
अध्याय २२० — बलिवासवसंवादः (Bali–Vāsava Dialogue on Kāla and Steadfastness)
Upa-parva: Rājadharmānuśāsana (Instruction on Royal Duty) — Bali–Vāsava Saṃvāda Episode
Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma what constitutes welfare (śreyas) for one submerged in misfortune—bereavement, loss of wealth, or loss of kingdom. Bhīṣma answers that dhṛti (steadfast composure) preserves the body and restores capacity for prosperity, then narrates an ancient dialogue between Indra and Bali. Indra approaches the defeated, bound Bali and questions his lack of grief despite dispossession. Bali replies that outcomes alternate by kāla; neither victor nor vanquished is the autonomous doer. He critiques pride in unstable sovereignty, urges equanimity in sorrow and joy, and advises attention to the present rather than fixation on past or future. Indra, acknowledging the insight, moderates hostility and grants conditional relief, while the narrative underscores impermanence of power, the limits of personal agency, and the governance value of humility and mental stability.
Chapter Arc: शरशय्या पर स्थित भीष्म युधिष्ठिर को एक ऐसा धर्म-तत्त्व सौंपते हैं जो चारों आश्रमों और समस्त वर्णों का आधार है—‘दम’ (इन्द्रिय-निग्रह/संयम)। → भीष्म बताते हैं कि बिना दम के न कर्म की सिद्धि टिकती है, न तप, न सत्य; तेज भी दम से ही धृत होता है—अन्यथा वही तेज तीक्ष्णता बनकर भीतर-ही-भीतर शत्रुओं को जन्म देता है। फिर वे दम से उत्पन्न गुणों की शृंखला गिनाते हैं—अक्रोध, आर्जव, अल्पवाद, निरभिमान, गुरु-पूजा, अनसूया, दया, अपैशुन—और दिखाते हैं कि संयम का अभाव मनुष्य को काम-क्रोध-लोभ, डाह और आत्म-प्रशंसा के दलदल में खींच ले जाता है। → दम-सम्पन्न पुरुष का चरित्र-चित्रण चरम पर पहुँचता है: वह सर्वभूतहित में रत, द्वेष से रहित, ‘महाह्रद’ (गहरे सरोवर) की भाँति अचल-प्रसन्न, प्रशंसा-निन्दा में सम, और जितेन्द्रिय होकर लोक में सत्कार तथा परलोक में स्वर्ग/उत्तम गति प्राप्त करता है—यहाँ ‘दम’ को मोक्षधर्म की धुरी के रूप में प्रतिष्ठित किया जाता है। → भीष्म निष्कर्ष देते हैं कि सभी आश्रमों में दम ही विशिष्ट है और धर्म-फल का उत्कर्ष दान्त (संयमी) में ही अधिक कहा गया है; अतः युधिष्ठिर के लिए राज्य-धर्म, प्रायश्चित्त और आत्म-शान्ति—सबका प्रवेश-द्वार यही संयम है।
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इस प्रकार श्रीमहाभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत गोक्षधर्मपर्वमें पंचशिखका उपदेशनामक दो सौ उन्नीसवाँ अध्याय प्रा हुआ ॥/ २१९ ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठके १५ श्लोक मिलाकर कुल ६७ श्लोक हैं) अपना छा | अड-४#-कात जा - “ये दोनों ज्ञान अथवा अज्ञानके विषय नहीं होते, इस कथनका अभिप्राय यों समझना चाहिये--जो श्रवणकालमें शब्दका अनुभव करता है, वह उसके साथ ही श्रोत्र और आकाशका अनुभव नहीं करता है। साथ ही उसे इन दोनोंका अज्ञान भी नहीं रहता; क्योंकि शब्दका श्रवणेन्द्रिय और आकाश दोनोंसे सम्बन्ध है। इन दोनोंके बिना शब्दका अनुभव हो ही नहीं सकता। विशत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय: श्वेतकेतु और सुवर्चलाका विवाह, दोनों पति-पत्नीका अध्यात्मविषयक संवाद तथा गार्हस्थ्य-धर्मका पालन करते हुए ही उनका परमात्माको प्राप्त होना एवं दमकी महिमाका वर्णन (युधिष्टिर उवाच अस्ति कश्चिद् यदि विभो सदारो नियतो गृहे । अतीतसर्वसंसार: सर्वद्वन्द्धविवर्जित: ।। त॑ मे ब्रूहि महाप्राज्ञ दुर्लभ: पुरुषो महान् । युधिष्ठिरने कहा--महाप्राज्ञ! प्रभो! यदि कोई ऐसा पुरुष हो, जो गृहस्थ आश्रममें पत्नीसहित संयम-नियमके साथ रहता हो, समस्त सांसारिक बन्धनोंको पार कर चुका हो और सम्पूर्ण द्वद्धोंसे दूर रहकर उन्हें धैर्यपूर्वक सहन करता हो तो उसका मुझे परिचय दीजिये, क्योंकि ऐसा महापुरुष दुर्लभ होता है ।। भीष्म उवाच शृणु राजन् यथावृत्तं यन्मां त्वं पृष्टवानसि । इतिहासमिमं शुद्ध संसारभयभेषजम् ।। भीष्मजीने कहा--राजन्! तुमने मुझसे जो विषय पूछा है, उसे यथावत््रूपसे सुनो। यह विशुद्ध इतिहास जन्म-मरणरूप रोगका भय दूर करनेके लिये उत्तम औषध है ।। देवलो नाम वित्रर्षि: सर्वशास्त्रार्थकोविद: । क्रियावान् धार्मिको नित्यं देवब्राह्मणपूजक: ।। ब्रह्मर्षि देवलका नाम सर्वत्र प्रसिद्ध है। वे सम्पूर्ण शास्त्रोंके ज्ञानमें निपुण, क्रियानिष्ठ, धार्मिक तथा देवताओं और ब्राह्मणोंकी सदा पूजा करनेवाले थे ।। सुता सुवर्चला नाम तस्य कल्याणलक्षणा । नातिहस्वा नातिकृशा नातिदीर्घा यशस्विनी ।। उनके एक पुत्री थी, जो सुवर्चलाके नामसे पुकारी जाती थी। वह यशस्विनी कन्या सभी शुभ लक्षणोंसे सम्पन्न थी। वह न तो अधिक नाटी थी और न अधिक लंबी, वह विशेष दुबली भी नहीं थी ।। प्रदानसमयं प्राप्ता पिता तस्य हाचिन्तयत् ।। अस्या: पति: कुतो वेति ब्राह्मण: श्रोत्रिय: पर: । विद्वान विप्रो हाकुट॒म्बः प्रियवादी महातपा: ।। धीरे-धीरे उसकी विवाहके योग्य अवस्था हो गयी। उसके पिता सोचने लगे, मेरी इस पुत्रीका पति श्रेष्ठ श्रोत्रिय ब्राह्मण होना चाहिये, जो विद्वान् होनेके साथ ही प्रिय वचन बोलनेवाला, महातपस्वी और अविवाहित हो; परंतु ऐसा पुरुष कहाँसे सुलभ हो सकता है? ।। इत्येवं चिन्तयानं तं रहस्याह सुवर्चला । अन्धाय मां महाप्राज्ञ देहानन्धाय वै पित: । एवं समर सदा विद्वन् ममेदं प्रार्थितं मुने ।। एकान्तमें बैठकर ऐसी ही चिन्तामें पड़े हुए पिताके पास जाकर सुवर्चलाने इस प्रकार कहा--'पिताजी! आप परम बुद्धिमान, विद्वान् और मुनि हैं। आप मुझे ऐसे पतिके हाथमें सौंपियेगा, जो अन्धा भी हो और आँखवाला भी हो। मेरी इस प्रार्थनाको सदा याद रखियेगा” ॥। पितोवाच न शव्यं प्रार्थितं वत्से त्वयाद्य प्रतिभाति मे । अन्धतानन्धता चेति विकारो मम जायते ।। उन्मत्तेवाशुभं वाक््यं भाषसे शुभलोचने । पिता बोले--बेटी! तुम्हारी यह प्रार्थना पूर्ण हो सके, ऐसा तो मुझे नहीं प्रतीत होता है; क्योंकि एक ही व्यक्ति अन्धा भी हो और अन्धा न भी हो, यह कैसे सम्भव है? तुम्हारी यह बात सुनकर मेरे मनमें खेद होता है। शुभलोचने! तुम पगली-सी होकर अशुभ बात मुँहसे निकाल रही हो ।। युवर्चलोवाच नाहमुन्मत्त भूताद्य बुद्धिपूर्व ब्रवीमि ते । विद्यते चेत् पतिस्तादूक् स मां भरति वेदवित् ।। सुवर्चला बोली--पिताजी! मैं पगली नहीं हूँ। खूब सोच-समझकर आपसे ऐसी बात कह रही हूँ। यदि ऐसा कोई वेदवेत्ता पति प्राप्त हो जाय तो वह मेरा भरण-पोषण कर सकता है ।। येभ्यस्त्वं मन्यसे दातुं मामिहानय तान् द्विजान् । तादृशं त॑ पति तेषु वरयिष्ये यथातथम् ।। आप जिन ब्राह्मणोंके हाथमें मुझे देना चाहते हैं, उन सबको यहाँ बुलवा लीजिये। मैं उन्हींमेंसे अपनी पसंदके अनुसार योग्य पतिका वरण कर लूँगी ।। तथेति चोकक्त्वा तां कन्यामृषि: शिष्यानुवाच ह । ब्राह्मणान् वेदसम्पन्नान् योनिगोत्रविशोधितान् । मातृतः पितृतः शुद्धान् शुद्धानाचारत: शुभान् । अरोगान् बुद्धिसम्पन्नान् शीलसत्त्वगुणान्वितान् ।। असंकीर्णाश्च गोत्रेषु वेदव्रतसमन्वितान् । ब्राह्मणान् स्नातकान् शीघ्र॑ं मातापितृसमन्वितान् ।। निवेष्टकामान् कन्यां मे दृष्टवा55नयत शिष्यका: । तब अपनी पुत्रीसे “तथास्तु' कहकर ऋषिने शिष्योंसे कहा--'शिष्यगण! जो वेदविद्यासे सम्पन्न, निष्कलंक माता-पितासे उत्पन्न, निर्दोष कुलके बालक, शुद्ध आचार- विचारवाले, शुभ लक्षणोंसे युक्त, नीरोग, बुद्धिमान, शील और सत्त्वसे सम्पन्न, गोत्रोंमें वर्णसंकरताके दोषसे रहित, वेदोक्त व्रतके पालनमें तत्पर, स्नातक, जीवित माता-पितावाले तथा मेरी कन्यासे विवाहकी इच्छा रखनेवाले श्रेष्ठ ब्राह्मण हों, उन सबको देखकर तुमलोग यहाँ शीघ्र बुला ले आओ ।। ” तच्छुत्वा त्वरिता: शिष्या हमश्रमेषु ततस्ततः । ग्रामेषु च ततो गत्वा ब्राह्मुणे भ्यो न्न्यवेदयन् ।। मुनिकी यह बात सुनकर उनके शिष्योंने तुरंत इधर-उधर आश्रमों तथा गाँवोंमें जाकर ब्राह्मणोंको इसकी सूचना दी ।। ऋषे: प्रभाव मत्वा ते कन्यायाश्ष द्विजोत्तमा: | अनेकमुनयो राजन् सम्प्राप्ता देवलाश्रमम् ।। राजन! ऋषि और उस कन्याके प्रभावको जानकर अनेक श्रेष्ठ ब्राह्मण महर्षि देवलके आश्रमपर आये ।। अनुमान्य यथान्यायं मुनीन् मुनिकुमारकान् । अभ्यर्च्य विधिवत् तत्र कन्यामाह पिता महान् ।। कन्याके महान् पिता देवलने वहाँ आये हुए ऋषियों तथा ऋषिकुमारोंका यथायोग्य सम्मान तथा विधिपूर्वक पूजन करके अपनी पुत्रीसे कहा-- एते5पि मुनयो वत्से स्वपुत्रैकमता इह । वेदवेदाड्सम्पन्ना: कुलीना: शीलसम्मता: ।। येअमी तेषु वरं भद्ठे त्वमिच्छसि महाव्रतम् | त॑ कुमारं वृणीष्वाद्य तस्मै दास्याम्यहं शुभे ।। “बेटी! ये मुनि जो यहाँ पधारे हैं, वेद-वेदांगोंसे सम्पन्न, कुलीन और शीलवान हैं। ये मेरे लिये अपने पुत्रके समान प्रिय हैं। भद्रे! इन लोगोंमेंसे तुम जिस महान् व्रतधारी ऋषिकुमारको पति बनाना चाहो, उसे आज चुन लो, शुभे! मैं उसीके साथ तुम्हारा विवाह कर दूँगा! ।। तथेति चोक््त्वा कल्याणी तप्तहेमनिभा तदा । सर्वलक्षणसम्पन्ना वाक्यमाह यशस्विनी ।। विप्राणां समितीर्दृष्टत्वा प्रणिपत्य तपोधनान् । तब “तथास्तु' कहकर तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिवाली, समस्त शुभलक्षणोंसे सम्पन्न, यशस्विनी, कल्याणमयी सुवर्चला ब्राह्मणोंक उस समुदायको देखकर सम्पूर्ण तपोधनोंको प्रणाम करके इस प्रकार बोली-- ।। युवर्चलोवाच यद्यस्ति समितौ विप्रो हान्धो5नन्ध: स मे वर: ।। सुवर्चलाने कहा--इस ब्राह्मण-सभामें वही मेरा पति हो सकता है, जो अन्धा हो और अन्धा न भी हो ।। तच्छुत्वा मुनयस्तत्र वीक्षमाणा: परस्परम् | नोचुरविंप्रा महाभागा: कन्यां मत्वा हवेदिकाम् ।। उस कन्याकी यह बात सुनकर सब मुनि एक-दूसरेका मुँह देखने लगे। वे महाभाग ब्राह्मण उस कन्याको अबोध जानकर कुछ बोले नहीं ।। कुत्सयित्वा मुनि तत्र मनसा मुनिसत्तमा: ।। यथागतं ययु: क्रुद्धा नानादेशनिवासिन: । कन्या च संस्थिता तत्र पितृवेश्मनि भामिनी ।। नाना देशोंमें निवास करनेवाले वे श्रेष्ठ मुनि कुपित हो मन-ही-मन देवल ऋषिकी निन्दा करते हुए जैसे आये थे, वैसे ही लौट गये और वह मानिनी कन्या वहाँ पिताके ही घरमें रह गयी। ततः कदाचिद् ब्रद्मण्यो विद्वान् न््यायविशारद: । ऊहापोहविधानन्षो ब्रह्मचर्यसमन्वित: ।। वेदविद् वेदतत्त्वज्ञ: क्रियाकल्पविशारद: । आत्मतत्त्वविभागज्ञ: पितृमान् गुणसागर: ।। श्वेतकेतुरिति ख्यात: श्रुत्वा वृत्तान्तमादरात् । कन्यार्थ देवलं चापि शीघ्र तत्रागतो5भवत् ।। तदनन्तर किसी समय दिद्वान्, ब्राह्मणभक्त, न्यायविशारद, ऊहापोह करनेमें कुशल, ब्रह्मचर्यसे सम्पन्न, वेदवेत्ता, वेदतत्त्वज्ञ, कर्मकाण्डविशारद, आत्मतत्त्वको विवेकपूर्वक जाननेवाले, जीवित पितावाले तथा सदगुणोंके सागर श्वेतकेतु ऋषि सारा वृत्तान्त सुनकर उस कन्याको प्राप्त करनेके लिये शीघ्रतापूर्वक आदरसहित देवल ऋषिके आश्रमपर आये |। उद्दालकसुतं दृष्टवा श्वेतकेतुं महाव्रतम् । यथान्यायं च सम्पूज्य देवल: प्रत्यभाषत ।। उद्दालकके पुत्र महान् व्रतधारी श्वेतकेतुको आया देख देवलने उनकी यथायोग्य पूजा करके अपनी पुत्रीसे कहा-- ।। कन्ये एष महाभागे प्राप्तो ऋषिकुमारक: । वरयैनं महाप्राज्ञं वेदवेदाड़पारगम् ।। “महान् सौभाग्यशालिनी कन्ये! ये ऋषिकुमार श्वेतकेतु पधारे हैं। ये बड़े भारी पण्डित और वेद-वेदांगोंके पारंगत विद्वान् हैं। तुम इनका वरण कर लो” ।। तच्छुत्वा कुपिता कन्या ऋषिपुत्रमुदैक्षत । तां कनन््यामाह विद्रर्षि: सो5हं भद्रे समागत:ः ।। पिताकी यह बात सुनकर कनन््याने कुपित हो ऋषिकुमार श्वेतकेतुकी ओर देखा। तब ब्रह्मर्षि श्वेतकेतुने उस कन्यासे कहा--“भद्रे! मैं वही हूँ (जिसे तुम चाहती हो), तुम्हारे लिये ही यहाँ आया हूँ ।। अन्धो5हमत्र तत्त्वं हि तथा मन्ये च सर्वदा । विशालनयनं विद्धि तथा मां हीनसंशयम् ।। वृणीष्व मां वरारोहे भजे च त्वामनिन्दिते । “मैं अन्ध हूँ, यह यथार्थ है। मैं अपने मनमें सदा ऐसा ही मानता भी हूँ। साथ ही मैं संदेहरहित होनेके कारण विशाल नेत्रोंसे युक्त भी हूँ। ऐसा ही तुम मुझे समझो। श्रेष्ठ अंगोंवाली अनिन्द्य सुन्दरी! तुम मुझे अंगीकार करो। मैं तुम्हारी अभीष्ट-सिद्धि करूँगा ।। येनेदं वीक्षते नित्यं वृणोति स्पृशतेडथ वा ।। घ्रायते वक्ति सततं येनेदं रसते पुनः । येनेदं मन्यते तत्त्वं येन बुध्यति वा पुन: ।। न चरक्षुविद्यते होतत् स वै भूतान्ध उच्यते । “जिस परमात्माकी शक्तिसे जीवात्मा सदा यह सब कुछ देखता है, ग्रहण करता है, स्पर्श करता है, सूँघता है, बोलता है, निरन्तर विभिन्न वस्तुओंका स्वाद लेता है, तत्त्वका मनन करता और बुद्धिद्वारा निश्चय करता है, वह परमात्मा ही चक्षु- कहलाता है। जो इस चक्षुसे रहित है, वही प्राणियोंमें अन्धा कहलाता है (और परमात्मारूपी चक्षुसे युक्त होनेके कारण मैं अनन्ध--नेत्रवाला भी हूँ) ।। यस्मिन् प्रवर्तते चेदं॑ पश्यन् शृण्वन् स्पृशन्नपि ।। जिप्रंश्न रसयंस्तद्वद् वर्तते येन चक्षुषा । तन्मे नास्ति ततो हान्धो वृणु भद्रेडद्य मामतः ।। “जिस परमात्माके भीतर ही यह सम्पूर्ण जगत् व्यवहारमें प्रवृत्त होता है। यह जगत् जिस आँखसे देखता, कानसे सुनता, त्वचासे स्पर्श करता, नासिकासे सूँघता, रसनासे रस लेता एवं जिस लौकिक चक्षुसे यह सारा बर्ताव करता है, उससे मेरा कोई सम्बन्ध नहीं है, इसलिये मैं अन्ध हूँ; अतः भद्रे! तुम मेरा वरण करो ।। लोकदृष्ट्या करोमीह नित्यनैमित्तिकादिकम् | आत्मदृष्ट्या च तत् सर्व विलिप्यामि च नित्यश: ।। “मैं लोकसंग्रहकी दृष्टिसे ही यहाँ नित्य-नैमित्तिक आदि कर्म करता हूँ तथा नित्य आत्मदृष्टि रखनेके कारण उन सब कर्मोसे लिप्त नहीं होता हूँ ।। स्थितो<हं निर्भर: शान्त: कार्यकारणभावन: । अविद्यया तरन् मृत्युं विद्यया तं तथामृतम् ।। यथाप्राप्तं तु संदृेश्य वसामीह विमत्सर: । “कार्य-कारणरूप परमात्माका चिन्तन करता हुआ मैं सदा शान्तभावसे उन्हींपर निर्भर रहता हूँ। कर्मोके अनुष्ठानसे मृत्युको पार करके ज्ञानके द्वारा अमृतमय परमात्माका साक्षात्कार कर चुका हूँ और प्रारब्धवश जो कुछ प्रिय-अप्रिय पदार्थ प्राप्त होता है, उसको समानभावसे देखता हुआ मैं ईर्ष्या-द्रेषसे रहित होकर यहाँ निवास करता हूँ ।। क्रीते व्यवसितं भद्रे भर्ताहं ते वृणीष्व माम् ।। तत: सुवर्चला दृष्ट्वा प्राह तं द्विजसत्तमम् । “भद्रे! मैं तुम्हारा उचित शुल्क चुकानेका निश्चय कर चुका हूँ और तुम्हारा भरण-पोषण करनेमें समर्थ हूँ; अतः तुम मेरा वरण करो।” यह सुनकर सुवर्चलाने द्विजश्रेष्ठ श्वेतकेतुकी ओर देखकर कहा ।। युवर्चलोवाच मनसासि वृतो विद्वन् शेषकर्ता पिता मम । वृणीष्व पितरं महामेष वेदविधिक्रम: ।। सुवर्चला बोली--विद्वन्! मैंने अपने हृदयसे आपका वरण कर लिया। शास्त्रमें कथित शेष कार्योंकी पूर्ति करनेवाले मेरे पिताजी हैं। आप उनसे मुझे माँग लीजिये। यही वेदविहित मर्यादा है ।। भीष्म उवाच तद् विज्ञाय पिता तस्या देवलो मुनिसत्तम: । श्वेतकेतुं च सम्पूज्य तथैवोद्दालकेन तम् ।। मुनीनामग्रत: कन्यां प्रददौ जलपूर्वकम् | भीष्मजी कहते हैं--राजन्! यह सब वृत्तान्त जानकर सुवर्चलाके पिता मुनिश्रेष्ठ देवलने उददालकसहित श्वेतकेतुकी पूजा करके मुनियोंके सामने जलसे संकल्प करके अपनी कन्या श्वेतकेतुको दे दी ।। उदाहरन्ति वै तत्र श्वेतकेतुं निरीक्ष्य तम् ।। हृत्पुण्डरीकनिलय: सर्वभूतात्मको हरि: । श्वेतकेतुस्वरूपेण स्थितो5सौ मधुसूदन: ।। वहाँ श्वेतकेतुको देखकर ऋषिगण इस प्रकार कहने लगे--मानो यहाँ श्वेतकेतुके रूपमें सबके हृदय-कमलमें निवास करनेवाले, सर्वभूतस्वरूप श्रीहरि भगवान् मधुसूदन ही विराजमान हैं ।। देवल उवाच प्रीयतां माधवो देव: पत्नी चेयं सुता मम । प्रतिपादयामि ते कनन््यां सहधर्मचरीं शुभाम् ।। देवल बोले--वररूपमें विराजमान ये भगवान् लक्ष्मीपति प्रसन्न हों। यह मेरी पुत्री इन्हें पत्नीरूपसे समर्पित है। प्रभो! मैं आपको कल्याणमयी सहधर्मिणीके रूपमें अपनी यह कन्या दे रहा हूँ ।। भीष्म उवाच इत्युक्त्वा प्रददौ तस्मै देवलो मुनिपुड्रव: । प्रतिगृह्य च तां कन्यां श्वेतकेतुर्महायशा: ।। उपयम्य यथान्यायमत्र कृत्वा यथाविधि । समाप्य तन्त्रं मुनिभिर्वेैवाहिकमनुत्तमम् ।। स गार्हस्थ्ये वसन् धीमान् भार्या तामिदमब्रवीत् ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन्! ऐसा कहकर मुनिवर देवलने उन्हें कन्यादान कर दिया। महायशस्वी श्वेतकेतुने उस कनन््याको लेकर उसके साथ यथोचितरूपसे विधि-पूर्वक विवाह किया। फिर मुनियोंद्वारा कराये हुए परम उत्तम वैवाहिक विधानको पूर्ण करके गृहस्थ- आश्रममें रहते हुए बुद्धिमान् श्वेतकेतुने अपनी उस धर्मपत्नीसे इस प्रकार कहा ।। श्षेतकेतुरुवाच यानि चोक्तानि वेदेषु तत् सर्व कुरु शो भने । मया सह यथान्यायं सहधर्मचरी मम ।। श्वेतकेतुने कहा--शोभने! वेदोंमें जिन शुभ कर्मोंका विधान है, मेरे साथ रहकर उन सबका यथोचितरूपसे अनुष्ठान करो और यथार्थरूपसे मेरी सहधर्मचारिणी बनो ।। अहमित्येव भावेन स्थितो<हं त्वं तथैव च । तस्मात् कर्माणि कुर्वीथा: कुर्या ते च तत: परम् ।। मैं इसी भावसे स्थित हूँ। तुम भी इसी भावसे स्थित रहना, अतः मेरी आज्ञाके अनुसार सारे कर्म करो, फिर मैं भी तुम्हारा प्रिय कार्य करूँगा ।। न ममेति च भावेन ज्ञानाग्निनिलयेन च । अनन्तरं तथा कुर्यास्तानि कर्माणि भस्मसात् ।। एवं त्वया च कर्तव्यं सर्वदादुर्भगा मया । यद् यदाचरति श्रेष्ठ: तत् तदेवेतरो जन: ।। तस्माल्लोकस्य सिद्धयर्थ कर्तव्यं चात्मसिद्धये ।। तदनन्तर “ये सब कर्म मेरे नहीं हैं और मैं इनका कर्ता नहीं हूँ” इस भावसे ज्ञानान्निद्वारा उन सब कर्मोंको भस्म कर डालो, तुम परम सौभाग्यवती हो। तुम्हें सदा इसी तरह ममता और अहंकारसे रहित होकर कर्म करना चाहिये और मुझे भी ऐसा ही करना चाहिये। श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है वैसे ही दूसरे लोग भी करते हैं, अतः लोकव्यवहारकी सिद्धि तथा आत्मकल्याणके लिये हम दोनोंको कर्मोंका अनुष्ठान करते रहना चाहिये ।। भीष्म उवाच उक्त्वैवं स महाप्राज्ञ: सर्वज्ञानैकभाजन: । पुत्रानुत्पाद्य तस्यां च यज्ञै: संतर्प्प देवता: ।। आत्मयोगपरो नित्य निर्दधन्द्धो निष्परिग्रह: | भीष्मजी कहते हैं--राजन! ऐसा उपदेश देकर सम्पूर्ण ज्ञानके एकमात्र निधि महाज्ञानी श्वेतकेतुने सुवर्चलाके गर्भसे अनेक पुत्र उत्पन्न किये। यज्ञोंद्वारा देवताओंको संतुष्ट किया; फिर आत्मयोगमें नित्य तत्पर रहकर वे निर्द्धन्द्र एवं परिग्रहशून्य हो गये ।। भार्या तां सदृशी प्राप्य बुद्धि क्षेत्रज्ञयोरिव । लोकमन्यमनुप्राप्ती भार्या भर्ता तथैव च ।। साक्षिभूतौ जगत्यस्मिंश्वरमाणौ मुदान्वितौ | अपने अनुरूप पत्नीको पाकर श्वेतकेतु उसी प्रकार सुशोभित होते थे, जैसे बुद्धिको पाकर क्षेत्रज्ञ। वे दोनों पति-पत्नी लोकान्तरमें भी पहुँच जाते थे और इस जगतमें साक्षीकी भाँति स्थित होकर प्रसन्नतापूर्वक विचरते थे ।। ततः कदाचिद् भर्तरं श्वेतकेतुं सुवर्चला । पप्रच्छ को भवानत्र ब्रहि मे तद् द्विजोत्तम । तामाह भगवान् वाग्मी त्वया ज्ञातो न संशय: ।। द्विजोत्तमेति मामुक्त्वा पुन: कमनुपृच्छसि । तदनन्तर एक दिन सुवर्चलाने अपने पति श्वेतकेतुसे पूछा--'द्विजश्रेष्ठी] आप कौन हैं, यह मुझे बताइये!” उस समय प्रवचन-कुशल भगवान् श्वेतकेतुने उससे कहा--'देवि! तुमने मेरे विषयमें जान ही लिया है, इसमें संदेह नहीं है। तुमने द्विजश्रेष्ठ कहकर मुझे सम्बोधित भी किया है; फिर उस द्विजश्रेष्ठके सिवा और किसको पूछ रही हो?” ।। सा तमाह महात्मानं पृच्छामि हृदि शायिनम् ।। तब सुवर्चलाने अपने महात्मा पतिसे कहा--“नाथ! मैं हृदय-गुफामें शयन करनेवाले आत्माको पूछती हूँ ।। तच्छुत्वा प्रत्युवाचैनां स न वक्ष्यति भामिनि | नामगोत्रसमायुक्तमात्मानं मन्यसे यदि । तन्मिथ्या गोत्रसद्धावे वर्तते देहबन्धनम् ।। यह सुनकर श्वेतकेतुने उससे कहा--“भामिनि! वह तो कुछ कहेगा नहीं। यदि तुम आत्माको नाम और गोत्रसे युक्त मानती हो तो यह तुम्हारी मिथ्या धारणा है; क्योंकि नाम- गोत्र होनेपर देहका बन्धन प्राप्त होता है ।। अहमित्येष भावो>त्र त्वयि चापि समाहित: । त्वमप्यहमहं सर्वमहमित्येव वर्तते ।। नात्र तत् परमार्थ वै किमर्थमनुपृच्छसि ।। 'आत्मामें अहम् (मैं हूँ) यह भाव स्थापित किया गया है। तुममें भी वही भाव है। तुम भी अहम, मैं भी अहम् और यह सब अहमका ही रूप है। इसमें वह परमार्थतत्त्व नहीं है; फिर किसलिये पूछती हो?” ।। ततः प्रहस्य सा हृष्टा भर्तारें धर्मचारिणी । उवाच वचन काले स्मयमाना तदा नृप ।। नरेश्वर! तब धर्मचारिणी पत्नी सुवर्चला बहुत प्रसन्न हुई, उसने हँसकर मुस्कराते हुए यह समयोचित्त वचन कहा ।। युवर्चलोवाच किमनेकप्रकारेण विरोधेन प्रयोजनम् । क्रियाकलापैर्रह्यार्षे ज्ञाननष्टोडसि सर्वदा ।। तनमे ब्रूहि महाप्राज्ञ यथाहं त्वामनुव्रता ।। सुवर्चला बोली--ब्रह्मर्ष! अनेक प्रकारके विरोधसे क्या प्रयोजन? सदा इस नाना प्रकारके क्रिया-कलापमें पड़कर आपका ज्ञान लुप्त होता जा रहा है। अतः महाप्राज्ञ! आप मुझे इसका कारण बताइये, क्योंकि मैं आपका अनुसरण करनेवाली हूँ ।। श्षेतकेतुरुवाच यद् यदाचरति श्रेष्ठ: तत् तदेवेतरों जन: । वर्तते तेन लोको<5यं संकीर्णश्र भविष्यति ।। श्वेतकेतुने कहा--प्रिये! श्रेष्ठ पुरुष जो-जो आचरण करता है, वही दूसरे लोग भी करते हैं; अतः हमारे कर्म त्याग देनेसे यह सारा जनसमुदाय संकरताके दोषसे दूषित हो जायगा ।। संकीर्णे च तथा धर्मे वर्णसंकरमेति च । संकरे च प्रवृत्ते तु मात्स्यो न्याय: प्रवर्तते ।। इस प्रकार धर्ममें संकीर्णता आनेपर प्रजामें वर्ण-संकरता फैल जाती है और संकरता फैल जानेपर सर्वत्र मात्स्यन्यायकी प्रवृत्ति हो जाती है (जैसे प्रबल मत्स्य दुर्बल मत्स्यको निगल जाते हैं, उसी प्रकार बलवान मनुष्य दुर्बलोंको सताने लगते हैं) ।। तदनिष्ट हरेर्भद्रे धातुरस्य महात्मन: । परमेश्वरसंक्रीडा लोकसृष्टिरियं शुभे ।। भद्रे! सम्पूर्ण जगत्का भरण-पोषण करनेवाले परमात्मा श्रीहरिको यह अभीष्ट नहीं है। शुभे! जगत्की यह सारी सृष्टि परमेश्वरकी क्रीड़ा है ।। यावत् पांसव उद्दिष्टास्तावत्यो5स्य विभूतय: । तावत्यश्ैव मायास्तु तावत्यो<स्याश्व शक्तय: ।। धूलिके जितने कण हैं, उतनी ही परमेश्वर श्रीहरिकी विभूतियाँ हैं, उतनी ही उनकी मायाएँ हैं और उतनी ही उन मायाओंकी शक्तियाँ भी हैं ।। एवं सुगद्नरे मुक्तो यत्र मे तद्भवा भवम् | छित्त्वा ज्ञानासिना गच्छेत् स विद्वान् स च मे प्रिय: ।। सो5हमेव न संदेह: प्रतिज्ञा इति तस्य वै ।। स्वयं भगवान् नारायणका कथन है कि “जो मुक्तिलाभके लिये उद्योगशील पुरुष अत्यन्त गहन गुफामें रहकर ज्ञानरूप खड़्गके द्वारा जन्म-मृत्युके बन्धनको काटकर मेरे धामको चला जाता है, वही विद्वान् है और वही मुझे प्रिय है। वह योगी पुरुष मैं ही हूँ। इसमें संदेह नहीं है” यह भगवानकी प्रतिज्ञा है ।। ये मूढास्ते दुरात्मानो धर्मसंकरकारका: । मर्यादाभेदका नीचा नरके यान्ति जन्तव:ः । आसुरीं योनिमापन्ना इति देवानुशासनम् ।। 'जो मूढ़, दुरात्मा, धर्मसंकरता उत्पन्न करनेवाले, मर्यादाभेदक और नीच मनुष्य हैं, वे नरकमें गिरते हैं और आसुरी योनिमें पड़ते हैं, यह भी उन्हीं भगवान्का अनुशासन है” ।। भगवत्या तथा लोके रक्षितव्यं न संशय: । मर्यादालोकरक्षार्थमेवमस्मि तथा स्थित: ।। देवि! तुम्हें भी जगत्की रक्षाके लिये लोकमर्यादाका पालन करना चाहिये। इसमें संशय नहीं है। मैं भी इसी भावसे लोक-मर्यादाकी रक्षामें स्थित हूँ ।। युवर्चलोवाच शब्द: को>त्र इति ख्यातस्तथार्थश्न महामुने । आकृत्यापि तयोर्रूहि लक्षणेन पृथक् पृथक् ।। सुवर्चलाने पूछा--महामुने! यहाँ शब्द किसे कहा गया है और अर्थ भी क्या है? आप उन दोनोंकी आकृति और लक्षणका निर्देश करते हुए उनका पृथक्-पृथक् वर्णन कीजिये ।। श्षेतकेतुरुवाच व्यत्ययेन च वर्णानां परिवादकृतो हि यः । स शब्द इति विज्ञेयस्तन्निपातो<र्थ उच्यते ।। श्वेतकेतुने कहा--अकार आदि वर्णोके समुदायको क्रम या व्यतिक्रमसे उच्चारण करनेपर जो वस्तु प्रकाशित होती है, उसे “शब्द” जानना चाहिये और उस शब्दसे जिस अभिप्रायकी प्रतीति हो, उसका नाम “अर्थ” है ।। युवर्चलोवाच शब्दार्थयोहि सम्बन्धस्त्वनयोरस्ति वा न वा । तन्मे ब्रूहि यथातत्त्वं शब्दस्थाने<र्थ एव चेत् ।। सुवर्चला बोली--यदि शब्दके होनेपर ही अर्थकी प्रतीति होती है तो इन शब्द और अर्थमें कोई सम्बन्ध है या नहीं? यह आप मुझे यथार्थरूपसे बतावें ।। श्षेतकेतुरुवाच शब्दार्थयोर्न चैवास्ति सम्बन्धो5त्यन्त एव हि । पुष्करे च यथा तोयं तथास्तीति च वेत्थ तत् ।। श्वेतकेतुने कहा--शब्द और अर्थमें एक प्रकारसे कोई नियत सम्बन्ध नहीं है। कमलके पत्तेपर स्थित जलकी भाँति शब्द एवं अर्थका अनियत सम्बन्ध है, ऐसा जानो ।। युवर्चलोवाच अर्थ स्थितिरहिं शब्दस्य नान्यथा च स्थितिर्भवेत् । विद्यते चेन्महाप्राज्ञ विनार्थ ब्रूहि सत्तम ।। सुवर्चला बोली--महाप्राज्ञ! अर्थपर ही शब्दकी स्थिति है, अन्यथा उसकी स्थिति नहीं हो सकती। साधु-शिरोमणे! यदि बिना अर्थका कोई शब्द हो तो उसे बताइये ।। श्षेतकेतुरुवाच स संसर्गो$तिमात्रस्तु वाचकत्वेन वर्तते । अस्ति चेद् वर्तते नित्यं विकारोच्चारणेन वै ।। श्वेतकेतुने कहा--अर्थके साथ शब्दका वाचकत्वरूप सम्बन्ध है और वह सम्बन्ध नित्य है। यदि शब्द है तो उसका अर्थ भी सदा है ही। विपरीत क्रमसे उच्चारण करनेपर भी शब्दका कुछ-न-कुछ अर्थ होता ही है (जैसे नदी, दीन इत्यादि) ।। युवर्चलोवाच शब्दस्थानोजत्र इत्युक्तस्तथार्थ इति मे कृतम् । अर्थास्थितो न तिषछेच्च विरूढमिह भाषितम् ।। सुवर्चला बोली--शब्द अर्थात् वेदका आधार है अर्थभूत परमात्मा। ऐसा ही दिद्वानोंने कहा है और यही मेरा भी मत है। उस अर्थका आधार लिये बिना तो शब्द टिक ही नहीं सकता। परंतु आप तो इनमें कोई नियत सम्बन्ध ही नहीं मानते हैं, अतः आपका कथन प्रसिद्धिके विपरीत है ।। श्षेतकेतुरुवाच न विकूलोऊत्र कथितो नाकाशं हि विना जगत् । सम्बन्धस्तत्र नास्त्येव तद्वदित्येष मन्यताम् ।। श्वेतकेतुने कहा--मैंने प्रसिद्धिके विपरीत कुछ नहीं कहा है। देखो, आकाशके बिना पृथ्वी अथवा पार्थिव जगत् टिक नहीं सकता तथापि इनमें कोई नित्य सम्बन्ध नहीं है। शब्द और अर्थका सम्बन्ध भी वैसा ही मानना चाहिये ।। युवर्चलोवाच सदाहड्कारशब्दो<यं व्यक्तमात्मनि संश्रित: । न वाचत्तत्र वर्तन्ते इति मिथ्या भविष्यति ।। सुवर्चला बोली--यह “अहम्' शब्द सदा ही आत्माके अर्थमें स्पष्टरूपसे प्रयुक्त होता है; परंतु “यतो वाचो निवर्तन्ते” इस श्रुतिके अनुसार वहाँ वाणीकी पहुँच नहीं है; अतः आत्माके लिये “अहम्' पदका प्रयोग भी मिथ्या ही होगा ।। श्षेतकेतुरुवाच अहंशब्दो हाहंभावो नात्मभावे शुभव्ते | न वर्तते परेडचिन्त्ये वाच: सगुणलक्षणा: ।। श्वेतकेतुने कहा--शुभव्रते! अहम् शब्दका आत्म-भावमें प्रयोग नहीं होता; किंतु अहम् भावका ही आत्म-भावमें प्रयोग होता है; क्योंकि सगुण पदार्थके बोधक वचन अचिन्त्य परब्रह्म परमात्माका बोध करानेमें असमर्थ हैं ।। मृण्मये हि घटे भावस्तादग्भाव इह्ेष्यते | अयं भाव: परे<चिन्त्ये ह्वात्मभावो यथा च तत् ।। जैसे मिट्टीके घड़ेमें मृत्तिका-भाव होता है, उसी प्रकार परमात्मासे उत्पन्न हुए प्रत्येक पदार्थमें परमात्मभाव अभीष्ट है; अतएव अचिन्त्य परब्रह्म परमात्मामें अहम् भाव ही आत्मभाव है और वही यथार्थ है ।। अहं त्वमेतदित्येव परे संकल्पना मया । तस्माद् वाचो न वर्तन्त इति नैव विरुध्यते ।। मैं', “तुम/ और “यह“--ये सब नाम परब्रह्म परमात्मामें हमलोगोंद्वारा कल्पित हैं (वास्तविक नहीं है), अतः “उस परमात्मातक वाणीकी पहुँच नहीं हो पाती" श्रुतिके इस कथनसे कोई विरोध नहीं है ।। तस्माद् वामेन वर्तन्ते मनसा भीरु सर्वश: । यथाकाशगतं विश्वृं संसक्तमिव लक्ष्यते ।। अतएव भीरु! मनुष्य भ्रान्तचित्तद्वारा ही अहम् आदि पदोंका प्रयोग करता है। जैसे आकाशकमें स्थित सम्पूर्ण विश्व उसमें सटा हुआ-सा दीखता है, उसी प्रकार परमात्मामें स्थित हुआ सारा दृश्य-प्रपंच उससे जुड़ा हुआ-सा जान पड़ता है ।। संसर्गे सति सम्बन्धात् तद् विकारं भविष्यति । अनाकाशगतं सर्व विकारे च सदा गतम् ।। ब्रह्यके साथ जगत्का जो सम्बन्ध है, उसी सम्बन्धसे यह उसीका कार्य जान पड़ता है। जैसे सारा जगत् आकाशसे पृथक् है तो भी उसके विकारोंसे सम्बन्ध होनेके कारण सदा उससे मिश्रित ही रहता है, उसी प्रकार जगत्से ब्रह्मका कोई सम्पर्क नहीं है तो भी यह उसीसे उत्पन्न होनेके कारण तद्रूप माना जाता है ।। तद् ब्रह्म परमं शुद्धमनौपम्यं न शक््यते । न दृश्यते तथा तच्च दृश्यते च मतिर्मम ।। वह ब्रह्म परम शुद्ध और उपमारहित है; अतः वाणी-द्वारा उसका वर्णन नहीं किया जा सकता। इन चर्मचक्षुओंसे उसको नहीं देखा जा सकता है तथा ज्ञानदृष्टिसे उसका साक्षात्कार होता है, ऐसा मेरा मत है ।। युवर्चलोवाच निर्विकारं हामूर्ति च निरयं सर्वगं तथा । दृश्यते च वियन्नित्यं दृगात्मा तेन दृश्यते ।। सुवर्चला बोली--तब तो यह मानना होगा कि जिस प्रकार निर्विकार, निराकार, निःसीम और सर्वव्यापी आकाशका सर्वदा ही दर्शन होता है, उसीके समान ज्ञानस्वरूप आत्माका भी दर्शन होता है ।। श्षेतकेतुरुवाच त्वचा स्पृशति वै वायुमाकाशस्थं॑ पुन: पुन: । तत्स्थं गन्धं तथा5पघ्राति ज्योति: पश्यति चक्षुषा ।। श्वेतकेतुने कहा--मनुष्य त्वचाद्वारा आकाशमें स्थित वायुका बारंबार स्पर्श करता है, नासिकाद्वारा आकाशवर्ती गन्धको बारंबार सूँघता है और नेत्रद्वारा आकाशस्थित ज्योतिका दर्शन करता है ।। तमोरश्मिगणश्नैव मेघजालं तथैव च । वर्ष तारागणं चैव नाकाशं दृश्यते पुनः ।। इसके सिवा अन्धकार, किरणसमूह, मेघोंकी घटा, वर्षा तथा तारागणका भी बारंबार दर्शन होता है; परंतु आकाश दृष्टिगोचर नहीं होता ।। आकाश स्याप्यथाकाशं सद्रूपमिति निश्चितम् । तदर्थे कल्पिता होते तत् सत्यो विष्णुरेव च ।। सत्स्वरूप परमात्मा उस आकाशका भी आकाश है, अर्थात् उसे भी अवकाश देनेवाला महाकाश है; यह निश्चित है, उन्हींके लिये और उन्हींके द्वारा इस सम्पूर्ण जगत्की सृष्टि हुई है। वे ही सत्य तथा सर्वव्यापी हैं ।। यानि नामानि गौणानि ह्युपचारात् परात्मनि । न चक्षुषा न मनसा न चान्येन परो विभु: ।। चिन्त्यते सूक्ष्मया बुद्धया वाचा वक्तुं न शक््यते । भगवानके जो गुण-सम्बन्धी नाम हैं, वे परमात्मामें औपचारिक हैं। नेत्र, मन तथा अन्य किसी इन्ट्रियके द्वारा भी उस सर्वव्यापी परमात्माका ग्रहण नहीं हो सकता। वाणीद्वारा भी उनका वर्णन नहीं किया जा सकता। केवल सूक्ष्म बुद्धिद्वारा उनका चिन्तन एवं साक्षात्कार किया जा सकता है ।। एतत् प्रपठचमखिलं तस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम् महाघटो<ल्पकश्नैव यथा मह्ां प्रतिष्ठित ।। यह सारा प्रपंच (समष्टि एवं व्यष्टि-जगत) उन्हीं परमात्मामें प्रतेष्ठित है। ठीक उसी तरह, जैसे बड़ा और छोटा घड़ा पृथ्वीपर स्थित होते हैं ।। न चस्त्री न पुमांश्चैव तथैव न नपुंसक: । केवलज्ञानमात्र तत् तस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम् ।। वह परमात्मा न स्त्री है, न पुरुष है और न नपुंसक ही है, केवल ज्ञानस्वरूप है। उसीके आधारपर यह सम्पूर्ण जगत् प्रतिष्ठित है ।। भूमिसंस्थानयोगेन वस्तुसंस्थानयोगत: । रसभेदा यथा तोये प्रकृत्यामात्मनस्तथा ।। जैसे एक ही जलमें मृत्तिकाविशेष एवं बीज आदि द्रव्यविशेषके संयोगसे रसभेद उत्पन्न होते हैं, उसी प्रकार प्रकृति और आत्माके संयोगसे गुण-कर्मके अनुसार अनेक प्रकारकी सृष्टि प्रकट होती है ।। तद्वाक्यस्मरणान्नित्यं तृप्तिं वारि पिबन्निव । प्राप्रोति ज्ञानमखिलं तेन तत् सुखमेधते ।। जैसे प्यासा मनुष्य पानी पीकर तृप्ति लाभ करता है, उसी प्रकार साधक ब्रह्मबबोधक वाक्यको स्मरण करके सदा तृप्ति एवं सम्पूर्ण ज्ञान प्राप्त करता है और उस ज्ञानसे उसका सुख उत्तरोत्तर अभ्युदयको प्राप्त होता है ।। युवर्चलोवाच अनेन साध्यं कि स्याद् वै शब्देनेति मतिर्मम । वेदगम्य: परोडचिन्त्य इति पौराणिका विदु: ।। निरर्थको यथा लोके तद्वत् स्थादिति मे मति: । निरीक्ष्यैवं यथान्यायं वक्तुमहसि मेडनघ ।। सुवर्चला बोली--निष्पाप मुने! इस शब्दसे क्या सिद्ध होनेवाला है? मेरी तो ऐसी धारणा है कि शब्दसे कुछ भी होने-जानेवाला नहीं है। परंतु पौराणिक विद्वान् ऐसा मानते हैं कि परमात्मा अचिन्त्य एवं वेदगम्य हैं। जैसे लोकमें बहुत-से शब्द निरर्थक होते हैं, उसी प्रकार वैदिक शब्द भी हो सकते हैं। मेरी बुद्धिमें तो यही बात आती है; अत: आप इस विषयमें यथोचित विचार करके मुझे यथार्थ बात बतानेकी कृपा करें ।। श्षेतकेतुरुवाच वेदगम्यं परं शुद्धमिति सत्या परा श्रुति: । व्याहत्या नैतदित्याह व्युपलिडज़्े च वर्तते ।। श्वेतकेतुने कहा--'शुद्धस्वरूप परब्रह्म परमात्मा वेदगम्य हैं" श्रुतिका यह कथन परम सत्य है। इस विषयमें नास्तिकोंका कहना है कि परब्रह्मकी प्रत्यक्ष उपलब्धि न होनेसे उक्त श्रुतिका कथन व्याघात दोषसे दूषित होनेके कारण सत्य नहीं है। इसका उत्तर आस्तिक यों देते हैं कि सूक्ष्म शरीरविशिष्ट स्थूल देहमें जीवात्मारूपसे परब्रह्मकी ही उपलब्धि होती है; अतः: श्रुतिका पूर्वाक्त कथन यथार्थ ही है ।। निरर्थको न चैवास्ति शब्दो लौकिक उत्तमे | अनन्वयास्तथा शब्दा निरर्था इति लौकिकै: ।। उत्तम अंगोंवाली देवि! कोई लौकिक शब्द भी निरर्थक नहीं है; फिर वैदिक शब्द तो व्यर्थ हो ही कैसे सकता है। जिन शब्दोंका परस्पर अन्वय नहीं होता--जो एक दूसरेसे असम्बद्ध होते हैं, उन्हींको लौकिक पुरुष निरर्थक बताते हैं ।। गृहान्ते तद्वदित्येव न वर्तन्ते परात्मनि । अगोचरत्वं वचसां युक्तमेवं तथा शुभे ।। किंतु शुभे! लौकिक शब्दोंकी ही भाँति वैदिक शब्द भी यद्यपि सार्थक समझे जाते हैं, तथापि वे साक्षात् परमात्माका बोध करानेमें असमर्थ हैं; क्योंकि परमात्माको वाणीका अगोचर बताया गया है और उनकी अगोचरता युक्तिसंगत भी है ।। साधनस्योपदेशाच्च हयुपायस्य च सूचनात् । उपलक्षणयोगेन व्यावृत्या च प्रदर्शनात् ।। वेदगम्य: पर: शुद्ध इति मे धीयते मति: । वेदोंमें ब्रह्म णी उपासना अथवा उसकी प्राप्तिके साधनका उपदेश है। उपासनाके उपाय भी सूचित किये गये हैं। (जैसे ग्रहणकालमें चन्द्रमा और सूर्यके साथ राहुका दर्शन होता है उसी प्रकार) उपलक्षण-योगसे प्रत्येक शरीरमें जीवात्मारूपसे ब्रह्मकी ही स्थितिका प्रदर्शन किया गया है। इसके सिवा नेति-नेति आदि निषेधात्मक वचनोंद्वारा अनात्मवस्तुके बाधपूर्वक ब्रह्मके स्वरूपकी ओर संकेत किया गया है। इसलिये शुद्धस्वरूप परमात्मा एकमात्र वेदगम्य हैं, यही मेरी सुनिश्चित धारणा है ।। अध्यात्मध्यानसम्भूतं भूतं दीपवत् स्फुटम् ।। ज्ञाने विद्धि शुभाचारे तेन यान्ति परां गतिम् । शुभ आचरणोंवाली देवि! तुम्हें यह विदित हो कि अध्यात्मतत्त्वके चिन्तनसे नित्य-ज्ञान दीपककी भाँति स्पष्टरूपसे प्रकाशित होने लगता है। उस ज्ञानसे मनुष्य परमगतिको प्राप्त होते हैं ।। यदि मे व्याह्तं गुहां श्रुत॑ न तु त्वया शुभे ।। तथ्यमित्येव वा शुद्धे ज्ञानं ज्ञानविलोचने । शुभे! शुद्धस्वरूपे! ज्ञानदृष्टिसे सम्पन्न देवि! मैंने यह जो गूढ़ एवं यथार्थ ब्रह्मज्ञानका विषय बताया है, इसे तुमने सुना है या नहीं? ।। नानारूपवदस्यैवमैश्वर्य दृश्यते शुभे । न वायुस्तन्न सूर्यस्तन्नाग्निस्तत् तु परं पदम् ।। अनेन पूर्णमेतद्धि हृदि भूतमिहेष्यते । शुभे! परब्रह्म परमात्माका एऐश्वर्य नाना रूपोंमें दिखायी देता है। वायुकी वहाँतक पहुँच नहीं है। सूर्य और अग्नि उस परमपदस्वरूप परमेश्वरको प्रकाशित नहीं कर सकते। परमात्मासे ही यह सम्पूर्ण जगत् परिपूर्ण है और वे ही प्रत्येक प्राणीके हृदयमें आत्मारूपसे निवास करते हैं ।। एतावदात्मविज्ञानमेतावद् यदहं स्मृतम् ।। आवयोर्न च सत्त्वे वै तस्मादज्ञानबन्धनम् । इतना ही परमात्मविज्ञान है। इतना ही अहम् पदार्थ माना गया है। हम दोनोंकी सत्ता नित्य नहीं है, ऐसी धारणा अज्ञानके कारण होती है ।। भीष्म उवाच एवं सुवर्चला ह्ृष्टा प्रोक्ता भरत्रा यथार्थवत् । परिचर्यमाणा हरुनिशं तत्त्वबुद्धिसमन्विता ।। भीष्मजी कहते हैं--राजन्! अपने पति श्वेतकेतुके इस प्रकार यथार्थ उपदेश देनेपर सुवर्चला आनन्दमग्न हो गयी। वह निरन्तर तत्त्वज्ञाननिष्ठ रहकर तदनुरूप आचरण करने लगी |। भर्ता च तामनुप्रेक्ष्य नित्यनैमित्तिकान्वित: । परमात्मनि गोविन्दे वासुदेवे महात्मनि ।। समाधाय च कर्माणि तन्मयत्वेन भावित: । कालेन महता राजन प्राप्नोति परमां गतिम् ।। श्वेतकेतु पत्नीको साथ रखकर नित्य-नैमित्तिक कर्मोमें संलग्न रहते थे। वे सबके हृदयमें निवास करनेवाले महामना परमात्मा गोविन्दको अपने समस्त कर्म समर्पित करके उन्हींके ध्यानमें तन्मय रहा करते थे। राजन्! इस प्रकार दीर्घकालतक परमात्मचिन्तन करके उन्होंने परमगति प्राप्त कर ली ।। एतत् ते कथितं राजन् यस्मात् त्वं परिपृच्छसि । गार्हस्थ्यं च समाधाय गतौ जायापती परम् ।।) नरेश्वर! तुमने जो प्रश्न किया था, उसके उत्तरमें मैंने यह प्रसंग सुनाया है। इस प्रकार वे दोनों पति-पत्नी गृहस्थधर्मका आश्रय लेकर परमात्माको प्राप्त हो गये ।। युधिछिर उवाच कि कुर्वन् सुखमाप्रोति कि कुर्वन् दुःखमाप्तुयात् । कि कुर्वन्निर्भयो लोके सिद्धश्चरति भारत,युधिष्ठिरने पूछा--भारत! मनुष्य क्या उपाय करनेसे सुख पाता है; क्या करनेसे दुःख उठाता है और कौन-सा काम करनेसे वह सिद्धकी भाँति संसारमें निर्भय होकर विचरता है इस प्रकार श्रीमह्याभारत शान्तिपर्वके अन्तर्गत मोक्षधर्मपर्वमें दमकी प्रशंसाविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ २२० ॥। (दाक्षिणात्य अधिक पाठका १०८६ “लोक मिलाकर कुल १२८३ श्लोक हैं) न२््च्य्नःिनाय्स ध््यु #ः--ानततज्स - “चष्टे इति चक्षु::--जो देखता है, वह चक्षु है। इस व्युत्पत्तिके अनुसार सर्वद्रष्टा परमात्मा ही चक्षु: पदका वाच्यार्थ है। एकविशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: व्रत, तप, उपवास, ब्रह्मचर्य तथा अतिथिसेवा आदिका विवेचन तथा यज्ञशिष्ट अन्नका भोजन करनेवालेको परम उत्तम गतिकी प्राप्तिका कथन युधिछिर उवाच द्विजातयो व्रतोपेता यदिदं भुज्जते हवि: । अन्न ब्राह्गकामाय कथमेतत् पितामह
ယုဓိဋ္ဌိရက ပြောသည်– «အဘိုးတော်၊ ဝတ္တရား (vrata) များကို ထိန်းသိမ်းသော ဒွိဇ (နှစ်ကြိမ်မွေး) တို့သည် ယဇ္ဉပူဇာအလှူ ‘ဟဝိစ်’ (havis) ကို အစာအဖြစ် စားသုံးကြသည်မှာ အဘယ်ကြောင့်နည်း။ ရည်မှန်းချက်သည် ဗြဟ္မန် (Brahman) — အမြင့်ဆုံးသော ဝိညာဉ်ရေးအကျိုးကို ရှာဖွေခြင်းဖြစ်လျှင်—ဤစားသုံးမှုကို မည်သို့ နားလည်သင့်သနည်း»
Verse 2
भीष्म उवाच दममेव प्रशंसन्ति वृद्धा: श्रुतिसमाधय: । सर्वेषामेव वर्णानां ब्राह्मणस्य विशेषत:,भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! मनोयोगपूर्वक वेदार्थका विचार करनेवाले वृद्ध पुरुष सामान्यतः सभी वर्णोके लिये और विशेषतः: ब्राह्मणके लिये मन और इन्द्रियोंके संयमरूप “दम' की ही प्रशंसा करते हैं
ဘိဿမက ပြောသည်– «ယုဓိဋ္ဌိရ၊ ဝေဒ၏ အဆုံးအဖြတ်များ၌ တည်ကြည်သော အိုမင်းပညာရှိတို့သည် ‘ဒမ’—ကိုယ်ကိုထိန်းချုပ်ခြင်းကိုသာ ချီးမွမ်းကြသည်။ အလုံးစုံသော ဝဏ္ဏများအတွက် ချီးမြှောက်ကြပြီး၊ အထူးသဖြင့် ဗြာဟ္မဏအတွက်ပင် ဖြစ်သည်—စိတ်နှင့် အင်္ဂါရုံတို့ကို အနိုင်ယူခြင်းသည် မှန်ကန်သော အကျင့်နှင့် ဝိညာဉ်ရေး ကြည်လင်မှု၏ အမြစ်ဖြစ်သောကြောင့်။»
Verse 3
नादान्तस्य क्रियासिद्धिर्यथावदुपपद्यते । क्रिया तपश्च सत्यं च दमे सर्व प्रतिष्ठितम्,जिसने दमका पालन नहीं किया है, उसे अपने कर्मोमें यथोचित सफलता नहीं मिलती; क्योंकि क्रिया, तप और सत्य--ये सभी दमके आधारपर ही प्रतिष्ठित होते हैं
ဘိဿမက ပြောသည်– «ကိုယ်ကိုမထိန်းချုပ်သူအတွက် လုပ်ဆောင်မှုတို့၏ မှန်ကန်သော အောင်မြင်မှု မပေါ်ထွန်းနိုင်။ အကြောင်းမှာ ကရိယာ (လုပ်ငန်း), တပ (တပဿ), နှင့် သစ္စာ—ဤအရာအားလုံးသည် ‘ဒမ’ ဆိုသော ကိုယ်ထိန်းချုပ်မှုကို အခြေခံ၍သာ တည်မြဲနေကြသည်။»
Verse 4
दमस्तेजो वर्धयति पवित्र दम उच्यते । विपाप्मा निर्भयो दान्त: पुरुषो विन्दते महत्,“दम” तेजकी वृद्धि करता है। “दम” परम पवित्र बताया गया है, मन और इन्द्रियोंका संयम करनेवाला पुरुष पाप और भयसे रहित होकर “महत्” पदको प्राप्त कर लेता है
ဘိဿမက ပြောသည်– «‘ဒမ’ သည် အတွင်းတောက်ပမှုနှင့် အင်အား (တေဇ) ကို တိုးပွားစေသည်။ ထို့ကြောင့် ဒမကို အလွန်သန့်ရှင်းစေသော အရာဟု ခေါ်ကြသည်။ စိတ်နှင့် အင်္ဂါရုံတို့ကို အနိုင်ယူထားသူသည် အပြစ်နှင့် ကြောက်ရွံ့ခြင်းမှ လွတ်ကင်းကာ ‘မဟတ်’—အမြင့်မြတ်သော အခြေအနေကို ရရှိသည်။»
Verse 5
सुखं दान्त: प्रस्वपिति सुखं च प्रतिबुद्धयते । सुखं लोके विपर्येति मनश्नास्य प्रसीदति,दमका पालन करनेवाला मनुष्य सुखसे सोता, सुखसे जागता और सुखसे ही संसारमें विचरता है तथा उसका मन भी प्रसन्न रहता है
ဘိဿမက ပြောသည်– «ကိုယ်ကိုထိန်းချုပ်သူသည် သက်သာစွာ အိပ်ပျော်ပြီး သက်သာစွာ နိုးထလာသည်။ လောက၌ သွားလာနေထိုင်ရာတွင်လည်း အေးချမ်းလွယ်ကူပြီး၊ သူ၏စိတ်လည်း တည်ငြိမ်ကြည်လင်နေသည်။»
Verse 6
तेजो दमेन धप्रियते तन्न तीक्ष्णोडधिगच्छति । अमित्रांश्व बहुन् नित्यं पृथगात्मनि पश्यति,दमसे ही तेजको धारण किया जाता है, जिसमें दमका अभाव है, वह तीव्र कामवाला रजोगुणी पुरुष उस तेजको नहीं धारण कर सकता और सदा काम, क्रोध आदि बहुत-से शत्रुओंको अपनेसे पृथक् अनुभव करता है
ဘိဿမက ပြောသည်—တောက်ပသော တေဇောနှင့် အတွင်းစွမ်းအားသည် ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်မှု (ဒမ) ဖြင့်သာ တည်တံ့နိုင်သည်။ ထိန်းချုပ်မှုမရှိဘဲ ထက်မြက်လွန်း၍ အလျင်အမြန် လှုပ်ရှားတတ်သူသည် ထိုရောင်ခြည်ကို အမှန်တကယ် မထိန်းသိမ်းနိုင်။ တဏှာက လှုံ့ဆော်သော ရဇဂုဏ်ပေါ်မူတည်သူသည် ကာမနှင့် ကရောဓတို့ကဲ့သို့သော ရန်သူများစွာကို မိမိနှင့် ကွဲပြားသကဲ့သို့ အမြဲမြင်ရ၍ အတွင်းစိတ်ကွဲပြားကာ အားနည်းလွယ်သည်။
Verse 7
क्रव्याद्धय इव भूतानामदान्तेभ्य: सदा भयम् | तेषां विप्रतिषेधार्थ राजा सृष्ट: स्वयम्भुवा,जिन्होंने मन और इन्द्रियोंका दमन नहीं किया है, उनसे समस्त प्राणियोंको उसी प्रकार सदा भय बना रहता है, जैसे मांसभक्षी व्याप्र आदि जन्तुओंसे भय हुआ करता है। ऐसे उद्दण्ड मनुष्योंकी उच्छुंखल प्रवृत्तिको रोकनेके लिये ही ब्रह्माजीने राजाकी सृष्टि की है
ဘိဿမက ပြောသည်—စိတ်နှင့် အင်္ဒြိယများကို မထိန်းချုပ်သူများကြောင့် သတ္တဝါအားလုံးသည် အမြဲတမ်း ကြောက်ရွံ့နေရသည်၊ အသားစားတိရစ္ဆာန်များကို ကြောက်သကဲ့သို့ပင်။ ထို့ကြောင့် ထိုကဲ့သို့ အမိုက်မဲ၍ စည်းကမ်းမဲ့သော လူတို့၏ လွတ်လပ်ရမ်းကားသော လှုပ်ရှားမှုကို တားဆီးရန်အတွက် ကိုယ်တိုင်ပေါ်ထွန်းသော ဖန်ဆင်းရှင်က မင်းအုပ်ချုပ်မှုကို ပေါ်ထွန်းစေခဲ့သည်။
Verse 8
आश्रमेषु च सर्वेषु दम एव विशिष्यते । यच्च तेषु फल धर्मे भूयो दान्ते तदुच्यते,चारों आश्रमोंमें दमको ही श्रेष्ठ बताया गया है। उन सब आश्रमोंमें धर्मका पालन करनेसे जो फल मिलता है, दमनशील पुरुषको वह फल और अधिक मात्रामें उपलब्ध होता है
ဘိဿမက ပြောသည်—အသက်တာအဆင့်လေးပါး (အာရှရမ) အားလုံးတွင် ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်မှု (ဒမ) သည် အထူးကောင်းမြတ်ဆုံးဟု ကြေညာထားသည်။ ထိုအာရှရမများအတွင်း ဓမ္မကို ကျင့်သုံးခြင်းဖြင့် ရရှိသော အကျိုးफलသည်ပင် ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်နိုင်သူထံတွင် ပိုမိုကြီးမားစွာ စုပေါင်းရရှိသည်ဟု ဆိုကြသည်။
Verse 9
तेषां लिड्जानि वक्ष्यामि येषां समुदयो दम: । अकार्पण्यमसंरम्भ: संतोष: श्रद्दधानता,अब मैं उन लक्षणोंका वर्णन करूँगा, जिनकी उत्पत्तिमें दम ही कारण है। कृपणताका अभाव, उत्तेजनाका न होना, संतोष, श्रद्धा, क्रोधका न आना, नित्य सरलता, अधिक बकवाद न करना, अभिमानका त्याग, गुरुसेवा, किसीके गुणोंमें दोषदृष्टि न करना, समस्त जीवोंपर दया करना, किसीकी चुगली न करना, लोकापवाद, असत्यभाषण तथा निन्दा- स्तुति आदिको त्याग देना, सत्पुरुषोंके संगकी इच्छा तथा भविष्यमें आनेवाले सुखकी स्पृहा और दु:खकी चिन्ता न करना--
ဘိဿမက ပြောသည်—ယခု ငါသည် ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်မှု (ဒမ) ကို အမြစ်အမြစ်အနက်အနက် အခြေခံထားသောသူတို့၏ လက္ခဏာများကို ပြောမည်။ ထိုလက္ခဏာများမှာ—လောဘကပ်ခြင်းကင်းခြင်း၊ စိတ်လှုပ်ရှား၍ အလျင်အမြန် မပြုခြင်း၊ ကျေနပ်တတ်ခြင်း၊ နှင့် ယုံကြည်ခြင်းတည်ငြိမ်ခြင်းတို့ ဖြစ်သည်။
Verse 10
अक्रोध आर्जवं नित्यं नातिवादो5भिमानिता । गुरुपूजानसूया च दया भूतेष्वपैशुनम्,अब मैं उन लक्षणोंका वर्णन करूँगा, जिनकी उत्पत्तिमें दम ही कारण है। कृपणताका अभाव, उत्तेजनाका न होना, संतोष, श्रद्धा, क्रोधका न आना, नित्य सरलता, अधिक बकवाद न करना, अभिमानका त्याग, गुरुसेवा, किसीके गुणोंमें दोषदृष्टि न करना, समस्त जीवोंपर दया करना, किसीकी चुगली न करना, लोकापवाद, असत्यभाषण तथा निन्दा- स्तुति आदिको त्याग देना, सत्पुरुषोंके संगकी इच्छा तथा भविष्यमें आनेवाले सुखकी स्पृहा और दु:खकी चिन्ता न करना--
ဘိဿမက ပြောသည်—ဒေါသကင်းခြင်း၊ အမြဲတမ်း ဖြောင့်မတ်ရိုးသားခြင်း၊ အလွန်အကျွံ အငြင်းပွားခြင်း မပြုခြင်း၊ မာနကင်းခြင်း၊ ဆရာကို ရိုသေကန်တော့ခြင်း၊ အပြစ်ရှာ၍ မနာလိုခြင်းကင်းခြင်း၊ သတ္တဝါအားလုံးအပေါ် ကရုဏာထားခြင်း၊ နှင့် အပြစ်တင်ပြောဆိုခြင်း (စကားဆိုး) ကို ရှောင်ကြဉ်ခြင်း—ဤတို့သည် ဓမ္မကို ထောက်ပံ့သော ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်မှု (ဒမ) နှင့် အတွင်းစည်းကမ်း၏ လက္ခဏာများ ဖြစ်သည်။
Verse 11
जनवादमृषावादस्तुतिनिन्दाविवर्जनम् | साधुकामश्न स्पृहयेन्नायतिं प्रत्ययेषु च,अब मैं उन लक्षणोंका वर्णन करूँगा, जिनकी उत्पत्तिमें दम ही कारण है। कृपणताका अभाव, उत्तेजनाका न होना, संतोष, श्रद्धा, क्रोधका न आना, नित्य सरलता, अधिक बकवाद न करना, अभिमानका त्याग, गुरुसेवा, किसीके गुणोंमें दोषदृष्टि न करना, समस्त जीवोंपर दया करना, किसीकी चुगली न करना, लोकापवाद, असत्यभाषण तथा निन्दा- स्तुति आदिको त्याग देना, सत्पुरुषोंके संगकी इच्छा तथा भविष्यमें आनेवाले सुखकी स्पृहा और दु:खकी चिन्ता न करना--
ဘီရှ္မက ပြောသည်။ လူသည် လူထုအတင်းအဖျင်း၊ မုသာစကားနှင့် ချီးမွမ်းခြင်း၊ ရှုတ်ချခြင်းတို့ကို ရှောင်ကြဉ်ရမည်။ သဒ္ဓါရှိသော သုစရိုက်သူတော်ကောင်းတို့၏ အပေါင်းအသင်းကို လိုလားသော်လည်း လောဘတဏှာကင်းရမည်—လာမည့်အရာကို မတောင့်တမိစေ၊ မျှော်လင့်ချက်နှင့် အာမခံချက်တို့အပေါ် စိုးရိမ်စွာ မမှီခိုစေ။ ဤအရာတို့သည် စိတ်ကို တည်ငြိမ်စေ၍ ဓမ္မလမ်းစဉ်ကို ထောက်ပံ့သော ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်မှု၏ လက္ခဏာများ ဖြစ်သည်။
Verse 12
अवैरकृत् सूपचार: समो निन्दाप्रशंसयो: । सुवृत्त: शीलसम्पन्न: प्रसन्नात्मा55त्मवान् प्रभु:
ဘီရှ္မက ဆိုသည်။ «သူသည် ရန်ငြိုးမထား၊ ယဉ်ကျေးသိမ်မွေ့စွာ ပြုမူတတ်၏။ အပြစ်တင်ခြင်းနှင့် ချီးမွမ်းခြင်းကြားတွင် စိတ်ညီမျှတည်ငြိမ်၏။ အကျင့်ကောင်း၍ သီလပြည့်စုံကာ အတွင်းစိတ် သာယာငြိမ်းချမ်း၏။ ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်နိုင်ပြီး အာဏာရှိသကဲ့သို့ သီလဂုဏ်၌ မလှုပ်မယှက် တည်၏»။
Verse 13
दुर्गमं सर्वभूतानां प्रायपन् मोदते सुखी,दमनशील पुरुष समस्त प्राणियोंको दुर्लभ वस्तुएँ देकर--दूसरोंको सुख पहुँचाकर स्वयं सुखी और प्रमुदित होता है। जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगा रहता और किसीसे द्वेष नहीं करता है, वह बहुत बड़े जलाशयकी भाँति गम्भीर होता है। उसके मनमें कभी क्षोभ नहीं होता तथा वह सदा ज्ञानानन्दसे तृप्त एवं प्रसन्न रहता है
ဘီရှ္မက ဆိုသည်။ ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်နိုင်သောသူသည် သတ္တဝါအားလုံးအတွက် ရယူရန်ခက်ခဲသောအရာများကို ပေးကမ်းရာတွင် ပျော်ရွှင်မှုကို တွေ့၏။ အခြားသူတို့ကို ချမ်းသာစေခြင်းဖြင့် သူကိုယ်တိုင်လည်း ချမ်းသာ၍ အလွန်ပျော်မြူး၏။ သတ္တဝါအားလုံး၏ အကျိုးကို အမြဲလိုက်လံဆောင်ရွက်ပြီး မည်သူ့ကိုမျှ မုန်းတီးမထားသူသည် ရေကန်ကြီးတစ်ကန်ကဲ့သို့ နက်ရှိုင်းတည်ငြိမ်၏။ သူ၏စိတ်၌ မည်သည့်လှုပ်ရှားမှုမျှ မရှိ; ဉာဏ်မှ ပေါက်ဖွားသော အာနန္ဒဖြင့် အမြဲတမ်း ပြည့်ဝ၍ သာယာငြိမ်းချမ်းနေ၏။
Verse 14
सर्वभूतहिते युक्तो न सम यो द्विषते जनम् | महाह्द इवाक्षो भ्य: प्रज्ञातृप्त: प्रसीदति,दमनशील पुरुष समस्त प्राणियोंको दुर्लभ वस्तुएँ देकर--दूसरोंको सुख पहुँचाकर स्वयं सुखी और प्रमुदित होता है। जो सम्पूर्ण प्राणियोंके हितमें लगा रहता और किसीसे द्वेष नहीं करता है, वह बहुत बड़े जलाशयकी भाँति गम्भीर होता है। उसके मनमें कभी क्षोभ नहीं होता तथा वह सदा ज्ञानानन्दसे तृप्त एवं प्रसन्न रहता है
ဘီရှ္မက ပြောသည်။ သတ္တဝါအားလုံး၏ အကျိုးကို အလေးထား၍ မည်သူ့ကိုမျှ မုန်းတီးမထားသူသည် မလှုပ်မယှက်—ရေကန်ကြီးတစ်ကန်ကဲ့သို့ နက်ရှိုင်းတည်ငြိမ်၏။ ထိုကဲ့သို့ ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်နိုင်သောသူသည် သတ္တဝါတို့၏ အကျိုးအတွက် ရယူရန်ခက်ခဲသောအရာများကိုပင် ပေးကမ်း၍ အခြားသူတို့ကို ချမ်းသာစေသဖြင့် ကိုယ်တိုင်လည်း ပျော်ရွှင်လာ၏။ သူ၏စိတ်သည် မည်သည့်အခါမျှ မလှုပ်ရှား; ဉာဏ်မှ ပေါက်ဖွားသော ကျေနပ်မှုကြောင့် အမြဲတမ်း သာယာငြိမ်းချမ်း၍ ပြည့်ဝနေ၏။
Verse 15
अभयं यस्य भूतेभ्य: सर्वेषामभयं यत: । नमस्य: सर्वभूतानां दान्तो भवति बुद्धिमान्,जो समस्त प्राणियोंसे निर्भय है तथा जिससे सम्पूर्ण प्राणी निर्भय हो गये हैं, वह दमनशील एवं बुद्धिमान् पुरुष सब जीवोंके लिये वन्दनीय होता है
ဘီရှ္မက ပြောသည်။ သတ္တဝါအားလုံးအပေါ် မကြောက်မရွံ့သော၊ ထို့ပြင် သူကြောင့် သတ္တဝါအားလုံးလည်း ကြောက်ရွံ့မှုကင်းသွားသော ပညာရှိနှင့် ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်နိုင်သူသည် သက်ရှိအားလုံးအတွက် ဂုဏ်ပြုလေးစားထိုက်သူ ဖြစ်လာ၏။ ထိုသူသည် အင်အားဖြင့် မဟုတ်ဘဲ၊ မိမိပတ်ဝန်းကျင်ကို လုံခြုံစိတ်ချစေခြင်းဖြင့် ဓမ္မကို ကိုယ်စားပြု၏။
Verse 16
न हृष्यति महत्यर्थे व्यसने च न शोचति । स वै परिमितप्रज्ञ: स दान्तो द्विज उच्यते,जो बहुत बड़ी सम्पत्ति पाकर हर्षसे फूल नहीं उठता और संकटमें पड़नेपर शोक नहीं करता, वह द्विज सूक्ष्म बुद्धिसे युक्त एवं जितेन्द्रिय कहलाता है
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်—ကြီးမားသော ဥစ္စာ သို့မဟုတ် အောင်မြင်မှု ရလာသော်လည်း မလွန်ကဲစွာ ဝမ်းမြောက်မနေသူ၊ အကျပ်အတည်း ကျရောက်သော်လည်း မဝမ်းနည်းမပျက်သူ—ထိုသူကို ဉာဏ်ပမာဏရှိ၍ အာရုံအင်္ဂါများကို ထိန်းချုပ်နိုင်သော «ဒွိဇ» (dvija) ဟု ခေါ်ကြသည်။ သင်ခန်းစာသည် အတွင်းစိတ်တည်ငြိမ်မှုကို ချီးမွမ်းသည်—ရရှိခြင်း၊ ဆုံးရှုံးခြင်းထက် စိတ်ညီညာ၍ စည်းကမ်းတကျ နေတတ်ခြင်းက စာရိတ္တရင့်ကျက်မှု၏ အမှတ်အသား ဖြစ်သည်။
Verse 17
कर्मशि: श्रुतिसम्पन्न: सद्धिराचरितै: शुचि: । सदैव दमसंयुक्तस्तस्य भुड्नक्ते महाफलम्,जो वेदशास्त्रोंका ज्ञाता और सत्पुरुषोंद्वारा आचरणमें लाये हुए शुभ कर्मोसे पवित्र है तथा जिसने सदा ही दमका पालन किया है, वह अपने शुभकर्मका महान् फल भोगता है
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်—ဓမ္မကံကို အလေးထား၍ ဆောင်ရွက်သူ၊ ဝေဒပညာနှင့် ပြည့်စုံသူ၊ သီလဝါဒသူတော်ကောင်းတို့ လက်တွေ့ကျင့်သုံးသော ကုသိုလ်ကံများကြောင့် သန့်စင်သူ၊ ထို့ပြင် အမြဲတမ်း ဒမ (ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်မှု) နှင့် ယှဉ်တွဲနေသူ—ထိုသူသည် မိမိကောင်းကံ၏ ကြီးမားသော အကျိုးကို အမှန်တကယ် ခံစားရသည်။
Verse 18
अनसूया क्षमा शान्ति: संतोष: प्रियवादिता । सत्यं दानमनायासो नैष मार्गों दुरात्मनाम्,किसीके दोष न देखना, हृदयमें क्षमाभाव रखना, शान्ति, संतोष, मीठे वचन बोलना, सत्य, दान तथा क्रियामें परिश्रमका बोध न होना--से सदगुण हैं। दुरात्मा पुरुष इस मार्गसे नहीं चलते हैं
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်—အပြစ်ရှာမနေခြင်း၊ ခွင့်လွှတ်နိုင်ခြင်း၊ အတွင်းစိတ်ငြိမ်းချမ်းမှု၊ ကျေနပ်တတ်ခြင်း၊ ချိုသာစွာ ပြောဆိုခြင်း၊ သစ္စာတရား၊ လှူဒါန်းခြင်း၊ လုပ်ဆောင်ရာတွင် ပင်ပန်းတယ်ဟု မခံစားဘဲ ဆောင်ရွက်နိုင်ခြင်း—ဤအရာတို့သည် ကောင်းမြတ်သူတို့၏ ဂုဏ်သတ္တိများ ဖြစ်သည်။ မကောင်းသောစိတ်သဘောရှိသူတို့သည် ဤလမ်းကို မလျှောက်ကြ။
Verse 19
कामक्रोधौ च लोभश्व परस्येष्याविकत्थना । कामक्रोधौ वशे कृत्वा ब्रह्मचारी जितेन्द्रिय:,उनमें तो काम, क्रोध, लोभ, दूसरोंके प्रति डाह और अपनी झूठी प्रशंसा आदि दुर्गुण ही भरे रहते हैं; इसलिये उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्णको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय होकर काम और क्रोधको वशमें करे तथा ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उत्साहके साथ घोर तपस्यामें संलग्न हो जाय एवं मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ विघ्न-बाधाओंसे रहित हो धैर्यपूर्वक सम्पूर्ण जगत्में विचरे
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်—ကာမ (လိုချင်တပ်မက်မှု) နှင့် က்ரောဓ (ဒေါသ)၊ ထို့ပြင် လောဘ၊ အခြားသူတို့အပေါ် မနာလိုမှု၊ ကိုယ်ကိုယ်တိုင်ကို မဟုတ်မမှန် ချီးကျူးဝါကြွားမှု—ဤအပြစ်တို့သည် ထိုကဲ့သို့သောသူများကို ပြည့်နှက်စေသည်။ ထို့ကြောင့် အမြင့်မြတ်၍ တင်းကျပ်သော ဝရတ (သစ္စာကတိ) ကို ထိန်းသိမ်းသော ဗြာဟ္မဏသည် ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်နိုင်သူ ဖြစ်ရမည်—ကာမနှင့် ဒေါသကို အာဏာအောက်သို့ ချုပ်ကိုင်၍ ဗြဟ္မစရိယ (brahmacarya) ကို စောင့်ထိန်းကာ တည်ကြည်သော အားထုတ်မှုဖြင့် ပြင်းထန်သော တပသ (တပဿ) တွင် ပါဝင်ရမည်။ အတားအဆီးကင်းစွာ သည်းခံခြင်းဖြင့် ကမ္ဘာလောကတစ်လျှောက် လှည့်လည်ကာ သတ်မှတ်ထားသော သေချိန်ကို စောင့်ဆိုင်းရမည်။
Verse 20
विक्रम्य घोरे तपसि ब्राह्मण: संशितव्रत: । कालाकाड्क्षी चरेललोकान् निरपाय इवात्मवान्,उनमें तो काम, क्रोध, लोभ, दूसरोंके प्रति डाह और अपनी झूठी प्रशंसा आदि दुर्गुण ही भरे रहते हैं; इसलिये उत्तम एवं कठोर व्रतका पालन करनेवाले ब्राह्णको चाहिये कि वह जितेन्द्रिय होकर काम और क्रोधको वशमें करे तथा ब्रह्मचर्यपालनपूर्वक उत्साहके साथ घोर तपस्यामें संलग्न हो जाय एवं मृत्युकालकी प्रतीक्षा करता हुआ विघ्न-बाधाओंसे रहित हो धैर्यपूर्वक सम्पूर्ण जगत्में विचरे
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်—ကောင်းစွာ ချွန်ထက်အောင် ထိန်းသိမ်းထားသော ဝရတများဖြင့် တည်ကြည်သော ဗြာဟ္မဏသည် ပြင်းထန်သော တပသ၌ အားထုတ်ရမည်။ ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်မှုဖြင့် ကမ္ဘာလောကတို့ကို လှည့်လည်ကာ (သေချိန်) ကံကြမ္မာသတ်မှတ်ထားသော အချိန်ကို စောင့်ဆိုင်းရမည်—အန္တရာယ်ကင်းသကဲ့သို့ တည်ငြိမ်၍ မလှုပ်ရှားမပျက်၊ အတားအဆီးကင်းစွာ နေရမည်။
Verse 126
प्राप्प लोके च सत्कारं स्वर्ग वै प्रेत्य गच्छति । जितेन्द्रिय पुरुष किसीके साथ वैर नहीं करता। उसका सबके साथ अच्छा बर्ताव होता है। वह निन्दा और स्तुतिमें समान भाव रखनेवाला, सदाचारी, शीलवान्, प्रसन्नचित्त, धैर्यवान् तथा दोषोंका दमन करनेमें समर्थ होता है। वह इहलोकमें सम्मान पाता और मृत्युके पश्चात् स्वर्गलोकमें जाता है
ဘီရှ္မက မိန့်ကြားသည်– မိမိအင်္ဒြိယများကို ထိန်းချုပ်နိုင်သောသူသည် မည်သူ့အပေါ်မျှ ရန်ငြိုးမထား၊ အားလုံးနှင့် ကောင်းမွန်စွာ ဆက်ဆံပြုမူသည်။ အပြစ်တင်ခြင်းနှင့် ချီးမွမ်းခြင်းတို့၌ စိတ်တည်ငြိမ်ညီမျှ၍ သမာဓိနှင့် သာသနာတရားအတိုင်း နေထိုင်ကာ ယဉ်ကျေးသိမ်မွေ့၊ စည်းကမ်းရှိ၊ စိတ်ပျော်ရွှင်၊ သတ္တိတည်ကြည်ပြီး မိမိ၏ ချို့ယွင်းချက်များကို ထိန်းနှိမ်နိုင်သည်။ ထိုသို့သောသူသည် ဤလောက၌ ဂုဏ်သိက္ခာရပြီး သေပြီးနောက် စွဝ်ဂလောကသို့ ရောက်သည်။
Verse 220
इति श्रीमहाभारते शान्तिपर्वणि मोक्षधर्मपर्वणि दमप्रशंसायां विंशत्यधिकद्धिशततमो< ध्याय:
ဤသို့ဖြင့် သီရိမဟာဘာရတ၏ ရှာန္တိပရဝ၌ ပါဝင်သော မောက္ခဓမ္မ အပိုင်းအတွင်း၊ ကိုယ်တိုင်ထိန်းချုပ်ခြင်း (ဒမ) ကို ချီးမွမ်းသည့် ဆွေးနွေးချက်ဖြစ်သော အခန်း နှစ်ရာနှစ်ဆယ် ပြီးဆုံး၏။
Yudhiṣṭhira asks what is truly beneficial for a person overwhelmed by calamity—especially when kinship networks, wealth, or political authority collapse—seeking a standard of conduct under severe loss.
Bali argues for equanimity grounded in kāla: fortunes and defeats rotate; pride in victory and despair in loss are both errors; disciplined composure and present-focused conduct are the practical basis for stability.
Yes: by embedding a mythic-political exemplum inside Bhīṣma’s instruction, the chapter operationalizes rājadharma as psychological governance—training the ruler to interpret power as transient and to respond with restraint rather than triumphalism or grief.