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Sukta 10.60
Gayatri (probable: short 3-pāda structure typical of gāyatrī-stanza)
This hymn moves from reverent approach to a radiant, praised power toward a distinctly life-restoring, healing register: calling back breath and vitality, reaffirming kinship, and urging the afflicted to “come forth.” It culminates in the consecration of the human hand as a universal medicine (viśvabheṣaja), an auspicious touch that transmits well-being and peace.
Mantra 1
आ जनं त्वेषसंदृशं माहीनानामुपस्तुतम् । अगन्म बिभ्रतो नमः ॥
हम उसके पास आए हैं जो चमकता है और सब देख सकता है। बड़े लोग उसकी तारीफ करते हैं। हम अपना नमन लेकर आए हैं, दिल से भगवान की तरफ उठा के।
Mantra 2
असमातिं नितोशनं त्वेषं निययिनं रथम् । भजेरथस्य सत्पतिम् ॥
मैं उस रथ को पकड़ लेता हूँ जो रुकता नहीं है और ठीक से जोड़ा गया है। वो चमकता है और सीधा चलता है। मैं उस रथ के मालिक को ढूंढता हूँ जो सच का रास्ता दिखाता है।
Mantra 3
यो जनान्महिषाँ इवातितस्थौ पवीरवान् । उतापवीरवान्युधा ॥
वो इंसान से बड़ा हो गया है जैसे बड़ा बैल सबसे आगे निकल जाता है। उसके पास रक्षा की ताकत है। लड़ाई में भी उसके पास दुश्मनों को भगाने की ताकत है।
Mantra 4
यस्येक्ष्वाकुरुप व्रते रेवान्मराय्येधते । दिवीव पञ्च कृष्टयः ॥
जिसकी नियम में इक्ष्वाकु आगे बढ़ता है, धन और खुशी से चमकता है। जैसे आसमान में पाँच खानदान उस रोशनी से बड़े होते हैं।
Mantra 5
इन्द्र क्षत्रासमातिषु रथप्रोष्ठेषु धारय । दिवीव सूर्यं दृशे ॥
इंद्र से यह प्रार्थना है कि वो अपनी ताकत रखे। जब भी लड़ाई हो, वो हमारे साथ हो। वो अपनी ताकत दिखाए, जैसे आसमान में सूरज चमकता है। सबको दिखाई दे, साफ साफ।
Mantra 6
अगस्त्यस्य नद्भ्यः सप्ती युनक्षि रोहिता । पणीन्न्यक्रमीरभि विश्वान्राजन्नराधसः ॥
अगस्त्य के पानी से सात ताकतें निकल के आएं। वो सब लाल-बाला हो, ताकत में। हे राजा, इन ताकतों से आगे बढ़ो। उन लोगों पे चारों तरफ से वार करो जो खुद ही खाते हैं और दूसरों को कुछ नहीं देते।
Mantra 7
अयं मातायं पितायं जीवातुरागमत् । इदं तव प्रसर्पणं सुबन्धवेहि निरिहि ॥
देखो, यह तुम्हारी माँ है, यह तुम्हारा बाप है। तुम्हारी जान आ गई है, तुम्हारा दम फिर से चल पड़ा है। तुम अब आज़ाद हो, कोई बंधन नहीं। हे अच्छे खंडान के बेटा, बाहर आ जाओ।
Mantra 8
यथा युगं वरत्रया नह्यन्ति धरुणाय कम् । एवा दाधार ते मनो जीवातवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये ॥
जैसे गाड़ी में बैल जोड़े जाते हैं और उनकी डोर कस के बाँध दी जाती है, वैसे ही तुम्हारा मन पक्का हो जाए। वो जीने के लिए पक्का हो, मरने के लिए नहीं। तुम्हारा बुरा न हो, तुम सफेद राहो।
Mantra 9
यथेयं पृथिवी मही दाधारेमान्वनस्पतीन् । एवा दाधार ते मनो जीवातवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये ॥
जैसे यह धरती बड़ी है और इसमें इतने सारे पेड़ हैं, वो सब धरती पकड़ के रखती है, वैसे ही तुम्हारा मन पक्का हो जाए। वो जीने के लिए पक्का हो, मरने के लिए नहीं। तुम्हारा बुरा न हो, तुम सफेद राहो।
Mantra 10
यमादहं वैवस्वतात्सुबन्धोर्मन आभरम् । जीवातवे न मृत्यवेऽथो अरिष्टतातये ॥
मैंने यम के पास से उस इंसान का दिमाग वापस लाया है जो पूरी तरह जुड़ा हुआ था। यह मैंने ज़िन्दगी के लिए किया है, मौत के लिए नहीं। अब वो सुरक्षित है, कोई टूटना नहीं है।
Mantra 11
न्यग्वातोऽव वाति न्यक्तपति सूर्यः । नीचीनमघ्न्या दुहे न्यग्भवतु ते रपः ॥
हवा नीचे की तरफ चलती है, सूरज भी नीचे की तरफ गरम करता है। गाय का दूध भी नीचे आता है बिना किसी नुकसान के। तुम्हारा बीमारी और तकलीफ भी ऐसे ही नीचे जाए और दूर हो जाए।
Mantra 12
अयं मे हस्तो भगवानयं मे भगवत्तरः । अयं मे विश्वभेषजोऽयं शिवाभिमर्शनः ॥
मेरा यह हाथ भगवान की कृपा से भरा है। यह और भी ज़्यादा शक्ति से भरा है। यह हाथ हर बीमारी ठीक करता है। इससे स्पर्श करने से शांति मिलती है।
It is a healing-oriented hymn that begins with reverent invocation of a radiant divine presence and then focuses on restoring breath, strength, and well-being, ending by empowering the healer’s hand as a channel of remedy.
It uses intimate, stabilizing language to re-anchor the person in life and belonging, then declares the return of vitality (life-breath) as a performative healing statement.
It means “this hand of mine is universal medicine”: the reciter treats the hand—especially in blessing or therapeutic touch—as a sacred instrument through which healing power is transmitted.
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