Adhyaya 263
Vana ParvaAdhyaya 26335 Verses

Adhyaya 263

Jatāyu’s Resistance, Sītā’s Traces, Kabandha’s Release, and the Path to Sugrīva (Āraṇyaka-parva 263)

Upa-parva: Rāmopākhyāna (Markaṇḍeya’s Rāma Narrative) — Jatāyu Episode and Kabandha Counsel

Markaṇḍeya narrates how Jatāyu, friend of Daśaratha and brother of Sampāti, witnesses Sītā carried in Rāvaṇa’s grasp and confronts the rākṣasa-king, demanding her release. A violent engagement follows: Jatāyu wounds Rāvaṇa with talons and beak, but Rāvaṇa severs the bird’s wings/arms with a sword and ascends with Sītā. As she is borne away, Sītā drops ornaments as location-markers and releases a cloth that falls among five leading vānaras. Rāma returns after slaying the deceptive great deer, reproaches Lakṣmaṇa, and rushes back to the āśrama where they find Jatāyu mortally wounded. Jatāyu identifies himself, reports the abduction, and indicates Rāvaṇa’s southern course before dying; Rāma performs funerary honors. The brothers then proceed south through the Daṇḍaka forest, encounter the formidable Kabandha who seizes Lakṣmaṇa, and jointly disable him by severing his arms. Upon Kabandha’s death, a radiant being emerges—identified as the gandharva Viśvāvasu under a curse—who confirms Sītā’s abduction by Rāvaṇa of Laṅkā and instructs Rāma to seek Sugrīva near the Pampā lake by Ṛṣyamūka, promising that alliance will enable progress toward locating Jānakī. The being then disappears, leaving Rāma and Lakṣmaṇa in reflective astonishment.

Chapter Arc: जनमेजय पूछते हैं—वन में रहते हुए भी पाण्डवों की कीर्ति, व्यवस्था और अतिथि-सत्कार की चर्चा सुनकर दुर्योधन जैसे दुरात्मा लोग उनके प्रति कैसे- कैसे आचरण करने लगे? → वैशम्पायन बताते हैं कि पाण्डवों के ‘नगर में रहने जैसे’ सुचारु जीवन और द्रौपदी के अक्षय-अन्न से ब्राह्मणों के तृप्त होने की बात सुनकर दुर्योधन के मन में पाप-बुद्धि जागती है। वह अपने भाइयों सहित दुर्वासा मुनि का अत्यन्त आदर से आतिथ्य करता है, दिन-रात उनकी सेवा में लगा रहता है और अनुग्रह पाने का अवसर खोजता है। → दुर्योधन दुर्वासा से वर-सा अनुग्रह माँगता है—‘यदि आप मुझ पर प्रसन्न हों, तो मेरी प्रार्थना से आप पाण्डवों के आश्रम में ठीक उसी समय जाएँ जब द्रौपदी भोजन कर चुकी हो’, ताकि अतिथि-धर्म के संकट में पाण्डव अपमानित हों। → दुर्वासा, दुर्योधन के आतिथ्य से संतुष्ट होकर उसकी बात मानने की ओर प्रवृत्त होते हैं; योजना का बीज पड़ जाता है और पाण्डव-आश्रम की ओर जाने का प्रसंग बनता है। → दुर्वासा के साथ अनेक शिष्यों का दल पाण्डवों के आश्रम की ओर बढ़ने लगता है—अब द्रौपदी और पाण्डव अतिथि-धर्म की इस अग्नि-परीक्षा से कैसे बचेंगे?

Shlokas

Verse 1

हि आय >> () हि २ 7 > मुद्ल ऋषिको ही “मौद्वल्य” भी कहा है। (ट्रोपदीहरणपर्व) द्विषष्टयधिकद्धिशततमो< ध्याय: दुर्योधनका हें मधिडिरके पा इक आतिथ्यसत्कारसे संतुष्ट करके उन्हें पास भेजकर प्रसन्न होना जनमेजय उवाच वसत्स्वेवं वने तेषु पाण्डवेषु महात्मसु | रममाणेषु चित्राभि: कथाभिमुनिभि: सह,जनमेजयने पूछा--महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा-वार्ताद्वारा मनोरग्जन करते थे तथा जबतक द्रौपद्री भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये

Janamejaya berkata: “Wahai maharsi! Ketika para Pāṇḍava yang berhati luhur itu tinggal demikian di hutan, bersukacita bersama para resi melalui kisah-kisah yang beraneka dan menakjubkan—”

Verse 2

सूर्यदत्ताक्षयान्नेव कृष्णाया भोजनावधि । ब्राह्मणांस्तर्पमाणेषु ये चान्नार्थमुपागता:,जनमेजयने पूछा--महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा-वार्ताद्वारा मनोरग्जन करते थे तथा जबतक द्रौपद्री भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये

—dan sebelum Kṛṣṇā (Draupadī) makan, mereka mengenyangkan para brāhmaṇa yang datang memohon santapan dengan makanan dari bejana tak habis yang dianugerahkan Sang Surya; pada masa itu, bagaimana Duryodhana dan para putra Dhṛtarāṣṭra lainnya—yang bertindak menurut nasihat Duḥśāsana, Karṇa, dan Śakuni—memperlakukan para Pāṇḍava? Mohon ceritakan semuanya sesuai pertanyaanku.”

Verse 3

धार्तराष्ट्रा दुरात्मान: सर्वे दुर्योधनादय: । कथ॑ तेष्वन्ववर्तन्त पापाचारा महामुने,जनमेजयने पूछा--महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा-वार्ताद्वारा मनोरग्जन करते थे तथा जबतक द्रौपद्री भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये

Janamejaya berkata: “Wahai resi agung, bagaimana para putra Dhṛtarāṣṭra—Duryodhana dan yang lainnya, jiwa-jiwa durjana yang berperilaku dosa—bersikap terhadap para Pāṇḍava?”

Verse 4

दुःशासनस्य कर्णस्य शकुनेश्व मते स्थिता: । एतदाचक्ष्व भगवन्‌ वैशम्पायन पृच्छत:,जनमेजयने पूछा--महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा-वार्ताद्वारा मनोरग्जन करते थे तथा जबतक द्रौपद्री भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये

Janamejaya berkata: “Wahai Bhagavan Vaiśampāyana, ceritakanlah kepadaku—ketika para Pāṇḍava yang saleh tinggal di rimba, menghibur para resi dengan beragam kisah, dan menjamu brāhmaṇa yang datang dengan makanan dari bejana tak habis pemberian Surya hingga Draupadī selesai makan—bagaimanakah putra-putra Dhṛtarāṣṭra yang durjana, yang mengikuti nasihat Duḥśāsana, Karṇa, dan Śakuni, bersikap terhadap mereka?”

Verse 5

वैशम्पायन उवाच श्र॒ुत्वा तेषां तथा वृत्ति नगरे वसतामिव । दुर्योधनो महाराज तेषु पापमरोचयत्‌,वैशम्पायनजीने कहा--महाराज! जब दुर्योधनने सुना कि पाण्डवलोग तो वनमें भी उसी प्रकार दान-पुण्य करते हुए आनन्दसे रह रहे हैं, जैसे नगरके निवासी रहा करते हैं, तब उसने उनका अनिष्ट करनेका विचार किया

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, ketika Duryodhana mendengar bahwa para Pāṇḍava, meski tinggal di rimba, hidup tenteram bagaikan warga kota serta terus menegakkan dana dan kebajikan, maka pikirannya condong pada dosa terhadap mereka, menginginkan celaka bagi mereka.”

Verse 6

तथा तैर्निकृतिप्रज्जै: कर्णदुःशासनादिशभि: । नानोपायैरघं तेषु चिन्तयत्सु दुरात्मसु,इस प्रकार सोचकर छल-कपटकी विद्यामें निपुण कर्ण और दुःशासन आदिके साथ जब वे दुरात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र भाँति-भाँतिके उपायोंसे पाण्डवोंको संकटमें डालनेकी युक्तिका विचार कर रहे थे, उसी समय महायशस्वी धर्मात्मा तपस्वी महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्योंको साथ लिये हुए वहाँ स्वेच्छासे ही आ पहुँचे

Vaiśampāyana berkata: “Demikianlah, ketika orang-orang durjana itu—cerdik dalam tipu daya—bersama Karṇa, Duḥśāsana, dan yang lain, tengah merancang berbagai siasat untuk menimpakan malapetaka kepada para Pāṇḍava, pada saat itulah resi agung Durvāsā, pertapa yang masyhur dan teguh dalam dharma, datang dengan kehendaknya sendiri, disertai sepuluh ribu murid.”

Verse 7

अभ्यागच्छत्‌ स धर्मात्मा तपस्वी सुमहायशा: । शिष्यायुतसमोपेतो दुर्वासा नाम कामत:,इस प्रकार सोचकर छल-कपटकी विद्यामें निपुण कर्ण और दुःशासन आदिके साथ जब वे दुरात्मा धृतराष्ट्र-पुत्र भाँति-भाँतिके उपायोंसे पाण्डवोंको संकटमें डालनेकी युक्तिका विचार कर रहे थे, उसी समय महायशस्वी धर्मात्मा तपस्वी महर्षि दुर्वासा अपने दस हजार शिष्योंको साथ लिये हुए वहाँ स्वेच्छासे ही आ पहुँचे

Pada saat itu juga, sang pertapa agung yang teguh dalam dharma dan termasyhur—resi bernama Durvāsā—datang dengan kehendaknya sendiri, disertai sepuluh ribu murid.

Verse 8

तमागतमभिप्रेक्ष्य मुनिं परमकोपनम्‌ | दुर्योधनो विनीतात्मा प्रश्रयेण दमेन च

Melihat sang resi yang datang—bermurka amat dahsyat—Duryodhana menaklukkan dirinya, lalu mendekat dengan kerendahan hati serta pengendalian diri.

Verse 9

विधिवत्‌ पूजयामास स्वयं किड्करवत्‌ स्थित:

Ia sendiri menghormatinya menurut tata yang semestinya, berdiri laksana seorang pelayan.

Verse 10

तं च पर्यचरद्‌ राजा दिवारात्रमतन्द्रित:

Sang raja pun melayaninya siang dan malam tanpa lengah.

Verse 11

क्षुधितो5स्मि ददस्वान्नं शीघ्रं मम नराधिप,वे मुनि कभी कहते कि 'राजन्‌! मैं बहुत भूखा हूँ, मुझे शीघ्र भोजन दो” ऐसा कहकर वे स्नान करनेके लिये चले जाते और बहुत देरके बाद लौटते थे। लौटकर वे कह देते--'मैं नहीं खाऊँगा; आज मुझे भूख नहीं है” ऐसा कहकर अदृश्य हो जाते थे

Sang resi kadang berkata, “Wahai raja, aku lapar—segeralah berikan makanan kepadaku.” Namun setelah berkata demikian ia pergi seolah hendak mandi, kembali setelah lama, lalu berkata, “Aku tidak akan makan; hari ini aku tidak lapar,” dan sesudah itu lenyap dari pandangan.

Verse 12

इत्युक्त्वा गच्छति स्नातुं प्रत्यागच्छति वै चिरात्‌ । न भोक्ष्याम्यद्य मे नास्ति क्षुधेत्युक्त्वैत्यदर्शनम्‌,वे मुनि कभी कहते कि 'राजन्‌! मैं बहुत भूखा हूँ, मुझे शीघ्र भोजन दो” ऐसा कहकर वे स्नान करनेके लिये चले जाते और बहुत देरके बाद लौटते थे। लौटकर वे कह देते--'मैं नहीं खाऊँगा; आज मुझे भूख नहीं है” ऐसा कहकर अदृश्य हो जाते थे

Setelah berkata demikian ia pergi untuk mandi dan kembali setelah lama. Sepulangnya ia berkata, “Aku tidak akan makan; hari ini aku tidak lapar,” dan setelah mengucapkannya ia lenyap dari pandangan.

Verse 13

अकस्मादेत्य च ब्रूते भोजयास्मांस्त्वरान्वित: । कदाचिच्च निशीथे स उत्थाय निकृतौ स्थित:

Waisampayana berkata: “Tiba-tiba ia datang dan dengan tergesa berkata, ‘Segera beri kami santapan!’ Dan kadang-kadang, di tengah malam yang sunyi, ia bangkit dan berdiri siap untuk menipu.”

Verse 14

वर्तमाने तथा तस्मिन्‌ यदा दुर्योधनो नृप:,भारत! ऐसा उन्होंने कई बार किया, तो भी जब राजा दुर्योधनके मनमें विकार या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ, तब वे दुर्धर्ष मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले---मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ!

Waisampayana berkata: “Ketika segala sesuatu berlangsung demikian, wahai keturunan Bharata, Raja Duryodhana—meski berkali-kali dipancing—tidak membiarkan kegelisahan batin ataupun amarah timbul dalam dirinya. Maka resi yang sukar ditandingi itu sangat berkenan kepadanya dan berkata: ‘Aku hendak menganugerahkan kepadamu sebuah anugerah (boon).’”

Verse 15

विकृतिं नैति न क्रोधं तदा तुष्टो5भवन्मुनि: । आह चैन दुराधर्षो वरदो5स्मीति भारत,भारत! ऐसा उन्होंने कई बार किया, तो भी जब राजा दुर्योधनके मनमें विकार या क्रोध नहीं उत्पन्न हुआ, तब वे दुर्धर्ष मुनि उसपर बहुत प्रसन्न हुए और इस प्रकार बोले---मैं तुम्हें वर देना चाहता हूँ!

Ketika dalam dirinya tidak timbul kegelisahan batin maupun amarah, sang resi pun menjadi puas. Wahai Bharata, resi yang tak tertandingi itu berkata kepadanya: “Akulah pemberi anugerah.”

Verse 16

दुर्वाया उवाच वरं वरय भद्रं ते यत्‌ ते मनसि वर्तते । मयि प्रीते तु यद्‌ धर्म्य नालभ्यं विद्यते तव,दुर्वासा बोले--राजन! तुम्हारा कल्याण हो। तुम्हारे मनमें जो इच्छा हो, उसके लिये वर माँगो। मेरे प्रसन्न होनेपर जो धर्मानुकूल वस्तु होगी, वह तुम्हारे लिये अलभ्य नहीं रहेगी

Durvasa berkata: “Pilihlah sebuah anugerah—semoga kebaikan menyertaimu—apa pun hasrat yang ada di hatimu. Bila aku berkenan, maka tiada sesuatu yang selaras dengan dharma akan tetap tak terjangkau bagimu.”

Verse 17

वैशम्पायन उवाच एतच्छुत्वा वचस्तस्य महर्षेरभावितात्मन: | अमन्यत पुनर्जातमात्मानं स सुयोधन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शुद्ध अन्त:ः:करणवाले महर्षि दुर्वासाका यह वचन सुनकर दुर्योधनने मन-ही-मन ऐसा समझा, मानो उसका नया जन्म हुआ हो

Waisampayana berkata: “Wahai Janamejaya, mendengar kata-kata sang maharsi yang batinnya terdidik dan terkendali itu, Suyodhana merasa dalam dirinya seakan-akan ia terlahir kembali.”

Verse 18

प्रागेव मन्त्रितं चासीत्‌ कर्णदुःशासनादिभि: । याचनीयं मुनेस्तुष्टादिति निश्चित्य दुर्मति:

Jauh sebelumnya perkara itu telah dimusyawarahkan bersama Karṇa, Duḥśāsana, dan yang lain. Dengan pertimbangan yang sesat, Duryodhana menetapkan bahwa bila sang resi telah berkenan, maka patutlah dimohonkan anugerah darinya.

Verse 19

अतिहर्षान्वितो राजन्‌ वरमेनमयाचत । शिष्यै: सह मम ब्रह्म॒न्‌ यथा जातो5तिथिभर्भवान्‌

Wahai Raja, diliputi sukacita yang meluap, ia memohon anugerah ini kepadanya: “Wahai Brāhmaṇa, jadilah tamuku, bersama para muridmu, sebagaimana engkau telah datang.”

Verse 20

अस्मत्कुले महाराजो ज्येष्ठ: श्रेष्ठो युधिष्ठिर: । वने वसति धर्मात्मा भ्रातृभि: परिवारित:

“Dalam garis keturunan kami, raja yang tertua dan termulia adalah Yudhiṣṭhira. Sang berhati dharma itu kini tinggal di hutan, dikelilingi saudara-saudaranya.”

Verse 21

गुणवान्‌ शीलसम्पन्नस्तस्य त्वमतिथिर्भव । मुनि संतुष्ट हों, तो क्या माँगना चाहिये, इस बातके लिये कर्ण और दुःशासन आदिके साथ उसकी पहलेसे ही सलाह हो चुकी थी। राजन्‌! उसी निश्चयके अनुसार दु्बद्धि दुर्योधनने अत्यन्त प्रसन्न होकर यह वर माँगा--“ब्रह्मन्‌! हमारे कुलमें महाराज युधिष्छिर सबसे ज्येष्ठ और श्रेष्ठ हैं। इस समय वे धर्मात्मा पाण्डुकुमार अपने भाइयोंके साथ वनमें निवास करते हैं। युधिष्ठिर बड़े गुणवान्‌ और सुशील हैं। जिस प्रकार आप मेरे अतिथि हुए, उसी तरह शिष्योंके सहित आप उनके भी अतिथि होइये || १८--२० $ ।। यदा च राजपुत्री सा सुकुमारी यशस्विनी,तदा त्वं तत्र गच्छेथा यद्यनुग्राह्ता मयि । “यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो मेरी प्रार्थनासे आप वहाँ ऐसे समयमें जाइयेगा, जब परम सुन्दरी यशस्विनी सुकुमारी राजकुमारी द्रौपदी समस्त ब्राह्मणों तथा पाँचों पतियोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करनेके पश्चात्‌ सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर रही हो”

“Yudhiṣṭhira berbudi luhur dan berwatak mulia; jadilah tamunya. Dan ketika sang putri raja yang lembut lagi termasyhur itu (Draupadī)—jika engkau berkenan menganugerahi aku—maka pergilah ke sana pada saat itu, atas permohonanku.”

Verse 22

भोजयित्वा द्विजान्‌ सर्वान्‌ पतींश्व वरवर्णिनी । विश्रान्ता च स्वयं भुक्त्वा सुखासीना भवेद्‌ यदा

“Ketika wanita berparas elok itu telah menjamu semua brahmana dan juga para suaminya, lalu setelah ia sendiri makan dan beristirahat, duduk dengan tenteram—”

Verse 23

तथा करिष्ये त्वत्प्रीत्येत्येवमुक्त्वा सुयोधनम्‌,“तुमपर प्रेम होनेके कारण मैं वैसा ही करूँगा', दुर्योधनसे ऐसा कहकर विप्रवर दुर्वासा जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। उस समय दुर्योधनने अपने-आपको कृतार्थ माना

Waiśaṃpāyana berkata, “Karena kasihku kepadamu, aku akan melakukannya persis demikian.” Setelah berkata demikian kepada Suyodhana, brahmana utama Durvāsā pun pergi sebagaimana ia datang. Saat itu Duryodhana menganggap dirinya telah berhasil sepenuhnya—yakin maksudnya tercapai dan keuntungan besar diraih berkat restu sang resi.

Verse 24

दुर्वासा अपि विप्रेन्द्री यथागतमगात्‌ ततः । कृतार्थमपि चात्मानं तदा मेने सुयोधन:,“तुमपर प्रेम होनेके कारण मैं वैसा ही करूँगा', दुर्योधनसे ऐसा कहकर विप्रवर दुर्वासा जैसे आये थे, वैसे ही चले गये। उस समय दुर्योधनने अपने-आपको कृतार्थ माना

Kemudian brahmana utama Durvāsā pun pergi persis sebagaimana ia datang. Saat itu Suyodhana (Duryodhana) menganggap dirinya telah berhasil—merasa maksudnya terpenuhi.

Verse 25

करेण च कर गृह कर्णस्य मुदितो भृशम्‌ । कर्णोडपि भ्रातृसहितमित्युवाच नृपं मुदा,वह कर्णका हाथ अपने हाथमें लेकर अत्यन्त प्रसन्न हुआ। कर्णने भी भाइयोंसहित राजा दुर्योधनसे बड़े हर्षके साथ इस प्रकार कहा

Lalu ia menggenggam tangan Karṇa dengan tangannya sendiri dan menjadi amat gembira. Karṇa pun, bersama saudara-saudaranya, berkata kepada Raja Duryodhana dengan sukacita besar sebagai berikut.

Verse 26

कर्ण उवाच दिष्टया काम: सुसंवृत्तो दिष्टया कौरव वर्धसे । दिष्टया ते शत्रवो मग्ना दुस्तरे व्यसनार्णवे,कर्ण बोला--कुरुनन्दन! सौभाग्यसे हमारा काम बन गया। तुम्हारा अभ्युदय हो रहा है, यह भी भाग्यकी ही बात है। तुम्हारे शत्रु विपत्तिके अपार महासागरमें डूब गये, यह कितने सौभाग्यकी बात है?

Karna berkata, “Berkat keberuntungan, maksud kita telah terlaksana dengan sempurna. Berkat keberuntungan, wahai Kaurava, engkau kian berjaya. Dan berkat keberuntungan pula, musuh-musuhmu telah tenggelam ke samudra malapetaka yang tak terseberangi.”

Verse 27

दुर्वासःक्रो धजे वह्नौ पतिता: पाण्डुनन्दना: | स्वैरेव ते महापापैर्गता वै दुस्तरं तम:

Karna berkata, “Putra-putra Pāṇḍu telah jatuh ke dalam api yang lahir dari amarah Durvāsā. Karena kehendak mereka sendiri—oleh dosa besar perbuatan mereka—mereka benar-benar melangkah ke dalam kegelapan yang sukar diseberangi.”

Verse 28

पाण्डव दुर्वासाकी क्रोधाग्निमें गिर गये हैं और अपने ही महापापोंके कारण वे दुस्तर नरकमें जा पड़े हैं ।। वैशम्पायन उवाच इत्थं ते निकृतिप्रज्ञा राजन्‌ दुर्योधनादय: । हसन्तः प्रीतमनसो जग्मु: स्वं स्‍्व॑ं निकेतनम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! छल-कपटकी विद्यामें प्रवीण दुर्योधन आदि इस प्रकार बातें करते और हँसते हुए प्रसन्न मनसे अपने-अपने भवनोंमें गये

Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, demikianlah Duryodhana dan yang lain—yang pikirannya terlatih dalam tipu daya—bercakap di antara mereka. Sambil tertawa dan hati bersuka, masing-masing kembali ke kediamannya sendiri.”

Verse 86

सहितो भ्रातृभि: श्रीमानातिथ्येन न्यमन्त्रयत्‌ । परम क्रोधी दुर्वासा मुनिको आया देख भाइयों-सहित श्रीमान्‌ राजा दुर्योधनने अपनी इन्द्रियोंको काबूमें रखकर नम्रतापूर्वक विनीतभावसे उन्हें अतिथिसत्कारके रूपमें निमन्त्रित किया

Waiśampāyana berkata: Bersama saudara-saudaranya, Raja Duryodhana yang termasyhur mengundang resi Durvāsā—yang terkenal sangat pemarah—dengan penghormatan tamu yang semestinya. Menaklukkan indra-indranya, ia berbicara dengan rendah hati dan sopan santun.

Verse 96

अहानि कतिचित्‌ तत्र तस्थौ स मुनिसत्तम: | दुर्योधनने स्वयं दासकी भाँति उनकी सेवामें खड़े रहकर विधिपूर्वक उनकी पूजा की। मुनिश्रेष्ठ दुर्वासा कई दिनोंतक वहाँ ठहरे रहे

Waiśampāyana berkata: Sang resi termulia tinggal di sana beberapa hari. Duryodhana sendiri berdiri melayani bagaikan seorang pelayan setia, memuliakannya dengan upacara yang semestinya. Demikianlah resi Durvāsā menetap di sana selama banyak hari.

Verse 106

दुर्योधनो महाराज शापात्‌ तस्य विशड्भशुकित: । महाराज जनमेजय! राजा दुर्योधन (श्रद्धासे नहीं, अपितु) उनके शापसे डरता हुआ दिन-रात आलस्य छोड़कर उनकी सेवामें लगा रहा

Waiśampāyana berkata: Wahai Maharaja, karena takut akan kutukannya, Duryodhana menjadi gelisah dan gentar. Wahai Maharaja Janamejaya, bukan karena iman, melainkan karena ngeri pada kutuk itu, ia menyingkirkan kemalasan dan melayani si resi siang dan malam.

Verse 136

पूर्ववत्‌ कारयित्वान्न न भुड्क्ते गर्हयन्‌ सम सः । फिर कहींसे अकस्मात्‌ आकर कहते--'हमलोगोंको जल्दी भोजन कराओ।” कभी आधी रातमें उठकर उसे नीचा दीखानेके लिये उद्यत हो पूर्ववत्‌ भोजन बनवाकर उस भोजनकी निन्दा करते हुए भोजन करनेसे इनकार कर देते थे

Waiśampāyana berkata: Seperti sebelumnya, setelah makanan disiapkan, ia tidak memakannya; sambil mencela hidangan itu, ia tetap tak tergoyahkan. Kadang ia datang tiba-tiba dari entah mana dan berkata, “Segera beri kami makan!” Kadang pula ia bangun di tengah malam, berniat mempermalukan sang tuan rumah; ia menyuruh menyiapkan makanan lagi seperti semula, lalu mencela makanan itu dan menolak menyantapnya.

Verse 226

तदा त्वं तत्र गच्छेथा यद्यनुग्राह्ता मयि । “यदि आपकी मुझपर कृपा हो तो मेरी प्रार्थनासे आप वहाँ ऐसे समयमें जाइयेगा, जब परम सुन्दरी यशस्विनी सुकुमारी राजकुमारी द्रौपदी समस्त ब्राह्मणों तथा पाँचों पतियोंको भोजन कराकर स्वयं भी भोजन करनेके पश्चात्‌ सुखपूर्वक बैठकर विश्राम कर रही हो”

Maka, bila engkau berkenan menunjukkan anugerah kepadaku, pergilah ke sana tepat pada saat itu—ketika Draupadī, sang putri raja yang amat elok, termasyhur, dan lembut budi, telah menjamu semua brāhmaṇa serta kelima suaminya, lalu selesai makan sendiri, dan duduk beristirahat dengan tenteram.

Verse 261

इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत व्रीहिद्रीणिकपर्वमें मुदूगल-देवदूत- संवादविषयक दो सौ इकसठवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-261 Mahābhārata, dalam Vana Parva, pada bagian yang disebut Vrīhīdrīṇika Parva, mengenai dialog antara Mudgala dan utusan ilahi.

Verse 262

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि द्रौपदीहरणपर्वणि दुर्वासउपाख्याने द्विषष्ट्यधिकद्धिशततमो<5ध्याय:

Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva—dalam bagian Draupadī-haraṇa—bab ke-262 dari kisah Durvāsā.

Frequently Asked Questions

The chapter stages the conflict between coercive abduction and protective duty: Jatāyu intervenes despite likely defeat, illustrating that dharmic action may require accepting personal loss to oppose unlawful force.

Ethical resolve must be paired with practical means: honoring allies (through gratitude and rites) and converting encounters into information and alliances are presented as disciplined steps toward restoring order.

No explicit phalaśruti is stated in the provided passage; its meta-function is structural—linking moral exemplarity (Jatāyu) to actionable guidance (Kabandha/Viśvāvasu) that redirects the protagonists toward alliance-based problem-solving.