
Mātali’s Arrival and Arjuna’s Ascent toward Amarāvatī (मातलिसंयुक्तरथागमनम् तथा इन्द्रलोकगमनारम्भः)
Upa-parva: Arjunābhigamana / Indralokārohaṇa Episode (Arjuna’s summons to Indra and ascent toward Amarāvatī)
Vaiśaṃpāyana describes the arrival of Indra’s chariot after the lokapālas depart. The ratha appears with storm-like sound and a display of divine armaments and ominous brilliance, signaling celestial authority. Arjuna recognizes the presence of a divine emissary; Mātali approaches with respectful address and conveys Indra’s invitation, stating that devas, ṛṣis, gandharvas, and apsarases await the sight of Kuntī’s son. Mātali promises Arjuna will return after receiving weapons (labdhāstraḥ). Arjuna responds with reverent restraint, noting the chariot’s inaccessibility to ordinary rulers and even ritual patrons without tapas, and instructs Mātali to mount first. After Mātali takes the reins, Arjuna performs purification in the Gaṅgā, recites prescribed japa, and satisfies the ancestors according to rule. He then bids farewell to Mount Mandara, praising it as a refuge for dharma-minded ascetics and aspirants to svarga, and acknowledging its tīrthas and natural sanctities. Arjuna mounts the divine chariot, ascends beyond mortal sight, witnesses countless vimānas and self-luminous realms where neither sun nor moon is needed, observes star-like abodes of the meritorious, and encounters assemblies of siddhas, fallen heroes, gandharvas, guhyakas, ṛṣis, and apsarases. Mātali explains these as sukṛtins established in their own radiant stations. The chapter culminates with the sight of Airāvata at the gate and Arjuna’s approach to Indra’s Amarāvatī, marking the threshold of celestial initiation.
Chapter Arc: वैशम्पायन अर्जुन को दिव्य लोक में ले जाते हैं—वह सिद्ध-चारणों से सुशोभित, रम्य अमरपुरी को प्रत्यक्ष देखता है, जहाँ वायु तक पुण्यगन्ध से भरा है। → अर्जुन नन्दनवन, सुगन्धित पुष्पों, देवविमानों की सहस्र पंक्तियों और ‘सुरवीथी’ (नक्षत्रमार्ग) की विराट व्यवस्था को देखता हुआ इन्द्राज्ञा से आगे बढ़ता है—हर ओर स्तुति, आशीर्वाद और दिव्य अनुशासन का दबदबा बढ़ता जाता है। → इन्द्रसभा के निकट दिव्य संगीत का उत्कर्ष—तुम्बुरु आदि गन्धर्व सामगान गाते हैं और सहस्रों अप्सराएँ (घृताची, मेनका, रम्भा, उर्वशी आदि) मनोहर नृत्य से सभा-परिसर को आलोकित कर देती हैं; अर्जुन के लिए यह देवलोक की पूर्णता का साक्षात्कार बनता है। → अर्जुन का इन्द्रलोक में स्वागत-पर्यटन पूर्ण रूप से स्थापित हो जाता है—सभा का वैभव, कला, गन्ध, गति और देव-व्यवस्था उसके सामने स्पष्ट हो जाती है। → इन्द्रसभा का दर्शन तो हो गया—अब इन्द्र से प्रत्यक्ष संवाद, उद्देश्य (दिव्यास्त्र-प्राप्ति/कार्यादेश) और आगे की परीक्षा का संकेत अगले अध्यायों पर टिका रहता है।
Verse 1
हि >> मय न (0) है 7 त्रिचत्वारिशो< ध्याय: अर्जुनद्वारा देवराज इन्द्रका दर्शन तथा इन्द्रसभामें उनका स्वागत वैशम्पायन उवाच ददर्श स पुरी रम्यां सिद्धचारणसेविताम् । सर्वर्तुकुसुमै: पुण्य: पादपैरुपशोभिताम्,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! अर्जुनने सिद्धों और चारणोंसे सेवित उस रम्य अमरावतीपुरीको देखा, जो सभी ऋतुओंके कुसुमोंसे विभूषित पुण्यमय वृक्षोंसे सुशोभित थी
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja! Arjuna melihat kota yang elok itu—Amarāvatī—yang dilayani para Siddha dan Cāraṇa, serta dihiasi pepohonan suci yang berbunga pada segala musim.”
Verse 2
तत्र सौगन्धिकानां च पुष्पाणां पुण्यगन्धिनाम् । उद्वीज्यमानो मिश्रेण वायुना पुण्यगन्धिना,वहाँ सुगन्धयुक्त कमल तथा पवित्र गन्धवाले अन्य पुष्पोंकी पवित्र गन्धसे मिली हुई वायु मानो व्यजन डुला रही थी
Di sana, keharuman suci dari teratai saugandhika dan bunga-bunga lain yang semerbak memenuhi tempat itu; angin yang bercampur wewangian murni itu berembus lembut, seakan mengibaskan cāmara (kipas upacara).
Verse 3
ननन््दनं च वन दिव्यमप्सरोगणसेवितम् । ददर्श दिव्यकुसुमैराद्दयद्धिरिव द्रुमै:,अप्सराओंसे सेवित दिव्य नन्दनवनका भी उन्होंने दर्शन किया, जो दिव्य पुष्पोंसे भरे हुए वृक्षोंद्वारा मानो उन्हें अपने पास बुला रहा था
Ia pun melihat hutan surgawi Nandana, yang ramai dikunjungi para Apsaras; pepohonannya sarat bunga-bunga ilahi, seakan memanggilnya untuk mendekat.
Verse 4
नातप्ततपसा शकयो द्रष्टं नानाहिताग्निना । स लोक कक गं नापि युद्धे पराड्मुखै:,जिन्होंने तपस्या नहीं की है, जो अग्निहोत्रसे दूर रहे हैं तथा जिन्होंने युद्धमें पीठ दिखा दी है, वैसे लोग पुण्यात्माओंके उस लोकका दर्शन भी नहीं कर सकते
Alam mulia itu tidak dapat disaksikan oleh orang yang tidak menempuh tapa, tidak memelihara āhitāgni (api suci), dan juga tidak oleh mereka yang berpaling lari dalam peperangan.
Verse 5
नायज्वभिनवत्रितिकैर्न वेदश्रुतिवर्जिति: । नानाप्लुताज्ैस्तीर्थेषु यज्ञदानबहिष्कृतै:,जिन्होंने यज्ञ नहीं किया है, व्रतका पालन नहीं किया है, जो वेद और श्रुतियोंके स्वाध्यायसे दूर रहे हैं, जिन्होंने तीर्थोंमें स्नान नहीं किया है तथा जो यज्ञ और दान आदि सत्कर्मोसे वंचित रहे हैं, ऐसे लोगोंको भी उस पुण्यलोकका दर्शन नहीं हो सकता
Waiśampāyana berkata: Mereka yang tidak melaksanakan yajña, tidak menunaikan tapa-brata, menjauh dari swādhyāya Weda dan śruti, tidak mandi di tīrtha, serta tersisih dari perbuatan bajik seperti yajña dan dāna—orang-orang demikian pun tidak akan memperoleh penglihatan atas loka yang suci itu.
Verse 6
नापि यज्ञहनै: क्षुद्रेर्दर्टं शक्य: कथंचन । पानपैर्गुरुतल्पैश्व मांसादैर्वा दुरात्मभि:,जो यज्ञोंमें विघ्म डालनेवाले नीच, शराबी, गुरुपत्नीगामी, मांसाहारी तथा दुरात्मा हैं, वे तो किसी भी प्रकार उस दिव्य लोकका दर्शन नहीं पा सकते
Waiśampāyana berkata: Orang-orang picik yang menghalangi yajña—pemabuk, pelanggar ranjang guru (gurutaḷpagāmī), pemakan daging, dan jiwa-jiwa durjana lainnya—sama sekali tidak dapat memperoleh penglihatan atas loka ilahi itu.
Verse 7
स तद् दिव्यं वनं पश्यन् दिव्यगीतनिनादितम् । प्रविवेश महाबाहु: शक्रस्य दयितां पुरीम्,जहाँ सब ओर दिव्य संगीत गूँज रहा था, उस दिव्य वनका दर्शन करते हुए महाबाहु अर्जुनने देवराज इन्द्रकी प्रिय नगरी अमरावतीमें प्रवेश किया
Waiśampāyana berkata: Sambil memandang hutan surgawi yang bergema oleh nyanyian ilahi itu, Arjuna yang berlengan perkasa memasuki Amarāvatī, kota kesayangan Śakra (Indra).
Verse 8
तत्र देवविमानानि कामगानि सहस्रशः । संस्थितान्यभियातानि ददर्शायुतशस्तदा,वहाँ स्वेच्छानुसार गमन करनेवाले देवताओंके सहस्रों विमान स्थिरभावसे खड़े थे और हजारों इधर-उधर आते-जाते थे। उन सबको पाण्डुनन्दन अर्जुनने देखा। उस समय गन्धर्व और अप्सराएँ उनकी स्तुति कर रही थीं। फ़ूलोंकी सुगन्धका भार वहन करनेवाली पवित्र मन्द-मन्द वायु मानो उनके लिये चँवर डुला रही थी
Di sana ia melihat ribuan demi ribuan vimāna para dewa yang bergerak sekehendak hati—sebagian tegak diam, sebagian lain melesat ke sana kemari dalam arus yang tak terbilang. Arjuna putra Pāṇḍu menyaksikan semuanya. Saat itu para Gandharva dan Apsaras melantunkan pujian baginya, dan angin yang suci, lembut—sarat beban harum bunga—seakan mengipasi dirinya laksana cāmara upacara.
Verse 9
संस्तूयमानो गन्धर्वैरप्सरोभिश्नल पाण्डव: | पुष्पगन्धवहै: पुण्यैर्वायुभिश्चवानुवीजित:,वहाँ स्वेच्छानुसार गमन करनेवाले देवताओंके सहस्रों विमान स्थिरभावसे खड़े थे और हजारों इधर-उधर आते-जाते थे। उन सबको पाण्डुनन्दन अर्जुनने देखा। उस समय गन्धर्व और अप्सराएँ उनकी स्तुति कर रही थीं। फ़ूलोंकी सुगन्धका भार वहन करनेवाली पवित्र मन्द-मन्द वायु मानो उनके लिये चँवर डुला रही थी
Waiśampāyana berkata: Sang Pāṇḍava (Arjuna) dipuji oleh para Gandharva dan Apsaras, sementara angin yang suci dan lembut—membawa harum bunga—seakan mengipasinya laksana cāmara. Demikianlah, di alam surgawi itu, ia disambut dengan kemuliaan yang selaras dengan tapa dan jasanya.
Verse 10
ततो देवा: सगन्धर्वा: सिद्धाश्न परमर्षय: | हृष्टा: सम्पूजयामासु: पार्थमक्लिष्टकारिणम्,तदनन्तर देवताओं, गन्धर्वों, सिद्धों और महर्षियोंने अत्यन्त प्रसन्न होकर अनायास ही महान् कर्म करनेवाले कुन्तीकुमार अर्जुनका स्वागत-सत्कार किया
Kemudian para dewa—bersama para Gandharwa, Siddha, dan resi agung—dengan hati bersukacita menghormati serta menyambut Pārtha (Arjuna), pelaku karya besar yang meraih tujuannya tanpa susah payah.
Verse 11
आशीवदि: स्तूयमानो दिव्यवादित्रनि:स्वनै: । प्रतिपेदे महाबाहुः शड्ःखदुन्दुभिनादितम्,कहीं उन्हें आशीर्वाद मिलता और कहीं स्तुति-प्रशंसा प्राप्त होती थी। स्थान-स्थानपर दिव्य वाद्योकी मधुर ध्वनिसे उनका स्वागत हो रहा था। इस प्रकार महाबाहु अर्जुन शंख और दुन्दुभियोंके गम्भीर नादसे गूँजते हुए 'सुरवीथी” नामसे प्रसिद्ध विस्तृत नक्षत्र-मार्गपर चलने लगे। इन्द्रकी आज्ञासे कुन्तीकुमारका सब ओर स्तवन हो रहा था और इस प्रकार वे गन्तव्य मार्गपर बढ़ते चले जा रहे थे
Di satu tempat ia menerima berkat, di tempat lain pujian; di mana-mana ia disambut oleh merdunya bunyi alat musik surgawi. Demikianlah Arjuna yang berlengan perkasa melangkah maju di jalan yang bergema oleh dentang sangkakala dan genderang besar.
Verse 12
नक्षत्रमार्ग विपुलं सुरवीथीति विश्रुतम् इन्द्राज्ञया ययौ पार्थ: स्तूयमान: समन्ततः,कहीं उन्हें आशीर्वाद मिलता और कहीं स्तुति-प्रशंसा प्राप्त होती थी। स्थान-स्थानपर दिव्य वाद्योकी मधुर ध्वनिसे उनका स्वागत हो रहा था। इस प्रकार महाबाहु अर्जुन शंख और दुन्दुभियोंके गम्भीर नादसे गूँजते हुए 'सुरवीथी” नामसे प्रसिद्ध विस्तृत नक्षत्र-मार्गपर चलने लगे। इन्द्रकी आज्ञासे कुन्तीकुमारका सब ओर स्तवन हो रहा था और इस प्रकार वे गन्तव्य मार्गपर बढ़ते चले जा रहे थे
Atas perintah Indra, Pārtha (Arjuna) menempuh jalur bintang yang luas, termasyhur sebagai “Suravīthī”; ia melaju sambil dipuji dari segala penjuru.
Verse 13
तत्र साध्यास्तथा विश्वे मरुतो5थाश्विनौ तथा । आदित्या वसवो रुद्रास्तथा ब्रह्मर्षपोडमला:,वहाँ साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, आदित्य, वसु, रुद्र तथा विशुद्ध ब्रह्मर्षिणण और अनेक राजर्षिगण एवं दिलीप आदि बहुत-से राजा, तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू आदि गन्धर्वगण विराजमान थे
Di sana hadir para Sādhya dan Viśvedewa, juga para Marut serta kedua Aśvin. Para Āditya, Vasu, dan Rudra pun berkumpul, bersama para Brahmarṣi yang suci tanpa noda.
Verse 14
राजर्षयश्व बहवो दिलीपप्रमुखा नृपा: । तुम्बुरुनरिदश्चैव गन्धर्वो च हहाहुहू:,वहाँ साध्य, विश्वेदेव, मरुद्गण, अश्विनीकुमार, आदित्य, वसु, रुद्र तथा विशुद्ध ब्रह्मर्षिणण और अनेक राजर्षिगण एवं दिलीप आदि बहुत-से राजा, तुम्बुरु, नारद, हाहा, हूहू आदि गन्धर्वगण विराजमान थे
Di sana hadir banyak raja-ṛṣi dan banyak raja yang dipimpin Dilīpa; Tumburu dan Nārada pun ada, demikian pula para Gandharwa Hahā dan Huhū.
Verse 15
तान् स सर्वान् समागम्य विधिवत् कुरुनन्दन: । ततो<पश्यद् देवराजं शतक्रतुमरिंदम:,शत्रुओंका दमन करनेवाले कुरुनन्दन अर्जुनने उन सबसे विधिपूर्वक मिलकर अन्तमें सौ यज्ञोंका अनुष्ठान करनेवाले देवराज इन्द्रका दर्शन किया
Setelah menemui mereka semua menurut tata yang semestinya, Arjuna—kebanggaan Kuru, penakluk musuh—akhirnya memandang Indra, raja para dewa, termasyhur sebagai pelaksana seratus yajña.
Verse 16
ततः पार्थों महाबाहुरवतीर्य रथोत्तमात् । ददर्श साक्षाद् देवेशं पितरं पाकशासनम्,उन्हें देखते ही महाबाहु पार्थ उस उत्तम रथसे उतर पड़े और देवेश्वर पिता पाकशासन (इन्द्र)-को उन्होंने प्रत्यक्ष देखा
Begitu melihatnya, Pārtha yang berlengan perkasa turun dari kereta unggul itu. Di hadapan matanya sendiri ia menyaksikan sang penguasa para dewa—ayahnya, Pākaśāsana (Indra).
Verse 17
पाण्डुरेणातपत्रेण हेमदण्डेन चारुणा । दिव्यगन्धाधिवासेन व्यजनेन विधूयता,उनके मस्तकपर श्वेत छत्र तना हुआ था, जिसमें मनोहर स्वर्णमय दण्ड शोभा पा रहा था। उनके उभय पार्श्वमें दिव्य सुगन्धसे वासित चँवर डुलाये जा रहे थे
Di atas kepalanya terangkat payung kerajaan berwarna putih, berhias gagang emas yang elok; dan di kedua sisinya ia dikipasi dengan cāmara (kipas ekor yak) yang diharumkan wewangian surgawi.
Verse 18
विश्वावसुप्र भृतिभिरर्गन्धर्वे: स्तुतिवन्दनै: । स्तूयमान द्विजाग्रयैश्न ऋग्यजु:सामसम्भवै:,विश्वावसु आदि गन्धर्व स्तुति और वन्दनापूर्वक उनके गुण गाते थे। श्रेष्ठ ब्रह्मर्षिगण ऋग्वेद, यजुर्वेद और सामवेदके इन्द्रदेवतासम्बन्धी मन्त्रोंद्रारा उनका स्तवन कर रहे थे
Ia dipuji oleh para Gandharva yang dipimpin Viśvāvasu dengan kidung sanjungan dan penghormatan. Bersamaan dengan itu, para brahmana-sage terkemuka melantunkannya dengan mantra-mantra Weda dari tradisi Ṛg, Yajus, dan Sāman.
Verse 19
ततो5भिगम्य कौन्तेय: शिरसाभ्यगमद् बली । स चैन वृत्तपीनाभ्यां बाहुशभ्यां प्रत्यगृह्नत,तदनन्तर बलवान कुन्तीकुमारने निकट जाकर देवेन्द्रके चरणोंमें मस्तक रख दिया और उन्होंने अपनी गोल-गोल मोटी भुजाओंसे उठाकर अर्जुनको हृदयसे लगा लिया
Kemudian putra Kuntī yang perkasa mendekat dan menundukkan kepala dengan hormat di kaki Indra. Indra pun, dengan lengan yang bulat dan kuat, mengangkat Arjuna dan mendekapnya ke dada.
Verse 20
ततः शक्रासने पुण्ये देवर्षिगणसेविते । शक्र: पाणौ गृहीत्वैनमुपावेशयदन्तिके,तत्पश्चात् इन्द्रने अर्जुनका हाथ पकड़कर अपने देवर्षिगणसेवित पवित्र सिंहासनपर उन्हें पास ही बिठा लिया
Kemudian, di singgasana suci Śakra yang dimuliakan dan dihadiri rombongan resi ilahi, Śakra (Indra) menggenggam tangan Arjuna dan mendudukkannya dekat di sisinya.
Verse 21
मूर्थ्नि चैनमुपाप्राय देवेन्द्र: परवीरहा । अड्कमारोपयामास प्रश्रयावनतं तदा,तब शत्रुवीरोंका संहार करनेवाले देवराजने विनीतभावसे आये हुए अर्जुनका मस्तक सूँघा और उन्हें अपनी गोदमें बिठा लिया
Saat itu Devendra, pembunuh para pahlawan musuh, mencium kepala Arjuna sebagai tanda kasih dan perkenan; melihatnya menunduk penuh hormat, ia mengangkatnya dan mendudukkannya di pangkuannya.
Verse 22
सहस्राक्षनियोगात् स पार्थ: शक्रासनं गत: । अध्यक्रामदमेयात्मा द्वितीय इव वासव:,उस समय सहसनेत्रधारी देवेन्द्रके आदेशसे उनके सिंहासनपर बैठे हुए अपरिमित प्रभावशाली कुन्तीकुमार दूसरे इन्द्रकी भाँति शोभा पा रहे थे
Atas titah Indra yang bermata seribu, putra Pṛthā itu menaiki dan duduk di singgasana Śakra; berjiwa tak terukur, ia bersinar laksana Vāsava kedua.
Verse 23
ततः प्रेम्णा वृत्रशत्रुरर्जुनस्य शुभं मुखम् | पस्पर्श पुण्यगन्धेन करेण परिसान्त्वयन्,इसके बाद वृत्रासुरके शत्रु इन्द्रने पवित्र गन्धयुक्त हाथसे बड़े प्रेमके साथ अर्जुनको सब प्रकारसे आश्वासन देते हुए उनके सुन्दर मुखका स्पर्श किया
Kemudian Indra, penakluk Vṛtra, menyentuh wajah mulia Arjuna dengan penuh kasih menggunakan tangannya yang harum oleh wewangian suci, seraya menenangkannya dalam segala hal.
Verse 24
प्रमार्जमान: शनकैर्बाहू चास्यायतौ शुभौ । ज्याशरक्षेपकठिनौ स्तम्भाविव हिरणमयौ,अर्जुनकी सुन्दर विशाल भुजाएँ प्रत्यंचा खींचकर बाण चलानेकी रगड़से कठोर हो गयी थीं। वे देखनेमें सोनेके खंभे-जैसी जान पड़ती थीं। देवराज उन भुजाओंपर धीरे-धीरे हाथ फेरने लगे
Lalu, sambil mengusap perlahan, sang raja para dewa membelai kedua lengan Arjuna yang panjang dan mulia—mengeras oleh tarikan tali busur dan lontaran anak panah—hingga tampak bagaikan pilar-pilar emas.
Verse 25
वज्जग्रहणचिह्लेन करेण परिसान्त्वयन् । मुहुर्मुहुर्वज़धरो बाहू चास्फोटयच्छनै:,वज्रधारी इन्द्र वज्रधारणजनित चिह्से सुशोभित दाहिने हाथसे अर्जुनको बार-बार सान्त्वना देते हुए उनकी भुजाओंको धीरे-धीरे थपथपाने लगे
Waiśampāyana berkata: Dengan tangan kanannya yang bertanda bekas memegang vajra, Indra sang pemegang petir berulang kali menenteramkan Arjuna; perlahan ia menepuk dan menekan lengan Arjuna dengan lembut, menanamkan ketenangan dan keyakinan di saat yang menegangkan itu.
Verse 26
स्मयन्निव गुडाकेशं प्रेक्षमाण: सहस्रदूक् । हर्षेणोत्फुल्लनयनो न चातृप्यत वृत्रहा,सहसख््र नयनोंसे सुशोभित वृत्रसूदन इन्द्र निद्राविजयी अर्जुनको मुसकराते हुए-से देख रहे थे। उस समय इन्द्रकी आँखें हर्षसे खिल उठी थीं। वे उन्हें देखनेसे तृप्त नहीं होते थे
Indra sang pembunuh Vṛtra, yang bermata seribu, memandang Gudākeśa Arjuna seakan-akan sambil tersenyum. Matanya merekah oleh sukacita; ia tak pernah merasa puas memandangnya.
Verse 27
एकासनोपविष्टो तौ शोभयांचक्रतु: सभाम् | सूर्याचन्द्रमसौ व्योम चतुर्दश्यामिवोदितौ,जैसे कृष्णपक्षकी चतुर्दशीको उदित हुए सूर्य और चन्द्रमा आकाशकी शोभा बढ़ाते हैं, उसी प्रकार एक सिंहासनपर बैठे हुए देवराज इन्द्र और कुन्तीकुमार अर्जुन देवसलभाको सुशोभित कर रहे थे
Waiśampāyana berkata: Duduk bersama di satu singgasana, Indra raja para dewa dan Arjuna putra Kuntī membuat balairung para dewa kian cemerlang—laksana matahari dan bulan yang terbit bersama pada hari keempat belas paruh gelap, menghiasi langit.
Verse 28
तत्र सम गाथा गायन्ति साम्ना परमवल्गुना । गन्धर्वस्तुम्बुरुश्रेष्ठा: कुशला गीतसामसु,उस समय वहाँ सामगानमें निपुण तुम्बुरु आदि श्रेष्ठ गन्धर्वगण सामगानके नियमानुसार अत्यन्त मधुर स्वरमें गाथागान करने लगे
Di sana para Gandharwa—dengan Tumburu sebagai yang terkemuka—yang mahir dalam nyanyian dan lantunan Sāman, mulai menyanyikan gāthā dengan suara amat merdu, tepat menurut tata cara Sāmagāna.
Verse 29
घृताची मेनका रम्भा पूर्वचित्ति: स्वयंप्रभा । उर्वशी मिश्रकेशी च दण्डगौरी वरूथिनी,घृताची, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति, स्वयंप्रभा, उर्वशी, मिश्रकेशी, दण्डगौरी, वरूथिनी, गोपाली, सहजन्या, कुम्भयोनि, प्रजागरा, चित्रसेना, चित्रलेखा, सहा और मधुरस्वरा--ये तथा और भी सहसीरों अप्सराएँ वहाँ इन्द्रसभामें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर नृत्य करने लगीं। वे कमललोचना अप्सराएँ सिद्ध पुरुषोंके भी चित्तको प्रसन्न करनेमें संलग्न थीं। उनके कटि- प्रदेश और नितम्ब विशाल थे। नृत्य करते समय उनके उन्नत स्तन कम्पमान हो रहे थे। उनके कटाक्ष, हाव-भाव तथा माधुर्य आदि मन, बुद्धि एवं चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अपहरण कर लेते थे
Waiśampāyana berkata: Ghṛtācī, Menakā, Rambhā, Pūrvacitti, Svayaṃprabhā, Urvaśī, Miśrakeśī, Daṇḍagaurī, dan Varūthinī—apsaras-apsaras termasyhur itu hadir di balairung Indra, memperindahnya dengan keelokan dan seni tari mereka.
Verse 30
गोपाली सहजन्या च कुम्भयोनि: प्रजागरा । चित्रसेना चित्रलेखा सहा च मधुरस्वरा,घृताची, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति, स्वयंप्रभा, उर्वशी, मिश्रकेशी, दण्डगौरी, वरूथिनी, गोपाली, सहजन्या, कुम्भयोनि, प्रजागरा, चित्रसेना, चित्रलेखा, सहा और मधुरस्वरा--ये तथा और भी सहसीरों अप्सराएँ वहाँ इन्द्रसभामें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर नृत्य करने लगीं। वे कमललोचना अप्सराएँ सिद्ध पुरुषोंके भी चित्तको प्रसन्न करनेमें संलग्न थीं। उनके कटि- प्रदेश और नितम्ब विशाल थे। नृत्य करते समय उनके उन्नत स्तन कम्पमान हो रहे थे। उनके कटाक्ष, हाव-भाव तथा माधुर्य आदि मन, बुद्धि एवं चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अपहरण कर लेते थे
Waiśampāyana berkata: Gopālī, Sahajanyā, Kumbhayoni, Prajāgarā, Citrasenā, Citralekhā, Sahā, dan Madhurasvarā—bersama Ghṛtācī, Menakā, Rambhā, Pūrvacitti, Svayaṃprabhā, Urvaśī, Miśrakeśī, Daṇḍagaurī, Varūthinī, serta ribuan apsaras lainnya—mulai menari di berbagai tempat di balairung Indra. Para bidadari bermata laksana teratai itu berhasrat menggembirakan bahkan batin para Siddha. Pinggang dan pinggul mereka lebar; ketika menari, dada mereka yang terangkat bergetar. Lirikan mata, gerak yang anggun, dan kemanisan mereka seakan merampas seluruh daya gerak pikiran, budi, dan hati.
Verse 31
एताश्षान्याश्व ननृतुस्तत्र तत्र सहस्रश: । चित्तप्रसादने युक्ता: सिद्धानां पच्मलोचना:,घृताची, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति, स्वयंप्रभा, उर्वशी, मिश्रकेशी, दण्डगौरी, वरूथिनी, गोपाली, सहजन्या, कुम्भयोनि, प्रजागरा, चित्रसेना, चित्रलेखा, सहा और मधुरस्वरा--ये तथा और भी सहसीरों अप्सराएँ वहाँ इन्द्रसभामें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर नृत्य करने लगीं। वे कमललोचना अप्सराएँ सिद्ध पुरुषोंके भी चित्तको प्रसन्न करनेमें संलग्न थीं। उनके कटि- प्रदेश और नितम्ब विशाल थे। नृत्य करते समय उनके उन्नत स्तन कम्पमान हो रहे थे। उनके कटाक्ष, हाव-भाव तथा माधुर्य आदि मन, बुद्धि एवं चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अपहरण कर लेते थे
Waiśampāyana berkata: Di sana, mereka ini dan tak terhitung apsaras lainnya menari di sana-sini, beribu-ribu jumlahnya. Bermata laksana teratai, mereka bertekad menyenangkan batin para Siddha, dan dengan tari, nyanyian, serta pesona mereka memikat para dewa yang berkumpul.
Verse 32
महाकटितटश्रोण्य: कम्पमानै: पयोधरै: । कटाक्षहावमारधुर्यैश्वेतोबुद्धिमनोहरै:,घृताची, मेनका, रम्भा, पूर्वचित्ति, स्वयंप्रभा, उर्वशी, मिश्रकेशी, दण्डगौरी, वरूथिनी, गोपाली, सहजन्या, कुम्भयोनि, प्रजागरा, चित्रसेना, चित्रलेखा, सहा और मधुरस्वरा--ये तथा और भी सहसीरों अप्सराएँ वहाँ इन्द्रसभामें भिन्न-भिन्न स्थानोंपर नृत्य करने लगीं। वे कमललोचना अप्सराएँ सिद्ध पुरुषोंके भी चित्तको प्रसन्न करनेमें संलग्न थीं। उनके कटि- प्रदेश और नितम्ब विशाल थे। नृत्य करते समय उनके उन्नत स्तन कम्पमान हो रहे थे। उनके कटाक्ष, हाव-भाव तथा माधुर्य आदि मन, बुद्धि एवं चित्तकी सम्पूर्ण वृत्तियोंका अपहरण कर लेते थे
Waiśampāyana berkata: Berpinggang lebar dan berpinggul penuh, dengan dada terangkat yang bergetar saat menari, serta dengan lirikan, gerak yang memesona, dan kemanisan yang merampas pikiran, budi, dan hati—Ghṛtācī, Menakā, Rambhā, Pūrvacitti, Svayaṃprabhā, Urvaśī, Miśrakeśī, Daṇḍagaurī, Varūthinī, Gopālī, Sahajanyā, Kumbhayoni, Prajāgarā, Citrasenā, Citralekhā, Sahā, Madhurasvarā, dan ribuan apsaras lainnya mulai menari di berbagai tempat di balairung Indra. Bermata teratai, mereka bahkan menggembirakan batin para Siddha; melalui pandang dan gerak, mereka menawan seluruh daya batin para hadirin.
Verse 42
इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपवकि अन्तर्गत इन्द्रलोकाभिगमनपर्वमें बयालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab keempat puluh dua dari bagian Indralokābhigamana dalam Vana Parva, Mahābhārata yang agung.
Verse 43
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि इन्द्रलोकाभिगमनपर्वणि इन्द्रसभादर्शने त्रिचत्वारिंशो ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपरव्वके अन्तर्गत इन्रलोकाभिगमनपर्वमें इन्द्रसभादर्शनविषयक तैतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian, dalam Mahābhārata yang suci, pada Vana Parva—khususnya bagian Indralokābhigamana—berakhir bab keempat puluh tiga, yang mengisahkan penyaksian balairung Indra.
The implicit dilemma is sequencing power and piety: Arjuna must accept extraordinary martial empowerment while ensuring that ritual purity, humility, and prescribed obligations are not bypassed for expediency.
Authority and access are shown as merit-conditioned: divine resources are approached through discipline, respectful conduct, and correct rites, indicating that capability should be grounded in ethical qualification.
No explicit phalaśruti is stated here; the meta-function is narrative-ethical—linking celestial ascent to śauca, pitṛ-duty, and tapas—thereby situating later martial success within a dharmic framework.