Adhyaya 205
Vana ParvaAdhyaya 20556 Versesधर्म-पक्ष निर्णायक रूप से विजयी; ब्रह्मास्त्र-प्रयोग से युद्ध का पलड़ा कुवलाश्व की ओर झुकता है।

Adhyaya 205

मातापितृपूजन-प्रधानधर्मः (Primacy of Filial Service) — Mārkaṇḍeya’s Account of the Vyādha’s Instruction

Upa-parva: Mārkaṇḍeya–Vyādha–Brāhmaṇa Dharmopadeśa (Embedded Didactic Episode)

Mārkaṇḍeya recounts how the dharmātmā vyādha addresses a brāhmaṇa, affirming that the earlier counsel attributed to a devoted wife was correctly perceived and then redirecting the brāhmaṇa toward immediate ethical repair: he had left home without parental consent for Vedic recitation, causing his aged parents distress and blindness. The vyādha insists that the brāhmaṇa promptly propitiate and serve his parents, presenting this as the highest dharma. The brāhmaṇa acknowledges the truth of the rebuke, praises the vyādha’s virtue, and commits to filial service. He then questions the vyādha’s social condition, stating he does not regard him as intrinsically ‘śūdra’ and asks for the causal account. The vyādha begins a prior-life narrative: formerly a learned brāhmaṇa skilled in Veda and Vedāṅgas, he associated with a king adept in archery; during a hunt he shot an arrow that struck an ascetic ṛṣi by mistake. The enraged sage cursed him to be born as a cruel vyādha in a śūdra womb, establishing the karmic backstory that will continue beyond this chapter.

Chapter Arc: मार्कण्डेय युधिष्ठिर से कहते हैं—एक समय धुन्धु नामक महान असुर ने लोकों को भयभीत कर रखा था; उसी प्रसंग में धुन्धुकी की कठोर तपस्या और वर-प्राप्ति का वृत्तान्त आरम्भ होता है। → धुन्धुकी एक पाँव पर दीर्घकाल तक तप करती है; शरीर कृश होकर नसों का जाल-सा दिखने लगता है। ब्रह्मा प्रसन्न होकर वर देते हैं, और वह ऐसा वर माँगती है कि देव, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस—किसी के हाथों वह अवध्य रहे। इस वर से धुन्धु (असुर) का आतंक और भी अजेय-सा प्रतीत होने लगता है; देवताओं के विमान-समूह उस क्षेत्र में दिखाई देने लगते हैं, मानो आकाश स्वयं संकट का साक्षी हो। → राजर्षि कुवलाश्व अपने असंख्य पुत्रों सहित बालुका-समुद्र (रेत के महासागर) में धुन्धु से युद्ध करते हैं; पुत्र चारों ओर से शर, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और तीक्ष्ण खड्गों से घेरकर प्रहार करते हैं। लोक-कल्याण हेतु कुवलाश्व ब्रह्मास्त्र का प्रयोग कर निर्णायक आघात करते हैं और धुन्धु का वध होता है। → धुन्धु-वध के कारण कुवलाश्व ‘धुन्धुमार’ नाम से विख्यात होते हैं; उनकी कीर्ति भूमण्डल में फैलती है। मार्कण्डेय इस उपाख्यान को विष्णु-कीर्तनरूप पवित्र कथा बताकर उसका श्रवण-फल कहते हैं—धर्म, पुत्र-प्राप्ति, दीर्घायु और ऐश्वर्य की वृद्धि।

Shlokas

Verse 1

हू... “<(>9)) #::.3 25.२ चतुर्राधिकद्विशततमो< ध्याय: धुन्धुकी तपस्या और वरप्राप्ति, कुवलाश्चद्वारा धुन्धुका वध और देवताओंका कुवलाश्वचको वर देना मार्कण्डेय उदाच धुन्धुर्नाम महाराज तयो: पुत्रो महाद्युति: | स तपो5तप्यत महन्महावीर्यपराक्रम:,मार्कण्डेयजी कहते हैं--महाराज! उन्हीं दोनों मधु और कैटभका पुत्र धुन्धु है जो बड़ा तेजस्वी और महान्‌ बल-पराक्रमसे सम्पन्न है। उसने बड़ी भारी तपस्या की

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja agung, ada seorang bernama Dhundhu—putra Madhu dan Kaiṭabha—bercahaya dengan kemilau yang besar. Berbekal kekuatan dahsyat dan kepahlawanan yang unggul, ia menempuh tapa yang amat berat.”

Verse 2

अतिष्ठदेकपादेन कृशो धमनिसंततः । तस्मै ब्रह्मा ददौ प्रीतो वरं वव्रे स च प्रभुम्‌,वह दीर्घकालतक एक पैरसे खड़ा रहा। उसका शरीर इतना दुर्बल हो गया कि नस- नाड़ियोंका जाल दिखायी देने लगा। ब्रह्माजीने उसकी तपस्यासे संतुष्ट होकर उसे वर दिया। धुन्धुने भगवान्‌ ब्रह्मासे इस प्रकार वर माँगा--

Ia berdiri lama dengan satu kaki, hingga tubuhnya menjadi begitu kurus sehingga anyaman urat-uratnya tampak jelas. Brahmā, berkenan atas tapa itu, menganugerahinya sebuah anugerah; lalu ia memohonkan pilihannya kepada Sang Penguasa.

Verse 3

देवदानवयक्षाणां सर्पगन्धर्वरक्षसाम्‌ । अवध्यो5हं भवेयं वै वर एष वृतो मया,“'भगवन्‌! मैं देवता, दानव, यक्ष, सर्प, गन्धर्व और राक्षस किसीके हाथसे न मारा जाऊँ। मैंने आपसे यही वर माँगा है”

“Wahai Bhagavān, inilah anugerah yang kupilih: semoga aku tak dapat dibunuh oleh deva, dānava, yakṣa, ular, gandharva, maupun rākṣasa.”

Verse 4

एवं भवतु गच्छेति तमुवाच पितामह: । स एवमुक्तस्तत्पादौ मूर्ध्ना स्पृश्य जगाम ह,तब ब्रह्माजीने उससे कहा--'ऐसा ही होगा। जाओ।” उनके ऐसा कहनेपर धुन्धुने मस्तक झुकाकर उनके चरणोंका स्पर्श किया और वहाँसे चला गया

Sang Pitāmaha (Brahmā) berkata kepadanya, “Demikianlah; pergilah.” Mendengar itu, Dhundhu menundukkan kepala, menyentuh kaki Brahmā dengan hormat, lalu berangkat.

Verse 5

सतु धुन्धुर्वरं लब्ध्वा महावीर्यपराक्रम: । अनुस्मरन्‌ पितृवधं द्रुतं विष्णुमुपागमत्‌,जब धुन्धु वर पाकर महान्‌ बल और पराक्रमसे सम्पन्न हो गया, तब उसे अपने पिता मधु और कैटभके वधका स्मरण हो आया और वह शीघ्रतापूर्वक भगवान्‌ विष्णुके पास गया

Setelah memperoleh anugerah itu, Dhundhu pun menjadi berdaya besar dan unggul dalam kepahlawanan. Mengingat kematian ayahnya, ia segera bergegas mendatangi Bhagavān Viṣṇu.

Verse 6

स तु देवान्‌ सगन्धर्वान्‌ जित्वा धुन्धुरमर्षण: । बबाध सर्वानसकृद्‌ विष्णु देवांश्व वै भूशम्‌,धुन्धु अमर्षमें भरा हुआ था। उसने गन्धर्व-सहित सम्पूर्ण देवताओंको जीतकर भगवान्‌ विष्णु तथा अन्य देवताओंको बार-बार महान वष्ट देना प्रारम्भ किया

Dhundhu yang diliputi amarah membara menaklukkan para dewa beserta para Gandharwa; lalu berulang kali ia menindas mereka semua dengan kekerasan—bahkan menyerang Wisnu dan para dewa lainnya dengan ganas.

Verse 7

समुद्रे बालुकापूर्ण उज्जालक इति स्मृते । आगम्य च स वुष्टात्मा तं देशं भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ! वह दुष्टात्मा बालुकामय प्रसिद्ध उच्चालक समुद्रमें आकर रहने और उस देशके निवासियोंकों सताने लगा। राजन! वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर धरतीके भीतर बालूमें छिपकर वहाँ उत्तंकके आश्रममें भी उपद्रव करने लगा

Wahai yang termulia di antara keturunan Bharata! Di lautan ada hamparan berpasir yang dikenal sebagai Ujjālaka. Datang ke sana, makhluk berhati jahat itu menetap di wilayah itu dan mulai mengganggu para penghuninya.

Verse 8

बाधते सम परं शक्‍्त्या तमुत्तड़काश्रमं विभो । अन्तर्भूमिगतस्तत्र बालुकान्तहितस्तथा,भरतश्रेष्ठ! वह दुष्टात्मा बालुकामय प्रसिद्ध उच्चालक समुद्रमें आकर रहने और उस देशके निवासियोंकों सताने लगा। राजन! वह अपनी पूरी शक्ति लगाकर धरतीके भीतर बालूमें छिपकर वहाँ उत्तंकके आश्रममें भी उपद्रव करने लगा

Wahai yang perkasa! Makhluk jahat itu menindas pertapaan Uttaṅka dengan segenap kekuatannya. Di sana ia menyusup ke bawah tanah dan bersembunyi di dalam pasir, namun tetap menimbulkan kekacauan.

Verse 9

मधुकैटभयो: पुत्रो धुन्धुर्भीमपराक्रम: । शेते लोकविनाशाय तपोबलमुपाश्रित:

Dhundhu, putra Madhu dan Kaiṭabha, yang berdaya-gagah mengerikan, berbaring di sana dengan bersandar pada kekuatan tapa—berniat memusnahkan dunia-dunia.

Verse 10

एतस्मिन्नेव काले तु राजा सबलवाहन:,भरतश्रेष्ठ] इसी समय राजा कुवलाश्वने अपनी सेना, सवारी तथा पुत्रोंके साथ प्रस्थान किया। उनके साथ विप्रवर उत्तंक भी थे

Pada saat itulah sang raja, lengkap dengan pasukan dan tunggangannya, berangkat dengan kesiapan penuh.

Verse 11

उत्तड़कविप्रसहित: कुवलाश्वो महीपति: । पुत्रै: सह महीपाल: प्रययौ भरतर्षभ,भरतश्रेष्ठ] इसी समय राजा कुवलाश्वने अपनी सेना, सवारी तथा पुत्रोंके साथ प्रस्थान किया। उनके साथ विप्रवर उत्तंक भी थे

Kemudian Raja Kuvalāśva, penguasa bumi, berangkat bersama putra-putranya; bersamanya pula brahmana utama Uttanka—wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata.

Verse 12

सहसौरेकविंशत्या पुत्राणामरिमर्दन: । कुवलाश्वो नरपतिरन्वितो बलशालिनाम्‌,शत्रुमर्दन महाराज कुवलाश्व अपने इकक्‍्कीस हजार बलवान पुत्रोंकी साथ लेकर (सेनासहित) चले थे

Wahai penakluk musuh, Raja Kuvalāśva berangkat disertai putra-putranya yang perkasa—dua puluh satu ribu jumlahnya—bersama bala tentara yang kuat.

Verse 13

तमाविशत्‌ ततो विष्णुर्भगवांस्तेजसा प्रभु: । उत्तड़कस्य नियोगेन लोकानां हितकाम्यया,तदनन्तर उत्तंकके अनुरोधसे सम्पूर्ण जगत्‌का हित करनेके लिये सर्वसमर्थ भगवान्‌ विष्णुने अपने तेजोमय स्वरूपसे कुवलाश्वमें प्रवेश किया

Sesudah itu, demi kesejahteraan dunia-dunia, atas permohonan Uttanka, Bhagavān Viṣṇu, Sang Penguasa, memasuki Kuvalāśva dengan daya cahaya-Nya.

Verse 14

तस्मिन्‌ प्रयाते दुर्धर्षे देवि शब्दों महान भूत्‌ । एष श्रीमानवध्योउ्द्य धुन्धुमारो भविष्यति,उन दुर्धर्षवीर कुवलाश्वके यात्रा करनेपर देवलोकमें अत्यन्त हर्षपूर्ण कोलाहल होने लगा। देवता कहने लगे--'ये श्रीमान्‌ नरेश अवध्य हैं, आज धुन्धुको मारकर ये” “धुन्धुमार' नाम धारण करेंगे

Wahai Dewi, ketika pahlawan yang tak tertaklukkan itu berangkat, terdengarlah sorak sukacita besar di alam para dewa. Para dewa berseru, “Raja yang mulia ini hari ini tak terkalahkan; setelah membunuh Dhundhu, ia akan menyandang nama ‘Dhundhumāra.’”

Verse 15

दिव्यैश्व पुष्पैस्तं देवा: समन्तात्‌ पर्यवारयन्‌ । देवदुन्दुभयश्चापि नेदु: स्वयमनीरिता:,देवतालोग चारों ओरसे उनपर दिव्य फूलोंकी वर्षा करने लगे। देवताओंकी दुन्दुभियाँ स्वयं बिना किसी प्रेरणाके बज उठीं

Para dewa dari segala penjuru menghujaninya dengan bunga-bunga surgawi; dan genderang ilahi para dewa pun bergema dengan sendirinya, tanpa ada yang membunyikannya.

Verse 16

शीतश्च वायु: प्रववी प्रयाणे तस्य धीमत: । विपांसुलां महीं कुर्वन्‌ ववर्ष च सुरेश्वर:,उन बुद्धिमान्‌ राजा कुवलाश्वचके यात्राकालमें शीतल वायु चलने लगी। देवराज इन्द्र धरतीकी धूल शान्त करनेके लिये वर्षा करने लगे

Mārkaṇḍeya berkata— Ketika raja yang bijaksana itu berangkat menempuh perjalanan, angin sejuk pun mulai berhembus. Lalu Indra, penguasa para dewa, menurunkan hujan, meredakan debu di bumi dan menjadikan tanah bebas dari kepulan pasir—tanda mujur yang melindungi, menyokong upaya dharma, dan meringankan lelah perjalanan.

Verse 17

अन्तरिक्षे विमानादि देवतानां युधिष्ठिर । तत्रैव समदृश्यन्त धुन्धुर्यत्र महासुर:

Mārkaṇḍeya berkata— “Wahai Yudhiṣṭhira, di angkasa para dewa, kereta-kereta udara dan sejenisnya tampak di sana juga—tepat di tempat sang Asura agung Dhundhu berada.”

Verse 18

युधिष्ठिर! जहाँ महान्‌ असुर *धुन्धु” रहता था, वहीं आकाशमें देवताओंके विमान आदि दिखायी देने लगे ।। कुवलाश्चस्य धुन्धोश्व युद्धकौतूहलान्विता: । देवगन्धर्वसहिता: समवैक्षन्‌ महर्षय:,कुवलाश्व और धुन्धुका युद्ध देखनेके लिये उत्सुक हो देवताओं और गन्धर्वोंके साथ महर्षि भी आकर डट गये और वहाँकी सारी बातोंपर दृष्टिपात करने लगे

Mārkaṇḍeya berkata— “Wahai Yudhiṣṭhira, tepat di tempat sang raksasa perkasa Dhundhu berdiam, kereta-kereta langit para dewa tampak di angkasa. Ingin menyaksikan pertarungan antara Raja Kuvalāśva dan Dhundhu, para maharṣi pun datang bersama para dewa dan Gandharva; mereka berdiri tegap, mengamati dengan saksama segala yang akan terjadi.”

Verse 19

नारायणेन कौरव्य तेजसा55प्यायितस्तदा । स गतो नृपतिः: क्षिप्र॑ पुत्रैस्तै: सर्वतो दिशम्‌

Mārkaṇḍeya berkata— “Wahai keturunan Kuru, saat itu sang raja, dikuatkan dan disegarkan oleh sinar ilahi Nārāyaṇa, segera bergerak maju bersama putra-putranya, menyebar ke segala penjuru.”

Verse 20

कुवलाश्चस्य पुत्रैश्न तस्मिन्‌ वै बालुकार्णवे

Mārkaṇḍeya berkata— “Dan Kuvalāśva, bersama putra-putranya, berada di sana—di hamparan pasir yang luas bagaikan samudra.”

Verse 21

आसीदू घोर वपुस्तस्य बालुकान्तर्हितं महत्‌

Mārkaṇḍeya berkata: “Tampaklah wujudnya yang amat besar dan mengerikan, tersembunyi di dalam pasir.”

Verse 22

ततो धुन्धुर्महाराज दिशमावृत्य पश्चिमाम्‌

Kemudian Dhundhu, wahai raja agung, meluas dan menyelubungi penjuru barat.

Verse 23

कुवलाश्रचस्य पुत्रैस्तु सर्वतः परिवारित:,उस समय राजा कुवलाश्चके पुत्रोंने सब ओरसे घेरकर उसपर आक्रमण किया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धारवाले खड़ग--इन सबके द्वारा चोट खाकर महाबली धुन्धु क्रोधित हो गया और उनके चलाये हुए नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको वह क्रोधी असुर खा गया

Mārkaṇḍeya berkata: Lalu putra-putra Kuvalāśva mengepungnya dari segala arah dan melancarkan serangan. Dihantam panah-panah tajam serta pukulan gada, pentung, alu, kapak-perang, palang besi, tombak, dan pedang berkilau bermata tajam, Dhundhu yang perkasa menyala dalam murka. Dalam amarahnya, asura itu menelan aneka senjata—baik lontar maupun genggam—yang mereka lemparkan kepadanya.

Verse 24

अभिद्रुत: शरैस्ती#णैर्गदाभिमुसलैरपि । पट्टिशै: परिचै: प्रासै: खड्गैश्न विमलै: शितै:,उस समय राजा कुवलाश्चके पुत्रोंने सब ओरसे घेरकर उसपर आक्रमण किया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धारवाले खड़ग--इन सबके द्वारा चोट खाकर महाबली धुन्धु क्रोधित हो गया और उनके चलाये हुए नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको वह क्रोधी असुर खा गया

Mārkaṇḍeya berkata: Mereka menyerbunya dengan panah-panah tajam, gada, pentung, alu, kapak-perang, palang besi, tombak, serta pedang yang bersih berkilau dan bermata tajam.

Verse 25

स वध्यमान: संक्रुद्ध: समुत्तस्थौ महाबल: । कुद्धश्चा भक्षयत्‌ तेषां शस्त्राणि विविधानि च,उस समय राजा कुवलाश्चके पुत्रोंने सब ओरसे घेरकर उसपर आक्रमण किया। तीखे बाण, गदा, मुसल, पट्टिश, परिघ, प्रास और चमचमाते हुए तेज धारवाले खड़ग--इन सबके द्वारा चोट खाकर महाबली धुन्धु क्रोधित हो गया और उनके चलाये हुए नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्रोंको वह क्रोधी असुर खा गया

Dipukul berulang-ulang, sang perkasa bangkit dalam amarah. Murka, ia pun melahap aneka senjata mereka.

Verse 26

आस्याद्‌ वमन्‌ पावकं स संवर्तकसमं तदा । तान्‌ सर्वान्‌ नृपते: पुत्रानदहत्‌ स्वेन तेजसा,तत्पश्चात्‌ उसने अपने मुँहसे प्रलयकालीन अग्निके समान आगकी चिनगारियाँ उगलना आरम्भ किया और उन समस्त राजकुमारोंको अपने तेजसे जलाकर भस्म कर दिया

Mārkaṇḍeya berkata: Lalu ia mulai memuntahkan dari mulutnya percikan-percikan api, laksana nyala pemusnah dunia pada saat pralaya; dan dengan daya panasnya sendiri ia membakar habis semua pangeran itu—putra-putra sang raja—hingga menjadi abu.

Verse 27

मुखजेनाग्निना क्रुद्धों लोकानुद्)र्तयन्निव । क्षणेन राजशार्दूल पुरेव कपिल: प्रभु:

Mārkaṇḍeya berkata: Dalam murka, dengan api yang keluar dari mulutnya ia seakan-akan membakar habis dunia-dunia. Wahai harimau di antara raja-raja, sekejap saja sang perkasa itu menjadi laksana Kapila pada zaman dahulu.

Verse 28

तेषु क्रोधाग्निदग्धेषु तदा भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठी] जब सभी राजकुमार धुन्धुकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये, तब महातेजस्वी राजा कुवलाश्वने दूसरे कुम्भकर्णके- समान जगे हुए उस महाकाय दानवपर आक्रमण किया

Mārkaṇḍeya berkata: Ketika para pangeran itu telah dilalap api murka Dhundhu, wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, Raja Kuvalāśva yang bertuah besar pun melancarkan serangan kepada raksasa raksasa itu—terjaga laksana Kumbhakarṇa kedua.

Verse 29

त॑ प्रबुद्धं महात्मानं कुम्भकर्णमिवापरम्‌ | आससाद महातेजा: कुवलाश्वो महीपति:,भरतश्रेष्ठी] जब सभी राजकुमार धुन्धुकी क्रोधाग्निसे दग्ध हो गये, तब महातेजस्वी राजा कुवलाश्वने दूसरे कुम्भकर्णके- समान जगे हुए उस महाकाय दानवपर आक्रमण किया

Mārkaṇḍeya berkata: Maka Raja Kuvalāśva, penguasa bumi yang menyala oleh keberanian, maju menghadapi musuh agung itu yang telah terjaga—laksana Kumbhakarṇa yang lain.

Verse 30

तस्य वारि महाराज सुस््राव बहु देहतः । तदापीय ततस्तेजो राजा वारिमयं नृूप

Mārkaṇḍeya berkata: Wahai raja agung, dari tubuhnya mengalir air dengan sangat banyak. Setelah meminum air itu, daya cahaya dan kekuatan sang raja pulih kembali; seakan-akan ia dipenuhi unsur air—hidup lagi dan diperbarui.

Verse 31

ब्रह्मास्त्रेण च राजेन्द्र दैत्यं क्रूरपराक्रमम्‌,सुरशत्रुममित्रघ्न॑ त्रैलोक्येश इवापर: । राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात्‌ सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणके लिये राजर्षि कुवलाश्वने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धुको दग्ध कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मास्त्रद्वारा शत्रुनाशक, देववैरी महान्‌ असुर धुन्धुको दग्ध करके राजा कुवलाश्च दूसरे इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja, dengan senjata Brahmā (Brahmāstra) ia menumbangkan dan membakar habis raksasa yang kejam perkasa itu—musuh para dewa dan pembinas apara lawan. Demi kesejahteraan segenap dunia, setelah menghanguskannya, Raja-Resi Kuvalāśva bersinar laksana penguasa tiga jagat, seakan Indra kedua.”

Verse 32

ददाह भरतश्रेष्ठ सर्वलोकभवाय वै | सो<स्त्रेण दग्ध्वा राजर्षि: कुवलाश्वञो महासुरम्‌

Wahai yang terbaik di antara keturunan Bharata, demi kesejahteraan semua dunia, sang raja-resi Kuvalāśva menghanguskan Asura agung itu dengan senjatanya.

Verse 33

धुन्धोर्वधात्‌ तदा राजा कुवलाश्वो महामना:

Sesudah Dhundhu terbunuh, Raja Kuvalāśva yang berhati luhur termasyhur dan dimuliakan; kemasyhurannya naik sepadan dengan dharma perbuatannya dalam melindungi dunia.

Verse 34

प्रीतैश्न त्रिदशै: सर्वेर्महर्षिसहितैस्तदा,तदनन्तर महर्षियोंसहित सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होकर वहाँ आये और राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजन्‌! उनकी बात सुनकर कुवलाश्व अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर इस प्रकार बोले--

Kemudian semua dewa, para Tiga Puluh Tiga, dengan hati gembira dan disertai para maharṣi, datang ke sana dan berkata kepada sang raja, “Mohonlah sebuah anugerah.”

Verse 35

वरं वृणीष्वेत्युक्त: स प्राउ्जलि: प्रणतस्तदा । अतीव मुदितो राजन्निदं वचनमब्रवीत्‌,तदनन्तर महर्षियोंसहित सम्पूर्ण देवता प्रसन्न होकर वहाँ आये और राजासे वर माँगनेका अनुरोध करने लगे। राजन्‌! उनकी बात सुनकर कुवलाश्व अत्यन्त प्रसन्न हुए और हाथ जोड़ मस्तक झुकाकर इस प्रकार बोले--

Ketika dikatakan kepadanya, “Pilihlah sebuah anugerah,” sang raja menangkupkan tangan dan menunduk hormat; dengan sukacita yang meluap, wahai raja, ia mengucapkan kata-kata ini.

Verse 36

दद्यां वित्तं द्विजाग्रयेभ्य: शत्रूणां चापि दुर्जय: । सख्यं च विष्णुना मे स्याद्‌ भूतेष्वद्रोह एव च,“देवताओं! मैं श्रेष्ठ ब्राह्मणोंको धन दान करूँ, शत्रुओंके लिये दुर्जय बना रहूँ, भगवान्‌ विष्णुके साथ सख्य भावसे मेरा प्रेम हो और किसी भी प्राणीके प्रति मेरे मनमें द्रोह न रह जाय

Mārkaṇḍeya berkata: “Semoga aku menganugerahkan harta sebagai dana kepada para dwija yang utama; semoga aku tetap tak terkalahkan bagi musuh-musuhku; semoga terjalin persahabatan dan keakraban penuh kasihku dengan Bhagavān Viṣṇu; dan semoga dalam diriku hanya ada tanpa niat jahat terhadap semua makhluk hidup.”

Verse 37

धर्मे रतिशक्ष सततं॑ स्वर्गे वासस्तथाक्षय: । तथास्त्विति ततो देवै: प्रीतैरुक्त: स पार्थिव:,“धर्ममें मेरा सदा अनुराग हो और अन्तमें मेरा स्वर्गलोकमें नित्य निवास हो।” यह सुनकर देवताओंने बड़ी प्रसन्नताके साथ राजा कुवलाश्वसे कहा--“महाराज! ऐसा ही होगा”

Mārkaṇḍeya berkata: “Semoga aku senantiasa berpegang pada dharma, dan pada akhirnya semoga bagiku ada kediaman yang tak binasa di surga.” Mendengar itu, para dewa yang berkenan menjawab sang raja: “Tathāstu, wahai penguasa; tepat seperti yang engkau mohonkan.”

Verse 38

ऋषिभि श्ष॒ सगन्धर्वैरुत्तड़केन च धीमता । सम्भाष्य चैनं विविधैराशीवदिस्ततो नूप,राजन्‌! तदनन्तर ऋषियों, गन्धर्वों और बुद्धिमान्‌ महर्षि उत्तंकने भी नाना प्रकारके आशीर्वाद देते हुए राजासे वार्तालाप किया

Mārkaṇḍeya berkata: Setelah berbincang dengannya, para ṛṣi bersama para Gandharva, dan juga Ṛṣi Uttaṅka yang bijaksana, menganugerahkan kepada sang raja beragam berkah.

Verse 39

देवा महर्षयश्लापि स्वानि स्थानानि भेजिरे | तस्य पुत्रास्त्रय: शिष्टा युधिष्ठिर तदाभवन्‌,युधिष्ठिर! इसके बाद देवता और महर्षि अपने-अपने स्थानको चले गये। उस युद्धमें राजा कुवलाश्चके तीन ही पुत्र शेष रह गये थे

Mārkaṇḍeya berkata: “Kemudian para dewa dan para mahāṛṣi kembali ke kediaman mereka masing-masing. Wahai Yudhiṣṭhira, pada pertempuran itu hanya tiga putra raja itu yang tersisa hidup.”

Verse 40

दृढाश्वः कपिलाश्वश्न चन्द्राश्वश्वैव भारत । तेभ्य: परम्परा राजन्निक्ष्वाकूणां महात्मनाम्‌

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Bhārata, Dṛḍhāśva, Kapilāśva, dan juga Candrāśva—melalui merekalah, wahai raja, garis keturunan mulia Ikṣvāku berlanjut tanpa terputus.”

Verse 41

वंशस्य सुमहाभाग राज्ञाममिततेजसाम्‌ । भारत! उनके नाम थे-दृढाश्वच, कपिलाश्व और चन्द्राश्बव। राजन! महाभाग! उन्हींसे अमित तेजस्वी इक्ष्वाकुवंशी महामना नरेशोंकी वंश-परम्परा चालू हुई ।। एवं स निहतस्तेन कुवलाश्वेन सत्तम,सज्जनशिरोमणे! इस प्रकार मधुकैटभ-कुमार महादैत्य धुन्धु कुवलाश्वके हाथसे मारा गया और राजा कुवलाश्चकी धुन्धुमार नामसे प्रसिद्धि हुई

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai Bhārata, yang paling beruntung! Dalam garis raja-raja yang termasyhur dan bercahaya tanpa batas itu, nama-namanya ialah Dṛḍhāśva, Kapilāśva, dan Candrāśva. Wahai raja, wahai yang mulia! Sejak mereka, silsilah para penguasa agung dari wangsa Ikṣvāku—berjiwa besar dan bersinar oleh daya yang tak terhingga—terus berlanjut. Demikianlah, wahai insan terbaik, permata para bajik, raksasa perkasa Dhundhu—putra Madhu dan Kaiṭabha—tewas di tangan Kuvalāśva. Karena memusnahkan Dhundhu, Raja Kuvalāśva termasyhur dengan nama Dhundhumāra.”

Verse 42

धुन्धुर्नाम महादैत्यो मधुकैटभयो: सुतः । कुवलाश्चश्व नृपतिर्धुन्धुमार इति स्मृत:,सज्जनशिरोमणे! इस प्रकार मधुकैटभ-कुमार महादैत्य धुन्धु कुवलाश्वके हाथसे मारा गया और राजा कुवलाश्चकी धुन्धुमार नामसे प्रसिद्धि हुई

Mārkaṇḍeya berkata: “Ada raksasa perkasa bernama Dhundhu, putra Madhu dan Kaiṭabha. Raja Kuvalāśva dikenang dengan nama ‘Dhundhumāra’ karena ia membunuh Dhundhu itu.” Kisah ini menegaskan bahwa kemasyhuran seorang penguasa berakar pada kebajikan: melindungi dunia dan menumpas kekuatan yang mengancam tatanan dharma.

Verse 43

नाम्ना च गुणसंयुक्तस्तदाप्रभूृति सो5भवत्‌ | एतत्‌ ते सर्वमाख्यातं यन्मां त्वं परिपृच्छसि

Sejak saat itu, namanya pun menyatu dengan sifat-sifatnya. Segala yang engkau tanyakan kepadaku telah kuceritakan seluruhnya kepadamu.

Verse 44

इदं तु पुण्यमाख्यानं विष्णो: समनुकीर्तनम्‌

Inilah kisah suci yang membawa pahala—pujian dan pengisahan tentang Viṣṇu yang mengalir tanpa putus.

Verse 45

शृणुयाद्‌ यः स धर्मात्मा पुत्रवांश्व भवेन्नर: । आयुष्मान्‌ भूतिमांश्वैव श्रुत्वा भवति पर्वसु । न च व्याधिभयं किंचित्‌ प्राप्रोति विगतज्वर:

Siapa pun yang mendengarkannya dengan jiwa yang berpegang pada dharma akan menjadi dikaruniai putra. Dengan mendengarnya pada waktu-waktu suci dan perayaan, ia memperoleh umur panjang dan kemakmuran. Bebas dari demam, tiada ketakutan akan penyakit yang menimpanya.

Verse 96

उत्तड़कस्याश्रमाभ्याशे नि:श्वसन्‌ पावकार्चिष: । मधु और कैटभका वह भयंकर पराक्रमी पुत्र धुन्धु तपोबलका आश्रय ले सम्पूर्ण लोकोंका विनाश करनेके लिये वहाँ मरुप्रदेशमें शयन करता था। उत्तड़कके आश्रमके पास साँस ले-लेकर वह आगकी चिनगारियाँ फैलाता था

Mārkaṇḍeya berkata: Di dekat āśrama Uttaṅka, di hamparan gurun, berbaringlah Dhundhu yang mengerikan dan perkasa—putra Madhu dan Kaiṭabha—bersandar pada daya tapa-bratanya, berniat memusnahkan segenap dunia. Terbaring dekat pertapaan Uttaṅka, ia mengembus dan menarik napas, menebarkan percik api pada tiap hembusan.

Verse 193

अर्णवं खानयामास कुवलाश्वो महीपति: । कुरुनन्दन! उस समय भगवान्‌ नारायणके तेजसे परिपुष्ट हो राजा कुवलाश्व अपने उन पुत्रोंके साथ वहाँ जा पहुँचे और शीघ्र ही चारों ओरसे उस बालुकामय समुद्रको खुदवाने लगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai kebanggaan wangsa Kuru, saat itu Raja Kuvalāśva—dikuatkan oleh sinar kemuliaan Bhagavān Nārāyaṇa—tiba di sana bersama putra-putranya. Tanpa menunda, dari segala penjuru mereka mulai menggali ‘samudra’ yang tersusun dari pasir itu.”

Verse 204

जो मनुष्य भगवान्‌ विष्णुके कीर्तनरूप इस पवित्र उपाख्यानको सुनता है वह धर्मात्मा और पुत्रवान्‌ होता है। जो पर्वोपर इस कथाको सुनता है वह दीर्घायु तथा ऐश्वर्यशाली होता है। उसे रोग आदिका कुछ भी भय नहीं होता। उसकी सारी चिन्ताएँ दूर हो जाती हैं ।। इति श्रीमहा भारते वनपर्वणि मार्कण्डेयसमास्यापर्वणि धुन्धुमारोपाख्याने चतुरधिकद्विशततमो<ध्याय:

Mārkaṇḍeya berkata: Barangsiapa mendengarkan kisah suci ini—yang merupakan pujian (kīrtana) bagi Bhagavān Viṣṇu—akan menjadi insan berbudi dharma dan dianugerahi putra. Barangsiapa mendengarkannya pada tiap parva, akan memperoleh umur panjang dan kemakmuran; tiada takut baginya terhadap penyakit dan sejenisnya, dan segala kegelisahannya pun sirna. Demikian berakhir, dalam Śrī Mahābhārata, pada Vana Parva, dalam bagian Markandeya-Samāsya, kisah Dhundhumāra, Bab 204.

Verse 206

सप्तभिर्दिवसै: खात्वा दृष्टो धुन्धुर्महाबल: । कुवलाश्वके पुत्रोंने सात दिनोंतक खुदाई करनेके बाद उस बालुकामय समुद्रमें (छिपे हुए) महाबली धुन्धुको देखा

Mārkaṇḍeya berkata: Setelah menggali selama tujuh hari, putra-putra Kuvalāśva akhirnya melihat Dhundhu yang mahaperkasa, tersembunyi di dalam ‘samudra’ pasir itu.

Verse 213

दीप्यमानं यथा सूर्यस्तेजसा भरतर्षभ । बालूके भीतर छिपा हुआ उसका शरीर विशाल एवं भयंकर था। भरतश्रेष्ठ) वह अपने तेजसे सूर्यके समान उद्दीप्त हो रहा था

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai banteng di antara keturunan Bharata, ia menyala oleh tejas bagaikan matahari. Tersembunyi di balik pasir, tubuhnya amat besar dan mengerikan; dan wahai yang terbaik di antara Bharata, oleh sinar alaminya sendiri ia bersinar laksana surya.”

Verse 226

सुप्तो5भूद्‌ राजशार्टूल कालानलसमझ्ुति: । महाराज! तदनन्तर धुन्धु पश्चिम दिशाको घेरकर सो गया। नृपश्रेष्ठ) उसकी कान्ति प्रलयकालीन अग्निके समान जान पड़ती थी

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai harimau di antara para raja, ia tertidur dengan sinar laksana api Kala (Waktu). Wahai Maharaja, setelah itu Dhundhu pergi, seakan-akan melingkupi penjuru barat. Wahai yang terbaik di antara para penguasa, kemilaunya tampak seperti kobaran api pada akhir suatu yuga.”

Verse 276

सगरस्यात्मजान्‌ क्रुद्धस्तदद्भुतमिवाभवत्‌ । नृपश्रेष्ठ! जैसे पूर्वकालमें भगवान्‌ कपिलने कुपित होकर राजा सगरके सभी पुत्रोंको क्षणभरमें दग्ध कर दिया था, उसी प्रकार क्रोधमें भरे हुए धुन्धुने, मानो वह सम्पूर्ण लोकोंको नष्ट कर देना चाहता हो, अपने मुखसे आग प्रकट करके कुवलाश्वके पुत्रोंको जला दिया। यह एक अद्भुत-सी घटना घटित हुई

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai raja terbaik, peristiwa itu menakjubkan, bagaikan kejadian purba ketika Bhagavān Kapila, murka, membakar habis semua putra Raja Sagara dalam sekejap. Demikian pula Dhundhu, menggelegak oleh amarah—seolah hendak memusnahkan seluruh loka—memuntahkan api dari mulutnya dan membakar putra-putra Kuvalāśva. Maka terjadilah kejadian yang luar biasa dan menggetarkan.”

Verse 306

योगी योगेन वह्लिंच शमयामास वारिणा | महाराज! उस समय धुन्धुके शरीरसे बहुत-सा जल प्रवाहित होने लगा, किंतु राजा कुवलाश्वने योगी होनेके कारण योगबलसे उस जलमय तेजको पी लिया और जल प्रकट करके धुन्धुकी मुखाग्निको बुझा दिया

Markandeya berkata: “Dengan daya yoga, sang yogin memadamkan api dengan air. Wahai Maharaja, saat itu dari tubuh Dhundhu mengalir deras air; namun Raja Kuvalāśva, karena menguasai yoga, menyerap ‘daya berair’ itu dengan kekuatan yoganya. Lalu ia memanifestasikan air dan memadamkan api yang menyala dari mulut Dhundhu.”

Verse 326

सुरशत्रुममित्रघ्न॑ त्रैलोक्येश इवापर: । राजेन्द्र! भरतश्रेष्ठ! तत्पश्चात्‌ सम्पूर्ण लोकोंके कल्याणके लिये राजर्षि कुवलाश्वने ब्रह्मास्त्रका प्रयोग करके उस क्रूर पराक्रमी दैत्य धुन्धुको दग्ध कर दिया। इस प्रकार ब्रह्मास्त्रद्वारा शत्रुनाशक, देववैरी महान्‌ असुर धुन्धुको दग्ध करके राजा कुवलाश्च दूसरे इन्द्रकी भाँति शोभा पाने लगे

Mārkaṇḍeya berkata: “Wahai musuh para dewa, penumpas lawan—laksana penguasa tiga loka yang lain! Wahai raja di atas para raja, terbaik di antara Bharata—kemudian, demi kesejahteraan semua dunia, sang rajarṣi Kuvalāśva menggunakan Brahmāstra dan membakar habis raksasa kejam dan perkasa itu, Dhundhuka. Setelah melalap Dhundhuka—mahāsura yang memusuhi para dewa—dengan Brahmāstra, Raja Kuvalāśva pun bersinar laksana Indra yang kedua.”

Verse 336

धुन्धुमार इति ख्यातो नाम्नाप्रतिरथो5भवत्‌ | उस समय महामना राजा कुवलाश्व धुन्धुको मारनेके कारण “धुन्धुमार” नामसे विख्यात हो गये। उनका सामना करनेवाला वीर कोई नहीं रह गया था

Mārkaṇḍeya berkata: “Karena membunuh Dhundhu, Raja Kuvalāśva yang berhati agung termasyhur dengan nama ‘Dhundhumāra’. Ia pun menjadi kesatria tanpa tanding—tiada seorang pun pahlawan yang sanggup berdiri melawannya.”

Verse 436

धौन्धुमारमुपाख्यानं॑ प्रथितं यस्य कर्मणा । तभीसे वे नरेश अपने नामके अनुसार वीरता आदि गुणोंसे युक्त हो भूमण्डलमें विख्यात हो गये। युधिष्ठिर! तुमने मुझसे जो पूछा था, वह सारा धुन्धुमारोपाख्यान मैंने तुमसे कह सुनाया। जिनके पराक्रमसे इस उपाख्यानकी प्रसिद्धि हुई है उन नरेशका भी परिचय दे दिया

Mārkaṇḍeya berkata: “Inilah kisah termasyhur tentang Dhaundhumāra, yang menjadi masyhur karena perbuatan raja itu. Wahai Yudhiṣṭhira, apa yang engkau tanyakan kepadaku telah kuceritakan kepadamu sepenuhnya—seluruh episode Dhaundhumāra. Dan para raja yang keberaniannya membuat kisah ini termasyhur pun telah kuperkenalkan.”

Frequently Asked Questions

A learned brāhmaṇa prioritizes Vedic recitation over immediate filial obligations, leaving without parental consent; the chapter frames this as misordered duty requiring restitution through service and reconciliation.

Dharma is validated by right conduct and proper ordering of obligations: honoring parents is presented as a paramount, actionable dharma that can supersede self-directed religious performance when the latter harms dependents.

No formal phalaśruti is stated here; the chapter’s meta-lesson operates implicitly by linking ethical repair (filial propitiation) and karmic causality (the curse narrative) to the broader soteriological aim of aligning action with dharma.