Adhyaya 35
Udyoga ParvaAdhyaya 3574 Verses

Adhyaya 35

Ārjava, Satya, and the Virocana–Sudhanvan Exemplum (Udyoga-parva 35)

Upa-parva: Vidura-nīti (Counsel of Vidura) — Ethical Statecraft Discourses

The chapter opens with Dhṛtarāṣṭra requesting further dharma- and artha-aligned instruction, expressing sustained interest in Vidura’s ‘variegated’ counsel (1). Vidura prioritizes ethical straightforwardness (ārjava) over even universal pilgrimage-bathing, presenting moral conduct toward all beings as equal or superior to ritual purification (2). He urges the king to adopt ārjava specifically in relation to his sons, promising worldly fame (kīrti) and posthumous well-being (3–4). To illustrate truth’s governance value, Vidura introduces an ancient exemplum: Keśinī questions Virocana about the relative superiority of brāhmaṇas and daityas, prompting a confrontation with the brāhmaṇa Sudhanvan (5–12). Their dispute escalates into a wager of life, requiring adjudication by Prahrāda, who navigates conflicting roles as father and witness (13–23). Sudhanvan explains the severe social and moral costs of false speech, with graded consequences for lying about animals, cattle, horses, persons, and land—culminating in a prohibition against ‘land-lies’ (24–27). Prahrāda rules in favor of Sudhanvan, establishing brāhmaṇa superiority in this frame and compelling Virocana’s submission; Sudhanvan restores Virocana due to Prahrāda’s adherence to dharma (28–31). Vidura then applies the lesson directly: Dhṛtarāṣṭra should not speak untruth for territory and should avoid collective ruin driven by attachment to sons (32). The remainder compiles governance maxims: divine protection operates through discernment rather than coercive rescue (33); intention toward the good yields success (34); deceit abandons the deceiver at death (35); certain social conflicts and corrupt paths are to be avoided (36); unreliable witnesses are listed (37); misperformed ‘status-rituals’ bring fear (38); grave antisocial acts are enumerated (39–41). Ethical evaluation is framed through conduct under stress (42), and the erosive forces of age, death, anger, desire, and pride are noted (43). Prosperity is linked to auspiciousness, competence, discipline, and restraint (44). Eight illuminating virtues are enumerated (45–46), followed by a schematic of ‘heavenly indicators’ in human life and the four practices of the good (47–48). Institutional ethics is summarized: no true assembly without elders who speak dharma; no dharma without truth; no truth mixed with deceit (49). Further social qualities and causal moral psychology are stated: evil diminishes wisdom, merit increases it; envy and harshness lead to distress, while non-envy and good conduct lead to ease (50–55). The chapter concludes with pragmatic temporal planning for well-being across life stages (56–58), observations on misplaced praise and the fragility of ill-gotten wealth (59–60), the hierarchy of moral governance (teacher/king/Yama) (61), and cautions about tracing origins (62). It ends by recommending brāhmaṇa-honor, generosity, and integrity as stabilizers of kṣatriya rule, and by criticizing reliance on destructive counselors while urging paternal conduct toward the Pāṇḍavas (63–67).

Chapter Arc: हस्तिनापुर के राजसभा-परिसर में विदुर धृतराष्ट्र के सम्मुख नीति का द्वार खोलते हैं—शांति का मार्ग कहीं बाहर नहीं, भीतर की विद्या, तप और इन्द्रियनिग्रह में है। → विदुर दृष्टान्त के रूप में प्राचीन आख्यान उठाते हैं—हंसरूप में विचरते महर्षि दत्तात्रेय से साध्य देवों का प्रश्न, और कवि-हृदय की वह कसौटी कि अग्नि-सूर्य-सम तेज बाणों से विद्ध होकर भी वह अपने ‘सुकृत’ को पहचानता है। इसी के साथ विदुर धृतराष्ट्र को स्मरण कराते हैं कि द्यूत में द्रौपदी के जीते जाने पर उन्होंने पहले ही चेताया था, पर अंधा मोह और पुत्र-आसक्ति ने राजधर्म को दबा दिया। → विदुर का सीधा, राजोचित आग्रह—‘धार्तराष्ट्र पाण्डवों का पालन करें और पाण्डव आपके पुत्रों का’; कुरुवंश का ‘मेढ़ी-भूत’ स्तम्भ बनकर धृतराष्ट्र ही संधि करें, ताकि शत्रु बीच में दरार न खोजें और दुर्योधन को सत्य में स्थिर करें। → विदुर शांति का सूत्र स्पष्ट करते हैं: विद्या, तप, इन्द्रियनिग्रह और लोभ-त्याग के बिना शान्ति नहीं; सम्यक् अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म और सुतप्त तप का फल अंत में सुख है—अतः अभी संधि कर के कुल-यश और प्रजा-कल्याण की रक्षा की जाए। → धृतराष्ट्र के सामने अंतिम नैतिक मोड़ खड़ा है—क्या वे पुत्र-मोह से ऊपर उठकर पाण्डवों से संधि करेंगे, या दुर्योधन की हठधर्मिता को ही राज्य-नीति बना देंगे?

Shlokas

Verse 1

ऑपन-माज बछ। अफि्-"ऋा - यज्ञोपवीतहीन पिताका पुत्र, उपनयन-संस्कारका समय व्यतीत होनेपर भी यज्ञोपवीतरहित, विवाहित होनेपर भी यज्ञोपवीतहीन--ये तीन प्रकारके “व्रात्य' कहे गये हैं। षट्त्रिशो5्ध्याय: दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादका उल्लेख करके महाकुलीन लोगोंका लक्षण बतलाते हुए विदुरका धृतराष्ट्रको समझाना विदुर उवाच अनत्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम्‌ | आत्रेयस्य च संवाद साध्यानां चेति न: श्रुतम्‌,विदुरजी कहते हैं--राजन्‌! इस विषयमें लोग दत्तात्रेय और साध्यदेवताओंके संवादरूप इस प्राचीन इतिहासका उदाहरण दिया करते हैं; यह मेरा भी सुना हुआ है

ବିଦୁର କହିଲେ—ରାଜନ! ଏହି ବିଷୟରେ ଲୋକେ ପୁରାତନ ଇତିହାସର ଉଦାହରଣ ଦିଅନ୍ତି—ଦତ୍ତାତ୍ରେୟ (ଆତ୍ରେୟ) ଓ ସାଧ୍ୟଦେବତାମାନଙ୍କ ସଂବାଦ। ଏହା ଆମେ ମଧ୍ୟ ପରମ୍ପରାରେ ଶୁଣିଛୁ।

Verse 2

चरन्तं हंसरूपेण महर्षि संशितव्रतम्‌ । साध्या देवा महाप्राज्ञं पर्यपृच्छन्त वै पुरा,प्राचीनकालकी बात है, उत्तम व्रतवाले महाबुद्धिमान्‌ महर्षि दत्तात्रेयजी हंस (परमहंस)-रूपसे विचर रहे थे; उस समय साध्यदेवताओंने उनसे पूछा

ପ୍ରାଚୀନକାଳରେ ଦୃଢ଼ବ୍ରତ, ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ମହର୍ଷି ଦତ୍ତାତ୍ରେୟ ପରମହଂସ-ରୂପେ ବିଚରଣ କରୁଥିଲେ। ସେତେବେଳେ ସାଧ୍ୟଦେବମାନେ ସେହି ପରମଜ୍ଞାନୀଙ୍କୁ ନିକଟେ ଯାଇ ଧର୍ମ ଓ ପରମତତ୍ତ୍ୱ ବିଷୟରେ ପ୍ରଶ୍ନ କଲେ।

Verse 3

साध्या ऊचु. साध्या देवा वयमेते महर्षे दृष्टवा भवन्तं न शकनुमो<डनुमातुम्‌ । श्रुतेन धीरो बुद्धिमांस्त्वं मतो नः काव्यां वाचं वक्तुमर्हस्युदाराम्‌,साध्य बोले--महर्षे! हम सब लोग साध्यदेवता हैं, केवल आपको देखकर हम आपके विषयमें कुछ अनुमान नहीं कर सकते। हमें तो आप शास्त्रज्ञानसे युक्त, धीर एवं बुद्धिमान्‌ जान पड़ते हैं; अत: हमलोगोंको अपनी दिद्वत्तापूर्ण उदार वाणी सुनानेकी कृपा करें

ସାଧ୍ୟମାନେ କହିଲେ—“ହେ ମହର୍ଷେ! ଆମେ ସାଧ୍ୟଦେବ। କେବଳ ଆପଣଙ୍କୁ ଦେଖି ଆପଣଙ୍କ ସ୍ୱରୂପ ବିଷୟରେ ନିଶ୍ଚୟ କରିପାରୁନାହିଁ। କିନ୍ତୁ ଶ୍ରୁତିପରମ୍ପରାରୁ ଆମେ ଆପଣଙ୍କୁ ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ, ଧୀର ଓ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଭାବେ ଜାଣୁ; ତେଣୁ ଆମ ପାଇଁ ଉଦାର, କାବ୍ୟମୟ ଓ ଉପଦେଶମୟ ବାଣୀ କହନ୍ତୁ।”

Verse 4

प ५» | र्ज श्र ली <&ू >2#अर्ीटर या । 202 2 /| जा 2४ 225०.22/+ ८>5<-“+33 0 !--- जवां + हंस उवाच एतत्‌ कार्यममरा: संभश्रुतं मे धृति: शर्म: सत्यधर्मनुवृत्ति: | ग्रन्थिंविनीय हृदयस्य सर्व प्रियाप्रिये चात्मसमं नयीत,परमहंसने कहा--साध्यदेवताओ! मैंने सुना है कि धैर्य-धारण, मनोनिग्रह तथा सत्य- धर्मोंका पालन ही कर्तव्य है; इसके द्वारा पुरुषको चाहिये कि हृदयकी सारी गाँठ खोलकर प्रिय और अप्रियको अपने आत्माके समान समझे

ହଂସ କହିଲେ—“ହେ ଅମରମାନେ, ମୁଁ ଏହି କଥା ଶୁଣିଛି—ଧୃତି, ଅନ୍ତଃସଂଯମ ଓ ସତ୍ୟଧର୍ମର ଅନୁସରଣ ହିଁ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ। ହୃଦୟର ସମସ୍ତ ଗଠି ଖୋଲି, ପ୍ରିୟ ଓ ଅପ୍ରିୟ—ଦୁହିଁକୁ ଆତ୍ମସମ ଭାବେ ଦେଖିବା ଉଚିତ।”

Verse 5

आक्रुश्यमानो नाक्रोशेन्मन्युरेव तितिक्षतः । आक्रोष्टारं निर्दहति सुकृतं चास्य विन्दति,दूसरोंसे गाली सुनकर भी स्वयं उन्हें गाली न दे। (गालीको) सहन करनेवालेका रोका हुआ क्रोध ही गाली देनेवालेको जला डालता है और उसके पुण्यको भी ले लेता है

ଗାଳି ଶୁଣିଲେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତିଗାଳି ଦେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଯେ ସହେ, ତାହାର ଦମିତ କ୍ରୋଧ ହିଁ ଗାଳିଦାତାକୁ ଦହନ କରେ ଏବଂ ତାହାର ପୁଣ୍ୟକୁ ମଧ୍ୟ ହରଣ କରେ।

Verse 6

नाक्रोशी स्यान्नावमानी परस्य मित्रद्रोही नोत नीचोपसेवी । न चाभिमानी न च हीनवृत्तो रूक्षां वाचं रुषतीं वर्जयीत,दूसरोंको न तो गाली दे और न उनका अपमान करे, मित्रोंसे द्रोह तथा नीच पुरुषोंकी सेवा न करे, सदाचारसे हीन एवं अभिमानी न हो, रूखी तथा रोषभरी वाणीका परित्याग करे

କାହାକୁ ଗାଳି ଦେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ, କାହାକୁ ଅପମାନ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ; ମିତ୍ରଙ୍କ ସହ ଦ୍ରୋହ କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ ଏବଂ ନୀଚ ଲୋକଙ୍କ ସେବାରେ ଲିପ୍ତ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। ଅଭିମାନୀ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ, ସଦାଚାରହୀନ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ; ରୂକ୍ଷ ଓ କ୍ରୋଧଭରା ବାଣୀକୁ ବର୍ଜନ କରିବା ଉଚିତ।

Verse 7

मर्माण्यस्थीनि हृदयं तथासून्‌ रूक्षा वाचो निर्दहन्तीह पुंसाम्‌ । तस्माद्‌ वाचमुषती रूक्षरूपां धर्मारामो नित्यशो वर्जयीत,इस जगतमें रूखी बातें मनुष्योंके मर्मस्थान, हड्डी, हृदय तथा प्राणोंको दग्ध करती रहती हैं; इसलिये धर्मानुरागी पुरुष जलानेवाली रूखी बातोंका सदाके लिये परित्याग कर दे

ଏହି ଜଗତରେ ରୁକ୍ଷ କଥା ମନୁଷ୍ୟଙ୍କର ମର୍ମସ୍ଥାନ, ଅସ୍ଥି, ହୃଦୟ ଓ ପ୍ରାଣ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତକୁ ଦଗ୍ଧ କରେ। ତେଣୁ ଧର୍ମରେ ରତ ପୁରୁଷ ସଦା ଦାହକ ଓ କଠୋର ବାଣୀକୁ ବର୍ଜନ କରୁ।

Verse 8

अरुन्तुदं परुषं रूक्षवा्चं वाक्कण्टकैर्वितुदन्तं मनुष्यान्‌ । विद्यादलक्ष्मीकतमं जनानां मुखे निबद्धां निर्क्रतिं वै वहन्तम्‌,जिसकी वाणी रूखी और स्वभाव कठोर है, जो मर्मस्थानपर आघात करता और वाग्बाणोंसे मनुष्योंको पीड़ा पहुँचाता है, उसे ऐसा समझना चाहिये कि वह मनुष्योंमें महादरिद्र है और वह अपने मुखमें दरिद्रता अथवा मौतको बाँधे हुए ढो रहा है

ଯାହାର ବାଣୀ ରୁକ୍ଷ ଓ ସ୍ୱଭାବ କଠୋର, ଯେ ମର୍ମସ୍ଥାନରେ ଆଘାତ କରେ ଏବଂ ବାକ୍-କଣ୍ଟକରେ ମନୁଷ୍ୟଙ୍କୁ ବିଦ୍ଧ କରି ପୀଡ଼ା ଦିଏ—ତାକୁ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସର୍ବାଧିକ ଦରିଦ୍ର ଜାଣ; ସେ ନିଜ ମୁଖରେ ଦରିଦ୍ରତା, ଅର୍ଥାତ୍ ମୃତ୍ୟୁକୁ ମାନୋ ବାନ୍ଧି ବହି ଚାଲିଛି।

Verse 9

परश्रेदेनमभिविध्येत बाणै- भुशं सुतीक्ष्णैरनलार्कदी प्तै: । स विध्यमानो5प्यतिदह्यमानो विद्यात्‌ कवि: सुकृतं मे दधाति,यदि दूसरा कोई इस मनुष्यको अग्नि और सूर्यके समान दग्ध करनेवाले अत्यन्त तीखे वाग्बाणोंसे बहुत चोट पहुँचावे तो वह विद्वान्‌ पुरुष चोट खाकर अत्यन्त वेदना सहते हुए भी ऐसा समझे कि वह मेरे पुण्योंको पुष्ट कर रहा है

ଯଦି ଅନ୍ୟ କେହି ଅଗ୍ନି ଓ ସୂର୍ଯ୍ୟ ସମ ଦହନକାରୀ, ଅତ୍ୟନ୍ତ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାକ୍-ବାଣରେ ତାକୁ ପୁନଃପୁନଃ ବିଦ୍ଧ କରେ, ତେବେ ସେ ଜ୍ଞାନୀ କବି ବିଦ୍ଧ ହୋଇ ଅତି ଦହିଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଏହିପରି ଜାଣୁ—“ଏହା ମୋ ପୁଣ୍ୟକୁ ପୁଷ୍ଟ କରୁଛି।”

Verse 10

यदि सन्त॑ सेवति यद्यसन्तं तपस्विनं यदि वा स्तेनमेव । वासो यथा रड्रवशं प्रयाति तथा स तेषां वशमभ्युपैति,जैसे वस्त्र जिस रंगमें रँगा जाय, वैसा ही हो जाता है, उसी प्रकार यदि कोई सज्जन, असज्जन, तपस्वी अथवा चोरकी सेवा करता है तो वह उन्हींके वशमें हो जाता है--उसपर उन्हींका रंग चढ़ जाता है

ହଂସ କହିଲେ: କେହି ସଜ୍ଜନଙ୍କୁ ସେବେ କି ଦୁର୍ଜନଙ୍କୁ; ତପସ୍ବୀଙ୍କୁ ସେବେ କି ଚୋରକୁ ମଧ୍ୟ—ବସ୍ତ୍ର ଯେପରି ଯେ ରଙ୍ଗରେ ରଞ୍ଜିତ ହୁଏ ସେହି ରଙ୍ଗ ଧାରଣ କରେ, ସେପରି ସେ ତାଙ୍କ ପ୍ରଭାବରେ ପଡ଼ି ତାଙ୍କ ସ୍ୱଭାବରେ ରଙ୍ଗିଯାଏ।

Verse 11

अतिवादं न प्रवदेन्न वादयेद्‌ यो5नाहतः प्रतिहन्यान्न घातयेत्‌ । हन्तुं च यो नेच्छति पापकं वै तस्मै देवा: स्पृहयन्त्यागताय,जो स्वयं किसीके प्रति बुरी बात नहीं कहता, दूसरोंसे भी नहीं कहलाता, बिना मार खाये स्वयं न तो किसीको मारता है और न दूसरोंसे ही मरवाता है, मार खाकर भी अपराधीको जो मारना नहीं चाहता, (स्वर्गमें) देवता भी उसके आगमनकी बाट जोहते रहते हैं

ହଂସ କହିଲେ: ଅତିବାଦ କିମ୍ବା ଅପଶବ୍ଦ କହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ବିବାଦକୁ ଉକ୍ତାନ୍ତ କରିବା ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ଯେ ନିଜେ ଆଘାତ ପାଇନାହିଁ ସେ ପ୍ରତିଆଘାତ କରୁ ନାହିଁ; ଅନ୍ୟକୁ ଆଘାତ କରାଇବା ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ। ଏବଂ ଆଘାତ ପାଇଲେ ମଧ୍ୟ ଯେ ଅପରାଧୀକୁ ହତ୍ୟା କରିବାକୁ ଚାହେ ନାହିଁ—ଏମିତି ସଂୟମୀର ସ୍ୱର୍ଗାଗମନକୁ ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଆକାଂକ୍ଷା କରନ୍ତି।

Verse 12

अव्याह्तं व्याहवताच्छेय आहु: सत्यं वदेद्‌ व्याहृतं तद्‌ द्वितीयम्‌ प्रियं वदेद्‌ व्याह्ृतं तत्‌ तृतीयं धर्म वदेद्‌ व्याह्ृतं तच्चतुर्थम्‌,बोलनेसे न बोलना ही अच्छा बताया गया है, (यह वाणीकी प्रथम विशेषता है और यदि बोलना ही पड़े तो) सत्य बोलना वाणीकी दूसरी विशेषता है यानी मौनकी अपेक्षा भी अधिक लाभप्रद है। (सत्य और) प्रिय बोलना वाणीकी तीसरी विशेषता है। यदि सत्य और प्रियके साथ ही धर्मसम्मत भी कहा जाय, तो वह वचनकी चौथी विशेषता है। (इनमें उत्तरोत्तर श्रेष्ठता है)

ହଂସ କହିଲେ— କଥା କହିବାଠାରୁ ମୌନ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ବୋଲି କୁହାଯାଏ। କହିବାକୁ ପଡ଼ିଲେ ସତ୍ୟ କହିବା ଦ୍ୱିତୀୟ ଶ୍ରେଷ୍ଠ। ସତ୍ୟ ଓ ପ୍ରିୟ ଏମିତି ବାକ୍ୟ ତୃତୀୟ। ସତ୍ୟ, ପ୍ରିୟ ଓ ଧର୍ମସମ୍ମତ ବାକ୍ୟ ଚତୁର୍ଥ—ସର୍ବୋତ୍ତମ।

Verse 13

यादृशै: संनिविशते यादृशांश्वोपसेवते । यादृगिच्छेच्च भवितुं तादूगू भवति पूरुष:,मनुष्य जैसे लोगोंके साथ रहता है, जैसे लोगोंकी सेवा करता है और जैसा होना चाहता है, वैसा ही हो जाता है

ମଣିଷ ଯେମିତି ଲୋକଙ୍କ ସହିତ ରହେ, ଯେମିତି ଲୋକଙ୍କୁ ସେବା-ଅନୁସରଣ କରେ, ଏବଂ ମନରେ ଯେମିତି ହେବାକୁ ଚାହେ—ଶେଷେ ସେ ତେମିତି ହୋଇଯାଏ।

Verse 14

यतो यतो निवर्तते ततस्ततो विमुच्यते । निवर्तनाद्धि सर्वतो न वेत्ति दुःखमण्वपि,मनुष्य जिन-जिन विषयोंसे मनको हटाता जाता है, उन-उनसे उसकी मुक्ति होती जाती है; इस प्रकार यदि सब ओरसे निवृत्ति हो जाय तो उसे लेशमात्र दुःखका भी कभी अनुभव नहीं होता

ମଣିଷ ଯେଉଁ ଯେଉଁ ବିଷୟରୁ ମନକୁ ଫେରାଏ, ସେହି ସେହି ବିଷୟରୁ ସେ କ୍ରମେ ମୁକ୍ତ ହୁଏ। ଏଭଳି ସବୁ ଦିଗରୁ ପୂର୍ଣ୍ଣ ନିବୃତ୍ତି ହେଲେ, ସେ ଅଣୁମାତ୍ର ଦୁଃଖ ମଧ୍ୟ ଅନୁଭବ କରେନାହିଁ।

Verse 15

न जीयते चानुजिगीषते<न्यान्‌ न वैरकृच्चाप्रतिघातकश्न । निन्दाप्रशंसासु समस्वभावो न शोचते हृष्पति नैव चायम्‌,जो न तो स्वयं किसीसे जीता जाता, न दूसरोंको जीतनेकी इच्छा करता है, न किसीके साथ वैर करता और न दूसरोंको चोट पहुँचाना चाहता है, जो निन्दा और प्रशंसामें समानभाव रखता है, वह हर्ष-शोकसे परे हो जाता है

ହଂସ କହିଲେ— ଯେ ନ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଜିତାଯାଏ, ନ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ଜିତିବାକୁ ଚାହେ; ଯେ ବୈର କରେନାହିଁ, ନ କାହାକୁ ଆଘାତ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରେ; ନିନ୍ଦା-ପ୍ରଶଂସାରେ ଯାହାର ସମଭାବ—ସେ ନ ଶୋକରେ ଡଗମଗାଏ, ନ ହର୍ଷରେ ଉଲ୍ଲସେ; ସେ ଉଭୟକୁ ଅତିକ୍ରମ କରେ।

Verse 16

भावमिच्छति सर्वस्य नाभावे कुरुते मन: । सत्यवादी मृदुर्दान्तो यः स उत्तमपूरुष:,जो सबका कल्याण चाहता है, किसीके अकल्याण-की बात मनमें भी नहीं लाता, जो सत्यवादी, कोमल और जितेन्द्रिय है, वह उत्तम पुरुष माना गया है

ଯେ ସମସ୍ତଙ୍କ ମଙ୍ଗଳ ଚାହେ, କାହାର ଅମଙ୍ଗଳ ପ୍ରତି ମନକୁ ମଧ୍ୟ ନ ନେଇଯାଏ; ଯେ ସତ୍ୟବାଦୀ, ମୃଦୁ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟଜିତ—ସେଇ ଉତ୍ତମ ପୁରୁଷ।

Verse 17

नानर्थक॑ सान्त्वयति प्रतिज्ञाय ददाति च । रन्ध्रं परस्थ जानाति य: स मध्यमपूरुष:,जो झूठी सान्त्वना नहीं देता, देनेकी प्रतिज्ञा करके दे ही देता है, दूसरोंके दोषोंको जानता है, वह मध्यम श्रेणीका पुरुष है

ଯେ ଅର୍ଥହୀନ ସାନ୍ତ୍ୱନା ଦିଏ ନାହିଁ, ଦେବି ବୋଲି ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରି ସତ୍ୟସତ୍ୟ ଦିଏ, ଏବଂ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ଦୋଷ-ଛିଦ୍ର ଜାଣେ—ସେ ମଧ୍ୟମ ଶ୍ରେଣୀର ପୁରୁଷ।

Verse 18

दुःशासनस्तूपहतो 5$भिशस्तो नावर्तते मन्युवशात्‌ कृतघ्न: । न कस्यचिन्मित्रमथो दुरात्मा कलाश्रैता अधमस्येह पुंस:,जिसका शासन अत्यन्त कठोर हो, जो अनेक दोषोंसे दूषित हो, कलंकित हो, जो क्रोधवश किसीकी बुराई करनेसे नहीं हटता हो, दूसरोंके किये हुए उपकारको नहीं मानता हो, जिसकी किसीके साथ मित्रता नहीं हो तथा जो दुरात्मा हो--ये अधम पुरुषके भेद हैं

ଯାହାର ଶାସନ ଅତ୍ୟନ୍ତ କଠୋର, ଯେ ଅନେକ ଦୋଷରେ ଦୂଷିତ ଓ କଳଙ୍କିତ, ଯେ କ୍ରୋଧବଶେ ନିନ୍ଦାରୁ ଫେରେ ନାହିଁ, ଯେ କୃତ ଉପକାରକୁ ମାନେ ନାହିଁ, ଯାହାର କାହା ସହିତ ମିତ୍ରତା ନାହିଁ ଓ ଯେ ଦୁରାତ୍ମା—ଏହିମାନେ ଏହି ଲୋକରେ ଅଧମ ପୁରୁଷର ଲକ୍ଷଣ।

Verse 19

न श्रद्दधाति कल्याण परेभ्योडप्यात्मशड्कित: । निराकरोति मित्राणि यो वै सो5धमपूरुष:,जो अपने ही ऊपर संदेह होनेके कारण दूसरोंसे भी कल्याण होनेका विश्वास नहीं करता, मित्रोंको भी दूर रखता है, वह अवश्य ही अधम पुरुष है

ଯେ ନିଜ ଉପରେ ସନ୍ଦେହ ଥିବାରୁ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କଠାରୁ ମଧ୍ୟ କଳ୍ୟାଣ ହେବ ବୋଲି ଶ୍ରଦ୍ଧା କରେ ନାହିଁ, ଏବଂ ମିତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଦୂରେ ଠେଲିଦିଏ—ସେ ନିଶ୍ଚୟ ଅଧମ ପୁରୁଷ।

Verse 20

उत्तमानेव सेवेत प्राप्तकाले तु मध्यमान्‌ । अधर्मांस्तु न सेवेत य इच्छेद्‌ भूतिमात्मन:,जो अपनी एऐश्वर्यवृद्धि चाहता है, वह उत्तम पुरुषोंकी ही सेवा करे, समय आ पड़नेपर मध्यम पुरुषोंकी भी सेवा कर ले, परंतु अधम पुरुषोंकी सेवा कदापि न करे

ଯେ ନିଜ ଭୂତି-ସମୃଦ୍ଧିର ବୃଦ୍ଧି ଚାହେ, ସେ ଉତ୍ତମମାନଙ୍କୁ ମାତ୍ର ସେବା କରୁ; ସମୟ ପଡିଲେ ମଧ୍ୟମମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ କରିପାରେ; କିନ୍ତୁ ଅଧର୍ମୀମାନଙ୍କୁ କେବେ ମଧ୍ୟ ସେବା କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।

Verse 21

प्राप्रोति वै वित्तमसद्वलेन नित्योत्थानात्‌ प्रज्ञया पौरुषेण | न त्वेव सम्यग्‌ लभते प्रशंसां न वृत्तमाप्रोति महाकुलानाम्‌,मनुष्य दुष्ट पुरुषोंके बलसे, निरन्तरके उद्योगसे, बुद्धिसे तथा पुरुषार्थसे धन भले ही प्राप्त कर ले; परंतु इससे उत्तम कुलीन पुरुषोंके सम्मान और सदाचारको वह पूर्णरूपसे कदापि नहीं प्राप्त कर सकता

ଅଧର୍ମୀମାନଙ୍କ ବଳରେ, ନିତ୍ୟ ଉଦ୍ୟମରେ, ପ୍ରଜ୍ଞାରେ ଓ ପୌରୁଷରେ ଦୁଷ୍ଟ ପୁରୁଷ ଧନ ଲାଭ କରିପାରେ; କିନ୍ତୁ ତାହାଦ୍ୱାରା ସେ ମହାକୁଳମାନଙ୍କ ଯଥାର୍ଥ ପ୍ରଶଂସା ଓ ଶିଷ୍ଟ ଆଚରଣକୁ ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ କେବେ ମଧ୍ୟ ପାଇନଥାଏ।

Verse 22

धृतराष्ट्र उवाच महाकुले भ्य: स्पृहयन्ति देवा धर्मार्थनित्याश्व बहुश्रुताश्न । पृच्छामि त्वां विदुर प्रश्नमेत॑ भवन्ति वै कानि महाकुलानि,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! धर्म और अर्थके अनुष्ठानमें परायण एवं बहुश्रुत देवता भी उत्तम कुलमें उत्पन्न पुरुषोंकी इच्छा करते हैं। इसलिये मैं तुमसे यह प्रश्न करता हूँ कि महान्‌ (उत्तम) कुलीन कौन हैं?

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— ବିଦୁର! ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ଅନୁଷ୍ଠାନରେ ନିତ୍ୟନିଷ୍ଠ ଏବଂ ବହୁଶ୍ରୁତ ମହାକୁଳଜନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଜନ୍ମ ନେବାକୁ ଦେବତାମାନେ ମଧ୍ୟ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରନ୍ତି। ତେଣୁ ମୁଁ ତୁମକୁ ପଚାରୁଛି— କେଉଁ କୁଳଗୁଡ଼ିକ ସତ୍ୟରେ ‘ମହାକୁଳ’?

Verse 23

विदुर उवाच तपो दमो ब्रह्मवित्तं विताना: पुण्या विवाहा: सततान्नदानम्‌ | येष्वेवैते सप्त गुणा वसन्ति सम्यग्वृत्तास्तानि महाकुलानि,विदुरजी बोले--राजन्‌! जिनमें तप, इन्द्रियसंयम, वेदोंका स्वाध्याय, यज्ञ, पवित्र विवाह, सदा अन्नदान और सदाचार--ये सात गुण वर्तमान हैं, उन्हें महान्‌ (उत्तम) कुलीन कहते हैं

ବିଦୁର କହିଲେ— ରାଜନ୍! ତପ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟସଂଯମ, ବେଦ-ବ୍ରହ୍ମବିଦ୍ୟା, ଯଜ୍ଞାନୁଷ୍ଠାନର ପରିପାଳନ, ପବିତ୍ର ବିବାହ, ନିରନ୍ତର ଅନ୍ନଦାନ ଓ ସମ୍ୟକ୍ ସଦାଚାର—ଏହି ସାତ ଗୁଣ ଯେଉଁ କୁଳରେ ବସନ୍ତି, ସେହି କୁଳଗୁଡ଼ିକୁ ‘ମହାକୁଳ’ କୁହାଯାଏ।

Verse 24

येषां हि वृत्तं व्यथते न योनि- श्षित्तप्रसादेन चरन्ति धर्मम्‌ । ते कीर्तिमिच्छन्ति कुले विशिष्टां त्यक्तानृतास्तानि महाकुलानि,जिनका सदाचार शिथिल नहीं होता, जो अपने दोषोंसे माता-पिताको कष्ट नहीं पहुँचाते, प्रसन्नचित्तसे धर्मका आचरण करते हैं तथा असत्यका परित्याग कर अपने कुलकी विशेष कीर्ति चाहते हैं, वे ही महान्‌ कुलीन हैं

ବିଦୁର କହିଲେ— ଯାହାଙ୍କ ସଦାଚାର ଶିଥିଳ ହୁଏ ନାହିଁ, ଯେମାନେ ନିଜ ଦୋଷରେ ମାତାପିତାଙ୍କୁ କଷ୍ଟ ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ, ପ୍ରସନ୍ନଚିତ୍ତରେ ଧର୍ମାଚରଣ କରନ୍ତି, ଏବଂ ଅସତ୍ୟକୁ ତ୍ୟାଗ କରି କୁଳର ବିଶିଷ୍ଟ କୀର୍ତ୍ତି ଚାହାନ୍ତି—ସେହି କୁଳମାନେ ହିଁ ସତ୍ୟରେ ‘ମହାକୁଳ’।

Verse 25

अनिज्यया कुविवाहैरवेदस्योत्सादनेन च | कुलान्यकुलतां यान्ति धर्मस्यातिक्रमेण च,यज्ञ न होनेसे, निन्दित कुलमें विवाह करनेसे, वेदका त्याग और धर्मका उल्लंघन करनेसे उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं

ବିଦୁର ସତର୍କ କଲେ— ଯଜ୍ଞ ନ କରିବା, ନିନ୍ଦିତ କୁଳରେ ବିବାହ, ବେଦକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଏବଂ ଧର୍ମ ଉଲ୍ଲଂଘନ—ଏହି କାରଣରୁ ଉତ୍ତମ କୁଳମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଧମତାକୁ ଯାଆନ୍ତି।

Verse 26

देवद्रव्यविनाशेन ब्रह्मस्वहरणेन च । कुलान्यकुलतां यान्ति ब्राह्म॒णातिक्रमेण च,देवताओंके धनका नाश, ब्राह्मणके धनका अपहरण और ब्राह्मणोंकी मर्यादाका उल्लंघन करनेसे उत्तम कुल भी अधम हो जाते हैं

ବିଦୁର କହିଲେ— ଦେବଦ୍ରବ୍ୟର ବିନାଶ, ବ୍ରାହ୍ମଣସ୍ୱର ହରଣ, ଏବଂ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଉଲ୍ଲଂଘନ—ଏହି କାରଣରୁ ଉତ୍ତମ କୁଳମାନେ ମଧ୍ୟ ଅଧମତାକୁ ଯାଆନ୍ତି।

Verse 27

ब्राह्मणानां परिभवात्‌ परिवादाच्च भारत । कुलान्यकुलतां यान्ति न्‍न्यासापहरणेन च,भारत! ब्राह्मणोंक अनादर और निन्दासे तथा धरोहर रखी हुई वस्तुको छिपा लेनेसे अच्छे कुल भी निन्दनीय हो जाते हैं

ବିଦୁର କହିଲେ— ହେ ଭାରତ! ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଅପମାନ, ନିନ୍ଦା ଏବଂ ନିକ୍ଷେପ (ଅମାନତ) ଅପହରଣ କରିବାରୁ ଉତ୍ତମ କୁଳମାନେ ମଧ୍ୟ କଳଙ୍କିତ ହୋଇ ନୀଚ ଭାବେ ଗଣାଯାନ୍ତି।

Verse 28

कुलानि समुपेतानि गोभि: पुरुषतो<र्थतः । कुलसंख्यां न गच्छन्ति यानि हीनानि वृत्तत:,गौओं, मनुष्यों और धनसे सम्पन्न होकर भी जो कुल सदाचारसे हीन हैं, वे अच्छे कुलोंकी गणनामें नहीं आ सकते

ଗୋଧନ, ଲୋକବଳ ଓ ଧନରେ ସମୃଦ୍ଧ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଯେ କୁଳ ସଦାଚାରରେ ହୀନ, ସେ କୁଳ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କୁଳମାନଙ୍କ ଗଣନାରେ ପଡ଼େ ନାହିଁ।

Verse 29

वृत्ततस्त्वविहीनानि कुलान्यल्पधनान्यपि । कुलसंख्यां च गच्छन्ति कर्षन्ति च महद्‌ यश:,थोड़े धनवाले कुल भी यदि सदाचारसे सम्पन्न हैं तो वे अच्छे कुलोंकी गणनामें आ जाते हैं और महान्‌ यश प्राप्त करते हैं

ଅଳ୍ପ ଧନ ଥିବା କୁଳ ମଧ୍ୟ ଯଦି ସଦାଚାରରେ ଅଭାବ ନଥାଏ, ତେବେ ସେମାନେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କୁଳମାନଙ୍କ ଗଣନାରେ ପଡ଼ନ୍ତି ଏବଂ ମହାନ୍ ଯଶ ଲାଭ କରନ୍ତି।

Verse 30

वृत्तं यत्नेन संरक्षेद्‌ वित्तमेति च याति च | अक्षीणो वित्तत: क्षीणो वृत्ततस्तु हतो हतः,सदाचारकी रक्षा यत्नपूर्वक करनी चाहिये; धन तो आता और जाता रहता है। धन क्षीण हो जानेपर भी सदाचारी मनुष्य क्षीण नहीं माना जाता; किंतु जो सदाचारसे भ्रष्ट हो गया, उसे तो नष्ट ही समझना चाहिये

ସଦାଚାରକୁ ଯତ୍ନପୂର୍ବକ ସୁରକ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ; ଧନ ଆସେ ଓ ଯାଏ। ଧନ କ୍ଷୟ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ମଣିଷ ସତ୍ୟରେ କ୍ଷୀଣ ହୁଏ ନାହିଁ; କିନ୍ତୁ ସଦାଚାରରୁ ପତିତ ହେଲେ ସେ ନିଶ୍ଚୟ ନଷ୍ଟ।

Verse 31

गोभि: पशुभिरश्वैश्व कृष्पा च सुसमृद्धया । कुलानि न प्ररोहन्ति यानि हीनानि वृत्तत:,जो कुल सदाचारसे हीन हैं, वे गौओं, पशुओं, घोड़ों तथा हरी-भरी खेतीसे सम्पन्न होनेपर भी उन्नति नहीं कर पाते

ଯେ କୁଳ ସଦାଚାରରେ ହୀନ, ସେ କୁଳ ଗୋଧନ, ପଶୁ, ଘୋଡ଼ା ଏବଂ ସୁସମୃଦ୍ଧ କୃଷି ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ସତ୍ୟ ଉନ୍ନତି କରିପାରେ ନାହିଁ।

Verse 32

मा न: कुले वैरकृत्‌ कश्रिदस्तु राजामात्यो मा परस्वापहारी । मित्रद्रोही नैकतिको$नृती वा पूर्वाशी वा पितृदेवातिथिभ्य:,हमारे कुलमें कोई वैर करनेवाला न हो, दूसरोंके धनका अपहरण करनेवाला राजा अथवा मन्त्री न हो और मित्रद्रोही, कपटी तथा असत्यवादी न हो। इसी प्रकार माता-पिता, देवता एवं अतिथियों-को भोजन करानेसे पहले भोजन करनेवाला भी न हो

ବିଦୁର କହିଲେ— ଆମ ବଂଶରେ କେହି ବିରୋଧ ଜଗାଇବାଳା ନ ହେଉ; ଆମ ମଧ୍ୟରେ କୌଣସି ରାଜା କିମ୍ବା ମନ୍ତ୍ରୀ ପରଧନ ଅପହରଣକାରୀ ନ ହେଉ। କେହି ମିତ୍ରଦ୍ରୋହୀ, ଛଳକାରୀ କିମ୍ବା ମିଥ୍ୟାବାଦୀ ନ ହେଉ; ଏବଂ ପିତାମାତା, ଦେବତା ଓ ଅତିଥିଙ୍କୁ ପ୍ରଥମେ ଅର୍ପଣ ନ କରି ପୂର୍ବେ ଭୋଜନ କରୁଥିବା କେହି ମଧ୍ୟ ନ ହେଉ।

Verse 33

यश्न नो ब्राह्मणान्‌ हन्याद्‌ यश्न नो ब्राह्मणान्‌ द्विषेत्‌ । न नः स समितिं गच्छेद्‌ यश्व नो निर्वपेत्‌ पितृनू,हमलोगोंमेंसे जो ब्राह्मणोंकी हत्या कर, ब्राह्मणोंके साथ द्वेष करे तथा पितरोंको पिण्डदान एवं तर्पण न करे, वह हमारी सभामें न प्रवेश करे

ଆମ ମଧ୍ୟରୁ ଯେ କେହି ବ୍ରାହ୍ମଣହତ୍ୟା କରେ, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ଦ୍ୱେଷ ରଖେ, ଏବଂ ପିତୃମାନଙ୍କୁ ପିଣ୍ଡଦାନ-ତର୍ପଣ ନ କରେ— ସେ ଆମ ସଭାକୁ ନ ଆସୁ।

Verse 34

तृणानि भूमिरुदकं वाक्‌ चतुर्थी च सूनूता । सतामेतानि गेहेषु नोच्छिद्यन्ते कदाचन,तृणका आसन, पृथ्वी, जल और चौथी मीठी वाणी--सज्जनोंके घरमें इन चार चीजोंकी कभी कमी नहीं होती

ତୃଣାସନ, ଭୂମି, ଜଳ, ଏବଂ ଚତୁର୍ଥ— ‘ସୂନୃତା’ ଅର୍ଥାତ୍ ମଧୁର ଓ ସତ୍ୟ ବାଣୀ; ସଜ୍ଜନଙ୍କ ଘରେ ଏହି ଚାରିଟି କେବେ ଶେଷ ହୁଏ ନାହିଁ।

Verse 35

इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजागयरपर्वमें विदुर-नीतिवाक्यविषयक पैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ,श्रद्धया परया राजन्नुपनीतानि सत्कृतिम्‌ । प्रवृत्तानि महाप्राज्ञ धर्मिणां पुण्यकर्मिणाम्‌ महाप्राज्ञ राजन! पुण्यकर्म करनेवाले धर्मात्मा पुरुषोंके यहाँ ये (उपर्युक्त वस्तुएँ) बड़ी श्रद्धाके साथ सत्कारके लिये उपस्थित की जाती हैं

ହେ ରାଜନ, ପରମ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ଏହି ଅର୍ପଣଗୁଡ଼ିକୁ ସତ୍କାର ଓ ଆତିଥ୍ୟର ନିମିତ୍ତେ ଆଗକୁ ଆଣାଯାଏ; ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ! ପୁଣ୍ୟକର୍ମରତ ଧର୍ମାତ୍ମାମାନଙ୍କ ଘରେ ଏହି ଆଚାର ଚାଲିଥାଏ।

Verse 36

सूक्ष्मोडपि भार नृपते स्यन्दनो वै शक्तो वोढुं न तथान्ये महीजा: । एवं युक्ता भारसहा भवन्ति महाकुलीना न तथान्ये मनुष्या:,नूपवर! रथ छोटा-सा होनेपर भी भार ढो सकता है, किंतु दूसरे काठ बड़े-बड़े होनेपर भी ऐसा नहीं कर सकते। इसी प्रकार उत्तम कुलमें उत्पन्न उत्साही पुरुष भार सह सकते हैं, दूसरे मनुष्य वैसे नहीं होते इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरहितवाक्ये षट्त्रिंशो ध्याय: ।। ३६ || इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजागरपर्वमें विदुर-हितवाक्यविषयक छत्तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ

ହେ ନୃପତି, ରଥ ଛୋଟ ହେଲେ ମଧ୍ୟ ଭାର ବୋହିବାକୁ ସମର୍ଥ; କିନ୍ତୁ ଅନ୍ୟ ବଡ଼ ବଡ଼ କାଠ ଖଣ୍ଡ ତାହା ପାରେ ନାହିଁ। ସେହିପରି ମହାକୁଳରେ ଜନ୍ମି, ଶିକ୍ଷା-ଶାସନରେ ଯୁକ୍ତ ପୁରୁଷମାନେ ଭାରସହ ହୁଅନ୍ତି; ଅନ୍ୟ ମନୁଷ୍ୟ ତେଣୁ ନୁହେଁ।

Verse 37

न तम्मित्र॑ं यस्य कोपाद्‌ बिभेति यद्‌ वा मित्र शड़कितेनोपचर्यम्‌ । यस्मिन्‌ मित्रे पितरीवाश्वसीत तद्‌ वै मित्र सड़तानीतराणि,जिसके कोपसे भयभीत होना पड़े तथा शंकित होकर जिसकी सेवा की जाय, वह मित्र नहीं है। मित्र तो वही है, जिसपर पिताकी भाँति विश्वास किया जा सके; दूसरे तो साथीमात्र हैं

ଯାହାର କ୍ରୋଧରୁ ଭୟ ହୁଏ, କିମ୍ବା ଯାହାକୁ ସନ୍ଦେହ ସହିତ ସେବା କରିବାକୁ ପଡ଼େ, ସେ ମିତ୍ର ନୁହେଁ। ପିତାଙ୍କ ପରି ଯାହାର ଉପରେ ନିଶ୍ଚିନ୍ତ ଭରସା ରଖିହେବ, ସେଇ ମିତ୍ର; ଅନ୍ୟମାନେ କେବଳ ପରିସ୍ଥିତିବଶତଃ ମିଳିଥିବା ସାଥୀମାତ୍ର।

Verse 38

यः कक्षिदप्यसम्बद्धो मित्रभावेन वर्तते । स एव बन्धुस्तन्मित्रं सा गतिस्तत्‌ परायणम्‌,पहलेसे कोई सम्बन्ध न होनेपर भी जो मित्रताका बर्ताव करे, वही बन्धु, वही मित्र, वही सहारा और वही आश्रय है

ପୂର୍ବରୁ କୌଣସି ସମ୍ପର୍କ ନଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଯେ ନିଷ୍କପଟ ମିତ୍ରଭାବରେ ବ୍ୟବହାର କରେ, ସେଇ ବନ୍ଧୁ, ସେଇ ମିତ୍ର, ସେଇ ସହାୟ, ସେଇ ଆଶ୍ରୟ।

Verse 39

चलचित्तस्य वै पुंसो वृद्धाननुपसेवत: । पारिप्लवमतेर्नित्यमप्चुवो मित्रसंग्रह:,जिसका चित्त चंचल है, जो वृद्धोंकी सेवा नहीं करता, उस अनिश्चितमति पुरुषके लिये मित्रोंका संग्रह स्थायी नहीं होता

ଯାହାର ଚିତ୍ତ ଚଞ୍ଚଳ, ଯେ ବୃଦ୍ଧମାନଙ୍କ ସେବା-ଉପାସନା କରେନାହିଁ, ସେଇ ଅନିଶ୍ଚିତମତି ପୁରୁଷ ପାଇଁ ମିତ୍ରସଂଗ୍ରହ କେବେ ନିଶ୍ଚଳ ରହେନାହିଁ।

Verse 40

चलचित्तमनात्मानमिन्द्रियाणां वशानुगम्‌ | अर्था: समभिवर्तन्ते हंसा: शुष्क॑ सरो यथा,जैसे सूखे सरोवरके ऊपर ही हंस मँड़राकर रह जाते हैं, उसके भीतर नहीं प्रवेश करते, उसी प्रकार जिसका चित्त चंचल है, जो अज्ञानी और इन्द्रियोंका गुलाम है, अर्थ उसको त्याग देते हैं

ଯେପରି ଶୁଷ୍କ ସରୋବର ଉପରେ ହଂସମାନେ ଘୁରିବେ, କିନ୍ତୁ ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କରିବେନାହିଁ; ସେପରି ଯାହାର ଚିତ୍ତ ଚଞ୍ଚଳ, ଯେ ଆତ୍ମସଂଯମହୀନ ଓ ଇନ୍ଦ୍ରିୟବଶ, ଧନ-ସମ୍ପଦ ତାଙ୍କୁ ନିକଟେ ଆସି ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରିଦିଏ।

Verse 41

अकस्मादेव कुप्यन्ति प्रसीदन्त्यनिमित्तत: । शीलमेतदसाधूनाम श्र पारिप्लवं यथा,दुष्ट पुरुषोंका स्वभाव मेघके समान चंचल होता है, वे सहसा क्रोध कर बैठते हैं और अकारण ही प्रसन्न हो जाते हैं

ଦୁଷ୍ଟମାନଙ୍କ ସ୍ୱଭାବ ମେଘ ପରି ଚଞ୍ଚଳ; ସେମାନେ ହଠାତ୍ କ୍ରୋଧ କରନ୍ତି ଏବଂ ଅକାରଣେ ପ୍ରସନ୍ନ ହୋଇଯାନ୍ତି। ଏହି ଅସ୍ଥିରତା ହିଁ ଅସାଧୁଙ୍କ ଲକ୍ଷଣ।

Verse 42

सत्कृताश्च कृतार्थाश्च मित्राणां न भवन्ति ये । तान्‌ मृतानपि क्रव्यादा: कृतघ्नान्‌ नोपभुज्जते

ଯେମାନେ ମିତ୍ରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ସତ୍କୃତ ହୋଇ ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ସାହାଯ୍ୟରେ କୃତାର୍ଥ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତିଦାନରେ ସତ୍ୟ ମିତ୍ର ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ, ସେମାନେ କୃତଘ୍ନ। ଏମିତି କୃତଘ୍ନମାନେ ମରିଗଲେ ମଧ୍ୟ, କୁହାଯାଏ, କ୍ରବ୍ୟାଦ (ମାଂସଭୋଜୀ) ପ୍ରାଣୀମାନେ ସୁଦ୍ଧା ତାଙ୍କ ମାଂସ ଖାଆନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 43

जो मित्रोंसे सत्कार पाकर और उनकी सहायतासे कृतकार्य होकर भी उनके नहीं होते, ऐसे कृतघ्नोंके मरनेपर उनका मांस मांसभोजी जनन्‍्तु भी नहीं खाते ।। अर्चयेदेव मित्राणि सति वासति वा धने । नानर्थयन्‌ प्रजानाति मित्राणां सारफल्गुताम्‌

ସମୃଦ୍ଧି ଥାଉ କି ଧନ ନିକଟରେ ରହୁ, ମିତ୍ରମାନଙ୍କୁ ନିଶ୍ଚୟ ସମ୍ମାନ କରିବା ଉଚିତ। ଯେ ଲୋକ କେବେ ବିପତ୍ତିରେ ପଡ଼ିନାହିଁ, ସେ ମିତ୍ରମାନଙ୍କର ସାର ଓ ଫଲ୍ଗୁତା (ଅସାରତା)କୁ ଯଥାର୍ଥ ଭାବେ ଜାଣିପାରେ ନାହିଁ।

Verse 44

धन हो या न हो, मित्रोंसे कुछ भी न माँगते हुए उनका सत्कार तो करे ही। मित्रोंके सार-असारकी परीक्षा न करे ।। संतापाद्‌ भ्रश्यते रूप॑ संतापाद्‌ भ्रश्यते बलम्‌ | संतापाद्‌ भ्रश्यते ज्ञानं संतापाद्‌ व्याधिमूच्छति,संताप (शोक)-से रूप नष्ट होता है, संतापसे बल नष्ट होता है, संतापसे ज्ञान नष्ट होता है और संतापसे मनुष्य रोगको प्राप्त होता है

ଧନ ଥାଉ କି ନ ଥାଉ, ମିତ୍ରମାନଙ୍କୁ କିଛି ନ ମାଗି ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କର ସତ୍କାର କରିବା ଉଚିତ; ମିତ୍ରମାନଙ୍କ ସାର-ଅସାରର ପରୀକ୍ଷା କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ। କାରଣ ସନ୍ତାପରୁ ରୂପ ନଷ୍ଟ ହୁଏ, ସନ୍ତାପରୁ ବଳ ନଷ୍ଟ ହୁଏ, ସନ୍ତାପରୁ ଜ୍ଞାନ ନଷ୍ଟ ହୁଏ, ଏବଂ ସନ୍ତାପରୁ ମନୁଷ୍ୟ ରୋଗକୁ ପ୍ରାପ୍ତ ହୁଏ।

Verse 45

अनवाप्यं च शोकेन शरीरं चोपतप्यते । अमित्राश्ष प्रहष्यन्ति मा सम शोके मन: कृथा:,अभीष्ट वस्तु शोक करनेसे नहीं मिलती; उससे तो केवल शरीर संतप्त होता है और शत्रु प्रसन्न होते हैं। इसलिये आप मनमें शोक न करें

ଶୋକ କରିଲେ ଅପ୍ରାପ୍ତ ବସ୍ତୁ ମିଳେ ନାହିଁ; ଶୋକରେ କେବଳ ଶରୀର ଦଗ୍ଧ ହୁଏ ଏବଂ ଶତ୍ରୁମାନେ ହର୍ଷିତ ହୁଅନ୍ତି। ତେଣୁ ମନରେ ଶୋକ କରନି।

Verse 46

पुनर्नरो प्रियते जायते च पुनर्नरो हीयते वर्धते च । पुनर्नरो याचति याच्यते च पुनर्नर: शोचति शोच्यते च,मनुष्य बार-बार मरता और जन्म लेता है, बार-बार क्षय और वृद्धिको प्राप्त होता है, बार-बार स्वयं दूसरेसे याचना करता है और दूसरे उससे याचना करते हैं तथा बारंबार वह दूसरोंके लिये शोक करता है और दूसरे उसके लिये शोक करते हैं

ମନୁଷ୍ୟ ପୁନଃପୁନଃ ମରେ ଏବଂ ଜନ୍ମ ନେଏ; ପୁନଃପୁନଃ କ୍ଷୟ ପାଏ ଏବଂ ବୃଦ୍ଧି ପାଏ। ପୁନଃପୁନଃ ସେ ନିଜେ ଯାଚନା କରେ ଏବଂ ପୁନଃପୁନଃ ତାଙ୍କୁ ଯାଚନା କରାଯାଏ; ପୁନଃପୁନଃ ସେ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଶୋକ କରେ ଏବଂ ପୁନଃପୁନଃ ଅନ୍ୟମାନେ ତାଙ୍କ ପାଇଁ ଶୋକ କରନ୍ତି।

Verse 47

सुखं च दुःखं च भवाभवौ च लाभालाभौ मरणं जीवितं च । पर्यायश: सर्वमेते स्पृशन्ति तस्माद्‌ धीरो न च हृष्येन्न शोचेत्‌,सुख-दुःख, उत्पत्ति-विनाश, लाभ-हानि और जीवन-मरण--ये क्रमश: सबको प्राप्त होते रहते हैं; इसलिये धीर पुरुषको इनके लिये हर्ष और शोक नहीं करना चाहिये

ସୁଖ-ଦୁଃଖ, ଉତ୍ପତ୍ତି-ବିନାଶ, ଲାଭ-ହାନି ଓ ଜୀବନ-ମରଣ—ଏସବୁ ପର୍ଯ୍ୟାୟକ୍ରମେ ସମସ୍ତଙ୍କୁ ସ୍ପର୍ଶ କରେ; ତେଣୁ ଧୀର ପୁରୁଷ ଏଥିପାଇଁ ନ ହର୍ଷ କରୁ, ନ ଶୋକ କରୁ।

Verse 48

चलानि हीमानि षडिन्द्रियाणि तेषां यद्‌ यद्‌ वर्धते यत्र यत्र । ततस्ततः ख्रवते बुद्धिरस्य छिद्रोदकुम्भादिव नित्यमम्भ:,ये छः इन्द्रियाँ बहुत ही चंचल हैं; इनमेंसे जो-जो इन्द्रिय जिस-जिस विषयकी ओर बढ़ती है, वहाँ-वहाँ बुद्धि उसी प्रकार क्षीण होती है, जैसे फूटे घड़ेसे पानी सदा चू जाता है

ଏହି ଛଅ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ନିଶ୍ଚୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଚଞ୍ଚଳ; ତାହାମଧ୍ୟରୁ ଯେ-ଯେ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଯେ-ଯେ ବିଷୟକୁ ବଳବତୀ ହୋଇ ଧାଉଁଛି, ସେଇ ଦିଗକୁ ମନୁଷ୍ୟର ବୁଦ୍ଧି କ୍ରମେ କ୍ଷୟ ହୁଏ—ଯେପରି ଫୁଟା ଘଡ଼ାରୁ ପାଣି ସଦା ଚୁଇଁଯାଏ।

Verse 49

धृतराष्ट उवाच तनुरुद्धः शिखी राजा मिथ्योपचरितो मया । मन्दानां मम पुत्राणां युद्धेनानतं करिष्यति,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! सूक्ष्म धर्मसे बँधे हुए, शिखासे सुशोभित होनेवाले राजा युधिष्ठिरके साथ मैंने मिथ्या व्यवहार किया है; अतः वे युद्ध करके मेरे मूर्ख पुत्रोंका नाश कर डालेंगे

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ବିଦୁର! ସଂୟମୀ, ଶିଖାଧାରୀ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ସହିତ ମୁଁ ମିଥ୍ୟା ବ୍ୟବହାର କରିଛି; ତେଣୁ ସେ ଯୁଦ୍ଧଦ୍ୱାରା ମୋର ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି ପୁଅମାନଙ୍କର ଅନ୍ତ କରିଦେବ।

Verse 50

नित्योद्विग्नमिदं सर्व नित्योद्विग्नमिदं मन: । यत्‌ तत्‌ पदमनुद्धिग्नं तन्मे वद महामते,महामते! यह सब कुछ सदा ही भयसे उद्विग्न है, मेरा यह मन भी भयसे उद्दिग्न है; इसलिये जो उद्वेगशून्य और शान्त पद (मार्ग) हो, वही मुझे बताओ

ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—ମହାମତେ! ଏ ସମସ୍ତ ଜଗତ ସଦା ଉଦ୍ବେଗରେ କମ୍ପିତ, ମୋର ମନ ମଧ୍ୟ ସଦା ଉଦ୍ବିଗ୍ନ; ତେଣୁ ଯେ ଉଦ୍ବେଗଶୂନ୍ୟ ଓ ଶାନ୍ତ ପଦ (ମାର୍ଗ) ଅଛି, ସେହିଟି ମୋତେ କହ।

Verse 51

विदुर उवाच नान्यत्र विद्यातपसोनन्यत्रेन्द्रियनिग्रहात्‌ नान्यत्र लोभसंत्यागाच्छान्तिं पश्यामि तेडनघ,विदुरजी बोले--पापशून्य नरेश! विद्या, तप, इन्द्रियनिग्रह और लोभत्यागके सिवा और कोई आपके लिये शान्तिका उपाय मैं नहीं देखता

ବିଦୁର କହିଲେ—ଅନଘ ରାଜନ! ବିଦ୍ୟା ଓ ତପ, ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହ ଏବଂ ଲୋଭସନ୍ତ୍ୟାଗ ବ୍ୟତୀତ ଆପଣଙ୍କ ଶାନ୍ତି ପାଇଁ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଉପାୟ ମୁଁ ଦେଖୁନାହିଁ।

Verse 52

बुद्धया भयं प्रणुदति तपसा विन्दते महत्‌ | गुरुशुश्रूषया ज्ञानं शान्तिं योगेन विन्दति,बुद्धिसे मनुष्य अपने भयको दूर करता है, तपस्यासे महत्पदको प्राप्त होता है, गुरुशुश्रूषासे ज्ञान और योगसे शान्ति पाता है

ମନୁଷ୍ୟ ବୁଦ୍ଧିଦ୍ୱାରା ଭୟକୁ ଦୂର କରେ; ତପସ୍ୟାଦ୍ୱାରା ମହତ୍ ପଦ ପାଏ; ଗୁରୁ-ଶୁଶ୍ରୂଷାଦ୍ୱାରା ଜ୍ଞାନ ଏବଂ ଯୋଗଦ୍ୱାରା ଶାନ୍ତି ଲଭେ।

Verse 53

अनश्रिता दानपुण्यं वेदपुण्यमनाश्रिता: । रागद्वेषविनिर्मुक्ता विचरन्तीह मोक्षिण:,मोक्षकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य दानके पुण्यका आश्रय नहीं लेते, वेदके पुण्यका भी आश्रय नहीं लेते; किंतु निष्कामभावसे राग-द्वेषसे रहित हो इस लोकमें विचरते रहते हैं

ମୋକ୍ଷକାମୀ ଲୋକ ଦାନପୁଣ୍ୟର ଆଶ୍ରୟ ନେନ୍ତି ନାହିଁ, ବେଦକର୍ମପୁଣ୍ୟର ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ; ରାଗ-ଦ୍ୱେଷରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇ ନିଷ୍କାମଭାବେ ଏହି ଲୋକରେ ବିଚରଣ କରନ୍ତି।

Verse 54

स्वधीतस्य सुयुद्धस्य सुकृतस्य च कर्मण: । तपसश्न्‌ सुतप्तस्य तस्यान्ते सुखमेधते,सम्यक्‌ अध्ययन, न्यायोचित युद्ध, पुण्यकर्म और अच्छी तरह की हुई तपस्याके अन्तमें सुखकी वृद्धि होती है

ସମ୍ୟକ୍ ଅଧ୍ୟୟନ, ନ୍ୟାୟୋଚିତ ଯୁଦ୍ଧ, ପୁଣ୍ୟକର୍ମ ଏବଂ ସୁତପ୍ତ ତପସ୍ୟା—ଏହାମାନଙ୍କର ଶେଷରେ ସୁଖ ବୃଦ୍ଧି ପାଏ।

Verse 55

स्वास्तीर्णानि शयनानि प्रपन्ना न वै भिन्ना जातु निद्रां लभन्ते । न स्त्रीषु राजन्‌ रतिमाप्रुवन्ति न मागधै: स्तूयमाना न सूतै:,राजन! आपसमें फूट रखनेवाले लोग अच्छे बिछौनोंसे युक्त पलंग पाकर भी कभी सुखकी नींद नहीं सोने पाते; उन्हें स्त्रियोंक पास रहकर तथा सूत-मागधोंद्वारा की हुई स्तुति सुनकर भी प्रसन्नता नहीं होती

ରାଜନ୍! ଯେମାନେ ନିଜ ଲୋକମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଫୁଟ ରଖନ୍ତି, ସେମାନେ ଭଲଭାବେ ପାତିଥିବା ଶୟନ ମିଳିଲେ ମଧ୍ୟ କେବେ ସୁଖନିଦ୍ରା ପାଆନ୍ତି ନାହିଁ। ନାରୀସଙ୍ଗ ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ, ମାଗଧ-ସୂତଙ୍କ ସ୍ତୁତି ମଧ୍ୟ ନୁହେଁ—ସେମାନଙ୍କୁ ଆନନ୍ଦ ଦେଇପାରେ।

Verse 56

न वै भिन्ना जातु चरन्ति धर्म नवैसुखं प्राप्तुवन्तीह भिन्ना: । नवै भिजन्ना गौरवं प्राप्तुवन्ति न वै भिन्ना: प्रशमं रोचयन्ति,जो परस्पर भेदभाव रखते हैं, वे कभी धर्मका आचरण नहीं करते। वे सुख भी नहीं पाते। उन्हें गौरव नहीं प्राप्त होता तथा उन्हें शान्तिकी वार्ता भी नहीं सुहाती

ଯେମାନେ ପରସ୍ପର ଭେଦଭାବରେ ରହନ୍ତି, ସେମାନେ କେବେ ଧର୍ମ ଆଚରଣ କରନ୍ତି ନାହିଁ। ଏହି ଲୋକରେ ସେମାନେ ସୁଖ ପାଆନ୍ତି ନାହିଁ; ଗୌରବ ମଧ୍ୟ ଲଭନ୍ତି ନାହିଁ; ଏବଂ ଶାନ୍ତିର କଥା ମଧ୍ୟ ସେମାନଙ୍କୁ ରୁଚେ ନାହିଁ।

Verse 57

न वै तेषां स्वदते पथ्यमुक्तं योगक्षेम॑ कल्पते नैव तेषाम्‌ । भिन्नानां वै मनुजेन्द्र परायणं न विद्यते किंचिदन्‍्यद्‌ विनाशात्‌,हितकी बात भी कही जाय तो उन्हें अच्छी नहीं लगती। उनके योगक्षेमकी भी सिद्धि नहीं हो पाती। राजन! भेदभाववाले पुरुषोंकी विनाशके सिवा और कोई गति नहीं है

ବିଦୁର କହିଲେ—ହିତକର ପରାମର୍ଶ ଏମିତି ଲୋକଙ୍କୁ କେବେ ମଧ୍ୟ ଭଲ ଲାଗେ ନାହିଁ; ତାଙ୍କ ପାଇଁ ଯୋଗକ୍ଷେମ ମଧ୍ୟ ଦୃଢ଼ ଭାବେ ସ୍ଥାପିତ ହୁଏ ନାହିଁ। ହେ ନରେନ୍ଦ୍ର, ଦଳଭେଦ ଓ ପରସ୍ପର ଶତ୍ରୁତାରେ ଭାଗିଯାଇଥିବାମାନଙ୍କ ପାଇଁ ବିନାଶ ଛଡ଼ା ଅନ୍ୟ କୌଣସି ଶେଷ ଗତି ନାହିଁ।

Verse 58

सम्पन्न गोषु सम्भाव्यं सम्भाव॒य॑ ब्राह्मणे तप: । सम्भाव्यं॑ चापल स्त्रीषु सम्भाव्यं ज्ञातितो भसम्‌,जैसे गौओंमें दूध, ब्राह्मणमें तप और युवती स्त्रियोंमें चंचलताका होना अधिक सम्भाव है, उसी प्रकार अपने जाति-बन्धुओंसे भय होना भी सम्भव ही है

ବିଦୁର କହିଲେ—ଯେପରି ସୁପାଳିତ ଗାଈମାନଙ୍କଠାରେ ଦୁଧ, ବ୍ରାହ୍ମଣଙ୍କଠାରେ ତପସ୍ୟା ଏବଂ ଯୁବତୀ ସ୍ତ୍ରୀମାନଙ୍କଠାରେ ଚଞ୍ଚଳତା ସ୍ୱାଭାବିକ ଭାବେ ଆଶା କରାଯାଏ, ସେପରି ନିଜ ଜ୍ଞାତି-ବନ୍ଧୁମାନଙ୍କଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଭୟ ଓ ବିପଦ ଉଦ୍ଭବ ହେବା ସମ୍ଭବ। ତେଣୁ ପଣ୍ଡିତମାନେ ସତର୍କ ରହନ୍ତି; କେବଳ ବନ୍ଧୁତ୍ୱର ନାମରେ ସାବଧାନତା ଛାଡ଼ନ୍ତି ନାହିଁ।

Verse 59

तन्तव:ः प्यायिता नित्यं तनवो बहुला: समा: । बहून्‌ बहुत्वादायासान्‌ सहन्तीत्युपमा सताम्‌,नित्य सींचकर बढ़ायी हुई पतली लताएँ बहुत होनेके कारण बहुत वर्षोतक नाना प्रकारके झोंके सहती हैं; यही बात सत्पुरुषोंके विषयमें भी समझनी चाहिये। (वे दुर्बल होनेपर भी सामूहिक शक्तिसे बलवान हो जाते हैं)

ବିଦୁର କହିଲେ—ସୂକ୍ଷ୍ମ ତନ୍ତୁମାନେ ମଧ୍ୟ ଯଦି ନିତ୍ୟ ପୋଷିତ ହୋଇ ଅନେକ ହୋଇ ଏକତ୍ର ରହନ୍ତି, ତେବେ ନିଜର ବହୁତ୍ୱର ବଳରେ ଅନେକ ପ୍ରକାର ଟାଣ-ଚାପ ସହନ କରନ୍ତି—ଏହା ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କର ଉପମା। ସେମାନେ ପ୍ରତ୍ୟେକ ଭାବେ ଦୁର୍ବଳ ହେଲେ ମଧ୍ୟ, ଏକତା, ନିରନ୍ତର ସହାୟତା ଓ ସାମୂହିକ ଶକ୍ତିରେ ବଡ଼ ଚାପ ବହନ କରିପାରନ୍ତି।

Verse 60

धूमायन्ते व्यपेतानि ज्वलन्ति सहितानि च | धृतराष्ट्रोल्मुकानीव ज्ञातयो भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ धृतराष्ट्र! जलती हुई लकड़ियाँ अलग-अलग होनेपर धुआँ फेंकती हैं और एक साथ होनेपर प्रज्वलित हो उठती हैं। इसी प्रकार जातिबन्धु भी (आपसमें) फूट होनेपर दुःख उठाते और एकता होनेपर सुखी रहते हैं

ବିଦୁର କହିଲେ—ଜ୍ୱଳନ୍ତ କାଠଖଣ୍ଡ ଅଲଗା ହେଲେ କେବଳ ଧୂଆଁ କରେ, ଏକତ୍ର ରହିଲେ ଦାହିଉଠେ। ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ସେପରି ଜ୍ଞାତି-ବନ୍ଧୁମାନେ ଫୁଟ ହେଲେ ଦୁଃଖ ଭୋଗନ୍ତି, ଏକତା ହେଲେ ସୁଖୀ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 61

ब्राह्मणेषु च ये शूरा: स्त्रीषु ज्ञातिषु गोषु च वृन्तादिव फलं पक्वं धृतराष्ट्र पतन्ति ते,धृतराष्ट्र! जो लोग ब्राह्मणों, स्त्रियों, जातिवालों और गौओंपर ही शूरता प्रकट करते हैं, वे डंठलसे पके हुए फलोंकी भाँति नीचे गिरते हैं

ବିଦୁର ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ସତର୍କ କରି କହିଲେ—ଯେମାନେ ବ୍ରାହ୍ମଣ, ସ୍ତ୍ରୀ, ନିଜ ଜ୍ଞାତି-ବନ୍ଧୁ ଓ ଗାଈମାନଙ୍କ ଉପରେ ମାତ୍ର ‘ଶୂରତା’ ଦେଖାନ୍ତି, ସେମାନେ ପ୍ରକୃତ ଶୂର ନୁହେଁ। ହେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର, ଡାଠିରୁ ପକ୍କ ଫଳ ଯେପରି ନିଶ୍ଚୟ ଝରିପଡ଼େ, ସେପରି ସେମାନେ ମାନ, ସ୍ଥିରତା ଓ ଧର୍ମସ୍ଥାନରୁ ଅନିବାର୍ଯ୍ୟ ଭାବେ ପତିତ ହୁଅନ୍ତି।

Verse 62

महानप्येकजो वृक्षो बलवान्‌ सुप्रतिष्ठित: । प्रसह एव वातेन सस्कन्धो मर्दितुं क्षणात्‌,यदि वृक्ष अकेला है तो वह बलवान, दृढ़मूल तथा बहुत बड़ा होनेपर भी एक ही क्षणमें आँधीके द्वारा बलपूर्वक शाखाओंसहित धराशायी किया जा सकता है

ବିଦୁର କହିଲେ—ଏକା ଦାଁଡ଼ିଥିବା ଗଛ, ଯେତେ ମହାନ, ବଳବାନ ଓ ଦୃଢ଼ମୂଳ ହେଉନାହିଁ, ଝଡ଼ ତାହାକୁ ଶାଖାସହିତ ଏକ କ୍ଷଣରେ ବଳପୂର୍ବକ ଚୁର୍ଣ୍ଣ କରି ପତିତ କରିଦେଇପାରେ।

Verse 63

अथ ये सहिता वृक्षा: सड्चश: सुप्रतिष्ठिता: । ते हि शीघ्रतमान्‌ वातान्‌ सहन्ते<न्योन्यसंश्रयात्‌,किंतु जो बहुत-से वृक्ष एक साथ रहकर समूहके रूपमें खड़े हैं, वे एक-दूसरेके सहारे बड़ी-से-बड़ी आँधीको भी सह सकते हैं

କିନ୍ତୁ ଯେ ଗଛମାନେ ଏକାଠି ଗୋଷ୍ଠୀରେ ଦୃଢ଼ଭାବେ ଦାଁଡ଼ିଥାନ୍ତି, ସେମାନେ ପରସ୍ପର ଆଶ୍ରୟରେ ଅତିତୀବ୍ର ବାତାସକୁ ମଧ୍ୟ ସହିଯାନ୍ତି।

Verse 64

एवं मनुष्यमप्येकं॑ गुणैरपि समन्वितम्‌ । शवयं द्विषन्तो मन्यन्ते वायुर्द्रममिवैकजम्‌,इसी प्रकार समस्त गुणोंसे सम्पन्न मनुष्यको भी अकेले होनेपर शत्रु अपनी शक्तिके अंदर समझते हैं, जैसे अकेले वृक्षको वायु

ଏହିପରି ଗୁଣସମ୍ପନ୍ନ ମଣିଷ ମଧ୍ୟ ଯଦି ଏକା ଥାଏ, ତେବେ ଦ୍ୱେଷୀ ଶତ୍ରୁମାନେ ତାକୁ ନିଜ ଶକ୍ତିର ଭିତରେ ବୋଲି ଭାବନ୍ତି—ଯେପରି ବାୟୁ ଏକା ଗଛକୁ ଦମନ କରେ।

Verse 65

अन्योन्यसमुपष्टम्भादन्योन्यापाश्रयेण च । ज्ञातय: सम्प्रवर्धन्ते सरसीवोत्पलान्युत,किंतु परस्पर मेल होनेसे और एकसे दूसरेको सहारा मिलनेसे जातिवाले लोग इस प्रकार वृद्धिको प्राप्त होते हैं, जैसे तालाबमें कमल

ପରସ୍ପର ସହାୟତା ଓ ପରସ୍ପର ଆଶ୍ରୟରେ ଜ୍ଞାତିଜନ ବୃଦ୍ଧି ପାଆନ୍ତି—ଯେପରି ସରୋବରରେ ଉତ୍ପଳ (ପଦ୍ମ) ଫୁଲେ।

Verse 66

अवध्या ब्राह्मणा गावो ज्ञातय: शिशव: स्त्रिय: । येषां चान्नानि भुज्जीत ये च स्यु: शरणागता:,ब्राह्मण, गौ, कुटुम्बी, बालक, स्त्री, अन्नदाता और शरणागत-ये अवध्य होते हैं

ବ୍ରାହ୍ମଣ, ଗାଈ, ନିଜ ଜ୍ଞାତି, ଶିଶୁ ଓ ସ୍ତ୍ରୀ—ଏମାନେ ଅବଧ୍ୟ; ଏବଂ ଯାହାଙ୍କ ଅନ୍ନ ଭୁଞ୍ଜାଯାଏ ସେମାନେ, ଓ ଯେ ଶରଣାଗତ ହୋଇ ଆସନ୍ତି ସେମାନେ ମଧ୍ୟ ଅବଧ୍ୟ।

Verse 67

न मनुष्ये गुण: कश्चिद्‌ राजन्‌ सधनतामृते । अनातुरत्वाद्‌ भद्रं ते मृतकल्पा हि रोगिण:,राजन्‌! आपका कल्याण हो, मनुष्यमें धन और आरोग्यको छोड़कर दूसरा कोई गुण नहीं है; क्योंकि रोगी तो मुर्देके समान है

ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ଆପଣଙ୍କ ମଙ୍ଗଳ ହେଉ। ଧନ ଓ ନିରୋଗତା ବ୍ୟତୀତ ମନୁଷ୍ୟରେ ଅନ୍ୟ କୌଣସି ବିଶେଷ ଗୁଣ ନାହିଁ; କାରଣ ରୋଗୀ ସତ୍ୟରେ ମୃତସମାନ।

Verse 68

अव्याधिजं कटुकं शीर्षरोगि पापानुबन्धं परुषं तीक्षणमुष्णम्‌ । सतां पेयं यन्न पिबन्त्यसन्तो मन्युं महाराज पिब प्रशाम्य,महाराज! जो बिना रोगके उत्पन्न, कड़वा, सिरमें दर्द पैदा करनेवाला, पापसे सम्बद्ध, कठोर, तीखा और गरम है, जो सज्जनोंद्वारा पान करनेयोग्य है और जिसे दुर्जन नहीं पी सकते--उस क्रोधको आप पी जाइये और शान्त होइये

ବିଦୁର କହିଲେ—ମହାରାଜ! ଯେ କ୍ରୋଧ ଶରୀରରୋଗ ବିନା ଉତ୍ପନ୍ନ ହୁଏ, କଟୁ, ଶିରୋବେଦନାକାରୀ, ପାପସଂଯୁକ୍ତ, କଠୋର, ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଓ ଉଷ୍ଣ—ଯାହା ସତ୍ପୁରୁଷମାନଙ୍କ ପାନଯୋଗ୍ୟ ଏବଂ ଅସତ୍ମାନେ ପିଇପାରନ୍ତି ନାହିଁ—ସେଇ କ୍ରୋଧକୁ ଆପଣ ଅନ୍ତରେ ହିଁ ପିଇ ଶାନ୍ତ ହୁଅନ୍ତୁ।

Verse 69

रोगार्दिता न फलान्याद्रियन्ते न वै लभन्ते विषयेषु तत्त्वम्‌ । दुःखोपेता रोगिणो नित्यमेव न बुध्यन्ते धनभोगान्‌ न सौख्यम्‌,रोगसे पीड़ित मनुष्य मधुर फलोंका आदर नहीं करते, विषयोंमें भी उन्हें कुछ सुख या सार नहीं मिलता। रोगी सदा ही दुःखी रहते हैं; वे न तो धनसम्बधी भोगोंका और न सुखका ही अनुभव करते हैं

ବିଦୁର କହନ୍ତି—ରୋଗାକ୍ରାନ୍ତ ଲୋକ ମଧୁର ଫଳକୁ ମଧ୍ୟ ଆଦର କରନ୍ତି ନାହିଁ, ବିଷୟଭୋଗରେ ମଧ୍ୟ କୌଣସି ସାର ମିଳେ ନାହିଁ। ରୋଗୀ ସଦା ଦୁଃଖରେ ଆବୃତ; ସେ ନ ଧନଜନିତ ଭୋଗକୁ ଠିକ୍‌ ଭାବେ ବୁଝେ, ନ ସୁଖକୁ ଅନୁଭବ କରେ।

Verse 70

पुरा हरुक्तं नाकरोस्त्वं वचो मे द्यूते जितां द्रौपदीं प्रेक्ष्य राजन्‌ । दुर्योधन वारयेत्यक्षवत्यां कितवत्वं पण्डिता वर्जयन्ति

ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ପୂର୍ବେ ମୁଁ କହିଥିବା କଥା ଆପଣ କରିଲେ ନାହିଁ। ଦ୍ୟୂତରେ ଦ୍ରୌପଦୀ ଜିତାଯାଇଥିବା ଦେଖି ମଧ୍ୟ ଆପଣ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ରୋକିଲେ ନାହିଁ। ପଣ୍ଡିତମାନେ ଜୁଆର ଦୁର୍ବ୍ୟସନକୁ ବର୍ଜନ କରନ୍ତି; ଏହା ବିନାଶ ଓ ଅପମାନ ଆଣେ।

Verse 71

राजन! पहले जूएमें द्रौयदीको जीती गयी देखकर मैंने आपसे कहा था--“आप द्यूतक्रीड़ामें आसक्त दुर्योधनको रोकिये, विद्वानूलोग इस प्रवंचनाके लिये मना करते हैं।' किंतु आपने मेरा कहना नहीं माना ।। न तद्‌ बल॑ यन्मृदुना विरुध्यते सूक्ष्मो धर्मस्तरसा सेवितव्य: । प्रध्वंसिनी क्रूरसमाहिता श्री- मृदुप्रौढा गच्छति पुत्रपौत्रान्‌,वह बल नहीं, जिसका मृदुल स्वभावके साथ विरोध हो; सूक्ष्म धर्मका शीघ्र ही सेवन करना चाहिये। क्रूरतापूर्वक उपार्जित लक्ष्मी नश्वर होती है, यदि वह मृदुलतापूर्वक बढ़ायी गयी हो तो पुत्र-पौत्रों-तनक स्थिर रहती है

ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଦ୍ୟୂତରେ ଦ୍ରୌପଦୀ ଜିତାଯାଇଥିବା ଦେଖି ମୁଁ ପୂର୍ବେ ଆପଣଙ୍କୁ କହିଥିଲି—“ଦ୍ୟୂତକ୍ରୀଡାରେ ଆସକ୍ତ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ରୋକନ୍ତୁ; ପଣ୍ଡିତମାନେ ଜୁଆର ଦୋଷକୁ ବର୍ଜନ କରନ୍ତି।” କିନ୍ତୁ ଆପଣ ମୋ କଥା ମାନିଲେ ନାହିଁ। ଯାହା ମୃଦୁତାଙ୍କ ସହ ବିରୋଧ କରେ, ସେ ବଳ ସତ୍ୟ ବଳ ନୁହେଁ; ସୂକ୍ଷ୍ମ ଧର୍ମକୁ ଶୀଘ୍ର ଏବଂ ସାବଧାନରେ ଆଶ୍ରୟ କରିବା ଉଚିତ। କ୍ରୂରତାରେ ଅର୍ଜିତ ଶ୍ରୀ ଧ୍ୱଂସଶୀଳ; କିନ୍ତୁ ମୃଦୁତା ଓ ପକ୍ୱତାରେ ପୋଷିତ ସମୃଦ୍ଧି ପୁତ୍ର-ପୌତ୍ର ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଟିକି ରହେ।

Verse 72

धार्तराष्ट्रा: पाण्डवान्‌ पालयन्तु पाण्डो: सुतास्तव पुत्रांश्न पान्तु । एकारिमित्रा: कुरवो होककार्या जीवन्तु राजन्‌ सुखिन: समृद्धा:,राजन्‌! आपके पुत्र पाण्डवोंकी रक्षा करें और पाण्डुके पुत्र आपके पुत्रोंकी रक्षा करें। सभी कौरव एक-दूसरेके शत्रुको शत्रु और मित्रको मित्र समझें। सबका एक ही कर्तव्य हो, सभी सुखी और समृद्धिशाली होकर जीवन व्यतीत करें

ହେ ରାଜନ୍! ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରୁନ୍ତୁ, ଏବଂ ପାଣ୍ଡୁଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରୁନ୍ତୁ। ସମସ୍ତ କୁରୁ ଏକତ୍ର ହୋଇ—ଏକେ ମିତ୍ରକୁ ମିତ୍ର ଓ ଏକେ ଶତ୍ରୁକୁ ଶତ୍ରୁ ଭାବୁନ୍ତୁ। ସମସ୍ତଙ୍କର ଏକେ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ହେଉ; ସେମାନେ ସୁଖୀ ଓ ସମୃଦ୍ଧ ହୋଇ ସହଯୋଗରେ ଜୀବନ ଯାପନ କରୁନ୍ତୁ।

Verse 73

मेढी भूत: कौरवाणां त्वमद्य त्वय्याधीनं कुरुकूलमाजमीढ । पार्थान्‌ बालान्‌ वनवासप्रतप्तान्‌ गोपायस्व स्वं यशस्तात रक्षन्‌,अजमीढकुलनन्दन! इस समय आप ही कौरवोंके आधारस्तम्भ हैं, कुरुवंश आपके ही अधीन है। तात! कुन्तीके पुत्र अभी बालक हैं और वनवाससे बहुत कष्ट पा चुके हैं; इस समय उनका पालन करके अपने यशकी रक्षा कीजिये

ହେ ଅଜମୀଢକୁଳନନ୍ଦନ! ଆଜି ଆପଣ ହିଁ କୌରବମାନଙ୍କର ଆଧାରସ୍ତମ୍ଭ; କୁରୁବଂଶ ଆପଣଙ୍କ ଅଧୀନରେ ଅଛି। ତାତ! କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନେ ଏଯାବତ୍ ଶିଶୁସଦୃଶ, ଏବଂ ବନବାସର କଷ୍ଟରେ ଦଗ୍ଧ; ସେମାନଙ୍କୁ ରକ୍ଷା କରନ୍ତୁ—ତାହାରେ ଆପଣଙ୍କ ଯଶ ରକ୍ଷିତ ହେବ।

Verse 74

संधत्स्व त्वं कौरव पाण्डुपुत्रै- मा तेडन्तरं रिपव: प्रार्थयन्तु । सत्ये स्थितास्ते नरदेव सर्वे दुर्योधनं स्थापय त्वं नरेन्द्र,कुरुराज! आप पाण्डवोंसे संधि कर लें, जिससे शत्रुओंको आपका छिद्र देखनेका अवसर न मिले। नरदेव! समस्त पाण्डव सत्यपर डटे हुए हैं; अब आप अपने पुत्र दुर्योधनको रोकिये

ହେ କୁରୁରାଜ! ପାଣ୍ଡୁପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ସନ୍ଧି କରନ୍ତୁ, ଯେପରି ଶତ୍ରୁମାନେ ଆପଣଙ୍କ ଘରେ ଛିଦ୍ର ଖୋଜିବାର ସୁଯୋଗ ନ ପାଆନ୍ତୁ। ହେ ନରଦେବ! ସମସ୍ତ ପାଣ୍ଡବ ସତ୍ୟରେ ଅଟୁଟ; ତେଣୁ ନରେନ୍ଦ୍ର, ଆପଣଙ୍କ ପୁତ୍ର ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନକୁ ରୋକନ୍ତୁ।

Frequently Asked Questions

The central dilemma is whether a ruler may employ untruth or evasive conduct to secure territory and factional advantage; the chapter argues that such expediency corrodes legitimacy and produces cascading harm.

Ārjava and satya are presented as higher-order stabilizers of political life: straightforward integrity toward kin and subjects preserves reputation, clarifies judgment, and aligns artha with dharma.

While not a formal phalaśruti, the chapter explicitly links ethical conduct to outcomes: worldly kīrti and posthumous well-being (including ‘svarga’ language) are framed as consequences of sustained integrity and truthfulness.