
Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
Upa-parva: Sanjaya–Dhritarashtra Samvada (Envoy’s Return and Court Reception)
Vaiśaṃpāyana narrates Saṃjaya’s departure after being permitted by the Pāṇḍavas and his swift arrival at Hāstinapura. Saṃjaya follows court procedure: he approaches the inner palace, requests the gatekeeper to announce him as a Pāṇḍava envoy, and seeks entry if the king is awake. The gatekeeper conveys the message; Dhṛtarāṣṭra orders that Saṃjaya be welcomed and admitted without delay. Saṃjaya enters the guarded royal hall and salutes the king, reporting that Yudhiṣṭhira has inquired after Dhṛtarāṣṭra’s welfare, his sons, grandsons, allies, and dependents. Dhṛtarāṣṭra reciprocally asks about Yudhiṣṭhira’s well-being. Saṃjaya then expands into a didactic critique: Yudhiṣṭhira is portrayed as committed to dharma over wealth and comfort, while the Kuru court’s governance is examined through themes of karmic consequence, the limits of human agency versus destiny, and the reputational and social costs of policy error. The discourse warns against rulerly weakness, पुत्रवश (being led by sons), and the failure to restrain destructive counsel. The chapter closes with Saṃjaya requesting rest after travel and noting that the Kurus will convene in the assembly the next morning to hear the Pāṇḍava message.
Chapter Arc: संजय के प्रस्थान के बाद अंधे सम्राट धृतराष्ट्र के भीतर शंका और आत्मरक्षा की बेचैनी उठती है; वह द्वारपाल से कहता है—“मैं विदुर से मिलना चाहता हूँ, उन्हें शीघ्र बुलाओ।” → विदुर राजमहल पहुँचते हैं, पर द्वारपाल उन्हें रोक देता है—राजा ने दर्शन के योग्य नहीं कहा। यह अपमान केवल व्यक्ति का नहीं, नीति का है: सत्य-वक्ता को दरबार से बाहर रखना। इसी पृष्ठभूमि में नीति-वचन उभरते हैं—मूढ़ मनुष्य के लक्षण (अनाहूत प्रवेश, अपृष्ट वाचालता, अविश्वस्त पर विश्वास), और समाज की कटु अर्थ-व्यवस्था (चोर असावधान से, वैद्य रोगी से, कामोन्मत्त स्त्री/पुरुष से जीविका आदि) जैसे कथन, जो धृतराष्ट्र के दरबार की नैतिक गिरावट पर परोक्ष प्रहार बनते हैं। → विदुर का निर्णायक उपदेश धृतराष्ट्र के सामने (या उसके लिए) गूंजता है—नित्यकर्म (दान, होम, देवपूजन, प्रायश्चित्त, मंगल) करने वाले का ‘उत्थान’ देवता भी साधते हैं; और जो आत्मसंयम व लज्जा (आत्मनापत्रपते) धारण करता है, वह सूर्य-सा तेजस्वी होकर लोक-गुरु बनता है। फिर विदुर सीधे मूल प्रश्न पर आते हैं: पाण्डु के पाँच पुत्र—वन में पले, शापदग्ध पिता के अनाथ-से—तुम्हीं ने बाल्य में बढ़ाए-शिक्षित किए; अब उनका न्यायोचित राज्य उन्हें देकर पुत्रों सहित सुखी हो, अन्यथा देव-मानव दोनों के बीच तुम निंद्य ठहरोगे। → अध्याय का निष्कर्ष नीति-निर्णय की कसौटी पर टिकता है: धृतराष्ट्र के लिए मार्ग स्पष्ट है—धर्म के अनुसार पाण्डवों को उनका उचित राज्य सौंपना, ताकि राज्य-शांति और यश दोनों सुरक्षित रहें। विदुर का वचन ‘राजनीति’ नहीं, ‘धर्मनीति’ बनकर खड़ा होता है। → धृतराष्ट्र विदुर की बात सुनकर किस ओर झुकेगा—पुत्रमोह की ओर या धर्म की ओर? दरबार के द्वार खुलेंगे या सत्य-वक्ता फिर रोका जाएगा?
Verse 1
[दाक्षिणात्य अधिक पाठके ७ ई श्लोक मिलाकर कुल ३९ ६ श्लोक हैं।] भीकम (2 अमान (प्रजागरपर्व) त्रयस्त्रिंशो 5 थ्याय:- धृतराष्ट्र-विदुर-संवाद वैशम्पायन उवाच द्वाःस्थं प्राह महाप्राज्ञो धृतराष्ट्रो महीपति: । विदुरं द्रष्टमिच्छामि तमिहानय मा चिरम्
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ ମହୀପତି ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଦ୍ୱାରସ୍ଥକୁ କହିଲେ—“ମୁଁ ବିଦୁରଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ଚାହୁଁଛି; ତାଙ୍କୁ ଏଠାକୁ ଶୀଘ୍ର ଆଣ, ବିଳମ୍ବ କରନି।”
Verse 2
वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! [संजयके चले जानेपर] महाबुद्धिमान् राजा धृतराष्ट्रने द्वारपालसे कहा--'मैं विदुरसे मिलना चाहता हूँ। उन्हें यहाँ शीघ्र बुला लाओ' ।। प्रहितो धृतराष्ट्रेण दूत: क्षत्तारमब्रवीत् । ईश्वरस्त्वां महाराजो महाप्राज्ञ दिदृक्षति,विदुर और धृतराष्ट्र धृतराष्ट्रका भेजा हुआ वह दूत जाकर विदुरसे बोला--“महामते! हमारे स्वामी महाराज धृतराष्ट्र आपसे मिलना चाहते हैं!
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ—ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପ୍ରେରିତ ଦୂତ ଯାଇ କ୍ଷତ୍ତା ବିଦୁରଙ୍କୁ କହିଲା—“ହେ ମହାମତେ, ଆମ ସ୍ୱାମୀ ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଆପଣଙ୍କୁ ଦେଖିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛନ୍ତି।”
Verse 3
एवमुक्तस्तु विदुर: प्राप्प राजनिवेशनम् | अब्रवीद् धृतराष्ट्राय द्वा:स्थ मां प्रतिवेदय,उसके ऐसा कहनेपर विदुरजी राजमहलके पास जाकर बोले--*द्वारपाल! धृतराष्ट्रको मेरे आनेकी सूचना दे दो”
ଏପରି କୁହାଯାଇ ଭିଦୁର ରାଜନିବାସକୁ ଯାଇ ଦ୍ୱାରପାଳକୁ କହିଲେ— “ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କୁ ମୋର ଆଗମନ ସୂଚନା ଦିଅ।”
Verse 4
द्वाःस्थ उवाच विदुरो$यमनुप्राप्तो राजेन्द्र तव शासनात् | द्रष्टमिच्छति ते पादौ कि करोतु प्रशाधि माम्,द्वारपालने जाकर कहा--महाराज! आपकी आज्ञासे विदुरजी यहाँ आ पहुँचे हैं, वे आपके चरणोंका दर्शन करना चाहते हैं। मुझे आज्ञा दीजिये, उन्हें क्या कार्य बताया जाय?
ଦ୍ୱାରପାଳ କହିଲା— “ମହାରାଜ! ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଭିଦୁର ଏଠାକୁ ଆସିପହଞ୍ଚିଛନ୍ତି। ସେ ଆପଣଙ୍କ ପାଦଦର୍ଶନ ଚାହୁଁଛନ୍ତି। ଆଜ୍ଞା କରନ୍ତୁ, ମୁଁ କ’ଣ କରିବି?”
Verse 5
धृतराष्ट उवाच प्रवेशय महाप्राज्ञं विदुरं दीर्घदर्शिनम् अहं हि विदुरस्यास्य नाकल्पो जातु दर्शने,धृतराष्ट्रने कहा--महाबुद्धिमान् दूरदर्शी विदुरको भीतर ले आओ, मुझे इस विदुरसे मिलनेमें कभी भी अड़चन नहीं है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ, ଦୀର୍ଘଦର୍ଶୀ ଭିଦୁରଙ୍କୁ ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କରାଅ। ଭିଦୁରଙ୍କ ସହ ଦର୍ଶନରେ ମୋ ପାଇଁ କେବେ ବାଧା ନାହିଁ।”
Verse 6
द्वाःस्थ उवाच प्रविशान्त:पुरं क्षत्तर्महाराजस्य धीमत: । नहि ते दर्शनेडकल्पो जातु राजाब्रवीद्धि माम्,द्वारपाल विदुरके पास आकर बोला--विदुरजी! आप बुद्धिमान् महाराज धृतराष्ट्रके अन्तःपुरमें प्रवेश कीजिये। महाराजने मुझसे कहा है कि मुझे विदुरसे मिलनेमें कभी अड़चन नहीं है
ଦ୍ୱାରପାଳ ଭିଦୁରଙ୍କୁ କହିଲା— “ହେ କ୍ଷତ୍ତା! ବୁଦ୍ଧିମାନ ମହାରାଜଙ୍କ ଅନ୍ତଃପୁରକୁ ପ୍ରବେଶ କରନ୍ତୁ। ରାଜା ମୋତେ କହିଛନ୍ତି— ଆପଣଙ୍କ ଦର୍ଶନରେ କେବେ ରୋକ ନାହିଁ।”
Verse 7
वैशम्पायन उवाच तत:ः प्रविश्य विदुरो धृतराष्ट्रनिवेशनम् । अब्रवीत् प्राञ्जलिवरवक्यं चिन्तयानं नराधिपम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्! तदनन्तर विदुर धृतराष्ट्रके महलके भीतर जाकर चिन्तामें पड़े हुए राजासे हाथ जोड़कर बोले--
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— ତାପରେ ଭିଦୁର ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ନିବାସରେ ପ୍ରବେଶ କରି, ଚିନ୍ତାରେ ମଗ୍ନ ନରାଧିପଙ୍କୁ କରଯୋଡ଼ି କଥା କହିଲେ।
Verse 8
विदुरो<हं महाप्राज्ञ सम्प्राप्तस्तव शासनात् । यदि किंचन कर्तव्यमयमस्मि प्रशाधि माम्,“महा प्राज्ञ! मैं विदुर हूँ, आपकी आज्ञासे यहाँ आया हूँ। यदि मेरे करनेयोग्य कुछ काम हो तो मैं उपस्थित हूँ, मुझे आज्ञा कीजिये”
ବୈଶମ୍ପାୟନ କହିଲେ— “ମହାପ୍ରାଜ୍ଞ! ମୁଁ ବିଦୁର; ଆପଣଙ୍କ ଆଜ୍ଞାରେ ଏଠାକୁ ଆସିଛି। ଯଦି ମୋର କରିବାକୁ କିଛି କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଥାଏ, ମୁଁ ପ୍ରସ୍ତୁତ; ମୋତେ ଆଦେଶ ଦିଅନ୍ତୁ।”
Verse 9
धृतराष्ट उवाच संजयो विदुर प्राज्ञो गहयित्वा च मां गतः । अजाततशत्रो: श्वो वाक््यं सभामध्ये स वक्ष्यति,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! बुद्धिमान् संजय आया था, वह मुझे बुरा-भला कहकर चला गया है। कल सभामें वह अजातशत्रु युधिष्ठिरके वचन सुनायेगा
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ବିଦୁର! ପ୍ରାଜ୍ଞ ସଞ୍ଜୟ ଆସି ମୋତେ ତିରସ୍କାର କରି ଚାଲିଗଲା। କାଲି ସଭାମଧ୍ୟରେ ସେ ଅଜାତଶତ୍ରୁ (ଯୁଧିଷ୍ଠିର)ଙ୍କ ବାର୍ତ୍ତା—ତାଙ୍କ ବଚନ—କହିବ।”
Verse 10
तस्याद्य कुरुवीरस्य न विज्ञातं वचो मया । तन्मे दहति गात्राणि तदकार्षीत् प्रजागरम्,आज मैं उस कुरुवीर युधिष्ठिरकी बात न जान सका--यही मेरे अंगोंको जला रहा है और इसीने मुझे अबतक जगा रखा है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ଆଜି ମଧ୍ୟ ମୁଁ ସେ କୁରୁବୀର (ଯୁଧିଷ୍ଠିର)ଙ୍କ ବଚନର ମର୍ମ ବୁଝିପାରିଲି ନାହିଁ। ସେଇ ଅସମର୍ଥତା ମୋ ଅଙ୍ଗପ୍ରତ୍ୟଙ୍ଗକୁ ଦହୁଛି, ଏବଂ ସେଇ ଯନ୍ତ୍ରଣା ମୋତେ ଏପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଜାଗାଇ ରଖିଛି।”
Verse 11
जाग्रतो दहुमानस्य श्रेयो यदनुपश्यसि । तद् ब्रूहि त्वं हि नस्तात धर्मार्थकुशलो हासि,तात! मैं चिन्तासे जलता हुआ अभीतक जग रहा हूँ। मेरे लिये जो कल्याणकी बात समझो, वह कहो; क्योंकि हमलोगोंमें तुम्हीं धर्म और अर्थके ज्ञानमें निपुण हो
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ତାତ! ମୁଁ ଚିନ୍ତାରେ ଦହୁଥିବାବେଳେ ଜାଗି ରହିଛି। ମୋ ପାଇଁ ଯାହା ଶ୍ରେୟସ୍କର ବୋଲି ତୁମେ ଦେଖ, ସେହି କଥା କହ; କାରଣ ଆମମଧ୍ୟରେ ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ଜ୍ଞାନରେ ତୁମେ ନିପୁଣ।”
Verse 12
यतः प्राप्त: संजय: पाण्डवेभ्यो न मे यथावन्मनस: प्रशान्तिः । सर्वेन्द्रियाण्यप्रकृतिं गतानि कि वक्ष्यतीत्येव मेडद्य प्रचिन््ता,संजय जबसे पाण्डवोंके यहाँसे लौटकर आया है, तबसे मेरे मनको पूर्ण शान्ति नहीं मिलती। सभी इन्द्रियाँ विकल हो रही हैं। कल वह क्या कहेगा, इसी बातकी मुझे इस समय बड़ी भारी चिन्ता हो रही है
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ— “ସଞ୍ଜୟ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପାଖରୁ ଫେରିଆସିଥିବାଦିନଠାରୁ ମୋ ମନକୁ ଯଥାର୍ଥ ଶାନ୍ତି ମିଳୁନାହିଁ। ମୋର ସମସ୍ତ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଅସ୍ଥିର ଓ ବିକଳ ହୋଇପଡ଼ିଛି। କାଲି ସେ କ’ଣ କହିବ—ଏହି ଚିନ୍ତା ଏବେ ମୋତେ ଭାରି ଭାବେ ଦହୁଛି।”
Verse 13
विदुर उवाच अभियुक्त बलवता दुर्बलं हीनसाधनम् | हृतस्वं कामिनं चोरमाविशन्ति प्रजागरा:,विदुरजी बोले--राजन! जिसका बलवानके साथ विरोध हो गया है, उस साधनहीन दुर्बल मनुष्यको, जिसका सब कुछ हर लिया गया है, उसको, कामीको तथा चोरको रातमें नींद नहीं आती
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ବଳବାନ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ଆହ୍ୱାନିତ ଦୁର୍ବଳ, ସାଧନହୀନ, ଯାହାର ଧନ ହରଣ ହୋଇଛି ସେ, କାମାସକ୍ତ ଓ ଚୋର—ଏମାନଙ୍କୁ ରାତିରେ ନିଦ୍ରା ଆସେ ନାହିଁ।
Verse 14
कच्चिदेतैर्महादोषैर्न स्पृष्टोडसि नराधिप । कच्चिच्च परवित्तेषु गृध्यन् न परितप्यसे,नरेन्द्र! कहीं आपका भी इन महान् दोषोंसे सम्पर्क तो नहीं हो गया है? कहीं पराये धनके लोभसे तो आप वष्ट नहीं पा रहे हैं?
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ନରାଧିପ! ଏହି ମହାଦୋଷଗୁଡ଼ିକ ତୁମକୁ ସ୍ପର୍ଶ କରିନାହିଁ ତ? ଏବଂ ପରଧନ ପ୍ରତି ଲୋଭ କରି ତୁମେ ମନେ ଜଳୁନାହିଁ ତ?
Verse 15
धृतराष्ट उवाच श्रोतुमिच्छामि ते धर्म्य पर॑ं नै:श्रेयसं वच: । अस्मिन् राजर्षिवंशे हि त्वमेकः: प्राज्ञलसम्मत:,धृतराष्ट्रने कहा--विदुर! मैं तुम्हारे धर्मयुक्त तथा कल्याण करनेवाले सुन्दर वचन सुनना चाहता हूँ; क्योंकि इस राजर्षिवंशमें केवल तुम्हीं विद्वानोंक भी माननीय हो
ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର କହିଲେ—“ବିଦୁର! ମୁଁ ତୁମର ଧର୍ମସମ୍ମତ ଓ ପରମ ଶ୍ରେୟସ୍କର ବଚନ ଶୁଣିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି; କାରଣ ଏହି ରାଜର୍ଷି-ବଂଶରେ ଜ୍ଞାନୀମାନେ ତୁମକୁ ଏକାକୀ ସତ୍ୟ ବିବେକୀ ବୋଲି ମାନନ୍ତି।”
Verse 16
विदुर उवाच (राजा लक्षणसम्पन्नस्त्रैलोक्यस्याधिपो भवेत् । प्रेष्यस्ते प्रेषितश्वैव धृतराष्ट्र युधिष्ठिर: ।। विदुरजी बोले--महाराज धुृतराष्ट्र! श्रेष्ठ लक्षणोंसे सम्पन्न राजा युधिष्ठिर तीनों लोकोंके विपरीततरकश्न त्वं भागधेये न सम्मतः । आर्चिषां प्रक्षयाच्चैव धर्मात्मा धर्मकोविद: ।। आप धर्मात्मा और धर्मके जानकार होते हुए भी आँखोंकी ज्योतिसे हीन होनेके कारण उन्हें पहचान न सके, इसीसे उनके अत्यन्त विपरीत हो गये और उन्हें राज्यका भाग देनेमें आपकी सम्मति नहीं हुई। आनृशंस्यादनुक्रोशाद् धर्मात् सत्यात् पराक्रमात् । गुरुत्वात् त्वयि सम्प्रेक्ष्य बहून् क्लेशांस्तितिक्षते ।। युधिष्ठिरमें क्रूरताका अभाव, दया, धर्म, सत्य तथा पराक्रम है; वे आपकमें पूज्यबुद्धि रखते हैं। इन्हीं सदगुणोंके कारण वे सोच-विचारकर चुपचाप बहुत-से क्लेश सह रहे हैं। दुर्योधने सौबले च कर्णे दुःशासने तथा । एतेष्वैश्वर्यमाधाय कथं त्वं भूतिमिच्छसि ।। आप दुर्योधन, शकुनि, कर्ण तथा दुःशासन-जैसे अयोग्य व्यक्तियोंपर राज्यका भार रखकर कैसे कल्याण चाहते हैं? आत्मज्ञानं समारम्भस्तितिक्षा धर्मनित्यता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते ।। ) अपने वास्तविक स्वरूपका ज्ञान, उद्योग, दुःख सहनेकी शक्ति और धर्ममें स्थिरता--ये गुण जिस मनुष्यको पुरुषार्थसे च्युत नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है। निषेवते प्रशस्तानि निन्दितानि न सेवते । अनास्तिक: श्रद्धधान एतत् पण्डितलक्षणम्,जो अच्छे कर्मोका सेवन करता और बुरे कर्मोसे दूर रहता है, साथ ही जो आस्तिक और श्रद्धालु है, उसके वे सदगुण पण्डित होनेके लक्षण हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—“ହେ ମହାରାଜ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର! ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ରାଜଲକ୍ଷଣରେ ସମ୍ପନ୍ନ; ଏମିତି ରାଜା ମାନୋ ତ୍ରିଲୋକର ଅଧିପତି ହୁଏ। ସେ ତୁମର ନିଷ୍ଠାବାନ ସେବକ, ତୁମ ଆଦେଶରେ ହିଁ ଚାଲେ—ତଥାପି ତୁମେ ତାକୁ ପ୍ରତିଦ୍ୱନ୍ଦୀ ପରି ଭାବିଛ।”
Verse 17
क्रोधो हर्षश्न दर्पश्ष ही: स्तम्भो मान्यमानिता । यमर्थान्नापकर्षन्ति स वै पण्डित उच्यते,क्रोध, हर्ष, गर्व, लज्जा, उद्ण्डता तथा अपनेको पूज्य समझना--ये भाव जिसको पुरुषार्थसे भ्रष्ट नहीं करते, वही पण्डित कहलाता है
ବିଦୁର କହିଲେ—କ୍ରୋଧ, ହର୍ଷ, ଗର୍ବ, ଲଜ୍ଜା, ହଠ ଓ ମାନ-ସମ୍ମାନ ପାଇବାର ଆତ୍ମମାନ—ଏହି ଭାବଗୁଡ଼ିକ ଯାହାକୁ ତାଙ୍କର ଲକ୍ଷ୍ୟ ଓ ଧର୍ମାଚରଣରୁ ଭ୍ରଷ୍ଟ କରିପାରେ ନାହିଁ, ସେଇ ନିଶ୍ଚୟ ପଣ୍ଡିତ କୁହାଯାଏ।
Verse 18
यस्य कृत्यं न जानन्ति मन्त्र वा मन्त्रितं परे । कृतमेवास्य जानन्ति स वै पण्डित उच्यते,दूसरे लोग जिसके कर्तव्य, सलाह और पहलेसे किये हुए विचारको नहीं जानते, बल्कि काम पूरा होनेपर ही जानते हैं, वही पण्डित कहलाता है
ଯାହାର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ, ପରାମର୍ଶ କିମ୍ବା ପୂର୍ବବିଚାର ଅନ୍ୟମାନେ ଜାଣନ୍ତି ନାହିଁ, କାର୍ଯ୍ୟ ସମାପ୍ତ ହେଲାପରେ ମାତ୍ର ଜାଣନ୍ତି—ସେଇ ନିଶ୍ଚୟ ପଣ୍ଡିତ କୁହାଯାଏ।
Verse 19
यस्य कृत्यं न विघ्नन्ति शीतमुष्णं भयं रति: । समृद्धिरसमृद्धिर्वां स वै पण्डित उच्यते,सर्दी-गरमी, भय-अनुराग, सम्पत्ति अथवा दरिद्रता--ये जिसके कार्यमें विघ्न नहीं डालते, वही पण्डित कहलाता है
ଶୀତ-ଉଷ୍ଣ, ଭୟ-ଆସକ୍ତି, ସମୃଦ୍ଧି କିମ୍ବା ଅସମୃଦ୍ଧି—ଏସବୁ ଯାହାର କାର୍ଯ୍ୟକୁ ବାଧା ଦେଇପାରେ ନାହିଁ, ସେଇ ନିଶ୍ଚୟ ପଣ୍ଡିତ କୁହାଯାଏ।
Verse 20
यस्य संसारिणी प्रज्ञा धर्मार्थावनुवर्तते । कामादर्थ वृणीते य: स वै पण्डित उच्यते,जिसकी लौकिक बुद्धि धर्म और अर्थका ही अनुसरण करती है और जो भोगको छोड़कर पुरुषार्थका ही वरण करता है, वही पण्डित कहलाता है
ଯାହାର ଲୋକବୁଦ୍ଧି ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ମାତ୍ର ଅନୁସରେ, ଏବଂ ଯେ କାମସୁଖକୁ ଛାଡ଼ି ପୁରୁଷାର୍ଥକୁ ବରେ—ସେଇ ପଣ୍ଡିତ କୁହାଯାଏ।
Verse 21
यथाशक्ति चिकीर्षन्ति यथाशक्ति च कुर्वते । न किंचिदवमन्यन्ते नरा: पण्डितबुद्धय:
ପଣ୍ଡିତବୁଦ୍ଧି ନରମାନେ ଯଥାଶକ୍ତି କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରନ୍ତି ଏବଂ ଯଥାଶକ୍ତି କରନ୍ତି; କୌଣସି ବସ୍ତୁ କିମ୍ବା ବ୍ୟକ୍ତିକୁ ତୁଚ୍ଛ ଭାବି ଅବମାନ କରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 22
विवेकपूर्ण बुद्धिवाले पुरुष शक्तिके अनुसार काम करनेकी इच्छा रखते हैं और करते भी हैं तथा किसी वस्तुको तुच्छ समझकर उसकी अवहेलना नहीं करते,क्षिप्रं विजानाति चिरं शुणोति विज्ञाय चार्थ भजते न कामात् । नासम्पृष्टो व्युपयुद्धक्ते परार्थे तत् प्रज्ञानं प्रथमं पण्डितस्य विद्वान् पुरुष किसी विषयको देरतक सुनता है; किंतु शीघ्र ही समझ लेता है, समझकर कर्तव्यबुद्धिसे पुरुषार्थमें प्रवृत्त होता है--कामनासे नहीं, बिना पूछे दूसरेके विषयमें व्यर्थ कोई बात नहीं कहता है। उसका यह स्वभाव पण्डितकी मुख्य पहचान है
ପଣ୍ଡିତ ପୁରୁଷ କୌଣସି ବିଷୟକୁ ଦୀର୍ଘ ସମୟ ଶୁଣେ, କିନ୍ତୁ ଶୀଘ୍ର ହିଁ ବୁଝିଯାଏ। ବୁଝି ସେ କାମନାରୁ ନୁହେଁ, କର୍ତ୍ତବ୍ୟବୁଦ୍ଧିରୁ ହିତକର ପୁରୁଷାର୍ଥରେ ପ୍ରବୃତ୍ତ ହୁଏ। ଏବଂ ପଚାରା ନହୋଇ ପରର ବିଷୟରେ ବ୍ୟର୍ଥ କଥା କହେ ନାହିଁ—ଏହି ହେଉଛି ପଣ୍ଡିତଙ୍କ ପ୍ରଥମ ପରିଚୟ।
Verse 23
नाप्राप्यमभिवाउछन्ति नष्ट नेच्छन्ति शोचितुम् । आपत्सु च न मुहान्ति नरा: पण्डितबुद्धय:,पण्डितोंकी-सी बुद्धि रखनेवाले मनुष्य दुर्लभ वस्तुकी कामना नहीं करते, खोयी हुई वस्तुके विषयमें शोक करना नहीं चाहते और विपत्तिमें पड़कर घबराते नहीं हैं
ପଣ୍ଡିତବୁଦ୍ଧିସମ୍ପନ୍ନ ଲୋକ ଅପ୍ରାପ୍ୟ ବସ୍ତୁକୁ ଆକାଙ୍କ୍ଷା କରନ୍ତି ନାହିଁ; ଯାହା ହାରାଇଗଲା ତାହା ପାଇଁ ଶୋକ କରିବାକୁ ଚାହାନ୍ତି ନାହିଁ; ଏବଂ ବିପଦରେ ପଡିଲେ ମଧ୍ୟ ମୋହିତ ହୁଅନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 24
निश्चित्य यः प्रक्रमते नानतर्वसति कर्मण: । अवन्ध्यकालो वश्यात्मा स वै पण्डित उच्यते,जो पहले निश्चय करके फिर कार्यका आरम्भ करता है, कार्यके बीचमें नहीं रुकता, समयको व्यर्थ नहीं जाने देता और चित्तको वशमें रखता है, वही पण्डित कहलाता है
ଯେ ପ୍ରଥମେ ନିଶ୍ଚୟ କରି ପରେ କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ କରେ, କାର୍ଯ୍ୟମଧ୍ୟରେ ଅଟକେ ନାହିଁ, ସମୟକୁ ବ୍ୟର୍ଥ ଯିବାକୁ ଦିଏ ନାହିଁ, ଏବଂ ନିଜ ମନକୁ ବଶରେ ରଖେ—ସେଇ ପଣ୍ଡିତ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 25
आर्यकर्मणि रज्यन्ते भूतिकर्माणि कुर्वते । हित॑ च नाभ्यसूयन्ति पण्डिता भरतर्षभ,भरतकुलभूषण! पण्डितजन श्रेष्ठ कर्मोमें रुचि रखते हैं, उन्नतिके कार्य करते हैं तथा भलाई करनेवालोंमें दोष नहीं निकालते
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ପଣ୍ଡିତମାନେ ଆର୍ୟକର୍ମରେ ଆସକ୍ତ ରହନ୍ତି, ଅଭ୍ୟୁଦୟ-ସମୃଦ୍ଧିକର କାର୍ଯ୍ୟ କରନ୍ତି, ଏବଂ ପରହିତକାରୀମାନଙ୍କୁ ଦୋଷାରୋପ କରନ୍ତି ନାହିଁ, ଇର୍ଷ୍ୟା କରନ୍ତି ନାହିଁ।
Verse 26
न हृष्यत्यात्मसम्माने नावमानेन तृप्यते । गाड़ो हृद इवाक्षोभ्यो य: स पण्डित उच्यते,जो अपना आदर होनेपर हर्षके मारे फ़ूल नहीं उठता, अनादरसे संतप्त नहीं होता तथा गंगाजीके हृद (गहरे गर्त)-के समान जिसके चित्तको क्षोभ नहीं होता, वही पण्डित कहलाता है
ଯେ ନିଜ ସମ୍ମାନ ହେଲେ ହର୍ଷରେ ଫୁଲିଉଠେ ନାହିଁ, ଅନ୍ୟର ଅପମାନରେ ମନେମନେ ତୃପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ, ଏବଂ ଗଭୀର ହ୍ରଦ ପରି ଯାହାର ଚିତ୍ତ ଅକ୍ଷୋଭ୍ୟ ରହେ—ସେଇ ପଣ୍ଡିତ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 27
तत्त्वज्ञ: सर्वभूतानां योगज्ञ: सर्वकर्मणाम् । उपायज्ञो मनुष्याणां नर: पण्डित उच्यते,जो सम्पूर्ण भौतिक पदार्थोकी असलियतका ज्ञान रखनेवाला, सब कार्योंके करनेका ढंग जाननेवाला तथा मनुष्योंमें सबसे बढ़कर उपायका जानकार है, वह मनुष्य पण्डित कहलाता है
ଯେ ସମସ୍ତ ଭୂତମାନଙ୍କର ତତ୍ତ୍ୱ ଜାଣେ, ସମସ୍ତ କର୍ମର ଯୋଗ—ଅର୍ଥାତ୍ ଠିକ୍ ପଦ୍ଧତି ଓ ଶାସ୍ତ୍ରବିଧି—ବୁଝେ, ଏବଂ ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଉପାୟଜ୍ଞାନରେ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ—ସେଇ ନର ପଣ୍ଡିତ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 28
प्रवृत्तवाक् चित्रकथ ऊहवान् प्रतिभानवान् | आशु ग्रन्थस्य वक्ता च यः स पण्डित उच्यते,जिसकी वाणी कहीं रुकती नहीं, जो विचित्र ढंगसे बातचीत करता है, तर्कमें निपुण और प्रतिभाशाली है तथा जो ग्रन्थके तात्पर्यको शीघ्र बता सकता है, वह पण्डित कहलाता है
ଯାହାର ବାଣୀ ଅଟକିନାହିଁ ପ୍ରବାହିତ ହୁଏ, ଯେ ବିଚିତ୍ର ଭାବେ ଯଥାଯଥ ଦୃଷ୍ଟାନ୍ତ ସହ କଥାବାର୍ତ୍ତା କରିପାରେ, ଯେ ତର୍କରେ ନିପୁଣ ଓ ପ୍ରତିଭାଶାଳୀ, ଏବଂ ଯେ ଗ୍ରନ୍ଥର ତାତ୍ପର୍ୟ ଶୀଘ୍ର କହିପାରେ—ସେଇ ପଣ୍ଡିତ କୁହାଯାଏ।
Verse 29
श्रुतं प्रज्ञानुगं यस्य प्रज्ञा चैव श्रुतानुगा । असम्भिन्नार्यमर्याद: पण्डिताख्यां लभेत सः,जिसकी विद्या बुद्धिका अनुसरण करती है और बुद्धि विद्याका तथा जो शिष्ट पुरुषोंकी मर्यादाका उल्लंघन नहीं करता, वही पण्डितकी संज्ञा पा सकता है
ଯାହାର ଶ୍ରୁତି (ବିଦ୍ୟା) ପ୍ରଜ୍ଞାକୁ ଅନୁସରେ ଏବଂ ପ୍ରଜ୍ଞା ପୁନଃ ଶ୍ରୁତିକୁ ଅନୁସରେ; ଯେ ଆର୍ୟଜନଙ୍କ ମର୍ୟାଦା ଭଙ୍ଗ କରେନାହିଁ—ସେଇ ପଣ୍ଡିତ ନାମ ପାଏ।
Verse 30
अश्रुतश्न समुन्नद्धो दरिद्रश्न महामना: । अर्थाश्वाकर्मणा प्रेप्सुर्मूढ इत्युच्यते बुधै:,बिना पढ़े ही गर्व करनेवाले, दरिद्र होकर भी बड़े-बड़े मनोरथ करनेवाले और बिना काम किये ही धन पानेकी इच्छा रखनेवाले मनुष्यको पण्डितलोग मूर्ख कहते हैं
ଯେ ଅଶିକ୍ଷିତ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଗର୍ବରେ ଫୁଲିଯାଏ, ଯେ ଦରିଦ୍ର ହୋଇ ମଧ୍ୟ ବଡ଼ ବଡ଼ ଆଶା ଧରେ, ଏବଂ ଯେ କାମ ନ କରି ଧନ ପାଇବାକୁ ଚାହେ—ତାକୁ ବୁଦ୍ଧିମାନେ ‘ମୂଢ’ କୁହନ୍ତି।
Verse 31
स्वमर्थ यः परित्यज्य परार्थमनुतिष्ठति । मिथ्या चरति मित्रार्थे यश्च॒ मूढ: स उच्यते,जो अपना कर्तव्य छोड़कर दूसरेके कर्तव्यका पालन करता है तथा मित्रके साथ असत् आचरण करता है, वह मूर्ख कहलाता है
ଯେ ନିଜ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଛାଡ଼ି ଅନ୍ୟର କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ପାଳନ କରେ, ଏବଂ ଯେ ମିତ୍ରର ନିମିତ୍ତେ ମଧ୍ୟ ମିଥ୍ୟା ଆଚରଣ କରେ—ସେ ମୂଢ କୁହାଯାଏ।
Verse 32
अकामान् कामयति य: कामयानान् परित्यजेत् | बलवन्तं च यो द्वेष्टि तमाहुर्मूडचेतसम्,जो न चाहनेवालोंको चाहता है और चाहनेवालोंको त्याग देता है तथा जो अपनेसे बलवानके साथ वैर बाँधता है, उसे मूढ़ विचारका मनुष्य कहते हैं
ଯେ ନ ଚାହୁଁଥିବା ଲୋକଙ୍କୁ ଚାହେ, ଏବଂ ଯେ ଚାହୁଁଥିବା ଲୋକଙ୍କୁ ତ୍ୟାଗ କରେ; ତଥା ଯେ ନିଜଠାରୁ ବଳବାନଙ୍କ ସହ ବୈର ବାନ୍ଧେ—ତାକୁ ମୂଢଚିତ୍ତ କୁହନ୍ତି।
Verse 33
अमित्र कुरुते मित्र मित्र द्वेष्टि हिनस्ति च । कर्म चारभते दुष्ट तमाहुर्मूठडचेतसम्,जो शत्रुको मित्र बनाता और मित्रसे द्वेष करते हुए उसे कष्ट पहुँचाता है तथा सदा बुरे कर्मोका आरम्भ किया करता है, उसे मूढ़ चित्तवाला कहते हैं इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि प्रजागरपर्वणि विदुरनीतिवाक्ये त्रय॒स्त्रिंशो ध्याय: ।। ३३ ।। इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत प्रजागरपर्वमें विदुर-नीतिवाक्यविषयक तैतीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଯେ ଶତ୍ରୁକୁ ମିତ୍ର କରେ, କିନ୍ତୁ ନିଜ ସତ୍ୟ ମିତ୍ରକୁ ଦ୍ୱେଷ କରି ତାହାକୁ କଷ୍ଟ ଦିଏ, ଏବଂ ପୁନଃପୁନଃ ଦୁଷ୍କର୍ମ ଆରମ୍ଭ କରେ—ତାକୁ ମୂଢଚିତ୍ତ କୁହାଯାଏ।
Verse 34
संसारयति कृत्यानि सर्वत्र विचिकित्सते । चिरं करो ति क्षिप्रार्थे स मूढो भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ। जो अपने कामोंको व्यर्थ ही फैलाता है, सर्वत्र संदेह करता है तथा शीघ्र होनेवाले काममें भी देर लगाता है, वह मूठ है
ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଯେ ନିଜ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ଅନାବଶ୍ୟକ ଭାବେ ଟାଣି ଲମ୍ବା କରେ, ସବୁଠାରେ ସନ୍ଦେହ କରେ, ଏବଂ ଶୀଘ୍ର ହେବା ଉଚିତ କାମରେ ମଧ୍ୟ ବିଳମ୍ବ କରେ—ସେ ମୂଢ।
Verse 35
श्राद्धं पितृभ्यो न ददाति दैवतानि न चार्चति । सुहन्मित्रं न लभते तमाहुर्मूठडचेतसम्,जो पितरोंका श्राद्ध और देवताओंका पूजन नहीं करता तथा जिसे सुहृद् मित्र नहीं मिलता, उसे मूढ चित्तवाला कहते हैं
ଯେ ପିତୃମାନଙ୍କୁ ଶ୍ରାଦ୍ଧ ଦିଏ ନାହିଁ, ଦେବତାମାନଙ୍କୁ ପୂଜା କରେ ନାହିଁ, ଏବଂ ଯାହାକୁ ସୁହୃଦ୍ ମିତ୍ର ମିଳେ ନାହିଁ—ତାକୁ ମୂଢଚିତ୍ତ କୁହାଯାଏ।
Verse 36
अनाहूतः प्रविशति अपृष्टो बहु भाषते । अविश्वस्ते विश्वसिति मूढचेता नराधम:,मूढ चित्तवाला अधम मनुष्य बिना बुलाये ही भीतर चला आता है, बिना पूछे ही बहुत बोलता है तथा अविश्वसनीय मनुष्यपर भी विश्वास करता है
ମୂଢଚିତ୍ତ ନରାଧମ ଡାକିନଥିଲେ ମଧ୍ୟ ଭିତରକୁ ପ୍ରବେଶ କରେ, ପଚାରିନଥିଲେ ମଧ୍ୟ ବହୁତ କଥା କହେ, ଏବଂ ଅବିଶ୍ୱସନୀୟ ଲୋକ ଉପରେ ମଧ୍ୟ ବିଶ୍ୱାସ କରେ।
Verse 37
परं क्षिपति दोषेण वर्तमान: स्वयं तथा | यश्च क्रुध्यत्यनीशान: स च मूढतमो नर:,स्वयं दोषयुक्त बर्ताव करते हुए भी जो दूसरेपर उसके दोष बताकर आशक्षेप करता है तथा जो असमर्थ होते हुए भी व्यर्थका क्रोध करता है, वह मनुष्य महामूर्ख है
ଯେ ନିଜେ ଦୋଷରେ ରହି ମଧ୍ୟ ଅନ୍ୟର ଦୋଷ ଦେଖାଇ ତାହାକୁ ଆକ୍ଷେପ କରେ, ଏବଂ ଯେ ଅସମର୍ଥ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ବ୍ୟର୍ଥ କ୍ରୋଧ କରେ—ସେ ମନୁଷ୍ୟ ସର୍ବାଧିକ ମୂଢ।
Verse 38
आत्मनो बलमज्ञाय धर्मार्थपरिवर्जितम् | अलभ्यमिच्छन् नैष्कर्म्यान्मूढबुद्धिरिहोच्यते
ନିଜ ବଳ ନ ଜାଣି, ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥକୁ ପରିତ୍ୟାଗ କରି, ଅଲଭ୍ୟ ବସ୍ତୁକୁ ଇଚ୍ଛା କରି କର୍ମରୁ ବିମୁଖ ହେଉଥିବା ଲୋକ—ଏଠାରେ ମୂଢବୁଦ୍ଧି ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 39
जो अपने बलको न समझकर बिना काम किये ही धर्म और अर्थसे विरुद्ध तथा न पानेयोग्य वस्तुकी इच्छा करता है, वह पुरुष इस संसारमें मूढबुद्धि कहलाता है ।। अशिष्यं शास्ति यो राजन् यश्च शून्यमुपासते- । कदर्य भजते यश्च तमाहुर्मूठडचेतसम्,राजन! जो अनधिकारीको उपदेश देता और शून्यकी उपासना करता है तथा जो कृपणका आश्रय लेता है, उसे मूढ चित्तवाला कहते हैं
ନିଜ ବଳକୁ ନ ବୁଝି, କରିବାକୁ ଥିବା କର୍ମ ନ କରି, ଧର୍ମ ଓ ଅର୍ଥର ବିରୋଧୀ ଏବଂ ଅଲଭ୍ୟ ବସ୍ତୁକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଥିବା ଲୋକ—ଏହି ସଂସାରରେ ମୂଢବୁଦ୍ଧି କୁହାଯାଏ। ଏବଂ ହେ ରାଜନ, ଯେ ଅଯୋଗ୍ୟ ଶିଷ୍ୟକୁ ଉପଦେଶ ଦିଏ, ଯେ ଶୂନ୍ୟକୁ ଉପାସନା କରେ, ଏବଂ ଯେ କୃପଣଙ୍କ ଆଶ୍ରୟ ନେଇଥାଏ—ତାକୁ ମୂଢଚିତ୍ତ ବୋଲି କୁହନ୍ତି।
Verse 40
अर्थ महान्तमासाद्य विद्यामैश्वर्यमेव वा | विचरत्यसमुन्नद्धों यः स पण्डित उच्यते,जो बहुत धन, विद्या तथा ऐश्वर्यको पाकर भी उद्दण्डतापूर्वक नहीं चलता, वह पण्डित कहलाता है
ବହୁ ଧନ, ବିଦ୍ୟା କିମ୍ବା ଐଶ୍ୱର୍ୟ ପାଇ ସୁଦ୍ଧା ଯେ ଅହଂକାର ନ କରି ଚାଲେ—ସେଇ ପଣ୍ଡିତ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 41
एक: सम्पन्नमश्नाति वस्ते वासश्न॒ शोभनम् | यो5संविभज्य भृत्येभ्य: को नृशंसतरस्तत:,जो अपनेद्वारा भरण-पोषणके योग्य व्यक्तियोंको बाँटे बिना अकेले ही उत्तम भोजन करता और अच्छा वस्त्र पहनता है, उससे बढ़कर क्रूर कौन होगा?
ସମ୍ପନ୍ନ ହୋଇ ସୁଦ୍ଧା ନିଜ ଆଶ୍ରିତମାନଙ୍କୁ ବାଣ୍ଟିନ ଦେଇ ଏକା ଉତ୍ତମ ଭୋଜନ କରେ ଓ ଶୋଭନ ବସ୍ତ୍ର ପିନ୍ଧେ—ତାଠାରୁ ଅଧିକ କ୍ରୂର କିଏ?
Verse 42
एक: पापानि कुरुते फल भुड्क्ते महाजन: । भोक्तारो विप्रमुच्यन्ते कर्ता दोषेण लिप्यते,मनुष्य अकेला पाप कर (-के धन कमा)-ता है और (उस धनका) उपभोग बहुत-से लोग करते हैं। उपभोग करनेवाले तो दोषसे छूट जाते हैं, पर उसका कर्ता दोषका भागी होता है
ପାପକର୍ମ ଏକଜଣ କରେ, ଫଳ ଭୋଗ କରନ୍ତି ବହୁଜନ। ଭୋଗକାରୀମାନେ ଦୋଷରୁ ମୁକ୍ତ ହୋଇଯାନ୍ତି, କିନ୍ତୁ କର୍ତ୍ତା ଦୋଷରେ ଲିପ୍ତ ହୁଏ।
Verse 43
एकं हन्यान्न वा हन्यादिषुर्मुक्तो धनुष्मता । बुद्धिर्बुद्धिमतोत्सृष्टा हन्याद् राष्ट्र सराजकम्,किसी धनुर्धर वीरके द्वारा छोड़ा हुआ बाण सम्भव है, एकको भी मारे या न मारे। परन्तु बुद्धिमानद्वारा प्रयुक्त की हुई बुद्धि राजाके साथ-साथ सम्पूर्ण राष्ट्रका विनाश कर सकती है
କୁଶଳ ଧନୁର୍ଧର ଛାଡ଼ିଥିବା ଗୋଟିଏ ବାଣ ଗୋଟିଏକୁ ମାରିପାରେ—କିମ୍ବା ମାରିନ ପାରେ। କିନ୍ତୁ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଯେ ବୁଦ୍ଧି ଚାଳନା କରେ, ସେ ରାଜା ସହ ସମଗ୍ର ରାଷ୍ଟ୍ରକୁ ଧ୍ୱଂସ କରିପାରେ।
Verse 44
एकयाद्े विनिश्िव्य त्री क्षतुर्भिवेशे कुरु । पजञ्च जित्वा विदित्वा षट् सप्त हित्वा सुखी भव,एक (बुद्धि)-से दो (कर्तव्य और अकर्तव्य)का निश्चय करके चार (साम, दान, भेद, दण्ड)-से तीन (शत्रु, मित्र तथा उदासीन)-को वशमें कीजिये। पाँच (इन्द्रियों)-को जीतकर छः (सन्धि, विग्रह, यान, आसन, द्वैधीभाव और समाश्रयरूप) गुणोंको जानकर तथा सात (स्त्री, जूआ, मृगया, मद्य, कठोर वचन, दण्डकी कठोरता और अन्यायसे धनोपार्जन)-को छोड़कर सुखी हो जाइये
ଏକ ଦୃଢ଼ ବୁଦ୍ଧିରେ ପ୍ରଥମେ ଦୁଇଟି ନିଶ୍ଚୟ କର—କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଓ ଅକର୍ତ୍ତବ୍ୟ। ପରେ ଚାରି ଉପାୟ (ସାମ, ଦାନ, ଭେଦ, ଦଣ୍ଡ) ଦ୍ୱାରା ତିନି ପ୍ରକାର (ଶତ୍ରୁ, ମିତ୍ର, ଉଦାସୀନ) କୁ ବଶ କର। ପାଞ୍ଚ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଜିତ; ରାଜନୀତିର ଛଅ ଗୁଣ (ସନ୍ଧି, ବିଗ୍ରହ, ଯାନ, ଆସନ, ଦ୍ୱୈଧୀଭାବ, ସମାଶ୍ରୟ) ଜାଣ; ଏବଂ ସାତ ବ୍ୟସନ ତ୍ୟାଗ କରି ସୁଖୀ ହେ।
Verse 45
एक॑ विषरसो हन्ति शस्त्रेणैकश्न वध्यते । सराष्ट्रं सप्रजं हन्ति राजानं मन्त्रविप्लव:,विषका रस एक (पीनेवाले)-को ही मारता है, शस्त्रसे एकका ही वध होता है; किंतु (गुप्त) मन्त्रणाका प्रकाशित होना राष्ट्र और प्रजाके साथ ही राजाका भी विनाश कर डालता है
ବିଷର ରସ କେବଳ ପିଇଥିବା ଗୋଟିଏକୁ ମାରେ, ଶସ୍ତ୍ରରେ ମଧ୍ୟ ଗୋଟିଏର ହିଁ ବଧ ହୁଏ; କିନ୍ତୁ ଗୁପ୍ତ ମନ୍ତ୍ରଣାର ବିପ୍ଲବ/ଭେଦ ରାଜା ସହ ରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ପ୍ରଜାକୁ ଧ୍ୱଂସ କରେ।
Verse 46
एक: स्वादु न भुज्जीत एकश्चार्थान् न चिन्तयेत् । एको न गच्छेदध्वानं नैक: सुप्तेषु जागूयात्,अकेले स्वादिष्ट भोजन न करे, अकेला किसी विषयका निश्चय न करे, अकेला रास्ता न चले और बहुत-से लोग सोये हों तो उनमें अकेला न जागता रहे
ଏକା ହୋଇ ସ୍ୱାଦିଷ୍ଟ ଭୋଜନ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ଏକା ହୋଇ ଗୁରୁତ୍ୱପୂର୍ଣ୍ଣ ବିଷୟ ଚିନ୍ତା କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ଏକା ହୋଇ ପଥ ଚାଲିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ, ଏବଂ ଅନେକେ ସୁଇଥିଲେ ସେମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଏକା ଜାଗି ରହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ।
Verse 47
एकमेवाद्धितीयं तद् यद् राजन् नावबुध्यसे । सत्यं स्वर्गस्यथ सोपानं पारावारस्य नौरिव,राजन! जैसे समुद्रके पार जानेके लिये नाव ही एकमात्र साधन है, उसी प्रकार स्वर्गके लिये सत्य ही एकमात्र सोपान है, दूसरा नहीं; किंतु आप इसे नहीं समझ रहे हैं
ରାଜନ୍! ଦ୍ୱିତୀୟ ନଥିବା ଗୋଟିଏ କଥା ଆପଣ ବୁଝୁନାହାନ୍ତି: ସମୁଦ୍ର ପାର ହେବାକୁ ନୌକା ଯେପରି ଏକମାତ୍ର ଉପାୟ, ସେପରି ସ୍ୱର୍ଗ ପାଇଁ ସତ୍ୟ ହିଁ ଏକମାତ୍ର ସୋପାନ।
Verse 48
एक: क्षमावतां दोषो द्वितीयो नोपपद्यते | यदेनं क्षमया युक्तमशक्तं मन्न्यते जन:
ବିଦୁର କହିଲେ—କ୍ଷମାଶୀଳମାନଙ୍କ ଉପରେ ଗୋଟିଏ ଦୋଷ ମାତ୍ର ଆରୋପ ହୁଏ; ଦ୍ୱିତୀୟଟି ନାହିଁ: ଯେ ମନୁଷ୍ୟ କ୍ଷମାଯୁକ୍ତ, ଲୋକେ ତାକୁ ଅଶକ୍ତ ଭାବନ୍ତି। ଏଭଳି କ୍ଷମାର ଗୁଣକୁ ମଧ୍ୟ ଜଗତ ପ୍ରାୟ ଦୁର୍ବଳତା ବୋଲି ଭୁଲ ବୁଝେ।
Verse 49
क्षमाशील पुरुषोंमें एक ही दोषका आरोप होता है, दूसरेकी तो सम्भावना ही नहीं है। वह दोष यह है कि क्षमाशील मनुष्यको लोग असमर्थ समझ लेते हैं ।। सो<स्य दोषो न मन्तव्य: क्षमा हि परमं बलम् | क्षमा गुणो हाशक्तानां शक्तानां भूषणं क्षमा,किंतु क्षमाशील पुरुषका वह दोष नहीं मानना चाहिये; क्योंकि क्षमा बहुत बड़ा बल है। क्षमा असमर्थ मनुष्योंका गुण तथा समर्थोका भूषण है
ବିଦୁର କହିଲେ—କ୍ଷମାଶୀଳ ପୁରୁଷଙ୍କ ସେଇ ‘ଦୋଷ’କୁ ଦୋଷ ବୋଲି ମନେ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ; କାରଣ କ୍ଷମା ହିଁ ପରମ ବଳ। ଅଶକ୍ତଙ୍କ ପାଇଁ କ୍ଷମା ଗୁଣ, ଶକ୍ତିମାନଙ୍କ ପାଇଁ କ୍ଷମା ଭୂଷଣ—ଶକ୍ତିକୁ ଧର୍ମରେ ସଂଯମ କରାଏ।
Verse 50
क्षमा वशीकृतिलेोंके क्षमया कि न साध्यते । शान्तिखड्ग: करे यस्य कि करिष्यति दुर्जन:,इस जगत्में क्षमा वशीकरणरूप है। भला, क्षमासे क्या नहीं सिद्ध होता? जिसके हाथमें शान्तिरूपी तलवार है, उसका दुष्ट पुरुष क्या कर लेंगे?
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହି ଲୋକରେ କ୍ଷମା ହୃଦୟ ଜିତିବାର ଶକ୍ତି; କ୍ଷମାରେ କ’ଣ ଅସାଧ୍ୟ? ଯାହାର ହାତରେ ଶାନ୍ତିରୂପ ଖଡ୍ଗ ଅଛି, ତାକୁ ଦୁଷ୍ଟ କ’ଣ କରିପାରିବ?
Verse 51
अतृणे पतितो वदह्नलिः स्वयमेवोपशाम्यति | अक्षमावान् परं दोषैरात्मानं चैव योजयेत्,तृणरहित स्थानमें गिरी हुई आग अपने-आप बुझ जाती है। क्षमाहीन पुरुष अपनेको तथा दूसरेको भी दोषका भागी बना लेता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ତୃଣ ନଥିବା ସ୍ଥାନରେ ପଡ଼ିଥିବା ଅଗ୍ନି ସ୍ୱୟଂ ଶାନ୍ତ ହୋଇଯାଏ; କିନ୍ତୁ ଯେ କ୍ଷମାହୀନ, ସେ ନିଜକୁ ଓ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦୋଷରେ ଜଡ଼ାଇ ଦିଏ।
Verse 52
एको धर्म: परं श्रेय: क्षमैका शान्तिरुत्तमा । विद्यैका परमा तृप्तिरहिंसेका सुखावहा,केवल धर्म ही परम कल्याणकारक है, एकमात्र क्षमा ही शान्तिका सर्वश्रेष्ठ उपाय है। एक विद्या ही परम संतोष देनेवाली है और एकमात्र अहिंसा ही सुख देनेवाली है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏକମାତ୍ର ଧର୍ମ ହିଁ ପରମ ଶ୍ରେୟ; ଶାନ୍ତିର ସର୍ବୋତ୍ତମ ଉପାୟ ଏକମାତ୍ର କ୍ଷମା। ପରମ ତୃପ୍ତି ଦେଉଥିବା ଏକମାତ୍ର ବିଦ୍ୟା, ଏବଂ ସୁଖ ଆଣୁଥିବା ଏକମାତ୍ର ଅହିଂସା।
Verse 53
(पृथिव्यां सागरान्तायां द्वाविमौ पुरुषाधमौ । गृहस्थश्न निरारम्भ: सारम्भश्नैव भिक्षुकः ।। ) समुद्रपर्यन्त इस सारी पृथ्वीमें ये दो प्रकारके अधम पुरुष हैं--अकर्मण्य गृहस्थ और कर्मोमें लगा हुआ संन्यासी। द्वाविमौ ग्रसते भूमि: सर्पो बिलशयानिव । राजानं चाविरोद्धारं ब्राह्मणं चाप्रवासिनम्,बिलमें रहनेवाले जीवोंको जैसे साँप खा जाता है, उसी प्रकार यह पृथ्वी शत्रुसे विरोध न करनेवाले राजा और परदेश सेवन न करनेवाले ब्राह्मण--इन दोनोंको खा जाती है
ବିଦୁର କହିଲେ—ସମୁଦ୍ରପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ଏହି ପୃଥିବୀରେ ଦୁଇ ପ୍ରକାର ଅଧମ ପୁରୁଷ ଅଛନ୍ତି: ଉଦ୍ୟମ ନ କରୁଥିବା ଗୃହସ୍ଥ, ଏବଂ ସାଂସାରିକ କାର୍ଯ୍ୟରେ ବ୍ୟସ୍ତ ଭିକ୍ଷୁ-ସନ୍ନ୍ୟାସୀ। ଯେପରି ବିଲରେ ରହୁଥିବା ପ୍ରାଣୀମାନଙ୍କୁ ସାପ ଗ୍ରସି ନେଇଥାଏ, ସେପରି ଏହି ପୃଥିବୀ ମଧ୍ୟ ଦୁଇଜଣଙ୍କୁ ‘ଗ୍ରସି’ ନେଇଥାଏ—ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ପ୍ରତିରୋଧ ନ କରୁଥିବା ରାଜାକୁ, ଏବଂ କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଥିଲେ ମଧ୍ୟ ପରଦେଶଗମନ (ଅଧ୍ୟୟନ, ଶିକ୍ଷାଦାନ କିମ୍ବା ଜୀବିକା ପାଇଁ) ନ କରୁଥିବା ବ୍ରାହ୍ମଣକୁ।
Verse 54
द्वे कर्मणी नरः कुर्वन्नस्मिललोके विरोचते । अब्रुवन् परुषं किंचिदसतो<नर्चयंस्तथा,जरा भी कठोर न बोलना और दुष्ट पुरुषोंका आदर न करना--इन दो कर्मोंका करनेवाला मनुष्य इस लोकमें विशेष शोभा पाता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ମଣିଷ ଏହି ଲୋକରେ ଦୁଇଟି ଆଚରଣ ଦ୍ୱାରା ବିଶେଷ ଶୋଭା ପାଏ: (୧) ଅଳ୍ପ ମଧ୍ୟ କଠୋର କଥା ନ କହିବା, ଏବଂ (୨) ଅସତ୍ୟ ଓ ଦୁଷ୍ଟଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ-ପୂଜା ନ କରିବା।
Verse 55
द्वाविमौ पुरुषव्याप्र परप्रत्ययकारिणौ । स्त्रियः कामितकामिन्यो लोक: पूजितपूजक:,दूसरी स्त्रीद्वारा चाहे गये पुरुषकी कामना करनेवाली स्त्रियाँ तथा दूसरोंके द्वारा पूजित मनुष्यका आदर करनेवाले पुरुष--ये दो प्रकारके लोग दूसरोंपर विश्वास करके चलनेवाले होते हैं
ହେ ପୁରୁଷଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଦୁଇ ପ୍ରକାର ଲୋକ ପରଙ୍କ ଭରସାରେ ଚାଲନ୍ତି: (୧) ଅନ୍ୟ ଜଣେ ସ୍ତ୍ରୀ ଯାହାକୁ ଚାହେ, ସେହି ପୁରୁଷକୁ ଚାହୁଁଥିବା ସ୍ତ୍ରୀମାନେ, ଏବଂ (୨) ଲୋକେ ଯାହାକୁ ପୂର୍ବରୁ ପୂଜନ୍ତି, ସେହିଜଣଙ୍କୁ ହିଁ ପୂଜୁଥିବା ପୁରୁଷମାନେ।
Verse 56
द्वाविमौ कण्टकौ तीक्ष्णौ शरीरपरिशोषिणौ । यश्चाधन: कामयते यश्च कुप्यत्यनी श्वरः,जो निर्धन होकर भी बहुमूल्य वस्तुकी इच्छा रखता और असमर्थ होकर भी क्रोध करता है--ये दोनों ही अपने लिये तीक्ष्ण काँटोंके समान हैं एवं अपने शरीरको सुखानेवाले हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହି ଦୁଇଟି ତୀକ୍ଷ୍ଣ କଣ୍ଟକ ସମାନ, ଯାହା ଶରୀରକୁ ଶୁଷ୍କ କରିଦିଏ: (୧) ଧନହୀନ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ମୂଲ୍ୟବାନ ବସ୍ତୁ ଲୋଭ କରୁଥିବା ଲୋକ, ଏବଂ (୨) ଅସମର୍ଥ ହୋଇ ମଧ୍ୟ କ୍ରୋଧ କରୁଥିବା ଲୋକ। ଉଭୟେ ନିଜକୁ ନିଜେ ପୀଡ଼ା ଦେଇ ବଳ କ୍ଷୟ କରନ୍ତି।
Verse 57
द्वावेव न विराजेते विपरीतेन कर्मणा । गृहस्थश्व निरारम्भ: कार्यवांश्वैव भिक्षुक:
ବିଦୁର କହିଲେ—ନିଜ ଧର୍ମର ବିପରୀତ କର୍ମ କଲେ କେବଳ ଦୁଇଜଣ ଶୋଭା ପାଆନ୍ତି ନାହିଁ: ଉଦ୍ୟମହୀନ ଗୃହସ୍ଥ ଏବଂ ସାଂସାରିକ କାର୍ଯ୍ୟରେ ବ୍ୟସ୍ତ ଭିକ୍ଷୁ। ଆଶ୍ରମଧର୍ମକୁ ଉଲଟାଇ ଚାଲିଲେ ଉଭୟଙ୍କ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ହ୍ରାସ ପାଏ।
Verse 58
दो ही अपने विपरीत कर्मके कारण शोभा नहीं पाते--अकर्मण्य गृहस्थ और प्रपंचमें लगा हुआ संन्यासी ।। द्वाविमौ पुरुषौ राजन् स्वर्गस्योपरि तिष्ठत: । प्रभुश्च क्षमया युक्तो दरिद्रश्न प्रदानवान्,राजन! ये दो प्रकारके पुरुष स्वर्गके भी ऊपर स्थान पाते हैं--शक्तिशाली होनेपर भी क्षमा करनेवाला और निर्धन होनेपर भी दान देनेवाला
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ଦୁଇ ପ୍ରକାର ପୁରୁଷ ସ୍ୱର୍ଗଠାରୁ ମଧ୍ୟ ଉପର ସ୍ଥାନ ପାଆନ୍ତି—ଶକ୍ତିଶାଳୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ କ୍ଷମାଯୁକ୍ତ, ଏବଂ ଦରିଦ୍ର ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଦାନଶୀଳ।
Verse 59
न्यायागतस्य द्रव्यस्य बोद्धव्यौ द्वावतिक्रमौ । अपात्रे प्रतिपत्तिश्व पात्रे चाप्रतिपादनम्,न्यायपूर्वक उपार्जित किये हुए धनके दो ही दुरुपयोग समझने चाहिये--अपात्रको देना और सत्पात्रको न देना
ନ୍ୟାୟରେ ଅର୍ଜିତ ଧନର ଦୁଇଟି ଅତିକ୍ରମ ଜାଣିବା ଉଚିତ—ଅପାତ୍ରକୁ ଦେବା, ଏବଂ ପାତ୍ରକୁ ନ ଦେବା।
Verse 60
द्वावम्भसि निवेष्टव्यौ गले बद्ध्वा दृढां शिलाम् | धनवन्तमदातारं दरिद्रंं चातपस्विनम्,जो धनी होनेपर भी दान न दे और दरिद्र होनेपर भी कष्ट सहन न कर सके--इन दो प्रकारके मनुष्योंको गलेमें मजबूत पत्थर बाँधकर पानीमें डुबा देना चाहिये
ଦୁଇ ପ୍ରକାର ଲୋକଙ୍କୁ ଗଳାରେ ଦୃଢ଼ ପଥର ବାନ୍ଧି ପାଣିରେ ଡୁବାଇ ଦେବା ଉଚିତ—ଧନୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଦାନ ନ କରୁଥିବା, ଏବଂ ଦରିଦ୍ର ହୋଇ ମଧ୍ୟ ତପସ୍ୟାସଦୃଶ କଷ୍ଟସହନ କରିପାରୁନଥିବା।
Verse 61
द्वाविमौ पुरुषव्याप्र सूर्यमण्डलभेदिनौ । परिव्राड् योगयुक्तश्व रणे चाभिमुखो हत:,पुरुषश्रेष्ठ) ये दो प्रकारके पुरुष सूर्यमण्डलको भेदकर ऊर्ध्वगतिको प्राप्त होते हैं-- योगयुक्त संन््यासी और संग्राममें शत्रुओंके सम्मुख युद्ध करके मारा गया योद्धा
ହେ ପୁରୁଷବ୍ୟାଘ୍ର! ଦୁଇ ପ୍ରକାର ପୁରୁଷ ସୂର୍ୟମଣ୍ଡଳକୁ ଭେଦି ଊର୍ଧ୍ୱଗତି ପାଆନ୍ତି—ଯୋଗଯୁକ୍ତ ପରିବ୍ରାଜକ ସନ୍ନ୍ୟାସୀ, ଏବଂ ରଣରେ ଶତ୍ରୁଙ୍କ ସମ୍ମୁଖେ ଯୁଦ୍ଧ କରି ହତ ହୋଇଥିବା ଯୋଦ୍ଧା।
Verse 62
त्रयो न््याया मनुष्याणां श्रूयन्ते भरतर्षभ । कनीयान् मध्यम: श्रेष्ठ इति वेदविदो विदु:ः,भरतश्रेष्ठ! मनुष्योंकी कार्यसिद्धिके लिये उत्तम, मध्यम और अधम--ये तीन प्रकारके न्यायानुकूल उपाय सुने जाते हैं, ऐसा वेदवेत्ता विद्वान् जानते हैं
ହେ ଭରତର୍ଷଭ! ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ କାର୍ଯ୍ୟସିଦ୍ଧି ପାଇଁ ତିନି ପ୍ରକାର ନୀତି ଶୁଣାଯାଏ—କନିଷ୍ଠ, ମଧ୍ୟମ ଓ ଶ୍ରେଷ୍ଠ; ଏହିପରି ବେଦବିଦ୍ମାନେ ଜାଣନ୍ତି।
Verse 63
त्रिविधा: पुरुषा राजन्नुत्तमाधममध्यमा: । नियोजयेद् यथावत् तांस्त्रिविधेष्वेव कर्मसु,राजन! उत्तम, मध्यम और अधम--ये तीन प्रकारके पुरुष होते हैं; इनको यथायोग्य तीन ही प्रकारके कर्मोमें लगाना चाहिये
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ପୁରୁଷ ତିନି ପ୍ରକାର—ଉତ୍ତମ, ମଧ୍ୟମ ଓ ଅଧମ। ସେମାନଙ୍କୁ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଓ ନିୟମାନୁସାରେ ସେହି ତିନି ପ୍ରକାର କର୍ମରେ ନିଯୁକ୍ତ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 64
त्रय एवाधना राजन् भार्या दासस्तथा सुत: । यत् ते समधिगच्छन्ति यस्य ते तस्य तद् धनम्,राजन! तीन ही धनके अधिकारी नहीं माने जाते--स्त्री, पुत्र तथा दास। ये जो कुछ कमाते हैं, वह धन उसीका होता है, जिसके अधीन ये रहते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ! ତିନିଜଣଙ୍କୁ ସ୍ୱତନ୍ତ୍ର ଧନାଧିକାରୀ ବୋଲି ମନାଯାଏ ନାହିଁ—ସ୍ତ୍ରୀ, ପୁତ୍ର ଓ ଦାସ। ସେମାନେ ଯାହା କିଛି ଅର୍ଜନ କରନ୍ତି, ଯାହାଙ୍କ ଅଧୀନରେ ରହନ୍ତି, ସେହି ଧନ ତାଙ୍କର ବୋଲି ଧରାଯାଏ।
Verse 65
हरणं च परस्वानां परदाराभिमर्शनम् । सुहृदश्न परित्यागस्त्रयो दोषा: क्षयावहा:,दूसरेके धनका हरण, दूसरेकी स्त्रीका संसर्ग तथा सुहृद् मित्रका परित्याग--ये तीनों ही दोष (मनुष्यके आयु, धर्म तथा कीर्तिका) क्षय करनेवाले होते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ପରଧନ ହରଣ, ପରସ୍ତ୍ରୀ ସହ ଅନୁଚିତ ସମ୍ପର୍କ, ଏବଂ ସୁହୃଦ୍ ମିତ୍ରଙ୍କୁ ପରିତ୍ୟାଗ—ଏହି ତିନି ଦୋଷ ମନୁଷ୍ୟର ଆୟୁ, ଧର୍ମ ଓ କୀର୍ତ୍ତିକୁ କ୍ଷୟ କରେ।
Verse 66
त्रिविधं नरकस्येदं द्वारं नाशनमात्मन: । काम: क्रोधस्तथा लोभस्तस्मादेतत् त्रयं त्यजेत्,काम, क्रोध और लोभ--ये आत्माका नाश करनेवाले नरकके तीन दरवाजे हैं; अतः इन तीनोंको त्याग देना चाहिये
ବିଦୁର କହିଲେ—କାମ, କ୍ରୋଧ ଓ ଲୋଭ—ଏହି ତିନିଟି ଆତ୍ମନାଶକ ନରକର ତିନି ଦ୍ୱାର; ତେଣୁ ଏହି ତିନିଟିକୁ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 67
वरप्रदानं राज्यं च पुत्रजन्म च भारत | शत्रोश्व मोक्षणं कृच्छात् त्रीणि चैके च तत्समम्
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ବରଦାନ ଦେବା, ରାଜ୍ୟ ପ୍ରାପ୍ତି ଓ ପୁତ୍ରଜନ୍ମ—ଏହି ତିନିଟିକୁ ମହାବର ବୋଲି ଗଣାଯାଏ; କିନ୍ତୁ କଷ୍ଟରେ ଶତ୍ରୁଠାରୁ ମୁକ୍ତି ପାଇବା—ସେ ଏକଟି ମଧ୍ୟ ସେହି ତିନିଟି ସମାନ।
Verse 68
भारत! वरदान पाना, राज्यकी प्राप्ति और पुत्रका जन्म--ये तीन एक ओर और शत्रुके कष्टसे छूटना--यह एक ओर; वे तीन और यह एक बराबर ही हैं ।। भक्त च भजमानं च तवास्मीति च वादिनम् | त्रीनेतांश्छरणं प्राप्तान् विषमेडपि न संत्यजेत्,भक्त, सेवक तथा मैं आपका ही हूँ, ऐसा कहनेवाले--इन तीन प्रकारके शरणागत मनुष्योंको संकट पड़नेपर भी नहीं छोड़ना चाहिये
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ବରଲାଭ, ରାଜ୍ୟପ୍ରାପ୍ତି ଓ ପୁତ୍ରଜନ୍ମ—ଏ ତିନି ଏକ ପଟେ; ଶତ୍ରୁର ପୀଡାରୁ ମୁକ୍ତି—ଏକ ପଟେ। ମୂଲ୍ୟରେ ସେ ଏକଟି ତିନିଟି ସମାନ। ତେଣୁ ବିପଦରେ ମଧ୍ୟ ଶରଣାଗତଙ୍କୁ କେବେ ଛାଡ଼ିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ—(୧) ଭକ୍ତ, (୨) ସେବା କରି ଆଶ୍ରୟ ଚାହୁଁଥିବା, (୩) ଯେ ସ୍ପଷ୍ଟ କହେ, “ମୁଁ ଆପଣଙ୍କର।”
Verse 69
चत्वारि राज्ञा तु महाबलेन वर्ज्यान्याहु: पण्डितस्तानि विद्यात् । अल्पप्रज्जैः सह मन्त्र न कुर्या- न्न दीर्घसूत्र रभसैश्चारणैश्व,थोड़ी बुद्धिवाले, दीर्घसूत्री, जल्दबाज और स्तुति करनेवाले लोगोंके साथ गुप्त सलाह नहीं करनी चाहिये। ये चारों महाबली राजाके लिये त्यागनेयोग्य बताये गये हैं। विद्वान पुरुष ऐसे लोगोंको पहचान ले
ବିଦୁର କହିଲେ—ମହାବଳୀ ରାଜା ଚାରି ପ୍ରକାର ଲୋକଙ୍କୁ ବର୍ଜନ କରିବା ଉଚିତ—ଏହା ପଣ୍ଡିତମାନେ କହନ୍ତି; ବିବେକୀ ଲୋକ ସେମାନଙ୍କୁ ଚିହ୍ନିବ। ଅଳ୍ପବୁଦ୍ଧି, ଦୀର୍ଘସୂତ୍ରୀ, ହଠାତ୍/ତ୍ୱରିତ କାର୍ଯ୍ୟକାରୀ, ଓ ଚାଟୁକାର—ଏମାନଙ୍କ ସହ ଗୁପ୍ତ ମନ୍ତ୍ରଣା କରିବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 70
चत्वारि ते तात गृहे वसन्तु श्रियाभिजुष्टस्य गृहस्थधर्मे । वृद्धो ज्ञातिरवसन्न: कुलीन: सदा दरिद्रो भगिनी चानपत्या,तात! गृहस्थधर्ममें स्थित आप लक्ष्मीवानके घरमें चार प्रकारके मनुष्योंको सदा रहना चाहिये--अपने कुटुम्बका बूढ़ा, संकटमें पड़ा हुआ उच्च कुलका मनुष्य, धनहीन मित्र और बिना संतानकी बहिन
ବିଦୁର କହିଲେ—ତାତ! ଗୃହସ୍ଥଧର୍ମରେ ଅବସ୍ଥିତ ଧନୀ ପୁରୁଷଙ୍କ ଘରେ ଚାରି ପ୍ରକାର ଲୋକ ସଦା ରହିବା ଉଚିତ—ବୃଦ୍ଧ ଜ୍ଞାତି, ସଙ୍କଟପତିତ କୁଳୀନ, ସଦା ଦରିଦ୍ର ମିତ୍ର, ଓ ସନ୍ତାନହୀନ ଭଗିନୀ।
Verse 71
चत्वार्याह महाराज साद्यस्कानि बृहस्पति: । पृच्छते त्रिदशेन्द्राय तानीमानि निबोध मे,महाराज! इन्द्रके पूछनेपर उनसे बृहस्पतिजीने जिन चारोंको तत्काल फल देनेवाला बताया था, उन्हें आप मुझसे सुनिये--
ବିଦୁର କହିଲେ—ମହାରାଜ! ବୃହସ୍ପତି ଚାରିଟି କାର୍ଯ୍ୟକୁ ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ଫଳଦାୟକ ବୋଲି କହିଥିଲେ। ତ୍ରିଦଶେନ୍ଦ୍ର ଇନ୍ଦ୍ର ପଚାରିଲେ ସେ ଚାରିଟି କହିଥିଲେ। ଏବେ ସେଗୁଡ଼ିକୁ ମୋ ପାଖରୁ ଶୁଣନ୍ତୁ।
Verse 72
देवतानां च संकल्पमनुभावं च धीमताम् । विनयं कृतविद्यानां विनाशं पापकर्मणाम्,देवताओंका संकल्प, बुद्धिमानोंका प्रभाव, विद्वानों-की नम्रनता और पापियोंका विनाश
ଦେବତାମାନଙ୍କ ସଙ୍କଳ୍ପ, ଧୀମାନମାନଙ୍କ ପ୍ରଭାବ, ସତ୍ୟ ଶିକ୍ଷିତମାନଙ୍କ ବିନୟ, ଓ ପାପକର୍ମୀମାନଙ୍କ ଅନିବାର୍ୟ ବିନାଶ—ଏ ଚାରିଟି ଜଗତରେ ଧର୍ମର ତତ୍କ୍ଷଣାତ୍ ଫଳଦାୟକ ନିୟମକୁ ପ୍ରକାଶ କରେ।
Verse 73
चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञ:,चार कर्म भयको दूर करनेवाले हैं; किंतु वे ही यदि ठीक तरहसे सम्पादित न हों, तो भय प्रदान करते हैं। वे कर्म हैं--आदरके साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौनका पालन, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदरके साथ यज्ञका अनुष्ठान
ବିଦୁର କହିଲେ—ଚାରିଟି କର୍ମ ଭୟ ଦୂର କରେ; କିନ୍ତୁ ଯଥାବିଧି ନ କରାଗଲେ ସେଇ କର୍ମ ନିଜେ ଭୟ ଓ ଅନର୍ଥ ଦେଇଥାଏ। ସେଗୁଡ଼ିକ—ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର, ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ମୌନ, ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ, ଏବଂ ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ଯଜ୍ଞାନୁଷ୍ଠାନ।
Verse 74
पञ्चाग्नयो मनुष्येण परिचर्या: प्रयत्नत: । पिता माताग्निरात्मा च गुरुश्न भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ) पिता, माता, अग्नि, आत्मा और गुरु-मनुष्यको इन पाँच अग्नियोंकी बड़े यत्नसे सेवा करनी चाहिये
ବିଦୁର ଉପଦେଶ ଦେଲେ—ମନୁଷ୍ୟ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଯତ୍ନରେ ପାଞ୍ଚ ‘ଅଗ୍ନି’ଙ୍କୁ ସେବା କରିବା ଉଚିତ: ପିତା, ମାତା, ଗୃହାଗ୍ନି, ନିଜ ଆତ୍ମା, ଏବଂ ଗୁରୁ।
Verse 75
पज्चैव पूजयॉँलल्लोके यश: प्राप्नोति केवलम् | देवान् पितृन् मनुष्यांश्व भिक्षूनतिथिपठ्चमान्,देवता, पितर, मनुष्य, संन्यासी और अतिथि--इन पाँचोंकी पूजा करनेवाला मनुष्य शुद्ध यश प्राप्त करता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଦେବତା, ପିତୃଗଣ, ମନୁଷ୍ୟ, ସନ୍ନ୍ୟାସୀ-ଭିକ୍ଷୁ ଏବଂ ଅତିଥି—ଏହି ପାଞ୍ଚଙ୍କୁ ପୂଜା କରୁଥିବା ମନୁଷ୍ୟ ଲୋକରେ ଶୁଦ୍ଧ ଓ ନିଷ୍କଳୁଷ ଯଶ ପାଏ।
Verse 76
पउ्च त्वानुगमिष्यन्ति यत्र यत्र गमिष्यसि । मित्राण्यमित्रा मध्यस्था उपजीव्योपजीविन:,राजन्! आप जहाँ-जहाँ जायँगे, वहाँ-वहाँ मित्र, शत्रु, उदासीन, आश्रय देनेवाले तथा आश्रय पानेवाले--ये पाँच आपके पीछे लगे रहेंगे
ବିଦୁର କହିଲେ—ରାଜନ୍! ଆପଣ ଯେଉଁଯେଉଁଠାକୁ ଯିବେ, ସେଉଁଠାସେଉଁଠାକୁ ପାଞ୍ଚ ପ୍ରକାର ଲୋକ ଆପଣଙ୍କ ପଛେ ପଛେ ଲାଗିବେ—ମିତ୍ର, ଶତ୍ରୁ, ମଧ୍ୟସ୍ଥ, ଆଶ୍ରୟ ଦେଉଥିବା, ଏବଂ ଆପଣଙ୍କ ଉପରେ ନିର୍ଭର କରି ଜୀବନ ଚାଲାଉଥିବା।
Verse 77
पज्चेन्द्रियस्य मर्त्यस्यच्छिद्रं चेदेकमिन्द्रियम् । ततोडस्य ख्रवति प्रज्ञा दृते: पात्रादिवोदकम्,पाँच ज्ञानेन्द्रियोंवाले पुछुषकी यदि एक भी इन्द्रिय छिद्र (दोष)-युक्त हो जाय तो उससे उसकी बुद्धि इस प्रकार बाहर निकल जाती है, जैसे मशकके छेदसे पानी
ବିଦୁର କହିଲେ—ପାଞ୍ଚ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ଥିବା ମର୍ତ୍ୟର ଯଦି ଗୋଟିଏ ଇନ୍ଦ୍ରିୟ ମଧ୍ୟ ଛିଦ୍ରଯୁକ୍ତ (ଦୋଷଗ୍ରସ୍ତ) ହୋଇଯାଏ, ତେବେ ତାହା ଦ୍ୱାରା ତାଙ୍କର ପ୍ରଜ୍ଞା ଏମିତି ଝରିଯାଏ—ଯେପରି ଛିଦ୍ର ଥିବା ପାତ୍ରରୁ ପାଣି।
Verse 78
षड् दोषा: पुरुषेणेह हातव्या भूतिमिच्छता । निद्रा तन्द्रा भयं क्रोध आलस्यं दीर्घसूत्रता,ऐश्वर्य या उन्नति चाहनेवाले पुरुषोंको नींद, तन्द्रा (ऊँचना), डर, क्रोध, आलस्य तथा दीर्घसूत्रता (जल्दी हो जानेवाले काममें अधिक देर लगानेकी आदत)--इन छह: दुर्गुणोंको त्याग देना चाहिये
ବିଦୁର କହିଲେ—ଯେ ପୁରୁଷ ଐଶ୍ୱର୍ୟ ଓ ସତ୍ୟ ଉନ୍ନତି ଚାହେ, ସେ ଏହି ଛଅ ଦୋଷ ନିଶ୍ଚୟ ତ୍ୟାଗ କରୁ: ନିଦ୍ରାଳୁତା, ତନ୍ଦ୍ରା, ଭୟ, କ୍ରୋଧ, ଆଳସ୍ୟ ଓ ଦୀର୍ଘସୂତ୍ରତା।
Verse 79
षडिमान् पुरुषो जह्याद् भिन्नां नावमिवार्णवे | अप्रवक्तारमाचार्यमनधीयानमृत्विजम्,उपदेश न देनेवाले आचार्य, मन्त्रोच्चारण न करनेवाले होता, रक्षा करनेमें असमर्थ राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, ग्राममें रहनेकी इच्छावाले ग्वाले तथा वनमें रहनेकी इच्छावाले नाई--इन छःको उसी भाँति छोड़ दे, जैसे समुद्रकी सैर करनेवाला मनुष्य छिद्रयुक्त नावका परित्याग कर देता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ସମୁଦ୍ରେ ଛିଦ୍ରଯୁକ୍ତ ନାଉକାକୁ ଯେପରି ତ୍ୟାଗ କରାଯାଏ, ସେପରି ମନୁଷ୍ୟ ଏହି ଛଅକୁ ତ୍ୟାଗ କରୁ: ଉପଦେଶ ନ ଦେଇଥିବା ଆଚାର୍ଯ୍ୟ, ଅଧ୍ୟୟନ ନ କରୁଥିବା ଋତ୍ୱିଜ, ରକ୍ଷା କରିବାରେ ଅସମର୍ଥ ରାଜା, କଟୁବାକ୍ୟ କହୁଥିବା ସ୍ତ୍ରୀ, ଗ୍ରାମରେ ରହିବାକୁ ଇଚ୍ଛୁକ ଗୋପାଳ, ଓ ବନରେ ରହିବାକୁ ଇଚ୍ଛୁକ ନାପିତ।
Verse 80
अरक्षितारं राजानं भार्या चाप्रियवादिनीम् | ग्रामकामं च गोपालं वनकाम॑ च नापितम्,उपदेश न देनेवाले आचार्य, मन्त्रोच्चारण न करनेवाले होता, रक्षा करनेमें असमर्थ राजा, कटु वचन बोलनेवाली स्त्री, ग्राममें रहनेकी इच्छावाले ग्वाले तथा वनमें रहनेकी इच्छावाले नाई--इन छःको उसी भाँति छोड़ दे, जैसे समुद्रकी सैर करनेवाला मनुष्य छिद्रयुक्त नावका परित्याग कर देता है
ବିଦୁର ଉପଦେଶ ଦେଲେ—ରକ୍ଷା କରିପାରୁନଥିବା ରାଜା, କଟୁବାକ୍ୟ କହୁଥିବା ସ୍ତ୍ରୀ, ଗ୍ରାମରେ ରହିବାକୁ ମାତ୍ର ଇଚ୍ଛୁକ ଗୋପାଳ, ଓ ବନରେ ରହିବାକୁ ମାତ୍ର ଇଚ୍ଛୁକ ନାପିତ—ଏମାନଙ୍କୁ ନିର୍ଦ୍ୱିଧାୟ ତ୍ୟାଗ କର; ସମୁଦ୍ରଯାତ୍ରାରେ ଛିଦ୍ରଯୁକ୍ତ ନାଉକାକୁ ଯେପରି ଛାଡ଼ିଦିଆଯାଏ।
Verse 81
षडेव तु गुणा: पुंसा न हातव्या: कदाचन । सत्यं दानमनालस्यमनसूया क्षमा धृति:,मनुष्यको कभी भी सत्य, दान, कर्मण्यता, अनसूया (गुणोंमें दोष दिखानेकी प्रवृत्तिका अभाव), क्षमा तथा धैर्य--इन छ: गुणोंका त्याग नहीं करना चाहिये
ବିଦୁର କହିଲେ—ମନୁଷ୍ୟ ଏହି ଛଅ ଗୁଣ କେବେ ମଧ୍ୟ ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ: ସତ୍ୟ, ଦାନ, ଅନାଳସ୍ୟ (କର୍ମନିଷ୍ଠା), ଅନସୂୟା (ଦୋଷଦର୍ଶନ ଓ ଈର୍ଷ୍ୟାର ଅଭାବ), କ୍ଷମା ଓ ଧୃତି (ଧୈର୍ଯ୍ୟ-ସ୍ଥିରତା)।
Verse 82
अर्थागमो नित्यमरोगिता च प्रिया च भार्या प्रियवादिनी च । वश्यश्न पुत्रो$र्थकरी च विद्या षड़् जीवलोकस्य सुखानि राजन्,राजन! धनकी प्राप्ति, नित्य नीरोग रहना, स्त्रीका अनुकूल तथा प्रियवादिनी होना, पुत्रका आज्ञाके अंदर रहना तथा धन पैदा करानेवाली विद्याका ज्ञान--ये छः बातें इस मनुष्यलोकमें सुखदायिनी होती हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ରାଜନ, ଏହି ମନୁଷ୍ୟଲୋକରେ ଛଅଟିକୁ ସୁଖ ବୋଲି ଗଣାଯାଏ: ଧନର ନିରନ୍ତର ଆଗମନ, ନିତ୍ୟ ନିରୋଗତା, ପ୍ରିୟ ଓ ମଧୁରବାଦିନୀ ସ୍ତ୍ରୀ, ଶାସନରେ ଥିବା ଆଜ୍ଞାକାରୀ ପୁତ୍ର, ଏବଂ ଅର୍ଥକାରୀ ବିଦ୍ୟା।
Verse 83
षण्णामात्मनि नित्यानामैश्वर्य योडथिगच्छति । न स पापै: कुतो<नर्थर्युज्यते विजितेन्द्रिय:,मनमें नित्य रहनेवाले छ: शत्रु (काम, क्रोध, लोभ, मोह, मद तथा मात्सर्य)-को जो वशमें कर लेता है, वह जितेन्द्रिय पुरुष पापोंसे ही लिप्त नहीं होता, फिर उनसे उत्पन्न होनेवाले अनर्थोंसे युक्त होनेकी तो बात ही क्या है?
ବିଦୁର କହିଲେ—ନିଜ ଆତ୍ମାରେ ସଦା ବସିଥିବା ଛଅ ଅନ୍ତର୍ଶତ୍ରୁ (କାମ, କ୍ରୋଧ, ଲୋଭ, ମୋହ, ମଦ, ମାତ୍ସର୍ୟ) କୁ ଯେ ଜିତି ଇନ୍ଦ୍ରିୟସଂଯମ ପାଏ, ସେ ପାପରେ ଲିପ୍ତ ହୁଏ ନାହିଁ; ତେବେ ପାପଜନିତ ଅନର୍ଥରେ ସେ କିପରି ଜଡିତ ହେବ?
Verse 84
षडिमे षट्सु जीवन्ति सप्तमो नोपलभ्यते । चौरा: प्रमत्ते जीवन्ति व्याधितेषु चिकित्सका:
ବିଦୁର କହିଲେ—ଛଅ ପ୍ରକାର ଲୋକ ଛଅ ପ୍ରକାର ଅବସ୍ଥାକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଜୀବନ୍ତି; ସପ୍ତମଟି ମିଳେ ନାହିଁ। ଅସାବଧାନଙ୍କୁ ଦେଖି ଚୋର ଜୀବେ, ରୋଗୀଙ୍କୁ ଦେଖି ଚିକିତ୍ସକ ଜୀବେ।
Verse 85
प्रमदा: कामयानेषु यजमानेषु याजका: । राजा विवदमानेषु नित्यं॑ मूर्खेषु पण्डिता:
କାମାସକ୍ତଙ୍କ ପାଖରେ ସ୍ତ୍ରୀ, ଯଜ୍ଞ କରୁଥିବା ଯଜମାନଙ୍କ ପାଖରେ ଯାଜକ, ବିବାଦୀଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ରାଜା, ଏବଂ ମୂର୍ଖମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସଦା ପଣ୍ଡିତ—ଏହିପରି ଦେଖାଯାଏ।
Verse 86
निम्नांकित छः प्रकारके मनुष्य छ: प्रकारके लोगोंसे अपनी जीविका चलाते हैं, सातवेंकी उपलब्धि नहीं होती। चोर असावधान पुरुषसे, वैद्य रोगीसे, कामोन्मत्त स्त्रियाँ कामियोंसे, पुरोहित यजमानोंसे, राजा झगड़नेवालोंसे तथा विद्वान् पुरुष मूर्शोंसे अपनी जीविका चलाते हैं ।। षडिमानि विनश्यन्ति मुहूर्तमनवेक्षणात् । गाव: सेवा कृषिर्भार्या विद्या वृषलसंगति:,मुहूर्त- भर भी देख-रेख न करनेसे गौ, सेवा, खेती, स्त्री, विद्या तथा शूद्रोंसे मेल--ये छः चीजें नष्ट हो जाती हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ମୁହୂର୍ତ୍ତମାତ୍ର ଅବହେଳାରେ ଏହି ଛଅଟି ନଷ୍ଟ ହୁଏ: ଗାଈ, ସେବା/କର୍ତ୍ତବ୍ୟ, କୃଷି, ଭାର୍ଯ୍ୟା (ଗୃହଶୃଙ୍ଖଳା), ବିଦ୍ୟା, ଏବଂ ନୀଚଙ୍କ ସଙ୍ଗତି।
Verse 87
षडेते हावमन्यन्ते नित्यं पूर्वोपकारिणम् । आचार्य शिक्षिता: शिष्या: कृतदाराश्ष मातरम्,ये छ: प्रायः सदा अपने पूर्व उपकारीका सम्मान नहीं करते हैं--शिक्षा समाप्त हो जानेपर शिष्य आचार्यका, विवाहित बेटे माताका, कामवासनाकी शान्ति हो जानेपर पुरुष स्त्रीका, कृतकार्य मनुष्य सहायकका, नदीकी दुर्गम धारा पार कर लेनेवाले पुरुष नावका तथा रोगी पुरुष रोग छूटनेके बाद वैद्यका
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହି ଛଅ ଲୋକ ପ୍ରାୟ ସଦା ନିଜ ପୂର୍ବ ଉପକାରୀଙ୍କୁ ଅବମାନ କରନ୍ତି: ଶିକ୍ଷା ସମାପ୍ତ କରିଥିବା ଶିଷ୍ୟ ଆଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ, ଏବଂ ବିବାହିତ ପୁତ୍ର ମାତାଙ୍କୁ।
Verse 88
नारीं विगतकामास्तु कृतार्थाश्व प्रयोजकम् | नावं निस्तीर्णकान्तारा आतुपराश्न चिकित्सकम्,ये छ: प्रायः सदा अपने पूर्व उपकारीका सम्मान नहीं करते हैं--शिक्षा समाप्त हो जानेपर शिष्य आचार्यका, विवाहित बेटे माताका, कामवासनाकी शान्ति हो जानेपर पुरुष स्त्रीका, कृतकार्य मनुष्य सहायकका, नदीकी दुर्गम धारा पार कर लेनेवाले पुरुष नावका तथा रोगी पुरुष रोग छूटनेके बाद वैद्यका
ବିଦୁର କହିଲେ— କାମନା ଶାନ୍ତ ହେଲେ ଲୋକେ ସ୍ତ୍ରୀକୁ, କାର୍ଯ୍ୟ ସିଦ୍ଧ ହେଲେ ସହାୟକକୁ, ବିପଦଜନକ ପଥ ଟପିଲେ ନାଉକୁ, ଏବଂ ରୋଗ ଭଲ ହେଲେ ବୈଦ୍ୟକୁ ଅବମାନ କରନ୍ତି। ଏହିପରି ଅନେକେ ପୂର୍ବରୁ ଉପକାର କରିଥିବାମାନଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ଦିଅନ୍ତି ନାହିଁ—ଶିକ୍ଷା ସମାପ୍ତି ପରେ ଶିଷ୍ୟ ଆଚାର୍ଯ୍ୟଙ୍କୁ, ବିବାହ ପରେ ପୁତ୍ର ମାତାଙ୍କୁ, କାମଶାନ୍ତି ପରେ ପୁରୁଷ ସ୍ତ୍ରୀକୁ, କାମ ସରିଲେ ମଣିଷ ସହାୟକକୁ, ଦୁର୍ଗମ ଧାରା ଟପିଲେ ନାଉକୁ, ରୋଗମୁକ୍ତ ହେଲେ ରୋଗୀ ବୈଦ୍ୟକୁ ଭୁଲିଯାଏ।
Verse 89
आरोग्यमानृण्यमविप्रवास: सद्धिर्मनुष्यै:ः सह सम्प्रयोग: । स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवास: षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्,राजन! नीरोग रहना, ऋणी न होना, परदेशमें न रहना, अच्छे लोगोंके साथ मेल होना, अपनी वृत्तिसे जीविका चलाना और निर्भय होकर रहना-ये छ: मनुष्यलोकके सुख हैं
ରାଜନ! ନିରୋଗ ରହିବା, ଋଣୀ ନ ହେବା, ପରଦେଶରେ ନ ରହିବା, ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ସହ ସଙ୍ଗ ହେବା, ନିଜ ପ୍ରୟାସରେ ଜୀବିକା ଚାଲାଇବା, ଏବଂ ନିର୍ଭୟ ହୋଇ ରହିବା—ଏହି ଛଅଟି ଜୀବଲୋକର ସୁଖ।
Verse 90
ईर्षी घृणी नसंतुष्ट: क्रोधनो नित्यशड्कित: । परभाग्योपजीवी च षडेते नित्यदु:खिता:
ବିଦୁର କହିଲେ—ଇର୍ଷ୍ୟାଳୁ, ଘୃଣାକାରୀ, ଅସନ୍ତୁଷ୍ଟ, କ୍ରୋଧୀ, ସଦା ସନ୍ଦେହୀ, ଏବଂ ଅନ୍ୟର ଭାଗ୍ୟ ଉପରେ ଜୀବିକା କରୁଥିବା—ଏହି ଛଅଜଣ ସଦା ଦୁଃଖୀ।
Verse 91
ईर्ष्या करनेवाला, घृणा करनेवाला, असंतोषी, क्रोधी, सदा शंकित रहनेवाला और दूसरेके भाग्यपर जीवन-निर्वाह करनेवाला--ये छ: सदा दु:खी रहते हैं ।। सप्त दोषा: सदा राज्ञा हातव्या व्यसनोदया: । प्रायशो यैर्विनश्यन्ति कृतमूला अपीश्वरा:,सत्रीविषयक आसक्ति, जूआ, शिकार, मद्यपान, वचनकी कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धनका दुरुपयोग करना--ये सात दुःखदायी दोष राजाको सदा त्याग देने चाहिये। इनसे दृढ़मूल राजा भी प्राय: नष्ट हो जाते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ଇର୍ଷ୍ୟାଳୁ, ଘୃଣାକାରୀ, ଅସନ୍ତୁଷ୍ଟ, କ୍ରୋଧୀ, ସଦା ସନ୍ଦେହୀ, ଏବଂ ଅନ୍ୟର ଭାଗ୍ୟ ଉପରେ ଜୀବିକା କରୁଥିବା—ଏହି ଛଅଜଣ ସଦା ଦୁଃଖୀ। ଏବଂ ରାଜନ! ବ୍ୟସନରୁ ଜନ୍ମିଥିବା ସାତ ଦୋଷ ରାଜାଙ୍କୁ ସଦା ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ; ଏହାଦ୍ୱାରା ଦୃଢ଼ମୂଳ ରାଜାମାନେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରାୟଃ ନଶ୍ଟ ହୁଅନ୍ତି—ସ୍ତ୍ରୀ-ବିଷୟକ ଆସକ୍ତି, ଜୁଆ, ଶିକାର, ମଦ୍ୟପାନ, କଠୋର ବାକ୍ୟ, ଦଣ୍ଡରେ ଅତ୍ୟଧିକ କଠୋରତା, ଏବଂ ଧନର ଦୁର୍ବ୍ୟବହାର।
Verse 92
स्त्रियो$क्षा मृगया पानं वाक्पारुष्यं च पञजचमम् | महच्च दण्डपारुष्यमर्थदूषणमेव च,सत्रीविषयक आसक्ति, जूआ, शिकार, मद्यपान, वचनकी कठोरता, अत्यन्त कठोर दण्ड देना और धनका दुरुपयोग करना--ये सात दुःखदायी दोष राजाको सदा त्याग देने चाहिये। इनसे दृढ़मूल राजा भी प्राय: नष्ट हो जाते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ସ୍ତ୍ରୀ-ବିଷୟକ ଆସକ୍ତି, ଜୁଆ, ଶିକାର, ମଦ୍ୟପାନ, (ପଞ୍ଚମ) କଠୋର ବାକ୍ୟ, ଦଣ୍ଡରେ ଅତ୍ୟଧିକ କଠୋରତା, ଏବଂ ଧନର ଦୂଷଣ/ଦୁର୍ବ୍ୟବହାର—ଏହି ସାତଟି ଦୁଃଖଦାୟକ ଦୋଷ; ରାଜାଙ୍କୁ ଏଗୁଡ଼ିକ ସଦା ତ୍ୟାଗ କରିବା ଉଚିତ।
Verse 93
अष्टौ पूर्वनिमित्तानि नरस्य विनशिष्यत: । ब्राह्मणान् प्रथम द्वेष्टि ब्राह्मणैश्व विरुध्यते,विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूर्वचिह्न हैं--प्रथम तो वह ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है, फिर उनके विरोधका पात्र बनता है, ब्राह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ- यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है। इन सब दोषोंको बुद्धिमान् मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे
ବିନାଶମୁଖୀ ମଣିଷରେ ଆଠଟି ପୂର୍ବଲକ୍ଷଣ ଦେଖାଯାଏ—ପ୍ରଥମେ ସେ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ଦ୍ୱେଷ କରେ, ପରେ ସେମାନଙ୍କ ସହ ବିରୋଧରେ ପଡ଼େ।
Verse 94
ब्राह्मणस्वानि चादत्ते ब्राह्मणांश्न जिघांसति । रमते निन्दया चैषां प्रशंसां नाभिनन्दति,विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूर्वचिह्न हैं--प्रथम तो वह ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है, फिर उनके विरोधका पात्र बनता है, ब्राह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ- यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है। इन सब दोषोंको बुद्धिमान् मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे
ବିନାଶପଥରେ ଥିବା ମଣିଷ ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କ ଧନ ହଡ଼ପ କରେ, ବ୍ରାହ୍ମଣମାନଙ୍କୁ ହତ୍ୟା କରିବାକୁ ମଧ୍ୟ ଚାହେ; ସେମାନଙ୍କ ନିନ୍ଦାରେ ରମେ ଏବଂ ସେମାନଙ୍କ ପ୍ରଶଂସାକୁ ଆନନ୍ଦରେ ଗ୍ରହଣ କରେନାହିଁ।
Verse 95
नैनान् स्मरति कृत्येषु याचितश्नाभ्यसूयति । एतान् दोषान् नर: प्राज्ञो बुध्येद् बुद्ध्वा विसर्जयेत्,विनाशके मुखमें पड़नेवाले मनुष्यके आठ पूर्वचिह्न हैं--प्रथम तो वह ब्राह्मणोंसे द्वेष करता है, फिर उनके विरोधका पात्र बनता है, ब्राह्मणोंका धन हड़प लेता है, उनको मारना चाहता है, ब्राह्मणोंकी निन्दामें आनन्द मानता है, उनकी प्रशंसा सुनना नहीं चाहता, यज्ञ- यागादिमें उनका स्मरण नहीं करता तथा कुछ माँगनेपर उनमें दोष निकालने लगता है। इन सब दोषोंको बुद्धिमान् मनुष्य समझे और समझकर त्याग दे
କର୍ତ୍ତବ୍ୟକାର୍ଯ୍ୟରେ ସେ ସେମାନଙ୍କୁ ସ୍ମରଣ କରେନାହିଁ; ଏବଂ କିଛି ମାଗିଲେ ସେ ଈର୍ଷ୍ୟା-ସନ୍ଦେହରେ ଦୋଷ ଖୋଜେ। ପ୍ରାଜ୍ଞ ମଣିଷ ଏହି ଦୋଷଗୁଡ଼ିକୁ ବୁଝି, ବୁଝିଲେ ସହସା ତ୍ୟାଗ କରୁ।
Verse 96
अष्टाविमानि हर्षस्य नवनीतानि भारत | वर्तमानानि दृश्यन्ते तान्येव स्वसुखान्यपि,भारत! मित्रोंसे समागम, अधिक धनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिंगन, मैथुनमें संलग्न होना, समयपर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और जनसमाजमें सम्मान--ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं
ହେ ଭାରତ! ହର୍ଷର ‘ନବନୀତ’ ଭଳି ଏହି ଆଠଟି ସାର ଏହି ଲୋକରେ ପ୍ରତ୍ୟକ୍ଷ ଦେଖାଯାଏ; ଏହିଗୁଡ଼ିକ ହିଁ ନିଜର ଲୌକିକ ସୁଖର ମଧ୍ୟ ସାଧନ।
Verse 97
समागमश्न सखिभिर्महांश्षैव धनागम: । पुत्रेण च परिष्वज्भ: संनिपातश्न मैथुने,भारत! मित्रोंसे समागम, अधिक धनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिंगन, मैथुनमें संलग्न होना, समयपर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और जनसमाजमें सम्मान--ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं
ସଖାମାନଙ୍କ ସହ ସମାଗମ, ବହୁ ଧନର ଆଗମନ, ପୁତ୍ରଙ୍କ ଆଲିଙ୍ଗନ, ଏବଂ ମୈଥୁନସଂଯୋଗ—ଏହିଗୁଡ଼ିକ (ହର୍ଷର ସାର) ଅଟେ।
Verse 98
समये च प्रियालाप: स्वयूथ्येषु समुन्नति: । अभिप्रेतस्य लाभश्व॒ पूजा च जनसंसदि,भारत! मित्रोंसे समागम, अधिक धनकी प्राप्ति, पुत्रका आलिंगन, मैथुनमें संलग्न होना, समयपर प्रिय वचन बोलना, अपने वर्गके लोगोंमें उन्नति, अभीष्ट वस्तुकी प्राप्ति और जनसमाजमें सम्मान--ये आठ हर्षके सार दिखायी देते हैं और ये ही अपने लौकिक सुखके भी साधन होते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ମିତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ସମାଗମ, ଅଧିକ ଧନଲାଭ, ପୁତ୍ରଙ୍କ ଆଲିଙ୍ଗନ, ମୈଥୁନସଂଯୋଗରେ ଲୀନ ହେବା, ସମୟୋଚିତ ଭାବେ ପ୍ରିୟବଚନ କହିବା, ନିଜ ଗୋଷ୍ଠୀରେ ଉନ୍ନତି, ଅଭୀଷ୍ଟ ବସ୍ତୁର ଲାଭ ଏବଂ ଜନସଭାରେ ସମ୍ମାନ—ଏହି ଆଠଟି ଆନନ୍ଦର ସାର ଭାବେ ଦେଖାଯାଏ; ଏହିମାନେ ଲୌକିକ ସୁଖର ସାଧନ ମଧ୍ୟ।
Verse 99
अष्टौ गुणा: पुरुषं दीपयन्ति प्रज्ञा च कौल्यं च दम: श्रुतं च । पराक्रमश्चाबहुभाषिता च दानं यथाशक्ति कृतज्ञता च,बुद्धि, कुलीनता, इन्द्रियनिग्रह, शास्त्रज्ञान, पराक्रम, अधिक न बोलना, शक्तिके अनुसार दान और कृतज्ञता--ये आठ गुण पुरुषकी ख्याति बढ़ा देते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ପ୍ରଜ୍ଞା, କୁଳୀନତା (ସଦାଚାର ସହ), ଇନ୍ଦ୍ରିୟନିଗ୍ରହ, ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞାନ, ପରାକ୍ରମ, ମିତଭାଷିତା, ଯଥାଶକ୍ତି ଦାନ ଏବଂ କୃତଜ୍ଞତା—ଏହି ଆଠ ଗୁଣ ପୁରୁଷକୁ ଦୀପ୍ତ କରେ ଓ ଖ୍ୟାତି ବଢ଼ାଏ।
Verse 100
नवद्वारमिदं वेश्म त्रिस्थूणं पठचसाक्षिकम् | क्षेत्रज्ञाधिष्ठितं विद्वान् यो वेद स पर: कवि:,जो विद्वान् पुरुष [आँख, कान आदि] नौ दरवाजे-वाले, तीन (सत्त्व, रज तथा तमरूपी) खंभोंवाले, पाँच (ज्ञानेन्द्रियरूप) साक्षीवाले, आत्माके निवासस्थान इस शरीररूपी गृहको तत्त्वसे जानता है, वह बहुत बड़ा ज्ञानी है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହି ଶରୀର ନବଦ୍ୱାରୀ ଗୃହ; ତିନି ସ୍ତମ୍ଭ (ସତ୍ତ୍ୱ-ରଜ-ତମ) ଉପରେ ଭିତ୍ତିକୃତ; ପାଞ୍ଚ ସାକ୍ଷୀ (ଜ୍ଞାନେନ୍ଦ୍ରିୟ) ଏହାକୁ ଦେଖୁଛନ୍ତି। ଯେ ଜ୍ଞାନୀ ଏହାକୁ କ୍ଷେତ୍ରଜ୍ଞ (ଆତ୍ମା) ଦ୍ୱାରା ଅଧିଷ୍ଠିତ ‘କ୍ଷେତ୍ର’ ଭାବେ ତତ୍ତ୍ୱତଃ ଜାଣେ, ସେଇ ପରମ ଦ୍ରଷ୍ଟା।
Verse 101
दश धर्म न जानन्ति धृतराष्ट्र निबोध तान् । मत्त: प्रमत्त उन्मत्तः श्रान्तः क्रुद्धों बुभुक्षित:,महाराज धृतराष्ट्र! दस प्रकारके लोग धर्मके तत्त्वको नहीं जानते, उनके नाम सुनो। नशेमें मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी-ये दस हैं। अतः इन सब लोगोंमें विद्वान् पुरुष आसक्त न होवे
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ମହାରାଜ! ଶୁଣ: ଦଶ ପ୍ରକାର ଲୋକ ଧର୍ମର ତତ୍ତ୍ୱ ଜାଣନ୍ତି ନାହିଁ—ମତ୍ତ (ନିଶାଗ୍ରସ୍ତ), ପ୍ରମତ୍ତ (ଅସାବଧାନ), ଉନ୍ମତ୍ତ (ବିକ୍ଷିପ୍ତ), ଶ୍ରାନ୍ତ (କ୍ଲାନ୍ତ), କ୍ରୁଦ୍ଧ (କ୍ରୋଧୀ) ଏବଂ ବୁଭୁକ୍ଷିତ (ଭୁଖା)।
Verse 102
त्वरमाणश्न लुब्धश्न भीत: कामी च ते दश । तस्मादेतेषु सर्वेषु न प्रसज्जेत पण्डित:,महाराज धृतराष्ट्र! दस प्रकारके लोग धर्मके तत्त्वको नहीं जानते, उनके नाम सुनो। नशेमें मतवाला, असावधान, पागल, थका हुआ, क्रोधी, भूखा, जल्दबाज, लोभी, भयभीत और कामी-ये दस हैं। अतः इन सब लोगोंमें विद्वान् पुरुष आसक्त न होवे
ବିଦୁର କହିଲେ—ତ୍ୱରାମାଣ (ତ୍ୱରିତ/ଉତାଉଳ), ଲୁବ୍ଧ (ଲୋଭୀ), ଭୀତ (ଭୟଭୀତ) ଏବଂ କାମୀ (କାମାସକ୍ତ)—ଏମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଇ ଦଶରେ। ତେଣୁ ପଣ୍ଡିତ ଏମାନଙ୍କ ସହ କେବେ ଆସକ୍ତ ହେବା ଉଚିତ ନୁହେଁ।
Verse 103
अन्रैवोदाहरन्तीममितिहासं पुरातनम् । पुत्रार्थमसुरेन्द्रेण गीत॑ चैव सुधन्वना,इसी विषयमें असुरोंके राजा प्रह्नादने सुधन्वाके साथ अपने पुत्रके प्रति कुछ उपदेश दिया था। नीतिज्ञलोग उस पुरातन इतिहासका उदाहरण देते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ଏହି ବିଷୟରେ ନୀତିଜ୍ଞମାନେ ଏକ ପୁରାତନ ଇତିହାସକୁ ଦୃଷ୍ଟାନ୍ତ ଭାବେ ଦେଖାନ୍ତି। ପୁତ୍ରହିତାର୍ଥେ ଅସୁରେନ୍ଦ୍ର ପ୍ରହ୍ଲାଦ ଏହି ପ୍ରସଙ୍ଗରେ ସୁଧନ୍ୱାଙ୍କୁ ଉପଦେଶ ଗାଇ/ବର୍ଣ୍ଣନା କରିଥିଲେ।
Verse 104
य:ः काममन्यू प्रजहाति राजा पात्रे प्रतिष्ठापयते धनं च । विशेषविच्छुतवान् क्षिप्रकारी त॑ सर्वलोक: कुरुते प्रमाणम्,जो राजा काम और क्रोधका त्याग करता है और सुपात्रको धन देता है, विशेषज्ञ है, शास्त्रोंका ज्ञाता और कर्तव्यको शीघ्र पूरा करनेवाला है, उस (-के व्यवहार और वचनों)-को सब लोग प्रमाण मानते हैं
ଯେ ରାଜା କାମ ଓ କ୍ରୋଧକୁ ତ୍ୟାଗ କରେ, ସୁପାତ୍ରରେ ଧନ ନିଯୁକ୍ତ କରେ, ବିଶେଷଜ୍ଞ, ଶାସ୍ତ୍ରଜ୍ଞ ଓ କର୍ତ୍ତବ୍ୟରେ ଶୀଘ୍ରକାରୀ—ତାହାକୁ ସର୍ବଲୋକ ପ୍ରମାଣ ମାନନ୍ତି।
Verse 105
जानाति विश्वासयितुं मनुष्यान् विज्ञातदोषेषु दधाति दण्डम् | जानाति मात्रां च तथा क्षमां च त॑ तादृशं श्रीर्जुषते समग्रा,जो मनुष्योंमें विश्वास उत्पन्न करना जानता है, जिनका अपराध प्रमाणित हो गया है उन्हींको जो दण्ड देता है, जो दण्ड देनेकी न्यूनाधिक मात्रा तथा क्षमाका उपयोग जानता है, उस राजाकी सेवामें सम्पूर्ण सम्पत्ति चली आती है
ଯେ ଶାସକ ଲୋକମାନଙ୍କ ମନେ ବିଶ୍ୱାସ ଜଗାଇବା ଜାଣେ, ଦୋଷ ପ୍ରମାଣିତ ହୋଇଥିବାମାନଙ୍କୁ ମାତ୍ର ଦଣ୍ଡ ଦିଏ, ଦଣ୍ଡର ଯଥାଯଥ ମାତ୍ରା ଓ ସମୟୋଚିତ କ୍ଷମା—ଦୁହେଁ ଜାଣେ; ଏମିତି ରାଜାଙ୍କୁ ସମଗ୍ର ସମୃଦ୍ଧି ସ୍ୱୟଂ ସେବା କରେ।
Verse 106
सुदुर्बल॑ नावजानाति कंचिद् युक्तो रिपुं सेवते बुद्धिपूर्वम् । न विग्रहं रोचयते बलस्थै: काले च यो विक्रमते स धीर:,जो किसी दुर्बलका अपमान नहीं करता, सदा सावधान रहकर शत्रुके साथ बुद्धिपूर्वक व्यवहार करता है, बलवानोंके साथ युद्ध पसंद नहीं करता तथा समय आनेपर पराक्रम दिखाता है, वही धीर है
ଯେ କେହି ଅତିଦୁର୍ବଳକୁ ମଧ୍ୟ ଅବମାନ କରେନାହିଁ, ସଂଯମୀ ଓ ସଚେତନ ରହି ଶତ୍ରୁ ସହ ବୁଦ୍ଧିପୂର୍ବକ ବ୍ୟବହାର କରେ, ବଳବାନଙ୍କ ସହ ଅକାରଣ ବିଗ୍ରହ ପସନ୍ଦ କରେନାହିଁ, ଏବଂ ସମୟ ଆସିଲେ ପରାକ୍ରମ ଦେଖାଏ—ସେଇ ଧୀର।
Verse 107
प्राप्पापदं न व्यथते कदाचि- दुद्योगमन्विच्छति चाप्रमत्त: । दुःखं च काले सहते महात्मा धुरन्धरस्तस्य जिता: सपत्ना:,जो धुरन्धर महापुरुष आपत्ति पड़नेपर कभी दुःखी नहीं होता, बल्कि सावधानीके साथ उद्योगका आश्रय लेता है तथा समयपर दुःख सहता है, उसके शत्रु तो पराजित ही हैं
ଆପଦ ଆସିଲେ ମଧ୍ୟ କେବେ ବି ଯେ ଧୁରନ୍ଧର ମହାତ୍ମା ବ୍ୟଥିତ ହୁଏନାହିଁ, ଅପ୍ରମତ୍ତ ରହି ଉଦ୍ୟୋଗକୁ ଆଶ୍ରୟ କରେ, ଏବଂ ସମୟ ଆସିଲେ ଦୁଃଖ ସହେ—ତାହାର ସପତ୍ନମାନେ ତ ଜିତାହୋଇଥିବା ସମାନ।
Verse 108
अनर्थक विप्रवासं गृहे भ्य: पापै: सन्धिं परदाराभिमर्शम् । दम्भं स्तैन्यं पैशुनं मद्यपानं न सेवते यश्च सुखी सदैव,जो घर छोड़कर निरर्थक विदेशवास, पापियोंसे मेल, परस्त्रीगमन, पाखण्ड, चोरी, चुगलखोरी तथा मदिरापान--इन सबका सेवन नहीं करता, वह सदा सुखी रहता है
ଯେ ଘର ଛାଡ଼ି ନିରର୍ଥକ ପ୍ରବାସ କରେନି, ପାପୀମାନଙ୍କ ସହ ସଙ୍ଗ/ସନ୍ଧି କରେନି, ପରସ୍ତ୍ରୀଗମନ କରେନି, ଢୋଙ୍ଗ, ଚୋରି, ଚୁଗୁଲି ଓ ମଦ୍ୟପାନ କରେନି—ସେ ସଦା ସୁଖୀ ରହେ।
Verse 109
न संरम्भेणारभते त्रिवर्ग- माकारित: शंसति तत्त्वमेव । न मित्रार्थे रोचयते विवादं नापूजित: कुप्यति चाप्यमूढ:,जो क्रोध या उतावलीके साथ धर्म, अर्थ तथा कामका आरम्भ नहीं करता, पूछनेपर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रके लिये झगड़ा नहीं पसंद करता, आदर न पानेपर क्ुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खो बैठता, दूसरोंके दोष नहीं देखता, सबपर दया करता है, असमर्थ होते हुए किसीकी जमानत नहीं देता, बढ़कर नहीं बोलता तथा विवादको सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है
ଯେ କ୍ରୋଧ କିମ୍ବା ଉତାବଳାରେ ଧର୍ମ-ଅର୍ଥ-କାମ ଏହି ତ୍ରିବର୍ଗର କାର୍ଯ୍ୟ ଆରମ୍ଭ କରେନି, ପଚାରିଲେ କେବଳ ସତ୍ୟ କହେ, ମିତ୍ର ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ବିବାଦକୁ ଭଲ ପାଏନି, ଏବଂ ସମ୍ମାନ ନ ମିଳିଲେ ମଧ୍ୟ କ୍ରୋଧିତ ହୁଏନି—ସେ ଧୀର ଜ୍ଞାନୀ।
Verse 110
न यो5भ्यसूयत्यनुकम्पते च न दुर्बल: प्रातिभाव्यं करोति । नात्याह किंचित् क्षमते विवादं सर्वत्र तादूगू लभते प्रशंसाम्,जो क्रोध या उतावलीके साथ धर्म, अर्थ तथा कामका आरम्भ नहीं करता, पूछनेपर यथार्थ बात ही बतलाता है, मित्रके लिये झगड़ा नहीं पसंद करता, आदर न पानेपर क्ुद्ध नहीं होता, विवेक नहीं खो बैठता, दूसरोंके दोष नहीं देखता, सबपर दया करता है, असमर्थ होते हुए किसीकी जमानत नहीं देता, बढ़कर नहीं बोलता तथा विवादको सह लेता है, ऐसा मनुष्य सब जगह प्रशंसा पाता है
ଯେ ଇର୍ଷ୍ୟା କରେନି ଓ କରୁଣାଶୀଳ, ଯେ ଅସମର୍ଥ ହୋଇ ମଧ୍ୟ କାହାରି ଜାମିନ ହୁଏନି, ଯେ ଅତି କଥା କହେନି ଓ ବିବାଦକୁ ସହେ—ସେ ଲୋକ ସର୍ବତ୍ର ପ୍ରଶଂସା ପାଏ।
Verse 111
यो नोद्धतं कुरुते जातु वेषं न पौरुषेणापि विकत्थते<न्यान् । न मूर्च्छित: कटुकान्याह किंचित् प्रियं सदा त॑ कुरुते जनो हि,जो कभी उद्ण्डका-सा वेष नहीं बनाता, दूसरोंके सामने अपने पराक्रमकी श्लाघा भी नहीं करता, क्रोधसे व्याकुल होनेपर भी कटुवचन नहीं बोलता, उस मनुष्यको लोग सदा ही प्यारा बना लेते हैं
ଯେ କେବେ ଉଦ୍ଧତ ଭଙ୍ଗୀ ଧାରଣ କରେନି, ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ସାମ୍ନାରେ ନିଜ ପୌରୁଷର ଡିଙ୍ଗ ମାରେନି, ଏବଂ କ୍ରୋଧରେ ମୁର୍ଛିତ ହେଲେ ମଧ୍ୟ କଟୁବଚନ କହେନି—ଲୋକେ ତାକୁ ସଦା ପ୍ରିୟ କରନ୍ତି।
Verse 112
न वैरमुद्दीपयति प्रशान्तं न दर्पमारोहति नास्तमेति । न दुर्गतो5स्मीति करोत्यकार्य तमार्यशीलं परमाहुरार्या:,जो शान्त हुई वैरकी आगको फिर प्रज्वलित नहीं करता, गर्व नहीं करता, हीनता नहीं दिखाता तथा “मैं विपत्तिमें पड़ा हूँ” ऐसा सोचकर अनुचित काम नहीं करता, उस उत्तम आचरणवाले पुरुषको आर्यजन सर्वश्रेष्ठ कहते हैं
ଯେ ଶାନ୍ତ ହୋଇଥିବା ବୈରକୁ ପୁଣି ଉତ୍ତେଜିତ କରେନି, ଗର୍ବରେ ଚଢ଼େନି, ନିରାଶାରେ ଡୁବେନି; ଏବଂ “ମୁଁ ବିପଦରେ ପଡ଼ିଛି” ଭାବି ମଧ୍ୟ ଅନୁଚିତ କାମ କରେନି—ସେହି ଆର୍ୟଶୀଳ ପୁରୁଷକୁ ଜ୍ଞାନୀମାନେ ସର୍ବଶ୍ରେଷ୍ଠ କହନ୍ତି।
Verse 113
न स्वे सुखे वै कुरुते प्रहर्ष नान्यस्य दु:खे भवति प्रह्ृष्ट: । दत्त्वा न पश्चात् कुरुतेडनुतापं स कथ्यते सत्पुरुषार्यशील:,जो अपने सुखमें प्रसन्न नहीं होता, दूसरेके दुःखके समय हर्ष नहीं मानता और दान देकर पश्चात्ताप नहीं करता, वह सज्जनोंमें सदाचारी कहलाता है
ଯେ ନିଜ ସୁଖରେ ହର୍ଷ କରେ ନାହିଁ, ଅନ୍ୟର ଦୁଃଖରେ ଆନନ୍ଦ କରେ ନାହିଁ, ଏବଂ ଦାନ କରି ପରେ ପଶ୍ଚାତ୍ତାପ କରେ ନାହିଁ—ସେ ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସଦାଚାରୀ, ଆର୍ୟଶୀଳ ବୋଲି କୁହାଯାଏ।
Verse 114
देशाचारान् समयाञ्जातिधर्मान् बुभूषते यः: स परावरज्ञ: । स यत्र तत्राभिगत: सदैव महाजनस्याधिपत्यं करोति,जो मनुष्य देशके व्यवहार, अवसर तथा जातियोंके धर्मोको तत्त्वसे जानना चाहता है, उसे उत्तम-अधमका विवेक हो जाता है। वह जहाँ कहीं भी जाता है, सदा महान् जनसमूहपर अपनी प्रभुता स्थापित कर लेता है
ଯେ ଦେଶର ଆଚାର, ସମୟୋଚିତ ମର୍ଯ୍ୟାଦା ଓ ବିଭିନ୍ନ ଜାତିର ଧର୍ମକୁ ତତ୍ତ୍ୱରେ ଜାଣିବାକୁ ଚାହେ, ସେ ଉତ୍ତମ-ଅଧମର ବିବେକ ପାଏ। ସେ ଯେଉଁଠି ଯାଏ, ସେଠି ସଦା ମହାଜନସମୂହ ଉପରେ ନିଜ ପ୍ରଭାବ ଓ ଅଧିପତ୍ୟ ସ୍ଥାପନ କରେ।
Verse 115
दम्भं मोहं मत्सरं पापकृत्यं राजद्विष्ट॑ पैशुनं पूगवैरम् । मत्तोन्मत्तैर्दुर्जनैश्वापि वाद॑ यः प्रज्ञावान् वर्जयेत् स प्रधान:,जो बुद्धिमान् दम्भ, मोह, मात्सर्य, पापकर्म, राजद्रोह, चुगलखोरी, समूहसे वैर और मतवाले, पागल तथा दुर्जनोंसे विवाद छोड़ देता है, वह श्रेष्ठ है
ଯେ ପ୍ରଜ୍ଞାବାନ୍ ଦମ୍ଭ, ମୋହ, ମତ୍ସର, ପାପକର୍ମ, ରାଜବିରୋଧ, ଚୁଗଲି, ଗୋଷ୍ଠୀ-ବୈର ଏବଂ ମତ୍ତ, ଉନ୍ମତ୍ତ ଓ ଦୁର୍ଜନମାନଙ୍କ ସହ ବିବାଦ—ଏସବୁକୁ ତ୍ୟାଗ କରେ, ସେଇ ଶ୍ରେଷ୍ଠ।
Verse 116
दानं होम॑ देवतं मड़़लानि प्रायश्चित्तान विविधाँललोकवादान् । एतानि यः कुरुते नैत्यकानि तस्योत्थानं देवता राधयन्ति,जो दान, होम, देवपूजन, मांगलिक कर्म, प्रायश्चित्त तथा अनेक प्रकारके लौकिक आचार--इन नित्य किये जानेयोग्य कर्मोंको करता है, देवतालोग उसके अभ्युदयकी सिद्धि करते हैं
ଯେ ଦାନ, ହୋମ, ଦେବପୂଜା, ମାଙ୍ଗଳିକ କର୍ମ, ପ୍ରାୟଶ୍ଚିତ୍ତ ଏବଂ ବିଭିନ୍ନ ପ୍ରକାରର ଲୋକସମ୍ମତ ଆଚାର—ଏହି ନିତ୍ୟକର୍ମଗୁଡ଼ିକ କରେ, ଦେବତାମାନେ ତାହାର ଅଭ୍ୟୁଦୟ ସିଦ୍ଧ କରନ୍ତି।
Verse 117
समैर्विवाहं कुरुते न हीनै: समै: सख्यं व्यवहारं कथां च । गुणैविशिष्टांश्न पुरो दधाति विपश्चितस्तस्य नया: सुनीता:,जो अपने बराबरवालोंके साथ विवाह, मित्रता, व्यवहार तथा बातचीत करता है, हीन पुरुषोंके साथ नहीं और गुणोंमें बढ़े-चढ़े पुरुषोंको सदा आगे रखता है, उस विद्वान्की नीति श्रेष्ठ नीति है
ଯେ ସମାନମାନଙ୍କ ସହ ବିବାହ କରେ, ହୀନମାନଙ୍କ ସହ ନୁହେଁ; ସମାନମାନଙ୍କ ସହିତ ମିତ୍ରତା, ବ୍ୟବହାର ଓ କଥାବାର୍ତ୍ତା କରେ; ଏବଂ ଗୁଣରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠମାନଙ୍କୁ ସଦା ଅଗ୍ରେ ରଖେ—ସେହି ବିପଶ୍ଚିତ୍ର ନୀତି ସୁନୀତ, ଅର୍ଥାତ୍ ଉତ୍ତମ ନୀତି।
Verse 118
मितं भुड्क्ते संविभज्यश्रितेभ्यो मितं स्वपित्यमितं कर्म कृत्वा । ददात्यमित्रेष्वपि याचित: सं- स्तमात्मवन्तं प्रजहत्यनर्था:
ବିଦୁର କହିଲେ—ଯେ ଆଶ୍ରିତମାନଙ୍କୁ ବାଣ୍ଟି ନିଜେ ମିତାହାର କରେ, ମିତ ନିଦ୍ରା ନେଇ ଧର୍ମସମ୍ମତ ମହତ୍ କାର୍ଯ୍ୟରେ ଅପାର ପରିଶ୍ରମ କରେ, ଏବଂ ଯାଚିତ ହେଲେ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦାନ କରେ—ଏପରି ଆତ୍ମସଂଯମୀ ସ୍ଥିରପୁରୁଷଙ୍କୁ ଅନର୍ଥ ଆକ୍ରମଣ କରେନାହିଁ।
Verse 119
जो अपने आश्रितजनोंको बाँटकर थोड़ा ही भोजन करता है, बहुत अधिक काम करके भी थोड़ा सोता है तथा माँगनेपर जो मित्र नहीं है, उन्हें भी धन देता है, उस मनस्वी पुरुषको सारे अनर्थ दूरसे ही छोड़ देते हैं ।। चिकीर्षितं विप्रकृतं च यस्य नान्ये जना: कर्म जानन्ति किंचित् | मन्त्रे गुप्ते सम्यगनुछिते च नाल्पो<प्यस्य च्यवते कक्रिदर्थ:,जिसके अपनी इच्छाके अनुकूल और दूसरोंकी इच्छाके विरुद्ध कार्यको दूसरे लोग कुछ भी नहीं जान पाते, मन्त्र गुप्त रहने और अभीष्ट कार्यका ठीक-ठीक सम्पादन होनेके कारण उसका थोड़ा भी काम बिगड़ने नहीं पाता
ବିଦୁର କହିଲେ—ଯେ ଆଶ୍ରିତମାନଙ୍କୁ ବାଣ୍ଟି ନିଜେ ଅଳ୍ପ ଭୋଜନ କରେ, ବହୁ କାମ କରି ମଧ୍ୟ ଅଳ୍ପ ନିଦ୍ରା କରେ, ଏବଂ ଯାଚିତ ହେଲେ ମିତ୍ର ନୁହେଁ ଏମିତି ଲୋକଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଧନ ଦାନ କରେ—ସେହି ମନସ୍ବୀ ପୁରୁଷକୁ ଅନର୍ଥ ଦୂରରୁ ହିଁ ଛାଡ଼ି ଯାଏ। ଆଉ ଯାହାର ଇଚ୍ଛାନୁକୂଳ କିମ୍ବା ପରଇଚ୍ଛାବିରୋଧୀ କାର୍ଯ୍ୟକୁ ଅନ୍ୟେ କିଛି ମଧ୍ୟ ଜାଣିପାରନ୍ତି ନାହିଁ, ଯାହାର ମନ୍ତ୍ର ଗୁପ୍ତ ରହେ ଏବଂ ଯୋଜନା ସମ୍ୟକ୍ ଭାବେ ସମ୍ପାଦିତ ହୁଏ—ତାହାର କୃତ୍ୟର ଅଳ୍ପ ଅଂଶ ମଧ୍ୟ ବିଫଳ ହୁଏନାହିଁ।
Verse 120
यः सर्वभूतप्रशमे निविष्ट: सत्यो मृदुर्मानकृच्छुद्ध भाव: । अतीव स ज्ञायते ज्ञातिमध्ये महामणिर्जात्य इव प्रसन्न:,जो मनुष्य सम्पूर्ण भूतोंको शान्ति प्रदान करनेमें तत्पर, सत्यवादी, कोमल, दूसरोंको आदर देनेवाला तथा पवित्र विचारवाला होता है, वह अच्छी खानसे निकले और चमकते हुए श्रेष्ठ रत्नकी भाँति अपनी जातिवालोंमें अधिक प्रसिद्धि पाता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଯେ ସମସ୍ତ ଭୂତଙ୍କୁ ଶାନ୍ତି ଦେବାରେ ନିବିଷ୍ଟ, ସତ୍ୟବାଦୀ, ମୃଦୁ, ଅନ୍ୟଙ୍କୁ ସମ୍ମାନ ଦେଉଥିବା ଏବଂ ଶୁଦ୍ଧଭାବସମ୍ପନ୍ନ—ସେ ନିଜ ଜ୍ଞାତିମଧ୍ୟରେ ଉତ୍ତମ ଖଣିରୁ ନିଷ୍କାଶିତ ଦୀପ୍ତିମାନ ମହାମଣି ପରି ବିଶେଷ ଖ୍ୟାତି ପାଏ।
Verse 121
य आत्मनापत्रपते भृशं नरः स सर्वलोकस्य गुरुर्भवत्युत । अनन्ततेजा: सुमना: समाहित: स तेजसा सूर्य इवावभासते,जो स्वयं ही अधिक लज्जाशील है, वह सब लोगोंमें श्रेष्ठ समझा जाता है। वह अपने अनन्त तेज, शुद्ध हृदय एवं एकाग्रतासे युक्त होनेके कारण कान्तिमें सूर्यके समान शोभा पाता है
ବିଦୁର କହିଲେ—ଯେ ପୁରୁଷ ନିଜ ଆତ୍ମାର ସମ୍ମୁଖରେ ଗଭୀର ଲଜ୍ଜା ବୋଧ କରେ, ସେ ନିଶ୍ଚୟ ସମସ୍ତ ଲୋକର ଗୁରୁ ହୁଏ। ଅନନ୍ତ ତେଜ, ଶୁଦ୍ଧମନ ଓ ସମାହିତ ଚିତ୍ତ ସହିତ ସେ ନିଜ ଧର୍ମତେଜରେ ସୂର୍ଯ୍ୟ ପରି ଦୀପ୍ତିମାନ ହୁଏ।
Verse 122
वने जाता: शापदग्धस्य राज्ञ: पाण्डो: पुत्रा: पउच पउ्चेन्द्रकल्पा: । त्वयैव बाला वर्धिता: शिक्षिताश्र तवादेशं पालयन्त्यम्बिकेय,अम्बिकानन्दन! (मृगरूपधारी किंदम ऋषिके) शापसे दग्ध राजा पाण्डुके जो पाँच पुत्र वनमें उत्पन्न हुए, वे पाँच इन्दोंके समान शक्तिशाली हैं, उन्हें आपने ही बचपनसे पाला और शिक्षा दी है; वे भी आपकी आज्ञाका पालन करते रहते हैं
ବିଦୁର କହିଲେ—ହେ ଅମ୍ବିକାନନ୍ଦନ! ଶାପଦଗ୍ଧ ରାଜା ପାଣ୍ଡୁଙ୍କର ଯେ ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ର ବନରେ ଜନ୍ମିଥିଲେ, ସେମାନେ ପାଞ୍ଚଜଣେ ଇନ୍ଦ୍ରସମ ପରାକ୍ରମୀ। ତୁମେ ନିଜେ ସେମାନଙ୍କୁ ଶୈଶବରୁ ପାଳି-ପୋଷି ଶିକ୍ଷା ଦେଇଛ; ଏବଂ ସେମାନେ ତୁମ ଆଦେଶ ପାଳନ କରୁଛନ୍ତି।
Verse 123
प्रदायैषामुचितं तात राज्यं सुखी पुत्रै: सहितो मोदमान: । न देवानां नापि च मानुषाणां भविष्यसि त्वं तर्कणीयो नरेन्द्र,तात! उन्हें उनका न््यायोचित राज्यभाग देकर आप अपने पुत्रोंक साथ आनन्दित होते हुए सुख भोगिये। नरेन्द्र! ऐसा करनेपर आप देवताओं तथा मनुष्योंकी आलोचनाके विषय नहीं रह जायँगे
ତାତ! ସେମାନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ନ୍ୟାୟୋଚିତ ରାଜ୍ୟଭାଗ ଦେଇ, ପୁତ୍ରମାନଙ୍କ ସହ ଆନନ୍ଦିତ ହୋଇ ସୁଖରେ ଶାନ୍ତି ଭୋଗ କର। ନରେନ୍ଦ୍ର! ଏପରି କଲେ ଦେବମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ନୁହେଁ, ମନୁଷ୍ୟମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ମଧ୍ୟ ତୁମେ ଆଉ ନିନ୍ଦାର ପାତ୍ର ହେବ ନାହିଁ।
The dilemma is whether a ruler prioritizes dharma-driven restraint and fair settlement or permits partisan attachment and weak oversight to normalize harmful policy—thereby transferring private bias into public catastrophe.
That ethical governance requires disciplined counsel and accountability: dharma is treated as superior to wealth-accumulation and comfort, while karmic outcomes and social judgment follow rulers who ignore corrective advice.
No explicit phalaśruti is presented; the meta-function is structural and didactic—positioning the envoy’s report as a moral audit of kingship and preparing the next day’s sabhā hearing as the decisive interpretive forum.