Adhyaya 32: Saṃjaya’s Return, Audience with Dhṛtarāṣṭra, and Ethical Admonition
आरोग्यमानृण्यमविप्रवास: सद्धिर्मनुष्यै:ः सह सम्प्रयोग: । स्वप्रत्यया वृत्तिरभीतवास: षड् जीवलोकस्य सुखानि राजन्,राजन! नीरोग रहना, ऋणी न होना, परदेशमें न रहना, अच्छे लोगोंके साथ मेल होना, अपनी वृत्तिसे जीविका चलाना और निर्भय होकर रहना-ये छ: मनुष्यलोकके सुख हैं
ରାଜନ! ନିରୋଗ ରହିବା, ଋଣୀ ନ ହେବା, ପରଦେଶରେ ନ ରହିବା, ସଜ୍ଜନମାନଙ୍କ ସହ ସଙ୍ଗ ହେବା, ନିଜ ପ୍ରୟାସରେ ଜୀବିକା ଚାଲାଇବା, ଏବଂ ନିର୍ଭୟ ହୋଇ ରହିବା—ଏହି ଛଅଟି ଜୀବଲୋକର ସୁଖ।
विदुर उवाच