Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
चत्वारि कर्माण्यभयंकराणि भयं प्रयच्छन्त्ययथाकृतानि । मानाग्निहोत्रमुत मानमौनं मानेनाधीतमुत मानयज्ञ:,चार कर्म भयको दूर करनेवाले हैं; किंतु वे ही यदि ठीक तरहसे सम्पादित न हों, तो भय प्रदान करते हैं। वे कर्म हैं--आदरके साथ अग्निहोत्र, आदरपूर्वक मौनका पालन, आदरपूर्वक स्वाध्याय और आदरके साथ यज्ञका अनुष्ठान
catvāri karmāṇy abhayankarāṇi bhayaṁ prayacchanty ayathākṛtāni | mānāgnihotram uta mānamaunaṁ mānenādhītam uta mānayajñaḥ ||
ବିଦୁର କହିଲେ—ଚାରିଟି କର୍ମ ଭୟ ଦୂର କରେ; କିନ୍ତୁ ଯଥାବିଧି ନ କରାଗଲେ ସେଇ କର୍ମ ନିଜେ ଭୟ ଓ ଅନର୍ଥ ଦେଇଥାଏ। ସେଗୁଡ଼ିକ—ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ଅଗ୍ନିହୋତ୍ର, ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ମୌନ, ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ସ୍ୱାଧ୍ୟାୟ, ଏବଂ ଶ୍ରଦ୍ଧାସହ ଯଜ୍ଞାନୁଷ୍ଠାନ।
विदुर उवाच