
Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न उठता है—यात्रा, गृहप्रवेश, कर्मारम्भ, देवयज्ञ और श्राद्ध जैसे अवसरों पर कौन-सा जप ‘कर्मसाधन’ बनकर शान्ति, पुष्टि, रक्षा और भय-निवारण कर सकता है। → भीष्म उत्तर को एक ही मन्त्र में नहीं बाँधते; वे नाम-स्मरण की विशाल परम्परा खोलते हैं—देवताओं, सप्तर्षियों, ध्रुव, अश्विनीकुमारों, रुद्र-गणों, विनायक-गणेश, तथा राजर्षि पृथु आदि के कीर्तन का क्रम, और बताते हैं कि किस प्रकार यह स्मरण दिशाओं में अधिष्ठित ऋषियों तक फैलकर लोक-कल्याण का साधन बनता है। → भीष्म ‘नाममाला’ के प्रत्यक्ष फल का घोष करते हैं—क्षेत्र में पढ़ने से सस्य-प्ररोह, मार्ग में पढ़ने से क्षेम-यात्रा, ग्रामान्तर में भी सुरक्षा; और नित्य देव-सप्तर्षि-ध्रुव-स्मरण से कष्ट-निवारण तथा अशुभ से मुक्ति—यहीं अध्याय का प्रभाव-शिखर आता है। → अध्याय एक सार्वभौम निष्कर्ष पर टिकता है—समस्त पूज्य नामों का प्रयत्नपूर्वक कीर्तन करने वाला पापों से छूटता है और धर्म-अर्थ-काम की सिद्धि पाता है; जप को ‘जीवन-व्यवहार’ के हर संस्कार में प्रतिष्ठित कर दिया जाता है।
Verse 1
(दाक्षिणात्य अधिक पाठके २ श्लोक मिलाकर कुल १४४ श्लोक हैं) ऑपन--माज छा | जि पजञज्चाशर्दाधिकशततमोब् ध्याय: जपनेयोग्य मन्त्र और सबेरे-शाम कीर्तन करनेयोग्य देवता, ऋषियों और राजाओंके मंगलमय नामोंका कीर्तन- माहात्म्य तथा गायत्रीजपका फल युधिछिर उवाच पितामह महाप्राज्ञ सर्वशास्त्रविशारद । कि जप्यं जपतो नित्यं भवेद् धर्मफलं महत्,युधिष्ठिरने पूछा--पितामह! आप महाज्ञानी और सम्पूर्ण शास्त्रोंके विशेषज्ञ हैं। अतः मैं पूछता हूँ कि प्रतिदिन किस स्तोत्र या मन्त्रका जप करनेसे धर्मके महान् फलकी प्राप्ति हो सकती है?
युधिष्ठिर म्हणाला—पितामह! आपण महाप्राज्ञ आणि सर्व शास्त्रांचे विशारद आहात. म्हणून मी विचारतो—दररोज कोणत्या मंत्राचा किंवा स्तोत्राचा जप केल्याने, नित्य जप करणाऱ्यास, धर्माचे महान फल प्राप्त होते?
Verse 2
प्रस्थाने वा प्रवेशे वा प्रवृत्ते वापि कर्मणि । दैवे वा श्राद्धकाले वा कि जप्यं कर्मसाधनम्,यात्रा, गृहप्रवेश अथवा किसी कर्मका आरम्भ करते समय, देवयज्ञमें या श्राद्धुके समय किस मन्त्रका जप करनेसे कर्मकी पूर्ति हो जाती है?
युधिष्ठिर म्हणाला—प्रवासाला निघताना, घरात प्रवेश करताना, किंवा कोणतेही कार्य सुरू करताना; देवयज्ञात किंवा श्राद्धकाळी—कर्मसिद्धीसाठी कोणत्या मंत्राचा जप करावा?
Verse 3
शान्तिकं पौष्टिक॑ रक्षा शत्रुघ्न भयनाशनम् | जप्यं यद् ब्रह्म॒समितं तद् भवान् वक्तुमहति,शान्ति, पुष्टि, रक्षा, शत्रुनाश तथा भय-निवारण करनेवाला कौन-सा ऐसा जपनीय मन्त्र है, जो वेदके समान माननीय है? आप उसे बतानेकी कृपा करें
युधिष्ठिर म्हणाला—शांती, पुष्टी, रक्षा, शत्रुनाश आणि भय-निवारण करणारा, वेदासमान मान्य असा कोणता जपनीय मंत्र आहे? कृपा करून तो सांगावा।
Verse 4
भीष्म उवाच व्यासप्रोक्तमिमं मन्त्र शुणुष्वैकमना नृप । सावितन्र्या विहित॑ दिव्यं सद्य: पापविमोचनम्,भीष्मजीने कहा--राजन्! महर्षि वेदव्यासका बताया हुआ यह एक मन्त्र है, उसे एकाग्रचित्त होकर सुनो। सावित्री देवीने इस दिव्यमन्त्रकी सृष्टि की है तथा यह तत्काल ही पापसे छुटकारा दिलानेवाला है
भीष्म म्हणाले—राजन्, व्यासांनी सांगितलेला हा मंत्र एकाग्रचित्ताने ऐक. सावित्रीदेवीने स्थापित केलेला हा दिव्य मंत्र तात्काळ पापमुक्ती देणारा आहे.
Verse 5
शृणु मन्त्रविधिं कृत्स्नं प्रोच्यमानं मयानघ । य॑ श्रुत्वा पाण्डवश्रेष्ठ सर्वपापै: प्रमुच्यते,अनघ! पाण्डवश्रेष्ठ! मैं इस मन्त्रकी सम्पूर्ण विधि बताता हूँ, सुनो। उसे सुनकर मनुष्य सब पापोंसे मुक्त हो जाता है
अनघ! पांडवश्रेष्ठ! या पवित्र मंत्राची संपूर्ण विधी मी सांगत आहे, ऐक. तो ऐकल्यावर मनुष्य सर्व पापांतून मुक्त होतो.
Verse 6
रात्रावहनि धर्मज्ञ जपन् पापैर्न लिप्यते । तत् ते5हं सम्प्रवक्ष्यामि शूणुष्वैकमना नूप,धर्मज्ञ नरेश्वर! जो रात-दिन इस मन्त्रका जप करता है, वह पापोंसे लिप्त नहीं होता। वही मन्त्र मैं तुम्हें बता रहा हूँ, एकचित्त होकर सुनो
धर्मज्ञ नरेश्वर! जो रात्रंदिवस या मंत्राचा जप करतो तो पापांनी लिप्त होत नाही. तोच मंत्र मी तुला सांगत आहे; राजन्, एकाग्रचित्ताने ऐक.
Verse 7
आयुष्मान् भवते चैव यं श्रुत्वा पार्थिवात्मज । पुरुषस्तु सुसिद्धार्थ: प्रेत्य चेह च मोदते,राजकुमार! जो इस मन्त्रको सुनता है, वह पुरुष दीर्घजीवी तथा सफलमनोरथ होता है, इहलोक और परलोकमें भी आनन्द भोगता है
राजकुमार! जो हा मंत्र ऐकतो तो दीर्घायुषी होतो आणि त्याचे सर्व हेतू सिद्ध होतात. तो इहलोकातही आणि परलोकातही आनंदित राहतो.
Verse 8
सेवितं सततं राजन पुरा राजर्षिसत्तमै: । क्षत्रधर्मपरैर्नित्यं सत्यव्रतपरायणै:,राजन! प्राचीनकालमें क्षत्रियरधर्मका पालन करनेवाले और सदा सत्य व्रतके आचरणमें संलग्न रहनेवाले राजर्षिशिरोमणि इस मन्त्रका सदा ही जप किया करते थे
राजन्! प्राचीन काळी क्षत्रधर्मात नित्य तत्पर आणि सत्यव्रताला दृढ असलेले श्रेष्ठ राजर्षी या (मंत्र/अनुष्ठान) चे सतत सेवन करीत; ते याचा अखंड जप करीत.
Verse 9
इदमाद्विकमव्यग्रं कुर्वद्धिर्नियतैः सदा । नृपैर्भरतशार्टूल प्राप्यते श्रीरनुत्तमा,भरतसिंह! जो राजा मन और इन्द्रियोंको वशमें करके शान्तिपूर्वक प्रतिदिन इस मन्त्रका जप करते हैं, उन्हें सर्वोत्तम सम्पत्ति प्राप्त होती है
हे भरतशार्दूल! जे राजे मन व इंद्रिये संयमून, नित्य अव्यग्र व शांतचित्ताने या मंत्राचा जप करतात, त्यांना अनुत्तम श्री व परम समृद्धी प्राप्त होते।
Verse 10
नमो वसिष्ठाय महाव्रताय पराशरं वेदनिधि नमस्ये । नमो>स्त्वनन्ताय महोरगाय नमोस्तु सिद्धेभ्य इहाक्षयेभ्य:,(यह मन्त्र इस प्रकार है--) महान् व्रतधारी वसिष्ठको नमस्कार है, वेदनिधि पराशरको नमस्कार है, विशाल सर्परूपधारी अनन्त (शेषनाग)-को नमस्कार है, अक्षय सिद्धगणको नमस्कार है, ऋषिवृन्दको नमस्कार है तथा परात्पर, देवाधिदेव, वरदाता परमेश्वरको नमस्कार है एवं सहस्र मस्तकवाले शिवको और सहस्रों नाम धारण करनेवाले भगवान् जनार्दनको नमस्कार है
महाव्रतधारी वसिष्ठांना नमस्कार; वेदनिधी पराशरांना मी प्रणाम करतो। महोरगरूप अनंताला नमस्कार असो; आणि येथे स्थित अक्षय सिद्धगणांना नमस्कार असो।
Verse 11
(यह मन्त्र इस प्रकार है--) महान् व्रतधारी वसिष्ठको नमस्कार है, वेदनिधि पराशरको नमस्कार है, विशाल सर्परूपधारी अनन्त (शेषनाग)-को नमस्कार है, अक्षय सिद्धगणको नमस्कार है, ऋषिवृन्दको नमस्कार है तथा परात्पर, देवाधिदेव, वरदाता परमेश्वरको नमस्कार है एवं सहस्र मस्तकवाले शिवको और सहस्रों नाम धारण करनेवाले भगवान् जनार्दनको नमस्कार है
हा मंत्र असा जपला जातो—महाव्रतधारी वसिष्ठांना नमस्कार; वेदनिधी पराशरांना नमस्कार; विशाल महोरगरूप अनंत (शेष) याला नमस्कार; येथे स्थित अक्षय सिद्धगणांना नमस्कार; ऋषिवृंदांना नमस्कार; तसेच परात्पर, देवाधिदेव, वरदाता परमेश्वराला नमस्कार। सहस्रमस्तक शिवाला नमस्कार आणि सहस्रनामधारी भगवान् जनार्दनाला नमस्कार।
Verse 12
अजैकपादहिर्बु धन्य: पिनाकी चापराजित: । ऋतश्न पितृरूपश्च त्रयम्बकश्न महेश्वर:,अजैकपाद, अहिर्बुध्य, पिनाकी, अपराजित, ऋत, पितृरूप त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर--ये ग्यारह रुद्र विख्यात हैं; जो तीनों लोकोंके स्वामी हैं
अजैकपाद, अहिर्बुध्न्य, धन्य, पिनाकी, अपराजित, ऋतश्न, पितृरूप, त्र्यम्बक आणि महेश्वर—हे रुद्राचे विख्यात रूप आहेत।
Verse 13
नमो<स्त्वृषिभ्य: परमं परेषां देवेषु देवं वरदं वराणाम् सहस्रशीर्षाय नम: शिवाय सहस्ननामाय जनार्दनाय,वृषाकपिश्न शम्भुश्न हवनो<थेश्वरस्तथा । एकादशैते प्रथिता रुद्रास्त्रिभुवनेश्वरा: अजैकपाद, अहिर्बुध्य, पिनाकी, अपराजित, ऋत, पितृरूप त्र्यम्बक, महेश्वर, वृषाकपि, शम्भु, हवन और ईश्वर--ये ग्यारह रुद्र विख्यात हैं; जो तीनों लोकोंके स्वामी हैं
परमांमध्ये परम अशा ऋषींना नमस्कार. देवांमध्ये देव, वरांमध्ये श्रेष्ठ वरदाता याला नमस्कार. सहस्रमस्तक शिवाला नमस्कार; सहस्रनामधारी जनार्दनाला नमस्कार. वृषाकपि, शम्भु, हवन तसेच ईश्वर—हे एकादश रुद्र म्हणून विख्यात आहेत; ते त्रिभुवनाचे अधीश्वर आहेत।
Verse 14
शतमेतत् समाम्नातं शतरुद्रे महात्मनाम् । अंशो भगश्न मित्रश्न वरुणश्ष जलेश्वर:,इत्येते द्वादशादित्या: काश्यपेया इति श्रुति: । वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें महात्मा रुद्रके सैकड़ों नाम बताये गये हैं। अंश, भग, मित्र, जलेश्वर, वरुण, धाता, अर्यमा, जयन्त, भास्कर, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र तथा विष्णु--ये बारह आदित्य कहलाते हैं। ये सब-के-सब कश्यपके पुत्र हैं
भीष्म म्हणाले—शतरुद्र-प्रकरणात महात्मा रुद्राची शंभर नावे परंपरेने पठित केली जातात. अंश, भग, मित्र, जलाधीश्वर वरुण इत्यादी—हे द्वादश आदित्य म्हणून प्रसिद्ध आहेत; आणि श्रुती सांगते की हे सर्व कश्यपाचे पुत्र आहेत.
Verse 15
तथा धातार्यमा चैव जयन्तो भास्करस्तथा । त्वष्टा पूषा तथैवेन्द्रो द्वादशो विष्णुरुच्यते
तसेच धाता व अर्यमा, जयंत व भास्कर; त्वष्टा, पूषा आणि इंद्र—हेच द्वादश रूपांनी विष्णु म्हणून सांगितले जातात.
Verse 16
धरो ध्रुवश्च सोमश्न सावित्रो5थानिलोडनल:
तो धर व ध्रुव; सोम व सावित्र; तसेच अनिल व अनलही आहे.
Verse 17
नासत्यश्वापि दस्नश्न स्मृतौ द्वावश्विनावपि
स्मृतिप्रमाणे दोन्ही अश्विनांना नासत्य आणि दस्न असेही म्हणतात.
Verse 18
अतः: पर प्रवक्ष्यामि लोकानां कर्मसाक्षिण:,अब मैं जगत्के कर्मपर दृष्टि रखनेवाले तथा यज्ञ, दान और सुकृतको जाननेवाले देवताओंका परिचय देता हूँ। ये देवगण स्वयं अदृश्य रहकर समस्त प्राणियोंके शुभाशुभकर्मोंको देखते रहते हैं। इनके नाम ये हैं--मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान् पितृगण। इनके सिवा तपस्वी मुनि तथा तप एवं मोक्षमें संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगतपर हितकी दृष्टि रखते हैं। ये सब अपना नाम-कीर्तन करनेवाले मनुष्योंको शुभ फल देते हैं
म्हणून आता मी लोकांच्या कर्मांचे साक्षी असलेल्या देवतांचे वर्णन करतो. ते अदृश्य राहूनही सर्व प्राण्यांची शुभाशुभ कर्मे सतत पाहतात आणि यज्ञ, दान व सुकृत यांचे तत्त्व जाणतात. त्यांची नावे—मृत्यू, काळ, विश्वेदेव आणि मूर्तिमान पितर. यांशिवाय तपस्वी मुनी तसेच तप व मोक्षात निष्ठ असलेले सिद्ध महर्षीही सर्व जगाकडे हितदृष्टीने पाहतात. हे सर्व आपल्या नामकीर्तन करणाऱ्या मनुष्यांना शुभ फल देतात.
Verse 19
अपि यज्ञस्य वेत्तारो दत्तस्य सुकृतस्य च । अदृश्या: सर्वभूतेषु पश्यन्ति त्रिदशेश्वरा:,अब मैं जगत्के कर्मपर दृष्टि रखनेवाले तथा यज्ञ, दान और सुकृतको जाननेवाले देवताओंका परिचय देता हूँ। ये देवगण स्वयं अदृश्य रहकर समस्त प्राणियोंके शुभाशुभकर्मोंको देखते रहते हैं। इनके नाम ये हैं--मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान् पितृगण। इनके सिवा तपस्वी मुनि तथा तप एवं मोक्षमें संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगतपर हितकी दृष्टि रखते हैं। ये सब अपना नाम-कीर्तन करनेवाले मनुष्योंको शुभ फल देते हैं
भीष्म म्हणाले—यज्ञ, दान आणि सुकृत जाणणारे असे देवेश्वरही आहेत; ते स्वतः अदृश्य राहून सर्व प्राण्यांच्या कर्मांचे निरीक्षण करीत असतात.
Verse 20
शुभाशुभानि कर्माणि मृत्यु: कालश्न सर्वश: । विश्वेदेवा: पितृगणा मूर्तिमन्तस्तपोधना:,अब मैं जगत्के कर्मपर दृष्टि रखनेवाले तथा यज्ञ, दान और सुकृतको जाननेवाले देवताओंका परिचय देता हूँ। ये देवगण स्वयं अदृश्य रहकर समस्त प्राणियोंके शुभाशुभकर्मोंको देखते रहते हैं। इनके नाम ये हैं--मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान् पितृगण। इनके सिवा तपस्वी मुनि तथा तप एवं मोक्षमें संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगतपर हितकी दृष्टि रखते हैं। ये सब अपना नाम-कीर्तन करनेवाले मनुष्योंको शुभ फल देते हैं
भीष्म म्हणाले—सर्व शुभ-अशुभ कर्मे मृत्यू आणि काळ पूर्णपणे पाहतात. विश्वेदेव आणि तपोधन मूर्तिमान पितृगणही साक्षी असतात.
Verse 21
मुनयश्वैव सिद्धाश्च॒ तपोमोक्षपरायणा: । शुचिस्मिता: कीर्तयतां प्रयच्छन्ति शुभं नृूणाम्,अब मैं जगत्के कर्मपर दृष्टि रखनेवाले तथा यज्ञ, दान और सुकृतको जाननेवाले देवताओंका परिचय देता हूँ। ये देवगण स्वयं अदृश्य रहकर समस्त प्राणियोंके शुभाशुभकर्मोंको देखते रहते हैं। इनके नाम ये हैं--मृत्यु, काल, विश्वेदेव और मूर्तिमान् पितृगण। इनके सिवा तपस्वी मुनि तथा तप एवं मोक्षमें संलग्न सिद्ध महर्षि भी सम्पूर्ण जगतपर हितकी दृष्टि रखते हैं। ये सब अपना नाम-कीर्तन करनेवाले मनुष्योंको शुभ फल देते हैं
तप व मोक्षपरायण मुनि आणि सिद्ध—पवित्र व मंदस्मित—यांचे नामकीर्तन करणाऱ्या मनुष्यांना ते शुभ फल देतात.
Verse 22
प्रजापतिकृतानेताललोकान् दिव्येन तेजसा । वसन्ति सर्वलोकेषु प्रयता: सर्वकर्मसु,प्रजापति ब्रह्माजीनेी जिन लोकोंकी रचना की है, उन सबमें ये अपने दिव्य तेजसे निवास करते हैं तथा शुद्धभावसे सबके कर्मोका निरीक्षण करते हैं
प्रजापतीने रचलेल्या या सर्व लोकांत ते दिव्य तेजाने वास करतात आणि संयमी होऊन सर्वांच्या कर्मांचे निरीक्षण करतात.
Verse 23
प्राणानामी श्वरानेतान् कीर्तयन् प्रयतो नर: । धर्मार्थकामैरविंपुलैर्युज्यते सह नित्यश:,ये सबके प्राणोंके स्वामी हैं। जो मनुष्य शुद्धभावसे नित्य इनका कीर्तन करता है, उसे प्रचुरमात्रामें धर्म, अर्थ और कामकी प्राप्ति होती है
हे सर्व प्राण्यांच्या प्राणांचे अधिपती आहेत. जो मनुष्य शुद्धभावाने नित्य त्यांचे कीर्तन करतो, तो सदैव विपुल धर्म, अर्थ व काम यांनी युक्त होतो.
Verse 24
लोकांश्व लभते पुण्यान् विश्वेश्वरकृतान् शुभान् । एते देवास्त्रयस्त्रिंशत् सर्वभूतगणेश्वरा:,वह लोकनाथ ब्रह्माजीके रचे हुए मंगलमय पवित्र लोकोंमें जाता है। ऊपर बताये हुए तैंतीस देवता सम्पूर्ण भूतोंके स्वामी हैं
तो विश्वेश्वराने निर्माण केलेले मंगलमय, पुण्य व पवित्र लोक प्राप्त करतो. हे तेहेतीस देव सर्व भूतगणांचे अधिपती आहेत.
Verse 25
नन्दी श्वरो महाकायो ग्रामणीर्वृषभध्वज: । ईश्वरा: सर्वलोकानां गणेश्व॒रविनायका:,कीर्तयन् प्रयत: सर्वान् सर्वपापै: प्रमुच्यते । इसी प्रकार नन्दीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी गणेश, विनायक, सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण, नक्षत्र, नदियाँ, आकाश, पक्षिराज गरुड़, पृथ्वीपर तपसे सिद्ध हुए महात्मा, स्थावर, जंगम, हिमालय, समस्त पर्वत, चारों समुद्र, भगवान् शंकरके तुल्य पराक्रमवाले उनके अनुचरगण, विष्णुदेव, जिष्णु, स्कन्द और अम्बिका--इन सबके नामोंका शुद्धभावसे कीर्तन करनेवाले मनुष्यके सब पाप नष्ट हो जाते हैं
नंदीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज—सर्वलोकांचे ईश्वर, गणेश्वर व विनायक—यांची नावे जो मनुष्य संयमाने व शुद्ध भावाने कीर्तन करतो, तो सर्व पापांतून मुक्त होतो.
Verse 26
सौम्या रौद्रा गणाश्वैव योगभूतगणास्तथा । ज्योतींषि सरितो व्योम सुपर्ण: पतगेश्वर:
सौम्य गण, रौद्र गण तसेच योगशक्तीने युक्त भूतगण आहेत; आकाशातील ज्योती, नद्या, स्वयं व्योम आणि सुपर्ण गरुड—पक्षिराज—हेही (या गणांमध्ये) अंतर्भूत आहेत.
Verse 27
पृथिव्यां तपसा सिद्धा: स्थावराश्न चराश्न ह । हिमवान् गिरय: सर्वे चत्वारश्न महार्णवा:
या पृथ्वीवर तपाच्या बळाने स्थावर व जंगम—सर्वांनी सिद्धी प्राप्त केली आहे. हिमवान, सर्व पर्वत आणि चारही महासागरही (तपाच्या प्रभावाचे) साक्षी आहेत.
Verse 28
भवस्यानुचराश्चैव हरतुल्यपराक्रमा: । विष्णुदेवो5थ जिष्णुश्न स्कन्दश्चाम्बिकया सह
भव (शिव) यांचे अनुचरही आहेत, ज्यांचे पराक्रम हरासारखे आहे. तसेच विष्णुदेव, जिष्णु आणि अम्बिकेसह स्कंदही (पूज्य) आहेत.
Verse 29
अत ऊर्ध्व॑ प्रवक्ष्यामि मानवानृषिसत्तमान्,अब श्रेष्ठ महर्षियोंके नाम बता रहा हूँ--यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, उशिजके पुत्र कक्षीवानू, अंगिरानन्दन बल, मेधातिथिके पुत्र कण्व ऋषि और वर्हिषद--ये सब ऋषि ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और लोकस्रष्टा बतलाये गये हैं
आता मी मानवांतील श्रेष्ठ महर्षींची नावे सांगतो—यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु; उशिजाचा पुत्र कक्षीवान; अंगिराचा पुत्र बल; मेधातिथीचा पुत्र कण्व ऋषी आणि वर्हिषद। हे सर्व ऋषी ब्रह्मतेजाने संपन्न व लोकधारक म्हणून कीर्तित आहेत।
Verse 30
यवक्रीतश्च रैभ्यश्व॒ अर्वावसुपरावसू । ओऔशिजजश्चैव कक्षीवान् बलश्षाड्रिरस: सुत:,अब श्रेष्ठ महर्षियोंके नाम बता रहा हूँ--यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, उशिजके पुत्र कक्षीवानू, अंगिरानन्दन बल, मेधातिथिके पुत्र कण्व ऋषि और वर्हिषद--ये सब ऋषि ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और लोकस्रष्टा बतलाये गये हैं
यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु व परावसु; तसेच उशिजाचा पुत्र कक्षीवान आणि शाड्रिरसाचा पुत्र बल—हे सर्व ऋषी ब्रह्मतेजाने युक्त व लोकधर्माचे धारक म्हणून स्मरणात आहेत।
Verse 31
ऋषिर्मेधातिथे: पुत्र: कण्वो बर्हिषदस्तथा । ब्रह्मतेजोमया: सर्वे कीर्तिता लोकभावना:,अब श्रेष्ठ महर्षियोंके नाम बता रहा हूँ--यवक्रीत, रैभ्य, अर्वावसु, परावसु, उशिजके पुत्र कक्षीवानू, अंगिरानन्दन बल, मेधातिथिके पुत्र कण्व ऋषि और वर्हिषद--ये सब ऋषि ब्रह्मतेजसे सम्पन्न और लोकस्रष्टा बतलाये गये हैं
मेधातिथीचा पुत्र कण्व ऋषी आणि वर्हिषदही (त्यांतच येतात)। हे सर्व ब्रह्मतेजाने परिपूर्ण, लोककल्याणकारी व लोकधारक म्हणून कीर्तित आहेत।
Verse 32
लभन्ते हि शुभं सर्वे रुद्रानलवसुप्रभा: । भुवि कृत्वा शुभं कर्म मोदन्ते दिवि दैवतैः,इनका तेज रुद्र, अग्नि तथा वसुओंके समान है। ये पृथ्वीपर शुभकर्म करके अब स्वर्गमें देवताओंके साथ आनन्दपूर्वक रहते हैं और शुभभलका उपभोग करते हैं
ते सर्वजण शुभ फल प्राप्त करतात. रुद्र, अग्नी व वसूंप्रमाणे तेजस्वी होऊन त्यांनी पृथ्वीवर शुभ कर्मे केली; आता ते स्वर्गात देवतांसह आनंद मानतात व पुण्यफळाचा उपभोग घेतात.
Verse 33
महेन्द्रगुरव: सप्त प्राचीं वै दिशमाश्रिता: । प्रयत: कीर्तयेदेतान् शक्रलोके महीयते,महेन्द्रके गुरु सातों महर्षि पूर्व दिशामें निवास करते हैं। जो पुरुष शुद्धचित्तसे इनका नाम लेता है, वह इन्द्रलोकमें प्रतिष्ठित होता है
महेन्द्राचे गुरु म्हणून प्रसिद्ध असे सात महर्षी पूर्व दिशेत निवास करतात. जो पुरुष संयमी व शुद्धचित्त होऊन श्रद्धेने त्यांची नावे कीर्तन करतो, तो शक्राच्या (इंद्राच्या) लोकात मान-प्रतिष्ठा प्राप्त करतो.
Verse 34
उन्मुचु:प्रमुचुश्वैव स्वस्त्यात्रेयश्व वीर्यवान् । दृढ्व्यश्वोर्ध्वबाहुश्न तृणसोमाज्निरास्तथा,उन्मुचु, प्रमुचु, शक्तिशाली स्वस्त्यात्रेय, दृढ्व्य, ऊर्ध्वबाहु, तृणसोमांगिरा और मित्रावरुणके पुत्र महाप्रतापी अगस्त्य मुनि--ये सात धर्मराज (यम)-के ऋत्विज् हैं और दक्षिण दिशामें निवास करते हैं
भीष्म म्हणाले—उन्मुचु, प्रमुचु, पराक्रमी स्वस्त्यात्रेय, दृढव्य, ऊर्ध्वबाहु, तृणसोमाङ्गिरा आणि मित्र-वरुणांचा पुत्र महातेजस्वी महर्षी अगस्त्य—हे सात धर्मराज (यम) यांचे ऋत्विज असून दक्षिण दिशेत वास करतात.
Verse 35
मित्रावरुणयो: पुत्रस्तथागस्त्य: प्रतापवान् | धर्मराजर्त्विज: सप्त दक्षिणां दिशमाश्रिता:,उन्मुचु, प्रमुचु, शक्तिशाली स्वस्त्यात्रेय, दृढ्व्य, ऊर्ध्वबाहु, तृणसोमांगिरा और मित्रावरुणके पुत्र महाप्रतापी अगस्त्य मुनि--ये सात धर्मराज (यम)-के ऋत्विज् हैं और दक्षिण दिशामें निवास करते हैं
भीष्म म्हणाले—मित्र-वरुणांचा प्रतापवान पुत्र अगस्त्य हा धर्मराज (यम) यांच्या सात ऋत्विजांपैकी एक आहे; ते सातही दक्षिण दिशेत निवास करतात.
Verse 36
दृढेयुश्न ऋतेयुश्व परिव्याधश्व कीर्तिमान् | एकत्र द्वितश्वैव त्रितश्षादित्यसांनिभा:,दृढेयु, ऋतेयु, कीर्तिमान् परिव्याध, सूर्यके सदृश तेजस्वी एकत, द्वित, त्रित तथा धर्मात्मा अत्रिके पुत्र सारस्वत मुनि--ये सात वरुणके ऋत्विज् हैं और पश्चिम दिशामें इनका निवास है
भीष्म म्हणाले—दृढेयु, ऋतेयु आणि कीर्तिमान परिव्याध; तसेच सूर्याप्रमाणे तेजस्वी एकत, द्वित व त्रित—हे सात वरुणाचे ऋत्विज असून पश्चिम दिशेत वास करतात.
Verse 37
अत्रे: पुत्रश्न धर्मात्मा ऋषि: सारस्वतस्तथा । वरुणस्यर्त्विज: सप्त पश्षचिमां दिशमाश्रिता:,दृढेयु, ऋतेयु, कीर्तिमान् परिव्याध, सूर्यके सदृश तेजस्वी एकत, द्वित, त्रित तथा धर्मात्मा अत्रिके पुत्र सारस्वत मुनि--ये सात वरुणके ऋत्विज् हैं और पश्चिम दिशामें इनका निवास है
भीष्म म्हणाले—अत्रीचा धर्मात्मा पुत्र ऋषि आणि सारस्वत मुनि देखील (त्यांत आहेत). हे सात वरुणाचे ऋत्विज असून पश्चिम दिशेत निवास करतात.
Verse 38
अत्रिर्वसिष्ठो भगवान् कश्यपश्च महानृषि: । गौतमश्न भरद्वाजो विश्वामित्रो5थ कौशिक:,अत्रि, भगवान् वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र और ऋचीकनन्दन प्रतापवान् उमग्रस्वभाववाले जमदग्नि--ये सात उत्तर दिशामें रहनेवाले और कुबेरके गुरु (ऋत्विज) हैं
भीष्म म्हणाले—अत्रि, भगवान वसिष्ठ, महर्षी कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र आणि ऋचीकनंदन प्रतापवान जमदग्नी—हे सात उत्तर दिशेत निवास करणारे आणि कुबेराचे गुरु (ऋत्विज) आहेत.
Verse 39
ऋचीकतनयश्चोग्रो जमदग्नि: प्रतापवान् | धनेश्वरस्य गुरव: सप्तैते उत्तराश्रिता:,अत्रि, भगवान् वसिष्ठ, महर्षि कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र और ऋचीकनन्दन प्रतापवान् उमग्रस्वभाववाले जमदग्नि--ये सात उत्तर दिशामें रहनेवाले और कुबेरके गुरु (ऋत्विज) हैं
भीष्म म्हणाले—ऋचीकांचा पुत्र, तेजस्वी व प्रतापवान, उग्रस्वभाव जमदग्नी आहे. अत्री, भगवान वसिष्ठ, महर्षी कश्यप, गौतम, भरद्वाज, कुशिकवंशी विश्वामित्र आणि ऋचीकनंदन प्रतापवान जमदग्नी—हे सातही उत्तर दिशेत निवास करणारे आणि धनाधिपती कुबेराचे गुरु (ऋत्विज) म्हणून कीर्तित आहेत.
Verse 40
अपरे मुनय: सप्त दिक्षु सर्वास्वधिष्ठिता: । कीर्तिस्वस्तिकरा नृणां कीर्तिता लोकभावना:,इनके सिवा सात महर्षि और हैं जो सम्पूर्ण दिशाओंमें निवास करते हैं। वे जगत्को उत्पन्न करनेवाले हैं। उपर्युक्त महर्षियोंका यदि नाम लिया जाय तो वे मनुष्योंकी कीर्ति बढ़ाते और उनका कल्याण करते हैं
भीष्म म्हणाले—यांशिवाय आणखी सात मुनि आहेत, जे सर्व दिशांत प्रतिष्ठित आहेत. ते लोकव्यवस्थेचे धारक आणि जगताचे भावक (उत्पादक) आहेत. त्यांच्या नावांचे स्मरण केल्याने मनुष्याची कीर्ती वाढते आणि कल्याण होते.
Verse 41
धर्म: कामश्न कालश्च वसुर्वासुकिरेव च । अनन्त: कपिलश्नैव सप्तैते धरणीधरा:,धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनन्त और कपिल--ये सात पृथ्वीको धारण करनेवाले हैं
भीष्म म्हणाले—धर्म, काम, काल, वसु, वासुकि, अनंत आणि कपिल—हे सात पृथ्वीला धारण करणारे आहेत.
Verse 42
रामो व्यासस्तथा ट्रौणिरश्व॒त्थामा च लोमश: । इत्येते मुनयो दिव्या एकैक: सप्त सप्तधा,परशुराम, व्यास, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा और लोमश--ये चारों दिव्य मुनि हैं। इनमेंसे एक-एक सात-सात ऋषियोंके समान हैं
भीष्म म्हणाले—राम (परशुराम), व्यास, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा आणि लोमश—हे दिव्य मुनि आहेत. यांपैकी प्रत्येक जण सात-सात ऋषींइतका मान्य आहे.
Verse 43
शान्तिस्वस्तिकरा लोके दिशांपाला: प्रकीर्तिता: । यस्यां यस्यां दिशि होते तन्मुख: शरणं व्रजेत्,ये सब ऋषि इस जगत्में शान्ति और कल्याणका विस्तार करनेवाले तथा दिशाओंके पालक कहे जाते हैं। ये जिस-जिस दिशामें निवास करें, उस-उस दिशाकी ओर मुँह करके इनकी शरण लेनी चाहिये
हे सर्व ऋषि या लोकी शांती व कल्याण करणारे आणि दिशांचे पालक म्हणून कीर्तित आहेत. ते ज्या-ज्या दिशेत निवास करतात, त्या त्या दिशेकडे मुख करून त्यांची शरण घ्यावी.
Verse 44
स्रष्टार: सर्वभूतानां कीर्तिता लोकपावना: । संवर्तो मेरुसावर्णो मार्कण्डेयश्व धार्मिक:,ये सम्पूर्ण भूतोंके स्र्टा और लोकपावन बताये गये हैं। संवर्त, मेरुसावर्णि, धर्मात्मा मार्कण्डेय, सांख्य, योग, नारद, महर्षि दुर्वासा--ये सात ऋषि अत्यन्त तपस्वी, जितेन्द्रिय और तीनों लोकोंमें विख्यात हैं
भीष्म म्हणाले—हे सर्व भूतांचे स्रष्टे आणि लोकांना पावन करणारे म्हणून कीर्तिले गेले आहेत—संवर्त, मेरुसावर्णि आणि धर्मात्मा महर्षी मार्कण्डेय।
Verse 45
सांख्ययोगौ नारदश्न दुर्वासाश्च महानृषि: । अत्यन्ततपसो दान्तास्त्रिषु लोकेषु विश्रुता:,ये सम्पूर्ण भूतोंके स्र्टा और लोकपावन बताये गये हैं। संवर्त, मेरुसावर्णि, धर्मात्मा मार्कण्डेय, सांख्य, योग, नारद, महर्षि दुर्वासा--ये सात ऋषि अत्यन्त तपस्वी, जितेन्द्रिय और तीनों लोकोंमें विख्यात हैं
भीष्म म्हणाले—सांख्य व योग, नारद आणि महानृषी दुर्वासा—हे अत्यंत तपस्वी, दान्त आणि त्रिलोकीत विख्यात आहेत।
Verse 46
अपरे रुद्रसंकाशा: कीर्तिता ब्रह्मलौकिका: । अपुत्रो लभते पुत्र दरिद्रो लभते धनम्,इन सब ऋषियोंके अतिरिक्त बहुत-से महर्षि रुद्रके समान प्रभावशाली हैं। इनका कीर्तन करनेसे ये ब्रह्मलोककी प्राप्ति करानेवाले होते हैं। उनके कीर्तनसे पुत्रहीनको पुत्र मिलता है और दरिद्रको धन
भीष्म म्हणाले—यांशिवाय आणखीही काही महर्षी आहेत, जे रुद्रासारखे तेजस्वी असून ब्रह्मलोकाशी संबद्ध म्हणून कीर्तिले गेले आहेत. त्यांचे कीर्तन केल्याने ब्रह्मलोकप्राप्ती होते; अपुत्राला पुत्र आणि दरिद्राला धन मिळते.
Verse 47
तथा धर्मार्थकामेषु सिद्धि च लभते नर: । पृथुं वैन्यं नूपवरं पृथ्वी यस्याभवत् सुता
भीष्म म्हणाले—अशा प्रकारे मनुष्य धर्म, अर्थ आणि काम यांतही सिद्धी प्राप्त करतो. वेनपुत्र उत्तम राजा पृथु असेच होते—ज्यांच्यासाठी पृथ्वी स्वतः कन्येसारखी झाली.
Verse 48
आदित्यवंशप्रभवं महेन्द्रसमविक्रमम्,सूर्यवंशमें उत्पन्न और देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी इला और बुधके प्रिय पुत्र त्रिभुवनविख्यात राजा पुरूरवाका नाम कीर्तन करें
भीष्म म्हणाले—आदित्यवंशात उत्पन्न, महेंद्रासमान पराक्रमी, इला व बुध यांचा प्रिय पुत्र आणि त्रिभुवनविख्यात राजा पुरूरवा—याचे नामकीर्तन करावे.
Verse 49
पुरूरवसमैलं च त्रिषु लोकेषु विश्रुतम् बुधस्य दयितं पुत्र कीर्तयेद् वसुधाधिपम्,सूर्यवंशमें उत्पन्न और देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी इला और बुधके प्रिय पुत्र त्रिभुवनविख्यात राजा पुरूरवाका नाम कीर्तन करें
भीष्म म्हणाले—हे पुत्रा! इळेच्या वंशात उत्पन्न, त्रिलोकीत विख्यात, बुधाचा प्रिय पुत्र व पृथ्वीचा अधिपती राजा पुरूरवा ऐल याचे नाम कीर्तन करावे.
Verse 50
त्रिलोकविश्रुतं वीर॑ भरतं च प्रकीर्तयेत् । गवामयेन यज्ञेन येनेष्टं वै कृते युगे,त्रिलोकीके विख्यात वीर भरतका नामोच्चारण करे, जिन्होंने सत्ययुगमें गवामय यज्ञका अनुष्ठान किया था। उन विश्वविजयिनी तपस्यासे युक्त, शुभ लक्षणसम्पन्न एवं लोकपूजित परम तेजस्वी महाराज रन्तिदेवका भी कीर्तन करें
भीष्म म्हणाले—त्रिलोकीत विख्यात अशा वीर भरताचेही नाम कीर्तन करावे; ज्याने कृत (सत्य) युगात गवामय यज्ञ केला होता.
Verse 51
रन्तिदेवं महादेवं कीर्तयेत् परमद्युतिम् विश्वजित्तपसोपेतं लक्षण्यं लोकपूजितम्,त्रिलोकीके विख्यात वीर भरतका नामोच्चारण करे, जिन्होंने सत्ययुगमें गवामय यज्ञका अनुष्ठान किया था। उन विश्वविजयिनी तपस्यासे युक्त, शुभ लक्षणसम्पन्न एवं लोकपूजित परम तेजस्वी महाराज रन्तिदेवका भी कीर्तन करें एतान् वै कल्यमुत्थाय कीर्तयन् शुभमश्षुते । नाग्निचौरभयं तस्य न मार्गप्रतिरोधनम्
भीष्म म्हणाले—परम तेजस्वी, महादेवासमान, विश्वजयी तपस्येने युक्त, शुभ लक्षणांनी संपन्न व लोकपूज्य महाराज रन्तिदेव याचे कीर्तन करावे. जो पहाटे उठून ही नावे कीर्तन करतो, तो कल्याण प्राप्त करतो; त्याला ना अग्नीचे भय, ना चोरांचे, आणि मार्गात अडथळाही होत नाही.
Verse 52
तथा श्वेतं च राजर्षि कीर्तयेत् परमद्युतिम् । सगरस्यात्मजा येन प्लावितास्तारितास्तथा,महातेजस्वी राजर्षि श्वेतका तथा जिन्होंने सगरपुत्रोंको गंगाजलसे आप्लावित करके उनका उद्धार किया था, उन महाराज भगीरथका भी कीर्तन एवं स्मरण करे
भीष्म म्हणाले—तसेच परम तेजस्वी राजर्षि श्वेत याचेही कीर्तन करावे. आणि ज्याच्या द्वारा सगरपुत्र गंगाजलाने आप्लावित होऊन उद्धार पावले, त्या महातेजस्वी राजर्षि भगीरथाचेही स्मरण-कीर्तन करावे.
Verse 53
हुताशनसमानेतान् महारूपान् महौजस: । उग्रकायान् महासतत्त्वान् कीर्तयेत् कीर्तिवर्धनान्,वे सभी राजा अग्निके समान तेजस्वी, अत्यन्त रूपवान, महान् बलसम्पन्न, उग्रशरीरवाले परम धीर और अपने कीर्तिको बढ़ानेवाले थे। इन सबका कीर्तन करना चाहिये
भीष्म म्हणाले—हे सर्व राजे हुताशन (अग्नी) समान तेजस्वी, अत्यंत रूपवान, महाओजस्वी, उग्रकाय व महासत्त्व (परम धीर) होते आणि कीर्ती वाढविणारे होते. म्हणून यांचे कीर्तन करावे.
Verse 54
देवानृषिगणांश्वैव नृपांश्व जगतीश्वरान् । सांख्यं योगं च परमं हव्यं कव्यं तथैव च,देवताओं, ऋषियों तथा पृथ्वीपर शासन करनेवाले राजाओंका कीर्तन करना चाहिये। सांख्ययोग, उत्तम हव्य-कव्य तथा समस्त श्रुतियोंके आधारभूत परब्रह्म परमात्माका कीर्तन सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मंगलमय परम पावन है। इनके बारंबार कीर्तनसे रोगोंका नाश होता है। इससे सब कर्मामें उत्तम पुष्टि प्राप्त होती है। भारत! मनुष्यको प्रतिदिन सबेरे और शामके समय शुद्धचित्त होकर भगवत्-कीर्तनके साथ ही उपर्युक्त देवताओं, ऋषियों और राजाओंके भी नाम लेने चाहिये
भीष्म म्हणाले—देव, ऋषिगण आणि पृथ्वीवर राज्य करणारे राजे यांचे स्मरण व कीर्तन करावे. सांख्य व योग यांचे परम तत्त्व, तसेच देवांसाठी हव्य आणि पितरांसाठी कव्य—या पवित्र अर्पणांचेही कीर्तन करावे. असे स्मरण-कीर्तन सर्व प्राण्यांसाठी परम मंगलमय व अत्यंत पावन आहे; वारंवार केल्याने व्याधी शांत होतात आणि सर्व कर्मांना उत्तम पुष्टी मिळते. म्हणून, हे भारत, मनुष्याने शुद्धचित्त होऊन दररोज सकाळ-संध्याकाळ भगवंताचे कीर्तन करीत या देवता, ऋषी आणि राजांची नावेही घ्यावीत.
Verse 55
कीर्तितं परम॑ ब्रह्म सर्वश्रुतिपरायणम् | मड्ूल्यं सर्वभूतानां पवित्र बहुकीर्तितम्,देवताओं, ऋषियों तथा पृथ्वीपर शासन करनेवाले राजाओंका कीर्तन करना चाहिये। सांख्ययोग, उत्तम हव्य-कव्य तथा समस्त श्रुतियोंके आधारभूत परब्रह्म परमात्माका कीर्तन सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मंगलमय परम पावन है। इनके बारंबार कीर्तनसे रोगोंका नाश होता है। इससे सब कर्मामें उत्तम पुष्टि प्राप्त होती है। भारत! मनुष्यको प्रतिदिन सबेरे और शामके समय शुद्धचित्त होकर भगवत्-कीर्तनके साथ ही उपर्युक्त देवताओं, ऋषियों और राजाओंके भी नाम लेने चाहिये
भीष्म म्हणाले—सर्व श्रुतींचा परम तात्पर्य ज्याच्यावर स्थिर आहे त्या परब्रह्माचे कीर्तन सांगितले गेले आहे. तोच सर्व प्राण्यांचा खरा मूल्यस्वरूप; वारंवार स्तुत झालेला परम पावन. त्याच्यासह देव, देवर्षी आणि पृथ्वीशासक राजांचे नामकीर्तनही सर्व जीवांसाठी मंगलकारक म्हटले आहे; याने व्याधी नष्ट होतात आणि कर्मांना श्रेष्ठ पुष्टी मिळते. म्हणून, हे भारत, मनुष्याने दररोज सकाळ-संध्याकाळ शुचिर्भूत होऊन भगवंताच्या पदाचे कीर्तन करावे.
Verse 56
व्याधिप्रशमन श्रेष्ठ पौष्टिक सर्वकर्मणाम् । प्रयत: कीर्तयेच्चैतान् कल्यं सायं च भारत,देवताओं, ऋषियों तथा पृथ्वीपर शासन करनेवाले राजाओंका कीर्तन करना चाहिये। सांख्ययोग, उत्तम हव्य-कव्य तथा समस्त श्रुतियोंके आधारभूत परब्रह्म परमात्माका कीर्तन सम्पूर्ण प्राणियोंके लिये मंगलमय परम पावन है। इनके बारंबार कीर्तनसे रोगोंका नाश होता है। इससे सब कर्मामें उत्तम पुष्टि प्राप्त होती है। भारत! मनुष्यको प्रतिदिन सबेरे और शामके समय शुद्धचित्त होकर भगवत्-कीर्तनके साथ ही उपर्युक्त देवताओं, ऋषियों और राजाओंके भी नाम लेने चाहिये
भीष्म म्हणाले—हे स्मरण-कीर्तन व्याधी शांत करण्याचे श्रेष्ठ साधन आहे आणि सर्व कर्मांना पुष्टी देणारे आहे. म्हणून, हे भारत, संयमी व शुद्धचित्त होऊन मनुष्याने सकाळ-संध्याकाळ या नामांचे कीर्तन करावे.
Verse 57
एते वै पान्ति वर्षन्ति भान्ति वान्ति सृजन्ति च । एते विनायका: श्रेष्ठा दक्षा: शान्ता जितेन्द्रिया:,ये देवता आदि जगतकी रक्षा करते, पानी बरसाते, प्रकाश और हवा देते तथा प्रजाकी सृष्टि करते हैं। ये ही विघ्नोंके राजा विनायक, श्रेष्ठ, दक्ष, क्षमाशील और जितेन्द्रिय हैं
हेच देव जगताचे रक्षण करतात, पाऊस पाडतात, प्रकाश देतात, वारा वाहवतात आणि प्रजेची सृष्टीही करतात. हेच विघ्नांचे अधिपती विनायक—श्रेष्ठ, दक्ष, शांत आणि जितेन्द्रिय आहेत.
Verse 58
नराणामशुभं सर्वे व्यपोहन्ति प्रकीर्तिता: । साक्षिभूता महात्मान: पापस्य सुकृतस्य च,ये महात्मा सब मनुष्योंके पाप-पुण्यके साक्षी हैं। इनका नाम लेनेपर ये सब लोग मानवोंके अमंगलका नाश करते हैं
हे महात्मे मनुष्यांच्या पाप-पुण्याचे साक्षी आहेत. यांचे कीर्तन व नामोच्चार झाल्यास ते सर्व लोकांचे सर्व अमंगल दूर करतात.
Verse 59
जो सबेरे उठकर इनके नाम और गुणोंका उच्चारण करता है, उसे शुभ कर्मोंके भोग प्राप्त होते हैं। उसके यहाँ आग और चोरका भय नहीं रहता तथा उसका मार्ग कभी रोका नहीं जाता
जो मनुष्य पहाटे उठून यांच्या नामांचे व गुणांचे कीर्तन करतो, तो शुभ कर्मांचे फळ प्राप्त करतो. त्याच्या घरी ना अग्नीचे भय राहते, ना चोरांचे; आणि त्याचा मार्ग कधीही अडविला जात नाही.
Verse 60
एतान् कीर्तयतां नित्य॑ दुःस्वप्नो नश्यते नृणाम् मुच्यते सर्वपापेभ्य: स्वस्तिमांश्व गृहान् ब्रजेत्,प्रतिदिन इन देवताओंका कीर्तन करनेसे मनुष्योंका दु:स्वप्न नष्ट हो जाता है। वह सब पापोंसे मुक्त होता है और कुशलपूर्वक घर लौटता है
या देवतांचे नित्य कीर्तन केल्याने मनुष्याचे दुःस्वप्न नष्ट होते. तो सर्व पापांतून मुक्त होतो आणि कुशलतेने घरी परततो.
Verse 61
दीक्षाकालेषु सर्वेषु यः पठेन्नियतो द्विज: । न्यायवानात्मनिरत: क्षान्तो दान्तोडनसूयक:,जो द्विज दीक्षाके सभी अवसरोंपर नियमपूर्वक इन नामोंका पाठ करता है, वह न्यायशील, आत्मनिष्ठ, क्षमावान्, जितेन्द्रिय तथा दोष-दृष्टिसे रहित होता है
जो द्विज सर्व दीक्षाकाळी नियमपूर्वक या नामांचे पठण करतो, तो न्यायशील, आत्मनिष्ठ, क्षमाशील, जितेंद्रिय आणि दोषदृष्टीरहित होतो.
Verse 62
रोगार्तो व्याधियुक्तो वा पठन् पापात् प्रमुच्यते । वास्तुमध्ये तु पठत: कुले स्वस्त्ययनं भवेत्,रणे-व्याधिसे ग्रस्त मनुष्य इसका पाठ करनेपर पापमुक्त एवं नीरोग हो जाता है। जो अपने घरके भीतर इन नामोंका पाठ करता है, उसके कुलका कल्याण होता है
रोगाने पीडित किंवा व्याधिग्रस्त मनुष्य हे पठण केल्यास पापमुक्त होतो. आणि जो आपल्या घराच्या आत हे पठण करतो, त्याच्या कुलाचे कल्याण होते.
Verse 63
क्षेत्रमध्ये तु पठतः सर्व सस्य॑ प्ररोहति । गच्छत: क्षेममध्वानं ग्रामान्तरगत: पठन्,खेतमें इस नाममालाको पढ़नेवाले मनुष्यकी सारी खेती जमती और उपजती है। जो गाँवके भीतर रहकर इस नामावलीका पाठ करता है, यात्रा करते समय उसका मार्ग सकुशल समाप्त होता है
शेतामध्ये ही नाममाला पठण करणाऱ्याची सर्व पिके उगवून भरभराटीला येतात. आणि जो दुसऱ्या गावाकडे जाताना हे पठण करतो, त्याचा प्रवास कुशलतेने पूर्ण होतो.
Verse 64
आत्मनश्न सुतानां च दाराणां च धनस्य च | बीजानामोषधीनां च रक्षामेतां प्रयोजयेत्,अपनी, पुत्रोंकी, पत्नीकी, धनकी तथा बीजों और ओषधियोंकी भी रक्षाके लिये इस नामावलीका प्रयोग करे
स्वतःची, पुत्रांची, पत्नीची, धनाची तसेच बिया व औषधी यांचीही रक्षा करण्यासाठी ही रक्षाविधी (नामावली) उपयोगात आणावी।
Verse 65
एतान् संग्रामकाले तु पठत: क्षत्रियस्य तु । व्रजन्ति रिपवो नाशं क्षेम॑ च परिवर्तते,युद्धकालमें इन नामोंका पाठ करनेवाले क्षत्रियके शत्रु भाग जाते हैं और उसका सब ओरसे कल्याण होता है
युद्धकाळी जो क्षत्रिय ही नावे पठण करतो, त्याचे शत्रू नाश पावतात आणि त्याचे सर्व बाजूंनी क्षेम-कल्याण होते।
Verse 66
एतान् दैवे च पित्रये च पठत: पुरुषस्य हि । भुज्जते पितर: कव्यं हव्यं च त्रेदिवौकस:,जो देवयज्ञ और श्राद्धके समय उपर्युक्त नामोंका पाठ करता है, उस पुरुषके हव्यको देवता और कव्यको पितर सहर्ष स्वीकार करते हैं
जो पुरुष देवयज्ञ व पितृकार्य (श्राद्ध) यांच्या वेळी ही नावे पठण करतो, त्याचे कव्य पितर आणि हव्य त्रिदिववासी देव आनंदाने स्वीकारतात।
Verse 67
न व्याधिश्वापदभयं न द्विपान्न हि तस्करात् । कश्मलं लघुतां याति पाप्मना च प्रमुच्यते,उसके यहाँ रोग या हिंसक जन्तुओंका भय नहीं रहता। हाथी अथवा चोरसे भी कोई बाधा नहीं आती। शोक कम हो जाता है और पापसे छुटकारा मिल जाता है
त्याला रोगाचे भय राहत नाही, हिंस्र पशूंचेही भय नसते; हत्ती किंवा चोर यांच्यापासूनही बाधा येत नाही. शोक-व्यथा हलकी होते आणि तो पापातून मुक्त होतो।
Verse 68
यानपात्रे च याने च प्रवासे राजवेश्मनि । परां सिद्धिमवाप्नोति सावित्री हुत्तमां पठन्,जो मनुष्य जहाजमें या किसी सवारीमें बैठनेपर, विदेशमें अथवा राजदरबारमें जानेपर मन-ही-मन उत्तम गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह परम सिद्धिको प्राप्त होता है
जो मनुष्य नौकेत, वाहनात, प्रवासात किंवा राजवाड्यात जाताना मनोमन उत्तम सावित्री (गायत्री) जपतो, तो परम सिद्धी प्राप्त करतो।
Verse 69
न च राजभयं तेषां न पिशाचान्न राक्षसात् । नाग्न्यम्बुपवनव्यालाद् भयं तस्योपजायते,गायत्रीका जप करनेसे द्विजको राजा, पिशाच, राक्षस, आग, पानी, हवा और साँप आदिका भय नहीं होता
भीष्म म्हणाले—त्याला राजांचा भय होत नाही, पिशाचांचेही नाही, राक्षसांचेही नाही; तसेच अग्नी, जल, वायू किंवा सर्प यांपासूनही भय उत्पन्न होत नाही. अशा प्रकारे गायत्रीचा संयमित जप केल्याने द्विज लौकिक व अदृश्य संकटांपासून रक्षित होऊन धर्मात स्थैर्य प्राप्त करतो.
Verse 70
चतुर्णामपि वर्णानामाश्रमस्य विशेषत: । करोति सतत शान्तिं सावित्रीमुत्तमां पठन्,जो उत्तम गायत्री-मन्त्रका जप करता है, वह पुरुष चारों वर्णों और विशेषतः चारों आश्रमोंमें सदा शान्ति स्थापन करता है
भीष्म म्हणाले—जो उत्तम सावित्री (गायत्री-मंत्र) निरंतर पठण करतो, तो चारही वर्णांसाठी आणि विशेषतः चारही आश्रम-व्यवस्थेसाठी सदैव शांतीची स्थापना करतो.
Verse 71
नान्निर्दहति काष्ठानि सावित्री यत्र पठ्यते । न तत्र बालो प्रियते न च तिष्ठन्ति पन्नगा:,जहाँ गायत्रीका जप किया जाता है, उस घरके काठके किवाड़ोंमें आग नहीं लगती। वहाँ बालककी मृत्यु नहीं होती तथा उस घरमें साँप नहीं टिकते हैं
भीष्म म्हणाले—जिथे सावित्री (गायत्री) पठण होते, तिथे अग्नी काष्ठांना जाळत नाही; तिथे बालकाचा मृत्यू होत नाही आणि तिथे सर्पही टिकत नाहीत.
Verse 72
न तेषां विद्यते दुःखं गच्छन्ति परमां गतिम् । ये शृण्वन्ति महद् ब्रह्म सावित्रीगुणकीर्तनम्,उस घरके निवासी, जो परब्रह्मस्वरूप गायत्री-मन्त्रके गुणोंका कीर्तन सुनते हैं, उन्हें कभी दु:ख नहीं होता है तथा वे परमगतिको प्राप्त होते हैं
भीष्म म्हणाले—जे महद् ब्रह्मस्वरूप सावित्रीच्या गुणकीर्तनाचे श्रवण करतात, त्यांना दुःख नसते; ते परम गतीला प्राप्त होतात.
Verse 73
गवां मध्ये तु पठतो गावो<स्य बहुवत्सला: । प्रस्थाने वा प्रवासे वा सर्वावस्थां गत: पठेत्,गौओंके बीचमें गायत्रीका जप करनेवाले पुरुषपर गौओंका वात्सल बहुत बढ़ जाता है। प्रस्थान-कालमें अथवा परदेशमें सभी अवस्थाओंमें मनुष्यों इसका जप करना चाहिये
भीष्म म्हणाले—गायींच्या मध्ये जो याचा पाठ करतो, त्याच्यावर गायींचे वात्सल्य फार वाढते. म्हणून प्रस्थानकाळी असो वा प्रवासात—ज्या कोणत्याही अवस्थेत असो—मनुष्याने याचा जप करावा.
Verse 74
जपतां जुद्धतां चैव नित्यं च प्रयतात्मनाम् | ऋषीणां परम जप्यं गुहमेतन्नराधिप,नरेश्वर! सदा शुद्धचित्त होकर जप करे, होम करनेवाले ऋषियोंके लिये यह परम गोपनीय मन्त्र है
जे नित्य जप करतात, जे युद्धात प्रवृत्त असतात आणि जे सदैव संयतात्मा असतात—त्यांच्यासाठी हा परम जपनीय मंत्र आहे. हे नराधिप! हा अत्यंत गुप्त उपदेश आहे; विशेषतः जप व होम करणाऱ्या ऋषींसाठी—जो सदैव शुद्धचित्ताने धारण करावा।
Verse 75
याधातथ्येन सिद्धस्य इतिहासं पुरातनम् | पराशरमतं दिव्यं शकाय कथितं पुरा,यह सिद्धिको प्राप्त हुए महर्षि वेदव्यासका कहा हुआ यथार्थ एवं प्राचीन इतिहास है। इसमें पराशर मुनिके दिव्य मतका वर्णन है। पूर्वकालमें इन्द्रको इसका उपदेश किया गया था
हा सिद्धी प्राप्त महर्षी वेदव्यासांनी यथार्थ रीतीने सांगितलेला प्राचीन इतिहास आहे. यात पराशर मुनींच्या दिव्य मताचे वर्णन आहे, आणि पूर्वकाळी हा शक्र (इंद्र) याला उपदेश करण्यात आला होता।
Verse 76
तदेतत् ते समाख्यातं तथ्य॑ ब्रह्म सनातनम् | ह्ृदयं सर्वभूतानां श्रुतिरिषा सनातनी,वही यह मन्त्र तुमसे कहा गया है। यह गायत्री-मन्त्र सत्य एवं सनातन ब्रह्मरूप है। यह सम्पूर्ण भूतोंका हृदय एवं सनातन श्रुति है
अशा प्रकारे मी तुला ते सत्य—सनातन ब्रह्म—सांगितले. हाच (मंत्र/उपदेश) सर्व भूतांचे हृदय आहे आणि हीच सनातन श्रुती आहे।
Verse 77
सोमादित्यान्वया: सर्वे राघवा: कुरवस्तथा । पठन्ति शुचयो नित्यं सावित्रीं प्राणिनां गतिम्,चन्द्र, सूर्य, रघु और कुरुके वंशरमें उत्पन्न हुए सभी राजा पवित्र भावसे प्रतिदिन गायत्री- मन्त्रका जप करते आये हैं। गायत्री संसारके प्राणियोंकी परमगति है
सोम व आदित्यवंशीय, रघुवंशी तसेच कुरुवंशी—असे सर्व राजे शुचि आचरणाने नित्य सावित्री (गायत्री)चा पाठ करीत आले आहेत. गायत्री हीच प्राण्यांची परम गती सांगितली आहे।
Verse 78
अभ्यासे नित्यं देवानां सप्तर्षीणां ध्रुवस्थ च । मोक्षणं सर्वकृच्छाणां मोचयत्यशुभात् सदा,प्रतिदिन देवताओं, सप्तर्षियों और ध्रुवका बारंबार स्मरण करनेसे समस्त संकटोंसे छुटकारा मिल जाता है। उनका कीर्तन सदा ही अशुभ अर्थात् पापके बन्धनसे मुक्त कर देता है
देव, सप्तर्षी आणि ध्रुव यांचे नित्य अभ्यासपूर्वक स्मरण केल्याने सर्व क्लेशांपासून मुक्ती मिळते; त्यांचे कीर्तन सदैव अशुभ—म्हणजे पाप—यांच्या बंधनातून सोडवते।
Verse 79
वृद्धैः काश्यपगौतमप्र भृतिभि र्भग्वड्धिरो5त्रयादिभि: शुक्रागस्त्यबृहस्पतिप्रभतिभिर्रह्यर्षिभि: सेवितम् । भारद्वाजमतमृचीकतनयै: प्राप्त वसिष्ठात् पुनः सावित्रीमधिगम्य शक्रवसुभि: कृत्स्ना जिता दानवा:,काश्यप, गौतम, भृगु, अंगिरा, अत्रि, शुक्र, अगस्त्य और बृहस्पति आदि वृद्ध ब्रह्मर्षियोंने सदा ही गायत्री-मन्त्रका सेवन किया है। महर्षि भारद्वाजने जिसका भलीभाँति मनन किया है, उस गायत्री-मन्त्रको ऋचीकके पुत्रोंने उन्हींसे प्राप्त किया तथा इन्द्र और वसुओंने वसिष्ठजीसे सावित्री-मन्त्रको पाकर उसके प्रभावसे सम्पूर्ण दानवोंको परास्त कर दिया
भीष्म म्हणाले—काश्यप, गौतम, भृगु, अंगिरा, अत्रि इत्यादी तसेच शुक्र, अगस्त्य, बृहस्पती इत्यादी वृद्ध ब्रह्मर्षींनी सावित्री (गायत्री) मंत्राचे नित्य सेवन केले आहे. महर्षी भारद्वाजांनी या मंत्राचे सखोल मनन केले; ऋचीकांचे पुत्र ते त्यांच्याकडूनच प्राप्त झाले. पुढे वसिष्ठांकडून सावित्री मिळवून इंद्र व वसूंनी तिच्या प्रभावाने सर्व दानवांना पराभूत केले.
Verse 80
यो गोशतं कनकश्ड्रमयं ददाति विप्राय वेदविदुषे च बहुश्रुताय । दिव्यां च भारतकथां कथयेच्च नित्यं तुल्यं फलं भवति तस्य च तस्य चैव,जो मनुष्य विद्वान् और बहुश्रुत ब्राह्यणको सौ गौओंके सींगोंमें सोना मढ़ाकर दान करता है और जो केवल दिव्य महाभारत कथाका प्रतिदिन प्रवचन करता है, उन दोनोंको एक-सा पुण्य फल प्राप्त होता है
भीष्म म्हणाले—जो वेदज्ञ व बहुश्रुत ब्राह्मणाला शिंगांवर सोने मढवलेल्या शंभर गायी दान देतो, आणि जो नित्य दिव्य महाभारत-कथेचे प्रवचन करतो—या दोघांनाही समान पुण्यफल प्राप्त होते.
Verse 81
भृगुका नाम लेनेसे धर्मकी वृद्धि होती है। वसिष्ठ मुनिको नमस्कार करनेसे वीर्य बढ़ता है। राजा रघुको प्रणाम करनेवाला क्षत्रिय संग्रामविजयी होता है तथा अश्विनीकुमारोंका नाम लेनेवाले मनुष्यको कभी रोग नहीं सताता
भृगूंचे नाव घेतल्याने धर्म वाढतो. वसिष्ठ मुनींना नमस्कार केल्याने वीर्य वाढते. राजा रघूंना प्रणाम करणारा क्षत्रिय संग्रामात विजयी होतो. आणि अश्विनीकुमारांचे नाव घेणाऱ्या मनुष्याला कधीही रोग बाधत नाही.
Verse 82
एषा ते कथिता राजन् सावित्री ब्रह्म शाश्वती | विवक्षुरसि यच्चान्यत् तत् ते वक्ष्यामि भारत,राजन! यह सनातन ब्रह्मरूपा गायत्रीका माहात्म्य मैंने तुमसे कहा है। भारत! अब और जो कुछ भी तुम पूछना चाहते हो, वह भी तुम्हें बताऊँगा
राजन्, ही शाश्वत ब्रह्मरूप सावित्री (गायत्री) मी तुला सांगितली. भारत, तुला आणखी जे काही विचारायचे असेल तेही मी तुला सांगेन.
Verse 83
धर्मो विवर्धति भूगो: परिकीर्तनेन वीर्य विवर्धति वसिष्ठनमोनतेन । संग्रामजिद् भवति चैव रघुं नमस्यन् स्यादश्विनौ च परिकीर्तयतो न रोग:
भृगूंची कीर्ती केल्याने धर्म वाढतो, वसिष्ठांना नमस्कार केल्याने वीर्य वाढते. रघूंना प्रणाम केल्याने संग्रामात विजय मिळतो, आणि अश्विनीकुमारांचे कीर्तन करणाऱ्यास रोग होत नाही.
Verse 150
इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि सावित्रीव्रतोपाख्याने पञ्चाशदधिकशततमो<ध्याय:
अशा प्रकारे श्रीमहाभारतातील अनुशासनपर्वातील दानधर्मपर्वात सावित्रीव्रतोपाख्यानांत एकशे पन्नासावा अध्याय समाप्त होतो।
Verse 153
इत्येते द्वादशादित्या: काश्यपेया इति श्रुति: । वेदके शतरुद्रिय प्रकरणमें महात्मा रुद्रके सैकड़ों नाम बताये गये हैं। अंश, भग, मित्र, जलेश्वर, वरुण, धाता, अर्यमा, जयन्त, भास्कर, त्वष्टा, पूषा, इन्द्र तथा विष्णु--ये बारह आदित्य कहलाते हैं। ये सब-के-सब कश्यपके पुत्र हैं
भीष्म म्हणाले—“हेच बारा आदित्य; श्रुतीप्रमाणे ते कश्यपाचे पुत्र आहेत. अंश, भग, मित्र, वरुण, धाता, अर्यमा, जयंत, भास्कर, त्वष्टा, पूषा, इंद्र आणि विष्णु—हे बारा आदित्य होत.”
Verse 163
प्रत्यूषश्न प्रभासश्च॒ वसवोडूष्टौ प्रकीर्तिता: । धर, ध्रुव, सोम, सावित्र, अनिल, अनल, प्रत्यूष और प्रभास--ये आठ वसु कहे गये हैं
भीष्म म्हणाले—“प्रत्यूष आणि प्रभास ही नावेही सांगितली; अशा रीतीने वसु आठ मानले गेले. धर, ध्रुव, सोम, सावित्र, अनिल, अनल, प्रत्यूष आणि प्रभास—हे आठ वसु स्मरणात आहेत।”
Verse 173
मार्तण्डस्यात्मजावेतौ संज्ञानासाविनिर्गतौ । नासत्य और दस्न--ये दोनों अश्विनीकुमारके नामसे प्रसिद्ध हैं। इनकी उत्पत्ति भगवान् सूर्यके वीर्यसे हुई है। ये अश्वरूपधारिणी संज्ञा देवीके नाकसे प्रकट हुऐ थे (ये सब मिलाकर तैंतीस देवता हैं)
भीष्म म्हणाले—“हे दोघे मार्तंड (सूर्य) याचे पुत्र असून अश्वरूप धारण करणाऱ्या संज्ञा देवीच्या नाकातून प्रकट झाले. नासत्य आणि दस्र—हे दोघे अश्विनीकुमार म्हणून प्रसिद्ध; दिवाकराच्या वीर्यातून त्यांची उत्पत्ती झाली. अशा रीतीने हे देव तैंतीसांच्या गणनेत येतात।”
Verse 283
कीर्तयन् प्रयत: सर्वान् सर्वपापै: प्रमुच्यते । इसी प्रकार नन्दीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज, सम्पूर्ण लोकोंके स्वामी गणेश, विनायक, सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण, नक्षत्र, नदियाँ, आकाश, पक्षिराज गरुड़, पृथ्वीपर तपसे सिद्ध हुए महात्मा, स्थावर, जंगम, हिमालय, समस्त पर्वत, चारों समुद्र, भगवान् शंकरके तुल्य पराक्रमवाले उनके अनुचरगण, विष्णुदेव, जिष्णु, स्कन्द और अम्बिका--इन सबके नामोंका शुद्धभावसे कीर्तन करनेवाले मनुष्यके सब पाप नष्ट हो जाते हैं
भीष्म म्हणाले—“जो मनुष्य संयमाने व शुद्ध भावाने या सर्वांची नावे कीर्तन करतो, तो सर्व पापांतून मुक्त होतो. नंदीश्वर, महाकाय, ग्रामणी, वृषभध्वज; सर्वलोकांचे स्वामी गणेश—विनायक—तसे सौम्यगण, रुद्रगण, योगगण, भूतगण; नक्षत्रे, नद्या, आकाश; पक्षिराज गरुड; तपाने सिद्ध झालेले महात्मे; स्थावर-जंगम; हिमालय व सर्व पर्वत; चारही समुद्र; शंकरास तुल्य पराक्रम असलेले त्यांचे अनुचरगण; आणि विष्णु, जिष्णु, स्कंद व अंबिका—या सर्वांची नावे शुद्ध अंतःकरणाने घेतल्यास सर्व पापांचा नाश होतो।”
Verse 473
प्रजापति सार्वभौम॑ कीर्तयेद् वसुधाधिपम् । इनका नाम लेनेवाले मनुष्यके धर्म, अर्थ और कामकी सिद्धि होती है। वेनकुमार नृपश्रेष्ठ पृथुका, जिनकी यह पृथ्वी पुत्री हो गयी थी तथा जो प्रजापति एवं सार्वभौम सम्राट् थे, कीर्तन करना चाहिये
भीष्म म्हणाले—जो प्रजापतीही होते आणि सार्वभौम वसुधाधिपतीही, त्या सम्राटाचे कीर्तन व स्तुती करावी. त्यांचे नाव घेतल्याने मनुष्याला धर्म, अर्थ आणि काम—या तिन्हींची सिद्धी होते. म्हणून वेनपुत्र, नृपश्रेष्ठ पृथू यांचे गुणगान करावे—ज्यांच्यासाठी ही पृथ्वी कन्येसमान झाली आणि जे प्रजापती व सार्वभौम सम्राट होते.