
Śakuntalā’s Satya-Discourse and the Recognition of Bharata (शकुन्तला–सत्योपदेशः; भरतप्रतिग्रहः)
Upa-parva: Śakuntalopākhyāna (Duḥṣanta–Śakuntalā Episode)
Chapter 69 presents Śakuntalā’s structured ethical critique of Duḥṣanta’s refusal to acknowledge their son. She opens with a perception-based rebuke—seeing others’ minor faults while ignoring one’s own—then develops illustrative analogies (mirror imagery; the swine and the swan separating impurity from essence) to distinguish the foolish from the discerning in moral speech. The discourse shifts to rājadharma and filial duty: abandoning one’s son undermines prosperity, reputation, and posthumous welfare, while truth is elevated above ritual magnitude (truth outweighing vast sacrificial merit). Śakuntalā warns that falsehood severs association and asserts her son’s capacity to rule even without Duḥṣanta. The narrative then introduces Vaiśaṃpāyana’s frame: a bodiless celestial voice validates Śakuntalā’s claim, instructs acceptance, and assigns the name Bharata (linked to “bearing/supporting”). Duḥṣanta explains his earlier hesitation as concern for public doubt, then formally embraces the child and honors Śakuntalā. The chapter concludes with Bharata’s consecration and a genealogical-ideological bridge: Bharata’s fame becomes an eponym for the Bhārata lineage and the epic’s civilizational identity.
Chapter Arc: Janamejaya, eager to know how the lion among men obtained Shakuntala, asks Vaishampayana for the full account—thus the tale turns from genealogy to a living scene of pursuit and fate. → Vaishampayana describes King Dushyanta setting out with a vast retinue—warriors in varied arms and attire, conches and kettledrums resounding—entering the forest for the royal hunt. The chase scatters herds, dries throats with dust and thirst, and turns the woodland into a tumult where beasts and men collide. → In the thick of the hunt, Dushyanta’s prowess blazes: he cuts down charging threats with sword and spear, whirls the mace with practiced mastery, and the forest itself seems overrun by elephants and storm-like volleys—until the king stands as the axis of the chaos, feared by beasts and admired by onlookers who liken him to Indra. → The chapter settles with the image of Dushyanta’s irresistible might and royal momentum established—his hunt has become the narrative engine that will carry him toward the encounter destined to change his lineage. → The king’s onward movement into the forest points toward the imminent meeting with Shakuntala, left just beyond the chapter’s threshold.
Verse 1
अपन बक। है २ >> $. दूरवर्ती शत्रुपर गदा फेंकना 'प्रक्षे' कहलाता है। २. समीपवर्ती शत्रुपर गदाकी कोटिसे प्रहार करना “विक्षेप” कहा गया है। ३. जब शत्रु बहुत हों तो सब ओर गदाको घुमाते हुए शत्रुओंपर उसका प्रहार करना “परिक्षेप” है। ४. गदाके अग्रभागसे मारना “अभिक्षेप” कहलाता है। एकोनसप्ततितमो<ध्याय: दुष्पन्तका शिकारके लिये वनमें जाना और विविध हिंसक वन-जन्तुओंका वध करना जनमेजय उवाच सम्भवं भरतस्याहं चरितं च महामते: । शकुन्तलाय श्रोत्पत्तिं श्रोतुमिच्छामि तत्त्वतः,जनमेजय बोले--ब्रह्मन! मैं परम बुद्धिमान् भरतकी उत्पत्ति और चरित्रको तथा शकुन्तलाकी उत्पत्तिके प्रसंगको भी यथार्थरूपसे सुनना चाहता हूँ
ジャナメージャヤ(Janamejaya)は言った。「大いなる心を備えた聖仙よ、バラタ(Bharata)の誕生とその生涯の事績、さらにシャクンタラー(Śakuntalā)の出自の次第を、真実のままに聞きたいのです。」
Verse 2
दुष्यन्तेन च वीरेण यथा प्राप्ता शकुन्तला | त॑ वै पुरुषसिंहस्य भगवन् विस्तरं त्वहम्
ジャナメージャヤは言った。「尊き御方よ、人の中の獅子たる勇王ドゥシュヤンタ(Duṣyanta)が、いかにしてシャクンタラー(Śakuntalā)を得て妻としたのか、その次第を余すところなくお語りください。私は全てを聞きたいのです。」
Verse 3
वैशम्पायन उवाच स कदाचिन्महाबाहु: प्रभूतनलवाहन:,वैशम्पायनजीने कहा--एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले
ヴァイシャンパーヤナ(Vaiśampāyana)は語った。ある時、強大な腕を持つ王ドゥシュヤンタ(Duṣyanta)は、多くの兵と乗り物を従え、数百の象馬に囲まれ、輝かしい四軍(車・象・馬・歩)の大軍を率いて、深い密林へと向かった。
Verse 4
वनं जगाम गहनं हयनागशतैर्वृत: । बलेन चतुरज्जेण वृत: परमवल्गुना,वैशम्पायनजीने कहा--एक समयकी बात है, महाबाहु राजा दुष्यन्त बहुत-से सैनिक और सवारियोंको साथ लिये सैकड़ों हाथी-घोड़ोंसे घिरकर परम सुन्दर चतुरंगिणी सेनाके साथ एक गहन वनकी ओर चले
ヴァイシャンパーヤナは語った。かつて、強大な腕をもつドゥシュヤンタ王は、幾百の馬と象に囲まれ、壮麗な四軍(四種の軍勢)を従えて、深く茂る森へと出立した。
Verse 5
खड्गशक्तिधरैवीरिर्गदामुसलपाणिभि: । प्रासतोमरहस्तैश्व ययौ योधशतैर्वृत:,जब राजाने यात्रा की, उस समय खड्ग, शक्ति, गदा, मुसल, प्रास और तोमर हाथमें लिये सैकड़ों योद्धा उन्हें घेरे हुए थे
ヴァイシャンパーヤナは語った。王が旅立つとき、剣と槍を携える勇士、棍棒と重い杵を握る者、長槍や投げ槍を持つ者ら、幾百の戦士が王を取り囲んで進んだ。
Verse 6
सिंहनादैश्व योधानां शड्खदुन्दुभिनि:स्वनै: । रथनेमिस्वनैश्वैव सनागवरबूंहितैः,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी
ヴァイシャンパーヤナは語った。ドゥシュヤンタ王が進発すると、四方に大いなる喧噪が起こった。戦士たちの獅子吼、法螺貝と太鼓の轟き、戦車の車輪の響き、そして巨象の鳴き声である。その出立は、規律に支えられた王権の威を示し、国土のダルマを守り民を護るという公の誓いであった。
Verse 7
नानायुधधरैश्वापि नानावेषधरैस्तथा । ह्षितस्वनमिश्रैश्न क्षेगेडितास्फोटितस्वनै:,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी
ヴァイシャンパーヤナは語った。さまざまな武器を携え、さまざまな装いをまとう戦士たちの間で、昂ぶる叫びが戯れの声と交じり合い、拍手や腕を打ち鳴らす音も加わって、四方に大きな騒然が起こった。王の遠征は、武威と規律、そして名声と権威を衆目に示す公の壮観であった。
Verse 8
आसीत् किलकिलाशब्दस्तस्मिन् गच्छति पार्थिवे । प्रासादवरशृज्गभस्था: परया नृपशो भया,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी
ヴァイシャンパーヤナは語った。その王が進むと、どっと大きな喧噪が起こり、騒めきと武の響きが満ちた。宮殿の最上の楼塔から、女たちは強い高揚と畏敬にとらわれて王の行列を見守り、都は大君の進軍に伴うざわめきで鳴り渡った。
Verse 9
ददृशुस्तं स्त्रियस्तत्र शूरमात्मयशस्करम् | शक्रोपमममित्रघ्नं परवारणवारणम्,महाराज दुष्यन्तके यात्रा करते समय योद्धाओंके सिंहनाद, शंख और नगाड़ोंकी आवाज, रथके पहियोंकी घरघराहट, बड़े-बड़े गजराजोंकी चिग्घाड़, घोड़ोंकी हिनहिनाहट, नाना प्रकारके आयुध तथा भाँति-भाँतिके वेष धारण करनेवाले योद्धाओंद्वारा की हुई गर्जना और ताल ठोंकनेकी आवाजोंसे चारों ओर भारी कोलाहल मच गया था। महलके श्रेष्ठ शिखरपर बैठी हुई स्त्रियाँ उत्तम राजोचित शोभासे सम्पन्न शूरवीर दुष्यन्तको देख रही थीं। वे अपने यशको बढ़ानेवाले, इन्द्रके समान पराक्रमी और शत्रुओंका नाश करनेवाले थे। शत्रुरूपी मतवाले हाथीको रोकनेके लिये उनमें सिंहके समान शक्ति थी
ヴァイシャンパーヤナは語った。そこにいた女たちは、その英雄を見た――自らの名声を高め、武威はインドラのごとく、敵を討ち滅ぼし、敵方の狂奔する戦象をも抑えとどめる者を。ここには王者の威光と武の徳が描かれる。王の目に見える力と規律は、敵の暴虐を制し、正法(ダルマ)にかなう王権の秩序を守る護りの力として示されている。
Verse 10
पश्यन्तः स्त्रीगणास्तत्र वज्रपाणिं सम मेनिरे । अयं स पुरुषव्यात्रो रणे वसुपराक्रम:
ヴァイシャンパーヤナは語った。見つめるうちに、そこに集う女たちは彼を金剛手(ヴァジュラパーニ)、すなわち雷霆の金剛杵を執るインドラに等しいと思った。「この方こそ人中の虎。戦場の威力はヴァスたちにも比すべき」と――英雄の力と、叙事詩が讃える武の理想への畏敬が、その言葉に満ちていた。
Verse 11
इति वाचो ब्रुवन्त्यस्ता: स्त्रिय: प्रेमणा नराधिपम्,ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। यत्र-तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति- प्रशंसा करते थे
ヴァイシャンパーヤナは語った。かく語りつつ、女たちは愛情に満ちて王を讃えた。さらに、あちらこちらに立つ最上のバラモンたちも、四方から同じく賛辞と称揚を捧げた。
Verse 12
तुष्ठवुः पुष्पवृष्टी क्ष ससृजुस्तस्य मूर्थनि । तत्र तत्र च विप्रेन्द्रै: स््तूयमान: समन््ततः,ऐसी बातें करती हुई वे स्त्रियाँ बड़े प्रेमसे महाराज दुष्यन्तकी स्तुति करतीं और उनके मस्तकपर फूलोंकी वर्षा करती थीं। यत्र-तत्र खड़े हुए श्रेष्ठ ब्राह्मण सब ओर उनकी स्तुति- प्रशंसा करते थे
人々は王を讃え、その御頭に花を雨のごとく降らせた。さらに、あちらこちらで、周囲の高徳なるバラモンたちが絶えず称揚を続けた――公の賛嘆が満ちるその場は、王のふるまいが栄誉と社会の承認に値することを際立たせていた。
Verse 13
निर्ययौ परमप्रीत्या वनं मृगजिघांसया । त॑ं देवराजप्रतिमं मत्तवारणधूर्गतम्,इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे
ヴァイシャンパーヤナは語った。大いなる歓びをもって、彼は野獣を狩らんと森へと出立した。威容と武威は天帝インドラに似、発情して荒ぶる象に騎して進む。ドゥシュヤンタ王が行くとき、四姓の人々はその後に従い、王を仰ぎ見て祝福と勝利の言葉を唱え、繁栄と成功を祈り続けた。
Verse 14
द्विजक्षत्रियविट्शूद्रा निर्यान्तमनुजग्मिरे । ददृशुर्वर्धभानास्ते आशीर्भिश्च॒ जयेन च,इस प्रकार महाराज वनमें हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेके लिये बड़ी प्रसन्नताके साथ नगरसे बाहर निकले। वे देवराज इन्द्रके समान पराक्रमी थे। मतवाले हाथीकी पीठपर बैठकर यात्रा करनेवाले उन महाराज दुष्यन्तके पीछे-पीछे ब्राह्मण, क्षत्रिय, वैश्य और शूद्र सभी वर्णोके लोग गये और सब आशीर्वाद एवं विजयसूचक वचनोंद्वारा उनके अभ्युदयकी कामना करते हुए उनकी ओर देखते रहे
ヴァイシャンパーヤナは語った。王が都を発してゆくと、ブラーフマナ、クシャトリヤ、ヴァイシャ、シュードラという四つの身分の人々が、その後ろに従った。彼らは王を見守りつづけ、吉祥の祝福と勝利の叫びを捧げて、王の遠征の成就と安寧を願った。
Verse 15
सुदूरमनुजग्मुस्तं पौरजानपदास्तथा । न्यवर्तन्त ततः पश्चादनुज्ञाता नृपेण ह,नगर और जनपदके लोग बहुत दूरतक उनके पीछे-पीछे गये। फिर महाराजकी आज्ञा होनेपर लौट आये
都の人々も郷里の民も、王の後をはるか遠くまで見送りに従った。やがて王の許しを得ると、彼らは引き返した——深い慕情と、王命に従う節度ある敬意とを併せ示しながら。
Verse 16
सुपर्णप्रतिमेनाथ रथेन वसुधाधिप: । महीमापूरयामास घोषेण त्रिदिवं तथा,उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्रा करनेवाले नरेशने घरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान् दुष्यन्तने एक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव (बाकली) आदि वृक्षोंसे भरपूर था
ヴァイシャンパーヤナは語った。やがて大地の主は、ガルダにも比すべき速さの戦車に乗って進んだ。疾走する車の轟きは地を鳴り響かせ、天にまでこだまするかのようであった——それは王の威勢と、定めが差し出すものへ向かって迷いなく進む意志を告げていた。
Verse 17
स गच्छन् ददृशे धीमान् नन्दनप्रतिमं वनम् । बिल्वार्कखदिराकीर्ण कपित्थधवसंकुलम्,उनका रथ गरुडके समान वेगशाली था। उसके द्वारा यात्रा करनेवाले नरेशने घरघराहटकी आवाजसे पृथ्वी और आकाशको गुँँजा दिया। जाते-जाते बुद्धिमान् दुष्यन्तने एक नन्दनवनके समान मनोहर वन देखा, जो बेल, आक, खैर, कैथ और धव (बाकली) आदि वृक्षोंसे भरपूर था
ヴァイシャンパーヤナは語った。道を進むうち、賢王はナンダナの園にも似た、心を奪う森を目にした。そこにはビルヴァ、アルカ、カディラの木々が繁り、さらにカピッタとダヴァが群れ立っていた。この光景は、豊穣と吉兆に満ちた自然の場へ王が踏み入ることを示し、叙事詩の流れにおいてしばしば重大な出会いと品行の試練に先立つ舞台となる。
Verse 18
विषमं पर्वतस्रस्तैरश्मभिश्व समावृतम् । निर्जलं निर्मनुष्यं च बहुयोजनमायतम्,पर्वतकी चोटीसे गिरे हुए बहुत-से शिला-खण्ड वहाँ इधर-उधर पड़े थे। ऊँची-नीची भूमिके कारण वह वन बड़ा दुर्गग जान पड़ता था। अनेक योजनतक फैले हुए उस वनमें कहीं जल या मनुष्यका पता नहीं चलता था
ヴァイシャンパーヤナは語った。その地は険しく、山から崩れ落ちた岩があまねく散り、覆い尽くしていた。起伏の激しい地形ゆえ、踏破はきわめて困難に見えた。幾多のヨージャナにわたり広がる荒野には、水の気配も人の跡もない——耐久と決意を試す、峻厳で近寄りがたい景観であった。
Verse 19
मृगसिंहैर्व॒तं घोरैरन्यैश्वापि वनेचरै: । तद् वन॑ मनुजव्याघ्र: सभृत्ययलवाहन:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया
ヴァイシャンパーヤナは語った。「その森は、鹿や獅子をはじめとする恐るべき獣と、荒野をさまようさまざまな生き物で満ちていた。そこへ人中の虎たるドゥシュヤンタ王が、従者と軍勢、騎乗の者らを伴って踏み入り、猛獣を狩りつつ林間を押し分けて進んだ。」
Verse 20
लोडयामास दुष्यन्त: सूदयन् विविधान् मृगान् । बाणगोचरसपम्प्राप्तांस्तत्र व्याप्रगणान् बहूनू,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया
ヴァイシャンパーヤナは語った。「ドゥシュヤンタ王は森を巡り、さまざまな野獣を狩っては討った。そこでは、矢の届く間合いに入った多くの虎を射落とした。」
Verse 21
पातयामास दुष्यन्तो निर्बिभेद च सायकै: । दूरस्थान् सायकै: कांश्चिदभिनत् स नराधिप:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया
ヴァイシャンパーヤナは語った。「ドゥシュヤンタ王は多くの獣を打ち倒し、矢で貫いた。遠くにいるものさえ、その君主は矢束で傷を負わせた。」
Verse 22
अभ्याशमागतांश्वान्यान् खड्गेन निरकृन्तत । कांश्चिदेणान् समाजघ्ने शक््त्या शक्तिमतां वर:,वह सब ओर मृग और सिंह आदि भयंकर जन्तुओं तथा अन्य वनवासी जीवोंसे भरा हुआ था। नरश्रेष्ठ राजा दुष्यन्तने सेवक, सैनिक और सवारियोंके साथ नाना प्रकारके हिंसक पशुओंका शिकार करते हुए उस वनको रौंद डाला। वहाँ बाणोंके लक्ष्यमें आये हुए बहुत-से व्याप्रोंको महाराज दुष्यन्तने मार गिराया और कितनोंको सायकोंसे बींध डाला। शक्तिशाली पुरुषोंमें श्रेष्ठ नरेशने कितने ही दूरवर्ती हिंसक पशुओंको बाणोंद्वारा घायल किया। जो निकट आ गये, उन्हें तलवारसे काट डाला और कितने ही एण जातिके पशुओंको शक्ति नामक शस्त्रद्वारा मौतके घाट उतार दिया
ヴァイシャンパーヤナは語った。「その王—剛勇の中の第一—は、近づく犬やほかの獣を剣で斬り伏せ、また幾頭かの羚羊を槍(シャクティ)で討ち取った。」
Verse 23
श्रोतुमिच्छामि तत्त्वज्ञ सर्व मतिमतां वर । भगवन! वीरवर दुष्यन्तने शकुन्तलाको कैसे प्राप्त किया? मैं पुरुषसिंह दुष्यन्तके उस चरित्रको विस्तारपूर्वक सुनना चाहता हूँ। तत्त्वज्ञ मुने! आप बुद्धिमानोंमें श्रेष्ठ हैं। अतः ये सब बातें बताइये,गदामण्डलतत्त्वज्ञक्ष॒चारामितविक्रम: । तोमरैरसिभिश्वापि गदामुसलकम्पनै: असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े
ジャナメージャヤは言った。「真実を知る方、賢者の中の最上よ。私はすべてを聞きたい。尊き御方よ—勇者ドゥシュヤンタはいかにしてシャクンタラーを得たのか。人中の獅子ドゥシュヤンタの生涯と行状を、余すところなく詳しく聞きたい。実相を知る牟尼よ、あなたは知者の第一である。ゆえに、これら一切を語ってください。」 (物語は続く。)無辺の武威を備えた王は、棍棒(mace)を旋回させる術に巧みであった。槍と剣、さらに棍棒と棍での打撃をもって、思うままにさまよう野象を討ちながら、あたりを巡った。驚くべき勇猛の王と戦を愛する兵たちは、その広大な森の隅々まで捜し尽くした。獅子と虎は森を捨てて逃げ去り、頭領を失った獣の群れは騒然と走り散り、別の群れは悲鳴をあげた。渇きに責められ、干上がった川床へ赴いても水を得られず、絶望に沈む。狂奔の疲れに心身尽き、気を失って倒れ伏す。飢えと渇きと疲労に打ちひしがれた多くの獣が、大地に散り敷かれていた。
Verse 24
चचार स विनिष्नन् वै स्वैरचारान् वनद्विपान् । राज्ञा चाद्भुतवीर्येण योधेश्व समरप्रियै:,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े
ヴァイシャンパーヤナは語った。彼はそこを巡り、思うままにさまよう森の野象を打ち倒していった。驚くべき武威を備えたその王は、戦を好む兵たちとともに大森林を四方にわたり徹底して捜し回った――度を越した王権の威勢は、森を生きものたちにとって恐怖の野へと変えてしまうのである。
Verse 25
लोड्यमानं महारण्यं तत्यजु: सम मृगाधिपा: । तत्र विद्रुतयूथानि हतयूथपतीनि च,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े
ヴァイシャンパーヤナは語った。広大な森が荒々しく捜索され、追い立てられると、百獣の主たる獅子と虎はその森を捨てて逃げ去った。そこでは、群れの長を失った多くの獣群が恐慌して走り、また別の群れは散り散りになって嘆きの声を上げつつ逃げ惑った。このくだりは、節度なき武力が自然へ向けられるとき、無辜の生きものに恐怖と混乱と苦しみをもたらすこと—抑制なき権力の巻き添えの害を暗に戒める—を示している。
Verse 26
मृगयूथान्यथौत्सुक्याच्छब्दं चक्रुस्ततस्तत: । शुष्काश्चापि नदीर्गत्वा जलनैराश्यकर्शिता:,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े
ヴァイシャンパーヤナは語った。すると鹿の群れは動揺し、あちらこちらで幾度も鳴き叫んだ。水を得られぬ絶望に責められたものは、干上がった川床にまで赴いたが、そこにも水はなく、失望と疲労とに打ちひしがれていった。
Verse 27
व्यायामक्लान्तह्ृदया: पतन्ति सम विचेतस: । क्षुत्पिपासापरीताश्र श्रान्ताश्न॒ पतिता भुवि,असीम पराक्रमवाले राजा गदा घुमानेकी कलामें अत्यन्त प्रवीण थे। अतः वे तोमर, तलवार, गदा तथा मुसलोंकी मारसे स्वेच्छापूर्वक विचरनेवाले जंगली हाथियोंका वध करते हुए वहाँ सब ओर विचरने लगे। अदभुत पराक्रमी नरेश और उनके युद्ध-प्रेमी सैनिकोंने उस विशाल वनका कोना-कोना छान डाला। अतः सिंह और बाघ उस वनको छोड़कर भाग गये। पशुओंके कितने ही झुंड, जिनके यूथपति मारे गये थे, व्यग्र होकर भागे जा रहे थे और कितने ही यूथ इधर-उधर आर्तनाद करते थे। वे प्याससे पीड़ित हो सूखी नदियोंमें जाकर जब जल नहीं पाते, तब निराशासे अत्यन्त खिन्न हो दौड़नेके परिश्रमसे क्लान्तचित्त होनेके कारण मूर्च्छित होकर गिर पड़ते थे। भूख, प्यास और थकावटसे चूर-चूर हो बहुत-से पशु धरतीपर गिर पड़े
ヴァイシャンパーヤナは語った。絶え間ない奔走に心は疲れ、感覚は鈍り揺らいで、生きものたちは崩れ落ちる。飢えと渇きに責められ、力尽きて大地に倒れる――節度なき暴力と荒野の攪乱が、命あるものを抗いようのない苦しみに追い込むさまの象徴である。
Verse 28
केचित् तत्र नरव्याप्रैरभक्ष्यन्त बुभुक्षितै: । केचिदग्निमथोत्पाद्य संसाध्य च वनेचरा:,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान् और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे
ヴァイシャンパーヤナは語った。そこには、飢えに駆られ虎のごとき荒々しい性を帯びて、食すべからざるものに手を伸ばす者もいた。別の者たち——森に住む者——はまず火を起こし、整えると、荒野にて習わしのままに食を煮炊きした。この光景は、秩序が崩れるとき、飢えと恐れが人を残虐へと押しやり、節制から遠ざけることを示している。
Verse 29
भक्षयन्ति सम मांसानि प्रकुट्य विधिवत् तदा । तत्र केचिद् गजा मत्ता बलिन: शस्त्रविक्षता:,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान् और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे
ヴァイシャンパーヤナは語った。—そのとき、その荒れた森では、ある者たちが己の習わしと粗野な掟に従って肉をこしらえ、これを食らっていた。そこにはまた、発情の狂気に酔う力強い象が、武器の打撃に裂かれ傷だらけとなり、鼻を引きすぼめて恐怖のうちに逃げ散っていた。この光景は、常の抑制が崩れ落ちたことを示す。飢えと暴力が生きものを狂おしい生存へと駆り立て、森は残虐と恐怖の舞台と化したのである。
Verse 30
संकोच्याग्रकरान् भीता: प्रद्रवन्ति सम वेगिता: । शकृन्मूत्रं सृजन्तश्च क्षरन्तः शोणितं बहु,वहाँ कितने ही व्याप्र-स्वभावके नृशंस जंगली मनुष्य भूखे होनेके कारण कुछ मृगोंको कच्चे ही चबा गये। कितने ही वनमें विचरनेवाले व्याध वहाँ आग जलाकर मांस पकानेकी अपनी रीतिके अनुसार मांसको कूट-कूटकर राँधने और खाने लगे। उस वनमें कितने ही बलवान् और मतवाले हाथी अस्त्र-शस्त्रोंके आघातसे क्षत-विक्षत होकर सूँड़को समेटे हुए भयके मारे वेगपूर्वक भाग रहे थे। उस समय उनके घावोंसे बहुत-सा रक्त बह रहा था और वे मल-मूत्र करते जाते थे
ヴァイシャンパーヤナは語った。—彼らは恐怖にかられ、前方(鼻)を引きすぼめて、同じ勢いで逃げ走った。走りながら糞尿を漏らし、傷口からは多くの血が流れ出た—森に満ちる暴力と、生きものに武器を向けたときの容赦ない帰結を映す像である。
Verse 31
वन्या गजवरास्तत्र ममृदुर्मनुजान् बहून् । तद् वनं बलमेघेन शरधारेण संवृतम् | व्यरोचत मृगाकीर्ण राज्ञा हतमृगाधिपम्,बड़े-बड़े जंगली हाथियोंने भी वहाँ भागते समय बहुत-से मनुष्योंको कुचल डाला। वहाँ बाणरूपी जलकी धारा बरसानेवाले सैन्यरूपी बादलोंने उस वनरूपी व्योमको सब ओरसे घेर लिया था। महाराज दुष्यन्तने जहाँके सिंहोंको मार डाला था, वह हिंसक पशुओंसे भरा हुआ वन बड़ी शोभा पा रहा था
ヴァイシャンパーヤナは語った。—そこでは、逃げ惑う野象の猛きものどもが、多くの人間を踏み潰した。その森は—まるで天空のように—四方から雲のごとき軍勢に囲まれ、矢の雨を降らされていた。獣が群れ満ちていながら、いよいよ輝いて見えたのは、王がすでにその森の“主たる捕食者”(獅子)を討ち果たしていたからである。
Verse 69
इति श्रीमहाभारते आदिपर्वणि सम्भवपर्वणि शकुन्तलोपाख्याने एकोनसप्ततितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत आदिपर्वके अन्तर्गत सम्भवपर्वमें शकुन्तलोपाख्यानविषयक उनहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
かくして『シュリー・マハーバーラタ』のアーディ・パルヴァ(初篇)中、サンバヴァ・パルヴァ(誕生篇)におけるシャクンタラーの物語、第六十九章は終わる。この結語(コロフォン)はシャクンタラー章段の完結を示し、叙事が再び起源と系譜の大きな枠組みへと戻ってゆくことを告げる—そこにこそ、この叙事詩の倫理と王統の関心が据えられている。
Verse 103
यस्य बाहुबलं प्राप्प न भवन्त्यसुहृदूगणा: । वहाँ देखती हुई स्त्रियोंने उन्हें वज्रपाणि इन्द्रके समान समझा और आपसमें वे इस प्रकार बातें करने लगीं--“सखियो! देखो तो सही, ये ही वे पुरुषसिंह महाराज दुष्यन्त हैं, जो संग्रामभूमिमें वसुओंके समान पराक्रम दिखाते हैं, जिनके बाहुबलमें पड़कर शत्रुओंका अस्तित्व मिट जाता है”
ヴァイシャンパーヤナは語った。—そこに彼の姿を見た女たちは、雷霆を手にするインドラ(ヴァジュラパーニ)に等しいと見なし、互いにこう語り合った。「友よ、見よ—この方こそ人中の獅子、ドゥシュヤンタ王。戦場にあってはヴァスたちのごとき武勇を示し、敵がその強き腕の届くところに落ちれば、立つ場所さえも消し去られるのだ。」
The dilemma concerns whether a ruler may deny a privately established relationship and child due to public doubt; the text evaluates this as a conflict between reputation-management and the non-negotiable duty of satya and पुत्रधर्म.
Truth is treated as the highest dharma and a stabilizing public good: discernment in speech, self-scrutiny, and fidelity to one’s obligations are presented as superior to mere external prestige or ritual magnitude.
A formal phalaśruti is not stated; instead, the chapter offers meta-validation through narrative authority (celestial testimony) and genealogical consequence: Bharata’s recognition becomes the legitimizing hinge for the Bhārata lineage and the epic’s historical self-identification.