Adhyaya 253
Vana ParvaAdhyaya 25363 Versesयुद्ध अभी प्रत्यक्ष नहीं; पर मानसिक/रणनीतिक स्तर पर कौरव पक्ष रज-तम प्रेरित आक्रामकता की ओर तेज़ी से झुकता है।

Adhyaya 253

Draupadī-apaharaṇa-saṃdeśaḥ (Report of Draupadī’s Abduction and the Pāṇḍavas’ Pursuit)

Upa-parva: Draupadī-haraṇa-anuyāna (Jayadratha Episode) — Kāmya-ka Forest Context

Vaiśaṃpāyana describes the Pāṇḍavas moving through the forest after hunting, hearing unsettling animal cries and interpreting them as signs of disorder. They turn toward the hermitage area with urgency. A jackal’s call on the left is treated as an inauspicious omen; Yudhiṣṭhira interprets it as indicating hostile action by the Kurus. The party enters the woods and finds a weeping girl—identified as Dhātreyikā, an attendant connected to Draupadī—who is questioned by Indrasena about the cause of distress and the safety of Draupadī. The attendant reports that Jayadratha has forcibly taken Draupadī, disregarding the Pāṇḍavas’ status. She points to fresh tracks and broken vegetation, urging immediate pursuit and arming. The attendant’s lament uses stark ritual and social inversions to communicate the severity of the transgression. Yudhiṣṭhira instructs her to restrain harsh speech even while acknowledging that rulers can act deceptively when intoxicated by power. The Pāṇḍavas then pursue rapidly along the indicated path, with Dhaulmya visible amid infantry, and their anger intensifies as they sight the dust of Jayadratha’s moving force and glimpse Draupadī on his chariot, prompting shouted challenge by Bhīma, Arjuna, the twins, and Yudhiṣṭhira.

Chapter Arc: हस्तिनापुर की राजनीति में अचानक अंधकार उतरता है—दुर्योधन अपमान और भय से प्रायोपवेशन (अनशन) पर बैठ जाता है, और सभा में यह प्रश्न गूंजता है कि क्या कुरुवंश का युवराज स्वयं को ही नष्ट कर देगा। → दानव-प्रेरित सलाहकार दुर्योधन को ‘साहस’ कहकर डांटते हैं, पर उसी डांट के भीतर उसे और कठोर, पाप-प्रधान उपायों की ओर मोड़ते हैं—अर्जुन-भय को लक्ष्य बनाकर वध-योजना, संशप्तकों का उकसाया जाना, और कर्ण को प्रतिज्ञा-बंधन में कसना। साथ ही, रज-तम से आक्रान्त होकर योद्धाओं के चित्त पर राक्षसी प्रभाव फैलता है; यहां तक कि भीष्म, द्रोण, कृप भी पाण्डव-स्नेह से विचलित दिखाए जाते हैं। → कर्ण, आविष्ट-चित्त होकर, दुर्योधन के भय का उत्तर प्रतिज्ञा में देता है—‘सत्यं ते प्रतिजानामि वधिष्यामि रणेऽर्जुनम्’—और दुर्योधन अनशन त्यागकर हस्तिनापुर लौटने/प्रस्थान का निश्चय करता है; राक्षसी प्रेरणा अब व्यक्तिगत शोक नहीं, संगठित हिंसा का रूप ले लेती है। → दुर्योधन का प्रायोपवेशन टूटता है, पर शांति से नहीं—उसके स्थान पर अर्जुन-वध की योजनाबद्ध प्रतिज्ञा, संशप्तक-उत्साह, और कौरव-सेना का सुसज्जित, ध्वज-पताका-छत्रों से भरा प्रस्थान स्थापित होता है; संकट टलता नहीं, दिशा बदलता है। → रज-तम से आक्रान्त संशप्तक और कर्ण की प्रतिज्ञा के साथ कौरव-सेना आगे बढ़ती है—अब प्रश्न यह है कि यह ‘अर्जुन-वध’ का उन्माद किसे पहले निगलेगा: अर्जुन को, या स्वयं कुरुवंश की मर्यादा को?

Shlokas

Verse 1

हि मय ० (0) है 7 द्विपज्चाशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: सर्नेपर दुर्योधन धनको समझाना और कर्णके अनुरोध करनेपर दुयोधनका अनशन त्याग करके हस्तिनापुरको प्रस्थान दानवा ऊचु: भो: सुयोधन राजेन्द्र भरतानां कुलोद्वह । शूरै: परिवृतो नित्यं तथैव च महात्मभि:,दानव बोले--भरतवंशका भार वहन करनेवाले महाराज सुयोधन! आप सदा शूरवीरों तथा महामना पुरुषोंसे घिरे रहते हैं, फिर आपने यह आमरण उपवास करनेका साहस क्‍यों किया है? आत्महत्या करनेवाला पुरुष तो अधोगतिको प्राप्त होता है और लोकमें उसकी निन्‍्दा होती है, जो अयश फैलानेवाली है

Vaiśampāyana berkata: Para Dānava berseru, “Wahai Suyodhana, raja di antara para raja, penopang wangsa Bharata! Engkau senantiasa dikelilingi para kesatria dan insan berhati luhur. Mengapa, kalau begitu, engkau berani berniat berpuasa sampai mati? Orang yang memusnahkan dirinya jatuh ke keadaan yang rendah, dan di dunia ia menuai cela—yang hanya menyebarkan nama buruk.”

Verse 2

अकार्षी: साहसमिदं कस्मात्‌ प्रायोपवेशनम्‌ । आत्मत्यागी ह्यथो याति वाच्यतां चायशस्करीम्‌,दानव बोले--भरतवंशका भार वहन करनेवाले महाराज सुयोधन! आप सदा शूरवीरों तथा महामना पुरुषोंसे घिरे रहते हैं, फिर आपने यह आमरण उपवास करनेका साहस क्‍यों किया है? आत्महत्या करनेवाला पुरुष तो अधोगतिको प्राप्त होता है और लोकमें उसकी निन्‍्दा होती है, जो अयश फैलानेवाली है

“Mengapa engkau melakukan tindakan gegabah ini—tekad berpuasa sampai mati? Sebab orang yang meninggalkan nyawanya sendiri jatuh ke keadaan yang rendah, dan di dunia ia pun mendapat cela—kehinaan yang menyebarkan nama buruk.”

Verse 3

न हि कार्यविरुद्धेषु बहुपापेषु कर्मसु । मूलघातिषु सज्जन्ते बुद्धिमन्तो भवद्विधा:,जो अभीष्ट कार्योके विरुद्ध पड़ते हों, जिनमें बहुत पाप भरे हों तथा जो जड़मूलसहित अपना विनाश करनेवाले हों, ऐसे आत्महत्या आदि अशुभ कर्मोमें आप-जैसे बुद्धिमान्‌ पुरुष नहीं प्रवृत्त होते

Sebab perbuatan yang bertentangan dengan tujuan, sarat dosa, dan menghantam hingga ke akar kehancuran—pada tindakan nista seperti bunuh diri—orang bijak sepertimu tidak akan menaruh diri.

Verse 4

नियच्छैनां मतिं राजन्‌ धर्मार्थसुखनाशिनीम्‌ | यशःप्रतापवीर्यघ्नीं शत्रूणां हर्षवर्धनीम्‌,राजन्‌! आपका यह आत्महत्यासम्बन्धी विचार धर्म, अर्थ तथा सुख, यश, प्रताप और पराक्रमका नाश करनेवाला तथा शत्रुओंका हर्ष बढ़ानेवाला है, अतः इसे रोकिये

“Wahai Raja, kendalikan niatmu ini. Ia memusnahkan dharma, kesejahteraan, dan kebahagiaan; membunuh kemasyhuran, wibawa, dan keberanian; dan hanya menambah sukacita musuh-musuhmu.”

Verse 5

श्रूयतां तु प्रभो तत्त्वं दिव्यतां चात्मनो नृप । निर्माणं च शरीरस्य ततो धैर्यमवाप्रुहि,प्रभो! एक रहस्यकी बात सुनिये। नरेश्वर! आपका स्वरूप दिव्य है तथा आपके शरीरका निर्माण भी अदभुत प्रकारसे हुआ है। यह हमलोगोंसे सुनकर धैर्य धारण कीजिये

Waiśampāyana berkata: “Dengarkanlah, wahai junjungan, hakikat sejati tentang dirimu—kodratmu yang ilahi, dan cara menakjubkan bagaimana tubuhmu dibentuk. Setelah mendengarnya dari kami, wahai raja, teguhkanlah hati dan keberanianmu.”

Verse 6

पुरा त्वं तपसास्माभिललब्धो राजन महेश्वरात्‌ । पूर्वकायश्च पूर्वस्ते निर्मितो वज्ञसंचयै:,राजन! पूर्वकालमें हमलोंगोंने तपस्याद्वारा भगवान्‌ शंकरकी आराधना करके आपको प्राप्त किया था। आपके शरीरका पूर्वभाग--जो नाभिसे ऊपर है, वज़्समूहसे बना हुआ है

Waiśampāyana berkata: “Dahulu, wahai Raja, melalui tapa kami, kami memperoleh engkau sebagai anugerah dari Maheśvara (Śiva). Dan bagian depan tubuhmu—bagian atas yang terbentuk lebih dahulu, dari pusar ke atas—dibentuk dari himpunan zat laksana vajra.”

Verse 7

अस्त्रैरभेद्य: शस्त्रैश्ञाप्पध: कायश्ष तेडनघ । कृत: पुष्पमयो देव्या रूपत: स्त्रीमनोहर:,वह किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे विदीर्ण नहीं हो सकता। अनघ! उसी प्रकार आपका नाभिसे नीचेका शरीर पार्वतीदेवीने पुष्पमय बनाया है, जो अपने रूप-सौन्दर्यसे स्त्रियोंके मनको मोहनेवाला है

“Wahai yang tanpa cela, tubuhmu tak dapat ditembus oleh senjata apa pun. Dan bagian tubuhmu dari pusar ke bawah dibentuk oleh Dewi Pārvatī menjadi laksana rangkaian bunga—indah rupanya hingga memikat hati para wanita.”

Verse 8

एवमीथ्चरसंयुक्तस्तव देहो नृपोत्तम । देव्या च राजशार्दूल दिव्यस्त्वं हि न मानुष:,नृपश्रेष्ठ! इस प्रकार आपका शरीर देवी पार्वतीके साथ साक्षात्‌ भगवान्‌ महेश्वरने संघटित किया है। अत: राजसिंह! आप मनुष्य नहीं, दिव्य पुरुष हैं

Waiśampāyana berkata: “Wahai raja terbaik, demikianlah tubuhmu dibentuk dan disatukan oleh Maheśvara sendiri bersama Sang Dewi (Pārvatī). Karena itu, wahai harimau di antara para penguasa, engkau bukan manusia semata—engkau makhluk ilahi.”

Verse 9

क्षत्रियाश्व॒ महावीर्या भगदत्तपुरोगमा: । दिव्यास्त्रविदुष: शूरा: क्षपयिष्यन्ति ते रिपून्‌

Waiśampāyana berkata: “Para Kṣatriya perkasa itu—dengan Bhagadatta di barisan terdepan—para pahlawan yang mahir dalam senjata-senjata surgawi, akan membinasakan musuh-musuhmu.”

Verse 10

भगदत्त आदि महापराक्रमी क्षत्रिय दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता तथा शौर्यसम्पन्न हैं। वे आपके शत्रुओंका संहार करेंगे ।। तदलं ते विषादेन भयं तव न विद्यते | साहाय्यार्थ च ते वीरा: सम्भूता भुवि दानवा:,अत: आपको शोक करनेकी आवश्यकता नहीं है। आपको कोई भय नहीं है। आपकी सहायताके लिये बहुत-से वीर दानव भूतलपर प्रकट हो चुके हैं

Vaiśampāyana berkata: “Para kesatria perkasa seperti Bhagadatta—mahir dalam senjata-senjata ilahi dan penuh keberanian—akan membinasakan musuh-musuhmu. Maka tinggalkanlah kemurungan ini: tiada ketakutan bagimu. Demi menolongmu, banyak Dānava yang gagah telah menampakkan diri di bumi. Karena itu jangan berduka; jangan gentar—sekutu-sekutu kuat telah bangkit untuk menyokong pihakmu.”

Verse 11

भीष्मद्रोणकृपादी श्र प्रवेक्ष्यन्त्यपरे5सुरा: । यैराविष्टा घृणां त्यक्त्वा योत्स्यन्ते तव वैरिभि:,दूसरे भी अनेक असुर भीष्म, द्रोणाचार्य और कृपाचार्य आदिके शरीरोंमें प्रवेश करेंगे, जिनसे आविष्ट होकर वे लोग दयाको त्यागकर आपके शत्रुओंके साथ युद्ध करेंगे

Banyak asura lainnya akan memasuki tubuh Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, dan para mahaguru itu; dikuasai oleh mereka, para kesatria itu akan menanggalkan belas kasih dan bertempur bersama pihakmu melawan musuh-musuhmu.

Verse 12

नैव पुत्रानु न च भ्रातृन्‌ न पितृन्‌ च बान्धवान्‌ | नैव शिष्यान्‌ न च ज्ञातीन्‌ न बालात्‌ स्थविरानू नच

Ia tidak akan menyisakan putra-putra, tidak pula saudara-saudara, tidak pula para ayah dan kaum kerabat; tidak pula murid-murid dan sanak keluarga—baik yang muda maupun yang tua.

Verse 13

युधि सम्प्रहरिष्यन्तो मोक्ष्यन्ति कुरुसत्तम | निः:स्नेहा दानवाविष्टा: समाक्रान्तेडन्तरात्मनि

Wahai yang terbaik di antara para Kuru, ketika hendak saling menghantam di medan perang, mereka akan melepaskan senjata-senjata mereka. Tanpa kasih alami, dikuasai dorongan Dānava—seakan batin pun tertindih—mereka akan terus menerjang.

Verse 14

कुरुश्रेष्ठ) दानवोंका आवेश होनेपर भीष्म, द्रोण आदिकी अन्तरात्मापर भी उन दानवोंका ही अधिकार हो जायगा। उस दशामें युद्धमें स्नेहरहित हो प्रहार करते हुए वे लोग पुत्रों, भाइयों, पितृजनों, बान्धवों, शिष्यों, कुटुम्बीजनों, बालकों तथा बूढ़ोंको भी नहीं छोड़ेंगे ।। प्रहरिष्यन्ति विवशा: स्नेहमुत्सृज्य दूरत: । हृष्टा: पुरुषशार्टूला: कलुषीकृतमानसा: । अविज्ञानविमूढाश्चव दैवाच्च विधिनिर्मितात्‌,वे पुरुषसिंह भीष्म आदि वीर (दानवोंके आवेशके कारण) विवश होकर अज्ञानसे मोहित हो जायँगे। उनके मनमें मलिनता आ जायगी और वे स्नेहको दूर छोड़कर प्रसन्नतापूर्वक अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रहार करेंगे। इसमें विधिनिर्मित होनहार ही कारण है

Wahai yang terbaik di antara para Kuru, ketika kerasukan Dānava menguasai mereka, bahkan batin Bhīṣma, Droṇa, dan para kesatria agung itu pun akan berada di bawah cengkeramannya. Dalam keadaan demikian, tanpa kasih sayang mereka akan menghantam di medan perang dan tidak akan menyisakan putra, saudara, ayah, kerabat, murid, anggota keluarga, anak-anak, maupun orang tua. Para “singa di antara manusia” itu, terpaksa, akan membuang kasih jauh-jauh; dengan gairah mereka akan menyerang dengan senjata. Pikiran mereka menjadi ternoda, mereka tersesat oleh ketidaktahuan—semuanya terjadi sebagai buah takdir yang ditempa oleh hukum nasib.

Verse 15

व्याभाषमाणाश्षान्योन्यं न मे जीवन्‌ विमोक्ष्यसे । सर्वे शस्त्रास्त्रमोक्षेण पौरुषे समवस्थिता:

Sambil saling berteriak menantang, ia menyatakan, “Engkau takkan lolos dariku hidup-hidup.” Dengan sumpah itu, mereka semua berdiri teguh dalam tekad ksatria, siap melepaskan senjata dan astra.

Verse 16

तेडपि पञ्च महात्मान: प्रतियोत्स्यन्ति पाण्डवा:

Vaiśampāyana berkata: “Kelima mahatma itu pun akan dihadapi oleh para Pāṇḍava dalam pertempuran.”

Verse 17

दैत्यरक्षोगणाश्वैव सम्भूता: क्षत्रयोनिषु,(प्रहरिष्यन्ति ते वीरास्तवारिषु महाबला: ।) राजन! दैत्यों तथा राक्षसोंके समुदाय क्षत्रिययोनिमें उत्पन्न हुए हैं, जो आपके शत्रुओंके साथ पराक्रमपूर्वक युद्ध करेंगे। वे महाबली वीर दैत्य आपके शत्रुओंपर गदा, मुसल, शूल तथा अन्य छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रहार करेंगे

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, gerombolan Daitya dan Rākṣasa telah lahir di antara garis-garis Kṣatriya. Para kesatria perkasa itu akan menghantam musuh-musuhmu dengan kekuatan dahsyat.”

Verse 18

योत्स्यन्ति युधि विक्रम्य शत्रुभिस्तव पार्थिव | गदाभिमरुसलै: शूलै: शस्त्रैरुच्चावचैस्तथा,(प्रहरिष्यन्ति ते वीरास्तवारिषु महाबला: ।) राजन! दैत्यों तथा राक्षसोंके समुदाय क्षत्रिययोनिमें उत्पन्न हुए हैं, जो आपके शत्रुओंके साथ पराक्रमपूर्वक युद्ध करेंगे। वे महाबली वीर दैत्य आपके शत्रुओंपर गदा, मुसल, शूल तथा अन्य छोटे-बड़े अस्त्र-शस्त्रोंद्वारा प्रहार करेंगे

Vaiśampāyana berkata: “Wahai Raja, gerombolan Daitya dan Rākṣasa telah lahir dalam garis Kṣatriya; bersama musuh-musuhmu mereka akan bertempur dengan keberanian di medan laga. Dengan gada, musala, tombak, serta senjata besar-kecil beraneka ragam, para pahlawan perkasa itu akan menghantam pihak lawanmu.”

Verse 19

यच्च ते<न्तर्गतं वीर भयमर्जुनसम्भवम्‌ | तत्रापि विहितो<स्माभिववधोपायो<र्जुनस्य वै,वीर! आपके भीतर जो अर्जुनका भय समाया हुआ है, वह भी निकाल देना चाहिये; क्योंकि हमलोगोंने अर्जुनके वधका उपाय भी कर लिया है

Vaiśampāyana berkata: “Wahai pahlawan, singkirkan juga rasa takut terhadap Arjuna yang telah bersarang dalam dirimu; sebab cara untuk membinasakan Arjuna pun telah kami siapkan.”

Verse 20

हतस्य नरकस्यात्मा कर्णमूर्तिमुपाश्रित: । तद्‌ वैरं संस्मरन्‌ वीर योत्स्यते केशवार्जुनौ,श्रीकृष्णके हाथों जो नरकासुर मारा गया है, उसकी आत्मा कर्णके शरीरमें घुस गयी है। वीरवर! वह (नरकासुर) उस वैरको याद करके श्रीकृष्ण और अर्जुनसे युद्ध करेगा

Waiśampāyana berkata: “Roh Naraka—yang dibunuh oleh Śrī Kṛṣṇa—telah bernaung dalam wujud jasmani Karṇa. Mengingat permusuhan lama itu, sang perkasa akan mencari pertempuran melawan Keśava dan Arjuna.”

Verse 21

स ते विक्रमशौटीरो रणे पार्थ विजेष्यति । कर्ण: प्रहरतां श्रेष्ठ: सर्वाश्षारीन्‌ महारथ:,महारथी कर्ण योद्धाओं में श्रेष्ठ और अपने पराक्रमपर गर्व रखनेवाला है। वह रणभूमिमें अर्जुन तथा आपके अन्य सब शत्रुओंपर अवश्य विजयी होगा

Waiśampāyana berkata: “Karṇa—yang bangga akan kegagahannya dan termasyhur keberaniannya—akan menaklukkan Pārtha (Arjuna) di medan laga. Sang mahāratha Karṇa, yang terdepan di antara para penyerang, pasti mengalahkan semua musuhmu.”

Verse 22

ज्ञात्वैतच्छझना वज्ी रक्षार्थ सव्यसाचिन: । कुण्डले कवचं चैव कर्णस्यापहरिष्यति,इस बातको समझकर वज्धारी इन्द्र अर्जुनकी रक्षाके लिये छल करके कर्णके कुण्डल और कवचका अपहरण कर लेंगे

Waiśampāyana berkata: “Memahami siasat ini, Indra sang pemegang vajra—demi melindungi Arjuna—akan menempuh tipu daya dan merampas anting serta zirah alami Karṇa.”

Verse 23

तस्मादस्माभिरप्यत्र दैत्या:शतसहस््रशः । नियुक्ता राक्षसाश्वैव ये ते संशप्तका इति,इसीलिये हमलोंगोंने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसोंको इस काममें लगा रखा है, जो संशप्तक नामसे विख्यात हैं। वे वीर अर्जुनको मार डालेंगे। अत: आप शोक न करें। नरेश्वर! आपको इस पृथ्वीका निष्कंटक राज्य भोगना है

Waiśampāyana berkata: “Karena itu, kami pun telah menempatkan di sini Daitya beratus-ratus ribu jumlahnya, juga para Rakṣasa, untuk tugas ini; mereka dikenal sebagai Saṁśaptaka. Mereka akan menewaskan Arjuna sang pahlawan. Maka jangan bersedih. Wahai raja, engkau ditakdirkan menikmati kedaulatan atas bumi ini tanpa gangguan.”

Verse 24

प्रख्यातास्ते<र्जुनं वीरं हनिष्यन्ति च मा शुचः । असपत्ना त्वया हीयं भोक्तव्या वसुधा नूप,इसीलिये हमलोंगोंने भी एक लाख दैत्यों तथा राक्षसोंको इस काममें लगा रखा है, जो संशप्तक नामसे विख्यात हैं। वे वीर अर्जुनको मार डालेंगे। अत: आप शोक न करें। नरेश्वर! आपको इस पृथ्वीका निष्कंटक राज्य भोगना है

Waiśampāyana berkata: “Para kesatria termasyhur itu pasti akan membunuh Arjuna sang pahlawan—jangan bersedih. Wahai raja, bumi ini akan kau nikmati tanpa tandingan; engkau ditakdirkan memerintah tanpa lawan.”

Verse 25

मा विषादं गमस्तस्मान्नैतत्त्वय्युपपद्यते । विनष्टे त्वयि चास्माकं पक्षो हीयेत कौरव,अतः कुरुनन्दन! आप विषाद न करें। यह आपको शोभा नहीं देता है। आपके नष्ट हो जानेपर तो हमारे पक्षका ही नाश हो जायगा

Karena itu jangan jatuh dalam keputusasaan; kemurungan seperti itu tidak layak bagimu. Wahai Kaurava, bila engkau binasa, pihak kami akan menyusut—bahkan menuju kehancuran.

Verse 26

गच्छ वीर न ते बुद्धिरन्या कार्या कथठ्चन । त्वमस्माकं गतिर्नित्यं देवतानां च पाण्डवा:,वीरवर! जाइये। अब आपको किसी तरह भी अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये। देखिये, देवताओंने पाण्डवोंका आश्रय ले रखा है; परंतु हमारी गति तो सदा आप ही हैं

Majulah, wahai pahlawan. Jangan sekali-kali memikirkan jalan lain. Engkaulah selalu tumpuan dan tempat kembali terakhir kami; dan para Pāṇḍava pun menjadi tumpuan para dewa.

Verse 27

वैशम्पायन उवाच एवमुकक्‍्त्वा परिष्वज्य दैत्यास्तं राजकुञ्जरम्‌ । समाश्चास्य च दुर्धर्ष पुत्रवद्‌ दानवर्षभा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! दुर्धर्ष वीर नृपशिरोमणि दुर्योधनसे ऐसा कहकर दैत्यों तथा दानवेश्वरोंने उसे पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाया और आश्वासन देकर उसकी बुद्धिको स्थिर किया। भारत! तत्पश्चात्‌ प्रिय वचन बोलकर उन्होंने दुर्योधनको जानेके लिये आज्ञा देते हुए कहा--'अब आप जाइये और शशत्रुओंपर विजय प्राप्त कीजिये"

Vaiśampāyana berkata: Setelah berkata demikian, para Daitya memeluk sang ‘gajah di antara raja-raja’ (Duryodhana). Para Dānava yang laksana banteng itu menenteramkan pangeran yang sukar ditaklukkan itu bagaikan anak sendiri, meneguhkan tekadnya.

Verse 28

स्थिरां कृत्वा बुद्धिमस्य प्रियाण्युक्त्वा च भारत | गम्यतामित्यनुज्ञाय जयमाप्रुहि चेत्यथ,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! दुर्धर्ष वीर नृपशिरोमणि दुर्योधनसे ऐसा कहकर दैत्यों तथा दानवेश्वरोंने उसे पुत्रकी भाँति हृदयसे लगाया और आश्वासन देकर उसकी बुद्धिको स्थिर किया। भारत! तत्पश्चात्‌ प्रिय वचन बोलकर उन्होंने दुर्योधनको जानेके लिये आज्ञा देते हुए कहा--'अब आप जाइये और शशत्रुओंपर विजय प्राप्त कीजिये"

Vaiśampāyana berkata: Wahai Bhārata, setelah meneguhkan tekadnya dan mengucapkan kata-kata yang menyenangkan, mereka memberinya izin, seraya berkata, “Pergilah sekarang, dan raihlah kemenangan.”

Verse 29

तैर्विसृष्टं महाबाहुं कृत्या सैवानयत्‌ पुनः । तमेव देशं यत्रासौ तदा प्रायमुपाविशत्‌,दैत्योंक विदा करनेपर उसी कृत्याने महाबाहु दुर्योधनको पुनः उसी स्थानपर पहुँचा दिया, जहाँ वह पहले आमरण उपवासके लिये बैठा था

Setelah dilepaskan oleh mereka, kṛtyā itu membawa sang berlengan perkasa kembali—ke tempat yang sama, tempat ia dahulu duduk untuk melakukan prāyopaveśa (puasa sampai mati).

Verse 30

प्रतिनिक्षिप्य तं वीर॑ कृत्या समभिपूज्य च । अनुज्ञाता च राज्ञा सा तथैवान्तरधीयत,वीर राजा दुर्योधनको वहाँ रखकर कृत्याने उसके प्रति सम्मान प्रदर्शित किया और उससे आज्ञा लेकर जैसे आयी थी, वैसे ही अदृश्य हो गयी

Setelah menempatkan sang pahlawan di sana, Kṛtyā menghormatinya sebagaimana mestinya. Lalu, setelah memperoleh izin sang raja, ia lenyap dari pandangan—sebagaimana ia muncul—menyelesaikan tugas yang diperintahkan kepadanya.

Verse 31

गतायामथ तस्‍यां तु राजा दुर्योधनस्तदा । स्वप्रभूतमिदं सर्वमचिन्तयत भारत

Ketika ia telah pergi, Raja Duryodhana saat itu merenungkan semuanya sebagai perwujudan kekuasaannya sendiri, wahai keturunan Bharata.

Verse 32

कर्ण संशप्तकांश्षैव पार्थस्यामित्रघातिन:

Vaiśampāyana berkata: Karṇa, bersama para Saṁśaptaka, berdiri menentang Pārtha—Arjuna, pembunuh para musuh—untuk menghadang dan mengekangnya dalam pertempuran.

Verse 33

एवमाशा दृढा तस्य धार्त॑राष्ट्रस्थ दुर्मतेः

Vaiśampāyana berkata: Demikianlah harapan orang yang berpikiran buruk itu—yang telah berpihak pada para Dhārtarāṣṭra—menjadi teguh dan mengeras.

Verse 34

कर्णो5प्याविष्ट चित्तात्मा नरकस्यान्तरात्मना

Vaiśampāyana berkata: Bahkan Karṇa pun, dengan pikiran dan batin yang dikuasai oleh dorongan neraka dari dalam, seakan kerasukan di dalam dirinya—tergerak oleh tekad gelap yang merusak.

Verse 35

संशप्तकाश्न ते वीरा राक्षसाविष्टचेतस:

Para kesatria itu terikat oleh sumpah; bagaikan kerasukan kegilaan rākṣasa, dikuasai amarah dan delusi, mereka menerjang dengan tekad nekat tanpa pertimbangan.

Verse 36

भीष्मद्रोणकृपाद्याश्न दानवाक्रान्तचेतस:

Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, dan yang lain—dengan batin yang dikuasai dorongan-dorongan dānavik—bertindak di bawah pengaruh kelam itu.

Verse 37

(कृत्यया55नाय्यकथितं यत्‌ तस्यां निशि दानवै: ।) न चाचचक्षे कस्मैचिदेतद्‌ राजा सुयोधन:,दानवोंने रातमें कृत्याद्वारा अपने यहाँ बुलाकर जो बातें कही थीं, उन्हें राजा दुर्योधनने किसीपर भी प्रकट नहीं किया

Apa pun yang disampaikan para Dānava kepadanya malam itu—setelah memanggilnya melalui perantaraan kṛtyā—Raja Suyodhana tidak mengungkapkannya kepada siapa pun.

Verse 38

दुर्योधनं निशान्ते च कर्णो वैकर्तनो<ब्रवीत्‌ । स्मयन्निवाञ्जलिं कृत्वा पार्थिव हेतुमद्‌ वच:,वह रात बीतनेपर सूर्यपुत्र कर्णने आकर राजा दुर्योधनसे हाथ जोड़ मुसकराते हुए यह युक्तियुक्त वचन कहा--

Saat fajar menyingsing, Karṇa Vaikartana berbicara kepada Raja Duryodhana. Sambil tersenyum dan menyatukan telapak tangan sebagai salam hormat, ia mengucapkan kata-kata yang beralasan dan bertujuan.

Verse 39

न मृतो जयते शत्रूञज्जीवन्‌ भद्राणि पश्यति । मृतस्य भद्राणि कुतः कौरवेय कुतो जय:,“कुरुनन्दन! मरा हुआ मनुष्य कभी शत्रुओंपर विजय नहीं पाता। जो जीवित रहता है वह कभी सुखके दिन भी देखता है। मरे हुए को कहाँ सुख और कहाँ विजय?

“Wahai putra wangsa Kuru! Orang mati tidak menaklukkan musuh. Hanya yang tetap hidup dapat menyaksikan hari-hari mujur. Bagi yang mati, di mana kesejahteraan—dan di mana kemenangan?”

Verse 40

न कालोउद्य विषादस्य भयस्य मरणस्य वा | परिष्वज्याब्रवीच्चैनं भुजाभ्यां स महाभुज:,“यह समय शोक मनाने, भयभीत होने अथवा मरनेका नहीं है", यह कहकर महाबाहु कर्णने दोनों भुजाओंसे खींचकर दुर्योधनको हृदयसे लगा लिया और कहा--

Vaiśampāyana berkata: “Ini bukan saatnya untuk berduka, untuk takut, ataupun untuk menginginkan kematian.” Setelah berkata demikian, Karṇa yang berlengan perkasa menarik Duryodhana dengan kedua lengannya, memeluknya erat ke dada, lalu berbicara.

Verse 41

उत्तिष्ठ राजन्‌ कि शेषे कस्माच्छोचसि शत्रुहन्‌ शत्रून्‌ प्रताप्य वीर्येण स कथं मृत्युमिच्छसि,'शत्रुघाती नरेश! उठो, क्‍यों सो रहे हो? किसलिये शोक करते हो? अपने पराक्रमसे शत्रुओंको संतप्त करके अब मृत्युकी इच्छा क्यों करते हो?

“Bangkitlah, wahai raja! Mengapa engkau terbaring demikian? Wahai pembunuh musuh, mengapa engkau berduka? Setelah membakar musuh-musuhmu dengan keberanianmu, bagaimana mungkin kini engkau menginginkan kematian?”

Verse 42

अथवा ते भयं जात॑ दृष्टवार्जुनपराक्रमम्‌ । सत्यं ते प्रतिजानामि वधिष्यामि रणे<र्जुनम्‌,“अथवा यदि तुम्हें अर्जुनका पराक्रम देखकर भय हो गया हो तो मैं तुमसे सच्ची प्रतिज्ञा करके कहता हूँ कि मैं युद्धमें अर्जुनको अवश्य मार डालूँगा

“Atau jika ketakutan timbul dalam dirimu setelah melihat kegagahan Arjuna, maka aku bersumpah dengan sebenar-benarnya: di medan perang aku pasti akan membunuh Arjuna.”

Verse 43

गते त्रयोदशे वर्षे सत्येनायुधमालभे । आनयिष्याम्यहं पार्थान्‌ वशं तव जनाधिप,“महाराज! मैं धनुष छूकर सचाईके साथ यह शपथ ग्रहण करता हूँ कि तेरहवाँ वर्ष व्यतीत होते ही पाण्डवोंको तुम्हारे वशमें ला दूँगा"

“Wahai penguasa manusia! Begitu tahun ketiga belas berlalu, aku menyentuh senjataku dan bersumpah demi kebenaran: aku akan membawa para Pārtha (Pāṇḍava) ke dalam kekuasaanmu.”

Verse 44

एवमुक्तस्तु कर्णेन दैत्यानां वचनात्‌ तथा । प्रणिपातेन चाप्येषामुदतिष्ठत्‌ सुयोधन:,कर्णके ऐसा कहनेपर और इन दुःशासन आदि भाइयोंके प्रणामपूर्वक अनुनय-विनय करनेपर दैत्योंके वचनोंका स्मरण करके दुर्योधन अपने आसनसे उठ खड़ा हुआ

Setelah Karṇa berkata demikian, dan setelah tersentuh oleh sujud hormat serta permohonan para saudaranya seperti Duḥśāsana, serta mengingat kata-kata para Daitya, Suyodhana (Duryodhana) pun bangkit dari tempat duduknya.

Verse 45

दैत्यानां तद्‌ वच: श्रुत्वा हृदि कृत्वा स्थिरां मतिम्‌ ततो मनुजशार्दूलो योजयामास वाहिनीम्‌,दैत्योंके पूर्वोिक्त कथनको याद करके नरश्रेष्ठ दुर्योधनने पाण्डवोंसे युद्ध करनेका पक्का विचार कर लिया और फिर हस्तिनापुर जानेके लिये रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंसे युक्त अपनी चतुरंगिणी सेनाको तैयार होनेकी आज्ञा दी। राजन्‌! वह विशाल वाहिनी गंगाके प्रवाहके समान चलने लगी

Mendengar ucapan para Daitya dan meneguhkannya sebagai tekad yang mantap di dalam hati, sang harimau di antara manusia itu mulai menata bala tentaranya. Mengingat kembali kata-kata yang telah diucapkan sebelumnya, Duryodhana mengambil keputusan bulat untuk berperang melawan para Pāṇḍava, lalu memerintahkan agar pasukan caturangga—kereta perang, gajah, kuda, dan infanteri—disiapkan untuk berangkat menuju Hastināpura. Wahai Raja, bala yang besar itu pun bergerak laksana arus Sungai Gaṅgā—tak terbendung dan mengembang oleh niatnya.

Verse 46

रथनागाश्वकलिलां पदातिजनसंकुलाम्‌ | गज्जौघप्रतिमा राजन्‌ सा प्रयाता महाचमू:,दैत्योंके पूर्वोिक्त कथनको याद करके नरश्रेष्ठ दुर्योधनने पाण्डवोंसे युद्ध करनेका पक्का विचार कर लिया और फिर हस्तिनापुर जानेके लिये रथ, हाथी, घोड़े और पैदल सैनिकोंसे युक्त अपनी चतुरंगिणी सेनाको तैयार होनेकी आज्ञा दी। राजन्‌! वह विशाल वाहिनी गंगाके प्रवाहके समान चलने लगी

Wahai Raja, bala besar itu maju—padat oleh kereta, gajah, dan kuda, serta sesak oleh kerumunan prajurit berjalan kaki—laksana kawanan gajah yang amat luas.

Verse 47

श्वेतच्छत्रै: पताकाभि ्षामरैश्न सुपाण्डुरै: । रथैनगि: पदातैश्न शुशुभेडतीव संकुला

Dihiasi payung putih, panji-panji, dan kipas chāmara yang amat pucat, serta berdesakan oleh kereta, gajah, dan prajurit berjalan kaki, pemandangan itu tampak berkilau cemerlang—semakin indah justru karena rapatnya himpunan pasukan.

Verse 48

जयाशीर्भिड्विजेन्द्रे: स स्तूयमानो5घिराजवत्‌,धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सम्राट्की भाँति श्रेष्ठ ब्राह्मणोंक मुखसे विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ अपनी स्तुति सुनता तथा लोगोंकी प्रणामाञ्जलियोंको ग्रहण करता हुआ उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित हो आगे-आगे चला

Sambil dipuji oleh para brāhmaṇa utama dengan berkat-berkat kemenangan, Duryodhana putra Dhṛtarāṣṭra berjalan di depan, berkilau laksana raja para nāga.

Verse 49

गृह्नन्नज्जलिमालाश्र धार्तराष्ट्री जनाधिप: । सुयोधनो ययावग्रे श्रिया परमया ज्वलन्‌,धृतराष्ट्रपुत्र राजा दुर्योधन सम्राट्की भाँति श्रेष्ठ ब्राह्मणोंक मुखसे विजयसूचक आशीर्वादोंके साथ अपनी स्तुति सुनता तथा लोगोंकी प्रणामाञ्जलियोंको ग्रहण करता हुआ उत्कृष्ट शोभासे प्रकाशित हो आगे-आगे चला

Dhārtarāṣṭra, penguasa rakyat bernama Suyodhana, menerima salam tangan terkatup dari orang banyak; ia berjalan di barisan depan, menyala oleh kemegahan yang tertinggi.

Verse 50

कर्णेन सार्ध राजेन्द्र सौबलेन च देविना । दुःशासनादयश्चास्य भ्रातर: सर्व एव ते,राजेन्द्र! कर्ण तथा द्यूतकृशल शकुनिके साथ दुःशासन आदि सब भाई, भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्नीक--ये सभी कुरुकुलरत्न नाना प्रकारके रथों, गजराजों तथा घोड़ोंपर बैठकर राजसिंह दुर्योधनके पीछे-पीछे चल रहे थे। जनमेजय! थोड़े समयमें उन सबने अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश किया

Waiśampāyana berkata: Wahai Raja, bersama Karṇa dan Saubala (Śakuni), serta semua saudara-saudaranya mulai dari Duḥśāsana—mereka semua mengikuti di belakangnya.

Verse 51

भूरिश्रवा: सोमदत्तो महाराजश्न बाह्विक: । रथै्नानाविधाकारैहयैर्गजवरैस्तथा,राजेन्द्र! कर्ण तथा द्यूतकृशल शकुनिके साथ दुःशासन आदि सब भाई, भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्नीक--ये सभी कुरुकुलरत्न नाना प्रकारके रथों, गजराजों तथा घोड़ोंपर बैठकर राजसिंह दुर्योधनके पीछे-पीछे चल रहे थे। जनमेजय! थोड़े समयमें उन सबने अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश किया

Bhūriśravas, Somadatta, dan raja tua Bāhlīka—semuanya menaiki kereta perang beraneka rupa, kuda-kuda pilihan, serta gajah-gajah agung.

Verse 52

प्रयान्तं नृपसिंहं तमनुजग्मु: कुरूद्वहा: । कालेनाल्पेन राजेन्द्र स्वपुरं विविशुस्तदा,राजेन्द्र! कर्ण तथा द्यूतकृशल शकुनिके साथ दुःशासन आदि सब भाई, भूरिश्रवा, सोमदत्त तथा महाराज बाह्नीक--ये सभी कुरुकुलरत्न नाना प्रकारके रथों, गजराजों तथा घोड़ोंपर बैठकर राजसिंह दुर्योधनके पीछे-पीछे चल रहे थे। जनमेजय! थोड़े समयमें उन सबने अपनी राजधानी हस्तिनापुरमें प्रवेश किया

Ketika sang singa di antara raja-raja itu berangkat, para unggulan wangsa Kuru mengikutinya. Wahai Raja, dalam waktu singkat mereka semua memasuki kota mereka sendiri.

Verse 153

श्लाघमाना: कुरुश्रेष्ठ करिष्यन्ति जनक्षयम्‌ । एक-दूसरेके विरुद्ध भाषण करते हुए वे सब योद्धा कहेंगे--“आज तू मेरे हाथोंसे जीवित नहीं बच सकता।' कुरुश्रेष्ठी! इस प्रकार सभी अस्त्र-शस्त्रोंकी वर्षा करते हुए पराक्रमपर डटे रहेंगे और परस्पर होड़ लगाकर जनसंहार करेंगे

Wahai yang terbaik di antara Kuru, mereka akan saling membanggakan diri dan menimbulkan kebinasaan manusia.

Verse 166

वधं चैषां करिष्यन्ति दैवयुक्ता महाबला: । वे दैवप्रेरित महाबली महात्मा पाँचों पाण्डव भी इन भीष्म आदिका सामना करते हुए इनका वध करेंगे

Dengan dorongan takdir, para perkasa itu akan menumpas mereka.

Verse 251

इस प्रकार श्रीमह्याभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रायोपवेशनविषयक दो सौ इक्यावनवाँ अध्याय पूरा हुआ

Demikian berakhir bab ke-251 dalam subbagian Ghoṣayātrā pada Vana Parva dari Mahābhārata yang suci, yang membahas tekad Duryodhana untuk menjalani prāyopaveśa (puasa hingga ajal).

Verse 252

इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनपुरप्रवेशे द्विपज्चाशदधिकद्धिशततमो<5ध्याय:

Demikian berakhir, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva, bagian Ghoṣa-yātrā Parva, bab yang menggambarkan masuknya Duryodhana ke kota—bab ke-252.

Verse 313

(सम्मृश्य तानि वाक्यानि दानवोक्तानि दुर्मति: ।) विजेष्यामि रणे पाण्डूनिति चास्याभवन्मति: । भारत! कृत्याके चले जानेपर राजा दुर्योधनने इन सारी बातोंको स्वप्न समझा। दैत्योंके कहे हुए वचनोंपर विचार करके दुर्बुद्धि दुर्योधनके मनमें यह संकल्प उदित हुआ कि -मैं युद्धमें पाण्डवोंको जीत लूँगा'

Merenungkan kata-kata yang diucapkan para Dānava, timbullah tekad dalam diri Duryodhana yang berakal sesat: “Aku akan menaklukkan para Pāṇḍava di medan perang.”

Verse 326

अमन्यत वधे युक्तान्‌ समर्थाश्व सुयोधन: । दुर्योधनने यह मान लिया कि संशप्तकगण तथा कर्ण ये शत्रुधाती अर्जुनके वधमें लगे हुए हैं और इसके लिये वे समर्थ हैं

Suyodhana (Duryodhana) menyimpulkan bahwa para Saṁśaptaka bersama Karṇa telah terikat pada tugas membunuh Arjuna dan bahwa mereka sanggup melaksanakannya.

Verse 336

विनिर्जये पाण्डवानाम भवद्‌ भरतर्षभ । जनमेजय! इस प्रकार उस खोटी बुद्धिवाले धृतराष्ट्रपुत्रके मनमें पाण्डवोंपर विजय पानेकी दृढ़ आशा हो गयी

Wahai Janamejaya, banteng di antara keturunan Bharata—demikianlah, ketika para Pāṇḍava dianggap telah dikalahkan, timbullah dalam benak putra Dhṛtarāṣṭra yang sesat budi itu harapan yang teguh untuk meraih kemenangan atas mereka.

Verse 343

अर्जुनस्य वधे क्रूरां करोति सम तदा मतिम्‌ । इधर कर्ण भी नरकासुरकी अन्तरात्मासे आविष्टचित्त होनेके कारण अर्जुनका वध करनेके लिये क्रूरतापूर्ण संकल्प करने लगा

Waiśampāyana berkata: Saat itu ia membentuk tekad yang keras dan tanpa belas kasihan untuk membinasakan Arjuna. Dikuasai dari dalam—batinnya seakan dirasuki pengaruh yang terkait dengan Narakāsura—Karna pun berpaling pada ketetapan yang kejam untuk membunuh Arjuna.

Verse 356

रजस्तमो भ्यामाक्रान्ता: फाल्गुनस्य वधैषिण: । इसी प्रकार राक्षसोंसे आविष्टचित्त होकर वे संशप्तक वीर भी रजोगुण और तमोगुणसे आक्रान्त हो अर्जुनको मार डालनेकी इच्छा रखने लगे

Waiśampāyana berkata: Dikuasai oleh rajas dan tamas, mereka pun bernafsu membunuh Phālguna (Arjuna). Dengan batin yang terseret amuk laksana rākṣasa, para kesatria Saṁsaptaka itu juga mematok kehendak untuk menewaskan Arjuna.

Verse 366

न तथा पाण्डुपुत्राणां स्नेहवन्तो विशाम्पते । राजन! भीष्म, द्रोण और कृपाचार्य आदिके मनपर भी दानवोंने अधिकार कर लिया था। अतः पाण्डवोंके प्रति उनका भी वैसा स्नेह नहीं रह गया

Waiśampāyana berkata: “Wahai pelindung rakyat, kasih sayang mereka kepada putra-putra Pāṇḍu tidak lagi seperti semula. O Raja, bahkan batin Bhīṣma, Droṇa, Kṛpa, dan para sesepuh lainnya telah berada di bawah pengaruh yang bersifat demoni; karena itu kelembutan lama mereka kepada para Pāṇḍava pun memudar.”

Verse 473

व्यपेता भ्रघने काले द्यौरिवाव्यक्तशारदी । शत छत्र, पताका, शुभ चँवर, रथ, हाथी और पैदल योद्धाओंसे भरी हुई वह कौरव- सेना शरत्कालमें कुछ-कुछ व्यक्त शारदीय सुषमासे सुशोभित आकाशकी भाँति शोभा पा रही थी

Waiśampāyana berkata: Setelah kelam yang pekat berlalu, bala Kaurava—penuh ratusan payung kebesaran, panji-panji, kipas yak yang bertuah, kereta, gajah, dan prajurit berjalan kaki—tampak gemilang. Laksana langit musim gugur yang berangsur jernih dan indah, demikian pula pasukan itu pada musim gugur memancarkan terang yang tertata.

Frequently Asked Questions

The chapter frames a dharma-saṅkaṭa between urgent protective retaliation (to recover Draupadī and restore violated order) and the need for disciplined conduct—especially regulating speech and action so that response remains lawful and purposeful rather than purely reactive.

Leadership is measured by containment: even when provoked by severe wrongdoing, a ruler must convert grief and anger into coordinated action, maintaining ethical speech and clarity of judgment while fulfilling protective duty.

No explicit phalaśruti is presented here; the meta-level function is narrative-ethical—using omens, messenger testimony, and Yudhiṣṭhira’s corrective speech as an interpretive guide to how dharma is enacted under crisis.