
Sukta 9.86
Soma Pavamāna
Jagatī (probable)
This Soma Pavamāna hymn celebrates the living rush of Soma as it is purified through wool and strainers, becoming sweet, exhilarating, and fit for the gods. It links the visible ritual flow—drops circling the vessel and filter—with cosmic order (ṛta), asking Soma to drive away hostile powers and to empower the singers with “vast” speech and heroic strength.
Mantra 1
प्र त आशवः पवमान धीजवो मदा अर्षन्ति रघुजा इव त्मना । दिव्याः सुपर्णा मधुमन्त इन्दवो मदिन्तमासः परि कोशमासते ॥
सोम की धारा आगे बढ़ रही है। यह साफ हो रही है। जैसे रेस के घोड़े दौड़ते हैं, वैसे ही यह अपनी ताक़ात से आगे बढ़ रही है। यह बूंदें आसमान से आती हैं, मीठी हैं और अच्छे पंखों वाली हैं। यह नशा देती हैं। एक बर्तन में सब जगह बस जाती हैं।
Mantra 2
प्र ते मदासो मदिरास आशवोऽसृक्षत रथ्यासो यथा पृथक् । धेनुर्न वत्सं पयसाभि वज्रिणमिन्द्रमिन्दवो मधुमन्त ऊर्मयः ॥
सोम की यह धारें तेज़ हैं और नशा देती हैं। यह फैल रही हैं जैसे रथ अलग-अलग रास्ते पे जाते हैं। जैसे गाय अपने बच्चे को दूध पिलाती है, वैसे ही यह मीठी लहरें इंद्र के पास जाती हैं। इंद्र के पास वज्र है। यह लहरें उसकी ताक़ात बढ़ाती हैं।
Mantra 3
अत्यो न हियानो अभि वाजमर्ष स्वर्वित्कोशं दिवो अद्रिमातरम् । वृषा पवित्रे अधि सानो अव्यये सोमः पुनान इन्द्रियाय धायसे ॥
सोम एक तेज़ घोड़े की तरह दौड़ता है ताकत की तरफ। वो सूरज की दुनिया ढूंढता है और आसमान के बर्तन में जाता है। एक बैल की तरह, वो छत पर खड़ा होता है जो कभी खत्म नहीं होती। वही फ़िल्टर पर सोम साफ़ होता है ताकि इंद्र की ताकत हमारे अंदर आए।
Mantra 4
प्र त आश्विनीः पवमान धीजुवो दिव्या असृग्रन्पयसा धरीमणि । प्रान्तॠषयः स्थाविरीरसृक्षत ये त्वा मृजन्त्यृषिषाण वेधसः ॥
सोम की ताकतें आगे बढ़ रही हैं, वो साफ़ हो रहा है। ये ताकतें आसमान से आती हैं और दूध जैसा अमृत ले कर आती हैं। रिशि अंदर से नदियाँ निकाल रहे हैं जो कभी सूखी नहीं होती। वो लोग सोम को साफ़ करते हैं और ज्ञान के काम करते हैं।
Mantra 5
विश्वा धामानि विश्वचक्ष ऋभ्वसः प्रभोस्ते सतः परि यन्ति केतवः । व्यानशिः पवसे सोम धर्मभिः पतिर्विश्वस्य भुवनस्य राजसि ॥
सोम, तुम सब जगह देख सकते हो और बहुत ताकतवाले हो। तुम्हारी रोशनी के झंडे चारों तरफ फैल गए हैं। तुम सच्चाई के नियम से बह रहे हो और अपने आप को बाँट रहे हो। तुम पूरी दुनिया के मालिक हो और राज कर रहे हो।
Mantra 6
उभयतः पवमानस्य रश्मयो ध्रुवस्य सतः परि यन्ति केतवः । यदी पवित्रे अधि मृज्यते हरिः सत्ता नि योना कलशेषु सीदति ॥
सोम की रोशनी की किरणें दोनों तरफ फैल रही हैं। वो सच में स्थिर है और उसकी रोशनी चारों तरफ है। जब वो पीला रंग का पानी फ़िल्टर पर साफ़ होता है, तब वो अपनी जगह ले लेता है। फिर वो प्यालों में जाके बैठ जाता है जो उसे पकड़ के रखते हैं।
Mantra 7
यज्ञस्य केतुः पवते स्वध्वरः सोमो देवानामुप याति निष्कृतम् । सहस्रधारः परि कोशमर्षति वृषा पवित्रमत्येति रोरुवत् ॥
यज्ञ का संकेत सोम है, वो साफ़ हो कर बह रहा है। वो भगवानों के पास जाता है जहाँ वो प्रकट होते हैं। उसमें हज़ारों धारें हैं और वो बर्तन के चारों तरफ दौड़ता है। एक मज़बूत बैल की तरह वो फ़िल्टर से गुज़र जाता है और आवाज़ करता है।
Mantra 8
राजा समुद्रं नद्यो वि गाहतेऽपामूर्मिं सचते सिन्धुषु श्रितः । अध्यस्थात्सानु पवमानो अव्ययं नाभा पृथिव्या धरुणो महो दिवः ॥
वो राजा है, समुंदर में जाता है जैसे नदियाँ जाती हैं। धारों में रह के पानी की लहरों के साथ चलता है। यह अपने आप को साफ करने वाला ऊन ऊँचे पहाड़ पर चढ़ गया जो कभी खत्म नहीं होता। यह धरती का नाभि है, आसमान का मज़बूत आधार।
Mantra 9
दिवो न सानु स्तनयन्नचिक्रदद्द्यौश्च यस्य पृथिवी च धर्मभिः । इन्द्रस्य सख्यं पवते विवेविदत्सोमः पुनानः कलशेषु सीदति ॥
जैसे आसमान का पहाड़ गरज रहा हो, वैसे ही चिल्लाता है। उसके नियम से आसमान और धरती टिक के रहती हैं। इंद्र की दोस्ती पा के वो बहता है। सोम, जब साफ होता है, तो प्यालों में बैठ जाता है।
Mantra 10
ज्योतिर्यज्ञस्य पवते मधु प्रियं पिता देवानां जनिता विभूवसुः । दधाति रत्नं स्वधयोरपीच्यं मदिन्तमो मत्सर इन्द्रियो रसः ॥
यज्ञ का रोशक प्रकाश बहता है, जैसे शहद जैसा मीठा प्यार। यह देवियों का बाप है, उनका जन्म देने वाला, बहुत चमकदार। वो एक खास रतन को छुपा के रखता है अपने अंदर। यह सबसे ज़्यादा नशा देने वाला है, इंद्र को ताकत देने वाला रस।
Mantra 11
अभिक्रन्दन्कलशं वाज्यर्षति पतिर्दिवः शतधारो विचक्षणः । हरिर्मित्रस्य सदनेषु सीदति मर्मृजानोऽविभिः सिन्धुभिर्वृषा ॥
आवाज़ कर के वो प्यालों की तरफ भागता है, आसमान का मालिक, सौ धारों वाला, सब देखने वाला। पीला सोम मित्र के स्थान पर बैठता है। भाड़ से और नदियों से साफ हो के वो ताकत पाता है।
Mantra 12
अग्रे सिन्धूनां पवमानो अर्षत्यग्रे वाचो अग्रियो गोषु गच्छति । अग्रे वाजस्य भजते महाधनं स्वायुधः सोतृभिः पूयते वृषा ॥
सबसे आगे नदियों में वो साफ होने वाला बहता है। सबसे आगे बोलने में वो रोशनी के बीच जाता है। सबसे आगे वो बड़ा खज़ाना पाता है। अपने आप को बचा के वो दबाने वालों से साफ होता है।
Mantra 13
अयं मतवाञ्छकुनो यथा हितोऽव्ये ससार पवमान ऊर्मिणा । तव क्रत्वा रोदसी अन्तरा कवे शुचिर्धिया पवते सोम इन्द्र ते ॥
सोम बिल्कुल ऐसा है जैसे कोई चिड़िया आज़ाद हो के उड़ गई हो। वो शीप के कपड़े के आर-पार निकल गया अपनी लहर के साथ। रिशि के इरादे से वो दोनों दुनिया के बीच में बह रहा है। सोम के खयाल साफ हैं, वो इंद्र के लिए बह रहा है।
Mantra 14
द्रापिं वसानो यजतो दिविस्पृशमन्तरिक्षप्रा भुवनेष्वर्पितः । स्वर्जज्ञानो नभसाभ्यक्रमीत्प्रत्नमस्य पितरमा विवासति ॥
सोम ने एक खास चोला पहना है, वो ऐसा है जैसे स्वर्ग को छू रहा हो। वो अंतरिक्ष में फैल गया और सब जगह अपनी जगह बना ली। वो रोशनी से पैदा हुआ और आसमान की तरफ बढ़ गया। वो पुराने पिताजी को जगाने जा रहा है।
Mantra 15
सो अस्य विशे महि शर्म यच्छति यो अस्य धाम प्रथमं व्यानशे । पदं यदस्य परमे व्योमन्यतो विश्वा अभि सं याति संयतः ॥
यह लोगों को बड़ा सुकून देता है, जैसे कोई अपने घर पहले पहुँच जाए। जब उसका कदम सबसे ऊपर आसमान में होता है, तब सब चीज़ें उसकी तरफ चलने लगती हैं। सब मिलकर एक जगह आ जाते हैं।
Mantra 16
प्रो अयासीदिन्दुरिन्द्रस्य निष्कृतं सखा सख्युर्न प्र मिनाति संगिरम् । मर्य इव युवतिभिः समर्षति सोमः कलशे शतयाम्ना पथा ॥
सोम की बूंद आगे बढ़ गई है, इंद्र के लिए जगह तैयार है। वो दोस्त की तरह है, दोस्ती का रिश्ता नहीं तोड़ता। जैसे कोई यंग लड़कियों के साथ मिलता है, वैसे ही सोम बाउल में डालता है। वह सौ रस्तों से आता है।
Mantra 17
प्र वो धियो मन्द्रयुवो विपन्युवः पनस्युवः संवसनेष्वक्रमुः । सोमं मनीषा अभ्यनूषत स्तुभोऽभि धेनवः पयसेमशिश्रयुः ॥
तुम्हारे खयाल आगे बढ़ रहे हैं, खुशी और नई चीज़ें ढूंढ़ते हुए। वो मिलकर काम करने लगते हैं। रिशि लोग सोम की तरफ गाते हैं। भजन और गायें दूध ले के उसके पास आती हैं।
Mantra 18
आ नः सोम संयतं पिप्युषीमिषमिन्दो पवस्व पवमानो अस्रिधम् । या नो दोहते त्रिरहन्नसश्चुषी क्षुमद्वाजवन्मधुमत्सुवीर्यम् ॥
हे सोम, हमारे पास आ जा। तू अपनी ताकत को कंट्रोल में रख के आ। तू खुद को साफ कर, बिना किसी कमी के। जो शक्ति तीन बार दिन में नया होती है, वो कभी खत्म नहीं होती। यह शक्ति हमें जीत दिलाती है, मीठी है और बहुत ताकत देती है।
Mantra 19
वृषा मतीनां पवते विचक्षणः सोमो अह्नः प्रतरीतोषसो दिवः । क्राणा सिन्धूनां कलशाँ अवीवशदिन्द्रस्य हार्द्याविशन्मनीषिभिः ॥
सोम एक बड़े बैल की तरह है जो सबको ताकत देता है। वो दिन भर, सुबह और आसमान में चलता है। वो सारी नदियों को ले के बर्तन में डालता है। फिर वो इंद्र के दिल में जाता है और रिशियों के साथ आता है जो सब समझते हैं।
Mantra 20
मनीषिभिः पवते पूर्व्यः कविर्नृभिर्यतः परि कोशाँ अचिक्रदत् । त्रितस्य नाम जनयन्मधु क्षरदिन्द्रस्य वायोः सख्याय कर्तवे ॥
वो पुराने रिशि जो सब समझते हैं, वो खुद को साफ करते हैं। लोगों की ताकत से वो बर्तन के आस-पास घूमता है। वो त्रित नाम के देवता को पैदा करता है और मीठा रस टपकता है। यह सब इंद्र और वायु की दोस्ती बनाने के लिए होता है।
Mantra 21
अयं पुनान उषसो वि रोचयदयं सिन्धुभ्यो अभवदु लोककृत् । अयं त्रिः सप्त दुदुहान आशिरं सोमो हृदे पवते चारु मत्सरः ॥
यह सोम खुद को साफ करता है और सुबह को चमकाता है। नदियों के लिए यह दुनिया को सही बनाता है। यह रस को एक दिन में एक सौ एक बार निकालता है। सोम दिल में जाके खुश हो उठता है और बहुत अच्छा लगता है।
Mantra 22
पवस्व सोम दिव्येषु धामसु सृजान इन्दो कलशे पवित्र आ । सीदन्निन्द्रस्य जठरे कनिक्रदन्नृभिर्यतः सूर्यमारोहयो दिवि ॥
हे सोम, तू देव लोगों के घर में खुद को साफ कर। तू छूट के बर्तन और कपड़े में आ जा। तू इंद्र के पेट में बैठ जा और आवाज़ कर। लोगों की ताकत से तूने आसमान में सूरज को उठा दिया है।
Mantra 23
अद्रिभिः सुतः पवसे पवित्र आँ इन्दविन्द्रस्य जठरेष्वाविशन् । त्वं नृचक्षा अभवो विचक्षण सोम गोत्रमङ्गिरोभ्योऽवृणोरप ॥
सोम को पत्थर से निचोड़ा जा रहा है, और वो अपने आप को साफ कर रहा है। वो छन्नी के थ्रू जाता है और इंद्र के पेट में पहुँचता है। सोम लोगों के लिए एक बड़ा दृष्टि वाला बन गया। उसने अंगिरसो के लिए छुपा हुआ गो-शाला खोल दी।
Mantra 24
त्वां सोम पवमानं स्वाध्योऽनु विप्रासो अमदन्नवस्यवः । त्वां सुपर्ण आभरद्दिवस्परीन्दो विश्वाभिर्मतिभिः परिष्कृतम् ॥
सोम साफ हो रहा है और रिशि लोग उसके पीछे चले जाते हैं। वो खुश होते हैं और उससे मदद माँगते हैं। एक सुंदर पक्षी ने सोम को आसमान के पार से लाया है। सबके विचार से वो परफेक्ट बन गया है।
Mantra 25
अव्ये पुनानं परि वार ऊर्मिणा हरिं नवन्ते अभि सप्त धेनवः । अपामुपस्थे अध्यायवः कविमृतस्य योना महिषा अहेषत ॥
सोम को भेड़ के ऊन में साफ किया जा रहा है। पानी की लहर उसे घेर लेती है और छन्नी में बंद होता है। सात गायें उस पीले रंग वाले झुकती हैं। पानी के बीच में बड़े लोगों ने एक रिशि को बिठाया है। वो सच्चाई के गर्भ की तरफ चीख़ उठते हैं।
Mantra 26
इन्दुः पुनानो अति गाहते मृधो विश्वानि कृण्वन्त्सुपथानि यज्यवे । गाः कृण्वानो निर्णिजं हर्यतः कविरत्यो न क्रीळन्परि वारमर्षति ॥
सोम जो साफ हो रहा है, वो हर रुकावत पार कर जाता है। यज्ञ करने वाले के लिए वो रास्ता आसान बना देता है। वो रोशनी की किरण पैदा करता है और चमकदार कपड़ा बनाता है। वो एक तेज़ घोड़े की तरह खेलता हुआ छन्नी के आस-पास बहता है।
Mantra 27
असश्चतः शतधारा अभिश्रियो हरिं नवन्तेऽव ता उदन्युवः । क्षिपो मृजन्ति परि गोभिरावृतं तृतीये पृष्ठे अधि रोचने दिवः ॥
सोम रुकता नहीं, सौ धारा में बहता है। चमक वाली शक्तियाँ उस सुनहरे पे झुकती हैं। वो पानी लेकर नीचे आती हैं। तेज़ शक्तियाँ उसे साफ करती हैं और रोशनी से उसे घेर लेती हैं। यह आसमान की चमकदार जगह पर होता है।
Mantra 28
तवेमाः प्रजा दिव्यस्य रेतसस्त्वं विश्वस्य भुवनस्य राजसि । अथेदं विश्वं पवमान ते वशे त्वमिन्दो प्रथमो धामधा असि ॥
यह सारी प्रजा तुम्हारी है, भगवान के बीज से पैदा हुई। तुम सारी दुनिया के ऊपर राज करते हो। इसलिए पूरा विश्व तुम्हारे कंट्रोल में है, पवमाना। तुम पहले हो इन्दु, तुमने ही सबकी नीव डाली।
Mantra 29
त्वं समुद्रो असि विश्ववित्कवे तवेमाः पञ्च प्रदिशो विधर्मणि । त्वं द्यां च पृथिवीं चाति जभ्रिषे तव ज्योतींषि पवमान सूर्यः ॥
तुम समुंदर हो, सब कुछ जानने वाले रिशि। पाँच दिशाएँ तुम्हारी है, इस बड़े नियम में। तुम दुनिया और आसमान दोनों से पार ले गए। तुम्हारी रोशनी पवमाना, वो सूर्य है।
Mantra 30
त्वं पवित्रे रजसो विधर्मणि देवेभ्यः सोम पवमान पूयसे । त्वामुशिजः प्रथमा अगृभ्णत तुभ्येमा विश्वा भुवनानि येमिरे ॥
तुम छन्नी में साफ हो रहे हो, बड़े नियम के क्षेत्र में, देवियों के लिए सोम पवमाना। पहले जो लोग अग्नि ढूँढ़ते थे, उन्होंने तुम्हे पकड़ा। तुम्हारे लिए ही सारी दुनिया अपनी जगह पर जम गई।
Mantra 31
प्र रेभ एत्यति वारमव्ययं वृषा वनेष्वव चक्रदद्धरिः । सं धीतयो वावशाना अनूषत शिशुं रिहन्ति मतयः पनिप्नतम् ॥
वो आगे बढ़ रहा है, उस छन्नी से पार जो कभी खत्म नहीं होती। बैल जैसा बलवान, पीले रंग का, जंगल में चीखता है। जगी हुई सोचें साथ में गा रही हैं। इच्छाएँ उस बच्चे को पाल रही हैं, जो चुपके-चुपके बढ़ रहा है।
Mantra 32
स सूर्यस्य रश्मिभिः परि व्यत तन्तुं तन्वानस्त्रिवृतं यथा विदे । नयन्नृतस्य प्रशिषो नवीयसीः पतिर्जनीनामुप याति निष्कृतम् ॥
वो सूर्य की किरणों से लपेट रहा है, धागा तान रहा है, तीन तरह से ताकि सही जान हो। नए-नए नियम ले कर चल रहा है, सब लोगों का मालिक साफ रास्ता पकड़ कर आ रहा है।
Mantra 33
राजा सिन्धूनां पवते पतिर्दिव ऋतस्य याति पथिभिः कनिक्रदत् । सहस्रधारः परि षिच्यते हरिः पुनानो वाचं जनयन्नुपावसुः ॥
यह नदियों का राजा है, आसमान का मालिक। वो सीधे रास्ते पर चलता है, ज़ोर से आवाज़ करता है। हज़ारों धारा से बहता है, पीला पानी चारों तरफ फैलता है। साफ़ हो के यह शक्ति पैदा करता है, अंदर की दौलत पास लाता है।
Mantra 34
पवमान मह्यर्णो वि धावसि सूरो न चित्रो अव्ययानि पव्यया । गभस्तिपूतो नृभिरद्रिभिः सुतो महे वाजाय धन्याय धन्वसि ॥
हे पवमान, तुम बड़े तूफ़ान की तरह बह रहे हो। सूरज की तरह चमक रहे हो, जो रास्ते कभी खत्म नहीं होते। लोग तुम्हे पकड़ के साफ़ करते हैं, पत्थर से निचोड़ते हैं। तुम बड़ी ताकत के लिए, बड़े धन्य के लिए मेहनत कर रहे हो।
Mantra 35
इषमूर्जं पवमानाभ्यर्षसि श्येनो न वंसु कलशेषु सीदसि । इन्द्राय मद्वा मद्यो मदः सुतो दिवो विष्टम्भ उपमो विचक्षणः ॥
खाने की शक्ति और ताकत ले के तुम बह रहे हो। बाज़ की तरह अपने घोंसले में बैठ जाते हो बर्तन में। तुम इंद्र के लिए खुशी का प्याला हो, नशा देने वाला। तुम आसमान को संभालते हो, सबसे ऊपर हो, सब देखते हो।
Mantra 36
सप्त स्वसारो अभि मातरः शिशुं नवं जज्ञानं जेन्यं विपश्चितम् । अपां गन्धर्वं दिव्यं नृचक्षसं सोमं विश्वस्य भुवनस्य राजसे ॥
सात बहनें, माँ जैसी, एक नए बच्चे को जन्म देती हैं। वो बच्चा जीतने वाला है, सब समझता है। वो पानी में सोम को दिखाते हैं, जो देवता है, लोगों को देखने वाला। वो पूरे दुनिया का राजा है।
Mantra 37
ईशान इमा भुवनानि वीयसे युजान इन्दो हरितः सुपर्ण्यः । तास्ते क्षरन्तु मधुमद्घृतं पयस्तव व्रते सोम तिष्ठन्तु कृष्टयः ॥
तुम इन दुनिया का मालिक हो, अपनी शक्ति से आगे बढ़ते हो। चमकते पंख वाली शक्ति को साथ ले कर चलते हो। तुम्हारे लिए मीठा घी और दूध बहाए। तुम्हारे नियम में, सोम, लोग पक्के रहें।
Mantra 38
त्वं नृचक्षा असि सोम विश्वतः पवमान वृषभ ता वि धावसि । स नः पवस्व वसुमद्धिरण्यवद्वयं स्याम भुवनेषु जीवसे ॥
सोम, तुम इंसानों के लिए आँखों वाले हो, सब तरफ से देखने वाले। तुम पवित्र करने वाले बैल हो, जो हर जगह दौड़ते हो। हमारे लिए साफ हो जाओ, धन और सोना जैसी चमक लाओ। हम इस दुनिया में सच्चा जीवन जीयें।
Mantra 39
गोवित्पवस्व वसुविद्धिरण्यविद्रेतोधा इन्दो भुवनेष्वर्पितः । त्वं सुवीरो असि सोम विश्ववित्तं त्वा विप्रा उप गिरेम आसते ॥
सोम, तुम खुद को साफ करो, रोशनी ढूँढने वाले, धन ढूँढने वाले, सोना जैसी चमक ढूँढने वाले। तुम बीज रखने वाले हो, इस दुनिया में बने हो। तुम बहादुरी देने वाले हो, सब कुछ जानने वाले। रिशि लोग तुम्हारे पास बैठे हैं, गाना गाते हैं।
Mantra 40
उन्मध्व ऊर्मिर्वनना अतिष्ठिपदपो वसानो महिषो वि गाहते । राजा पवित्ररथो वाजमारुहत्सहस्रभृष्टिर्जयति श्रवो बृहत् ॥
मधुरी की लहर उठती है, पेड़-पौधे हिलने लगते हैं। पानी में दाखिल होके बड़ा बलवान उसमें घूसता है। राजा पवित्र रथ पर बैठ के ताकत पकड़ता है। हज़ार चमक के साथ वो बड़ा नाम जीतता है।
Mantra 41
स भन्दना उदियर्ति प्रजावतीर्विश्वायुर्विश्वाः सुभरा अहर्दिवि । ब्रह्म प्रजावद्रयिमश्वपस्त्यं पीत इन्दविन्द्रमस्मभ्यं याचतात् ॥
वो खुशियाँ उठाता है, बच्चे देता है, सब को जीवन देता है, दिन-रात अच्छा रखता है। जब सोम को पिया जाता है, वो इंद्र को हमारे लिए बोलने के लिए भेजता है। बच्चे दे, और सफर के लिए ताकत दे।
Mantra 42
सो अग्रे अह्नां हरिर्हर्यतो मदः प्र चेतसा चेतयते अनु द्युभिः । द्वा जना यातयन्नन्तरीयते नरा च शंसं दैव्यं च धर्तरि ॥
वो चमकता हुआ दिन के आगे है, मस्ती लाता है, रोशनी चलाता है। दिमाग से जागता है, रोशनी के पीछे चलता है। दो किस्म के लोगों के बीच चलता है, दोनों को ले चलता है। इंसान की बात और भगवान की बात, दोनों को संभालता है।
Mantra 43
अञ्जते व्यञ्जते समञ्जते क्रतुं रिहन्ति मधुनाभ्यञ्जते । सिन्धोरुच्छ्वासे पतयन्तमुक्षणं हिरण्यपावाः पशुमासु गृभ्णते ॥
वोह लोग तेल लगा रहे हैं, फैला रहे हैं, सब मिलकर लगा रहे हैं। शहद से उसकी इच्छा को चख रहे हैं और उसे मीठा बना के नहा रहे हैं। नदी के ऊपर जब वोह उड़ने वाला बैल उड़ता है, तोह सोने जैसी चमक वाले लोग उस्से पकड़ लेते हैं। यह जीवन की शक्ति है जो उनके हाथ में आ गई।
Mantra 44
विपश्चिते पवमानाय गायत मही न धारात्यन्धो अर्षति । अहिर्न जूर्णामति सर्पति त्वचमत्यो न क्रीळन्नसरद्वृषा हरिः ॥
सब गाना गा रहे हैं उसके लिए जो सब समझता है और साफ हो रहा है। बड़ी नदी की तरह निचोड़ा हुआ रस बह रहा है। साँप की तरह वोह पुरानी खाल छोड़ के आगे बढ़ रहा है। खेलते हुए घोड़े की तरह चमकता बैल आगे दौड़ रहा है।
Mantra 45
अग्रेगो राजाप्यस्तविष्यते विमानो अह्नां भुवनेष्वर्पितः । हरिर्घृतस्नुः सुदृशीको अर्णवो ज्योतीरथः पवते राय ओक्यः ॥
जो राजा आगे चलता है, पानी वाला, उसकी ताकत बढ़ रही है। वोह दिन नापता है और दुनिया में स्थित है। चमक वाला, घी जैसा चमकता, देखने में अच्छा, समुंदर जैसा विदेश वाला, रोशनी की रथ में बैठ के साफ हो रहा है। यह संपत्ति के लिए है।
Mantra 46
असर्जि स्कम्भो दिव उद्यतो मदः परि त्रिधातुर्भुवनान्यर्षति । अंशुं रिहन्ति मतयः पनिप्नतं गिरा यदि निर्णिजमृग्मिणो ययुः ॥
आसमान से एक खंभा छोड़ दिया गया है जो सब पकड़ के रखता है। वोह खुशी ऊपर उठी और तीन दुनिया में फैल गई। सोचने वाली शक्ति उस चमकते किरण को चख कर साफ करती है। जब गाने वाले लोग अपना गाना लेकर आगे बढ़ते हैं, तोह उसे चमकदार कपड़े पहना देते हैं।
Mantra 47
प्र ते धारा अत्यण्वानि मेष्यः पुनानस्य संयतो यन्ति रंहयः । यद्गोभिरिन्दो चम्वोः समज्यस आ सुवानः सोम कलशेषु सीदसि ॥
तुम्हारी धारें आगे बढ़ रही हैं। जब तुम साफ हो रहे हो और सीधी राह पर आ रहे हो, तोह तेज़ पानी दौड़ रहा है। जब तुम रोशनी के किरणों के साथ दो प्यालों में मिल रहे हो, तब तुम निचोड़ के निकले हो। हे सोम, तुम उस बर्तन में बैठ गए हो जहाँ पूरा करना होता है।
Mantra 48
पवस्व सोम क्रतुविन्न उक्थ्योऽव्यो वारे परि धाव मधु प्रियम् । जहि विश्वान्रक्षस इन्दो अत्रिणो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः ॥
सोम, तू खुद को साफ कर। तू जानता है क्या सही है। लोग तेरे लिए गाना गाते हैं। तू उस कपड़े के फ़िल्टर के पास से गुज़रता है, मीठा पानी ले के। सारी बुरी ताक़तें मारना, जो लोग खाते हैं वो अंधेरा। हम लोग सबके सामने बड़ी बात बोलें, ताकतवाले बन के।
The hymn opens with the image of swift, thought-driven Soma currents surging forward, divine drops settling around the vessel as they purify (9.86.1).
It develops the purification imagery—wool, sieve, waves, waters—and elevates it into a vision of Soma as kavi placed in the ‘womb of ṛta,’ with the ritual actions mirroring cosmic order (e.g., 9.86.25).
Soma is invoked as kratu-vit (knower of the will) whose clarified sweetness becomes a force of protection and victory, destroying rākṣasas and hostile powers (9.86.48).
The hymn resolves in communal aspiration: empowered by Soma, the singers seek to speak the Vast (bṛhat) in the assembly and to stand strong with heroic inner energies.
प्र त आशवः पवमान धीजवो मदा अर्षन्ति रघुजा इव त्मना । दिव्याः सुपर्णा मधुमन्त इन्दवो मदिन्तमासः परि कोशमासते ॥ṛtasya yonā
bṛhad vadema
It praises Soma as he is purified (pavamāna) through wool and strainers, becoming sweet, powerful, and fit for divine offering, while also supporting truth (ṛta) and strength for the worshippers.
These are the real ritual instruments and surroundings of Soma purification; the hymn also treats them as symbols of inner clarification—raw potency becoming clear, truthful inspiration.
It asks Soma to destroy hostile forces (rākṣasas, atriṇ) and to grant the community strong, ‘vast’ speech and heroic inner power in the sacred assembly.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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