Jatāyu’s Resistance, Sītā’s Traces, Kabandha’s Release, and the Path to Sugrīva (Āraṇyaka-parva 263)
धार्तराष्ट्रा दुरात्मान: सर्वे दुर्योधनादय: । कथ॑ तेष्वन्ववर्तन्त पापाचारा महामुने,जनमेजयने पूछा--महामुनि वैशम्पायनजी! जब महात्मा पाण्डव इस प्रकार वनमें रहकर मुनियोंके साथ विचित्र कथा-वार्ताद्वारा मनोरग्जन करते थे तथा जबतक द्रौपद्री भोजन न कर ले, तबतक सूर्यके दिये हुए अक्षयपात्रसे प्राप्त होनेवाले अन्नसे वे उन ब्राह्मणोंको तृप्त करते थे, जो भोजनके लिये उनके पास आये होते थे; उन दिनों दुःशासन, कर्ण और शकुनिके मतके अनुसार चलनेवाले पापाचारी दुरात्मा दुर्योधन आदि धृतराष्ट्रपुत्रोंने उन पाण्डवोंके साथ कैसा बर्ताव किया? भगवन! मेरे प्रश्नके अनुसार ये सब बातें कहिये
janamejaya uvāca | dhārtarāṣṭrā durātmānaḥ sarve duryodhanādayaḥ | kathaṁ teṣv anvavartanta pāpācārā mahāmune ||
Janamejaya berkata: “Wahai resi agung, bagaimana para putra Dhṛtarāṣṭra—Duryodhana dan yang lainnya, jiwa-jiwa durjana yang berperilaku dosa—bersikap terhadap para Pāṇḍava?”
जनमेजय उवाच