
Pāṇḍava-senā-niryāṇa and Vyūha-vibhāga (पाण्डवसेनानिर्याण तथा व्यूहविभाग)
Upa-parva: Sainyaniryāṇa (Pāṇḍava-senā-vyūha) Episode
Sañjaya reports that upon hearing Ulūka’s words, Yudhiṣṭhira orders the Pāṇḍava army to move out with Dhṛṣṭadyumna at the front. The host is described as a formidable caturvidha-bala—infantry, elephants, chariots, and cavalry—guarded by Bhīmasena and other leaders alongside Arjuna and the mahārathas, and likened to an unshaken earth or a still ocean in its steadiness. Dhṛṣṭadyumna, intent on confronting Droṇa, advances the divisions and assigns principal warriors against prominent opponents in accordance with strength and resolve: Arjuna toward Karṇa; Bhīma toward Duryodhana; Nakula toward Aśvatthāman; Śaibya toward Kṛtavarman; Yuyudhāna toward Jayadratha; Śikhaṇḍin toward Bhīṣma; Sahadeva toward Śakuni; Cekitāna toward Śalya; Dhṛṣṭaketu toward Śalya (as additionally stated); Uttamaujas toward Gautama; the Draupadeyas toward the Trigartas; and Abhimanyu toward Vṛṣasena, with Abhimanyu assessed as exceptionally capable in battle. After separating and grouping these fighters, Dhṛṣṭadyumna—described as radiant and resolute—organizes the army in proper formation (vidhivat vyūhya) and stands prepared for the Pāṇḍavas’ success in the imminent engagement.
Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र को बताता है कि दुर्योधन का दूत उलूक फिर अर्जुन के पास आया और दुर्योधन का संदेश—धमकी, उपहास और युद्ध-घोष—ज्यों का त्यों सुनाने लगा। → उलूक के वचन सुनते ही पाण्डव पहले से संचित क्रोध में भड़क उठते हैं; वे आसनों से उठ खड़े होते हैं, भुजाएँ झटकते हैं और क्रुद्ध सर्पों की भाँति एक-दूसरे की ओर देखते हैं। सभा का ताप बढ़ता जाता है—यह केवल संदेश नहीं, पाण्डव-धर्म और वीर्य को ललकारने वाला अपमान है। → भाव-भंगिमा पढ़कर वृकोदर (भीम) हाथ मसलते हुए उठता है और उलूक को कठोर उत्तर देता है—दुर्योधन को समस्त क्षत्रियों के बीच, कर्ण और धृतराष्ट्र के सुनते हुए, पाण्डव-प्रतिज्ञा और प्रतिशोध का संदेश पहुँचाने को कहता है; दुर्योधन के ‘उधार के बल’ पर गर्जने का उपहास करता है और युद्ध में पाण्डव-पक्ष के महारथियों की ज्वाला-सी प्रतिज्ञा का उद्घोष करता है। → उलूक को स्पष्ट कर दिया जाता है कि उसका संदेश सुन लिया गया; अब पाण्डव भयभीत नहीं, बल्कि प्रतिज्ञाबद्ध हैं—दूत लौटे और दुर्योधन को वही उत्तर दे जो यहाँ से उठी अग्नि है। → दूत के लौटते ही यह प्रश्न हवा में लटकता है—क्या दुर्योधन इस उत्तर से भी झुकेगा, या अपमान-प्रतिज्ञा का यह संवाद सीधे कुरुक्षेत्र की रणभेरी बन जाएगा?
Verse 1
अपना बछ। डे, द्विषष्टर्याधेकशततमो< ध्याय: पाण्डवपक्षकी ओरसे दुर्योधनको उसके संदेशका उत्तर संजय उवाच उलूकस्त्वर्जुनं भूयो यथोक्तं वाक्यमत्रवीत् | आशीविषमिव क्रुद्धं तुदन् वाक्यशलाकया,संजय कहते हैं--राजन्! उलूकने विषधर सर्पके समान क्रोधमें भरे हुए अर्जुनको अपने वाग्बाणोंसे और भी पीड़ा देते हुए दुर्योधनकी कही हुई सारी बातें कह सुनायीं इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत उलूकदूताभिगमनपर्वमें श्रीकृष्ण आदिके वचनविषयक एक सौ बासठवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ १६२ ॥/ ऑपन-साजल बछ। अप ऋाल त्रिषष्टयाधिेकशततमो< ध्याय: पाँचों पाण्डवों, विराट, द्रुपद, शिखण्डी और धृष्टद्युम्नका संदेश लेकर उलूकका लौटना और उलूककी बात सुनकर दुर्योधनका सेनाको युद्धके लिये तैयार होनेका आदेश देना संजय उवाच दुर्योधनस्यथ तद् वाक्य निशम्य भरतर्षभ । नेत्राभ्यामतिताम्राभ्यां कैतव्यं समुदैक्षत
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ରାଜନ୍! ଉଲୂକ ପୁନର୍ବାର ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ, ଯେପରି କହିବାକୁ ଶିଖାଯାଇଥିଲା ସେହିପରି ଯଥାବତ୍ ବାର୍ତ୍ତା କହିଲା। କ୍ରୋଧରେ ବିଷଧର ସର୍ପ ସମ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାକ୍ୟ-ଶଲାକାରେ ଅଧିକ ଚୁଭାଇ, ଦୁର୍ୟୋଧନଙ୍କ ସମଗ୍ର ସନ୍ଦେଶ ଯଥାର୍ଥ ଶୁଣାଇଲା।
Verse 2
तस्य तद् वचन श्रुत्वा रुषिता: पाण्डवा भृशम् | प्रागेव भृशसंक्रुद्धा: कैतव्येनापि धर्षिता:,उसकी बात सुनकर पाण्डवोंको बड़ा रोष हुआ। एक तो वे पहलेसे ही अधिक क्रुद्ध थे, दूसरे जुआरी शकुनिके बेटेने भी उनका बड़ा तिरस्कार किया
ତାହାର କଥା ଶୁଣି ପାଣ୍ଡବମାନେ ଅତ୍ୟନ୍ତ କ୍ରୋଧିତ ହେଲେ। ସେମାନେ ପୂର୍ବରୁ ହିଁ ଭୟଙ୍କର ରୋଷରେ ଥିଲେ; ତା’ପରେ ସେଇ କୈତବ୍ୟ ଜୁଆରି ଅପମାନ କରି ଆଉ ଅଧିକ ଉତ୍ତେଜିତ କଲା।
Verse 3
आसनेषूदतिष्ठन्त बाहुंश्नैव प्रचिक्षिपु: । आशीविषा इव क्रुद्धा वीक्षांचक्रु: परस्परम्,वे आसनोंसे उठकर खड़े हो गये और अपनी भुजाओंको इस प्रकार हिलाने लगे, मानो प्रहार करनेके लिये उद्यत हों। वे विषैले सर्पोंके समान अत्यन्त कुपित हो एक-दूसरेकी ओर देखने लगे
ସେମାନେ ଆସନରୁ ଉଠି ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ ଏବଂ ପ୍ରହାରକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେବା ପରି ଭୁଜା ଝଟକିଲେ। କ୍ରୋଧିତ ବିଷଧର ସର୍ପମାନଙ୍କ ପରି ସେମାନେ ପରସ୍ପରଙ୍କୁ ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଦୃଷ୍ଟିରେ ଦେଖିଲେ।
Verse 4
अवाक्शिरा भीमसेन: समुदैक्षत केशवम् | नेत्राभ्यां लोहितान्ताभ्यामाशीविष इव श्वसन्,भीमसेनने फुफकारते हुए विषधर नागकी भाँति लंबी साँसें खींचते हुए सिर नीचे किये लाल नेत्रोंसे भगवान् श्रीकृष्णकी ओर देखा
ଭୀମସେନ ମୁଣ୍ଡ ନମାଇ କେଶବଙ୍କୁ ଦେଖିଲେ। ବିଷଧର ସର୍ପ ପରି ଶ୍ୱାସ ଫୁଙ୍କାରି, ଆଖିର କୋଣ ଲାଲ ହୋଇଥିବା ନେତ୍ରଦ୍ୱୟରେ ସେ ଦୃଷ୍ଟି ନିବେଶ କଲେ।
Verse 5
आर्त वातात्मजं दृष्टवा क्रोधेनाभिहतं भृशम् । उत्स्मयन्निव दाशार्ह: कैतव्यं प्रत्यभाषत,वायुपुत्र भीमको क्रोधसे अत्यन्त पीड़ित और आहत देख दशार्हकुलभूषण श्रीकृष्णने उलूकसे मुसकराते हुए-से कहा--
ବାୟୁପୁତ୍ର ଭୀମ କ୍ରୋଧରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଆକୁଳ ଓ ଆହତ ହୋଇଥିବାକୁ ଦେଖି, ଦାଶାର୍ହ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ମନେ ହେଲା ହାଲୁକା ସ୍ମିତ ସହ କୈତବ୍ୟ (ଉଲୂକ)କୁ ସମ୍ବୋଧନ କରି କହିଲେ।
Verse 6
प्रयाहि शीघ्र कैतव्य ब्रूयाश्वैव सुयोधनम् । श्रुतं वाक्य गृहीतो<र्थों मतं यत् ते तथास्तु तत्,“जुआरी शकुनिके पुत्र उलूक! तू शीघ्र लौट जा और दुर्योधनसे कह दे--'पाण्डवोंने तुम्हारा संदेश सुना और उसके अर्थको समझकर स्वीकार किया। युद्धके विषयमें जैसा तुम्हारा मत है, वैसा ही हो”
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ହେ ଜୁଆରି! ଶୀଘ୍ର ଫେରିଯାଅ ଏବଂ ସୁୟୋଧନଙ୍କୁ କୁହ—‘ପାଣ୍ଡବମାନେ ତୁମ ସନ୍ଦେଶ ଶୁଣିଛନ୍ତି, ତାହାର ଅର୍ଥ ବୁଝି ଗ୍ରହଣ କରିଛନ୍ତି। ଯୁଦ୍ଧ ବିଷୟରେ ତୁମ ମତ ଯେପରି, ସେପରି ହେଉ।’”
Verse 7
एवमुक््त्वा महाबाहु: केशवो राजसत्तम | पुनरेव महाप्राज्ञ युधिष्ठिरमुदैक्षत,नृपश्रेष्ठै ऐसा कहकर महाबाहु केशवने पुनः परम बुद्धिमान् राजा युधिष्ठिरकी ओर देखा
ଏପରି କହି ମହାବାହୁ କେଶବ ପୁନର୍ବାର ପରମ ପ୍ରାଜ୍ଞ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ପ୍ରତି ଦୃଷ୍ଟି ଦେଲେ।
Verse 8
सृञ्जयानां च सर्वेषां कृष्णस्य च यशस्विन: । द्रुपदस्य सपुत्रस्य विराटस्य च संनिधौ,फिर उलूकने भी समस्त सूंजयवंशी क्षत्रियसमुदाय, यशस्वी श्रीकृष्ण तथा पुत्रोंसहित द्रपद और विराटके समीप सम्पूर्ण राजाओंकी मण्डलीमें शेष बातें कहीं। उसने विषधर सर्पके सदृश कुपित हुए अर्जुनको पुन: अपने वाग्बाणोंसे पीड़ा देते हुए दुर्योधनकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं। साथ ही श्रीकृष्ण आदि अन्य सब लोगोंसे कहनेके लिये भी उसने जो-जो संदेश दिये थे, उन्हें भी उन सबको यथावत्रूपसे सुना दिया
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ସୃଞ୍ଜୟ, ଯଶସ୍ବୀ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ, ପୁତ୍ରସହିତ ଦ୍ରୁପଦ ଓ ବିରାଟଙ୍କ ସନ୍ନିଧିରେ, ରାଜମଣ୍ଡଳୀର ମଧ୍ୟରେ, ଉଲୂକ ଅବଶିଷ୍ଟ କଥା କହିଲା। ଦୁର୍ୟୋଧନ କହିଥିବା ସବୁକଥା ସେ ଯଥାତଥା ପୁନରୁକ୍ତି କରି, ବିଷଧର ସର୍ପ ପରି କ୍ରୁଦ୍ଧ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ତୀକ୍ଷ୍ଣ ବାକ୍ୟବାଣରେ ପୁନଃ ଦଂଶନ କରି ଉତ୍ତେଜିତ କରିବାକୁ ଚେଷ୍ଟା କଲା। ଏବଂ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଆଦି ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ପାଇଁ ଯେଯେ ସନ୍ଦେଶ ଦିଆଯାଇଥିଲା, ସେଗୁଡ଼ିକୁ ମଧ୍ୟ ସେ ଯଥାରୂପେ ଶୁଣାଇଦେଲା।
Verse 9
भूमिपानां च सर्वेषां मध्ये वाक््यं जगाद ह । उलूको>प्यर्जुनं भूयो यथोक्त वाक्यमब्रवीत्,फिर उलूकने भी समस्त सूंजयवंशी क्षत्रियसमुदाय, यशस्वी श्रीकृष्ण तथा पुत्रोंसहित द्रपद और विराटके समीप सम्पूर्ण राजाओंकी मण्डलीमें शेष बातें कहीं। उसने विषधर सर्पके सदृश कुपित हुए अर्जुनको पुन: अपने वाग्बाणोंसे पीड़ा देते हुए दुर्योधनकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं। साथ ही श्रीकृष्ण आदि अन्य सब लोगोंसे कहनेके लिये भी उसने जो-जो संदेश दिये थे, उन्हें भी उन सबको यथावत्रूपसे सुना दिया
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ସେ ଭାଷଣ କଲା। ତା’ପରେ ଉଲୂକ ଅର୍ଜୁନଙ୍କୁ ପୁନଃ, ଯେପରି କହିବାକୁ କୁହାଯାଇଥିଲା ସେପରି ଯଥାତଥା ବାକ୍ୟ କହିଲା।
Verse 10
आशीविषमिव क्रुद्धं तुदन् वाक्यशलाकया । कृष्णादीं श्वैव तान् सर्वान् यथोक्तं वाक्यमब्रवीत्,फिर उलूकने भी समस्त सूंजयवंशी क्षत्रियसमुदाय, यशस्वी श्रीकृष्ण तथा पुत्रोंसहित द्रपद और विराटके समीप सम्पूर्ण राजाओंकी मण्डलीमें शेष बातें कहीं। उसने विषधर सर्पके सदृश कुपित हुए अर्जुनको पुन: अपने वाग्बाणोंसे पीड़ा देते हुए दुर्योधनकी कही हुई सब बातें कह सुनायीं। साथ ही श्रीकृष्ण आदि अन्य सब लोगोंसे कहनेके लिये भी उसने जो-जो संदेश दिये थे, उन्हें भी उन सबको यथावत्रूपसे सुना दिया
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କ୍ରୁଦ୍ଧ ବିଷଧର ସର୍ପ ପରି, ନିଜ ବାକ୍ୟର ତୀକ୍ଷ୍ଣ ଶଲାକାରେ ଚୁଭାଇ, ଉଲୂକ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ ଆଦି ସମସ୍ତଙ୍କୁ ମଧ୍ୟ ଦୁର୍ୟୋଧନର ସନ୍ଦେଶ ଯଥାତଥା କହିଲା।
Verse 11
उलूकस्य तु तद् वाक््यं पापं दारुणमीरितम् | श्र॒ुत्वा विचुक्षुभे पार्थो ललाटं चाप्यमार्जयत्,उलूकके कहे हुए उस पापपूर्ण दारुण वचनको सुनकर कुन्तीपुत्र अर्जुनको बड़ा क्षोभ हुआ। उन्होंने हाथसे ललाटका पसीना पोंछा
ଉଲୂକ କହିଥିବା ସେହି ପାପପୂର୍ଣ୍ଣ ଓ ଦାରୁଣ ବାକ୍ୟ ଶୁଣି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ଅର୍ଜୁନ ଗଭୀର ଭାବେ କ୍ଷୁବ୍ଧ ହେଲେ; ସେ ହାତରେ ଲଲାଟର ଘାମ ପୁଛିଲେ।
Verse 12
तदवस्थं तदा दृष्टवा पार्थ सा समितिर्नप । नामृष्यन्त महाराज पाण्डवानां महारथा:
ହେ ନୃପ! ସେହି ଅବସ୍ଥା ଦେଖି, ହେ ପାର୍ଥ, ସେ ଯୋଧାସଭା ସହି ପାରିଲା ନାହିଁ। ହେ ମହାରାଜ! ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ମହାରଥୀମାନେ ମଧ୍ୟ ତାହା ସହନ କରି ପାରିଲେ ନାହିଁ।
Verse 13
नरेश्वर! अर्जुनको उस अवस्थामें देखकर राजाओंकी वह समिति तथा पाण्डव महारथी सहन न कर सके ।। अधिक्षेपेण कृष्णस्य पार्थस्य च महात्मन: । श्रुत्वा ते पुरुषव्याप्रा: क्रोधाज्जज्वलुरच्युता:,राजन! महात्मा अर्जुन तथा श्रीकृष्णके प्रति आक्षेपपूर्ण वचन सुनकर वे पुरुषसिंह शूरवीर क्रोधसे जल उठे
ରାଜନ! ମହାତ୍ମା ଅର୍ଜୁନ ଓ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କ ପ୍ରତି ଆକ୍ଷେପପୂର୍ଣ୍ଣ ବଚନ ଶୁଣି ସେ ପୁରୁଷସିଂହ ବୀରମାନେ ସହି ପାରିଲେ ନାହିଁ; କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳି ଉଠିଲେ।
Verse 14
धृष्टद्युम्न: शिखण्डी च सात्यकिश्व महारथ: । केकया भ्रातर: पज्च राक्षसक्ष घटोत्कच:,दन्तान् दन्तेषु निष्पिष्य सृक्किणी परिलेलिहन् | धष्टद्युम्न, शिखण्डी, महारथी सात्यकि, पाँच भाई केकयराजकुमार, राक्षस घटोत्कच, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु, राजा धृष्टकेतु, पराक्रमी भीमसेन तथा महारथी नकुल- सहदेव--ये सब-के-सब क्रोधसे लाल आँखें किये अपने आसनोंसे उछलकर खड़े हो गये और अंगद, पारिहार्य (मोतियोंके गुच्छों) तथा केयूरोंसे विभूषित एवं लाल चन्दनसे चर्चित अपनी सुन्दर भुजाओंको थामकर दाँतोंपर दाँत रगड़ते हुए ओठोंके दोनों कोने चाटने लगे
ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ଶିଖଣ୍ଡୀ, ମହାରଥୀ ସାତ୍ୟକି, କେକୟଙ୍କ ପାଞ୍ଚ ଭାଇ ଓ ରାକ୍ଷସ ଘଟୋତ୍କଚ—ଦାନ୍ତ ଉପରେ ଦାନ୍ତ ଚାପି ଘସି, ଓଠର କୋଣ ଚାଟି—କ୍ରୋଧରେ ନିଜ ଆସନରୁ ଉଛଳି ଉଠି ଦଣ୍ଡାୟମାନ ହେଲେ।
Verse 15
द्रौपदेयाभिमन्युश्न धृष्टकेतुश्न पार्थिव: । भीमसेनश्न विक्रान्तो यमजौ च महारथौ
ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପୁତ୍ରମାନେ, ଅଭିମନ୍ୟୁ, ରାଜା ଧୃଷ୍ଟକେତୁ, ପରାକ୍ରମୀ ଭୀମସେନ ଏବଂ ଯମଜ—ନକୁଳ ଓ ସହଦେବ—ଦୁହେଁ ମହାରଥୀ—ସେଠାରେ ଥିଲେ।
Verse 16
उत्पेतुरासनात् सर्वे क्रोधसंरक्तलोचना: । बाहून् प्रगृह्म रुचिरान् रक्तचन्दनरूषितान् । अड्डदैः पारिहार्यश्व केयूरैश् विभूषितान्
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—କ୍ରୋଧରେ ରକ୍ତବର୍ଣ୍ଣ ନୟନ ହୋଇ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଆସନରୁ ଉଛଳି ଉଠିଲେ। ରକ୍ତଚନ୍ଦନ ଲେପିତ ଏବଂ କେୟୂର ଆଦି ରାଜଚିହ୍ନ-ଭୂଷଣରେ ବିଭୂଷିତ ନିଜ ସୁନ୍ଦର ବାହୁ ଉଠାଇଲେ।
Verse 17
तेषामाकारभावज्ञ: कुन्तीपुत्रो वृकोदर:,हस्तं हस्तेन निष्पिष्य उलूकं॑ वाक्यमब्रवीत् | उनकी आकृति और भावको जानकर दुन्तीपुत्र वृकोदर बड़े वेगसे उठे और क्रोधसे जलते हुएके समान सहसा आँखें फाड़-फाड़कर देखते, दाँत कट-कटाते और हाथ-से-हाथ रगड़ते हुए उलूकसे इस प्रकार बोले--
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେମାନଙ୍କ ଆକାର ଓ ଭାବ ଜାଣି କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ବୃକୋଦର (ଭୀମ) ଗୋଟିଏ ହାତକୁ ଅନ୍ୟ ହାତରେ ଚେପି ଉଲୂକଙ୍କୁ କଥା କହିଲେ।
Verse 18
उदतिष्ठत् स वेगेन क्रोधेन प्रज्वलजन्निव । उद्वृत्य सहसा नेत्रे दन्तान् कटकटाय्य च
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ସେ ବେଗରେ ଉଠିଦାଁଡ଼ିଲେ, ଯେନ କ୍ରୋଧରେ ଜ୍ୱଳିଉଠୁଛନ୍ତି। ସହସା ନୟନ ଉଲଟାଇ ବଡ଼ କରି, ଦାନ୍ତ କଟକଟାଇଲେ।
Verse 19
अशक्तानामिवास्माकं प्रोत्साहननिमित्तकम्
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏହା ଆମ ପାଇଁ, ଯେନ ଆମେ ଅଶକ୍ତ, ଉତ୍ସାହ ବଢ଼ାଇବାର ନିମିତ୍ତ ମାତ୍ର।
Verse 20
तन्मे कथयते मन्द शृणु वाक््यं दुरासदम्,“मूर्ख उलूक! अब तू मेरी कही हुई दुःसह बातें सुन और समस्त राजाओंकी मण्डलीमें सूतपुत्र कर्ण और अपने दुरात्मा पिता शकुनिके सामने दुर्योधनको सुना देना --
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ହେ ମନ୍ଦବୁଦ୍ଧି, ମୋର ଏହି ଦୁରାସଦ ବାକ୍ୟ ଶୁଣ। ‘ମୂର୍ଖ ଉଲୂକ! ମୁଁ କହୁଥିବା ଏହି ଦୁଃସହ କଥା ଶୁଣ; ତାପରେ ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ସଭାମଧ୍ୟରେ, ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଏବଂ ତୋର ଦୁରାତ୍ମା ପିତା ଶକୁନିଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ, ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଏହା ଶୁଣାଇଦେ।’”
Verse 21
सर्वक्षत्रस्य मध्ये तं यद् वक्ष्यसि सुयोधनम् । शृण्वत: सूतपुत्रस्य पितुश्च त्वं दुरात्मन:,“मूर्ख उलूक! अब तू मेरी कही हुई दुःसह बातें सुन और समस्त राजाओंकी मण्डलीमें सूतपुत्र कर्ण और अपने दुरात्मा पिता शकुनिके सामने दुर्योधनको सुना देना --
ସୁଯୋଧନଙ୍କୁ ତୁମେ ଯେ କଥା କହିବ, ସେ କଥା ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟମଣ୍ଡଳୀର ମଧ୍ୟରେ ହିଁ କହ—ଯେଉଁଠାରେ ସୂତପୁତ୍ର କର୍ଣ୍ଣ ଶୁଣୁଥିବେ ଏବଂ ତାଙ୍କ ଦୁରାତ୍ମା ପିତା ଶକୁନି ମଧ୍ୟ ଶୁଣୁଥିବେ। ସମସ୍ତଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦୁର୍ଯୋଧନଙ୍କୁ ସେ କଥା ଶୁଣାଇଦିଅ।
Verse 22
अस्माभ्ि: प्रीतिकामैस्तु भ्रातुर्ज्येष्ठस्य नित्यश: । मर्षितं ते दुराचार तत् त्वं न बहु मन््यसे,“दुराचारी दुर्योधन! हमलोगोंने सदा अपने बड़े भाईको प्रसन्न रखनेकी इच्छासे तेरे बहुत-से अत्याचारोंको चुपचाप सह लिया है; परंतु तू इन बातोंको अधिक महत्त्व नहीं दे रहा है
ହେ ଦୁରାଚାରୀ ଦୁର୍ଯୋଧନ! ଜ୍ୟେଷ୍ଠ ଭ୍ରାତାଙ୍କୁ ସଦା ପ୍ରସନ୍ନ ରଖିବା ଇଚ୍ଛାରେ ଆମେ ତୋର ଅନେକ ଅତ୍ୟାଚାର ନିରବେ ସହିଛୁ; କିନ୍ତୁ ତୁ ଏହାକୁ କିଛି ମହତ୍ତ୍ୱ ଦେଉନାହୁଁ।
Verse 23
प्रेषितश्नह्वषीकेश: शमाकाड्क्षी कुरून् प्रति । कुलस्य हितकामेन धर्मराजेन धीमता,“बुद्धिमान् धर्मराजने कौरवकुलके हितकी इच्छासे शान्ति चाहनेवाले भगवान् श्रीकृष्णको कौरवोंके पास भेजा था
କୁରୁକୁଳର ହିତକାମନାରେ, ଶାନ୍ତି ଆକାଙ୍କ୍ଷୀ ବୁଦ୍ଧିମାନ ଧର୍ମରାଜ ହୃଷୀକେଶ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ କୌରବମାନଙ୍କ ପାଖକୁ ଦୂତ ଭାବେ ପଠାଇଥିଲେ।
Verse 24
त्वं कालचोदितो नून॑ गन्तुकामो यमक्षयम् | गच्छस्वाहवमस्माभिस्तच्च श्वो भविता श्रुवम्,'परंतु तू निश्चय ही कालसे प्रेरित हो यमलोकमें जाना चाहता है (इसीलिये संधिकी बात नहीं मान सका)। अच्छा, हमारे साथ युद्धमें चल। कल निश्चय ही युद्ध होगा
ତୁ ନିଶ୍ଚୟ କାଳର ପ୍ରେରଣାରେ ଯମଙ୍କ ଅକ୍ଷୟ ଲୋକକୁ ଯିବାକୁ ଚାହୁଁଛୁ; ସେହିପାଇଁ ସନ୍ଧିର ପଥ ମାନିଲୁ ନାହିଁ। ତେବେ ଆ—ଆମ ସହ ଯୁଦ୍ଧକୁ ଯା। କାଲି ନିଶ୍ଚୟ ଯୁଦ୍ଧ ହେବ।
Verse 25
मयापि च प्रतिज्ञातो वध: सभ्रातृकस्य ते । स तथा भविता पाप नात्र कार्या विचारणा,'पापात्मन! मैंने भी जो तेरे और तेरे भाइयोंके वधकी प्रतिज्ञा की है, वह उसी रूपमें पूर्ण होगी। इस विषयमें तुझे कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
ହେ ପାପାତ୍ମା! ତୋର ଓ ତୋର ଭାଇମାନଙ୍କ ବଧ ବିଷୟରେ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ପ୍ରତିଜ୍ଞା କରିଛି; ସେ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ସେହିପରି ହିଁ ପୂରଣ ହେବ। ଏଥିରେ ବିଚାର କିମ୍ବା ସନ୍ଦେହର ସ୍ଥାନ ନାହିଁ।
Verse 26
वेलामतिक्रमेत् सद्यः सागरो वरुणालय: । पर्वताश्न विशीर्येयुर्मयोक्ते न मृषा भवेत्,“वरुणालय समुद्र शीघ्र ही अपनी सीमाका उल्लंघन कर जाय और पर्वत जीर्ण-शीर्ण होकर बिखर जाय॑ँ, परंतु मेरी कही हुई बात झूठी नहीं हो सकती
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ବରୁଣାଳୟ ସମୁଦ୍ର ଯଦି ତୁରନ୍ତ ନିଜ ତଟସୀମା ଅତିକ୍ରମ କରେ, ଏବଂ ପର୍ବତମାନେ ଭାଙ୍ଗି ଚୁର୍ଣ୍ଣବିଚୁର୍ଣ୍ଣ ହୋଇ ଛିଟିଯାଆନ୍ତୁ, ତଥାପି ମୋ କହିଥିବା କଥା ମିଥ୍ୟା ହେବ ନାହିଁ।
Verse 27
सहायस्ते यदि यम: कुबेरो रुद्र एव वा । यथाप्रतिज्ञं दुर्बुद्धे प्रकरिष्यन्ति पाण्डवा: । दुःशासनस्य रुधिरं पाता चास्मि यथेप्सितम्,'दुर्बद्धे! तेरी सहायताके लिये यमराज, कुबेर अथवा भगवान् रुद्र ही क्यों न आ जायाँ, पाण्डव अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार सब कार्य अवश्य करेंगे। मैं अपनी इच्छाके अनुसार दुःशासनका रक्त अवश्य पीऊँगा
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ହେ ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି! ତୋର ସହାୟତା ପାଇଁ ଯମ, କୁବେର କିମ୍ବା ସ୍ୱୟଂ ରୁଦ୍ର ଆସିଲେ ମଧ୍ୟ, ପାଣ୍ଡବମାନେ ନିଜ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ଅନୁସାରେ ନିଶ୍ଚୟ ସବୁ କାର୍ଯ୍ୟ କରିବେ। ଏବଂ ମୁଁ ଯେପରି ଇଚ୍ଛା କରିଛି, ଦୁଃଶାସନର ରକ୍ତ ଅବଶ୍ୟ ପିବି।
Verse 28
यश्नेह प्रतिसंरब्ध: क्षत्रियो माभियास्यति । अपि भीष्म पुरस्कृत्य तं॑ नेष्यामि यमक्षयम्,“उस समय साक्षात् भीष्मको भी आगे करके जो कोई भी क्षत्रिय क्रोधपूर्वक मेरे ऊपर धावा करेगा, उसे उसी क्षण यमलोक पहुँचा दूँगा
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଏଠାରେ ଯେ କୌଣସି କ୍ଷତ୍ରିୟ କ୍ରୋଧରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇ, ଭୀଷ୍ମଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି ମୋ ଉପରେ ଧାଉ କରିବ, ମୁଁ ତାକୁ ସେଇ କ୍ଷଣେ ଯମଙ୍କ ଅକ୍ଷୟ ଲୋକକୁ ପଠାଇଦେବି।
Verse 29
यच्चैतदुक्त वचन मया क्षत्रस्य संसदि | यथैतद् भविता सत्यं तथैवात्मानमालभे,“मैंने क्षत्रियोंकी सभामें यह बात कही है, जो अवश्य सत्य होगी। यह मैं अपनी सौगन्ध खाकर कहता हूँ
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— କ୍ଷତ୍ରିୟମାନଙ୍କ ସଭାରେ ମୁଁ ଯେ ଵଚନ କହିଛି, ତାହା ଯେପରି ନିଶ୍ଚୟ ସତ୍ୟ ହେବ, ସେପରି ମୁଁ ନିଜ ପ୍ରାଣର ଶପଥ ନେଇ ନିଜକୁ ତାହାରେ ବାନ୍ଧୁଛି।
Verse 30
भीमसेनवच: श्रुत्वा सहदेवो5प्यमर्षण: । क्रोधसंरक्तनयनस्ततो वाक्यमुवाच ह,भीमसेनका वचन सुनकर सहदेवका भी अमर्ष जाग उठा। तब उन्होंने भी क्रोधसे आँखें लाल करके यह बात कही--
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ— ଭୀମସେନଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ସହଦେବଙ୍କ ମନରେ ମଧ୍ୟ ଅମର୍ଷ ଜାଗିଉଠିଲା। ତାପରେ କ୍ରୋଧରେ ରକ୍ତିମ ନୟନ ହୋଇ ସହଦେବ ଏହି କଥା କହିଲେ।
Verse 31
शौटीरशूरसद्शमनीकजनसंसदि । शृणु पाप वचो महां यद्वाच्यो हि पिता त्वया,'“ओ पापी! मैं इन वीर सैनिकोंकी सभामें गर्वीले शूरवीरके योग्य वचन बोल रहा हूँ। तू इसे सुन ले और अपने पिताके पास जाकर सुना दे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ବୀର ଯୋଦ୍ଧାମାନଙ୍କ ଏହି ସଭାରେ ମୁଁ ଗର୍ବିତ ଓ ପରାକ୍ରମୀ ଶୂରଙ୍କୁ ଯୋଗ୍ୟ ଏମିତି ବଚନ କହୁଛି। ହେ ପାପୀ! ଶୁଣ; ତାପରେ ତୋ ପିତାଙ୍କ ପାଖକୁ ଯାଇ ମୋର ଏହି ସନ୍ଦେଶ ତାଙ୍କୁ କହିଦେ।”
Verse 32
नास्माकं भविता भेद: कदाचित् कुरुभि: सह । धृतराष्ट्रस्य सम्बन्धो यदि न स्यात् त्वया सह,“यदि धृतराष्ट्रका तेरे साथ सम्बन्ध न होता, तो कभी कौरवोंके साथ हमलोगोंकी फूट नहीं होती
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରଙ୍କ ସହ ତୋର ଏହି ସମ୍ପର୍କ ନଥାନ୍ତା, ତେବେ କୁରୁମାନଙ୍କ ସହ ଆମର କେବେ—କୌଣସି ସମୟରେ—ଭେଦ ହେଇନଥାନ୍ତା।”
Verse 33
त्वं तु लोकविनाशाय धृतराष्ट्रकुलस्यथ च । उत्पन्नो वैरपुरुष: स्वकुलघ्नश्व पापकृत्,'तू सम्पूर्ण जगत् तथा धृतराष्ट्रकुलके विनाशके लिये पापाचारी मूर्तिमान् वैरपुरुष होकर उत्पन्न हुआ है। तू अपने कुलका भी नाश करनेवाला है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“କିନ୍ତୁ ତୁ ତ ଲୋକବିନାଶ ଓ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରକୁଳବିନାଶ ପାଇଁ ପାପାଚାରୀ, ମୂର୍ତ୍ତିମାନ ବୈରପୁରୁଷ ହୋଇ ଜନ୍ମିଛୁ। ତୁ ନିଜ କୁଳକୁ ମଧ୍ୟ ନାଶ କରିବୁ।”
Verse 34
जन्मप्रभृति चास्माकं पिता ते पापपूरुष: । अहितानि नृशंसानि नित्यश: कर्तुमिच्छति,“उलूक! तेरा पापात्मा पिता जन्मसे ही हम-लोगोंके प्रति प्रतिदिन क्रूरतापूर्ण अहितकर बर्ताव करना चाहता है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ଆମ ଜନ୍ମରୁ ହିଁ ତୋର ପାପାତ୍ମା ପିତା ଆମ ପ୍ରତି ନିତ୍ୟ କ୍ରୂର ଓ ଅହିତକର କାର୍ଯ୍ୟ କରିବାକୁ ଇଚ୍ଛା କରୁଛି।”
Verse 35
तस्य वैरानुषड्रस्य गन्तास्म्यन्तं सुदुर्गमम् । अहमादीौ निहत्य त्वां शकुने: सम्प्रपश्यत:,ततो5स्मि शकुनिं हन्तामिषतां सर्वधन्विनाम् | इसलिये मैं शकुनिके देखते-देखते सबसे पहले तेरा वध करके सम्पूर्ण धनुर्धरोंके सामने शकुनिको भी मार डालूँगा और इस प्रकार अत्यन्त दुर्गम शत्रुतासे पार हो जाऊँगा”
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—“ସେଇ ଗଭୀର ଓ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଦୁର୍ଗମ ବୈରର ଅନ୍ତକୁ ମୁଁ ପହଞ୍ଚିବି। ଶକୁନି ଦେଖୁଥିବାବେଳେ ପ୍ରଥମେ ତୋତେ ବଧ କରିବି; ତାପରେ ସମସ୍ତ ଧନୁର୍ଧରଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଶକୁନିକୁ ମଧ୍ୟ ମାରିଦେବି। ଏଭଳି ଭାବେ ସେଇ ଭୟଙ୍କର ଶତ୍ରୁତାକୁ ମୁଁ ଅତିକ୍ରମ କରିବି।”
Verse 36
भीमस्य वचन श्रुत्वा सहदेवस्य चोभयो:,मन्दा गृहेषु सुखिनो मृत्युपाशवशं गता: । भीमसेन और सहदेव दोनोंके वचन सुनकर अर्जुनने भीमसेनसे मुसकराते हुए कहा --आर्य भीम! जिनका आपके साथ वैर ठन गया है, वे घरमें बैठकर सुखका अनुभव करनेवाले मूर्ख कौरव कालके पाशमें बाँध गये हैं (अर्थात् उनका जीवन नहींके बराबर है)
ଭୀମ ଓ ସହଦେବ—ଉଭୟଙ୍କ ବଚନ ଶୁଣି ଅର୍ଜୁନ ହସି ହସି ଭୀମସେନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଆର୍ୟ ଭୀମ! ଯେ ମୂଢ କୌରବମାନେ ତୁମ ସହ ବୈର ବାନ୍ଧିଛନ୍ତି, ସେମାନେ ଘରେ ବସି ସୁଖ ଭାବିଲେ ମଧ୍ୟ ପ୍ରକୃତରେ ମୃତ୍ୟୁର ପାଶରେ ପଡ଼ିଛନ୍ତି; ସେମାନଙ୍କ ଜୀବନ ପ୍ରାୟ ନଷ୍ଟ।”
Verse 37
उवाच फाल्गुनो वाक््यं भीमसेनं स्मयन्निव | भीमसेन न ते सन्ति येषां वैरं त्वया सह,मन्दा गृहेषु सुखिनो मृत्युपाशवशं गता: । भीमसेन और सहदेव दोनोंके वचन सुनकर अर्जुनने भीमसेनसे मुसकराते हुए कहा --आर्य भीम! जिनका आपके साथ वैर ठन गया है, वे घरमें बैठकर सुखका अनुभव करनेवाले मूर्ख कौरव कालके पाशमें बाँध गये हैं (अर्थात् उनका जीवन नहींके बराबर है)
ଫାଲ୍ଗୁନ (ଅର୍ଜୁନ) ମାନୋ ହଳକା ବ୍ୟଙ୍ଗ୍ୟସ୍ମିତ ସହ ଭୀମସେନଙ୍କୁ କହିଲେ—“ଭୀମସେନ! ଯେମାନେ ତୁମ ସହ ବୈର ବାନ୍ଧିଛନ୍ତି, ସେମାନେ ଆଉ ସତ୍ୟରେ ଜୀବିତ ନୁହେଁ। ଘରେ ବସି ସୁଖ ଭାବିଲେ ମଧ୍ୟ ସେ ମୂଢ କୌରବମାନେ କାଳବନ୍ଧନରେ ମୃତ୍ୟୁପାଶରେ ପଡ଼ିଛନ୍ତି।”
Verse 38
उलूकश्नच न ते वाच्य: परुषं पुरुषोत्तम,दूता: किमपराध्यन्ते यथोक्तस्यानुभाषिण: । “पुरुषोत्तम! आपको इस उलूकसे कोई कठोर बात नहीं कहनी चाहिये। बेचारे दूतोंका क्या अपराध है? वे तो कही हुई बातका अनुवादमात्र करनेवाले हैं”
“ହେ ପୁରୁଷୋତ୍ତମ! ଉଲୂକଙ୍କୁ କଠୋର କଥା କହିବା ଉଚିତ୍ ନୁହେଁ। ଦୂତମାନଙ୍କର କ’ଣ ଅପରାଧ? ସେମାନେ ଯେପରି କୁହାଯାଇଛି ସେପରି ମାତ୍ର ପୁନରୁକ୍ତି କରନ୍ତି।”
Verse 39
एवमुक्त्वा महाबाहुर्भीमं भीमपराक्रमम्,धृष्टद्युम्ममुखान् वीरान् सुह्दद: समभाषत । भयंकर पराक्रमी भीमसेनसे ऐसा कहकर महाबाहु अर्जुनने धृष्टद्युम्न आदि वीर सुहृदोंसे कहा--
ଏପରି କହି ମହାବାହୁ ଅର୍ଜୁନ ଭୟଙ୍କର ପରାକ୍ରମୀ ଭୀମଙ୍କ ସହ କଥା ସମାପ୍ତ କରି, ପରେ ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ ଆଦି ନିଜ ସୁହୃଦ ବୀରମାନଙ୍କୁ ସମ୍ବୋଧନ କଲେ।
Verse 40
श्रुतं वस्तस्पापस्य धार्तराष्ट्स्य भाषितम्,“बन्धुओ! आपलोगोंने उस पापी दुर्योधनकी बात सुनी है न? इसमें उसके द्वारा विशेषत: मेरी और भगवान् श्रीकृष्णकी निन््दा की गयी है। आपलोग हमारे हितकी कामना रखते हैं, इसलिये इस निन्दाको सुनकर कुपित हो उठे हैं
“ବନ୍ଧୁମାନେ! ସେଇ ପାପୀ ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ରପୁତ୍ର କହିଥିବା କଥା ତୁମେ ଶୁଣିଛ। ତାହାରେ ସେ ବିଶେଷତଃ ମୋତେ ଓ ଭଗବାନ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ନିନ୍ଦା କରିଛି। ତୁମେ ଆମ ହିତକାମୀ; ତେଣୁ ଏହି ଅପବାଦ ଶୁଣି ତୁମର କ୍ରୋଧ ଉଠିଛି।”
Verse 41
कुत्सनं वासुदेवस्यथ मम चैव विशेषत: । श्रुत्वा भवन्त: संरब्धा अस्माकं हितकाम्यया,“बन्धुओ! आपलोगोंने उस पापी दुर्योधनकी बात सुनी है न? इसमें उसके द्वारा विशेषत: मेरी और भगवान् श्रीकृष्णकी निन््दा की गयी है। आपलोग हमारे हितकी कामना रखते हैं, इसलिये इस निन्दाको सुनकर कुपित हो उठे हैं
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ବାସୁଦେବଙ୍କର ଏବଂ ବିଶେଷତଃ ମୋର ନିନ୍ଦା ଶୁଣି, ଆମ ହିତକାମନାରୁ ଆପଣମାନେ କ୍ରୋଧରେ ଉଦ୍ଦୀପ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି। ସେହି ପାପୀ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନର ବଚନ ଆପଣମାନେ ଶୁଣିଛନ୍ତି, ଯେଉଁଥିରେ ସେ ଭଗବାନ୍ ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣଙ୍କୁ ଓ ମୋତେ ଅବମାନ କରିଛି।
Verse 42
प्रभावाद् वासुदेवस्य भवतां च प्रयत्नत: । समग्रं पार्थिवं क्षत्र॑ं सर्व न गणयाम्यहम्,“परंतु भगवान् वासुदेवके प्रभाव और आपलोगोंके प्रयत्नसे मैं इस समस्त भूमण्डलके सम्पूर्ण क्षत्रियोंको भी कुछ नहीं गिनता हूँ
କିନ୍ତୁ ବାସୁଦେବଙ୍କ ପ୍ରଭାବ ଓ ଆପଣମାନଙ୍କ ପ୍ରୟାସରେ ମୁଁ ଏହି ସମଗ୍ର ଭୂମଣ୍ଡଳର ସମସ୍ତ କ୍ଷତ୍ରିୟ-ରାଜସମୂହକୁ ମଧ୍ୟ କିଛି ମନେ କରେନି।
Verse 43
भवद्धिः समनुज्ञातो वाक्यमस्य यदुत्तरम् । उलूके प्रापयिष्यामि यद् वक्ष्यति सुयोधनम्,“यदि आपलोगोंकी आज्ञा हो तो मैं इस बातका उत्तर उलूकको दे दूँ, जिसे यह दुर्योधनको सुना देगा
ଆପଣମାନଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ଥିଲେ, ତାହାର ବଚନର ଯେ ଉତ୍ତର, ସେହିଟି ମୁଁ ଉଲୂକଙ୍କୁ ପହଞ୍ଚାଇଦେବି; ସେ ତାହା ସୁଯୋଧନ (ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ)ଙ୍କୁ କହିଦେବ।
Verse 44
श्वोभूते कत्थितस्यास्य प्रतिवाक्यं चमूमुखे । गाण्डीवेनाभिधास्यामि क्लीबा हि वचनोत्तरा:,“अथवा आपकी सम्मति हो, तो कल खबेरे सेनाके मुहानेपर उसकी इन शेखीभरी बातोंका ठीक-ठीक उत्तर गाण्डीव धनुषद्वारा दे दूँगा; क्योंकि केवल बातोंमें उत्तर देनेवाले तो नपुंसक होते हैं!
ଅଥବା ଆପଣମାନଙ୍କ ସମ୍ମତି ଥିଲେ, କାଲି ପ୍ରଭାତେ ସେନାମୁଖରେ ତାହାର ଏହି ଗର୍ବୋକ୍ତିର ଯଥାର୍ଥ ପ୍ରତିଉତ୍ତର ମୁଁ ଗାଣ୍ଡୀବ ଧନୁଷ ଦ୍ୱାରା ଦେବି; କାରଣ କେବଳ କଥାରେ ଉତ୍ତର ଦେବା ଲୋକ କ୍ଲୀବ।
Verse 45
ततस्ते पार्थिवा: सर्वे प्रशशंसुर्धनंजयम् | तेन वाक्योपचारेण विस्मिता राजसत्तमा:,अर्जुनकी इस प्रवचन-शैलीसे सभी श्रेष्ठ भूपाल आश्वर्यचकित हो उठे और वे सब-के- सब उनकी भूरि-भूरि प्रशंसा करने लगे
ତାପରେ ସେ ସମସ୍ତ ପାର୍ଥିବ ଧନଞ୍ଜୟଙ୍କୁ ପ୍ରଶଂସା କଲେ। ତାଙ୍କର ବାକ୍ୟ-ଉପଚାରରେ ବିସ୍ମିତ ହୋଇ ରାଜସତ୍ତମମାନେ ପୁନଃପୁନଃ ଗୁଣଗାନ କରିଲେ।
Verse 46
अनुनीय च तान् सर्वान् यथामान्यं यथावय: । धर्मराजस्तदा वाक्य तत्प्राप्यं प्रत्यभाषत,तदनन्तर धर्मराजने उन समस्त राजाओंको उनकी अवस्था और प्रतिष्ठाके अनुसार अनुनय-विनय करके शान्त किया और दुर्योधनको देनेयोग्य जो संदेश था, उसे इस प्रकार कहा--
ଧର୍ମରାଜ ସେହି ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କୁ ତାଙ୍କର ବୟସ ଓ ପଦମର୍ଯ୍ୟାଦା ଅନୁସାରେ ଯଥୋଚିତ ସମ୍ମାନ ଦେଇ ବିନୟପୂର୍ବକ ଶାନ୍ତ କଲେ; ତାପରେ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ପହଞ୍ଚାଇବା ଯୋଗ୍ୟ ସନ୍ଦେଶକୁ ପରିସ୍ଥିତିଅନୁକୂଳ ଭାବେ ଏଭଳି କହିଲେ।
Verse 47
आत्मानमवमन्वानो न हि स्यात् पार्थिवोत्तम: । तत्रोत्तरं प्रवक्ष्यामि तव शुश्रूषणे रत:,“उलूक! कोई भी श्रेष्ठ राजा शान्त रहकर अपनी अवज्ञा सहन नहीं कर सकता। मैंने तुम्हारी बात ध्यान देकर सुनी है। अब मैं तुम्हें उत्तर देता हूँ, उसे सुनो”
“ହେ ଉଲୂକ! ଯେ ରାଜା ସତ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ, ସେ ପ୍ରକାଶ୍ୟ ଅପମାନ ସହି ନିରବ ରହିପାରେ ନାହିଁ। ତୁମ କଥା ମୁଁ ଧ୍ୟାନଦେଇ ଶୁଣିଛି; ଏବେ ମୁଁ ଉତ୍ତର କହୁଛି—ଶୁଣ।”
Verse 48
उलूकं॑ भरतश्रेष्ठ सामपूर्वमथोर्जितम् । दुर्योधनस्य तद् वाक््यं निशम्य भरतर्षभ:,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार युधिष्ठिरने उलूकसे पहले मधुर वचन बोलकर फिर ओजस्वी शब्दोंमें उत्तर दिया। (उलूकके मुखसे) पहले दुर्योधनके पूर्वोक्त संदेशको सुनकर भरतकुलभूषण युधिष्छिर रोषसे अत्यन्त लाल हुए नेत्रोंद्वारा देखते हुए विषधर सर्पके समान उच्छवास लेने लगे। फिर ओठोंके दोनों कोनोंको चाटते हुए वे श्रीकृष्ण तथा भाइयोंकी ओर देखकर बोलनेको प्रस्तुत हुए। वे अपनी विशाल भुजा ऊपर उठा धूर्त जुआरी शकुनिके पुत्र उलूकसे मुसकराते हुए-से बोले---
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ! ଉଲୂକଙ୍କୁ ପ୍ରଥମେ ସାମମୟ ମଧୁର ବଚନରେ ସମ୍ବୋଧନ କରି, ପରେ ଓଜସ୍ବୀ ବାଣୀରେ—ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କ ସେହି ସନ୍ଦେଶ ଶୁଣି—ଭରତବଂଶର ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଯୁଧିଷ୍ଠିର ଅନ୍ତରେ ଦହିଉଠିଲେ।
Verse 49
अतिलोहिलतनेत्राभ्यामाशीविष इव श्वसन् | स्मयमान इव क्रोधात् सक्किणी परिसंलिहन्,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार युधिष्ठिरने उलूकसे पहले मधुर वचन बोलकर फिर ओजस्वी शब्दोंमें उत्तर दिया। (उलूकके मुखसे) पहले दुर्योधनके पूर्वोक्त संदेशको सुनकर भरतकुलभूषण युधिष्छिर रोषसे अत्यन्त लाल हुए नेत्रोंद्वारा देखते हुए विषधर सर्पके समान उच्छवास लेने लगे। फिर ओठोंके दोनों कोनोंको चाटते हुए वे श्रीकृष्ण तथा भाइयोंकी ओर देखकर बोलनेको प्रस्तुत हुए। वे अपनी विशाल भुजा ऊपर उठा धूर्त जुआरी शकुनिके पुत्र उलूकसे मुसकराते हुए-से बोले---
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ ଜନମେଜୟ! କ୍ରୋଧରେ ତାଙ୍କ ଚକ୍ଷୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଲାଲ ହୋଇଉଠିଲା; ବିଷଧର ସର୍ପ ପରି ଫୁସଫୁସ କରି ଶ୍ୱାସ ନେଲେ। ଅନ୍ତରେ କ୍ରୋଧ ଜ୍ୱଳିଥିଲେ ମଧ୍ୟ, ଯେନ ହସୁଥିବା ପରି, ଓଠର କୋଣ ଚାଟି, ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଉଦ୍ୟତ ହେଲେ।
Verse 50
जनार्दनमभिप्रेक्ष्य भ्रातृश्वैवेदमब्रवीत् । अभ्यभाषत कैततव्यं प्रगृह्य विपुलं भुजम्,भरतश्रेष्ठ जनमेजय! इस प्रकार युधिष्ठिरने उलूकसे पहले मधुर वचन बोलकर फिर ओजस्वी शब्दोंमें उत्तर दिया। (उलूकके मुखसे) पहले दुर्योधनके पूर्वोक्त संदेशको सुनकर भरतकुलभूषण युधिष्छिर रोषसे अत्यन्त लाल हुए नेत्रोंद्वारा देखते हुए विषधर सर्पके समान उच्छवास लेने लगे। फिर ओठोंके दोनों कोनोंको चाटते हुए वे श्रीकृष्ण तथा भाइयोंकी ओर देखकर बोलनेको प्रस्तुत हुए। वे अपनी विशाल भुजा ऊपर उठा धूर्त जुआरी शकुनिके पुत्र उलूकसे मुसकराते हुए-से बोले---
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଜନାର୍ଦ୍ଦନ (ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ)ଙ୍କୁ ଏବଂ ପରେ ନିଜ ଭାଇମାନଙ୍କୁ ଦେଖି ସେ ଏହି କଥା କହିଲେ; ବିଶାଳ ଭୁଜ ଉଠାଇ, ଯାହା କହିବା କର୍ତ୍ତବ୍ୟ ଥିଲା ତାହା ଉଚ୍ଚାରଣ କରି, ସେ ଉତ୍ତର ଦେବାକୁ ଆରମ୍ଭ କଲେ।
Verse 51
उलूक गच्छ कैतव्य ब्रूहि तात सुयोधनम् । कृतघ्नं वैरपुरुषं दुर्मतिं कुलपांसनम्,“जुआरी शकुनिके पुत्र तात उलूक! तुम जाओ और वैरके मूर्तिमान् स्वरूप उस कृतघ्न, दुर्बुद्धि एवं कुलांगार दुर्योधनसे इस प्रकार कह दो--
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ କପଟୀ ଉଲୂକ! ଯାଅ, ପୁତ୍ର, ଏବଂ ସୁଯୋଧନଙ୍କୁ କହ—ସେଇ କୃତଘ୍ନ, ବୈରର ମୂର୍ତ୍ତିମାନ ରୂପ, ଦୁର୍ବୁଦ୍ଧି ଓ କୁଳକଳଙ୍କ ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନଙ୍କୁ ଏହି ସନ୍ଦେଶ ଜଣାଇଦେ।
Verse 52
पाण्डवेषु सदा पाप नित्यं जिद्ठां प्रवर्तसे । स्ववीर्याद् यः पराक्रम्य पाप आह्वयते परान् । अभीत: पूरयन् वाक्यमेष वै क्षत्रिय: पुमान्,“पापी दुर्योधन! तू पाण्डवोंके साथ सदा कुटिल बर्ताव करता आ रहा है। पापात्मन्! जो किसीसे भयभीत न होकर अपने वचनोंका पालन करता है और अपने ही बाहुबलसे पराक्रम प्रकट करके शत्रुओंको युद्धके लिये बुलाता है, वही पुरुष क्षत्रिय है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ ପାପୀ! ତୁମେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତି ସଦା କୁଟିଳ ଆଚରଣ କରିଆସୁଛ। ହେ ଦୁଷ୍ଟ! ଯେ ନିର୍ଭୟ ହୋଇ ନିଜ ପ୍ରତିଜ୍ଞା ପାଳନ କରେ, ଏବଂ ନିଜ ବାହୁବଳରେ ପରାକ୍ରମ ଦେଖାଇ ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଖୋଲା ଆହ୍ୱାନ କରେ—ସେଇ ପୁରୁଷ ହିଁ ସତ୍ୟ କ୍ଷତ୍ରିୟ।
Verse 53
स पाप: क्षत्रियो भूत्वा अस्मानाहूय संयुगे । मान्यामान्यान् पुरस्कृत्य युद्ध मा गा: कुलाधम,“कुलाधम! तू पापी है! देख, क्षत्रिय होकर और हमलोगोंको युद्धके लिये बुलाकर ऐसे लोगोंको आगे करके रणभूमिमें न आना, जो हमारे माननीय वृद्ध गुरुजन और स्नेहास्पद बालक हों
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ କୁଳାଧମ! ତୁମେ ପାପୀ; କ୍ଷତ୍ରିୟ ହୋଇ ମଧ୍ୟ ଆମକୁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଡାକିଛ। କିନ୍ତୁ ରଣଭୂମିକୁ ଆସିବାବେଳେ ଆମ ପୂଜ୍ୟ ବୃଦ୍ଧ ଗୁରୁଜନ ଓ ସ୍ନେହାସ୍ପଦ ଶିଶୁମାନଙ୍କୁ ଆଗରେ ରଖି ଆସିବା ନୁହେଁ—ଏହା ପାପ ଓ ନୀଚତା।
Verse 54
आत्मवीर्य समाश्रित्य भृत्यवीर्य च कौरव । आह्वयस्व रणे पार्थान् सर्वथा क्षत्रियो भव,“कुरुनन्दन! तू अपने तथा भरणीय सेवकवर्गके बल और पराक्रमका आश्रय लेकर ही कुन्तीके पुत्रोंका युद्धके लिये आह्वान कर। सब प्रकारसे क्षत्रियत्वका परिचय दे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ହେ କୌରବ! ନିଜ ବୀର୍ୟ ଓ ନିଜ ଆଶ୍ରିତ ଭୃତ୍ୟମାନଙ୍କ ବୀର୍ୟକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ରଣରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ରମାନଙ୍କୁ ଆହ୍ୱାନ କର। ସମସ୍ତ ପ୍ରକାରେ କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମ ପାଳନ କର।
Verse 55
परवीर्य समाश्रित्य यः समाह्दयते परान् | अशक्त: स्वयमादातुमेतदेव नपुंसकम्,“जो स्वयं सामना करनेमें असमर्थ होनेके कारण दूसरोंके पराक्रमका भरोसा करके शत्रुओंको युद्धके लिये ललकारता है, उसका यह कार्य उसकी नपुंसकताका ही सूचक है
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଯେ ନିଜେ ସମ୍ମୁଖୀନ ହେବାକୁ ଅଶକ୍ତ ହୋଇ ଅନ୍ୟମାନଙ୍କ ପରାକ୍ରମକୁ ଆଶ୍ରୟ କରି ଶତ୍ରୁଙ୍କୁ ଯୁଦ୍ଧ ପାଇଁ ଲଲକାରେ, ସେଇ କାର୍ଯ୍ୟ ହିଁ ତାହାର ପୌରୁଷହୀନତା ଓ କାୟରତାର ଚିହ୍ନ।
Verse 56
स त्वं परेषां वीर्येण आत्मानं बहु मन्यसे । कथमेवमशक्तस्त्वमस्मान् समभिगर्जसि,'तू तो दूसरोंके ही बलसे अपने-आपको बहुत अधिक शक्तिशाली मानता है; परंतु ऐसा असमर्थ होकर तू हमारे सामने गर्जना कैसे कर रहा है?”
ପରଙ୍କ ବୀର୍ୟ୍ୟରେ ଭରସା କରି ତୁ ନିଜକୁ ଅତ୍ୟନ୍ତ ପ୍ରବଳ ଭାବୁଛୁ; କିନ୍ତୁ ନିଜେ ଅଶକ୍ତ ହୋଇ ଆମ ସମ୍ମୁଖରେ ଏଭଳି ଗର୍ଜନ କେମିତି କରୁଛୁ?
Verse 57
श्रीकृष्ण उवाच मद्धचश्नापि भूयस्ते वक्तव्य: स सुयोधन: । श्व॒ इदानीं प्रपद्येथा: पुरुषो भव दुर्मते,तत्पश्चात् भगवान् श्रीकृष्णने कहा--उलूक! इसके बाद तू दुर्योधनसे मेरी यह बात भी कह देना--*दुर्मते! अब कल ही तू रणभूमिमें आ जा और अपने पुरुषत्वका परिचय दे
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—“ଉଲୂକ! ମୋର ଏହି କଥାଟି ମଧ୍ୟ ପୁଣି ସେ ସୁୟୋଧନଙ୍କୁ କହିଦେ—‘ଦୁର୍ମତେ! କାଲିହିଁ ରଣଭୂମିକୁ ଆ; ପୁରୁଷ ହୋଇ ପୁରୁଷତ୍ୱ ଦେଖା।’”
Verse 58
मन्यसे यच्च मूढ त्वं न योत्स्यति जनार्दन: । सारथ्येन वृतः पार्थरिति त्वं न बिभेषि च,'मूढ़! तू जो यह समझता है कि दुन्तीके पुत्रोंने श्रीकृष्णसे सारथि बननेका अनुरोध किया है, अतः वे युद्ध नहीं करेंगे। सम्भवत: इसीलिये तू मुझसे डर नहीं रहा है
ମୂଢ! ତୁ ଭାବୁଛୁ—ପୃଥାପୁତ୍ରମାନେ ଜନାର୍ଦ୍ଦନଙ୍କୁ କେବଳ ସାରଥି ଭାବେ ବରିଛନ୍ତି, ତେଣୁ ସେ ଯୁଦ୍ଧ କରିବେ ନାହିଁ; ଏହି ଭାବନାରୁ ତୁ ମୋତେ ଭୟ କରୁନାହୁଁ।
Verse 59
जघन्यकालमप्येतन्न भवेत् सर्वपार्थिवान् | निर्दहेयमहं क्रोधात् तृणानीव हुताशन:
ଏହା ସମସ୍ତ ରାଜାଙ୍କ ପାଇଁ ମଧ୍ୟ ସବୁଠାରୁ ଜଘନ୍ୟ କାଳ ହେବ ନାହିଁ; କାରଣ କ୍ରୋଧ ଯଦି ମୋତେ ଆବରଣ କରେ, ତେବେ ଅଗ୍ନି ଯେପରି ଶୁଖିଲା ତୃଣକୁ ଦହେ, ସେପରି ମୁଁ ସେମାନଙ୍କୁ ଦହିଦେଇପାରିବି।
Verse 60
'परंतु याद रख, मैं चाहूँ, तो इन सम्पूर्ण नरेशोंको अपनी क्रोधाग्निसे उसी प्रकार भस्म कर सकता हूँ, जैसे आग घास-फूसको जला डालती है। किंतु युद्धके अन्ततक मुझे ऐसा करनेका अवसर न मिले; यही मेरी इच्छा है ।। युधिष्ठिरनियोगात् तु फाल्गुनस्य महात्मन: । करिष्ये युध्यमानस्य सारथ्यं विजितात्मन:,'राजा युधिष्ठिरके अनुरोधसे मैं जितेन्द्रिय महात्मा अर्जुनके युद्ध करते समय उनके सारथिका काम अवश्य करूँगा
କିନ୍ତୁ ମନେ ରଖ—ମୁଁ ଚାହିଲେ ମୋର କ୍ରୋଧାଗ୍ନିରେ ଏହି ସମସ୍ତ ନରେଶଙ୍କୁ ଅଗ୍ନି ଯେପରି ଘାସ-ଫୁସକୁ ଜଳାଇଦିଏ, ସେପରି ଭସ୍ମ କରିପାରିବି; ତଥାପି ଯୁଦ୍ଧର ଶେଷ ପର୍ଯ୍ୟନ୍ତ ମୋତେ ଏପରି କରିବାର ସୁଯୋଗ ନ ଆସୁ—ଏହି ମୋର ଇଚ୍ଛା। ଏବଂ ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିରଙ୍କ ଅନୁରୋଧରେ, ଜିତେନ୍ଦ୍ରିୟ ମହାତ୍ମା ଅର୍ଜୁନ (ଫାଲ୍ଗୁନ) ଯୁଦ୍ଧ କରୁଥିବାବେଳେ ମୁଁ ନିଶ୍ଚୟ ତାଙ୍କର ସାରଥି ହେବି।
Verse 61
यद्युत्पतसि लोकांस्त्रीन् यद्याविशसि भूतलम् | तत्र तत्रार्जुनरथं प्रभाते द्रक्ष्यसे पुन:,“अब तू यदि तीनों लोकोंसे ऊपर उड़ जाय अथवा धरतीमें समा जाय, तो भी (तू जहाँ- जहाँ जायगा), वहाँ-वहाँ कल प्रातः:काल अर्जुनका रथ पहुँचा हुआ देखेगा
ଶ୍ରୀକୃଷ୍ଣ କହିଲେ—“ତୁମେ ଯଦି ତିନି ଲୋକର ଉପରକୁ ଉଡ଼ିଯାଅ, କିମ୍ବା ପୃଥିବୀ ଭିତରେ ଲୀନ ହୋଇଯାଅ, ତଥାପି ତୁମେ ଯେଉଁଯେଉଁଠାକୁ ଯିବ, ସେଉଁସେଉଁଠାରେ କାଲି ପ୍ରଭାତେ ଅର୍ଜୁନଙ୍କ ରଥକୁ ପୁଣି—ପହଞ୍ଚିଥିବା ଅବସ୍ଥାରେ—ଦେଖିବ।”
Verse 62
यच्चापि भीमसेनस्य मन्यसे मोघभाषितम् । दुःशासनस्य रुधिरं पीतमद्यावधारय,“इसके सिवा, तू जो भीमसेनकी कही हुई बातोंको व्यर्थ मानने लगा है, यह ठीक नहीं है। तू आज ही निश्चितरूपसे समझ ले कि भीमसेनने दुःशासनका रक्त पी लिया
ଏବଂ ତୁମେ ଭୀମସେନଙ୍କ କଥାକୁ ମିଥ୍ୟା ଗର୍ବୋକ୍ତି ଭାବୁଛ—ଏହା ଠିକ୍ ନୁହେଁ। ଆଜି ନିଶ୍ଚିତ ଭାବେ ଜାଣି ରଖ—ଭୀମ ଦୁଃଶାସନଙ୍କ ରକ୍ତ ପିଇଛି।
Verse 63
न त्वां समीक्षते पार्थो नापि राजा युधिष्ठिर: । न भीमसेनो न यमौ प्रतिकूलप्रभाषिणम्,'तू पाण्डवोंके विपरीत कठुभाषण करता जा रहा है, परंतु अर्जुन, राजा युधिष्ठिर, भीमसेन तथा नकुल-सहदेव तुझे कुछ भी नहीं समझते हैं”
ତୁମେ ପାଣ୍ଡବମାନଙ୍କ ପ୍ରତିକୂଳରେ କଠୋର କଥା କହିଚାଲିଛ; କିନ୍ତୁ ପାର୍ଥ ଅର୍ଜୁନ, ରାଜା ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଭୀମସେନ ଓ ଯମଜ ନକୁଳ-ସହଦେବ—କେହି ମଧ୍ୟ ତୁମକୁ ଗୁରୁତ୍ୱ ଦେଉନାହାନ୍ତି।
Verse 161
इस प्रकार श्रीमह्ाभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत उलूकदूतागमनपर्वमें उलूकवाक्यविषयक एक सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବ ଅନ୍ତର୍ଗତ ଉଲୂକଦୂତାଗମନପର୍ବରେ ଉଲୂକବାକ୍ୟବିଷୟକ ଏକଶତ ଏକଷଷ୍ଟିତମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା।
Verse 162
इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि उलूकदूताभिगमनपर्वणि कृष्णादिवाक्ये द्विषष्टयधिकशततमो< ध्याय:
ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ଉଦ୍ୟୋଗପର୍ବରେ ଉଲୂକଦୂତାଭିଗମନପର୍ବରେ କୃଷ୍ଣାଦିବାକ୍ୟବିଷୟକ ଦ୍ୱିଷଷ୍ଟ୍ୟଧିକଶତତମ (ଏକଶତ ଦ୍ୱିଷଷ୍ଟିତମ) ଅଧ୍ୟାୟ।
Verse 166
दन्तान् दन्तेषु निष्पिष्य सृक्किणी परिलेलिहन् | धष्टद्युम्न, शिखण्डी, महारथी सात्यकि, पाँच भाई केकयराजकुमार, राक्षस घटोत्कच, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, अभिमन्यु, राजा धृष्टकेतु, पराक्रमी भीमसेन तथा महारथी नकुल- सहदेव--ये सब-के-सब क्रोधसे लाल आँखें किये अपने आसनोंसे उछलकर खड़े हो गये और अंगद, पारिहार्य (मोतियोंके गुच्छों) तथा केयूरोंसे विभूषित एवं लाल चन्दनसे चर्चित अपनी सुन्दर भुजाओंको थामकर दाँतोंपर दाँत रगड़ते हुए ओठोंके दोनों कोने चाटने लगे
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଦାନ୍ତକୁ ଦାନ୍ତରେ ଚାପି ଘଷି, ଓଠର ଦୁଇ କୋଣକୁ ଜିଭରେ ଚାଟୁଥିବା ଧୃଷ୍ଟଦ୍ୟୁମ୍ନ, ଶିଖଣ୍ଡୀ, ମହାରଥୀ ସାତ୍ୟକି, କୈକେୟରାଜଙ୍କ ପାଞ୍ଚ ରାଜକୁମାର, ରାକ୍ଷସ ଘଟୋତ୍କଚ, ଦ୍ରୌପଦୀଙ୍କ ପାଞ୍ଚ ପୁତ୍ର, ଅଭିମନ୍ୟୁ, ରାଜା ଧୃଷ୍ଟକେତୁ, ପରାକ୍ରମୀ ଭୀମସେନ ଏବଂ ମହାରଥୀ ନକୁଳ–ସହଦେବ—ଏ ସମସ୍ତେ କ୍ରୋଧରେ ରକ୍ତବର୍ଣ୍ଣ ଚକ୍ଷୁ କରି ନିଜ ନିଜ ଆସନରୁ ହଠାତ୍ ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଗଲେ। ଅଙ୍ଗଦ, ମୁକ୍ତାହାର-ଗୁଚ୍ଛ ଓ କେୟୂରରେ ଭୂଷିତ, ଲାଲ ଚନ୍ଦନଲେପିତ ସୁନ୍ଦର ଭୁଜାକୁ ଦୃଢ଼ ଧରି ସେମାନେ ଦାନ୍ତ ଘଷୁଥିଲେ, ଓଠକୋଣ ଚାଟୁଥିଲେ—ଅନ୍ତରର ଧର୍ମକ୍ଷୋଭ ଓ ଯୁଦ୍ଧବାତ୍ୟାର ବାହ୍ୟ ଚିହ୍ନ ଯେପରି।
Verse 186
हस्तं हस्तेन निष्पिष्य उलूकं॑ वाक्यमब्रवीत् | उनकी आकृति और भावको जानकर दुन्तीपुत्र वृकोदर बड़े वेगसे उठे और क्रोधसे जलते हुएके समान सहसा आँखें फाड़-फाड़कर देखते, दाँत कट-कटाते और हाथ-से-हाथ रगड़ते हुए उलूकसे इस प्रकार बोले--
ସଞ୍ଜୟ କହିଲେ—ଏକ ହାତକୁ ଅନ୍ୟ ହାତରେ ଚାପି ଘଷୁଥିବା, ସଂଯମିତ କ୍ରୋଧରେ କୁନ୍ତୀପୁତ୍ର ବୃକୋଦର ଭୀମ ହଠାତ୍ ମହାବେଗରେ ଉଠି ଦାଁଡ଼ାଇଲେ। ଉଲୂକର ଆକୃତି ଓ ଭାବ ଜାଣି, କ୍ରୋଧାଗ୍ନିରେ ଜ୍ୱଳିତ ମନୁଷ୍ୟ ପରି ଚକ୍ଷୁ ବିସ୍ତାର କରି ଦେଖିଲେ, ଦାନ୍ତ କଟକଟାଇଲେ, ହାତ ଘଷି ଘଷି, କ୍ଷତ୍ରିୟଧର୍ମାନୁସାରେ ଉଲୂକକୁ ଏହିପରି କହିଲେ।
Verse 193
श्रुतं ते वचन मूर्ख यत् त्वां दुर्योधनो<ब्रवीत् | 'ओ मूर्ख! दुर्योधनने तुझसे जो कुछ कहा है, वह तेरा वचन हमने सुन लिया। मानो हम असमर्थ हों और तू हमें प्रोत्साहन देनेके निमित्त यह सब कुछ कह रहा हो
ଭୀମ କହିଲେ—ହେ ମୂର୍ଖ! ଦୁର୍ଯ୍ୟୋଧନ ତୋତେ ଯାହା କହିଛି, ସେଇ କଥାକୁ ତୁମ ମୁଖରୁ ଆମେ ଶୁଣିଲୁ; ତୋର ବଚନ ଆମେ ଶୁଣିସାରିଲୁ। ତୁ ଏମିତି କହୁଛୁ ଯେପରି ଆମେ ଅସମର୍ଥ, ଏବଂ ଯେପରି ଆମକୁ ଉତ୍ତେଜିତ କରିବା ପାଇଁ ମାତ୍ର ଏସବୁ କହୁଛୁ।
How to translate political resolve into organized readiness: the chapter shows the need to allocate elite combat capacity across multiple threat-nodes while maintaining coherent command under Dhṛṣṭadyumna.
Effective leadership in crisis prioritizes clarity of roles, proportional deployment (matching capability to opposition), and disciplined formation—reducing chaos by making accountability explicit.
No explicit phalaśruti appears in this chapter; its meta-significance lies in documenting procedural war-readiness as an ethical-structural bridge between failed diplomacy and imminent battle.