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Sukta 9.97
Soma Pavamāna (the purified Soma)
This Pavamāna Soma hymn celebrates Soma’s pressing and purification as he streams through the filter into the bowls, becoming fit to mingle with the gods. It repeatedly portrays Soma as a vigilant, chanting, priestly power who enters the bright dwelling of sacrifice and brings increase—cattle, strength, and ordered prosperity. The hymn also widens the blessing by invoking allied cosmic supports (Mitra, Varuṇa, Aditi, Heaven and Earth) to stabilize the gains bestowed through Soma.
Mantra 1
अस्य प्रेषा हेमना पूयमानो देवो देवेभिः समपृक्त रसम् । सुतः पवित्रं पर्येति रेभन्मितेव सद्म पशुमान्ति होता ॥
सोम भगवान अपनी सोनी ताकत से साफ़ हो रहा है। वो अपना रस भगवानों के साथ मिला रहा है। उसका रस निकल के वो छन्नी के आस-पास घूमता है और गाता है। वो अपना काम पक्का कर के चमकदार घर में जा रहा है, वो अंदर की पूजा करने वाला है।
Mantra 2
भद्रा वस्त्रा समन्या वसानो महान्कविर्निवचनानि शंसन् । आ वच्यस्व चम्वोः पूयमानो विचक्षणो जागृविर्देववीतौ ॥
वो अच्छे कपड़े पहन के आया है, जो सबको पसंद आए। बड़ा रिशि है वो, जो अंदर की बातें बताता है। साफ़ हो के वो बर्तन में बोलने लगता है। वो जो सब देख सकता है, हमेशा जागता रहता है, भगवानों को जीतने के काम में लगा है।
Mantra 3
समु प्रियो मृज्यते सानो अव्ये यशस्तरो यशसां क्षैतो अस्मे । अभि स्वर धन्वा पूयमानो यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
सोम को साफ किया जा रहा है, वो भी एक ऊंची जगह पर। वो सबसे ज़्यादा चमकता है, चमकने वालों में भी। अपने आप को साफ करते-करते वो आवाज़ दे रहा है, आस-पास सब सुन सकें। भगवान, तुम हमेशा हमें अच्छा रखो और बुराई से बचाओ।
Mantra 4
प्र गायताभ्यर्चाम देवान्त्सोमं हिनोत महते धनाय । स्वादुः पवाते अति वारमव्यमा सीदाति कलशं देवयुर्नः ॥
गाओ और भगवानों की स्तुति करो। सोम को आगे बढ़ाओ ताकि बड़ा फल मिले। यह मीठा है और कपड़े से फ़िल्टर होके पानी में मिलता है। वो एक बर्तन में आके बैठता है, भगवान का प्यारा बन के।
Mantra 5
इन्दुर्देवानामुप सख्यमायन्त्सहस्रधारः पवते मदाय । नृभिः स्तवानो अनु धाम पूर्वमगन्निन्द्रं महते सौभगाय ॥
सोम की बूंदें भगवानों के पास जाती हैं, उनकी दोस्ती के लिए। वो हज़ार रस्तों से आता है और खुद को साफ करता है ताकि खुशी मिले। लोग उसकी तारीफ करते हैं, वो पुराने रस्ते से आता है। इंद्र तक पहुंचता है बड़ा भाग्य लाने के लिए।
Mantra 6
स्तोत्रे राये हरिरर्षा पुनान इन्द्रं मदो गच्छतु ते भराय । देवैर्याहि सरथं राधो अच्छा यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
सोम, तुम गाना और भगवान की स्तुति के लिए बहो। अपने आप को साफ करते रहो। तुम्हारी खुशी इंद्र तक पहुंचे, उनको ताकत मिले। भगवानों के साथ एक ही रथ में बैठ के चलो, आशीर्वाद लेने। हमेशा हमें अच्छा रखो और बचाओ।
Mantra 7
प्र काव्यमुशनेव ब्रुवाणो देवो देवानां जनिमा विवक्ति । महिव्रतः शुचिबन्धुः पावकः पदा वराहो अभ्येति रेभन् ॥
सोम बोलता है जैसे कोई बड़ा ज्ञानी हो। भगवान बताते हैं कि भगवान कैसे पैदा हुए। सोम का इरादा बड़ा है, वो साफ है और साफ करने वाला है। वो आगे बढ़ता है जैसे कोई सुअर ज़मीन तोड़ के चलता है, अपना मक़सद पकड़ने के लिए।
Mantra 8
प्र हंसासस्तृपलं मन्युमच्छामादस्तं वृषगणा अयासुः । आङ्गूष्यं पवमानं सखायो दुर्मर्षं साकं प्र वदन्ति वाणम् ॥
हंस जैसे उड़ने वाली शक्तियाँ आगे बढ़ रही हैं। तेज़ ताकत लेकर अपने घर की तरफ जा रही हैं। बैल जैसी ताकतें मंज़िल पर पहुँच गई हैं। दोस्त मिलकर बोल रहे हैं, साफ करने वाली आवाज़ निकल रही हैं। यह आवाज़ रुकती नहीं, बहुत ताकतवर है।
Mantra 11
अध धारया मध्वा पृचानस्तिरो रोम पवते अद्रिदुग्धः । इन्दुरिन्द्रस्य सख्यं जुषाणो देवो देवस्य मत्सरो मदाय ॥
फिर वो शहद जैसी मीठी धार में मिल जाता है। ऊन के बाल के ऊपर से गुज़रता है, पत्थर से निचोड़ा हुआ। चमकदार बूँद इंद्र की दोस्ती क़ुबूल करती है। भगवान खुशी से भरता है और दूसरों को भी मस्ती देता है।
Mantra 16
जुष्ट्वी न इन्दो सुपथा सुगान्युरौ पवस्व वरिवांसि कृण्वन् । घनेव विष्वग्दुरितानि विघ्नन्नधि ष्णुना धन्व सानो अव्ये ॥
इंदु, हमारी बात सुन और खुद को साफ कर। हमें अच्छा रास्ता दिख और आसान सफ़ाई बना। जैसे कोई हथौड़ा मारता है, वैसे ही हर तरफ़ की मुश्किलें तोड़ दे। ऊन वाली पहाड़ी पर अपनी ताकत चला।
Mantra 17
वृष्टिं नो अर्ष दिव्यां जिगत्नुमिळावतीं शंगयीं जीरदानुम् । स्तुकेव वीता धन्वा विचिन्वन्बन्धूँरिमाँ अवराँ इन्दो वायून् ॥
हमारे लिए आसमान से बारिश जैसी ताकत भेज। जल्दी अपना काम करे, अच्छा करे, खुशी दे। जैसे कोई तेज़ तीर चलता है, वैसे ही इंदु हर तरफ़ फैल जा। नीचे की ताकतों को पकड़ और उन्हें उठा ले।
Mantra 18
ग्रन्थिं न वि ष्य ग्रथितं पुनान ऋजुं च गातुं वृजिनं च सोम । अत्यो न क्रदो हरिरा सृजानो मर्यो देव धन्व पस्त्यावान् ॥
जैसे किसी गाँठ को खोलते हैं, वैसे ही सोम उलझ हटा और साफ़ हो। सीधा रास्ता भी दिख और टेढ़ा रास्ता भी ठीक कर। जैसे घोड़ा हिनहिनाता है और दौड़ता है, वैसे ही पीला रंग वाली ताकत निकलती है। भगवान जैसे नौजवान, घर में खुश रह।
Mantra 20
अरश्मानो येऽरथा अयुक्ता अत्यासो न ससृजानास आजौ । एते शुक्रासो धन्वन्ति सोमा देवासस्ताँ उप याता पिबध्यै ॥
यह सोम रस ऐसे हैं जैसे बगैर लगाम की गाड़ियाँ, जैसे दो दौड़ में घोड़े भाग रहे हों। यह चमकदार सोम आगे बढ़ रहे हैं। हे देवता, इनके पास आओ और पियो। यह साफ शक्ति जीत के साथ चल रही है, इसको अंदर ले लो।
Mantra 22
तक्षद्यदी मनसो वेनतो वाग्ज्येष्ठस्य वा धर्मणि क्षोरनीके । आदीमायन्वरमा वावशाना जुष्टं पतिं कलशे गाव इन्दुम् ॥
जब मन की इच्छा से शब्द उसको बनाता है, जब दूध चमकता है, तब वो शक्तियाँ आती हैं। वो आस रखती हैं कि कुछ मिलेगा। किरण जैसी गाय, वो प्यारे इंदु को पात्रे में ले लेती हैं।
Mantra 23
प्र दानुदो दिव्यो दानुपिन्व ऋतमृताय पवते सुमेधाः । धर्मा भुवद्वृजन्यस्य राजा प्र रश्मिभिर्दशभिर्भारि भूम ॥
वो देवता जो पानी देता है, आगे बढ़ रहा है। जो सच के लिए है, वो सच के साथ बहक रहा है। वो धरम बन गया, वो खेत का राजा है। दस किरण के साथ चल रहा है, बहुत बड़ा है।
Mantra 24
पवित्रेभिः पवमानो नृचक्षा राजा देवानामुत मर्त्यानाम् । द्विता भुवद्रयिपती रयीणामृतं भरत्सुभृतं चार्विन्दुः ॥
जब वो छन्नी से साफ हो रहा है, वो लोगों को देखने वाला बन गया। देवतों और लोगों का राजा बन गया। दो तरह से वो धन का मालिक है। प्यारा इंदु सच को लेकर हमारे पास आता है।
Mantra 25
अर्वाँ इव श्रवसे सातिमच्छेन्द्रस्य वायोरभि वीतिमर्ष । स नः सहस्रा बृहतीरिषो दा भवा सोम द्रविणोवित्पुनानः ॥
जैसे तेज़ घोड़ा नाम के लिए दौड़ता है, वैसे ही इंद्र और वायु के पास जा। हमें हज़ार बड़ी शक्ति दे। सोम, जब तू साफ हो रहा है, तो हमारे लिए धन ढूँढने वाला बन जा।
Mantra 29
शतं धारा देवजाता असृग्रन्त्सहस्रमेनाः कवयो मृजन्ति । इन्दो सनित्रं दिव आ पवस्व पुरएतासि महतो धनस्य ॥
भगवान की तरफ़ से सौ धारें निकली हैं। रिशि लोग हज़ार पाप साफ़ कर रहे हैं। हे इंदु, आसमान की ख़ज़ाने तक साफ़ हो के पहुँच। तू बड़े धन का पहले रास्ता है।
Mantra 32
कनिक्रददनु पन्थामृतस्य शुक्रो वि भास्यमृतस्य धाम । स इन्द्राय पवसे मत्सरवान्हिन्वानो वाचं मतिभिः कवीनाम् ॥
तू चीख़ के साथ सच के रास्ते पे चल। चमक के तू अमृत के घर को रोशन कर। इंद्र के लिए तू ख़ुद साफ़ हो रहा है, ख़ुशी से भरा हुआ। रिशियों के विचार से शब्द को आगे बढ़ा।
Mantra 33
दिव्यः सुपर्णोऽव चक्षि सोम पिन्वन्धाराः कर्मणा देववीतौ । एन्दो विश कलशं सोमधानं क्रन्दन्निहि सूर्यस्योप रश्मिम् ॥
हे सोम, भगवान की पक्की चिड़ैया ने ऊपर से देखा। पूजा के काम से धारें भर रही हैं। हे इंदु, उस कलश में जा जहाँ सोम रखा है। चीख़ के सूर्य की किरण तक आ, उड़ के उस रोशनी में पहुँच।
Mantra 35
सोमं गावो धेनवो वावशानाः सोमं विप्रा मतिभिः पृच्छमानाः । सोमः सुतः पूयते अज्यमानः सोमे अर्कास्त्रिष्टुभः सं नवन्ते ॥
गाइयाँ और दूध देने वाली शक्तियाँ सोम के लिए पुकार रही हैं। रिशि लोग अपने विचार से सोम को ढूँढ रहे हैं। सोम निकल के साफ़ किया जा रहा है, तेल लगा लगा के। सोम में गीत और छंदें मिलकर नए बन रहे हैं।
Mantra 36
एवा नः सोम परिषिच्यमान आ पवस्व पूयमानः स्वस्ति । इन्द्रमा विश बृहता रवेण वर्धया वाचं जनया पुरंधिम् ॥
हे सोम, हम सब के ऊपर बहा। साफ़ हो के अच्छाई के लिए यहाँ आ। बड़ी आवाज़ के साथ इंद्र तक पहुँच। हमें शब्द की शक्ति बढ़ा, बरकत ला जो सब भर दे।
Mantra 37
आ जागृविर्विप्र ऋता मतीनां सोमः पुनानो असदच्चमूषु । सपन्ति यं मिथुनासो निकामा अध्वर्यवो रथिरासः सुहस्ताः ॥
सोम जाग रहा है, पूरी तरह सावधान। वो सच बात को जानने वाला है और अभी अपने साफ होने का टाइम चल रहा है, बाउल में बैठा है। पंडित लोग उसके पास जाते हैं, सब मिलकर काम करते हैं। वो लोग बहुत एक्सपर्ट हैं, जैसे रथ चलाने वाले तेज़ होते हैं, उनके हाथ काम जानते हैं।
Mantra 38
स पुनान उप सूरे न धातोभे अप्रा रोदसी वि ष आवः । प्रिया चिद्यस्य प्रियसास ऊती स तू धनं कारिणे न प्र यंसत् ॥
सोम साफ हो रहा है, जैसे कोई सूरज के पास खड़ा हो। उसने दुनिया को फैला दिया, दोनों तरफ भर दिया। जो लोग उसके काम आते हैं, उन्हे वो प्यार रखता है। जो काम करता है उसको वो धन देता है, कुछ नहीं छुपाता।
Mantra 39
स वर्धिता वर्धनः पूयमानः सोमो मीढ्वाँ अभि नो ज्योतिषावीत् । येना नः पूर्वे पितरः पदज्ञाः स्वर्विदो अभि गा अद्रिमुष्णन् ॥
सोम बढ़ रहा है और दूसरों को भी बढ़ा रहा है। अभी वो साफ हो रहा है, बहुत देने वाला है, और रोशनी लेकर हमारे पास आया है। हमारे पुराने पिताजी लोग, जो रास्ता जानते थे, उन्होंने सोम की मदद से रोशनी पाई। उन्होंने पत्थर तोड़कर अंदर की चीज़ निकाली।
Mantra 40
अक्रान्त्समुद्रः प्रथमे विधर्मञ्जनयन्प्रजा भुवनस्य राजा । वृषा पवित्रे अधि सानो अव्ये बृहत्सोमो वावृधे सुवान इन्दुः ॥
समुंदर आगे बढ़ा, जब पहली बार नियम बना। उसने सब जीव पैदा किए, वो सबसे बड़ा राजा बन गया। सोम बैल की तरह कपड़े पर चढ़ा, उसने अपना साइज़ बढ़ा लिया। अभी वो निचड़ के पैदा हो रहा है।
Mantra 41
महत्तत्सोमो महिषश्चकारापां यद्गर्भोऽवृणीत देवान् । अदधादिन्द्रे पवमान ओजोऽजनयत्सूर्ये ज्योतिरिन्दुः ॥
सोम ने बहुत बड़ा काम किया, बहुत ताकतवाला है। पानी के अंदर रह कर उसने भगवान लोगों को चूज़ किया। साफ होने के बाद उसने इंद्र में ताकत डाल दी। उसने सूरज में रोशनी पैदा कर दी।
Mantra 42
मत्सि वायुमिष्टये राधसे च मत्सि मित्रावरुणा पूयमानः । मत्सि शर्धो मारुतं मत्सि देवान्मत्सि द्यावापृथिवी देव सोम ॥
सोम देवता खुश हो रहे हैं वायु के साथ, क्योंकि हम उनसे माँग रहे हैं और वो हमें देंगे। मित्र और वरुण के साथ भी खुश हो रहे हैं जब वो साफ हो रहे हैं। मरुत सेना के साथ खुश हैं, सारे देवी-देवता के साथ खुश हैं। आसमान और धरती के साथ भी खुश हैं, यह सोम देवता है।
Mantra 43
ऋजुः पवस्व वृजिनस्य हन्तापामीवां बाधमानो मृधश्च । अभिश्रीणन्पयः पयसाभि गोनामिन्द्रस्य त्वं तव वयं सखायः ॥
सोम सीधा बहो, तुम टेढ़ी बातों को खत्म करते हो। बिमारी और दुश्मनी को तुम दूर भगा देते हो। दूध में और दूध मिला के उस्से बढ़ा दो, चमक को और तेज करो। तुम इंद्र के हो और हम तुम्हारे साथी हैं।
Mantra 44
मध्वः सूदं पवस्व वस्व उत्सं वीरं च न आ पवस्वा भगं च । स्वदस्वेन्द्राय पवमान इन्दो रयिं च न आ पवस्वा समुद्रात् ॥
हमें मीठा रस दो, धन का सोर्स भी दो। हमें ताकत दो और भग देवता की किरपा भी दो। इंद्र के लिए मीठा बनो, सोम तुम पवित्र हो रहे हो। समुंदर से जो चमक आती है वो भी हमें दो।
Mantra 45
सोमः सुतो धारयात्यो न हित्वा सिन्धुर्न निम्नमभि वाज्यक्षाः । आ योनिं वन्यमसदत्पुनानः समिन्दुर्गोभिरसरत्समद्भिः ॥
सोम रस निकल के बह रहा है जैसे तेज घोड़ा दौड़ता है, रास्ता नहीं छोड़ता। नदी की तरह नीचे की तरफ जाता है। अपने असली घर में वापस जाके बैठ जाता है, साफ हो रहा है। चमक और पानी के साथ मिल के एक हो जाता है।
Mantra 46
एष स्य ते पवत इन्द्र सोमश्चमूषु धीर उशते तवस्वान् । स्वर्चक्षा रथिरः सत्यशुष्मः कामो न यो देवयतामसर्जि ॥
यह सोम इंद्र के लिए बह रहा है, समझदार है और बाउल में तैयार है, ताकत से भरा है। उसकी आँखों में चमक है, रथ की तरह चलता है, सच्ची ताकत है। इच्छा की तरह भगवान की तरफ जाने वालों के लिए निकला है।
Mantra 47
एष प्रत्नेन वयसा पुनानस्तिरो वर्पांसि दुहितुर्दधानः । वसानः शर्म त्रिवरूथमप्सु होतेव याति समनेषु रेभन् ॥
सोम अपनी पुरानी ताकत से खुद को साफ कर रहा है। वो पानी की शक्ति अपने ऊपर ले रहा है। पानी में वो तीन तरह की सुरक्षा देता है। वो मंडलियों में जैसे पंडित चलता है। सब जगह सहमता पैदा करता है।
Mantra 48
नू नस्त्वं रथिरो देव सोम परि स्रव चम्वोः पूयमानः । अप्सु स्वादिष्ठो मधुमाँ ऋतावा देवो न यः सविता सत्यमन्मा ॥
अब सोम हमारे लिए बह रहा है। रथों की तरह तेज़ हो के पास आता है। बर्तन में गिर रहा है और खुद को साफ करता है। पानी में वो बहुत मीठा है, जैसे शहद। वो सच का जानकार है। भगवान सवित्र की तरह सच सोचता है और हमारे मन में सच जगाता है।
Mantra 49
अभि वायुं वीत्यर्षा गृणानोऽभि मित्रावरुणा पूयमानः । अभी नरं धीजवनं रथेष्ठामभीन्द्रं वृषणं वज्रबाहुम् ॥
सोम वायु की तरफ बह रहा है। यज्ञ के लिए जा रहा है और गाना गा रहा है। मित्र और वरुण के पास जा रहा है, खुद को साफ करते हुए। नर के पास जा रहा है जो तेज़ सोचता है और रथ पर बैठे है। इंद्र के पास जा रहा है जो बलवान है और वज्र हाथ में रखता है।
Mantra 50
अभि वस्त्रा सुवसनान्यर्षाभि धेनूः सुदुघाः पूयमानः । अभि चन्द्रा भर्तवे नो हिरण्याभ्यश्वान्रथिनो देव सोम ॥
सोम चमकदार कपड़ों की तरफ बह रहा है। अच्छे कपड़े पहनने वाली शक्तियों के पास जा रहा है। गायों की तरफ जा रहा है जो दूध देती हैं, खुद को साफ करते हुए। चमकदार खजाने की तरफ जा रहा है हमारे लिए। सोने की तरह चमकने वाली चीज़ों की तरफ। तेज़ घोड़ों और रथ की ताकत की तरफ जा रहा है।
Mantra 51
अभी नो अर्ष दिव्या वसून्यभि विश्वा पार्थिवा पूयमानः । अभि येन द्रविणमश्नवामाभ्यार्षेयं जमदग्निवन्नः ॥
सोम हमारे पास आसमानी दौलत लेकर आओ। ज़मीन की सारी दौलत लेकर आओ, खुद को साफ करते हुए। वो दौलत लेकर आओ जिससे हम असली फायदा पाएँ। रिशियों की विरासत लेकर आओ, जमदग्नि की तरह। हमें वो ताकत मिले जो हमारे अंदर है।
Mantra 52
अया पवा पवस्वैना वसूनि माँश्चत्व इन्दो सरसि प्र धन्व । ब्रध्नश्चिदत्र वातो न जूतः पुरुमेधश्चित्तकवे नरं दात् ॥
इन्दु, इस सफाई के रास्ते से खुद को साफ करो। इसके साथ यह दौलत को भी आगे बढ़ाओ, जैसे कोई सरोवर में हो। यहाँ चमकता हुआ एक हवा की तरह तेज चलता है। और वो जो दान देता है, वो कारीगर को वीर ताकत देता है। इस तरह साफ की हुई खुशी से इंसान को ताकत मिलती है।
Mantra 53
उत न एना पवया पवस्वाधि श्रुते श्रवाय्यस्य तीर्थे । षष्टिं सहस्रा नैगुतो वसूनि वृक्षं न पक्वं धूनवद्रणाय ॥
और हमारे लिए भी इस सफाई से खुद को साफ करो। उस पास पर जहाँ लोग सुनते हैं, वहाँ रुको। हमारे लिए खजाने हिलाओ, साठों हज़ार, जैसे पक्का पेड़ अपना फल गिरा देता है। यह सब कुछ लड़ाई के लिए ऊपर से आता है।
Mantra 54
महीमे अस्य वृषनाम शूषे माँश्चत्वे वा पृशने वा वधत्रे । अस्वापयन्निगुतः स्नेहयच्चापामित्राँ अपाचितो अचेतः ॥
इसकी ताकत बहुत बड़ी है, चाहे मांशत्व हो या प्रिशन या वधत्र। वो छुपी हुई चीज़ों को सुला देता है और नरम कर देता है। दुश्मनों को भगा देता है, जो ना सोचते हैं ना समझते हैं, उनको हमारे पास से दूर कर देता है।
Mantra 55
सं त्री पवित्रा विततान्येष्यन्वेकं धावसि पूयमानः । असि भगो असि दात्रस्य दातासि मघवा मघवद्भ्य इन्दो ॥
तीन छन्नों से गुज़र के तुम एक रास्ते पर दौड़ते हो, सोम, और साफ होते हो। तुम भगवान हो, खुशी देने वाली ताकत हो। तुम दान देने वाले हो, धन देने वाले हो, इन्दु, जो धनवान लोगों को धन देते हो।
Mantra 56
एष विश्ववित्पवते मनीषी सोमो विश्वस्य भुवनस्य राजा । द्रप्साँ ईरयन्विदथेष्विन्दुर्वि वारमव्यं समयाति याति ॥
यह सोम सब कुछ जानता है और समझदारी से बहता है। वो सारी दुनिया का राजा है। अपने चमकते हुए बूंदों को सबके सामने फैलाता है। इन्दु आगे बढ़ता है, ऊन के छन्न के साथ-साथ, मुक्ति के द्वारों को पार कर के।
Mantra 57
इन्दुं रिहन्ति महिषा अदब्धाः पदे रेभन्ति कवयो न गृध्राः । हिन्वन्ति धीरा दशभिः क्षिपाभिः समञ्जते रूपमपां रसेन ॥
जब सोम रस निकलता है तो ताकतवाले लोग उसे चाट लेते हैं। रिशि लोग उसकी हर मूवमेंट पर चिल्लाते हैं जैसे चिड़िया चहक रही हो। जो लोग इस काम में लगे हैं वो दस तेज़ी से हाथ चलाते हैं। पानी के रस से सोम का रूप चमकने लगता है।
Mantra 58
त्वया वयं पवमानेन सोम भरे कृतं वि चिनुयाम शश्वत् । तन्नो मित्रो वरुणो मामहन्तामदितिः सिन्धुः पृथिवी उत द्यौः ॥
हे सोम, जब तू साफ हो रहा है तो हम तेरे साथ मिलकर जो कुछ पाना चाहते हैं वो संभाल के रखेंगे। मित्र और वरुण हमें बरकत दें। अदिति, नदी, धरती और आसमान सब मिलकर हमारे काम को बड़ा करें।
Soma Pavamāna is Soma ‘in purification’—the pressed sacred juice treated as a deity as it is strained through the filter and made fit to be offered to the gods.
The hymn describes Soma being pressed, flowing around and through the filter, entering the bowls, and becoming a powerful, purified essence that brings prosperity and strengthens the divine order.
They are invoked as supporting cosmic powers to enlarge and stabilize the benefits gained through Soma—so the prosperity and order produced by the rite become lasting and protected.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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