस अवस्थामें देखकर भीमसेनको बड़ा दुःख हुआ। इधर प्यास भी उन्हें बहुत कष्ट दे रही थी ।। अमन्यत महाबाहु: कर्म तद् यक्षरक्षसाम् स चिन्तयामास तदा योद्धव्यं ध्रुवमद्य वै
ସେଠାକୁ ପହଞ୍ଚି ମହାବାହୁ ଭୀମ ସେଇ ତିନି ପୁରୁଷସିଂହ ଭାଇଙ୍କୁ ପୃଥିବୀରେ ପଡ଼ିଥିବା ଦେଖିଲା। ସେମାନଙ୍କ ଦଶା ଦେଖି ସେ ଶୋକାକୁଳ ହେଲା; ତୃଷ୍ଣା ମଧ୍ୟ ତାକୁ ଭୟଙ୍କର କଷ୍ଟ ଦେଲା। ତେବେ ସେ ମହାବାହୁ ଏହାକୁ ଯକ୍ଷ-ରାକ୍ଷସମାନଙ୍କ କୃତ୍ୟ ଭାବି ମନେ ଚିନ୍ତା କଲା—“ଆଜି ଯୁଦ୍ଧ ନିଶ୍ଚିତ।”
Verse 38
पास्यामि तावत् पानीयमिति पार्थो वृकोदर: । ततो<भ्यधावत् पानीयं पिपासु: पुरुषर्षभ:
“ପ୍ରଥମେ ମୁଁ ଜଳ ଦେଖିଆସିବି,” ବୋଲି କହି ବୃକୋଦର (ଭୀମ) ଆଗେ ବଢ଼ିଲା। ତାପରେ ସେ ପୁରୁଷର୍ଷଭ ତୃଷ୍ଣାରେ କାତର ହୋଇ ଜଳ ଦିଗକୁ ଧାଇଲା।
Verse 39
महाबाहु भीमसेनने मन-ही-मन यह निश्चय किया कि “यह यक्षों तथा राक्षस्रोंका काम है।' फिर उन्होंने सोचा; “आज निश्चय ही मुझे शत्रुके साथ युद्ध करना पड़ेगा, अतः पहले जल तो पी लूँ।” ऐसा निश्चय करके प्यासे नरश्रेष्ठ कुन्तीकुमार भीमसेन जलकी ओर दौड़े ।। यक्ष उवाच मा तात साहसं कार्षीमम पूर्वपरिग्रह: । प्रश्नानुक्त्वा तु कौन्तेय ततः पिब हरस्व च,यक्ष बोला--तात! पानी पीनेका साहस न करना। इस जलपर पहलेसे ही मेरा अधिकार स्थापित हो चुका है। कुन्तीकुमार! पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दे दो, फिर पानी पीओ और ले भी जाओ
ଯକ୍ଷ କହିଲା— “ତାତ! ଅବିବେକୀ ସାହସ କରନି। ଏହି ଜଳ ଉପରେ ପୂର୍ବରୁ ମୋର ଅଧିକାର ସ୍ଥାପିତ। ହେ କୌନ୍ତେୟ, ପ୍ରଥମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ଦେ; ତାପରେ ଜଳ ପିଅ—ଇଚ୍ଛା ହେଲେ ନେଇ ଯାଅ ମଧ୍ୟ।”
Verse 40
एवमुक्तस्तदा भीमो यक्षेणामिततेजसा । अनुक्त्वैव तु तान् प्रश्नान् पीत्वैव निपपात ह,अमिततेजस्वी यक्षके ऐसा कहनेपर भी भीमसेन उन प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही जल पीने लगे और पीते ही मूर्च्छिंत होकर गिर पड़े
ଅମିତ ତେଜସ୍ବୀ ଯକ୍ଷ ଏପରି କହିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଭୀମ ସେ ପ୍ରଶ୍ନମାନଙ୍କର ଉତ୍ତର ନ ଦେଇ ଜଳ ପିଇଲା; ଏବଂ ପିଇବା ସହସହି ସେ ମୂର୍ଛିତ ହୋଇ ପଡ଼ିଗଲା।
Verse 41
ततः कुन्तीसुतो राजा प्रचिन्त्य पुरुषर्षभ: । समुत्थाय महाबाहुर्दहुमानेन चेतसा,तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे
ତାପରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର—ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ—ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଗଭୀର ଚିନ୍ତା କରି ଉଠିଲେ; ଦହୁଥିବା ଚିତ୍ତ ସହ ଆଗେଇଲେ।
Verse 42
व्यपेतजननिर्घोष॑ प्रविवेश महावनम् । रुरुभिश्न वराहैश्व पक्षिभिश्न निषेवितम्,तदनन्तर कुन्तीपुत्र पुरुषरत्न महाबाहु राजा युधिष्ठिर बहुत देरतक सोच-विचार करके उठे और जलते हुए हृदयसे उन्होंने उस विशाल वनमें प्रवेश किया, जहाँ मनुष्योंकी आवाजतक नहीं सुनायी देती थी। वहाँ रुरु मृग, वराह तथा पक्षियोंके समुदाय ही निवास करते थे
ସେ ମନୁଷ୍ୟ-ନିର୍ଘୋଷ ଲୁପ୍ତ ଥିବା ସେଇ ମହାବନରେ ପ୍ରବେଶ କଲେ; ସେଠାରେ ରୁରୁ ମୃଗ, ବରାହ ଓ ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କ ଦଳ ମାତ୍ର ନିବାସ କରୁଥିଲେ।
Verse 43
नीलभास्वरवर्णश्न॒ पादपैरुपशोभितम् | भ्रमरैरुपगीतं च पक्षिभिश्न महायशा:,नीले रंगके चमकीले वृक्ष उस वनकी शोभा बढ़ा रहे थे। भ्रमरोंके गुंजन और विहंगोंके कलरवसे वह वनप्रान्त शब्दायमान हो रहा था
ହେ ମହାଯଶସ୍ବୀ! ନୀଳାଭ ଦୀପ୍ତ ବର୍ଣ୍ଣର ପାଦପମାନେ ସେ ବନକୁ ଶୋଭାୟିତ କରିଥିଲେ; ଭ୍ରମରମାନଙ୍କ ଗୁଞ୍ଜନ-ଗୀତ ଓ ପକ୍ଷୀମାନଙ୍କ କଲରବରେ ସେ ବନପ୍ରାନ୍ତ ନିନାଦିତ ହେଉଥିଲା।
Verse 44
स गच्छन् कानने तस्मिन् हेमजालपरिष्कृतम् । ददर्श तत् सर: श्रीमान् विश्वकर्मकृतं यथा,महायशस्वी श्रीमान् युधिष्ठिरने उस वनमें विचरण करते हुए उस सरोवरको देखा, जो सुनहरे रंगके कुसुमकेसरोंसे विभूषित था। जान पड़ता था; साक्षात् विश्वकर्माने ही उसका निर्माण किया है
ସେହି ବନରେ ଚାଲିଯାଉଥିବା ବେଳେ ମହାୟଶସ୍ବୀ ଶ୍ରୀମାନ୍ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ସୁବର୍ଣ୍ଣଜାଳରେ ଶୋଭିତ ସେହି ସରୋବରକୁ ଦେଖିଲେ; ମନେ ହେଲା ସାକ୍ଷାତ୍ ବିଶ୍ୱକର୍ମା ତାହା ନିର୍ମାଣ କରିଛନ୍ତି।
Verse 45
उपेतं नलिनीजालै: सिन्धुवारै: सवेतसै: । केतकै: करवीरैश्नव पिप्पलैश्वैव संवृतम् । (ततो धर्मसुतः श्रीमान् भ्रातृदर्शनलालस: ।) श्रमार्तस्तदुपागम्य सरो दृष्टवाथ विस्मित:,उस सरोवरका जल कमलकी बेलोंसे आच्छादित हो रहा था और उसके चारों किनारोंपर सिंदुवार, बेंत, केवड़े, करवीर तथा पीपलके वृक्ष उसे घेरे हुए थे। उस समय भाइयोंसे मिलनेके लिये उत्सुक श्रीमान् धर्मनन्दन युधिष्ठिर थकावटसे पीड़ित हो उस सरोवरपर आये और वहाँकी अवस्था देखकर बड़े विस्मित हुए
ସେହି ସରୋବରର ଜଳ କମଳଲତାର ଗୁଚ୍ଛରେ ଆବୃତ ଥିଲା, ଏବଂ ଚାରିପାଖେ ସିନ୍ଧୁବାର, ବେତସ, କେତକ, କରବୀର ଓ ପିପ୍ପଳ ଗଛ ତାହାକୁ ସମସ୍ତ ଦିଗରୁ ଘେରି ରହିଥିଲେ। ତାପରେ ଭାଇମାନଙ୍କ ଦର୍ଶନ ପାଇଁ ଆତୁର ଧର୍ମସୁତ ଶ୍ରୀମାନ୍ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶ୍ରମରେ କ୍ଲାନ୍ତ ହୋଇ ସେଠାକୁ ଆସି, ସେହି ସରୋବରକୁ ଦେଖି ଆଶ୍ଚର୍ୟଚକିତ ହେଲେ।
Verse 306
अनेकैरिषुसड्घातैरन्तरिक्षे ववर्ष ह । भरतश्रेष्ठ जनमेजय! अर्जुन उस समय कर्णि, नालीक तथा नाराच आदि बाणोंकी वर्षा कर रहे थे। प्याससे पीड़ित हुए अर्जुनने कितने ही अमोघ बाणोंका प्रयोग करके आकाशमें भी कई बार बाण-समूहकी वर्षा की
ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜନମେଜୟ! ସେ ସମୟରେ ଅର୍ଜୁନ କର୍ଣ୍ଣୀ, ନାଳୀକ ଓ ନାରାଚ ଆଦି ଅସଂଖ୍ୟ ବାଣଗୁଚ୍ଛ ଆକାଶରେ ବର୍ଷାଇଲେ। ପିଆସରେ ପୀଡିତ ହୋଇଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ଅନେକ ଅମୋଘ ଶର ପ୍ରୟୋଗ କରି, ପୁନଃପୁନଃ ଆକାଶକୁ ମଧ୍ୟ ବାଣବର୍ଷାରେ ଭରିଦେଲେ।
Verse 311
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत आरणेयपर्वमें मृगका अनुसंधानविषयक तीन सौ ग्यारहवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଆରଣେୟପର୍ବରେ ମୃଗ-ଅନୁସନ୍ଧାନ ବିଷୟକ ତିନିଶେ ଏଗାରତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 316
अनुक्त्वा च पिबन प्रश्नान् पीत्वैव न भविष्यसि । यक्ष बोला--पार्थ! इस प्रकार प्राणियोंपर आघात करनेसे क्या लाभ? पहले मेरे प्रश्नोंका उत्तर दो, फिर जल पीओ। यदि तुम प्रश्नोंका उत्तर दिये बिना ही यहाँका जल पीओगे, तो पीते ही मर जाओगे
ୟକ୍ଷ କହିଲା—“ପାର୍ଥ! ମୋ ପ୍ରଶ୍ନଗୁଡ଼ିକର ଉତ୍ତର ନ ଦେଇ ଯଦି ତୁମେ ଜଳ ପିବ, ତେବେ ପିଇବା ସହିତେ ଜୀବିତ ରହିବ ନାହିଁ। ଏଭଳି ଭାବେ ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କ ଉପରେ ପ୍ରହାର କରି କ’ଣ ଲାଭ? ପ୍ରଥମେ ମୋ ପ୍ରଶ୍ନର ଉତ୍ତର ଦିଅ; ତାପରେ ଜଳ ପିଅ। ଉତ୍ତର ନ ଦେଇ ଏଠାର ଜଳ ପିଲେ, ପିଇବା କ୍ଷଣେ ମୃତ୍ୟୁ ପାଇବ।”
Verse 323
अवज्ञायैव तां वाचं पीत्वैव निपपात ह । उसके ऐसा कहनेपर कुन्तीपुत्र सव्यसाची धनंजय उसके वचनोंकी अवहेलना करके जल पीने लगे और पीते ही अचेत होकर गिर पड़े
ଯକ୍ଷର ସତର୍କବାଣୀକୁ ଅବଜ୍ଞା କରି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ସବ୍ୟସାଚୀ ଧନଞ୍ଜୟ ସେ ଜଳ ପିଲେ; ଏବଂ ପିଇବା ସହସହି ସେ ଅଚେତ ହୋଇ ଭୂମିରେ ପଡ଼ିଗଲେ।
Verse 3312
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि आरणेयपर्वणि नकुलादिपतने द्वादशाधिकत्रिशततमो<5ध्याय:
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ବନପର୍ବର ଆରଣେୟପର୍ବରେ ‘ନକୁଳାଦି ପତନ’ ବିଷୟକ (ବାରଟି ଅଧିକ) ତିନିଶେ ଚବିଶତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।