
Daitya-āśvāsana of Duryodhana; Karṇa’s assurance and the mobilization of the Kaurava host
Upa-parva: Duryodhana–Prāyopaveśana-nivāraṇa (Daitya-āśvāsana episode)
The chapter opens with dānavas addressing Duryodhana, who has adopted a hazardous resolve of prāyopaveśana. They characterize the act as contrary to purpose and laden with reputational harm, urging restraint and steadiness. They then present a cosmological reassurance: Duryodhana’s body is described as divinely constituted—crafted through ascetic acquisition and extraordinary materials—implying he is not merely human and is therefore destined for a larger role. They forecast intensified conflict through the assertion that various warriors will be internally overpowered/impelled to fight without ordinary attachments, including the Saṃśaptakas, who are portrayed as oriented toward Arjuna’s destruction. A strategic thread follows concerning Karṇa and Arjuna: the text anticipates Karṇa’s confrontation with Kṛṣṇa–Arjuna, the intervention of Indra (Vajrī) to remove Karṇa’s natural protections, and the deployment of numerous daitya/rākṣasa forces as supportive agents. After the daityas depart, Duryodhana interprets the episode as dreamlike yet emerges with firm resolve to defeat the Pandavas. Karṇa later reinforces this resolve, arguing that death cannot secure victory and promising to kill Arjuna. The chapter concludes with Duryodhana organizing a vast, well-appointed army and returning toward his city amid auspicious acclamations and the visible pageantry of royal power.
Chapter Arc: हस्तिनापुर के भीतर एक नया षड्यंत्र जन्म लेता है—कर्ण और शकुनि धृतराष्ट्र के पास जाकर द्वैतवन की ‘घोषयात्रा’ (गोधन-निरीक्षण/विहार) का प्रस्ताव रखते हैं, मानो यह केवल मनोरंजन हो। → शकुनि दुर्योधन के लिए ‘मृगया’ और वन-प्रवास को समयोचित बताकर धृतराष्ट्र की शंका को धीरे-धीरे ढीला करता है; साथ ही पहले से ‘समंग’ नामक ग्वाले को सिखा-पढ़ाकर व्यवस्था पक्की कर दी जाती है—यात्रा दिखती सरल है, पर भीतर से योजनाबद्ध। → शकुनि के तर्कों से दबे धृतराष्ट्र अनिच्छा से ही सही, दुर्योधन को मंत्रियों सहित जाने की अनुमति दे देते हैं—यही क्षण आगे के अपमान-योजनाओं और वन में होने वाले संकटों का द्वार खोलता है। → आज्ञा पाकर दुर्योधन कर्ण के साथ, विशाल सेना और वाहनों सहित नगर से निकलता है; दो कोस दूर पड़ाव डालकर आगे द्वैतवन-सरोवर की ओर प्रस्थान करता है। → द्वैतवन की ओर बढ़ती यह राजसी यात्रा किसे देखने/दुखाने के लिए है—और वन में कौन-सा अनपेक्षित प्रतिरोध इसका स्वागत करेगा?
Verse 1
हि >> आय न (हुक है 7 7 एकोनचत्वारिशर्दाधिकद्विशततमो< ध्याय: कर्ण आदिके द्वारा द्वैतवनमें जानेका प्रस्ताव, राजा धृतराष्ट्रकी अस्वीकृति, शकुनिका समझाना, धृतराष्ट्रका अनुमति देना तथा दुर्योधनका प्रस्थान वैशम्पायन उवाच धृतराष्ट्र ततः सर्वे ददृशुर्जनमेजय । पृष्टवा सुखमथो राज्ञ: पृष्टा राज्ञा च भारत,वैशम्पायनजी कहते हैं--भरतनन्दन जनमेजय! तदनन्तर वे सब लोग राजा धृतराष्ट्रसे मिले। उन्होंने राजाकी कुशल पूछी तथा राजाने उनकी
Vaiśampāyana berkata: “Wahai Janamejaya, sesudah itu mereka semua menemui Raja Dhṛtarāṣṭra. Setelah menanyakan kesejahteraan sang raja, mereka pun ditanyai kembali tentang keadaan mereka oleh raja, wahai keturunan Bharata.”
Verse 2
ततस्तैर्विहित: पूर्व समज्रो नाम बल्लव: । समीपस्थास्तदा गावो धृतराष्टे न्न्यवेदयत्,उन लोगोंने समंग नामक एक ग्वालेको पहलेसे ही सिखा-पढ़ाकर ठीक कर लिया था। उसने राजा धृतराष्ट्रकी सेवामें निवेदन किया कि महाराज! आजकल आपकी गौएँ समीप ही आयी हुई हैं!
Kemudian, setelah sebelumnya mereka melatih dan menyiapkan seorang gembala bernama Samajra, ia mendekati Raja Dhṛtarāṣṭra dan menyampaikan: “Wahai Baginda, saat ini sapi-sapi paduka telah datang dan berada di dekat sini.”
Verse 3
अनन्तरं च राधेय: शकुनिश्च विशाम्पते । आहतुः पार्थिवश्रेष्ठं धृतराष्ट्र जनाधिपम्,जनमेजय! इसके बाद कर्ण और शकुनिने राजाओंमें श्रेष्ठ जननायक धृतराष्ट्रसे कहा --
Wahai Janamejaya, kemudian Karṇa putra Rādhā dan Śakuni berbicara kepada Dhṛtarāṣṭra, penguasa manusia dan yang utama di antara para raja.
Verse 4
रमणीयेषु देशेषु घोषा: सम्प्रति कौरव । स्मारणे समय: प्राप्तो वत्सानामपि चाडुकनम्,“कुरुराज! इस समय हमारी गौओंके स्थान रमणीय प्रदेशोंमें हैं। यह समय गौओं और बछड़ोंकी गणना करने तथा उनकी आयु, रंग, जाति एवं नामका ब्यौरा लिखनेके लिये भी अत्यन्त उपयोगी है
“Wahai Kaurava, kini perkemahan ternak kita berada di negeri-negeri yang elok. Inilah saat yang tepat untuk menghitung sapi-sapi dan anak-anaknya serta mencatat rinciannya.”
Verse 5
मृगया चोचिता राजन्नस्मिन् काले सुतस्य ते । दुर्योधनस्य गमनं समनुज्ञातुमहसि,“राजन! इस समय आपके पुत्र दुर्योधनके लिये हिंसक पशुओंके शिकार करनेका भी उपयुक्त अवसर है। अतः आप इन्हें द्वैतवनमें जानेकी आज्ञा दीजिये”
Waiśampāyana berkata: “Wahai Raja, inilah saat yang tepat bagi putramu Duryodhana untuk menekuni olahraga kerajaan, yakni berburu. Karena itu, patutlah engkau mengizinkannya berangkat menuju hutan.”
Verse 6
धृतराष्ट उवाच मृगया शोभना तात गवां हि समवेक्षणम् । विश्रम्भस्तु न गन्तव्यो बल्लवानामिति स्मरे,धृतराष्ट्र बोले--तात! हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेका प्रस्ताव सुन्दर है। गौओंकी देख-भालका काम भी अच्छा ही है; परंतु ग्वालोंकी बातोंपर विश्वास नहीं करना चाहिये, यह नीतिका वचन है, जिसका मुझे स्मरण हो आया है
Dhṛtarāṣṭra berkata: “Anakku, usul berburu itu memang elok, dan mengawasi ternak pun pekerjaan yang terpuji. Namun aku teringat sebuah petuah kenegaraan: jangan menaruh kepercayaan pada para gembala.”
Verse 7
ते तु तत्र नरव्याप्रा: समीप इति नः श्रुतम् अतो नाभ्यनुजानामि गमन तत्र वः स्वयम्,मैंने सुना है कि नरश्रेष्ठ पाण्डव भी इन दिनों वहीं कहीं आस-पास ठहरे हुए हैं; अतः तुमलोगोंको मैं स्वयं वहाँ जानेकी आज्ञा नहीं दे सकता
Kami mendengar bahwa para Pāṇḍava—manusia-manusia unggul itu—sedang tinggal di sekitar wilayah yang sama. Karena itu aku tidak dapat mengizinkan kalian pergi ke sana atas kehendak sendiri.
Verse 8
छटद्दाना निर्जितास्ते तु कर्शिताश्व महावने । तपोनित्याश्न राधेय समर्थाश्ष महारथा:,राधानन्दन! पाण्डव छलपूर्वक हराये गये हैं। महान् वनमें रहकर उन्हें बड़ा कष्ट भोगना पड़ा है। वे निरन्तर तपस्या करते रहे हैं और अब विशेष शक्तिसम्पन्न हो गये हैं। महारथी तो वे हैं ही
Wahai putra Rādhā, para Pāṇḍava itu dikalahkan lewat tipu daya dan terkikis oleh derita di rimba besar. Mereka tekun bertapa tanpa henti; kini mereka menjadi semakin berdaya—dan bagaimanapun mereka adalah para mahāratha, kesatria kereta perang agung.
Verse 9
धर्मराजो न संक्रुद्धयेद् भीमसेनस्त्वमर्षण: । यज्ञसेनस्य दुहिता तेज एव तु केवलम्,माना कि धर्मराज युधिष्ठिर क्रोध नहीं करेंगे, परंतु भीमसेन तो सदा ही अमर्षमें भरे रहते हैं और राजा ट्रुपदकी पुत्री कृष्णा भी साक्षात् अग्निकी ही मूर्ति है
Raja Yudhiṣṭhira, penegak dharma, tidak akan mudah tersulut amarah; tetapi Bhīmasena tak tahan penghinaan dan cepat murka. Dan Kṛṣṇā, putri Yajñasena (Drupada), bagaikan semata-mata nyala kemilau api.
Verse 10
यूयं चाप्यपराध्येयु्दर्पमोहसमन्विता: । ततो विनिर्दहेयुस्ते तपसा हि समन्विता:,तुमलोग तो अहंकार और मोहमें चूर रहते ही हो; अतः उनका अपराध अवश्य करोगे। उस दशामें वे तुम्हें भस्म किये बिना नहीं छोड़ेंगे। क्योंकि उनमें तपःशक्ति विद्यमान है
Dibutakan oleh kesombongan dan delusi, kalian pun pasti akan melakukan pelanggaran. Maka para pertapa itu—berbekal daya tapa—takkan membiarkan kalian pergi tanpa membakar kalian (dengan kekuatan rohani mereka).
Verse 11
अथवा सायुधा वीरा मन्युनाभिपरिप्लुता: । सहिता बद्धनिस्त्रिंशा दहेयु: शस्त्रतेजसा
Atau para pahlawan itu—bersenjata dan diliputi amarah—dapat bersatu, menghunus pedang, lalu membakar segalanya dengan kedahsyatan daya senjata mereka.
Verse 12
अथवा, उन वीरोंके पास अस्त्र-शस्त्रोंकी भी कमी नहीं है। तुम्हारे प्रति उनका क्रोध सदा ही बना रहता है। वे तलवार बाँधे सदा एक साथ रहते हैं; अतः वे अपने शस्त्रोंके तेजसे भी तुम्हें दग्ध कर सकते हैं ।। अथ यूय॑ बहुत्वात् तानभियात कथंचन । अनार्य परमं तत् स्यादशक््यं तच्च वै मतम्,यदि संख्यासे अधिक होनेके कारण तुमने ही किसी प्रकार उनपर चढ़ाई कर दी तो यह भी तुम्हारी बड़ी भारी नीचता ही समझी जायगी। मेरी समझमें तो तुमलोगोंका पाण्डवोंपर विजय पाना असम्भव ही है
Dhṛtarāṣṭra berkata: “Atau para pahlawan itu sama sekali tidak kekurangan senjata dan perlengkapan perang. Amarah mereka terhadap kalian selalu menyala. Dengan pedang tergantung, mereka senantiasa bersama; karena itu, oleh kilau dan daya senjata mereka pun mereka dapat membakar kalian. Dan bila, bersandar pada jumlah kalian yang lebih banyak, kalian entah bagaimana maju menyerang mereka, itu akan menjadi puncak tindakan tak mulia. Menurut penilaianku, kemenangan kalian atas para Pāṇḍava adalah mustahil.”
Verse 13
उषितो हि महाबाहुरिन्द्रलोके धनंजय: । दिव्यान्यस्त्राण्यवाप्याथ तत:ः प्रत्यागतो वनम्,महाबाहु धनंजय इन्द्रलोकमें रह चुके हैं और वहाँसे दिव्यास्त्रोंकी शिक्षा लेकर वनमें लौटे हैं
Dhṛtarāṣṭra berkata: “Sungguh, Dhanañjaya (Arjuna) yang berlengan perkasa telah tinggal di dunia Indra; setelah memperoleh ajaran tentang senjata-senjata ilahi di sana, kini ia kembali lagi ke hutan.”
Verse 14
अकृतास्त्रेण पृथिवी जिता बीभत्सुना पुरा । कि पुनः स कृतास्त्रोडद्य न हन्याद् वो महारथ:,पहले जब अर्जुनको दिव्यास्त्र नहीं प्राप्त हुए थे, तभी उन्होंने सारी पृथ्वीको जीत लिया था। अब तो महारथी अर्जुन दिव्यास्त्रोंके विद्वान् हैं, ऐसी दशामें वे तुम्हें मार डालें, यह कौन बड़ी बात है?
Dhṛtarāṣṭra berkata: “Dahulu, ketika Bībhatsu (Arjuna) belum menguasai senjata-senjata ilahi, ia tetap menaklukkan bumi. Maka betapa lebih lagi sekarang, ketika ia terlatih dalam panah-missil ilahi—apa hebatnya bila sang mahāratha itu membunuh kalian?”
Verse 15
अथवा मद्वच: श्रुत्वा तत्र यत्ता भविष्यथ | उद्विग्नवासो विश्रम्भाद् दुःखं तत्र भविष्यति,अथवा मेरी बात सुनकर तुमलोग वहाँ यदि अपनेको काबूमें रखते हुए सावधानीके साथ रह सको, तो भी यह विश्वास करके कि ये लोग सत्यवादी होनेके कारण हमें कष्ट नहीं देंगे, वनवाससे उद्विग्न हुए पाण्डवोंके बीचमें निवास करना तुम्हारे लिये दुःखदायी ही होगा
Atau, sekalipun setelah mendengar ucapanku kalian mampu menahan diri dan tinggal di sana dengan penuh kewaspadaan, tetap saja—dengan bersandar pada keyakinan bahwa “mereka orang-orang yang berkata benar, maka takkan mencelakai kita”—tinggal di tengah para Pāṇḍava yang telah gelisah oleh hidup di rimba niscaya akan menjadi sumber derita bagi kalian.
Verse 16
अथवा सैनिका: केचिदपकुर्युर्युधिष्ठिरम् । तदबुद्धिकृतं कर्म दोषमुत्पादयेच्च व:,अथवा यह भी सम्भव है कि तुमलोगोंके कुछ सैनिक युधिष्ठिरका अपमान कर बैठें और तुम्हारे अनजानमें किया गया यह अपराध तुमलोगोंके लिये हानिकारक हो जाय
Atau bisa saja beberapa prajuritmu menghina Yudhiṣṭhira; dan perbuatan salah itu—meski terjadi karena ketidaktahuan dan tanpa maksudmu—tetap dapat menimbulkan cela serta mendatangkan mudarat atas kalian.
Verse 17
तस्माद् गच्छन्तु पुरुषा: स्मारणायाप्तकारिण: । न स्वयं तत्र गमनं रोचये तव भारत,अतः भरतनन्दन! दूसरे विश्वसनीय पुरुष गौओंकी गणना करनेके लिये वहाँ चले जायँगे। स्वयं तुम्हारा वहाँ जाना मुझे ठीक नहीं जान पड़ता
Karena itu, biarlah orang-orang yang tepercaya—yang mampu menunaikan amanat—pergi ke sana untuk melakukan pencatatan dan perhitungan yang perlu (misalnya menghitung ternak). Adapun engkau, wahai Bhārata, aku tidak menyetujui jika engkau pergi sendiri.
Verse 18
शकुनिरुवाच धर्मज्ञ: पाण्डवो ज्येष्ठ: प्रतिज्ञातं च संसदि | तेन द्वादश वर्षाणि वस्तव्यानीति भारत,शकुनि बोला--भारत! ज्येष्ठ पाण्डव युधिष्ठिर धर्मात्मा हैं। उन्होंने भरी सभामें यह प्रतिज्ञा की है कि “हमें बारह वर्षोतक वनमें रहना है”
Śakuni berkata: “Wahai Bhārata, yang tertua di antara para Pāṇḍava, Yudhiṣṭhira, adalah seorang yang mengetahui dharma. Di hadapan sidang penuh ia telah mengikrarkan sumpah; karena itu, sesuai ketetapan, mereka harus tinggal dua belas tahun di rimba.”
Verse 19
अनुवृत्ताश्न ते सर्वे पाण्डवा धर्मचारिण: । युधिष्ठिरस्तु कौन्तेयो न न: कोप॑ करिष्यति
Mereka semua, para Pāṇḍava, teguh menapaki dharma. Dan Yudhiṣṭhira, putra Kuntī, menurut dugaanku tidak akan melampiaskan amarahnya kepada kita.
Verse 20
अन्य पाण्डव भी धर्मपर ही चलनेवाले हैं; अतः वे सब-के-सब युधिष्ठिरका ही अनुसरण करते हैं। कुन्तीनन्दन युधिष्ठिर हमलोगोंपर कदापि क्रोध नहीं करेंगे ।। मृगयां चैव नो गन्तुमिच्छा संवर्तते भृशम् । स्मारणं तु चिकीर्षामो न तु पाण्डवदर्शनम्,हमारी विशेष इच्छा केवल हिंसक पशुओंका शिकार खेलनेकी है। हमलोग वहाँ स्मरणके लिये केवल गौओंकी गणना करना चाहते हैं। पाण्डवोंसे मिलनेकी हमारी इच्छा बिलकुल नहीं है
Dhṛtarāṣṭra berkata: “Para Pāṇḍava yang lain pun teguh pada dharma; sebab itu mereka semua mengikuti Yudhiṣṭhira semata. Yudhiṣṭhira, putra Kuntī, takkan pernah murka kepada kita. Hasrat kami yang kuat hanyalah pergi berburu. Kami hanya hendak melakukan ‘penghitungan’ (dalih pemeriksaan dan pencatatan), bukan mencari pertemuan dengan para Pāṇḍava.”
Verse 21
न चानार्यसमाचार: कक्षित् तत्र भविष्यति | न च तत्र गमिष्यामो यत्र तेषां प्रतिश्रय:,हमारी ओरसे वहाँ कोई भी नीचतापूर्ण व्यवहार नहीं होगा। जहाँ पाण्डवोंका निवास होगा, उधर हमलोग जायाँगे ही नहीं
“Dan dari pihak kami tidak akan ada perilaku yang hina atau tak beradab di sana. Dan kami tidak akan pergi ke tempat di mana para Pāṇḍava bernaung dan tinggal.”
Verse 22
वैशम्पायन उवाच एवमुक्त: शकुनिना धृतराष्ट्रो जनेश्वर: । दुर्योधनं सहामात्यमनुजज्ञे न कामत:,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! शकुनिके ऐसा कहनेपर राजा धृतराष्ट्रने इच्छा न होते हुए भी मन्त्रियों-सहित दुर्योधनको वहाँ जानेकी आज्ञा दे दी
Vaiśampāyana berkata: Ketika Śakuni berkata demikian, Raja Dhṛtarāṣṭra, penguasa manusia, meski tidak menghendakinya, tetap memberi izin kepada Duryodhana—bersama para menterinya—untuk pergi ke sana.
Verse 23
अनुज्ञातस्तु गान्धारि: कर्णेन सहितस्तदा । निर्यया भरतश्रेष्ठो बलेन महता वृतः,धृतराष्ट्रकी आज्ञा पाकर गान्धारीपुत्र भरतश्रेष्ठ दुर्योधन कर्ण और विशाल सेनाके साथ नगरसे बाहर निकला
Setelah memperoleh izin, putra Gāndhārī—yang utama di antara keturunan Bharata, Duryodhana—berangkat saat itu juga bersama Karṇa, dikelilingi oleh bala tentara yang besar, keluar dari kota.
Verse 24
दुःशासनेन च तथा सौबलेन च धीमता । संवृतो भ्रातृभि श्षान्यै: स्त्रीभिश्वापि सहस्रश:,दुःशासन, बुद्धिमान् शकुनि, अन्यान्य भाइयों तथा सहस्ौरों स्त्रियोंसे घिरे हुए दुर्योधनने वहाँसे प्रस्थान किया
Dikelilingi oleh Duḥśāsana, oleh Saubala yang bijaksana (Śakuni), oleh saudara-saudara lainnya, dan juga oleh ribuan perempuan, Duryodhana pun berangkat dari tempat itu.
Verse 25
त॑ निर्यान्तं महाबाहुं द्रष्ट द्वैतवनं सर: । पौराश्चानुययु: सर्वे सहदारा वनं च तत्,द्वैतववन नामक सरोवर तथा वनको देखनेके लिये यात्रा करनेवाले महाबाहु दुर्योधनके पीछे समस्त पुरवासी भी अपनी स्त्रियोंको साथ लेकर गये
Waiśampāyana berkata: Ketika Duryodhana yang berlengan perkasa berangkat untuk melihat telaga di Dvaitavana beserta hutan itu, seluruh warga kota pun mengikutinya, membawa istri-istri mereka.
Verse 26
अष्टौ रथसहस्राणि त्रीणि नागायुतानि च । पत्तयो बहुसाहस्रा हयाश्व नवति: शता:,दुर्योधनके साथ आठ हजार रथ, तीस हजार हाथी, कई हजार पैदल और नौ हजार घोड़े गये
Bersama Duryodhana berangkat delapan ribu kereta perang, tiga ayuta gajah (tiga puluh ribu), banyak ribu prajurit pejalan kaki, dan sembilan ribu kuda.
Verse 27
शकटापणवेशाक्र वणिजो वन्दिनस्तथा । नराक्ष मृगयाशीला: शतशो5थ सहस्रश:,बोझ ढोनेके लिये सैकड़ों छकड़े, दुकानें तथा वेष-भूषाकी सामग्रियाँ भी साथ चलीं। वणिक्, वंदीजन तथा आखेटप्रिय मनुष्य सैकड़ों-हजारोंकी संख्यामें साथ गये
Bersama mereka turut bergerak ratusan kereta pengangkut beban, lapak-lapak pasar, serta perlengkapan busana dan perhiasan. Para pedagang, para pemuji (bard), dan orang-orang yang gemar berburu pun ikut serta dalam jumlah ratusan hingga ribuan.
Verse 28
ततः प्रयाणे नृपते: सुमहानभवत् स्वनः । प्रावषीव महावायोरुद्धतस्य विशाम्पते,राजन! राजा दुर्योधनके प्रस्थानकालमें बड़े जोरका कोलाहल हुआ, मानो वर्षाकालमें प्रचण्ड वायुका भयंकर शब्द सुनायी दे रहा हो
Wahai raja, ketika sang raja berangkat, timbullah gemuruh yang amat besar—laksana suara mengerikan angin dahsyat yang mengamuk pada musim hujan.
Verse 29
गव्यूतिमात्रे न्यवसद् राजा दुर्योधनस्तदा । प्रयातो वाहनै: सर्वैस्ततो द्वैतवनं सर:,नगरसे दो कोस दूर जाकर राजा दुर्योधनने पड़ाव डाल दिया। फिर वहाँसे समस्त वाहनोंके साथ द्वैतवन एवं सरोवरकी ओर प्रस्थान किया
Setelah menempuh jarak satu gavyūti, Raja Duryodhana berhenti dan berkemah. Dari sana, bersama seluruh kendaraan dan tunggangannya, ia berangkat menuju hutan Dvaitavana dan telaganya.
Verse 238
इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें घोषयात्राके सम्बन्धमें परामर्शविषयक दो सौ अड़तीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab ke-238 dari Mahābhārata bagian Vana Parva, dalam subbagian Ghoṣa-yātrā, yang membahas musyawarah mengenai ekspedisi para penggembala sapi.
Verse 239
इति श्रीमहाभारते वनपर्वणि घोषयात्रापर्वणि दुर्योधनप्रस्थाने एकोनचत्वारिंशदधिकद्विशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमह्ाभारत वनपर्वके अन्तर्गत घोषयात्रापर्वमें दुर्योधनप्रस्थानविषयक दो सौ उनतालीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikianlah, dalam Śrī Mahābhārata pada Vana Parva, bagian Ghoṣa-yātrā, bab tentang keberangkatan Duryodhana berakhir—yakni bab ke-239.
The dilemma is whether despair justifies self-termination (prāyopaveśana) for a ruler; the counsel reframes it as a breach of responsibility that damages collective welfare, legitimacy, and strategic continuity.
Steadfastness and disciplined judgment are treated as ethical instruments of governance: a leader must restrain self-destructive impulses, assess consequences for dependents, and act in ways that preserve order and purpose.
No formal phalaśruti is stated in this passage; the meta-level significance operates narratively—explaining a psychological turn toward renewed resolve and foreshadowing later confrontations through embedded strategic prophecy.