
Keśinī’s Inquiry to Bāhuka and the Emotional Signs of Concealed Identity (केशिन्याः बाहुकपरीक्षा)
Upa-parva: Nalopākhyāna (Tale of Nala and Damayantī)
Damayantī, observing a physically altered charioteer seated on a chariot, instructs her attendant Keśinī to approach with gentleness and ask precise questions to determine who he is, suspecting he may be Nala. Keśinī greets the man respectfully and conveys Damayantī’s questions: when the party departed, why they came, and who the third companion is. Bāhuka explains that King Ṛtuparṇa, having heard of Damayantī’s second svayaṃvara, set out swiftly with exceptional horses, and that Bāhuka serves as his charioteer and cook. He identifies the other companion as Vārṣṇeya, Nala’s well-known charioteer, and states that Nala left his children behind and now moves hidden in the world, unrecognized in altered form. Keśinī then recites the earlier lament voiced by Damayantī (as carried by a brāhmaṇa messenger), requesting the same reply again. Hearing it, Nala’s heart is distressed; he restrains himself, speaks in praise of steadfast women who do not become angry even in adversity, and then breaks into tears. Keśinī returns and reports both the content and Bāhuka’s visible emotional transformation to Damayantī.
Chapter Arc: तीव्र वेग से दौड़ते रथ में ऋतुपर्ण का उत्तरीय वस्त्र गिर पड़ता है—और उसी क्षण ‘बाहुक’ बने नल की असाधारण चपलता व नियंत्रण पर राजा की दृष्टि टिक जाती है। → ऋतुपर्ण, नल की रथ-विद्या से चकित होकर उसे परखने लगता है: मार्ग में खड़े बहेड़े (विभीतक) के वृक्ष के फलों और पत्तों की संख्या बताने की चुनौती उठती है। नल के भीतर छिपा हुआ ‘कली’ भी जलन और पीड़ा से तड़पता है—मानो विषधर नाग का दाह दिन-रात दे रहा हो। → ऋतुपर्ण गणना-विद्या का अद्भुत प्रदर्शन करता है—एक-एक शाखा, प्रशाखा, पत्ते और फल तक का सूक्ष्म हिसाब (पंचकोटि पत्तों जैसी अतिशयोक्त संख्या-छवियों सहित) सुनाकर नल को स्तब्ध कर देता है; नल के भीतर कली का दाह तीव्रतम हो उठता है, क्योंकि यह विद्या आगे चलकर ‘कली-निर्गमन’ का द्वार बनने वाली है। → ऋतुपर्ण नल से वचन लेता है कि वह उसे उसी दिन विदर्भ पहुँचा देगा ताकि सूर्य-दर्शन से पहले दमयंती तक पहुँचा जा सके; बदले में वह नल को अपनी ‘अक्षहृदय-ज्ञान’ और ‘संख्यान-कौशल’ की झलक/प्रतिज्ञा देता है। नल के मन में आशा और भय साथ-साथ जागते हैं—दमयंती के निकट पहुँचने की आशा, और कली के दाह से मुक्ति की अनकही आकांक्षा। → कली का दाह भीतर-भीतर बढ़ रहा है; ऋतुपर्ण की विद्या नल के भाग्य को पलटने वाली है—क्या यह ज्ञान नल को कली से मुक्त कर पाएगा और दमयंती से पुनर्मिलन का मार्ग खोलेगा?
Verse 1
हि आय >> () हि २ 7 द्विसप्ततितमो< ध्याय: ऋतुपर्णके उत्तरीय वस्त्र गिरने और बहेड़ेके वृक्षके फलोंको गिननेके विषयमें नलके साथ ऋतुपर्णकी बातचीत, ऋतुपर्णसे नलको द्यूतविद्याके रहस्यकी प्राप्ति और उनके शरीरसे कलियुगका निकलना बृहदश्च उवाच स नदी: पर्वतांश्षैव वनानि च सरांसि च | अचिरेणातिचक्राम खेचर: खे चरजन्निव,बृहदश्व मुनि कहते हैं--युधिष्ठिर! जैसे पक्षी आकाशमें उड़ता है, उसी प्रकार बाहुक (बड़े वेगसे) शीघ्रतापूर्वक कितनी ही नदियों, पर्वतों, वनों और सरोवरोंको लाँचघता हुआ आगे बढ़ने लगा
Bṛhadaśva berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, bagaikan burung melintas di angkasa, Bāhuka melaju dengan sangat cepat; dalam waktu singkat ia menyeberangi sungai, gunung, hutan, dan danau, terus maju tanpa tertahan.”
Verse 2
तथा प्रयाते तु रथे तदा भाज़सुरिनृप: । उत्तरीयमधो<पश्यद् भ्रष्ट परपुरंजय:,जब रथ इस प्रकार तीव्र गतिसे दौड़ रहा था, उसी समय शत्रुओंके नगरोंको जीतनेवाले राजा ऋतुपर्णने देखा, उनका उत्तरीय वस्त्र नीचे गिर गया है
Ketika kereta melaju demikian kencang, raja penakluk kota-kota musuh, Ṛtuparṇa, melihat bahwa kain atasnya (uttarīya) telah tergelincir dan jatuh ke bawah.
Verse 3
ततः स त्वरमाणस्तु पटे निपतिते तदा । ग्रहीष्यामीति तं राजा नलमाह महामना:,उस समय वस्त्र गिर जानेपर उन महामना नरेशने बड़ी उतावलीके साथ नलसे कहा --“महामते! इस वेगशाली घोड़ोंको (थोड़ी देरके लिये) रोक लो। मैं अपनी गिरी हुई चादर लूँगा। जबतक यह वार्ष्णेय उतरकर मेरे उत्तरीय वस्त्रको ला दे, तबतक रथको रोके रहो”
Ketika jubahnya terjatuh, raja yang berhati luhur itu—dengan tergesa—berkata kepada Nala, “Aku akan memungutnya. Wahai yang bijaksana, tahanlah kuda-kuda yang sangat cepat ini sejenak. Sampai Vārṣṇeya turun dan membawa kain atasku, hentikanlah kereta.”
Verse 4
निगृह्लीष्व महाबुद्धे हपानेतान् महाजवान् । वार्ष्णेयो यावदेनं मे पटमानयतामिह,उस समय वस्त्र गिर जानेपर उन महामना नरेशने बड़ी उतावलीके साथ नलसे कहा --“महामते! इस वेगशाली घोड़ोंको (थोड़ी देरके लिये) रोक लो। मैं अपनी गिरी हुई चादर लूँगा। जबतक यह वार्ष्णेय उतरकर मेरे उत्तरीय वस्त्रको ला दे, तबतक रथको रोके रहो”
Bṛhadaśva berkata, “Wahai yang berakal agung, kendalikan kuda-kuda yang sangat cepat ini. Biarkan Vārṣṇeya turun dan membawa kainku yang jatuh ke sini.”
Verse 5
नलस्तं प्रत्युवाचाथ दूरे भ्रष्ट: पटस्तव । योजनं समतिक्रान्तो नाहतु शक््यते पुन:,यह सुनकर नलने उसे उत्तर दिया--“महाराज! आपका वस्त्र बहुत दूर गिरा है। मैं उस स्थानसे चार कोस आगे आ गया हूँ। अब फिर वह नहीं लाया जा सकता”
Mendengar itu, Nala menjawab, “Wahai Raja, kainmu jatuh jauh di belakang. Aku telah melampauinya sejauh satu yojana; kini tak mungkin dibawa kembali.”
Verse 6
एवमुक्तो नलेनाथ तदा भाज़सुरिरनप: । आससाद वने राजन् फलवन्तं बिभीतकम्,राजन्! नलके ऐसा कहनेपर राजा ऋतुपर्ण चुप हो गये। अब वे एक वनमें एक बहेड़ेके वृक्षेके पास आ पहुँचे, जिसमें बहुत-से फल लगे थे
Bṛhadaśva berkata: Setelah Nala berkata demikian, Bhājasuri (Ṛtupārṇa) terdiam tanpa jawaban. Lalu, wahai Raja, di hutan ia sampai pada sebatang pohon bibhītaka yang sarat buah.
Verse 7
तं दृष्टवा बाहुक॑ राजा त्वरमाणो5भ्यभाषत । ममापि सूत पश्य त्वं संख्याने परमं बलम्,उस वृक्षको देखकर राजा ऋतुपर्णने तुरंत ही बाहुकसे कहा--'सूत! तुम देखो, मुझमें भी गणना करने (हिसाब लगाने) की कितनी अद्भुत शक्ति है
Melihat itu, Raja Ṛtupārṇa dengan tergesa berkata kepada Bāhuka, “Kusir, lihatlah! Aku pun memiliki kekuatan luar biasa dalam perhitungan.”
Verse 8
सर्व: सर्व न जानाति सर्वज्ञो नास्ति कश्षन | नैकत्र परिनिष्ठास्ति ज्ञानस्य पुरुषे क्वचित्,“सब लोग सभी बातें नहीं जानते। संसारमें कोई भी सर्वज्ञ नहीं है तथा एक ही पुरुषमें सम्पूर्ण ज्ञानकी प्रतिष्ठा नहीं है
Bṛhadaśva berkata: Tidak semua orang mengetahui segala sesuatu. Di dunia ini tidak ada seorang pun yang sungguh mahatahu, dan pengetahuan yang sempurna tidaklah tegak sepenuhnya pada satu orang saja. Karena itu hendaknya manusia tetap rendah hati, belajar dari sesama, dan menjauhi kesombongan atas pemahamannya sendiri.
Verse 9
वृक्षेडस्मिन् यानि पर्णानि फलान्यपि च बाहुक | पतितान्यपि यान्यत्र तत्रैकमधिकं शतम्
Bṛhadaśva berkata: “Wahai Bāhuka, daun dan buah pada pohon ini—termasuk yang telah gugur di sini—berjumlah seratus satu.”
Verse 10
एकपत्राधिकं चात्र फलमेकं॑ च बाहुक । पञ्चकोट्यो<5थ पत्राणां द्ायोरपि च शाखयो:
Bṛhadaśva berkata: “Wahai Bāhuka, di sini ada satu buah lebih dan satu daun lebih. Dan pada kedua dahan ini saja, jumlah daun mencapai lima koṭi.”
Verse 12
“बाहुक! इस वृक्षपर जितने पत्ते और फल हैं, उन सबको मैं बताता हूँ। पेड़के नीचे जो पत्ते और फल गिरे हुए हैं, उनकी संख्या एक सौ अधिक है, इसके सिवा एक पत्र तथा एक फल और भी अधिक है; अर्थात् नीचे गिरे हुए पत्तों और फलोंकी संख्या वृक्षमें लगे हुए पत्तों और फलोंसे एक सौ दो अधिक है। इस वृक्षकी दोनों शाखाओंमें पाँच करोड़ पत्ते हैं। तुम्हारी इच्छा हो तो इन दोनों शाखाओं तथा इसकी अन्य प्रशाखाओं (को काटकर उन)-के पत्ते गिन लो। इसी प्रकार इन शाखाओंमें दो हजार पंचानबे फल लगे हुए हैं ।। ततो रथमवस्थाप्य राजानं बाहुको<ब्रवीत् । परोक्षमिव मे राजन् कत्थसे शत्रुकर्शन,यह सुनकर बाहुकने रथ खड़ा करके राजासे कहा--“शत्रुसूदन नरेश! आप जो कह रहे हैं, वह संख्या परोक्ष है। मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर उसके फलोंकी संख्याको प्रत्यक्ष करूँगा। महाराज! आपकी आँखोंके सामने इस बहेड़ेको का्टूँगा। इस प्रकार गणना कर लेनेपर वह संख्या परोक्ष नहीं रह जायगी। बिना ऐसा किये मैं तो नहीं समझ सकता कि (फलोंकी) संख्या इतनी है या नहीं
Bṛhadaśva berkata: “Wahai Bāhuka, aku akan menyebutkan kepadamu jumlah setiap daun dan buah pada pohon ini. Daun dan buah yang gugur di bawahnya berjumlah seratus lebih banyak daripada yang masih melekat; bahkan masih lebih satu daun dan satu buah lagi. Artinya, yang jatuh di bawah melebihi yang di pohon sebanyak seratus dua. Pada dua dahan utamanya terdapat lima koṭi daun. Jika engkau berkehendak, tebanglah kedua dahan itu beserta cabang-cabangnya dan hitunglah daunnya. Demikian pula, pada dahan-dahan itu ada dua ribu sembilan puluh lima buah.” Mendengar itu, Bāhuka menghentikan kereta dan berkata kepada raja: “Wahai raja penakluk musuh, apa yang paduka nyatakan terasa seakan hanya diketahui secara tidak langsung. Aku akan menebang pohon bibhītaka ini dan menjadikan jumlah buahnya tampak nyata. Di hadapan mata paduka sendiri akan kutumbangkan; setelah dihitung, hal itu tak lagi menjadi dugaan. Tanpa demikian, aku tak dapat menerima bahwa jumlah buahnya benar seperti yang paduka katakan.”
Verse 13
प्रत्यक्षमेतत् कर्तास्मि शातयित्वा बिभीतकम् | अथात्र गणिते राजन् विद्यते न परोक्षता,यह सुनकर बाहुकने रथ खड़ा करके राजासे कहा--“शत्रुसूदन नरेश! आप जो कह रहे हैं, वह संख्या परोक्ष है। मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर उसके फलोंकी संख्याको प्रत्यक्ष करूँगा। महाराज! आपकी आँखोंके सामने इस बहेड़ेको का्टूँगा। इस प्रकार गणना कर लेनेपर वह संख्या परोक्ष नहीं रह जायगी। बिना ऐसा किये मैं तो नहीं समझ सकता कि (फलोंकी) संख्या इतनी है या नहीं
Bāhuka berkata: “Akan kubuat hal ini nyata dengan menebang pohon bibhītaka itu. Maka, wahai raja, dalam perhitungan ini takkan ada lagi sesuatu yang tersembunyi atau sekadar tersimpulkan.”
Verse 14
प्रत्यक्ष ते महाराज शातयिष्ये बिभीतकम् | अहं हि नाभिजानामि भवेदेवं न वेति वा,यह सुनकर बाहुकने रथ खड़ा करके राजासे कहा--“शत्रुसूदन नरेश! आप जो कह रहे हैं, वह संख्या परोक्ष है। मैं इस बहेड़ेके वृक्षको काटकर उसके फलोंकी संख्याको प्रत्यक्ष करूँगा। महाराज! आपकी आँखोंके सामने इस बहेड़ेको का्टूँगा। इस प्रकार गणना कर लेनेपर वह संख्या परोक्ष नहीं रह जायगी। बिना ऐसा किये मैं तो नहीं समझ सकता कि (फलोंकी) संख्या इतनी है या नहीं
Wahai Maharaja, akan kutebang pohon bibhītaka ini dan di hadapan matamu sendiri akan kubuat jumlah buahnya menjadi nyata; sebab tanpa itu aku tak dapat sungguh-sungguh mengetahui apakah bilangannya memang demikian atau tidak.
Verse 15
संख्यास्थामि फलान्यस्य पश्यतस्ते जनाधिप । मुहूर्तमपि वार्ष्णेयो रश्मीन् यच्छतु वाजिनाम्,'जनेश्वर! यदि वारष्णेय दो घड़ीतक भी इन घोड़ोंकी लगाम सँभाले तो मैं आपके देखते-देखते इसके फलोंको गिन लूँगा”
Wahai penguasa manusia, di hadapanmu aku akan menghitung buah-buahnya; biarlah Vārṣṇeya memegang kendali kuda-kuda itu walau hanya selama satu muhūrta.
Verse 16
तमब्रवीन्नप: सूतं नायं कालो विलम्बितुम् । बाहुकस्त्वब्रवीदेनं परं यत्न॑ं समास्थित:,तब राजाने सारथिसे कहा--“यह विलम्ब करनेका समय नहीं है।” बाहुक बोला--मैं प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही गणना समाप्त कर दूँगा। आप दो ही घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये। अथवा यदि आपको बड़ी जल्दी हो तो यह विदर्भदेशका मंगलमय मार्ग है, वाष्णेयको सारथि बनाकर चले जाइये'
Lalu sang raja berkata kepada kusirnya, “Ini bukan saatnya berlama-lama.” Namun Bāhuka, teguh dalam upaya tertinggi, menjawab, “Akan segera kuselesaikan perhitungannya.”
Verse 17
प्रतीक्षस्व मुहूर्त त्वमथवा त्वरते भवान् । एष याति शिव: पन्था याहि वार्ष्णेयसारथि:,तब राजाने सारथिसे कहा--“यह विलम्ब करनेका समय नहीं है।” बाहुक बोला--मैं प्रयत्नपूर्वक शीघ्र ही गणना समाप्त कर दूँगा। आप दो ही घड़ीतक प्रतीक्षा कीजिये। अथवा यदि आपको बड़ी जल्दी हो तो यह विदर्भदेशका मंगलमय मार्ग है, वाष्णेयको सारथि बनाकर चले जाइये'
Tunggulah sejenak; atau bila engkau tergesa, inilah jalan yang mujur—berangkatlah dengan Vārṣṇeya sebagai kusirmu.
Verse 18
अब्रवीदृतुपर्णस्तु सान्त्वयन् कुरुनन्दन । त्वमेव यन्ता नान्यो<5स्ति पृथिव्यामपि बाहुक,कुरुनन्दन! तब ऋतुपर्णने उसे सान्त्वना देते हुए कहा--“बाहुक! तुम्हीं इन घोड़ोंको हॉँक सकते हो। इस कलामें पृथ्वीपर तुम्हारे जैसा दूसरा कोई नहीं है
Lalu Raja Ṛtuparṇa, menenangkan putra Kuru, berkata, “Bāhuka, hanya engkaulah yang mampu mengendalikan kuda-kuda ini; di bumi ini tiada seorang pun yang setara denganmu dalam keahlian itu.”
Verse 19
त्वत्कृते यातुमिच्छामि विदर्भान् हयकोविद । शरणं त्वां प्रपन्नो5स्मि न विघ्नं कर्तुमहसि,'घोड़ोंके रहस्यको जाननेवाले बाहुक! तुम्हारे ही प्रयत्नसे मैं विदर्भदेशकी राजधानीमें पहुँचना चाहता हूँ। देखो, तुम्हारी शरणमें आया हूँ। इस कार्यमें विघ्न न डालो
Wahai Bāhuka, yang mahir mengetahui rahasia kuda! Dengan pertolongan dan upayamulah aku ingin berangkat ke Vidarbha. Lihatlah—aku telah berlindung padamu; janganlah engkau menghalangi urusan ini.
Verse 20
कामं च ते करिष्यामि यन्मां वक्ष्यसि बाहुक | विदर्भान् यदि यात्वाद्य सूर्य दर्शयितासि मे,“बाहुक! यदि आज विदर्भदेशमें पहुँचकर तुम मुझे सूर्यका दर्शन करा सको तो तुम जो कहोगे, तुम्हारी वही इच्छा पूर्ण करूँगा”
Wahai Bāhuka, apa pun yang kau minta akan kupenuhi. Jika hari ini juga engkau dapat tiba di Vidarbha dan memperlihatkan kepadaku matahari di sana, maka apa pun yang kau ucapkan—keinginanmu akan terlaksana.
Verse 21
अथाब्रवीद् बाहुकस्तं संख्याय च बिभीतकम् । ततो विदर्भान् यास्यामि कुरुष्वैवं वचो मम,यह सुनकर बाहुकने कहा--“मैं बहेड़ेके फलोंको गिनकर विदर्भदेशको चलूँगा। आप मेरी यह बात मान लीजिये”
Mendengar itu, Bāhuka berkata, “Setelah menghitung buah bibhītaka, barulah aku akan berangkat ke Vidarbha. Mohon bertindak sesuai dengan ucapanku.”
Verse 22
अकाम इव तं राजा गणयस्वेत्युवाच ह | एकदेशं च शाखाया: समादिष्ट॑ मयानघ,राजाने मानो अनिच्छासे कहा--“अच्छा, गिन लो। अश्वविद्याके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप बाहुक! मेरे बताये अनुसार तुम शाखाके एक ही भागको गिनो। इससे तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी'। बाहुकने रथसे उतरकर तुरंत ही उस वृक्षको काट डाला
Sang raja, seolah enggan, berkata, “Baiklah—hitunglah. Wahai yang tak bercela, hitunglah hanya satu bagian dari dahan itu, sebagaimana telah kuperintahkan.”
Verse 23
गणयस्वाश्रृतत्त्वज्ञ ततस्त्वं प्रीतिमावह । सो<वतीर्य रथात् तूर्ण शातयामास त॑ टद्रुमम्,राजाने मानो अनिच्छासे कहा--“अच्छा, गिन लो। अश्वविद्याके तत्त्वको जाननेवाले निष्पाप बाहुक! मेरे बताये अनुसार तुम शाखाके एक ही भागको गिनो। इससे तुम्हें बड़ी प्रसन्नता होगी'। बाहुकने रथसे उतरकर तुरंत ही उस वृक्षको काट डाला
Sang raja berkata, “Hitunglah, wahai Bāhuka yang tak bercela, yang memahami hakikat ajaran dan prinsip-prinsip ilmu kuda; dengan itu engkau akan mendatangkan kepuasan bagiku.” Lalu Bāhuka segera turun dari kereta dan seketika menebang pohon itu.
Verse 24
ततः स विस्मयाविष्टो राजानमिदमत्रवीत् । गणयित्वा यथोक्तानि तावन्त्येव फलानि तु,गिननेसे उसे उतने ही फल मिले। तब उसने विस्मित होकर राजा ऋतुपर्णसे कहा --
Lalu, diliputi keheranan, ia berkata kepada sang raja: “Aku telah menghitungnya tepat seperti yang Paduka ucapkan; buah-buah itu memang sebanyak itu.”
Verse 25
अत्यद्भुतमिदं राजन् दृष्टवानस्मि ते बलम् | श्रोतुमिच्छामि तां विद्यां ययैतज्ज्ञायते नूप,“राजन्! आपमें गणितकी यह अद्भुत शक्ति मैंने देखी है। नराधिप! जिस विद्यासे यह गिनती जान ली जाती है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।' राजा तुरंत जानेके लिये उत्सुक थे, अतः उन्होंने बाहुकसे कहा--“तुम मुझे द्यूत-विद्याका मर्मज्ञ और गणितमें अत्यन्त निपुण समझो'
Bṛhadaśva berkata: “Wahai Raja, aku telah menyaksikan kekuatan yang sungguh menakjubkan dalam dirimu—ketangkasanmu dalam berhitung. Wahai penguasa manusia, aku ingin mendengar pengetahuan yang dengannya perhitungan seperti ini dapat dipahami.”
Verse 26
तमुवाच ततो राजा त्वरितो गमने नृप । विद्धयक्षहृददयज्ञं मां संख्याने च विशारदम्,“राजन्! आपमें गणितकी यह अद्भुत शक्ति मैंने देखी है। नराधिप! जिस विद्यासे यह गिनती जान ली जाती है, उसे मैं सुनना चाहता हूँ।' राजा तुरंत जानेके लिये उत्सुक थे, अतः उन्होंने बाहुकसे कहा--“तुम मुझे द्यूत-विद्याका मर्मज्ञ और गणितमें अत्यन्त निपुण समझो'
Lalu sang raja, yang ingin segera berangkat, berkata: “Ketahuilah aku sebagai orang yang memahami inti permainan dadu, dan yang sangat terampil dalam perhitungan.”
Verse 27
बाहुकस्तमुवाचाथ देहि विद्यामिमां मम । मत्तोडपि चाश्वह्नदयं गृहाण पुरुषर्षभ,बाहुकने कहा--'पुरुषश्रेष्ठ) तुम यह विद्या मुझे बतला दो और बदलेमें मुझसे भी अश्व-विद्याका रहस्य ग्रहण कर लो”
Kemudian Bāhuka berkata: “Ajarkanlah kepadaku pengetahuanmu itu. Dan sebagai gantinya, wahai insan terbaik, terimalah dariku rahasia ilmu kuda—seni kepengurusan dan pengetahuan tentang kuda.”
Verse 28
ऋतुपर्णस्ततो राजा बाहुक॑ कार्यगौरवात् । हयज्ञानस्य लोभाच्च तं तथेत्यब्रवीद् वच:,तब राजा ऋतुपर्णने कार्यकी गुरुता और अश्व-विज्ञानके लोभसे बाहुकको आश्वासन देते हुए कहा--“तथास्तु”
Maka Raja Ṛtuparṇa, karena beratnya urusannya dan tergoda oleh hasrat akan rahasia ilmu kuda, menenangkan Bāhuka dan berkata: “Jadilah demikian.”
Verse 29
यथोक्तं त्वं गृहाणेदमक्षाणां हृदयं परम् निक्षेपो मे5श्वह्दयं त्वयि तिष्ठतु बाहुक । एवमुकक््त्वा ददौ विद्यामृतुपर्णो नलाय वै,“बाहुक! तुम मुझसे द्यूत-विद्याका गूढ़ रहस्य ग्रहण करो और अभश्वविज्ञानको मेरे लिये अपने ही पास धरोहरके रूपमें रहने दो।” ऐसा कहकर ऋतुपर्णने नलको अपनी विद्या दे दी
Bṛhadaśva berkata: “Sebagaimana telah kukatakan, terimalah dariku ‘jantung’ tertinggi—rahasia terdalam—dari ilmu dadu. Dan titipanku, pengetahuan bernama Aśvahṛdaya (ilmu kuda), hendaklah tetap padamu, wahai Bāhuka.” Setelah berkata demikian, Raja Ṛtupārṇa benar-benar menganugerahkan ilmunya kepada Nala.
Verse 30
तस्याक्षहृददयज्ञस्य शरीरान्नि:सृत: कलि: । कर्कोटकविषं तीक्ष्णं मुखात् सततमुद्धमन्,द्यूत-विद्याका रहस्य जाननेके अनन्तर नलके शरीरसे कलियुग निकला। तब कर्कोटक नागके तीखे विषको अपने मुखसे बार-बार उगल रहा था। उस समय कष्टमें पड़े हुए कलियुगकी वह शापाग्नि भी दूर हो गयी। राजा नलको उसने दीर्घकालतक कष्ट दिया था और उसीके कारण वे किंकर्तव्यविमूढ हो रहे थे
Bṛhadaśva berkata: Setelah rahasia Aksahṛdaya diketahui, Kali keluar dari tubuh Nala. Saat muncul, ia berulang kali memuntahkan dari mulutnya racun tajam ular Karkoṭaka. Pada saat itu juga, nyala kutuk yang melekat pada Kali yang menderita pun sirna. Dialah yang lama menyiksa Raja Nala, dan karenanya Nala terjerumus dalam kebingungan tentang apa yang harus dilakukan.
Verse 31
कलेस्तस्य तदार्तस्य शापाग्नि: स विनि:सृत: । स तेन कर्शितो राजा दीर्घकालमनात्मवान्,द्यूत-विद्याका रहस्य जाननेके अनन्तर नलके शरीरसे कलियुग निकला। तब कर्कोटक नागके तीखे विषको अपने मुखसे बार-बार उगल रहा था। उस समय कष्टमें पड़े हुए कलियुगकी वह शापाग्नि भी दूर हो गयी। राजा नलको उसने दीर्घकालतक कष्ट दिया था और उसीके कारण वे किंकर्तव्यविमूढ हो रहे थे
Bṛhadaśva berkata: Dari Kali yang menderita itu, api kutuk pun keluar lalu pergi menjauh. Karena disiksa olehnya, Raja Nala lama kehilangan penguasaan diri—batinnya gelisah dan pertimbangannya terguncang.
Verse 32
ततो विषविमुक्तात्मा स्वं रूपमकरोत् कलि: । त॑ शप्तुमैच्छत् कुपितो निषधाधिपतिर्नलः,तदनन्तर विषके प्रभावसे मुक्त होकर कलियुगने अपने स्वरूपको प्रकट किया। उस समय निषधनरेश नलने कुपित हो कलियुगको शाप देनेकी इच्छा की
Kemudian, setelah terbebas dari pengaruh racun, Kali menampakkan wujudnya yang sejati. Saat itu Nala, penguasa Niṣadha, murka dan hendak mengutuk Kali.
Verse 33
तमुवाच कलिभ्भीतो वेपमान: कृताञज्जलि: । कोपं॑ संयच्छ नृपते कीर्ति दास्यामि ते पराम्,तब कलियुग भयभीत हो काँपता हुआ हाथ जोड़कर उनसे बोला--“महाराज! अपने क्रोधको रोकिये। मैं आपको उत्तम कीर्ति प्रदान करूँगा
Maka Kali, ketakutan dan gemetar, dengan kedua telapak tangan terkatup memohon, berkata: “Wahai raja, tahanlah amarahmu. Aku akan menganugerahkan kepadamu kemasyhuran yang tertinggi.”
Verse 34
इन्द्रसेनस्थ जननी कुपिता माशपत् पुरा । यदा त्वया परित्यक्ता ततो5हं भूशपीडितः,“इन्द्रसेनकी माता दमयन्तीने, पहले जब उसे आपने वनमें त्याग दिया था, कुपित होकर मुझे शाप दे दिया। उससे मैं बड़ा कष्ट पाता रहा हूँ
Bṛhadaśva berkata: “Damayantī, ibu Indrasena, dahulu sekali dalam amarah menjatuhkan kutuk kepadaku. Sejak engkau meninggalkannya di rimba, aku tersiksa oleh kutuk itu dan menanggung derita besar.”
Verse 35
अवसं त्वयि राजेन्द्र सुदुः:खमपराजित । विषेण नागराजस्य दहा[मानो दिवानिशम्,“किसीसे पराजित न होनेवाले महाराज! मैं आपके शरीरमें अत्यन्त दु:खित होकर रहता था। नागराज कर्कोटकके विषसे मैं दिन-रात झुलसता जा रहा था (इस प्रकार मुझे अपने कियेका कठोर दण्ड मिल गया है)
Bṛhadaśva berkata: “Wahai raja manusia, yang tak terkalahkan, aku tinggal di dalam tubuhmu dalam kesengsaraan yang amat. Terbakar siang dan malam oleh bisa raja ular, aku terus tersengat panas—demikianlah aku menerima hukuman keras atas perbuatanku sendiri.”
Verse 36
शरणं त्वां प्रपन्नो5स्मि शृणु चेदं॑ वचो मम । येच त्वां मनुजा लोके कीर्तयिष्यन्त्यतन्द्रिता: । मत्प्रसूतं भयं तेषां न कदाचिद् भविष्यति,“अब मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी यह बात सुनिये। यदि भयसे पीड़ित और शरणमें आये हुए मुझको आप शाप नहीं देंगे तो संसारमें जो मनुष्य आलस्यरहित हो आपकी कीर्ति-कथाका कीर्तन करेंगे, उन्हें मुझसे कभी भय नहीं होगा।” कलियुगके ऐसा कहनेपर राजा नलने अपने क्रोधको रोक लिया
Aku datang memohon perlindunganmu; dengarkan ucapanku. Jika engkau tidak mengutukku—meski aku ketakutan dan telah berlindung padamu—maka orang-orang di dunia yang tanpa lalai melantunkan kemasyhuranmu takkan pernah gentar oleh bahaya yang timbul dariku.
Verse 37
भयार्त शरणं यात॑ यदि मां त्वं न शप्स्यसे । एवमुक्तो नलो राजा न्ययच्छत् कोपमात्मन:,“अब मैं आपकी शरणमें हूँ। आप मेरी यह बात सुनिये। यदि भयसे पीड़ित और शरणमें आये हुए मुझको आप शाप नहीं देंगे तो संसारमें जो मनुष्य आलस्यरहित हो आपकी कीर्ति-कथाका कीर्तन करेंगे, उन्हें मुझसे कभी भय नहीं होगा।” कलियुगके ऐसा कहनेपर राजा नलने अपने क्रोधको रोक लिया
“Jika engkau tidak mengutukku ketika aku datang dalam ketakutan mencari perlindungan,” demikian ucapnya; mendengar itu Raja Nala menahan amarah di dalam dirinya.
Verse 38
ततो भीत: कलि: क्षिप्रं प्रविवेश बिभीतकम् | कलिस्त्वन्यैस्तदादृश्य: कथयन् नैषधेन वै,तदनन्तर कलियुग भयभीत हो तुरंत ही बहेड़ेके वृक्षमें समा गया। वह जिस समय निषधराज नलके साथ बात कर रहा था, उस समय दूसरे लोग उसे नहीं देख पाते थे
Lalu Kali yang ketakutan segera masuk ke pohon bibhītaka untuk bersembunyi. Dan ketika ia berbicara dengan Nala, raja Niṣadha, Kali tidak terlihat oleh siapa pun yang lain—kehadirannya tersembunyi dari semua.
Verse 39
ततो गतज्वरो राजा नैषध: परवीरहा । सम्प्रणष्टे कलौ राजा संख्यायास्य फलान्युत,तदनन्तर कलियुगके अदृश्य हो जानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले निषधनरेश राजा नल सारी चिन्ताओंसे मुक्त हो गये। बहेड़ेके फलोंको गिनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उत्तम तेजसे युत्ह तेजस्वी रूप धारण करके रथपर चढ़े और वेगशाली घोड़ोंको हाँकते हुए विदर्भदेशको चल दिये
Maka Raja Nala dari Niṣadha—pembinasa para pahlawan musuh—terbebas dari demam dan kegelisahan yang membakar. Ketika Kali lenyap, sang raja menghitung buah-buah itu; pengaruh jahat yang sirna membuat benaknya kembali jernih, dan ia merasakan kepuasan serta kelegaan yang baru.
Verse 40
मुदा परमया युक्तस्तेजसाथ परेण वै । रथमारुह् तेजस्वी प्रययौं जवनैर्हयै:,तदनन्तर कलियुगके अदृश्य हो जानेपर शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले निषधनरेश राजा नल सारी चिन्ताओंसे मुक्त हो गये। बहेड़ेके फलोंको गिनकर उन्हें बड़ी प्रसन्नता हुई। वे उत्तम तेजसे युत्ह तेजस्वी रूप धारण करके रथपर चढ़े और वेगशाली घोड़ोंको हाँकते हुए विदर्भदेशको चल दिये
Dipenuhi sukacita tertinggi dan dianugerahi sinar keagungan yang luar biasa, raja yang cemerlang itu naik ke keretanya dan berangkat, memacu kuda-kuda yang tangkas. Dengan lenyapnya noda pengaruh Kali, kecemasan Nala pun sirna; tekadnya pulih untuk kembali ke Vidarbha dengan martabat dan keyakinan yang utuh.
Verse 41
बिभीतकश्षाप्रशस्त: संवृत्त: कलिसंश्रयात् । हयोत्तमानुत्पततो द्विजानिव पुन: पुन:,कलियुगके आश्रय लेनेसे बहेड़ेका वृक्ष निन्दित हो गया। तदनन्तर राजा नलने प्रसन्नचित्तसे पुनः घोड़ोंको हाँकना आरम्भ किया। वे उत्तम अश्व पक्षियोंकी तरह बार-बार उड़ते हुए-से प्रतीत हो रहे थे। अब महायशस्वी राजा नल विदर्भदेशकी ओर (बड़े वेगसे बढ़े) जा रहे थे
Karena telah menjadi tempat berlindung Kali, pohon bibhītaka pun disebut dengan celaan. Setelah itu Raja Nala, dengan hati yang kembali cerah, mulai lagi memacu kuda-kudanya; kuda-kuda unggul itu tampak melompat berulang kali laksana burung yang mengepak hendak terbang. Demikianlah Nala yang termasyhur melesat cepat menuju negeri Vidarbha.
Verse 42
नल: संचोदयामास प्रहृष्टेनान्तरात्मना । विदर्भाभिमुखो राजा प्रययौ स महायशा:,कलियुगके आश्रय लेनेसे बहेड़ेका वृक्ष निन्दित हो गया। तदनन्तर राजा नलने प्रसन्नचित्तसे पुनः घोड़ोंको हाँकना आरम्भ किया। वे उत्तम अश्व पक्षियोंकी तरह बार-बार उड़ते हुए-से प्रतीत हो रहे थे। अब महायशस्वी राजा नल विदर्भदेशकी ओर (बड़े वेगसे बढ़े) जा रहे थे
Dengan batin yang berseri oleh kegembiraan, Nala kembali mendorong kuda-kudanya. Raja yang termasyhur itu berangkat menghadap ke arah Vidarbha, melaju di jalan dengan semangat yang pulih.
Verse 43
नले तु समतिक्रान्ते कलिरप्यगमद् गृहम् । ततो गतज्वरो राजा नलो<भूत् पृथिवीपति: । विमुक्त: कलिना राजन् रूपमात्रवियोजित:,नलके चले जानेपर कलि अपने घर चले गये। राजन्! कलिसे मुक्त हो भूमिपाल राजा नल सारी चिन्ताओंसे छुटकारा पा गये; किंतु अभीतक उन्हें अपना पहला रूप नहीं प्राप्त हुआ था। उनमें केवल इतनी ही कमी रह गयी थी
Ketika Nala telah melampaui keadaan itu, Kali pun pergi kembali ke kediamannya. Maka Raja Nala, terbebas dari demam yang membakar, kembali menjadi penguasa bumi. Wahai raja, lepas dari cengkeraman Kali, ia hanya masih terpisah dari rupa lamanya—itulah satu-satunya kekurangan yang tersisa.
Verse 71
इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें ऋतुपर्णका विदर्भदिशमें गमनविषयक इकहतत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab ketujuh puluh satu dalam kisah Nala di dalam Vana Parva Mahābhārata, yang mengisahkan perjalanan Raja Ṛtūparṇa menuju negeri Vidarbha.
Verse 72
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि नलोपाख्यानपर्वणि कलिनिर्गमे द्विसप्ततितमो< ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत नलोपाख्यानपर्वमें कलियुगनिर्गगनविषयक बहत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, dalam bagian Kisah Nala, berakhirlah bab ketujuh puluh dua yang mengisahkan mundurnya (kepergian) Kali.
Verse 131
प्रचिनुह्मास्य शाखे द्वे याश्चाप्यन्या: प्रशाखिका: । आशभ्यां फलसहसे द्वे पज्चोनं शतमेव च
Bṛhadaśva berkata: “Mari kita kumpulkan dua dahan utamanya, dan juga cabang-cabang kecil lainnya. Dari dua dahan ini, kita berharap memperoleh dua ribu ikatan buah, dan juga seratus kurang lima.”
The dilemma is how to balance truth, privacy, and safety when identity is concealed: Damayantī seeks certainty without rash accusation, while Nala (as Bāhuka) navigates truthful speech without self-exposure.
The passage foregrounds endurance and self-governance: exemplary persons restrain reactive anger in hardship, preserve integrity, and respond to suffering with disciplined speech rather than escalation.
No explicit phalaśruti appears here; the meta-function is evidentiary and pedagogical—showing how inner truth surfaces through controlled dialogue and involuntary affect within the epic’s ethical case-study format.