
Babhruvāhana’s Lament and Appeal for Expiation (प्रायश्चित्त-याचना)
Upa-parva: Aśvamedha-Anubandha (Babhruvāhana–Arjuna Encounter Cycle)
Vaiśaṃpāyana narrates a scene of acute aftermath: the queen, having ceased lamentation, holds her husband’s feet and sits, breathing heavily, gazing upon her son. Babhruvāhana regains consciousness, sees his mother on the battlefield, and voices escalating self-reproach. He frames the sight of his mother reclining beside a fallen hero as unbearable, calls attention to the fallen warrior’s ornaments, and publicly identifies the slain as his “father,” addressing Brahmins as witnesses. He requests immediate śānti rites and asks what prāyaścitta could exist for the sin of killing one’s father (pitṛ-hatyā), asserting that no adequate expiation is available and anticipating hell as the consequence of guru-vadha. He contrasts standard expiations for killing a kṣatriya with the near-impossibility of atoning for patricide. He then addresses the Nāga princess (Ulūpī), claiming he has fulfilled her desire by striking down Arjuna, and declares intent to follow the path of the ancestors, unable to sustain himself. He makes a truth-assertion (satya) before all beings: if his father does not rise, he will fast unto death on that very ground. The chapter closes with Babhruvāhana falling silent, adopting a prāyopaveśa posture, shifting the narrative from combat to ritual-ethical resolution.
Chapter Arc: रणभूमि में धनंजय अर्जुन का निहत होकर पड़ा होना—और उसके ऊपर मणिपुर-नरेश बभ्रुवाहन का अपराध-बोध; चित्रांगदा का विलाप और मूर्च्छा से दृश्य का आरम्भ। → होश में आते ही दिव्यवपुर्धरा चित्रांगदा उलूपी को देखती है और कटु वाणी में कहती है कि ‘तुम्हारे कारण’ मेरे पुत्र ने अपने ही स्वामी को बाण से गिरा दिया। उलूपी पर दोषारोपण, मातृत्व का आक्रोश, और पुत्र के हाथों पति-वध की असह्य विडम्बना तनाव को बढ़ाती है। → उलूपी विनयपूर्वक आग्रह करती है—‘यदि अर्जुन सर्वथा अपराधी भी हों, तो भी क्षमा करो; उन्हें जीवित करो’—और संजीवनी-मणि के प्रयत्न से अर्जुन का पुनर्जीवन होता है; देवपुष्प-वृष्टि और इन्द्र की दिव्य सुमन-वर्षा से क्षण का उत्कर्ष। → अर्जुन उठकर पूर्ण स्वस्थ होते हैं, बभ्रुवाहन को हृदय से लगाते हैं और उसके मस्तक को सूँघकर पिता-स्नेह से आश्वस्त करते हैं; बभ्रुवाहन भी शिर झुकाकर उलूपी से (और समस्त प्रसंग से) सत्य जानने/पूछने की मुद्रा में आता है—दोष, दण्ड और करुणा का संतुलन स्थापित। → अर्जुन के पुनर्जीवन के बाद भी प्रश्न शेष रहता है—यह नियति-रचित द्वन्द्व क्यों घटित हुआ, और उलूपी की योजना/धर्म-प्रेरणा का वास्तविक हेतु क्या था?
Verse 1
अफ--णकात अशीतितमो<्ध्याय: चित्रांगदाका विलाप, मूर्च्छासे जगनेपर बभ्रुवाहनका शोकोदगार और उलूपीके प्रयत्नसे संजीवनीमणिके द्वारा अर्जुनका पुनः जीवित होना वैशम्पायन उवाच ततो बहुतरं भीरुर्विलप्य कमलेक्षणा । मुमोह दुःखसंतप्ता पपात च महीतले,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर भीरु स्वभाववाली कमलनयनी चित्रांगदा पतिवियोग-दुःखसे संतप्त होकर बहुत विलाप करती हुई मूर्च्छित हो गयी और पृथ्वीपर गिर पड़ी
វៃសម្បាយនៈ បាននិយាយថា៖ បន្ទាប់មក ចិត្រាង្គដា អ្នកមានភ្នែកដូចផ្កាឈូក មានចិត្តខ្លាចដោយសភាពធម្មជាតិ បានយំសោកយ៉ាងយូរ។ ត្រូវកម្តៅទុក្ខនៃការបែកពីស្វាមីដុតឆេះ នាងសន្លប់ ហើយដួលលើផែនដី។
Verse 2
प्रतिलभ्य च सा संज्ञां देवी दिव्यवपुर्धरा । उलूपीं पन्नगसुतां दृष्टवेदं वाक्यमब्रवीत्,कुछ देर बाद होशमें आनेपर दिव्यरूपधारिणी देवी चित्रांगदाने नागकन्या उलूपीको सामने खड़ी देख इस प्रकार कहा--
វៃសម្បាយនៈ បាននិយាយថា៖ ពេលបានស្មារតីឡើងវិញ នាងចិត្រាង្គដា អ្នកមានរូបកាយភ្លឺរលោងដូចទេវី បានឃើញ អុលូពី កូនស្រីកើតពីពួកនាគ ឈរនៅមុខ ហើយនាងបាននិយាយពាក្យទាំងនេះ។
Verse 3
उलूपि पश्य भर्तारें शयानं निहतं रणे । त्वत्कृते मम पुत्रेण बाणेन समितिंजयम्,“उलूपी! देखो, हम दोनोंके स्वामी मारे जाकर रणभूमिमें सो रहे हैं। तुम्हारी प्रेरणासे ही मेरे बेटेने समरविजयी अर्जुनका वध किया है
វៃសម្បាយនៈ បាននិយាយថា៖ «អុលូពី! មើលចុះ—ស្វាមីរបស់យើងទាំងពីរ ដេកលើសមរភូមិ ដោយត្រូវសម្លាប់។ ដោយសារអ្នក កូនប្រុសរបស់ខ្ញុំបានបាញ់ព្រួញ សម្លាប់ អរជុន អ្នកឈ្នះសង្គ្រាម!»
Verse 4
ननु त्वमार्यधर्मज्ञा ननु चासि पतिव्रता । यत्त्वस्कृतेड्यं पतित: पतिस्ते निहतो रणे,“बहिन! तुम तो आर्यधर्मको जाननेवाली और पतिव्रता हो। तथापि तुम्हारी ही करतूतसे ये तुम्हारे पति इस समय रणभूमिमें मरे पड़े हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «មែនហើយ អ្នកស្គាល់ធម៌ដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់ (អារីយធម៌) ហើយមែនហើយ អ្នកជាស្ត្រីស្មោះត្រង់ចំពោះស្វាមី។ ប៉ុន្តែដោយសារអំពើដែលអ្នកបានធ្វើ ស្វាមីរបស់អ្នក—អ្នកគួរឲ្យគោរព—ឥឡូវនេះដេកដួល ស្លាប់នៅលើសមរភូមិ»។
Verse 5
किंतु सर्वापराधो<5यं यदि तेड्द्य धनंजय: । क्षमस्व याच्यमाना वै जीवयस्व धनंजयम्,'किंतु यदि ये अर्जुन सर्वथा तुम्हारे अपराधी हों तो भी आज क्षमा कर दो। मैं तुमसे इनके प्राणोंकी भीख माँगती हूँ। तुम धनंजयको जीवित कर दो
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ទោះបីធនញ្ជយ (អរជុន) នេះបានប្រព្រឹត្តកំហុសទាំងអស់ចំពោះអ្នកក៏ដោយ សូមអភ័យទោសឲ្យគាត់នៅថ្ងៃនេះ។ ខ្ញុំសូមអង្វរជីវិតរបស់គាត់—សូមឲ្យធនញ្ជយរស់នៅ»។
Verse 6
ननु त्वमार्ये धर्मज्ञा त्रैलोक्यविदिता शुभे | यद् घातयित्वा पुत्रेण भर्तारें नानुशोचसि,'आर्ये! शुभे! तुम धर्मको जाननेवाली और तीनों लोकोंमें विख्यात हो। तो भी आज पुत्रसे पतिकी हत्या कराकर तुम्हें शोक या पश्चात्ताप नहीं हो रहा है, इसका क्या कारण है?
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ប៉ុន្តែ មែនហើយ ស្ត្រីអភិជន—អ្នកដ៏មង្គល—អ្នកជាអ្នកដឹងធម៌ ហើយល្បីល្បាញទូទាំងបីលោក។ ហេតុអ្វីបានជា បន្ទាប់ពីឲ្យកូនប្រុសរបស់អ្នកសម្លាប់ស្វាមីរបស់អ្នកហើយ អ្នកមិនសោកស្តាយ ឬមានវិប្បដិសារីទេ?»
Verse 7
नाहं शोचामि तनयं हतं पन्नगनन्दिनि । पतिमेव तु शोचामि यस्यातिथ्यमिदं कृतम्,“नागकुमारी! मेरा पुत्र भी मरा पड़ा है, तो भी मैं उसके लिये शोक नहीं करती। मुझे केवल पतिके लिये शोक हो रहा है, जिनका मेरे यहाँ इस तरह आतिथ्य-सत्कार किया गया”
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ នាគកញ្ញា! ទោះបីកូនប្រុសរបស់ខ្ញុំដេកស្លាប់នៅទីនោះ ខ្ញុំក៏មិនសោកស្តាយចំពោះគាត់ទេ។ ខ្ញុំសោកស្តាយតែស្វាមីរបស់ខ្ញុំប៉ុណ្ណោះ—ព្រោះហេតុនេះបានកើតឡើង បន្ទាប់ពីគាត់បានធ្វើការទទួលភ្ញៀវ (អាទិថិសត្ការ)»។
Verse 8
इत्युक्त्वा सा तदा देवीमुलूपीं पन्नगात्मजाम् । भर्तारमभिगम्येदमित्युवाच यशस्विनी,नागकन्या उलूपीदेवीसे ऐसा कहकर यशस्विनी चित्राड़दा उस समय पतिके निकट गयी और उन्हें सम्बोधित करके इस प्रकार विलाप करने लगी--
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នាងបាននិយាយដូច្នេះទៅកាន់ទេវី អុលូពី (Ulūpī) នាគកញ្ញាដែលកើតពីពូជនាគ។ បន្ទាប់មក ស្ត្រីដ៏ល្បីល្បាញនោះបានចូលទៅជិតស្វាមី ហើយហៅគាត់មកនិយាយ ដោយចាប់ផ្តើមពោលពាក្យដូច្នេះ—ទាំងយំសោក និងអង្វរចំពោះអ្វីដែលត្រឹមត្រូវ នៅមុខទុក្ខវេទនាដែលកំពុងខិតមក។
Verse 9
उत्तिष्ठ कुरुमुख्यस्य प्रियमुख्य मम प्रिय । अयमश्वो महाबाहो मया ते परिमोक्षित:,“कुरुराजके प्रियतम और मेरे प्राणाधार! उठो। महाबाहो! मैंने तुम्हारा यह घोड़ा छुड़वा दिया है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ចូរឈរឡើង—អ្នកជាទីស្រឡាញ់បំផុតក្នុងចំណោមអ្នកជាទីស្រឡាញ់របស់កុលកុរុដ៏ឧត្តម—ជាទីស្រឡាញ់របស់ខ្ញុំផ្ទាល់។ ឱ មហាបាហូ! ខ្ញុំបានដោះស្រាយ និងសង្គ្រោះសេះនេះឲ្យអ្នកហើយ»។
Verse 10
ननु त्वया नाम विभो धर्मराजस्य यज्ञिय: । अयमश्चो<्नुसर्तव्य: स शेषे कि महीतले,'प्रभो! तुम्हें तो महाराज युधिष्ठिरके यज्ञ-सम्बन्धी अश्वके पीछे-पीछे जाना है; फिर यहाँ पृथ्वीपर कैसे सो रहे हो?
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «មែនហើយ ឱ ព្រះអម្ចាស់ដ៏មានអានុភាព! អ្នកត្រូវតែដើរតាមសេះបូជាយញ្ញរបស់ព្រះមហាក្សត្រ យុធិષ્ઠិរ។ ហេតុអ្វីបានជាអ្នកដេកនៅទីនេះលើផែនដី ដោយទុកខ្លួនឲ្យនៅក្រោយ?»
Verse 11
त्वयि प्राणा ममायत्ता: कुरूणां कुरुनन्दन । स कस्मात् प्राणदो<न्येषां प्राणात् संत्यक्तवानसि,“कुरुनन्दन! मेरे और कौरवोंके प्राण तुम्हारे ही अधीन हैं। तुम तो दूसरोंके प्राणदाता हो, तुमने स्वयं कैसे प्राण त्याग दिये?”
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ កុរុនន្ទន! ជីវិតរបស់ខ្ញុំ និងជីវិតរបស់ប្រជាកុរុទាំងឡាយ ស្ថិតនៅក្រោមការពឹងផ្អែកលើអ្នក។ អ្នកដែលធ្លាប់ជាអ្នកផ្តល់ និងការពារជីវិតរបស់អ្នកដទៃ—ហេតុអ្វីបានជាអ្នកវិញ បោះបង់ជីវិតរបស់ខ្លួន?»
Verse 12
उलूपि साधु पश्येमं पतिं निपतितं भुवि | पुत्रं चेमं समुत्साद्य घातयित्वा न शोचसि,(इतना कहकर वह फिर उलूपीसे बोली--) '“उलूपी! ये पतिदेव भूतलपर पड़े हैं। तुम इन्हें अच्छी तरह देख लो। तुमने इस बेटेको उकसाकर स्वामीकी हत्या करायी है। कया इसके लिये तुम्हें शोक नहीं होता?
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឧលូពី! ចូរមើលឲ្យច្បាស់—ស្វាមីរបស់អ្នកដេកដួលលើដី។ អ្នកបានញុះញង់កូនប្រុសនេះ ហើយបណ្តាលឲ្យគេសម្លាប់ម្ចាស់របស់ខ្លួន។ តើអ្នកមិនសោកស្តាយចំពោះអ្វីដែលអ្នកបានបង្កឡើយឬ?»
Verse 13
काम॑ स्वपितु बालो<यं भूमौ मृत्युवशं गतः । लोहिताक्षो गुडाकेशो विजय: साधु जीवतु,'मृत्युके वशमें पड़ा हुआ मेरा यह बालक चाहे सदाके लिये भूमिपर सोता रह जाय, किंतु निद्राके स्वामी, विजय पानेवाले अरुणनयन अर्जुन अवश्य जीवित हों--यही उत्तम है
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «សូមឲ្យកូនតូចនេះ ដែលបានធ្លាក់ក្រោមអំណាចមរណៈ ដេកលើដីយូរប៉ុនណាក៏ដោយ; តែសូមឲ្យអរជុន—ភ្នែកក្រហម អ្នកគ្រប់គ្រងនិទ្រា (គុដាកេស) និងអ្នកឈ្នះជានិច្ច—រស់រានមានជីវិត។ នោះហើយជាផ្លូវល្អប្រសើរ»។
Verse 14
नापराधो<स्ति सुभगे नराणां बहुभार्यता । प्रमदानां भवत्येष मा ते5भूद बुद्धिरीदृशी,“सुभगे! कोई पुरुष बहुत-सी स्त्रियोंको पत्नी बनाकर रखे, तो उनके लिये यह अपराध या दोषकी बात नहीं होती। स्त्रियाँ यदि ऐसा करें (अनेक पुरुषोंसे सम्बन्ध रखें) तो यह उनके लिये अवश्य दोष या पापकी बात होती है। अतः तुम्हारी बुद्धि ऐसी क्रूर नहीं होनी चाहिये
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «នាងសុភគេ! សម្រាប់បុរស ការមានភរិយាច្រើន មិនត្រូវបានចាត់ទុកថាជាកំហុសទេ។ តែសម្រាប់ស្ត្រី ការប្រព្រឹត្តបែបនោះ—មានទំនាក់ទំនងជាមួយបុរសជាច្រើន—ត្រូវបានចាត់ទុកថាជារឿងគួរត្រូវបន្ទោស និងជាបាប។ ដូច្នេះ កុំឲ្យចិត្តរបស់នាងក្លាយទៅជាបែបនេះ (រឹងរាក់ទាក់ ឬវង្វេង) ឡើយ»
Verse 15
सख्यं चैतत् कृतं धात्रा शश्वदव्ययमेव तु । सख्यं समभिजानीहि सत्यं सड्भतमस्तु ते,“विधाताने पति और पत्नीकी मित्रता सदा रहनेवाली और अटूट बनायी है। (तुम्हारा भी इनके साथ वही सम्बन्ध है।) इस सख्यभावके महत्त्वको समझो और ऐसा उपाय करो जिससे तुम्हारी इनके साथ की हुई मैत्री सत्य एवं सार्थक हो
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «មិត្តភាពនេះ ត្រូវបានព្រះវិធាតាបញ្ញត្តិឲ្យមាន—ជានិច្ច និងមិនអាចបំបែកបាន។ ដូច្នេះ ចូរនាងទទួលស្គាល់ និងគោរពមិត្តភាពនេះ; ចូរឲ្យសម្ពន្ធរបស់នាងជាមួយពួកគេ ក្លាយជាការពិត និងសម្រេចផលពេញលេញ»
Verse 16
पुत्रेण घातयित्वैनं पतिं यदि न मेउद्य वै जीवन्तं दर्शयस्यद्य परित्यक्ष्यामि जीवितम्,“तुम्हींने बेटेको लड़ाकर उसके द्वारा इन पतिदेवकी हत्या करवायी है। यह सब करके यदि आज तुम पुनः इन्हें जीवित करके न दिखा दोगी तो मैं भी प्राण त्याग दूँगी
«នាងបានបញ្ឆោតកូនប្រុសរបស់ខ្ញុំ ឲ្យវាយសម្លាប់ស្វាមីរបស់ខ្ញុំ។ បន្ទាប់ពីបានធ្វើរឿងទាំងនេះហើយ ប្រសិនបើថ្ងៃនេះ—មែនថ្ងៃនេះ—នាងមិនបង្ហាញឲ្យខ្ញុំឃើញស្វាមីខ្ញុំរស់វិញទេ ខ្ញុំនឹងបោះបង់ជីវិតរបស់ខ្ញុំ»
Verse 17
साहं दुःखान्विता देवि पतिपुत्रविनाकृता । इहैव प्रायमाशिपष्ये प्रेक्षन्त्यास्ते न संशय:,'देवि! मैं पति और पुत्र दोनोंसे वज्चित होकर दु:खमें डूब गयी हूँ। अतः अब यहीं तुम्हारे देखते-देखते मैं आमरण उपवास करूँगी, इसमें संशय नहीं है”
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ទេវី! ខ្ញុំត្រូវបានដកហូតទាំងស្វាមី និងកូនប្រុស ហើយលង់ក្នុងទុក្ខសោក។ ដូច្នេះ នៅទីនេះផ្ទាល់—នៅមុខភ្នែករបស់ទេវី—ខ្ញុំនឹងធ្វើព្រាយៈ (អាហារមិនទទួលរហូតដល់ស្លាប់) ដោយគ្មានសង្ស័យ»
Verse 18
इत्युक्त्वा पन्नगसुतां सपत्नी चैत्रवाहनी । ततः प्रायमुपासीना तूष्णीमासीज्जनाधिप,नरेश्वर! नागकन्यासे ऐसा कहकर उसकी सौत चित्रवाहनकुमारी चित्रांगा आमरण उपवासका संकल्प लेकर चुपचाप बैठ गयी
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នាងបាននិយាយដូច្នេះទៅកាន់កញ្ញានាគ ហើយបន្ទាប់មក ស្ត្រីរួមស្វាមីរបស់នាង—ព្រះនាង ចិត្រង្គា កូនស្រីនៃចិត្រវាហន—បានទទួលព្រមានព្រាយៈ (អាហារមិនទទួលរហូតដល់ស្លាប់)។ នាងអង្គុយស្ងៀមស្ងាត់យ៉ាងឧត្តុង្គ មិនរអាក់រអួលឡើយ ឱ ព្រះមហាក្សត្រ ជាអធិបតីនៃមនុស្ស។
Verse 19
वैशम्पायन उवाच ततो विलप्य विरता भर्तु: पादौ प्रगृह् सा । उपविष्टा भवद् दीना सोच्छवासं पुत्रमीक्षती,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! तदनन्तर विलाप करके उससे विरत हो चित्रांगदा अपने पतिके दोनों चरण पकड़कर दीनभावसे बैठ गयी और लंबी साँस खींच- खींचकर अपने पुत्रकी ओर भी देखने लगी
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ បន្ទាប់ពីនាងយំសោកហើយស្ងប់ស្ងាត់ ចិត្រាង្គដាបានចាប់កាន់ព្រះបាទទាំងពីររបស់ស្វាមី។ នាងអង្គុយចុះដោយទុក្ខសោកអស់កម្លាំង ដកដង្ហើមវែងៗជាបន្តបន្ទាប់ ហើយភ្នែកនាងមើលទៅកាន់កូនប្រុសម្តងហើយម្តងទៀត—រូបភាពនៃការអង្វរ និងទុក្ខវេទនារបស់ម្តាយ ក្នុងព្រំដែននៃភក្ដីភាពរបស់ភរិយា។
Verse 20
ततः संज्ञां पुनर्लब्ध्वा स राजा बभ्रुवाहन: । मातरं तामथालोक्य रणभूमावथाब्रवीत्,थोड़ी ही देरमें राजा बभ्रुवाहनको पुनः चेत हुआ। वह अपनी माताको रणभूमिमें बैठी देख इस प्रकार विलाप करने लगा--
បន្ទាប់មក ព្រះបាទបព្រហូវាហនៈបានស្ដារស្មារតីឡើងវិញ។ ព្រះអង្គឃើញមាតារបស់ព្រះអង្គអង្គុយនៅលើសមរភូមិ ហើយព្រះអង្គបាននិយាយដូច្នេះ—ដោយសោកស្តាយ និងទុក្ខវេទនា—នៅកណ្ដាលទិដ្ឋភាពនៃសង្គ្រាម។ ពេលនោះបង្ហាញការភ្ញាក់ផ្អើលនៃធម៌ក្នុងសមរភូមិ៖ ពេលសាច់ញាតិ និងកាតព្វកិច្ចប៉ះទង្គិច បេះដូងអ្នកយុទ្ធបែរចេញពីជ័យជម្នះទៅរកការស្តាយក្រោយ និងទំនួលខុសត្រូវ។
Verse 21
इतो दुःखतरं कि नु यन्मे माता सुखैधिता । भूमौ निपतितं वीरमनुशेते मृतं पतिम्,“हाय! जो अबतक सुखोंमें पली थी, वही मेरी माता चित्रांगदा आज मृत्युके अधीन होकर पृथ्वीपर पड़े हुए अपने वीर पतिके साथ मरनेका निश्चय करके बैठी हुई है। इससे बढ़कर दुःखकी बात और क्या हो सकती है?
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ទុក្ខអ្វីអាចធ្ងន់ធ្ងរជាងនេះទៀត? មាតារបស់ខ្ញុំ ដែលធ្លាប់បានចិញ្ចឹមក្នុងសុខស្រួល ឥឡូវដេកលើដីជិតស្វាមីវីរបុរសដែលដួលស្លាប់ កាន់កាប់គាត់ដូចជាមនុស្សស្លាប់ ហើយសម្រេចចិត្តតាមគាត់ទៅសេចក្តីស្លាប់»។
Verse 22
निहन्तारं रणे<5रीणां सर्वशस्त्रभृतां वरम् मया विनिहतं संख्ये प्रेक्षते दुर्मरं बत,'संग्राममें जिनका वध करना दूसरेके लिये नितान्त कठिन है, जो युद्धमें शत्रुओंका संहार करनेवाले तथा सम्पूर्ण शस्त्रधारियोंमें श्रेष्ठ हैं, उन्हीं मेरे पिता अर्जुनको आज यह मेरे ही हाथों मरकर पड़ा देख रही है
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «អាលាស! អ្នកសម្លាប់សត្រូវក្នុងសង្គ្រាម អ្នកល្អឯកក្នុងចំណោមអ្នកកាន់អាវុធទាំងអស់—ព្រះបិតារបស់ខ្ញុំ អរជុន—ត្រូវបានខ្ញុំវាយសម្លាប់ក្នុងការប្រយុទ្ធ; ហើយឥឡូវគាត់ដេកនៅទីនោះ ជាទិដ្ឋភាពដែលស្ទើរមិនអាចទ្រាំមើលបាន»។
Verse 23
अहो<स्या हृदयं देव्या दृढं यज्ञ विदीर्यते । व्यूढोरस्क॑ महाबाहें प्रेक्षन्त्या निहतं पतिम्
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «អាលាស! ទោះបីបេះដូងនាងរឹងមាំ ក៏កំពុងត្រូវបែកបាក់ចេញជាចំណិតៗ ឱ យជ្ញៈ។ ស្ត្រីដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់នោះ ទ្រូងទូលាយ ដៃខ្លាំង មើលឃើញស្វាមីរបស់នាងដេកស្លាប់»។
Verse 24
यत्र नाहं न मे माता विप्रयुज्येत जीवितात्,“तभी तो इस संकटके समय भी मेरे और मेरी माताके प्राण नहीं निकलते। हाय! हाय! मुझे धिककार है, लोगों! देख लो! मुझ पुत्रके द्वारा मारे गये कुरुवीर अर्जुनका सुनहरा कवच यहाँ पृथ्वीपर फेंका पड़ा है”
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ក្នុងវិបត្តិដ៏ធំនេះ ខ្ញុំ និងមាតារបស់ខ្ញុំ មិនត្រូវបានបំបែកចេញពីជីវិតទេ—អាសូរ! អាសូរ! ខ្ញុំគួរឲ្យអាម៉ាស់ណាស់! មនុស្សទាំងឡាយ ចូរមើលចុះ! នៅលើដីនេះ មានសំបកអាវុធមាសរបស់វីរបុរសកុរុ អរជុន ត្រូវបានបោះចោល—គាត់ត្រូវបានខ្ញុំ ដែលជាកូនរបស់គាត់ សម្លាប់!»
Verse 25
हा हा धिक् कुरुवीरस्य संनाहं काज्चनं भुवि । अपविद्धं हतस्येह मया पुत्रेण पश्यत,“तभी तो इस संकटके समय भी मेरे और मेरी माताके प्राण नहीं निकलते। हाय! हाय! मुझे धिककार है, लोगों! देख लो! मुझ पुत्रके द्वारा मारे गये कुरुवीर अर्जुनका सुनहरा कवच यहाँ पृथ्वीपर फेंका पड़ा है”
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «អាសូរ! អាសូរ—អាម៉ាស់លើខ្ញុំ! ចូរមើលនៅទីនេះ៖ សំបកអាវុធមាសរបស់វីរបុរសកុរុ គេបានបោះចោលលើផែនដី—បោះចោលនៅទីនេះ បន្ទាប់ពីគាត់ត្រូវបានសម្លាប់—សម្លាប់ដោយកូនរបស់គាត់ឯង!»
Verse 26
भो भो पश्यत मे वीरं पितरं ब्राह्मणा भुवि | शयानं वीरशयने मया पुत्रेण पातितम्,हे ब्राह्मणो! देखो, मुझ पुत्रके द्वारा मार गिराये गये मेरे वीर पिता अर्जुन वीरशय्यापर सो रहे हैं
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងឡាយ ចូរមើល—មើលនៅលើដីនេះឯង—ឪពុកវីរបុរសរបស់ខ្ញុំ កំពុងដេកលើវីរាសយ្យា (គ្រែរបស់វីរបុរស) ត្រូវបានខ្ញុំ ដែលជាកូនរបស់គាត់ បាញ់ទម្លាក់!»
Verse 27
ब्राह्मणा: कुरुमुख्यस्य ये मुक्ता हपसारिण: । कुर्वन्ति शान्तिं कामस्य रणे यो5यं मया हत:,'कुरुश्रेष्ठ युधिष्ठिरके घोड़ेके पीछे-पीछे चलनेवाले जो ब्राह्मणलोग शान्तिकर्म करनेके लिये नियुक्त हुए हैं, वे इनके लिये कौन-सी शान्ति करते थे, जो ये रणभूमिमें मेरेद्वारा मार डाले गये!
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ អ្នកប្រសើរបំផុតក្នុងចំណោមកុរុទាំងឡាយ ព្រះព្រាហ្មណ៍ដែលត្រូវបានតែងតាំងឲ្យដើរតាមមុខកុរុ (ព្រះមហាក្សត្រ) ហើយកំពុងប្រតិបត្តិពិធីសន្តិ (śānti) ដើម្បីបំបាត់អាក្រក់—ពួកគេធ្វើ “សន្តិ” អ្វីសម្រាប់មនុស្សនេះ ដែលត្រូវបានខ្ញុំសម្លាប់នៅលើសមរភូមិ? (បើពិធីនោះមានអានុភាព ហេតុអ្វីមរណភាពនេះកើតឡើង?)»
Verse 28
व्यादिशन्तु च किं विप्रा: प्रायश्ित्तमिहाद्य मे । सुनृशंसस्य पापस्य पितृहन्तू रणाजिरे,'ब्राह्मणो! मैं अत्यन्त क्रूर, पापी और समरांगणमें पिताकी हत्या करनेवाला हूँ। बताइये, मेरे लिये अब यहाँ कौन-सा प्रायश्रित्त है?
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «ឱ ព្រះព្រាហ្មណ៍ទាំងឡាយ សូមកំណត់ប្រាប់ខ្ញុំ—នៅទីនេះ និងឥឡូវនេះ—អំពីពិធីលាងបាប (prāyaścitta) សម្រាប់ខ្ញុំ។ ខ្ញុំជាមនុស្សសាហាវ ធ្វើបាបយ៉ាងខ្លាំង—អ្នកដែលបានសម្លាប់ឪពុកខ្លួនឯងនៅលើសមរភូមិ»
Verse 29
दुश्चरा द्वादशसमा हत्वा पितरमद्य वै । ममेह सुनृशंसस्य संवीतस्यास्य चर्मणा,“आज पिताकी हत्या करके मेरे लिये बारह वर्षोतक कठोर व्रतका पालन करना अत्यन्त कठिन है। मुझ क्रूर पितृघातीके लिये यहाँ यही प्रायश्नित्त है कि मैं इन्हींके चमड़ेसे अपने शरीरको आच्छादित करके रहूँ और अपने पिताके मस्तक एवं कपालको धारण किये बारह वर्षोतक विचरता रहूँ। पिताका वध करके अब मेरे लिये दूसरा कोई प्रायश्ित्त नहीं है
Vaiśaṃpāyana said: “Having slain my father today, it is exceedingly hard for me to undertake a harsh vow lasting twelve years. For me—cruel and guilty of patricide—this alone is the expiation here: to keep my body covered with his very hide, and to wander for twelve years bearing my father’s head and skull. After killing my father, there is no other atonement for me.”
Verse 30
शिर:कपाले चास्यैव युज्जत: पितुरद्य मे । प्रायक्षित्तं हि नास्त्यन्यद्धत्वाद्य पितरं मम,“आज पिताकी हत्या करके मेरे लिये बारह वर्षोतक कठोर व्रतका पालन करना अत्यन्त कठिन है। मुझ क्रूर पितृघातीके लिये यहाँ यही प्रायश्नित्त है कि मैं इन्हींके चमड़ेसे अपने शरीरको आच्छादित करके रहूँ और अपने पिताके मस्तक एवं कपालको धारण किये बारह वर्षोतक विचरता रहूँ। पिताका वध करके अब मेरे लिये दूसरा कोई प्रायश्ित्त नहीं है
Vaiśampāyana said: “For me today, after killing my own father, there is no other expiation. My penance must be this alone: to clothe myself in his very skin and to wander bearing his severed head and skull.”
Verse 31
पश्य नागोत्तमसुते भर्तारें निहतं मया । कृतं॑ प्रियं मया तेडद्य निहत्य समरेडर्जुनम्,“नागराजकुमारी! देखो, युद्धमें मैंने तुम्हारे स््वामीका वध किया है। सम्भव है आज समरांगणमें इस तरह अर्जुनकी हत्या करके मैंने तुम्हारा प्रिय कार्य किया हो
Vaiśampāyana said: “Look, O daughter of the foremost of Nāgas: I have slain your husband. Perhaps today, by killing Arjuna in battle, I have done what is dear to you.”
Verse 32
सो5हमद्य गमिष्यामि गति पितृनिषेविताम् । न शव्नोम्यात्मना55त्मानमहं धारयितुं शुभे,'परंतु शुभे! अब मैं इस शरीरको धारण नहीं कर सकता। आज मैं भी उस मार्गपर जाऊँगा, जहाँ मेरे पिताजी गये हैं
Vaiśampāyana said: “Therefore, today I shall depart along the path once trodden by my forefathers. O auspicious lady, I am no longer able to sustain myself—by my own inner strength I cannot continue to bear this body.”
Verse 33
सा त्वं मयि मृते मातस्तथा गाण्डीवधन्वनि । भव प्रीतिमती देवि सत्येनात्मानमालभे,“मातः! देवि! मेरे तथा गाण्डीवधारी अर्जुनके मर जानेपर तुम भलीभाँति प्रसन्न होना। मैं सत्यकी शपथ खाकर कहता हूँ कि पिताजीके बिना मेरा जीवन असम्भव है”
Vaiśaṃpāyana said: “Mother, when I am dead—and likewise when Arjuna, the bearer of the Gāṇḍīva, is dead—be at peace and do not grieve, O goddess-like mother. I swear by truth: without my father, life is impossible for me.”
Verse 34
इत्युक्त्वा स ततो राजा दुःखशोकसमाहत: । उपस्पृश्य महाराज दुःखाद् वचनमब्रवीत्,महाराज! ऐसा कहकर दुःख और शोकसे पीड़ित हुए राजा बभ्रुवाहनने आचमन किया और बड़े दुःखसे इस प्रकार कहा--
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ ពោលដូច្នោះហើយ ព្រះរាជា—ត្រូវទុក្ខ និងសោកវេទនាបង្ក្រាប—បានធ្វើអាចមនៈ (ពិធីស្រូបទឹកតាមវិន័យ)។ បន្ទាប់មក ឱ ព្រះមហាក្សត្រ! ដោយទុក្ខឈឺចាប់លើសលប់ ទ្រង់បានពោលពាក្យទាំងនេះ។
Verse 35
शृण्वन्तु सर्वभूतानि स्थावराणि चराणि च । त्वं च मातर्यथा सत्यं ब्रवीमि भुजगोत्तमे,'संसारके समस्त चराचर प्राणियो! आप मेरी बात सुनें। नागराजकुमारी माता उलूपी! तुम भी सुन लो। मैं सच्ची बात बता रहा हूँ
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «សត្វមានជីវិតទាំងអស់—ទាំងអសកម្ម និងចល័ត—ចូរស្តាប់។ ហើយអ្នកផងដែរ ឱ មាតា អ្នកឧត្តមក្នុងចំណោមពស់ទាំងឡាយ! ខ្ញុំនឹងនិយាយសេចក្តីពិត ដូចដែលវាជាក់ស្តែង»។
Verse 36
यदि नोीत्तिष्ठति जय: पिता मे नरसत्तम: । अस्मिन्नेव रणोद्देशे शोषयिष्ये कलेवरम्,“यदि मेरे पिता नरश्रेष्ठ अर्जुन आज जीवित हो पुनः उठकर खड़े नहीं हो जाते तो मैं इस रणभूमिमें ही उपवास करके अपने शरीरको सुखा डालूँगा
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «បើឪពុករបស់ខ្ញុំ—អរជុន បុរសឧត្តម អ្នកឈ្នះ—មិនរស់ឡើងវិញ មិនឈរឡើងទៀតទេ នោះនៅលើទីសមរភូមិនេះឯង ខ្ញុំនឹងអត់អាហារ រហូតឲ្យរាងកាយស្ងួតស្រក»។
Verse 37
न हि मे पितरं हत्वा निष्कृतिर्विद्यते क्वचित् | नरकं प्रतिपत्स्यामि ध्रुवं गुरुवधार्दित:,'पिताकी हत्या करके मेरे लिये कहीं कोई उद्धारका उपाय नहीं है। गुरुजन (पिता)-के वधरूपी पापसे पीड़ित हो मैं निश्चय ही नरकमें पहडूँगा'
«ព្រោះខ្ញុំ បានសម្លាប់ឪពុកហើយ មិនមានការប្រាយសេចក្តីបាបណាមួយនៅទីណាទេ។ ត្រូវបាបនៃការសម្លាប់គ្រូ—ឪពុករបស់ខ្លួន—បង្ក្រាប ខ្ញុំនឹងធ្លាក់ចូលនរកជាក់ជាមិនខាន»។
Verse 38
वीरं हि क्षत्रियं हत्वा गोशतेन प्रमुच्यते । पितरं तु निहत्यैवं दुर्लभा निष्कृतिर्मम,“किसी एक वीर क्षत्रियका वध करके विजेता वीर सौ गोदान करनेसे उस पापसे छुटकारा पाता है; परंतु पिताकी हत्या करके इस प्रकार उस पापसे छुटकारा मिल जाय, यह मेरे लिये सर्वथा दुर्लभ है
«ព្រោះសម្លាប់វីរខ្សត្រីយម្នាក់ គេអាចរួចផុតពីបាបនោះដោយការបរិច្ចាគគោមួយរយក្បាល។ ប៉ុន្តែសម្លាប់ឪពុករបស់ខ្លួនហើយ ឲ្យរួចផុតពីកំហុសនោះដោយវិធីដូចគ្នា—ការប្រាយបាបបែបនោះ សម្រាប់ខ្ញុំ វាពិតជាកម្រណាស់»។
Verse 39
एष एको महातेजा: पाण्डुपुत्रो धनंजय: । पिता च मम धर्मात्मा तस्य मे निष्कृति: कुतः,'ये पाण्डुपुत्र धनंजय अद्वितीय वीर, महान् तेजस्वी, धर्मात्मा तथा मेरे पिता थे। इनका वध करके मैंने महान् पाप किया है। अब मेरा उद्धार कैसे हो सकता है?”
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ «មនុស្សតែមួយនេះ—ធនញ្ជយ (អរជុន) កូនប្រុសរបស់បណ្ឌុ—គ្មានអ្នកណាប្រៀបបាន មានពន្លឺកិត្តិយសដ៏អស្ចារ្យ។ ហើយទ្រង់ក៏ជាព្រះបិតារបស់ខ្ញុំ ដែលមានធម៌ជាទីពឹងផងដែរ។ ដោយសារខ្ញុំបានបណ្តាលឲ្យទ្រង់ស្លាប់ ខ្ញុំបានទទួលបាបធ្ងន់ធ្ងរ; ឥឡូវនេះ ការសងបាប និងការរំដោះរបស់ខ្ញុំ នឹងកើតមកពីណា?»
Verse 40
इत्येवमुक्त्वा नूपते धनंजयसुतो नृपः । उपस्पृश्याभवत् तूष्णीं प्रायोपेतो महामति:,नरेश्वरर ऐसा कहकर धनंजयकुमार परम बुद्धिमान् राजा बभ्रुवाहन पुन: आचमन करके आमरण उपवासका व्रत लेकर चुपचाप बैठ गया
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ និយាយដូច្នោះហើយ ព្រះរាជា—បព្រហូវាហន កូនប្រុសរបស់ធនញ្ជយ (អរជុន)—បានធ្វើអាចមនៈ (ពិធីស្រូបទឹកតាមរបៀប) ហើយស្ងៀមស្ងាត់ ចូលកាន់សច្ចៈ «ប្រាយោបវេស» គឺអធិស្ឋានអត់អាហាររហូតដល់ស្លាប់ ដោយបញ្ញាដ៏ខ្ពង់ខ្ពស់។
Verse 41
वैशमग्पायन उवाच प्रायोपविष्टे नृपती मणिपूरेश्वरे तदा । पितृशोकसमाविष्टे सह मात्रा परंतप,वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! पिताके शोकसे संतप्त हुआ मणिपुरनरेश बभ्रुवाहन जब माताके साथ आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठ गया, तब उलूपीने संजीवनमणिका स्मरण किया। नागोंके जीवनकी आधारभूत वह मणि उसके स्मरण करते ही वहाँ आ गयी
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នៅពេលនោះ ឱ ព្រះអង្គអ្នកដុតបំផ្លាញសត្រូវ! ពេលព្រះរាជាមណិពុរ—ដែលត្រូវទុក្ខសោកចំពោះព្រះបិតាគ្របដណ្តប់—អង្គុយជាមួយព្រះមាតា ដោយបានកាន់វ្រតអត់អាហាររហូតដល់ស្លាប់ នោះ អ៊ូលូពី បាននឹកឃើញ «សញ្ជីវនមណិ» ពេជ្រជីវិតរបស់ពួកនាគ; ហើយភ្លាមៗតែគាត់រំលឹកដល់វា ពេជ្រនោះក៏មកដល់ទីនោះ។
Verse 42
उलूपी चिन्तयामास तदा संजीवनं मणिम् । स चोपातिष्ठत तदा पन्नगानां परायणम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--शत्रुओंको संताप देनेवाले जनमेजय! पिताके शोकसे संतप्त हुआ मणिपुरनरेश बभ्रुवाहन जब माताके साथ आमरण उपवासका व्रत लेकर बैठ गया, तब उलूपीने संजीवनमणिका स्मरण किया। नागोंके जीवनकी आधारभूत वह मणि उसके स्मरण करते ही वहाँ आ गयी
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ នៅពេលនោះ អ៊ូលូពី បានគិតរំលឹកអំពី «សញ្ជីវនមណិ» ពេជ្រដែលស្តារជីវិតឡើងវិញ។ ហើយភ្លាមៗតែគាត់រំលឹកដល់វា ពេជ្រនោះ—ដែលគេរាប់ថាជាទីពឹង និងជាគ្រឹះជីវិតរបស់ពួកនាគ—ក៏បានបង្ហាញខ្លួននៅទីនោះ។
Verse 43
त॑ गृहीत्वा तु कौरव्य नागराजपते: सुता । मन: प्रह्लादनीं वाचं सैनिकानामथाब्रवीत्,कुरुनन्दन! उस मणिको लेकर नागराजकुमारी उलूपी सैनिकोंके मनको आह्लाद प्रदान करनेवाली बात बोली--
វៃសម្បាយនៈបាននិយាយថា៖ កាន់យកពេជ្រនោះហើយ អ៊ូលូពី—កូនស្រីរបស់ព្រះអម្ចាស់នាគ—បាននិយាយទៅកាន់ទាហានទាំងឡាយ ដោយពាក្យសម្តីដែលធ្វើឲ្យចិត្តពួកគេរីករាយ និងស្ងប់ស្ងាត់ឡើងវិញ។
Verse 44
उत्तिष्ठ मा शुच: पुत्र नैव विष्णुस्त्वया जित: । अजेय: पुरुषैरेष तथा देवै: सवासवै:,“बेटा बभ्रुवाहन! उठो, शोक न करो! ये अर्जुन तुम्हारे द्वारा परास्त नहीं हुए हैं। ये तो सभी मनुष्यों और इन्द्रसहित सम्पूर्ण देवताओंके लिये भी अजेय हैं
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «កូនអើយ ចូរក្រោកឡើង កុំសោកស្តាយឡើយ។ វិស្ណុមិនត្រូវបានអ្នកឈ្នះទេ។ វីរបុរសនេះមិនអាចឈ្នះបានដោយមនុស្សទេ ហើយសូម្បីតែដោយទេវតាទាំងឡាយ រួមទាំងឥន្ទ្រ ក៏ដូចគ្នា»។
Verse 45
मया तु मोहनी नाम मायैषा सम्प्रदर्शिता | प्रियार्थ पुरुषेन्द्रस्य पितुस्तेडद्य यशस्विन:,“यह तो मैंने आज तुम्हारे यशस्वी पिता पुरुषप्रवर धनंजयका प्रिय करनेके लिये मोहनी माया दिखलायी है
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ថ្ងៃនេះ ខ្ញុំឯងបានបង្ហាញមាយាដែលហៅថា ‘មោហិនី’ នេះ—ដើម្បីបំពេញចិត្តឪពុកដ៏មានកិត្តិយសរបស់អ្នក អ្នកប្រសើរបំផុតក្នុងចំណោមបុរសទាំងឡាយ»។
Verse 46
जिज्ञासुह्दोष पुत्रस्य बलस्य तव कौरव: । संग्रामे युद्धातो राजन्नागत: परवीरहा,“राजन! तुम इनके पुत्र हो। ये शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुरुकूलतिलक अर्जुन संग्राममें जूझते हुए तुम-जैसे बेटेका बल-पराक्रम जानना चाहते थे। वत्स! इसीलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित किया है। सामर्थ्यशाली पुत्र! तुम अपनेमें अणुमात्र पापकी भी आशंका न करो
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ ព្រះរាជា អ្នកជាកូនរបស់ដោសៈ។ អរជុន អ្នកសម្លាប់វីរបុរសសត្រូវ នៃវង្សកុរុ បានត្រឡប់មកពីសមរភូមិ បន្ទាប់ពីប្រយុទ្ធ ដោយប្រាថ្នាចង់ដឹងកម្លាំង និងសេចក្តីក្លាហានរបស់អ្នក។ ដូច្នេះ កូនស្រឡាញ់អើយ ខ្ញុំបានជំរុញអ្នកឲ្យចូលសង្គ្រាម។ កូនដ៏មានអំណាចអើយ កុំឲ្យមានការភ័យខ្លាចអំពើបាបសូម្បីតែបន្តិចក្នុងរឿងនេះឡើយ»។
Verse 47
तस्मादसि मया पुत्र युद्धाय परिचोदित: । मा पापमात्मन: पुत्र शड़केथा हाण्वपि प्रभो,“राजन! तुम इनके पुत्र हो। ये शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले कुरुकूलतिलक अर्जुन संग्राममें जूझते हुए तुम-जैसे बेटेका बल-पराक्रम जानना चाहते थे। वत्स! इसीलिये मैंने तुम्हें युद्धके लिये प्रेरित किया है। सामर्थ्यशाली पुत्र! तुम अपनेमें अणुमात्र पापकी भी आशंका न करो
«ដូច្នេះ កូនអើយ ខ្ញុំបានជំរុញអ្នកឲ្យចូលសង្គ្រាម។ កុំឲ្យមានការភ័យខ្លាចអំពើបាបសម្រាប់ខ្លួនអ្នក សូម្បីតែបន្តិចឡើយ—ឱ កូនអើយ ឱ អ្នកដ៏មានអំណាច»។
Verse 48
ऋषिरेष महानात्मा पुराण: शाश्वतो$क्षर: । नैनं शक्तो हि संग्रामे जेतुं शक्रोडपि पुत्रक,“ये महात्मा नर पुरातन ऋषि, सनातन एवं अविनाशी हैं। बेटा! युद्धमें इन्हें इन्द्र भी नहीं जीत सकते
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឥសីដ៏មហាត្មានេះ ជាបុរាណ ជាសនាតន និងមិនរលាយបាត់។ កូនអើយ ក្នុងសង្គ្រាម សូម្បីតែសក្រិ (ឥន្ទ្រ) ក៏មិនអាចឈ្នះព្រះអង្គបានទេ»។
Verse 49
अयं तु मे मणिर्दिव्य: समानीतो विशाम्पते । मृतान् मृतान् पन्नगेन्द्रानु यो जीवयति नित्यदा,'प्रजानाथ! मैं यह दिव्यमणि ले आयी हूँ। यह सदा युद्धमें मरे हुए नागराजोंको जीवित किया करती है। प्रभो! तुम इसे लेकर अपने पिताकी छातीपर रख दो। फिर तुम पाण्थुपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनको जीवित हुआ देखोगे”
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់នៃប្រជាជន! ខ្ញុំបាននាំមកនូវមណីទិព្វនេះ។ វាមានអานุភាពជានិច្ច អាចស្តារជីវិតស្តេចនាគដែលបានស្លាប់ក្នុងសង្គ្រាម។ សូមយកវាទៅដាក់លើទ្រូងព្រះបិតារបស់ទ្រង់; បន្ទាប់មក ទ្រង់នឹងឃើញអర్జុន កូនកុន្តី ត្រឡប់មកមានជីវិតវិញ»។
Verse 50
एनमस्योरसि त्वं च स्थापयस्व पितु: प्रभो । संजीवितं तदा पार्थ स त्वं द्रष्टासि पाण्डवम्,'प्रजानाथ! मैं यह दिव्यमणि ले आयी हूँ। यह सदा युद्धमें मरे हुए नागराजोंको जीवित किया करती है। प्रभो! तुम इसे लेकर अपने पिताकी छातीपर रख दो। फिर तुम पाण्थुपुत्र कुन्तीकुमार अर्जुनको जीवित हुआ देखोगे”
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ ព្រះអម្ចាស់! សូមដាក់មណីទិព្វនេះលើទ្រូងព្រះបិតារបស់ទ្រង់។ បន្ទាប់មក ឱ បារថៈ ទ្រង់នឹងឃើញបណ្ឌវៈនោះ ត្រូវបានស្តារជីវិតវិញ»។
Verse 51
इत्युक्तः स्थापयामास तस्योरसि मर्णिं तदा । पार्थस्यामिततेजा: स पितु: स्नेहादपापकृत्,उलूपीके ऐसा कहनेपर निष्पाप कर्म करनेवाले अमित तेजस्वी बभ्रुवाहनने अपने पिता पार्थकी छातीपर स्नेहपूर्वक वह मणि रख दी
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ ដោយបានឮដូច្នោះ បព្រហូវាហនៈ អ្នកប្រព្រឹត្តកិច្ចអសុចរិតមិនមាន និងមានតេជៈដ៏ខ្លាំង បានដាក់មណីនោះលើទ្រូងបិតា បារថៈ ដោយសេចក្តីស្រឡាញ់។
Verse 52
तस्मिन् न्यस्ते मणौ वीरो जिष्णुरुज्जीवित: प्रभु: । चिरसुप्त इवोत्तस्थौ मृष्टलोहितलोचन:,उस मणिके रखते ही शक्तिशाली वीर अर्जुन देरतक सोकर जगे हुए मनुष्यकी भाँति अपनी लाल आँखें मलते हुए पुनः जीवित हो उठे
ពេលមណីនោះត្រូវបានដាក់លើគាត់ ភាវីរបុរសដ៏ខ្លាំង ជិṣṇុ (អរជុន) ត្រូវបានស្តារជីវិតវិញ។ គាត់ក៏លើកខ្លួនឡើង ដូចអ្នកភ្ញាក់ពីដំណេកយូរ ហើយខាត់ភ្នែកក្រហមរបស់ខ្លួន។
Verse 53
तमुत्थितं महात्मानं लब्धसंज्ञं मनस्विनम् । समीक्ष्य पितरं स्वस्थं ववन्दे बश्रुवाहन:,अपने मनस्वी पिता महात्मा अर्जुनको सचेत एवं स्वस्थ होकर उठा हुआ देख बभ्रुवाहनने उनके चरणोंमें प्रणाम किया
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ ពេលឃើញបិតាដ៏មានព្រលឹងខ្ពង់ខ្ពស់ និងមានចិត្តមាំមួន បានក្រោកឡើងវិញ ដោយបានស្មារតីត្រឡប់មក និងមានសុខភាពល្អ បព្រហូវាហនៈបានកោតគោរព ក្រាបបង្គំជើងរបស់ព្រះបិតា។
Verse 54
उत्यथिते पुरुषव्याप्रे पुनर्लक्ष्मीवति प्रभो । दिव्या: सुमनस: पुण्या ववृषे पाकशासन:,प्रभो! पुरुषसिंह श्रीमान् अर्जुनके पुनः उठ जानेपर पाकशासन इन्द्रने उनके ऊपर दिव्य एवं पवित्र फूलोंकी वर्षा की
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ ព្រះអម្ចាស់អើយ! ពេលដែលអរជុន—សីហបុរសដ៏រុងរឿង ពោរពេញដោយសិរីលាភ—បានក្រោកឡើងម្ដងទៀត នោះបាកសាសនៈ (ឥន្ទ្រ) បានបាញ់ភ្លៀងផ្កាទេវៈដ៏បរិសុទ្ធចុះលើគាត់។ ទិដ្ឋភាពនោះបញ្ជាក់ថា វីរភាពអត់ធ្មត់ និងសេចក្តីសម្រេចចិត្តត្រឹមត្រូវ ដែលស្របតាមធម៌ តែងត្រូវបានទេវតាគោរពកិត្តិយស។
Verse 55
अनाहता दुन्दुभयो विनेदुर्मेघनि:स्वना: । साधु साध्विति चाकाशे बभूव सुमहान् स्वन:,मेघके समान गम्भीर ध्वनि करनेवाली देव-दुन्दुभियाँ बिना बजाये ही बज उठीं और आकाशमें साधुवादकी महान् ध्वनि गूँजने लगी
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ ដោយមិនបានវាយសោះ ស្គរទេវៈបានលាន់ឡើង ដ៏ធ្ងន់ជ្រៅដូចសំឡេងពពកផ្គរលាន់ ហើយនៅលើមេឃ ក៏មានសំឡេងសរសើរដ៏ធំធេងលាន់ថា «ល្អណាស់! ល្អណាស់!»
Verse 56
उत्थाय च महाबाहु: पर्याश्वस्तो धनंजय: । बभ्रुवाहनमालिड्ग्य समाजिघ्रत मूर्थनि,महाबाहु अर्जुन भलीभाँति स्वस्थ होकर उठे और बभ्रुवाहनको हृदयसे लगाकर उसका मस्तक सूँघने लगे
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ បន្ទាប់មក ធនញ្ជយ (អរជុន) វីរបុរសដៃធំ បានក្រោកឡើងវិញដោយសុខសប្បាយពេញលេញ។ គាត់បានអោបបាប្រហូវាហនៈ ហើយដោយសេចក្តីស្រឡាញ់ បានស្រូបក្លិនក្បាលរបស់គេ—ជាកាយវិការស្និទ្ធស្នាលនៃការទទួលស្គាល់ជាបិតា និងការផ្សះផ្សា បញ្ជាក់សាច់ញាតិ និងការស្ដារសមធម៌ក្រោយជម្លោះ។
Verse 57
ददर्श चापि दूरेडस्य मातरं शोककर्शिताम् । उलूप्या सह तिष्ठन्तीं ततो5पृच्छद् धनंजय:,उससे थोड़ी ही दूरपर बभ्रुवाहनकी शोकाकुल माता चित्रांगदा उलूपीके साथ खड़ी थी। अर्जुनने जब उसे देखा, तब बशभ्रुवाहनसे पूछा--
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ អរជុនក៏បានឃើញនៅមិនឆ្ងាយទេ ម្តាយរបស់គេ—ត្រូវទុក្ខព្រួយបំផ្លាញ—ឈរជាមួយអ៊ូលូពី។ ពេលឃើញនាងនៅទីនោះ ធនញ្ជយ (អរជុន) ក៏សួរបាប្រហូវាហនៈ ដើម្បីដឹងហេតុ និងន័យនៃទុក្ខដែលបានគ្របដណ្តប់លើគ្រួសាររបស់គាត់។
Verse 58
किमिदं लक्ष्यते सर्व शोकविस्मयहर्षवत् । रणाजिरममित्रघ्न यदि जानासि शंस मे,'शत्रुओंका संहार करनेवाले वीर पुत्र! यह सारा समरांगण शोक, विस्मय और हर्षसे युक्त क्यों दिखायी देता है? यदि जानते हो तो मुझे बताओ
វៃសម្បាយនៈបានមានពាក្យថា៖ «ឱ កូនវីរបុរស អ្នកសម្លាប់សត្រូវ! ហេតុអ្វីបានជាសមរភូមិនេះទាំងមូល មើលទៅពោរពេញដោយទុក្ខព្រួយ ការភ្ញាក់ផ្អើល និងសេចក្តីរីករាយក្នុងពេលតែមួយ? បើអ្នកដឹងហេតុ សូមប្រាប់ខ្ញុំ»។
Verse 59
जननी च किमर्थ ते रणभूमिमुपागता । नागेन्द्रदुहििता चेयमुलूपी किमिहागता,“तुम्हारी माता किसलिये रणभूमिमें आयी है? तथा इस नागराजकन्या उलूपीका आगमन भी यहाँ किसलिये हुआ है?
វៃសម្បាយនៈបានមានប្រសាសន៍ថា៖ «ហេតុអ្វីបានជាមាតារបស់អ្នកមកដល់សមរភូមិនេះ? ហើយហេតុអ្វីបានជា អ៊ុលូពី—កូនស្រីនៃព្រះអធិរាជនាគ—ក៏មកទីនេះដែរ?»
Verse 60
जानाम्यहमिदं युद्ध त्वया मद्वचनात् कृतम् । स्त्रीणामागमने हेतुमहमिच्छामि वेदितुम्,“मैं तो इतना ही जानता हूँ कि तुमने मेरे कहनेसे यह युद्ध किया है; परंतु यहाँ स्त्रियोंके आनेका क्या कारण है? यह मैं जानना चाहता हूँ
វៃសម្បាយនៈបានមានប្រសាសន៍ថា៖ «ខ្ញុំដឹងតែប៉ុណ្ណេះថា អ្នកបានចូលរួមសង្គ្រាមនេះតាមពាក្យបញ្ជារបស់ខ្ញុំ។ ប៉ុន្តែខ្ញុំចង់ដឹងថា ហេតុអ្វីបានជាស្ត្រីទាំងឡាយមកទីនេះ?»
Verse 61
तमुवाच तथा पृष्टो मणिपूरपतिस्तदा । प्रसाद्य शिरसा विद्वानुलूपी पृच्छयतामियम्,पिताके इस प्रकार पूछनेपर विद्वान् मणिपुरनरेशने पिताके चरणोंमें सिर रखकर उन्हें प्रसन्न किया और कहा--'पिताजी! यह वृत्तान्त आप माता उलूपीसे पूछिये”
ពេលត្រូវបានសួរដូច្នោះ ព្រះរាជាមណិបុរ ដែលមានប្រាជ្ញា បានទម្លាក់ក្បាលនៅជើងព្រះបិតា ដើម្បីឲ្យព្រះបិតាពេញព្រះហឫទ័យ ហើយទូលថា៖ «ព្រះបិតា សូមសួររឿងរ៉ាវនេះពីមាតា អ៊ុលូពី»។
Verse 80
इति श्रीमहा भारते आश्वमेधिके पर्वणि अनुगीतापर्वणि अश्वानुसरणे अर्जुनप्रत्युज्जीवने अशीतितमो<ध्याय:
ដូច្នេះ បានបញ្ចប់ជំពូកទី៨០ ក្នុង «ស្រីមហាភារត» នៃ «អាស្វមេធិកបរវ»—ក្នុងផ្នែក «អនុគីតា»—ដែលពិពណ៌នាអំពីការតាមដានសេះបូជាយញ្ញ និងការស្ដារអរជុនឲ្យរស់ឡើងវិញ។
Verse 233
दुर्मरं पुरुषेणेह मन्ये हुध्वन्यनागते । “चौड़ी छाती और विशाल भुजावाले अपने पतिको मारा गया देखकर भी जो मेरी माता चित्रांगदा देवीका दृढ़ हृदय विदीर्ण नहीं हो जाता है। इससे मैं यह मानता हूँ कि अन्तकाल आये बिना मनुष्यका मरना बहुत कठिन है
វៃសម្បាយនៈបានមានប្រសាសន៍ថា៖ «ខ្ញុំយល់ថា មនុស្សម្នាក់មិនងាយស្លាប់នៅទីនេះ មុនពេលវេលាដែលវាសនាកំណត់មកដល់ឡើយ។ ទោះបានឃើញស្វាមីរបស់នាង—ទ្រូងទូលាយ ដៃខ្លាំង—ត្រូវសម្លាប់ ក៏មាតារបស់ខ្ញុំ ព្រះនាងចិត្រាង្គដា ដែលមានចិត្តរឹងមាំ មិនបែកបាក់ដោយទុក្ខសោកឡើយ។ ដូចនេះ ខ្ញុំសន្និដ្ឋានថា បើមិនដល់ម៉ោងចុងក្រោយរបស់មនុស្សទេ មរណភាពមិនងាយមកដល់ឡើយ»។
Babhruvāhana treats his battlefield act as pitṛ-hatyā (father-slaying) and confronts the dilemma of whether any ritual or ethical remedy can address an offense perceived as uniquely non-expiable, despite the broader political-ritual context.
The chapter portrays moral responsibility as independent of outcome: even when actions occur under contested duties, the agent must examine harm, seek learned guidance, and prioritize restoration and truthfulness over self-justification.
Rather than a formal phalaśruti, the chapter uses satya-vacana and prāyopaveśa as meta-ethical instruments: truth-assertion and self-restraint function as narrative signals that dharma is pursued through accountability and reparative intent.