
द्रौपदी–सत्यभामा संवादः (Draupadī and Satyabhāmā on ethical household conduct)
Upa-parva: Draupadī–Satyabhāmā Saṃvāda (Discourse on conjugal ethics and household governance)
Vaiśaṃpāyana narrates a meeting where Draupadī and Satyabhāmā sit together in a cordial setting. Satyabhāmā privately asks Draupadī how she maintains the Pandavas’ affection and compliance, explicitly inquiring about vows, austerities, ritual baths, mantras, medicines, and other techniques. Draupadī rebukes the premise, refusing to endorse ‘asat-strī’ practices, and argues that a husband who suspects mantra-based control becomes distressed rather than peaceful. She warns of the dangers of clandestine powders and poisons and of the social harms attributed to such conduct. Draupadī then enumerates her method: abandoning ego, desire, and anger; practicing careful speech and demeanor; prioritizing service and attentiveness; observing domestic discipline (timely food, cleanliness, hospitality); honoring elders (especially Kuntī); and maintaining detailed oversight of resources, guests, and staff. She portrays household stability as achieved through tireless, transparent duty and respectful comportment. Satyabhāmā, hearing the dharma-consistent explanation, apologizes for her teasing inquiry and affirms Draupadī’s conduct.
Chapter Arc: मार्कण्डेय के वचन से कथा एक अनोखे ‘यज्ञ-विश्व’ में प्रवेश करती है—जहाँ अग्नि केवल ज्वाला नहीं, देव-स्वरूप नामों और विधानों का जीवित जाल है; भूर्-भुवः-स्वः आदि महाव्याहृतियों से ध्यान-मन्त्र का आरम्भ होता है। → अग्नियों के अनेक नाम, वंश-परम्परा और यज्ञ-प्रयोग क्रमशः खुलते हैं—‘शिव’ नामक अग्नि शक्तिपूजा में रत, ‘शम्भु’ और ‘आवसथ्य’ जैसे गृह्य-अग्नि-स्वरूप, दर्श-पौर्णमास, आग्रयण आदि कर्मों में किस अग्नि को हवि मिले—यह सूक्ष्म विधान कथा को गहन बनाता है; साथ ही चेतावनी आती है कि गृहस्थ अग्नियों का दावानल से संसर्ग हो जाए तो प्रायश्चित्त-इष्टि आवश्यक है। → विधि का शिखर उस क्षण पर आता है जब प्रायश्चित्त और ‘स्विष्टकृत्’ की परम भूमिका प्रतिपादित होती है—यज्ञ की त्रुटि को ‘स्विष्ट’ बनाकर पूर्ण करने वाला अग्नि-तत्त्व ही रक्षक है; ‘विश्वपति’ नामक अग्नि को वेदों में ‘सम्पूर्ण जगत् का पति’ कहे जाने का उल्लेख इस अध्याय का दार्शनिक उत्कर्ष बनता है। → अग्नि-नामों, उनके कर्म-क्षेत्र और शुद्धि-विधानों का संहिताबद्ध निष्कर्ष देकर मार्कण्डेय आंगिरसोपाख्यान के इस खण्ड को पूर्ण करते हैं—यज्ञ की शुद्धि, नाम-स्मरण और नियत हवि-समर्पण से लोक-व्यवस्था टिकती है। → आंगिरसोपाख्यान की अगली कड़ी में अग्नि-परम्परा/विधान का विस्तार आगे बढ़ने का संकेत रहता है।
Verse 1
हि >> मय न [हुक आज अप > भू:, भुवः, स्वः, महः, जनः--ये पाँच महाव्याहतियाँ हैं। ध्यानके लिये मन्त्रप्रयोग इस प्रकार है--'* भूरजन्नमग्नये पृथिव्यै स्वाहा इत्यादि। एकविशर्त्याधिकद्विशततमो< ध्याय: अग्निस्वरूप तप और भानु (मनु)-की संततिका वर्णन मार्कण्डेय उवाच गुरुभिरनियमैर्युक्तो भरतो नाम पावक: । अग्नि: पुष्टिमतिर्नाम तुष्ट: पुष्टिं प्रयच्छति । भरत्येष प्रजा: सर्वास्ततो भरत उच्यते,मार्कण्डेयजी कहते हैं--युथिष्ठिर! पूर्वोक्त भरत नामक अग्नि (जो शंयुके पौत्र और ऊर्जके पुत्र हैं) गुरुतर नियमोंसे युक्त हैं। वे संतुष्ट होनेपर पुष्टि प्रदान करते हैं, इसलिये उनका एक नाम 'पुष्टिमति” भी है। समस्त प्रजाका भरण-पोषण करते हैं, इसलिये उन्हें भरत कहते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Yudhiṣṭhira, ada Api suci bernama Bharata, yang terikat oleh disiplin berat serta laku tapa yang ketat. Ia juga disebut Puṣṭimati, sebab bila berkenan ia menganugerahkan pusti—kecukupan dan kemakmuran. Karena ia menopang dan memelihara semua makhluk, maka ia disebut ‘Bharata’—yang menanggung dan menyangga umat.”
Verse 2
अग्निर्यश्न शिवो नाम शक्तिपूजापरश्न सः | दुःखार्तानां च सर्वेषां शिवकृत् सततं शिव:,'शिव” नामसे प्रसिद्ध जो अग्नि हैं, वे शक्तिकी आराधनामें लगे रहते हैं। समस्त दुःखातुर मनुष्योंका सदा ही शिव (कल्याण) करते हैं, इसलिये उन्हें 'शिव” कहते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Api yang termasyhur dengan nama ‘Śiva’ senantiasa tekun dalam pemujaan Śakti. Ia terus-menerus mendatangkan kebaikan bagi semua yang dilanda duka; karena itulah ia disebut ‘Śiva’—sang pembawa kesejahteraan.”
Verse 3
तपसस्तु फल दृष्टवा सम्प्रवृद्धं तपो महत् | उद्धर्तुकामो मतिमान् पुत्रो जज्ञे पुरंदर:,तप (पाञ्चजन्य)-का तपस्याजनित फल (ऐश्वर्य) बढ़कर महान् हो गया है, यह देख उसे प्राप्त करनेकी इच्छासे मानो बुद्धिमान् इन्द्र ही पुरंदर नामसे उनके पुत्र होकर प्रकट हुए
Markandeya berkata: Melihat buah tapa itu telah tumbuh amat besar dan agung, Purandara yang bijaksana (Indra), ingin merenggutnya, lahir sebagai putra mereka dan menampakkan diri dengan nama Purandara.
Verse 4
* ऊष्मा चैवोष्मणो जज्ञे सोडग्निधूतस्य लक्ष्यते अग्निश्चापि मनुर्नाम प्राजापत्यमकारयत्,उन्हीं पांचजन्यसे “ऊष्मा” नामक अग्निका प्रादुर्भाव हुआ। जो समस्त प्राणियोंके शरीरमें ऊष्मा (गर्मी)-के द्वारा परिलक्षित होते हैं तथा तपके जो “मनु” नामक अग्निस्वरूप पुत्र हैं, उन्होंने 'प्राजापत्य” यज्ञ सम्पन्न कराया था
Markandeya berkata: Dari prinsip panas (ūṣman) itu sendiri lahirlah api bernama Ūṣmā, yang tampak sebagai kehangatan tubuh pada semua makhluk. Dan ada pula Agni bernama Manu—putra bertabiat api, penuh tapa—yang menyelenggarakan yajña Prajāpatya.
Verse 5
शम्भुमग्निमथ प्राहुब्राह्मिणा वेदपारगा: । आवसथशथ्यं द्विजा: प्राहुर्दीप्तमरग्निं महाप्रभम्,वेदोंके पारंगत दिद्वान् ब्राह्मण “शम्भु' तथा “आवसथ्य” नामक अग्निको देदीप्यमान तथा महान् तेज: पुछ्जसे सम्पन्न बताते हैं
Markandeya berkata: Para Brahmana yang menguasai Weda menyebut adanya api suci bernama Śambhu. Dan kaum dwija juga menyebut api lain bernama Āvasathya—menyala terang dan berkilau dengan kemuliaan besar.
Verse 6
ऊर्जस्करान् हव्यवाहान् सुवर्णसदृशप्रभान् । ततस्तपो हाजनयत् पज्च यज्ञसुतानिह,इस प्रकार जिन्हें यज्ञमें सोमकी आहुति दी जाती है, ऐसे पाँच पुत्रोंको तपने पैदा किया। वे सब-के-सब सुवर्ण-सदृश कान्तिमान, बल और तेजकी प्राप्ति करानेवाले तथा देवताओंके लिये हविष्य पहुँचानेवाले हैं
Markandeya berkata: Lalu tapa itu melahirkan di sini lima putra yajña—bercahaya laksana emas, pemberi daya dan semangat, serta pengangkut persembahan (havya) bagi para dewa.
Verse 7
प्रशान्तेअग्निर्महाभाग परिश्रान्तो गवां पति: । असुरान् जनयन् घोरानू् मर्त्याश्चवैव पृथग्विधान्,महाभाग! अस्तकालमें परिश्रमसे थके-माँदे सूर्यदेव (अग्निमें प्रविष्ट होनेके कारण) अग्निस्वरूप हो जाते हैं।* भयंकर असुरों तथा नाना प्रकारके मरणधर्मा मनुष्योंको उत्पन्न करते हैं। (उन्हें भी तपकी ही संततिके अन्तर्गत माना गया है)
Markandeya berkata: “Wahai mulia, ketika sang penguasa ternak (Surya) telah letih oleh jerih payahnya lalu menjadi tenang, ia menjelma sebagai api. Dari keadaan itu ia melahirkan Asura-asura yang mengerikan dan juga beragam jenis manusia fana.”
Verse 8
तपसश्च मनु पुत्र भानुं चाप्यड्रिरा: सृजत् । बृहद्धानु तु त॑ प्राहुब्राह्मिणा वेदपारगा:,तपके मनु (प्रजापति) स्वरूप पुत्र भानु नामक अग्निको अंगिराने भी (अपना प्रभाव अर्पित करके) नूतन जीवन प्रदान किया है। वेदोंके पारगामी विद्वान ब्राह्मण भानुको ही “बृहद्धानु' कहते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai putra Manu! Dengan daya tapa, Aṅgiras pun melahirkan Bhānu, sang Agni, dan menganugerahinya daya-teja yang diperbarui. Para Brāhmaṇa bijak yang telah menyeberangi samudra Weda menyebut Bhānu itu dengan nama ‘Bṛhaddhānu.’”
Verse 9
भानोर्भार्या सुप्रजा तु बृहद्धासा तु सूर्यजा । असूजेतां तु षट् पुत्रान् शृणू तासां प्रजाविधिम्,भानुकी दो पत्नियाँ हुईं--सुप्रजा और बृहद्धासा। इनमें बृहद्धासा सूर्यकी कन्या थी। इन दोनोंने छः पुत्रोंको जन्म दिया। इनके द्वारा जो संतानोंकी सृष्टि हुई, उसका वर्णन सुनो
Mārkaṇḍeya berkata: “Bhānu memiliki dua istri—Suprajā dan Bṛhaddhāsā; dan Bṛhaddhāsā adalah putri Sūrya. Dari keduanya lahir enam putra. Kini dengarkan bagaimana keturunan mereka berkembang.”
Verse 10
दुर्बलानां तु भूतानामसून् यः सम्प्रयच्छति । तमनग्निं बलदं प्राहुः प्रथमं भानुतः सुतम्,जो दुर्बल प्राणियोंको प्राण एवं बल प्रदान करते हैं, उन्हें 'बलद' नामक अग्नि बताया जाता है। ये भानुके प्रथम पुत्र हैं
Sang Agni yang menganugerahkan napas hidup dan kekuatan kepada makhluk yang lemah disebut Balada, “Pemberi Kekuatan”. Dialah putra sulung Bhānu.
Verse 11
यः प्रशान्तेषु भूतेषु मन्युर्भवति दारुण: । अग्नि: स मन्युमान्नाम द्वितीयो भानुत: सुत:,जो शान्त प्राणियोंमें भयंकर “क्रोध” बनकर प्रकट होते हैं, वे 'मन्युमान्” नामक अग्नि भानुके द्वितीय पुत्र हैं
Api yang menjelma sebagai amarah dahsyat, bahkan di antara makhluk yang tenang, disebut Manyumān. Dialah putra kedua Bhānu.
Verse 12
दर्शे च पौर्णमासे च यस्येह हविरुच्यते । विष्णु्नामेह यो<ग्निस्तु धृतिमान्नाम सोडज्लिरा:,यहाँ जिनके लिये दर्श तथा पौर्णमास यागोंमें हविष्य-समर्पणका विधान पाया जाता है, उन अग्निका नाम “विष्णु” है। वे “अंगिरा” गोत्रीय माने गये हैं। उन्हींका दूसरा नाम “धृतिमान' अग्नि है (ये भानुके तीसरे पुत्र हैं)
Api suci yang baginya di dunia ini persembahan havis ditetapkan dalam upacara Darśa (bulan baru) dan Paurṇamāsa (bulan purnama) dikenal dengan nama “Viṣṇu”. Ia dipandang berasal dari garis Aṅgiras, dan juga disebut “Dhṛtimān”, yang teguh.
Verse 13
३ इन्द्रेण सहितं यस्य हविराग्रयणं स्मृतम् । अग्निराग्रयणो नाम भानोरेवान्वयस्तु सः
Mārkaṇḍeya berkata: “Dia yang persembahan pertama (āgrayaṇa) havis-nya dikenang dilakukan bersama Indra disebut ‘Agni-Āgrayaṇa’; dan garis keturunannya sungguh ditelusurkan dari Bhānu (Sang Surya).”
Verse 14
इन्द्रसहित जिनके लिये आग्रयण (नूतन अद्नद्वारा सम्पन्न होनेवाले यज्ञ) कर्ममें हविष्य- अर्पणका विधान है, वे “आग्रयण' नामक अग्नि भानुके ही (चौथे) पुत्र हैं ।। चातुर्मास्येषु नित्यानां हविषां योनिरग्रह: । चतुर्भि: सहित: पुत्रैर्भानोरेवान्वय: स्तुभ:,चातुर्मास्य यज्ञोंमें नित्य विहित आग्नेय आदि आठ हविष्योंके जो उद्धवस्थान हैं, उनका नाम “अग्रह' है। (वे ही वैश्वदेव पर्वमें प्रधान विश्वदेव नामक अग्नि हैं--से भानुके पाँचवें पुत्र हैं) 'स्तुभ” नामक अग्नि भी भानुके ही पुत्र हैं। पहले कहे हुए चार पुत्रोंके साथ जो ये अग्रह (वैश्वदेव) और स्तुभ हैं, इन्हें मिलाकर भानुके छ: पुत्र हैं
Mārkaṇḍeya berkata: Dalam korban Cāturmāsya, persembahan-persembahan yang ditetapkan sebagai nitya memiliki sumber yang disebut Agraha. Stubha pun termasuk dalam garis Bhānu; bersama empat putra Bhānu yang telah disebutkan, Agraha dan Stubha juga dihitung sebagai keturunannya.
Verse 15
निशा त्वजनयत् कन्यामग्नीषोमाबुभौ तथा । मनोरेवाभवद् भार्या सुषुवे पडच पावकान्,मनु (भानु)-की ही एक तीसरी पत्नी थी, जिसका नाम था निशा। उसने एक कन्या और दो पुत्रों-को जन्म दिया। (कन्याका नाम “रोहिणी” तथा) पुत्रोंके नाम थे--अग्नि और सोम, इनके सिवा, निशाने पाँच अग्निस्वरूप पुत्र और भी उत्पन्न किये। (जिनके नाम क्रमश: इस प्रकार हैं--वैश्वानर, विश्वपति, सब्निहित, कपिल और अग्रणी)
Markandeya berkata: Niśā melahirkan seorang putri, dan juga dua putra—Agni dan Soma. Ia menjadi istri Manu dan melahirkan lima putra yang bersifat api.
Verse 16
पूज्यते हविषाग्रयेण चातुर्मास्येषु पावक: । पर्जन्यसहित: श्रीमाननिनेर्वेश्वानरस्तु सः,चातुर्मास्य यज्ञोंमें प्रधान हविष्यद्वारा पर्जन्यसहित जिनकी पूजा की जाती है, वे कान्तिमान् वैश्वानर नामक अग्नि (मनुके प्रथम पुत्र) हैं
Mārkaṇḍeya berkata: Dalam ritus musiman Cāturmāsya, Pāvaka (Api Suci) dipuja dengan persembahan yang utama. Ia yang bercahaya, dipuja bersama Parjanya, adalah Vaiśvānara—putra Anini.
Verse 17
अस्य लोकस्य सर्वस्य य: प्रभु: परिपठ्यते । सोअन्निर्विश्वपतिर्नाम द्वितीयो वै मनो: सुत:
Mārkaṇḍeya berkata: “Dia yang dilantunkan dan dikenang sebagai penguasa seluruh dunia ini bernama Anirviśvapati; dialah putra kedua Manu.”
Verse 18
कन्या सा रोहिणी नाम हिरण्यकशिपो: सुता
Mārkaṇḍeya berkata: “Gadis itu bernama Rohiṇī; ia adalah putri Hiraṇyakaśipu.”
Verse 19
कर्मणासौ बभौ भार्या स वह्नि: स प्रजापति: । मनुकी कन्या भी *स्विष्टकृत” ही मानी गयी है। उसका नाम रोहिणी है; वह मनुकी कुमारी पुत्री किसी अशुभ कर्मके कारण हिरण्यकशिपुकी पत्नी हुई थी। वास्तवमें “मनु” ही वह्नि है और वे ही 'प्रजापति' कहे गये हैं ।। १८ $ ।। प्राणानाश्रित्य यो देहं प्रवर्तयति देहिनाम् । तस्य संनिहितो नाम शब्दरूपस्य साधन:,जो देहधारियोंके प्राणोंका आश्रय लेकर उनके शरीरको कार्यमें प्रवृत्त करते हैं, उनका नाम है, 'संनिहित” अग्नि। ये मनुके तीसरे पुत्र हैं। इनके द्वारा शब्द तथा रूपको ग्रहण करनेमें सहायता मिलती है
Mārkaṇḍeya berkata: “Prinsip ilahi yang, bersandar pada napas kehidupan (prāṇa), menggerakkan tubuh para makhluk berjasad untuk beraktivitas disebut Saṃnihita, ‘Api yang Bersemayam’. Dialah sarana bagi penangkapan dan bekerjanya bunyi serta rupa.”
Verse 20
शुक्लकृष्णगतिर्देवो यो बिभर्ति हुताशनम् । अकल्मष: कल्मषाणां कर्ता क्रोधाश्रितस्तु सः,जो दीप्तिमान् महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण- पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात् विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगतके कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अनिन हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं)
Mārkaṇḍeya berkata: “Sang dewa yang menjadi lintasan dan sandaran bagi jalan terang dan jalan gelap, yang memanggul serta memelihara Api Suci, yang sendiri tak bernoda namun menjadi pembentuk segala yang bernoda—ia bersemayam sebagai api dalam wujud amarah. Dialah Mahāpurusha yang bercahaya, dikenal para pertapa sebagai resi Kapila, penggagas Sāṅkhya dan Yoga.”
Verse 21
कपिलं परमर्षि च यं प्राहुर्यतय: सदा । अग्नि: स कपिलो नाम सांख्ययोगप्रवर्तक:,जो दीप्तिमान् महापुरुष, शुक्ल और कृष्ण गतिके आधार हैं, जो अग्निका धारण- पोषण करते हैं, जिनमें किसी प्रकारका कल्मष अर्थात् विकार नहीं है तथापि जो समस्त विकारस्वरूप जगतके कर्ता हैं, यति लोग जिनको सदा महर्षि कपिलके नामसे कहा करते हैं, जो सांख्ययोगके प्रवर्तक हैं वे क्रोधस्वरूप अग्निके आश्रय कपिल नामक अनिन हैं। (ये मनुके चौथे पुत्र हैं)
Mārkaṇḍeya berkata: “Dia yang oleh para pertapa senantiasa disebut Kapila, sang resi tertinggi—dialah Agni sendiri, dikenal dengan nama Kapila, penggerak jalan Sāṅkhya dan Yoga. Walau tak bernoda, melalui dirinya dunia yang beraneka perubahan menjadi tersingkap; maka para bijak memujanya sebagai landasan api bagi pengetahuan dan pengendalian diri.”
Verse 22
अग्र॑ यच्छन्ति भूतानां येन भूतानि नित्यदा । कर्मस्विह विचित्रेषु सो5ग्रणीर्वद्विरुच्यते,मनुष्य आदि समस्त भूत-प्राणी सर्वदा भाँति-भाँतिके कर्मोमें जिनके द्वारा सब भूतोंके लिये अन्नका अग्रभाग अर्पण करते हैं वे अग्रणी नामक अग्नि (मनुके पाँचवें पुत्र) कहलाते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Dia yang olehnya, dalam beragam kewajiban di dunia ini, bagian pertama dari makanan senantiasa dipersembahkan demi semua makhluk—sehingga makhluk-makhluk terpelihara—dialah yang termasyhur sebagai ‘Agraṇī’, Sang Pemimpin.”
Verse 23
इमानन्यान् समसृजत् पावकान् प्रथितान् भुवि । अन्निहोत्रस्य दुष्टस्य प्रायश्षित्तार्थमुल्वणान्,मनुने अग्निहोत्र कर्ममें की हुई त्रुटिके प्रायश्चित्त [समाधान)-के लिये इन लोकविख्यात तेजस्वी अग्नियोंकी सृष्टि की, जो पूर्वोक्त अग्नियोंसे भिन्न हैं
Untuk penebusan kesalahan dalam upacara Agnihotra, Manu menciptakan pāvaka-pāvaka lain yang berbeda dari api- api terdahulu—api yang termasyhur di bumi karena kemilau dan dayanya.
Verse 24
संस्पृशेयुर्यदान्योन्यं कथज्चिद् वायुनाग्नय: । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै शुचये5ग्नये,यदि किसी प्रकार हवाके चलनेसे अग्नियोंका परस्पर स्पर्श हो जाय तो अष्टाकपाल (आठ कपालोंमें- संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए) पुरोडाशके द्वारा शुचि नामक अग्निके लिये इष्टि करनी (आहुति देनी) चाहिये
Bila karena hembusan angin api-api suci itu tanpa sengaja saling bersentuhan, hendaknya dilakukan iṣṭi bagi Agni yang bernama Śuci, dengan persembahan puroḍāśa aṣṭākapāla (delapan wadah).
Verse 25
दक्षिणानिनिर्यदा द्वाभ्यां संसजेत तदा किल | इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वै वीतयेडग्नये,जब दक्षिणाग्निका गार्हपत्य तथा हवनीय नामक दो अग्नियोंसे संसर्ग हो जाय, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कारपूर्वक तैयार किये हुए पुरोडाशद्वारा “वीति” नामक अग्निके लिये आहुति देनी चाहिये
Apabila Dakṣiṇāgni bersentuhan dengan dua api lainnya—Gārhapatya dan Āhavanīya—maka hendaknya dilakukan iṣṭi dengan puroḍāśa aṣṭākapāla bagi Agni yang bernama Vīti.
Verse 26
यद्यग्नयो हि स्पृश्येयुर्निवेशस्था दवाग्निना । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या तु शुचयेडग्नये,यदि गृहस्थित अग्नियोंका दावानलसे संसर्ग हो जाय तो मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा शुचि नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये
Jika api- api rumah tangga yang telah ditegakkan pada tempatnya bersentuhan dengan api rimba (dāvāgni), maka hendaknya dilakukan iṣṭi dengan caru yang telah disucikan dalam wadah aṣṭākapāla, dipersembahkan kepada Agni sebagai Śuci.
Verse 27
अग्निं रजस्वला वै स्त्री संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या वसुमते5ग्नये,यदि अनि्निहोत्र सम्बन्धी अग्निको कोई रजस्वला स्त्री छू दे तो वसुमान् अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुद्वारा आहुति देनी चाहिये
Bila seorang perempuan yang sedang haid menyentuh api suci yang terkait dengan Agnihotra, maka hendaknya dilakukan iṣṭi dengan caru yang telah disucikan dalam wadah aṣṭākapāla, dipersembahkan kepada Agni sebagai Vasumat.
Verse 28
मृत: श्रूयेत यो जीव: परेयु: पशवो यदा । इष्टिरशकपालेन कार्या सुरभिमतेडग्नये,यदि किसी प्राणीका मृत्युसूचक विलाप आदि सुनायी दे अथवा कुक्कुर आदि पशु उस अग्निका स्पर्श कर लें, उस दशामें मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा सुरभिमान् नामक अग्निकी प्रसन्नताके लिये होम करना चाहिये
Mārkaṇḍeya berkata: “Bila terdengar pertanda maut bagi seorang yang masih hidup—seperti ratapan dan semacamnya—atau bila hewan seperti anjing menyentuh api suci itu, maka pada keadaan demikian hendaklah dilakukan penebusan: sebuah iṣṭi, dengan puroḍāśa yang disiapkan pada delapan piring tanah liat, sebagai homa untuk menenteramkan Agni yang bernama ‘Surabhimān.’”
Verse 29
आर्तों न जुहुयादनिंे त्रिरात्र॑ यस्तु ब्राह्मण: । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या स्वादुत्तराग्नये,जो ब्राह्मण किसी पीड़ासे आतुर होकर तीन राततक अनिनिहोत्र न करे, उसे मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा “उत्तरर नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये
Mārkaṇḍeya berkata: “Bila seorang brāhmaṇa, karena derita, tidak mempersembahkan oblation ke dalam api suci selama tiga malam, maka hendaklah ia melakukan penebusan: sebuah iṣṭi, dengan caru yang disucikan dalam wadah tanah liat berpecahan delapan, dipersembahkan kepada api yang bernama ‘Uttara.’”
Verse 30
दर्श च पौर्णमासं च यस्य तिछेत् प्रतिष्ठितम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या पथिकृतेडग्नये
Mārkaṇḍeya berkata: “Bagi orang yang telah menegakkan dengan semestinya laku upacara bulan baru dan bulan purnama, hendaklah dilakukan sebuah iṣṭi dengan havis yang disucikan, disiapkan pada delapan pecahan bejana tanah liat, dipersembahkan kepada Agni yang bernama ‘Pathikṛt’, pelindung para pengembara.”
Verse 31
जिसका चालू किया हुआ दर्श और पौर्णमास याग बीचमें ही बंद हो जाय अथवा बिना आहुति किये ही रह जाय, उसे “पथिकृत” नामक अग्निके लिये मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत चरुके द्वारा होम करना चाहिए ।। सूतिकाग्निर्यदा चाग्निं संस्पृशेदग्निहोत्रिकम् । इष्टिरष्टाकपालेन कार्या चाग्निमतेडग्नये,जब सूतिकागृहकी अग्नि, अग्निहोत्रकी अग्निका स्पर्श कर ले, तब मिट्टीके आठ पुरवोंमें संस्कृत पुरोडाशद्वारा 'अग्निमान” नामक अग्निको आहुति देनी चाहिये
Mārkaṇḍeya berkata: “Bila upacara darśa dan paurṇamāsa yang telah dimulai terputus di tengah jalan, atau tertinggal tanpa persembahan, maka hendaklah dilakukan homa dengan caru yang disucikan pada delapan pecahan bejana tanah liat, dipersembahkan kepada Agni bernama ‘Pathikṛt.’ Dan bila api di kamar nifas (sūtikā) bersentuhan dengan api Agnihotra, maka hendaklah dilakukan iṣṭi-homa dengan puroḍāśa yang disucikan pada delapan wadah, dipersembahkan kepada Agni bernama ‘Agnimat.’”
Verse 173
ततः स्विष्ट॑ भवेदाज्यं स्विष्टकृत् परमस्तु सः । जो वेदोंमें सम्पूर्ण जगत॒के पति” कहे गये हैं, वे विश्वपति नामक अग्नि मनुके द्वितीय पुत्र हैं। उन्हींके प्रभावसे हविष्यकी सुन्दरभावसे आहुति-क्रिया सम्पन्न होती है; अतः वे परम स्विष्टकृत् (उत्तम अभीष्टकी पूर्ति करनेवाले) कहे जाते हैं
Mārkaṇḍeya berkata: “Sesudah itu, ghee menjadi sungguh-sungguh ‘terpersembahkan dengan baik’; sebab dialah Sviṣṭakṛt yang tertinggi—yang oleh kuasanya persembahan diselesaikan dengan indah dan sesuai tata. Karena itu ia dipuji sebagai penyempurna utama bagi yajña yang diidamkan beserta buahnya.”
Verse 220
इस प्रकार श्रीमह्या भारत वनपवकि अन्तर्गत मार्कण्डेयसमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्मानविषयक दो सौ बीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Demikian berakhir bab ke-220 dalam Vana Parva Mahābhārata, pada bagian Markandeya-Samāsya, yang memuat kisah Āṅgirasa. Kolofon penutup ini menandai tuntasnya satu rangkaian ajaran dan tutur-kisah, serta menghadirkan jeda untuk merenungkan makna dharma dan rohani dari peristiwa yang baru dipaparkan.
Verse 221
इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि आंगिरसोपाख्याने एकविंशत्यधिकद्वधिशततमो<5 ध्याय:,इस प्रकार श्रीमहाभारत वनपर्वके अन्तर्गत मार्कण्डेययमास्यापर्वमें आंगिरसोपाख्यानविषयक दो सौ इक्कीसवाँ अध्याय पूरा हुआ
Mārkaṇḍeya berkata: “Demikianlah, dalam Vana Parva Mahābhārata, pada bagian Markandeya-Samāsya, berakhir kisah yang dikenal sebagai Āṅgirasa Upākhyāna—yakni bab ke-221.” Dengan kata lain, kolofon ini menutup bab secara resmi, menandai rampungnya episode, dan mengajak pendengar menyimpan makna etisnya sebagai ajaran dharma dalam kitab rimba itu.
The dilemma concerns whether relational influence should be sought through covert techniques (mantras, medicines, coercive stratagems) or through ethically transparent conduct; Draupadī treats the former as corrosive to trust and peace within intimate life.
Sustainable concord arises from self-governance and service: controlling anger and desire, speaking carefully, honoring elders, maintaining hospitality and cleanliness, and managing resources responsibly—thereby making trust, not fear, the basis of stability.
No formal phalaśruti is stated; the closure functions as ethical validation through Satyabhāmā’s acknowledgment and apology, marking the discourse as dharma-consistent and socially commendable rather than ritually reward-framed.