
वारुणी सभा — Varuṇa’s Divine Assembly (Nārada’s Description)
Upa-parva: Sabhā-vibhāga (Divine Assembly Halls: Varuṇa-sabhā and transition to Kubera-sabhā)
Nārada narrates to Yudhiṣṭhira the features of Varuṇa’s radiant white assembly hall, constructed by Viśvakarman and situated amid inner waters. The hall is portrayed as climatically balanced and sensorially pleasant, ornamented with gem-like trees bearing flowers and fruits, and populated by multicolored botanical forms and innumerable birds with gentle, indistinct calls. Varuṇa is described as seated with Vāruṇī, adorned with divine garments and ornaments, receiving veneration from Ādityas. A detailed roll of Nāgas follows (including Vāsuki, Takṣaka, Airāvata, and others), characterized by banners, coils, and hoods, attending without fatigue. Daityas and Dānavas are also listed as present—garlanded, crowned, and richly accoutred—depicted as recipients of boons and steadfast in observance within Varuṇa’s order. The chapter expands the court’s constituency to the four oceans, major rivers (e.g., Bhāgīrathī, Kāliṇdī, Narmadā, Sindhu), waterscapes (wells, ponds, lakes), directions, earth, mountains, aquatic beings, and the musical praise of Gandharvas and Apsarases. The unit concludes with Nārada stating he has seen this Vāruṇī sabhā and inviting Yudhiṣṭhira to hear next of Kubera’s hall, marking a transition in the divine-sabhā catalog.
Chapter Arc: वैशम्पायन जनमेजय को उस अद्भुत सभा का वर्णन सुनाते हैं जिसे विश्वकर्मा ने जल के भीतर रचा—रत्नमय वृक्षों, फल-फूलों और दिव्य प्रकाश से भरी हुई। → सभा के भीतर के रंग-रूप और बनावट का विस्तार होता है—नीले, पीले, काले, श्वेत, लाल लता-गुल्म; मञ्जरी-जाल; और अग्नियों के अनेक नामों का स्मरण, मानो यज्ञ-शक्ति स्वयं वास्तु में प्रवाहित हो। फिर सभा में उपस्थित दैत्य-दानव, गन्धर्व-अप्सरा, नदियाँ-तीर्थ और मूर्तिमान रस/पर्वत—सबका क्रमशः परिचय आता है, जिससे यह स्थान केवल भवन नहीं, एक जीवित ब्रह्माण्ड-सभा बन जाता है। → वरुण-सभा में समस्त गन्धर्व-अप्सराएँ वाद्य-गीत सहित वरुण की स्तुति करते हैं; रत्नयुक्त पर्वत और प्रतिष्ठित ‘रस’ मधुर कथाएँ कहते हैं; और वरुण का मन्त्री सुनाभ पुत्र-पौत्रों सहित, ‘गौ’ तथा ‘पुष्कर’ तीर्थ के साथ उपासना में स्थित दिखता है—यह दृश्य सभा की दिव्यता और देव-व्यवस्था की पराकाष्ठा है। → अध्याय सभा की पूर्णता को स्थिर करता है—निर्माण (विश्वकर्मा), अलंकरण (रत्न-वृक्ष, रंग-लताएँ), और निवास/उपासना (वरुण-स्तुति, मन्त्री-परिवार, तीर्थ-नदियाँ) के माध्यम से यह स्पष्ट होता है कि यह सभा धर्म-व्यवस्था और ऐश्वर्य का केन्द्र है। → यह दिव्य वैभव आगे चलकर मनुष्यों की सभा-राजनीति और अहंकार के लिए मानक/प्रलोभन बनेगा।
Verse 1
- नीलकण्ठने अपनी टीकामें इन सत्ताईस पावकोंके नाम इस प्रकार बताये हैं--अंगिरा, दक्षिणाग्नि, गार्हपत्याग्नि, आहवनीयाग्नि, निर्मन्थ्य, वैद्युत, शूर, संवर्त, लौकिक, जठराग्नि, विषग, क्रव्यात्, क्षेमवान्, वैष्णव, दस्युमान्ू, बलद, शान्त, पुष्ट, विभावसु, ज्योतिष्मान, भरत, भद्र, स्विष्टकृत्, वसुमान्, क्रतु, सोम और पितृमान्। नवमो<्ध्याय: वरुणकी सभाका वर्णन नारद उवाच युधिष्ठिर सभा दिव्या वरुणस्यामितप्र भा । प्रमाणेन यथा याम्या शुभप्राकारतोरणा,नारदजी कहते हैं--युधिष्ठिर! वरुणदेवकी दिव्य सभा अपनी अनन्त कान्तिसे प्रकाशित होती रहती है। उसकी भी लंबाई-चौड़ाईका मान वही है, जो यम-राजकी सभाका है। उसके परकोटे और फाटक बड़े सुन्दर हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ବରୁଣଦେବଙ୍କ ଦିବ୍ୟ ସଭା ଅପରିମେୟ କାନ୍ତିରେ ସଦା ଦୀପ୍ତିମାନ। ତାହାର ପରିମାଣ ଯମରାଜଙ୍କ ସଭା ସମାନ, ଏବଂ ତାହାର ପ୍ରାକାର ଓ ତୋରଣଦ୍ୱାର ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁନ୍ଦର।
Verse 2
अन्त:ःसलिलमास्थाय विदहिता विश्वकर्मणा । दिव्यै रत्नमयैर्वृक्षै:ः फलपुष्पप्रदैर्युता,विश्वकर्माने उस सभाको जलके भीतर रहकर बनाया है। वह फल-फूल देनेवाले दिव्य रत्नमय वृक्षोंसे सुशोभित होती है
ବିଶ୍ୱକର୍ମା ଜଳର ଭିତରେ ଅବସ୍ଥିତ ରହି ସେହି ସଭାକୁ ନିର୍ମାଣ କରିଥିଲେ। ଫଳ ଓ ପୁଷ୍ପ ଦେଇଥିବା ଦିବ୍ୟ ରତ୍ନମୟ ବୃକ୍ଷମାନେ ତାହାକୁ ଶୋଭାୟିତ କରିଥିଲେ।
Verse 3
नीलपीतासितश्यामै: सितैलॉहितकैरपि । अवतानैस्तथा गुल्मैर्मज्जरीजालधारिभि:,उस सभाके भिन्न-भिन्न प्रदेश नीले-पीले, काले, सफेद और लाल रंगके लतागुल्मोंसे आच्छादित हैं। उन लताओंने मनोहर मंजरीपुंज धारण कर रखे हैं
ସେହି ସଭାର ବିଭିନ୍ନ ଭାଗ ନୀଳ, ପୀତ, କଳା, ଶ୍ୟାମ, ଶ୍ୱେତ ଓ ଲୋହିତ ବର୍ଣ୍ଣର ଲତା ଓ ଗୁଲ୍ମମାନେ ଦ୍ୱାରା ଆବୃତ ଥିଲା। ସେହି ଲତାମାନେ ମନୋହର ମଞ୍ଜରୀଗୁଚ୍ଛର ଜାଲ ଧାରଣ କରିଥିଲେ।
Verse 4
तथा शकुनयस्तस्यां विचित्रा मधुरस्वरा: । अनिर्देश्या वपुष्मन्त: शतशो5थ सहस्रश:,सभाभवनके भीतर विचित्र और मधुर स्वरसे बोलनेवाले सैकड़ों-हजारों पक्षी चहकते रहते हैं। उनके विलक्षण रूप-सौन्दर्यका वर्णन नहीं हो सकता। उनकी आकृति बड़ी सुन्दर है
ତଥା ସେହି ସଭାଭବନ ଭିତରେ ବିଚିତ୍ର ରୂପ ଓ ମଧୁର ସ୍ୱର ଥିବା ଶତଶଃ ସହସ୍ରଶଃ ପକ୍ଷୀମାନେ କଲରବ କରୁଥିଲେ। ସେମାନଙ୍କ ରୂପସୌନ୍ଦର୍ୟ ବର୍ଣ୍ଣନାତୀତ; ସେମାନଙ୍କ ଦେହାକୃତି ଅତ୍ୟନ୍ତ ମନୋହର ଥିଲା।
Verse 5
सा सभा सुखसंस्पर्शा न शीता न च घर्मदा । वेश्मासनवती रम्या सिता वरुणपालिता,वरुणकी सभाका स्पर्श बड़ा ही सुखद है, वहाँ न सर्दी है, न गर्मी। उसका रंग श्वेत है, उसमें कितने ही कमरे और आसन (दिव्य मंच आदि) सजाये गये हैं। वरुणजीके द्वारा सुरक्षित वह सभा बड़ी रमणीय जान पड़ती है
ସେହି ସଭା ସ୍ପର୍ଶରେ ଅତ୍ୟନ୍ତ ସୁଖଦ; ସେଠାରେ ନ ଶୀତ, ନ ଘର୍ମ। ତାହା ଶ୍ୱେତବର୍ଣ୍ଣ, ଅନେକ କକ୍ଷ ଓ ଆସନସହିତ ଯୁକ୍ତ, ରମଣୀୟ—ଏବଂ ବରୁଣଦେବଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପାଳିତ-ରକ୍ଷିତ।
Verse 6
यस्यामास्ते स वरुणो वारुण्या च समन्वित: । दिव्यरत्नाम्बरधरो दिव्याभरणभूषित:,उसमें दिव्य रत्नों और वस्त्रोंकी धारण करनेवाले तथा दिव्य अलंकारोंसे अलंकृत वरुणदेव वारुणी देवीके साथ विराजमान होते हैं
ସେହି ସଭାରେ ବରୁଣଦେବ ବାରୁଣୀ ଦେବୀଙ୍କ ସହିତ ଆସୀନ ଅଛନ୍ତି। ସେ ଦିବ୍ୟ ରତ୍ନଖଚିତ ବସ୍ତ୍ର ପରିଧାନ କରି, ଦିବ୍ୟ ଆଭୂଷଣରେ ଭୂଷିତ ହୋଇ, ରାଜସ ତେଜ ଓ ନିୟମିତ ମହିମାରେ ଦୀପ୍ତିମାନ।
Verse 7
स्रग्विणो दिव्यगन्धाश्न दिव्यगन्धानुलेपना: । आदित्यास्तत्र वरुणं जलेश्वरमुपासते,उस सभामें दिव्य हार, दिव्य सुगन्ध तथा दिव्य चन्दनका अंगराग धारण करनेवाले आदित्यगण जलके स्वामी वरुणकी उपासना करते हैं
ସେହି ଦିବ୍ୟ ସଭାରେ ଦିବ୍ୟ ମାଳାଧାରୀ, ସ୍ୱର୍ଗୀୟ ସୁଗନ୍ଧରେ ସୁବାସିତ ଓ ଦିବ୍ୟ ଚନ୍ଦନଲେପରେ ଅନୁଲିପ୍ତ ଆଦିତ୍ୟଗଣ ଜଳାଧିପତି ବରୁଣଙ୍କୁ ଭକ୍ତିପୂର୍ବକ ଉପାସନା କରନ୍ତି।
Verse 8
इस प्रकार श्रीमहाभारत सभापवके अन्तर्गत लोकपालयभाख्यानपर्वमें यमस भा-वर्णन नामक आठवाँ अध्याय पूरा हुआ,वासुकिस्तक्षकश्नैव नागश्चनैरावतस्तथा । कृष्णश्न लोहितश्रैव पद्मश्रित्रश्न वीर्यवान् वासुकि नाग, तक्षक, ऐरावतनाग, कृष्ण, लोहित, पद्म और पराक्रमी चित्र,
ଏହିପରି ଶ୍ରୀମହାଭାରତର ସଭାପର୍ବାନ୍ତର୍ଗତ ଲୋକପାଳସଭାଖ୍ୟାନପର୍ବରେ ‘ଯମସଭା-ବର୍ଣ୍ଣନ’ ନାମକ ଅଷ୍ଟମ ଅଧ୍ୟାୟ ସମାପ୍ତ ହେଲା। ବାସୁକି, ତକ୍ଷକ, ଐରାବତ ନାଗ, କୃଷ୍ଣ, ଲୋହିତ, ପଦ୍ମ ଏବଂ ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ଚିତ୍ର—ଏମାନେ ନାଗ।
Verse 9
कम्बलाश्चतरौ नागौ धृतराष्ट्रबलाहकौ । (मणिनागश्न नागश्न मणि: शड्खनखस्तथा । कौरव्य: स्वस्तिकश्नैव एलापत्रश्ष॒ वामन: ।। अपराजिततश्न दोषश्न नन्दकः पूरणस्तथा । अभीक: शिभिक: श्वेतो भद्ठरो भद्रेश्वरस्तथा ।।) मणिमान् कुण्डधारश्व॒ कर्कोटकथनंजयौ,कम्बल, अश्वतर, धृतराष्ट्र, बलाहक, मणिनाग, नाग, मणि, शंखनख, कौरव्य, स्वस्तिक, एलापत्र, वामन, अपराजित, दोष, नन्दक, पूरण, अभीक, शिभिक, श्वेत, भद्र, भद्रेश्वर, मणिमान्, कुण्डधार, कर्कोटक, धनंजय, इति श्रीमहाभारते सभापर्वणि लोकपालसभाख्यानपर्वणि वरुणसभावर्णने नवमो<ध्याय:
କମ୍ବଳ ଓ ଅଶ୍ୱତର—ଏହି ଦୁଇ ନାଗ; ଧୃତରାଷ୍ଟ୍ର ଓ ବଲାହକ; ଏହିପରି ମଣିନାଗ, ନାଗ, ମଣି ଓ ଶଙ୍ଖନଖ; କୌରବ୍ୟ, ସ୍ୱସ୍ତିକ, ଏଲାପତ୍ର ଓ ବାମନ; ଅପରାଜିତ, ଦୋଷ, ନନ୍ଦକ ଓ ପୂରଣ; ଅଭୀକ, ଶିଭିକ, ଶ୍ୱେତ, ଭଦ୍ର ଓ ଭଦ୍ରେଶ୍ୱର; ଏବଂ ମଣିମାନ, କୁଣ୍ଡଧାର, କର୍କୋଟକ ଓ ଧନଞ୍ଜୟ—ଏମାନେ ସମସ୍ତେ ନାଗ। ଇତି ଶ୍ରୀମହାଭାରତେ ସଭାପର୍ବଣି ଲୋକପାଳସଭାଖ୍ୟାନପର୍ବଣି ‘ବରୁଣସଭା-ବର୍ଣ୍ଣନ’ ନାମକ ନବମ ଅଧ୍ୟାୟ।
Verse 10
पाणिमान् कुण्डधारश्न बलवान् पृथिवीपते । प्रहादो मूषिकादश्व॒ तथैव जनमेजय:,पाणिमान्ू, बलवान कुण्डधार, प्रहाद, मूषिकाद, जनमेजय आदि नाग जो पताका, मण्डल और फणोंसे सुशोभित वहाँ उपस्थित होते हैं, महानाग भगवान् अनन्त भी वहाँ स्थित होते हैं, जिन्हें देखते ही जलके स्वामी वरुण आसन आदि देते और सत्कारपूर्वक उनका पूजन करते हैं। वासुकि आदि सभी नाग हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े होते और भगवान् शेषकी आज्ञा पाकर यथायोग्य आसनोंपर बैठकर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं। युधिष्ठि!! ये तथा और भी बहुतसे नाग उस सभामें क्लेशरहित हो महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ପୃଥିବୀପତି! ପାଣିମାନ, କୁଣ୍ଡଧାର, ବଲବାନ, ପ୍ରହ୍ଲାଦ, ମୂଷିକାଦ ଏବଂ ଜନମେଜୟ ଆଦି ନାଗମାନେ ମଧ୍ୟ ସେଠାରେ ଉପସ୍ଥିତ ଅଛନ୍ତି। ଧ୍ୱଜ, ମଣ୍ଡଳ ଓ ଫଣାର ଦ୍ୟୁତିରେ ଦୀପ୍ତ ହୋଇ ସେମାନେ ସଭାର ଶୋଭା ବଢ଼ାନ୍ତି। ସେଠାରେ ମହାନାଗ ଭଗବାନ ଅନନ୍ତ (ଶେଷ) ମଧ୍ୟ ଅବସ୍ଥିତ; ତାଙ୍କୁ ଦେଖିବାମାତ୍ରେ ଜଳାଧିପତି ବରୁଣ ଆସନ ଆଦି ଦେଇ ସତ୍କାରପୂର୍ବକ ପୂଜା କରନ୍ତି। ବାସୁକି ଆଦି ସମସ୍ତ ନାଗ ହାତ ଯୋଡ଼ି ତାଙ୍କ ସମ୍ମୁଖରେ ଦଣ୍ଡାୟମାନ ରହନ୍ତି ଏବଂ ଶେଷଙ୍କ ଆଜ୍ଞା ପାଇ ଯଥାଯୋଗ୍ୟ ଆସନରେ ବସନ୍ତି। ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ଅନେକ ନାଗ ସେହି ସଭାରେ କ୍ଲେଶରହିତ ହୋଇ ମହାତ୍ମା ବରୁଣଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି।
Verse 11
पाणिमान्ू, बलवान कुण्डधार, प्रहाद, मूषिकाद, जनमेजय आदि नाग जो पताका, मण्डल और फणोंसे सुशोभित वहाँ उपस्थित होते हैं, महानाग भगवान् अनन्त भी वहाँ स्थित होते हैं, जिन्हें देखते ही जलके स्वामी वरुण आसन आदि देते और सत्कारपूर्वक उनका पूजन करते हैं। वासुकि आदि सभी नाग हाथ जोड़कर उनके सामने खड़े होते और भगवान् शेषकी आज्ञा पाकर यथायोग्य आसनोंपर बैठकर वहाँकी शोभा बढ़ाते हैं। युधिष्ठि!! ये तथा और भी बहुतसे नाग उस सभामें क्लेशरहित हो महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं
Narada says: Many serpent-lords—Pāṇimān, the mighty Kuṇḍadhāra, Prahlāda, Mūṣikāda, Janamejaya, and others—adorned with banners, circular emblems, and splendid hoods, are present there. The great serpent, the divine Ananta, is also seated in that assembly; at the very sight of him Varuṇa, lord of the waters, rises to honor him, offers him a seat and other courtesies, and worships him with due reverence. Vāsuki and the other nāgas stand before him with folded hands; then, by the command of the blessed Śeṣa, they take their appropriate seats and enhance the splendor of the hall. O Yudhiṣṭhira, these and many other nāgas dwell there without distress, devotedly attending upon the great-souled Varuṇa. The passage highlights a moral order in which even powerful beings observe hierarchy, humility, and proper hospitality toward the truly venerable.
Verse 12
बलिवैंरोचनो राजा नरकः पृथिवींजय: । प्रह्मादो विप्रचित्तिश्ष कालखज्जाश्नल दानवा:,विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्वीविजयी नरकासुर, प्रह्मद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संहाद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं। वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है
Narada said: “King Bali, son of Virocana, and Naraka the conqueror of the earth; Prahlada, Vipracitti, and the Danavas such as Kalakhañja—along with many other Daityas and Danavas—appear in that celestial assembly adorned with charming earrings, beautiful garlands, crowns, and divine garments and ornaments. There they continually attend upon the great Varuṇa, bearer of the noose of Dharma. Having obtained boons, they are mighty in valor and free from death; their conduct and vows are described as excellent.”
Verse 13
सुहनुर्दुर्मुख: शुड्ख: सुमना: सुमतिस्तत: । घटोदरो महापार्शच: क्रथन: पिठरस्तथा,विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्वीविजयी नरकासुर, प्रह्मद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संहाद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं। वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है
Nārada said: “Suhanu, Durmukha, Śaṅkha, Sumanas, Sumati; Ghaṭodara, Mahāpārśva, Krathana, Piṭhara; King Bali, son of Virocana; the earth-conquering Narakāsura; Prahlāda; Vipracitti; the Dānava Kālakhañja; and many others—Viśvarūpa, Svarūpa, Virūpa, Mahāśiras, the ten-headed Rāvaṇa, Vālī, Meghavāsa, Daśāvara, Ṭiṭṭibha, Viṭabhūta, Saṃhāda, Indratāpana, and the rest—these hosts of Daityas and Dānavas, adorned with charming earrings, splendid garlands, crowns, and divine garments and ornaments, continually worship in that assembly the great god Varuṇa, the noble bearer of the ‘noose of Dharma’. Having obtained boons, they have become valorous and free from death; their conduct and vows are declared to be exceedingly excellent.”
Verse 14
विश्वरूप: स्वरूपश्ष विरूपो5थ महाशिरा: । दशग्रीवक्ष॒ वाली च मेघवासा दशावर:,विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्वीविजयी नरकासुर, प्रह्मद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संहाद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं। वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है
Narada said: There in that assembly are gathered hosts of Daityas and Danavas—Viśvarūpa, Svarūpa, Virūpa, Mahāśiras; Daśagrīva (Rāvaṇa), Vālī, Meghavāsa, Daśāvara; King Bali, son of Virocana; the earth-conqueror Narakāsura; Prahlāda; Vipracitti; the Danava Kālakhañja; Suhanu, Durmukha, Śaṅkha, Sumanas, Sumati, Ghaṭodara, Mahāpārśva, Krathana, Piṭhara, and others. Adorned with charming earrings, splendid garlands, crowns, and divine garments and ornaments, they continually worship the great-souled god Varuṇa, who bears the noose of dharma. Having obtained boons, they are endowed with valor and have become free from death; their conduct and their vowed observances are described as exceedingly excellent.
Verse 15
टिट्टिभो विटभूतश्न संद्वादश्रेन्द्रतापन: । देत्यदानवसड्घाश्च सर्वे रुचिरकुण्डला:,विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्वीविजयी नरकासुर, प्रह्मद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संहाद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं। वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है
Nārada said: “There are many hosts of Daityas and Dānavas—adorned with charming earrings—such as Ṭiṭṭibha, Viṭabhūta, Saṃdvāda, Indratāpana, the king Bali (son of Virocana), the earth-conqueror Narakāsura, Prahlāda, Vipracitti, Kālakhañja, Suhanu, Durmukha, Śaṅkha, Sumanas, Sumati, Ghaṭodara, Mahāpārśva, Krathana, Piṭhara, Viśvarūpa, Svarūpa, Virūpa, Mahāśiras, the ten-headed Rāvaṇa, Vālī, Meghavāsa, Daśāvara, and others. Wearing beautiful garlands, crowns, and divine garments and ornaments, they continually worship in that assembly the great Varuṇa, who bears the noose of Dharma. Having obtained boons, they have become valorous and free from death; their conduct and vows are described as exceedingly excellent.”
Verse 16
स्रग्विणो मौलिनश्वैव तथा दिव्यपरिच्छदा: । सर्वे लब्धवरा: शूरा: सर्वे विगतमृत्यव:,विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्वीविजयी नरकासुर, प्रह्मद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संहाद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं। वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है
ନାରଦ କହିଲେ—“ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ସ୍ରଗ୍ଧାରୀ, ମୌଳିଧାରୀ ଏବଂ ଦିବ୍ୟ ପରିଚ୍ଛଦ-ଭୂଷଣରେ ଶୋଭିତ ଥିଲେ। ସମସ୍ତେ ବରପ୍ରାପ୍ତ, ସମସ୍ତେ ଶୂର, ଏବଂ ବରଦାନରେ ସମସ୍ତେ ମୃତ୍ୟୁରହିତ—ବିରୋଚନପୁତ୍ର ରାଜା ବଳି, ପୃଥିବୀବିଜୟୀ ନରକାସୁର, ପ୍ରହ୍ଲାଦ, ବିପ୍ରଚିତ୍ତି, ଦାନବ କାଳଖଞ୍ଜ, ସୁହନୁ, ଦୁର୍ମୁଖ, ଶଂଖ, ସୁମନା, ସୁମତି, ଘଟୋଦର, ମହାପାର୍ଶ୍ୱ, କ୍ରଥନ, ପିଠର, ବିଶ୍ୱରୂପ, ସ୍ୱରୂପ, ବିରୂପ, ମହାଶିରା, ଦଶମୁଖ ରାବଣ, ବାଳୀ, ମେଘବାସା, ଦଶାବର, ଟିଟ୍ଟିଭ, ବିଟଭୂତ, ସଂହାଦ, ଇନ୍ଦ୍ରତାପନ ଆଦି। ଏହି ଦୈତ୍ୟ-ଦାନବ ସମୂହ ମନୋହର କୁଣ୍ଡଳ, ସୁନ୍ଦର ହାର, କିରୀଟ ଓ ଦିବ୍ୟ ବସ୍ତ୍ରାଭରଣ ଧାରଣ କରି, ସେହି ସଭାରେ ଧର୍ମପାଶଧାରୀ ମହାତ୍ମା ବରୁଣଦେବଙ୍କୁ ସଦା ଉପାସନା କରନ୍ତି। ବରଲାଭରେ ସେମାନେ ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ଓ ମୃତ୍ୟୁବିମୁକ୍ତ ହୋଇଛନ୍ତି; ସେମାନଙ୍କ ଆଚରଣ ଓ ବ୍ରତ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉତ୍ତମ ବୋଲି ବର୍ଣ୍ଣିତ।”
Verse 17
ते तस्यां वरुणं देवं धर्मपाशधरं सदा । उपासते महात्मानं सर्वे सुचरितव्रता:,विरोचनपुत्र राजा बलि, पृथ्वीविजयी नरकासुर, प्रह्मद, विप्रचित्ति, कालखंज दानव, सुहनु, दुर्मुख, शंख, सुमना, सुमति, घटोदर, महापार्श्व, क्रथन, पिठर, विश्वरूप, स्वरूप, विरूप, महाशिरा, दशमुख रावण, वाली, मेघवासा, दशावर, टिट्टिभ, विटभूत, संहाद तथा इन्द्रतापन आदि सभी दैत्यों और दानवोंके समुदाय मनोहर कुण्डल, सुन्दर हार, किरीट तथा दिव्य वस्त्राभूषण धारण किये उस सभामें धर्मपाशधारी महात्मा वरुणदेवकी सदा उपासना करते हैं। वे सभी दैत्य वरदान पाकर शौर्यसम्पन्न हो मृत्युरहित हो गये हैं। उनका चरित्र एवं व्रत बहुत उत्तम है
ନାରଦ କହିଲେ—“ସେହି ସଭାରେ ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଧର୍ମପାଶଧାରୀ ଦେବ ବରୁଣ—ମହାତ୍ମା ଓ ନିତ୍ୟସ୍ଥିର—ଙ୍କୁ ସଦା ଉପାସନା କରନ୍ତି; ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ସୁଚରିତ ଓ ଉତ୍ତମ ବ୍ରତବାନ। ସେଠାରେ ବିରୋଚନପୁତ୍ର ରାଜା ବଳି, ପୃଥିବୀବିଜୟୀ ନରକାସୁର, ପ୍ରହ୍ଲାଦ, ବିପ୍ରଚିତ୍ତି, ଦାନବ କାଳଖଞ୍ଜ, ସୁହନୁ, ଦୁର୍ମୁଖ, ଶଂଖ, ସୁମନା, ସୁମତି, ଘଟୋଦର, ମହାପାର୍ଶ୍ୱ, କ୍ରଥନ, ପିଠର, ବିଶ୍ୱରୂପ, ସ୍ୱରୂପ, ବିରୂପ, ମହାଶିରା, ଦଶମୁଖ ରାବଣ, ବାଳୀ, ମେଘବାସା, ଦଶାବର, ଟିଟ୍ଟିଭ, ବିଟଭୂତ, ସଂହାଦ, ଇନ୍ଦ୍ରତାପନ ଆଦି ଦୈତ୍ୟ-ଦାନବ—ମନୋହର କୁଣ୍ଡଳ, ସୁନ୍ଦର ମାଳା, କିରୀଟ ଓ ଦିବ୍ୟ ବସ୍ତ୍ରାଭରଣ ଧାରଣ କରି—ବରୁଣଙ୍କୁ ନିରନ୍ତର ପ୍ରଣାମ କରନ୍ତି, ଯିଏ ନୀତି-ନିଗ୍ରହର ଧାରକ। ବରଲାଭରେ ସେମାନେ ପରାକ୍ରମଶାଳୀ ଓ ମୃତ୍ୟୁବିମୁକ୍ତ ବୋଲି କୁହାଯାଏ; ସେମାନଙ୍କ ଆଚରଣ ଓ ବ୍ରତ ଅତ୍ୟନ୍ତ ଉତ୍କୃଷ୍ଟ ବୋଲି ବର୍ଣ୍ଣିତ।”
Verse 18
तथा समुद्राश्चत्वारो नदी भागीरथी च सा | कालिन्दी विदिशा वेणा नर्मदा वेगवाहिनी,चारों समुद्र, भागीरथी नदी, कालिन्दी, विदिशा, वेणा, नर्मदा, वेगवाहिनी,
ନାରଦ କହିଲେ—“ତଥା ଚାରି ସମୁଦ୍ର ଅଛନ୍ତି, ଏବଂ ସେହି ପ୍ରସିଦ୍ଧ ଭାଗୀରଥୀ ନଦୀ; ତଥା କାଳିନ୍ଦୀ, ବିଦିଶା, ବେଣା ଓ ବେଗବାହିନୀ ନର୍ମଦା।”
Verse 19
विपाशा च शठतद्गुश्न चन्द्रभागा सरस्वती । इरावती वितस्ता च सिन्धुर्देवनदी तथा,विपाशा, शतद्रु, चन्द्रभागा, सरस्वती, इरावती, वितस्ता, सिन्धु, देवनदी,
ନାରଦ କହିଲେ—“ବିପାଶା, ଶତଦ୍ରୁ, ଚନ୍ଦ୍ରଭାଗା, ସରସ୍ୱତୀ, ଇରାବତୀ, ବିତସ୍ତା, ସିନ୍ଧୁ ଏବଂ ଦେବନଦୀ ମଧ୍ୟ ଅଛି।”
Verse 20
गोदावरी कृष्णवेणा कावेरी च सरिद्वधरा । किम्पुना च विशल्या च तथा वैतरणी नदी,गोदावरी, कृष्णवेणा, सरिताओंमें श्रेष्ठ कावेरी, किम्पुना, विशल्या, वैतरणी नदी,
ନାରଦ କହିଲେ—“ଗୋଦାବରୀ, କୃଷ୍ଣବେଣା, ଏବଂ ସରିତାମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ କାବେରୀ; ତଥା କିମ୍ପୁନା, ବିଶଲ୍ୟା ଓ ବୈତରଣୀ ନଦୀ ମଧ୍ୟ ଅଛି।”
Verse 21
तृतीया, ज्येष्ठलिला, महानद शोण, चर्मण्वती, पर्णाशा, महानदी,
ନାରଦ ଆହୁରି କହିଲେ—ତୃତୀୟା, ଜ୍ୟେଷ୍ଠଲିଲା, ମହାନଦ ଶୋଣ, ଚର୍ମଣ୍ୱତୀ, ପର୍ଣାଶା ଏବଂ ଆଉ ଗୋଟିଏ ମହାନଦୀ—ଏହି ସବୁ ପ୍ରସିଦ୍ଧ ନଦୀ।
Verse 22
सरयूर्वारवत्याथ लाड़्ली च सरिद्वरा । करतोया तथात्रेयी लौहित्यशक्ष महानद:,सरयू, वारखत्या, सरिताओंमें श्रेष्ठ लांगली, करतोया, आत्रेयी, महानद लौहित्य,
ନାରଦ କହିଲେ—ସରୟୁ, ବାରବତୀ ଏବଂ ନଦୀମାନଙ୍କ ମଧ୍ୟରେ ଶ୍ରେଷ୍ଠ ଲାଙ୍ଗଲୀ; ତଥା କରତୋୟା, ଆତ୍ରେୟୀ ଓ ମହାନଦ ଲୌହିତ୍ୟ ମଧ୍ୟ ଅଛି।
Verse 23
तृतीया ज्येछ्ठिला चैव शोणश्लवापि महानद: । चर्मण्वती तथा चैव पर्णाशा च महानदी,लड्घती गोमती चैव संध्या त्रि:स्रोतसी तथा । एताश्षान्याश्न राजेन्द्र सुतीर्था लोकविश्रुता: भरतवंशी राजेन्द्र युधिष्ठिर! लंघती, गोमती, संध्या और त्रिस्रोतसी, ये तथा दूसरे लोकविख्यात उत्तम तीर्थ (वहाँ वरुणकी उपासना करते हैं),
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ରାଜେନ୍ଦ୍ର! ତୃତୀୟା, ଜ୍ୟେଷ୍ଠିଲା, ଶୋଣଶ୍ଲବା, ମହାନଦ ଚର୍ମଣ୍ୱତୀ ଓ ପର୍ଣାଶା; ତଥା ଲଂଘତୀ, ଗୋମତୀ, ସନ୍ଧ୍ୟା ଓ ତ୍ରିଃସ୍ରୋତସୀ—ଏହି ସବୁ ଏବଂ ଅନ୍ୟାନ୍ୟ ଅନେକ ଉତ୍ତମ ତୀର୍ଥ ଲୋକେ ପ୍ରସିଦ୍ଧ।
Verse 24
सरित: सर्वतश्नान्यास्तीर्थानि च सरांसि च | कूृपाश्न सप्रस्रवणा देहवन्तो युधिष्ठिर,उपासते महात्मानं॑ सर्वे जलचरास्तथा । समस्त सरिताएँ, जलाशय, सरोवर, कूप, झरने, पोखरे और तालाब, सम्पूर्ण दिशाएँ, पृथ्वी, पर्वत तथा सम्पूर्ण जलचर जीव अपने-अपने स्वरूप धारण करके महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର! ସ୍ନାନଯୋଗ୍ୟ ସମସ୍ତ ନଦୀ, ସମସ୍ତ ତୀର୍ଥ ଓ ସରୋବର; ତଥା ପ୍ରବାହଯୁକ୍ତ କୂପ ଓ ଝରଣା—ଏହି ସବୁ ଦେହ ଧାରଣ କରି ମହାତ୍ମା ବରୁଣଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି। ଏହିପରି ଜଳଚର ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ ମଧ୍ୟ ତାଙ୍କୁ ନମସ୍କାର କରେ।
Verse 25
पल्वलानि तडागानि देहवन्त्यथ भारत । दिशस्तथा मही चैव तथा सर्वे महीधरा:
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭାରତ! ପଲ୍ୱଳ (ଚିକ୍କଣ-ଜଳାଶୟ) ଓ ତଡାଗ, ଦେହଧାରୀ ପ୍ରାଣୀ, ଦିଗମାନ, ପୃଥିବୀ ଏବଂ ସମସ୍ତ ପର୍ବତ—ଏହି ସବୁ ମଧ୍ୟ (ସେହି ସୁସଂଗଠିତ ଜଗତରେ) ଅବସ୍ଥିତ।
Verse 26
गीतवादित्रवन्तश्न गन्धर्वाप्सरसां गणा:
ନାରଦ କହିଲେ—ସେଠାରେ ଗନ୍ଧର୍ବ ଓ ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କ ଦଳ ଥିଲା; ଗୀତ ଓ ବାଦ୍ୟଧ୍ୱନିରେ ସମସ୍ତ ଦିଗ ଗୁଞ୍ଜିଉଠୁଥିଲା।
Verse 27
महीधरा रत्नवन्तो रसा ये च प्रतिछ्िता:
ନାରଦ କହିଲେ—ପର୍ବତମାନେ ରତ୍ନରେ ସମୃଦ୍ଧ; ଦେଶ-ପ୍ରଦେଶମାନେ ସୁଦୃଢ଼ ଭାବେ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ଓ ନିଜ ନିଜ ରସ (ଜୀବସାର) ଯୁକ୍ତ।
Verse 28
वारुणश्न तथा मन्त्री सुनाभ: पर्युपासते
ନାରଦ କହିଲେ—ଏହିପରି ବାରୁଣଶ୍ନ ଓ ମନ୍ତ୍ରୀ ସୁନାଭ ସଦା ସଜାଗ ରହି ନିକଟରେ ଉପସ୍ଥିତ ହୋଇ ସେବା କରନ୍ତି।
Verse 29
सर्वे विग्रहवन्तस्ते तमीश्वरमुपासते,ये सभी शरीर धारण करके लोकेश्वर वरुणकी उपासना करते रहते हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ସେମାନେ ସମସ୍ତେ ଦେହଧାରୀ ହୋଇ ମଧ୍ୟ, ଲୋକାଧିପ ବରୁଣ ନାମକ ସେଇ ଈଶ୍ୱରଙ୍କୁ ନିତ୍ୟ ଭକ୍ତିରେ ଉପାସନା କରନ୍ତି।
Verse 30
एषा मया सम्पतता वारुणी भरतर्षभ | दृष्टपूर्वा सभा रम्या कुबेरस्य सभां शूणु,भरतश्रेष्ठ। पहले सब ओर घूमते हुए मैंने वरुणजीकी इस रमणीय सभाका भी दर्शन किया है। अब तुम कुबेरकी सभाका वर्णन सुनो
ନାରଦ କହିଲେ—ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, ଘୁରିବା ସମୟରେ ମୁଁ ବରୁଣଙ୍କ ଏହି ରମଣୀୟ ସଭାକୁ ମଧ୍ୟ ପୂର୍ବରୁ ଦେଖିଛି। ଏବେ, ହେ ଭରତଶ୍ରେଷ୍ଠ, କୁବେରଙ୍କ ସଭାର ବର୍ଣ୍ଣନା ଶୁଣ।
Verse 113
पताकिनो मण्डलिन: फणावन्तश्न सर्वश: । (अनन्तश्न महानागो यं स दृष्टवा जलेश्वर: । अभ्यर्चयति सत्कारैरासनेन च त॑ विभुम् ।। वासुकिप्रमुखाश्वैव सर्वे प्राजजलय: स्थिता: । अनुज्ञाताश्व शेषेण यथा्हमुपविश्य च ।।) एते चान्ये च बहव: सर्पस्तिस्यां युधिष्ठिर । उपासते महात्मानं वरुण विगतक्क्लमा:
ନାରଦ କହିଲେ—ସେଠାରେ ସବୁଦିଗରେ ପତାକାଧାରୀ, ମଣ୍ଡଳାକାରେ କୁଣ୍ଡଳିତ ଓ ଫଣାରେ ଶୋଭିତ ନାନା ପ୍ରକାର ସର୍ପ ଅଛନ୍ତି। ମହାନାଗ ଅନନ୍ତଙ୍କୁ ଦେଖିବାମାତ୍ରେ ଜଳାଧିପତି ବରୁଣ ଉଠି ସେହି ବିଭୁଙ୍କୁ ସତ୍କାର ସହ ପୂଜା କରି ଆସନ ଦିଅନ୍ତି। ବାସୁକି ଆଦି ପ୍ରଧାନ ନାଗମାନେ ହାତ ଯୋଡ଼ି ଦଣ୍ଡାୟମାନ; ଶେଷଙ୍କ ଅନୁମତି ପାଇ ମୁଁ ମଧ୍ୟ ଯଥୋଚିତ ଭାବେ ବସିଲି। ହେ ଯୁଧିଷ୍ଠିର, ଏମାନେ ଓ ଅନ୍ୟ ଅନେକ ସର୍ପ ସେଠାରେ କ୍ଲାନ୍ତିହୀନ ମହାତ୍ମା ବରୁଣଙ୍କୁ ସେବା-ଉପାସନା କରନ୍ତି।
Verse 253
उपासते महात्मानं॑ सर्वे जलचरास्तथा । समस्त सरिताएँ, जलाशय, सरोवर, कूप, झरने, पोखरे और तालाब, सम्पूर्ण दिशाएँ, पृथ्वी, पर्वत तथा सम्पूर्ण जलचर जीव अपने-अपने स्वरूप धारण करके महात्मा वरुणकी उपासना करते हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ସମସ୍ତ ଜଳଚରମାନେ ମଧ୍ୟ ସେହିପରି ମହାତ୍ମା ବରୁଣଙ୍କୁ ଉପାସନା କରନ୍ତି। ନଦୀମାନେ ଓ ସମସ୍ତ ପ୍ରକାର ଜଳସ୍ରୋତ—ସରୋବର, କୂଆ, ଝରଣା, ପୋଖରୀ ଓ ତାଳାବ—ଦିଗମାନେ, ପୃଥିବୀ ଓ ପର୍ବତମାନେ, ଏବଂ ଜଳରେ ଗତି କରୁଥିବା ସମସ୍ତ ପ୍ରାଣୀ, ନିଜ-ନିଜ ରୂପ ଧାରଣ କରି ବରୁଣଙ୍କୁ ଶ୍ରଦ୍ଧାରେ ପୂଜନ କରନ୍ତି।
Verse 263
स्तुवन्तो वरुणं तस्यां सर्व एव समासते । सभी गन्धर्व और अप्सराओंके समुदाय भी गीत गाते और बाजे बजाते हुए उस सभामें वरुणदेवताकी स्तुति एवं उपासना करते हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ସେହି ଦିବ୍ୟ ସଭାରେ ସମସ୍ତେ ଏକତ୍ର ବସି ବରୁଣଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି କରନ୍ତି। ଗନ୍ଧର୍ବମାନେ ଓ ଅପ୍ସରାମାନଙ୍କ ଦଳ ମଧ୍ୟ ଗୀତ ଗାଇ ଓ ବାଦ୍ୟ ବଜାଇ ବରୁଣଦେବଙ୍କୁ ସ୍ତୁତି-ଉପାସନା କରନ୍ତି।
Verse 276
कथयन्त: सुमधुरा: कथास्तत्र समासते । रत्नयुक्त पर्वत और प्रतिष्ठित रस (मूर्तिमान् होकर) अत्यन्त मधुर कथाएँ कहते हुए वहाँ निवास करते हैं
ନାରଦ କହିଲେ—ସେଠାରେ ସମସ୍ତେ ଏକତ୍ର ବସି ଅତ୍ୟନ୍ତ ମଧୁର କଥା କହୁଥାନ୍ତି। ରତ୍ନଯୁକ୍ତ ପର୍ବତମାନେ ଓ ପ୍ରତିଷ୍ଠିତ ରସମାନେ ମଧ୍ୟ ମୂର୍ତ୍ତିମାନ ହୋଇ ସେଠାରେ ବାସ କରନ୍ତି ଏବଂ ନିତ୍ୟ ପରମ ମଧୁର କଥା ବର୍ଣ୍ଣନା କରନ୍ତି।
Verse 286
पुत्रपौत्रै: परिवृतों गोनाम्ना पुष्करेण च | वरुणका मन्त्री सुनाभ अपने पुत्र-पौत्रोंसे घिरा हुआ गौ तथा पुष्कर नामवाले तीर्थके साथ वरुणदेवकी उपासना करता है
ନାରଦ କହିଲେ—ବରୁଣଙ୍କ ମନ୍ତ୍ରୀ ସୁନାଭ ପୁତ୍ର-ପୌତ୍ରମାନଙ୍କ ଦ୍ୱାରା ପରିବୃତ ହୋଇ, ‘ଗୌ’ ନାମକ ତୀର୍ଥ ଓ ‘ପୁଷ୍କର’ ନାମକ ତୀର୍ଥ ସହିତ ସଂଯୁକ୍ତ ରହି, ବରୁଣଦେବଙ୍କୁ ଉପାସନା କରୁଛନ୍ତି।
The motif is accountability through moral restraint: Varuṇa’s sovereignty is presented as rule that binds wrongdoing and stabilizes order, implying governance grounded in enforceable ethical norms.
It instructs that authority is validated by ordered integration—ritual, environment, and diverse constituencies—so a sabhā symbolizes not only power but the capacity to harmonize domains under a coherent rule.
No formal phalaśruti appears; the closing functions as narrative meta-direction, with Nārada asserting eyewitness credibility and shifting the discourse toward Kubera’s sabhā as the next comparative exemplar.