
Sukta 9.85
Soma (for Indra; protective/exorcistic nuance against Rakṣas)
This Pavamāna Soma hymn celebrates the well-pressed Soma as it is purified, made fit for Indra, and empowered to drive away sickness and Rakṣas-like hostile forces. The verses move between the concrete ritual scene—filtering, cups, and priestly action—and a luminous cosmic vision in which Soma’s guardian-power (Gandharva motif) radiates through Heaven and Earth. Overall, the sukta frames Soma as both sacramental drink and a protective, exorcistic force that secures vitality, clarity, and victory.
Mantra 1
इन्द्राय सोम सुषुतः परि स्रवापामीवा भवतु रक्षसा सह । मा ते रसस्य मत्सत द्वयाविनो द्रविणस्वन्त इह सन्त्विन्दवः ॥
इंद्र के लिए सोम रस अच्छे से निचोड़ा गया है। चारों तरफ बहो। बिमारी और बुरी ताकत साथ निकल जाए। जो लोग दो मन के हैं वो इस रस को ना चाखें। चमकदार बूंदें यहाँ हों, सच्चा धन लेकर।
Mantra 2
अस्मान्त्समर्ये पवमान चोदय दक्षो देवानामसि हि प्रियो मदः । जहि शत्रूँरभ्या भन्दनायतः पिबेन्द्र सोममव नो मृधो जहि ॥
हम्मे जंग में आगे बढ़ा, सोम रस। तू देवताओं का काम और शक्ति है, उनका प्यारा रस। हमारे दुश्मनों को मार जो हमें पकड़ना चाहते हैं। इंद्र, सोम रस पी। हमें बचा और हमारे रास्ते में आने वाली चीज़ें हटा दे।
Mantra 4
सहस्रणीथः शतधारो अद्भुत इन्द्रायेन्दुः पवते काम्यं मधु । जयन्क्षेत्रमभ्यर्षा जयन्नप उरुं नो गातुं कृणु सोम मीढ्वः ॥
यह सोम रस हज़ारों रास्तों का है, सौ धारों वाला है। यह आश्चर्य है। इंद्र के लिए यह रस साफ हो रहा है, जैसे मीठा शहद जो दिल चाहता है। यह खेत जीत के उसपर बहता है। पानी जीत के हमारे लिए चौड़ा रास्ता बना दे, सोम रस। तू अच्छा वरदान देता है।
Mantra 5
कनिक्रदत्कलशे गोभिरज्यसे व्यव्ययं समया वारमर्षसि । मर्मृज्यमानो अत्यो न सानसिरिन्द्रस्य सोम जठरे समक्षरः ॥
सोम रस प्याले में आवाज़ कर रहा है। वो गो-भक्त लोगों के हाथों से तैयार हो रहा है। सही वक्त पर वो छेंटें से गुज़र के बाहर आ रहा है। जैसे तेज़ घोड़ा रेस जीतने के लिए तैयार होता है, वैसे ही सोम साफ़ होके इंद्र के पेट में जा रहा है।
Mantra 6
स्वादुः पवस्व दिव्याय जन्मने स्वादुरिन्द्राय सुहवीतुनाम्ने । स्वादुर्मित्राय वरुणाय वायवे बृहस्पतये मधुमाँ अदाभ्यः ॥
हे सोम, मीठा बनो और बहक। देवी शक्ति के लिए बहक। इंद्र के लिए बहक, जिसका नाम अच्छा है। मित्र, वरुण और वायु के लिए बहक। भस्पति के लिए भी शहद जैसा मीठा बन कर बहक।
Mantra 7
अत्यं मृजन्ति कलशे दश क्षिपः प्र विप्राणां मतयो वाच ईरते । पवमाना अभ्यर्षन्ति सुष्टुतिमेन्द्रं विशन्ति मदिरास इन्दवः ॥
दस हाथ प्याले में सोम को साफ़ कर रहे हैं। रिशि लोगों के विचार और बातें आगे बढ़ रही हैं। साफ़ होके वो अच्छे गीत की तरफ़ बहक रहे हैं। यह नशा वाली बूंदें इंद्र के पास जा रही हैं।
Mantra 8
पवमानो अभ्यर्षा सुवीर्यमुर्वीं गव्यूतिं महि शर्म सप्रथः । माकिर्नो अस्य परिषूतिरीशतेन्दो जयेम त्वया धनंधनम् ॥
जब सोम साफ़ हो रहा है, वो हमारे पास बहक। वो ताकत ला रहा है, चमकता खेत और बड़ा आराम। कोई भी अंधेरा हम पर हावी न हो। इन्दु, तेरे साथ हम धन पे धन जीते रहें।
Mantra 9
अधि द्यामस्थाद्वृषभो विचक्षणोऽरूरुचद्वि दिवो रोचना कविः । राजा पवित्रमत्येति रोरुवद्दिवः पीयूषं दुहते नृचक्षसः ॥
वो बैल बन के आसमान के ऊपर खड़ा है। वो सब देखने वाला है। आसमान को चमका दिया है। राजा जैसा छेंटें से गुज़र के आवाज़ कर रहा है। रिशि लोग आसमान से अमृत निकाल रहे हैं।
Mantra 10
दिवो नाके मधुजिह्वा असश्चतो वेना दुहन्त्युक्षणं गिरिष्ठाम् । अप्सु द्रप्सं वावृधानं समुद्र आ सिन्धोरूर्मा मधुमन्तं पवित्र आ ॥
आसमान के ऊपर कुछ ताकें हैं जो कभी थकते नहीं। वो सोम को निकालते हैं जैसे गाय दूध देती है। यह सोम पहाड़ों पे खड़ा है। पानी में एक बूंद बड़ी हो रही है। समुंदर से, नदी की लहरों से, मीठा रस आता है। वो छन्नी के पास पहुँचता है।
Mantra 11
नाके सुपर्णमुपपप्तिवांसं गिरो वेनानामकृपन्त पूर्वीः । शिशुं रिहन्ति मतयः पनिप्नतं हिरण्ययं शकुनं क्षामणि स्थाम् ॥
आसमान के ऊपर एक सुंदर पंछी आया है। उसके पंख अच्छे हैं। वो पुरानी आवाज़ें बनी हैं जो इस पंछी को बनाती हैं। यह पंछी ज़मीन पे बस गया है। सोना जैसा चमकता है। यह हमेशा चलता रहता है। इसकी सोचें इस बच्चे को चाट्टी करती हैं और प्यार देती हैं।
Mantra 12
ऊर्ध्वो गन्धर्वो अधि नाके अस्थाद्विश्वा रूपा प्रतिचक्षाणो अस्य । भानुः शुक्रेण शोचिषा व्यद्यौत्प्रारूरुचद्रोदसी मातरा शुचिः ॥
गंधर्व आसमान के ऊपर खड़ा है। वो सीधा खड़ा है। वो सब चीज़ें देख रहा है। उसकी रोशनी चमक रही है, बिल्कुल साफ रोशनी। उसने दुनिया और ज़मीन दोनों को चमका दिया। दोनों माँ जैसी हैं, अब साफ चमक रही हैं।
Soma is invoked to flow for Indra, simultaneously expelling sickness and Rakṣas-like darkness, and guarding the sacred rasa from the ‘double-minded.’
The hymn dwells on the mechanics and poetry of purification—hands, cup, and inspired speech—showing Soma’s bright drops becoming fit to enter Indra and empower praise and victory.
A visionary elevation: the Gandharva-guardian stands aloft, beholding all forms, while Soma’s radiance flashes out and makes Heaven and Earth shine—purification becomes cosmic illumination.
The purified Soma is established as a beneficent, wealth-bringing, order-protecting power: fit for Indra, hostile forces repelled, and the rite secured in clarity and light.
apāmīvā bhavatu rakṣasā saha
daśa kṣipaḥ
ūrdhvo gandharvo adhi nāke asthāt
It praises Soma as it is purified for offering to Indra, asking that the clarified Soma drive away sickness and hostile forces (Rakṣas) and bring strength, clarity, and true wealth.
The verse warns that Soma’s sacred essence should not be approached with divided intention or deceit; purity of motive is part of the rite’s power and protection.
Here the Gandharva functions as a lofty guardian/witness of Soma, expressing Soma’s radiant, overseeing aspect—an image that turns the ritual purification into a cosmic illumination of Heaven and Earth.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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