
Sukta 10.61
Traditionally connected with narrative material around Bṛhaspati/Angiras-complex in late RV; exact rishi attribution varies by Anukramaṇī traditions for 10.61 (often listed under a late seer-family).
Mixed/Allusive: mantric power (Brahman/Bṛhaspati impulse) with Rudra-force; inner battle motif; no single exclusive devatā in this verse.
Triṣṭubh (11-syllable cadence typical of narrative and battle hymns).
RV 10.61 is a late, triṣṭubh hymn that frames mantra (brahman) as a fierce, Rudra-like force active in an inner “battle,” where inspired speech and right will break hostile divisions and re-found the sacrifice in unity. It moves through Angiras/Bṛhaspati-style imagery of victorious word-power, names the radiant fire-principle as Bharga/Agni who seats the gods in a triple foundation, and ends by calling the Viśve Devāḥ to help in concord and clear discernment.
Mantra 1
इदमित्था रौद्रं गूर्तवचा ब्रह्म क्रत्वा शच्यामन्तराजौ । क्राणा यदस्य पितरा मंहनेष्ठाः पर्षत्पक्थे अहन्ना सप्त होतॄन् ॥
यह रुद्र की शक्ति वाला मंत्र है। इसे सही तरीके से बोला जाता है और इरादे के साथ किया जाता है। जब दो बड़े लोग इसे चलाते हैं, यह दुश्मन के बीच से गुज़र के सात लोगों को हटा देता है। यह सब एक जगह लाने के लिए होता है।
Mantra 2
स इद्दानाय दभ्याय वन्वञ्च्यवानः सूदैरमिमीत वेदिम् । तूर्वयाणो गूर्तवचस्तमः क्षोदो न रेत इतऊति सिञ्चत् ॥
वो देना चाहता है और आगे बढ़ना चाहता है। उसने वेदी को अच्छे ऑफरिंग्स से नाप लिया। वो सही बोलता है और आगे बढ़ता है। वो बीज की तरह शक्ति डालता है अंधेरे में नया काम शुरू करने के लिए।
Mantra 3
मनो न येषु हवनेषु तिग्मं विपः शच्या वनुथो द्रवन्ता । आ यः शर्याभिस्तुविनृम्णो अस्याश्रीणीतादिशं गभस्तौ ॥
जब भी कोई बुलावा आता है, एक ताकत दौड़ती है जैसे मन खुद चल रहा हो। रिशि लोग अपनी शक्ति से उसे पकड़ लेते हैं और आगे बढ़ जाते हैं। जो महान पुरुष है, वो अपनी किरणों से रास्ता साफ करता है। वो सीधा रास्ता बना देता है जहाँ पूजा हो सके।
Mantra 4
कृष्णा यद्गोष्वरुणीषु सीदद्दिवो नपाताश्विना हुवे वाम् । वीतं मे यज्ञमा गतं मे अन्नं ववन्वांसा नेषमस्मृतध्रू ॥
जब अंधेरी ताकत लाल किरणों पर आ जाती है, अश्विन भाइयों को बुलाता हूँ। आप आसमान के बेटे हो। मेरा यज्ञ स्वीकारो, मेरा खाना आके खा लो। तुम लोग जो बड़ा काम करते हो, मेरी इच्छा को भूलना मत। मेरा काम चलता रहे, यही चाहिए।
Mantra 5
प्रथिष्ट यस्य वीरकर्ममिष्णदनुष्ठितं नु नर्यो अपौहत् । पुनस्तदा वृहति यत्कनाया दुहितुरा अनुभृतमनर्वा ॥
इसका काम बहुत पक्का है, मज़बूत है और सही चल रहा है। पुरुष की ताकत रास्ते में जो रुकावटें हैं, उनको हटा देती है। फिर से वो इसको बड़ा करता है। जो कुछ लड़की से, बेटी से आया था, वो गिरने नहीं देता। यह शक्ति काम को वापस ला देती है।
Mantra 6
मध्या यत्कर्त्वमभवदभीके कामं कृण्वाने पितरि युवत्याम् । मनानग्रेतो जहतुर्वियन्ता सानौ निषिक्तं सुकृतस्य योनौ ॥
जब बीच में काम हुआ, जब पास आके इच्छा जगी। पिता और जवान में प्यार पैदा हुआ। मन से लगे हुए, वो बीज छोड़ के चले गए। वो बीज ऊपर पहाड़ पर गिराया, जहाँ सही जगह थी बनने के लिए।
Mantra 7
पिता यत्स्वां दुहितरमधिष्कन्क्ष्मया रेतः संजग्मानो नि षिञ्चत् । स्वाध्योऽजनयन्ब्रह्म देवा वास्तोष्पतिं व्रतपां निरतक्षन् ॥
जब पिता अपनी बेटी के पास गया और ज़मीन के साथ बीज गिराया। तब भगवान लोगों ने सही जगह से मंत्र और सत्य पैदा किया। उन्होंने वास्तोस्पति को बनाया जो व्रत रखता है और घर का मालिक है।
Mantra 8
स ईं वृषा न फेनमस्यदाजौ स्मदा परैदप दभ्रचेताः । सरत्पदा न दक्षिणा परावृङ्न ता नु मे पृशन्यो जगृभ्रे ॥
वो जैसे बैल लड़ाई में झाग उगा देता है, उसने भी ऐसा किया। फिर छोटी सोच दूर हो गई और वो आगे बढ़ गया। सही काम करने की शक्ति रुक गई और मोड़ लिया। लेकिन अब वो बुरी ताकें मुझे पकड़ नहीं सकती, मैं उनका दबाव नहीं मानता।
Mantra 9
मक्षू न वह्निः प्रजाया उपब्दिरग्निं न नग्न उप सीददूधः । सनितेध्मं सनितोत वाजं स धर्ता जज्ञे सहसा यवीयुत् ॥
जल्दी से, जैसे कोई सामान उठा के ले जाता है, वैसे ही संतान का पुकार पास आता है। जैसे नंगी आग छुपके से बैठ जाती है, वैसे ही यह छिपने वाले स्थान के पास है। यह लकड़ी जीता है और ताकत भी जीता है। यह धारने वाला पैदा हुआ है, नौजवान, अपनी ताकत से काम चलाता है।
Mantra 10
मक्षू कनायाः सख्यं नवग्वा ऋतं वदन्त ऋतयुक्तिमग्मन् । द्विबर्हसो य उप गोपमागुरदक्षिणासो अच्युता दुदुक्षन् ॥
जल्दी से नवग्वा नाम के लोग किसी नई लड़की के साथ दोस्ती में घुल गए। वो सच बोलते थे और सच के साथ चले। इन लोगों में डबल ताकत थी, वो गाय चराने वाले के पास गए। लेकिन उनके पास सही काम करने की बात नहीं थी, इसलिए उन्होंने ऐसा दूध निकाला जो नहीं निकलना चाहिए था।
Mantra 11
मक्षू कनायाः सख्यं नवीयो राधो न रेत ऋतमित्तुरण्यन् । शुचि यत्ते रेक्ण आयजन्त सबर्दुघायाः पय उस्रियायाः ॥
जल्दी से उस नई लड़की से एक नई दोस्ती बनी। यह एक ऐसी देन है जैसे खुशी का बीज, सच की तरफ बढ़ता है। हे साफ वाले, जब लोग तुम्हारे पास तुम्हारा खजाना ले कर आते हैं, तब उस गाय से दूध निकलता है जो हमेशा देती है, चमक वाली रोशनी का।
Mantra 12
पश्वा यत्पश्चा वियुता बुधन्तेति ब्रवीति वक्तरी रराणः । वसोर्वसुत्वा कारवोऽनेहा विश्वं विवेष्टि द्रविणमुप क्षु ॥
जब अलग हुई ताकें फिर से जाग उठती हैं, जैसे पैडा जल्दी से अपना रास्ता ढूंढ लेती है, तब खुशी से बोलने वाला यह बात बताता है। यहाँ गाने वाले लोग धन देने वाले के धन से अपने आप को ढाक लेते हैं और पूरी संपत्ति जल्दी से पास खींच लेते हैं।
Mantra 13
तदिन्न्वस्य परिषद्वानो अग्मन्पुरू सदन्तो नार्षदं बिभित्सन् । वि शुष्णस्य संग्रथितमनर्वा विदत्पुरुप्रजातस्य गुहा यत् ॥
लोग बहुत सारी सभा में बैठ के आए थे। वो कुछ तोड़ना चाहते थे जो इंसान के लिए नहीं था। एक ताकत ने शुष्ण की पकड़ ढूँढ ली जो छुपी हुई थी। वो ताकत ने गुफा में उसका बंधन ढूँढ लिया जो बहुत औलाद पैदा करता था।
Mantra 14
भर्गो ह नामोत यस्य देवाः स्वर्ण ये त्रिषधस्थे निषेदुः । अग्निर्ह नामोत जातवेदाः श्रुधी नो होतॠतस्य होताध्रुक् ॥
भर्ग उसका नाम है। भगवान उसमें बैठे हैं तीन स्थानों में, चमक के जैसे। अग्नि भी उसका नाम है, जातवेदस कहते हैं। हे सच का पुजारी, हमारी सुन। तू वो होता है जो हवन करता है और कभी धोखा नहीं देता।
Mantra 15
उत त्या मे रौद्रावर्चिमन्ता नासत्याविन्द्र गूर्तये यजध्यै । मनुष्वद्वृक्तबर्हिषे रराणा मन्दू हितप्रयसा विक्षु यज्यू ॥
वो दोनों देवता रुद्र की चमक ले के आते हैं। नासत्य कहते हैं उन्हें। इंद्र, इनकी पूजा करनी चाहिए ताकि उद्धार हो। यह लोग खुश हैं जैसे इंसान हवन के वक्त। कुशा बिछा के बैठते हैं, भोग लगा के पुकारते हैं। सब लोगों में इन्हे बुलाया जाता है।
Mantra 16
अयं स्तुतो राजा वन्दि वेधा अपश्च विप्रस्तरति स्वसेतुः । स कक्षीवन्तं रेजयत्सो अग्निं नेमिं न चक्रमर्वतो रघुद्रु ॥
यह राजा है जिसको मैं प्रणाम करता हूँ। वो सब ठीक करता है। रिशि पानी पार करता है अपना पुल बना के। उसने कक्षीवन्त को हिला दिया। उसने अग्नि को चलाया, जैसे पहिया घूमता है, जैसे घोड़ा दौड़ता है।
Mantra 17
स द्विबन्धुर्वैतरणो यष्टा सबर्धुं धेनुमस्वं दुहध्यै । सं यन्मित्रावरुणा वृञ्ज उक्थैर्ज्येष्ठेभिरर्यमणं वरूथैः ॥
वो दोनों तरफ का रिश्ता रखता है। वो पार कराता है। वो यज्ञ करता है ताकि गाय और घोड़े से दूध मिले। मित्र और वरुण के साथ गाते हैं। बड़े बड़े देवताओं के साथ अर्यमन को भी साथ ले आते हैं।
Mantra 18
तद्बन्धुः सूरिर्दिवि ते धियंधा नाभानेदिष्ठो रपति प्र वेनन् । सा नो नाभिः परमास्य वा घाहं तत्पश्चा कतिथश्चिदास ॥
आसमान में जो ज्ञानी रिशि है, वो तुम्हारे ख़याल को सही जगह पे सेट करता है। नाभान्नेदिष्ठ नाम का रिशि बोलता है, ढूंढता हुआ और इच्छा रखता हुआ। यह हमारा सबसे बड़ा केंद्र है, इस जीवन का मेन हिस्सा। मैं भी बाद में उसमें शामिल हो गया कुछ तरह से।
Mantra 19
इयं मे नाभिरिह मे सधस्थमिमे मे देवा अयमस्मि सर्वः । द्विजा अह प्रथमजा ऋतस्येदं धेनुरदुहज्जायमाना ॥
यह मेरा केंद्र है, यहीं मेरा स्थान है। यह मेरे सारे देवता हैं, मैं पूरा खुद यही हूँ। मैं दो बार पैदा हुआ, सत्य का पहला पैदा हुआ बेटा। यह गाय पैदा होते ही मुझे ज्ञान का दूध पिलाती है।
Mantra 20
अधासु मन्द्रो अरतिर्विभावाव स्यति द्विवर्तनिर्वनेषाट् । ऊर्ध्वा यच्छ्रेणिर्न शिशुर्दन्मक्षू स्थिरं शेवृधं सूत माता ॥
फिर खुशी वाला चमकता हुआ देवता नीचे आता है, दो तरफ मुड़ता हुआ, जंगल में जीता हुआ। जब लाइन ऊपर उठती है, जैसे बच्चे का दाँत निकलता है, तब माँ जल्दी से स्थिर और अच्छा बढ़ता हुआ पैदा करती है।
Mantra 21
अधा गाव उपमातिं कनाया अनु श्वान्तस्य कस्य चित्परेयुः । श्रुधि त्वं सुद्रविणो नस्त्वं याळाश्वघ्नस्य वावृधे सूनृताभिः ॥
फिर चमकती किरणें कन्या की राह पे चल पड़ी, और किसी भी ढूंढने वाले कुत्ते से आगे निकल गई। हे धन देने वाले, हमारी सुन। तू सच और सही बातों से हमारे अंदर दुश्मन की ताकत को मारने वाली शक्ति बढ़ाता है।
Mantra 22
अध त्वमिन्द्र विद्ध्यस्मान्महो राये नृपते वज्रबाहुः । रक्षा च नो मघोनः पाहि सूरीननेहसस्ते हरिवो अभिष्टौ ॥
हे इंद्र, हमें जान, हमें अपनी नज़र में रख बड़े धन के लिए। हे लोगों के राजा, तेरा हाथ वज्र वाला है। हे देने वाले, हमारी रक्षा कर। हमारे ज्ञानी नेताओं की सुरक्षा कर। हे घोड़े वाले, तुम्हारी मदद में कोई परेशानी नहीं, तुम हमारे साथ खड़े रहो।
Mantra 23
अध यद्राजाना गविष्टौ सरत्सरण्युः कारवे जरण्युः । विप्रः प्रेष्ठः स ह्येषां बभूव परा च वक्षदुत पर्षदेनान् ॥
दो राजा थे जो रोशनी ढूंढ रहे थे। उन्होंने एक ताकत चलाई जो तेज़ी से गई। एक रिशि जो सबसे प्यारा था, उनका लीडर बन गया। वो उनको आगे ले गया और पार करके ले आया।
Mantra 24
अधा न्वस्य जेन्यस्य पुष्टौ वृथा रेभन्त ईमहे तदू नु । सरण्युरस्य सूनुरश्वो विप्रश्चासि श्रवसश्च सातौ ॥
अब इस जीतने वाले के लिए हम मेहनत करते हैं। यह मेहनत बेकार नहीं है। तू उसका बेटा है, एक घोड़ा जैसे तेज़ चलता है। तू एक रिशि भी है और नाम कमाने में ताकत है।
Mantra 25
युवोर्यदि सख्यायास्मे शर्धाय स्तोमं जुजुषे नमस्वान् । विश्वत्र यस्मिन्ना गिरः समीचीः पूर्वीव गातुर्दाशत्सूनृतायै ॥
अगर तुम्हारी दोस्ती के लिए यह लोग स्तुति सुन लें। जो शब्द ठीक से जुड़ते हैं, वो सब उसमें आ जाते हैं। पुराने रास्ते की तरह, यह रास्ता सच्चाई की तरफ ले जाता है।
Mantra 26
स गृणानो अद्भिर्देववानिति सुबन्धुर्नमसा सूक्तैः । वर्धदुक्थैर्वचोभिरा हि नूनं व्यध्वैति पयस उस्रियायाः ॥
वो पानी के साथ भगवान की स्तुति करता है। अच्छे शब्द और गान से वो बढ़ता है। अब रास्ता खुल रहा है और दूध की धारा निकल रही है।
Mantra 27
त ऊ षु णो महो यजत्रा भूत देवास ऊतये सजोषाः । ये वाजाँ अनयता वियन्तो ये स्था निचेतारो अमूराः ॥
हे भगवान, तुम हमारे लिए बड़ी मदद बनो। तुम लोग जो ताकत ले कर आगे बढ़ते हो, जो चारों तरफ हो, जो सही फैसला करते हो, तुम हमारे साथ हो।
A fierce, well-shaped inspired Word (brahman) is introduced as effective through will and skill within an inner battle.
Angiras/Bṛhaspati-style victory logic unfolds: the mantra, set in motion by ancestral ‘fathers’ of the work, crosses hostile ground and breaks divisive offering-forces; the theology turns to naming and identification of the divine fire-principle.
The explicit naming revelation: Bharga is named as the radiant seat of the gods in the triple foundation, and Agni Jātavedas is hailed as the undeceiving Hotar of ṛta.
The hymn widens from the specific force of mantra/fire to a collective invocation of the All-Gods, asking for united help, forward-leading plenitude (vāja), wide movement, and clear, undeluded discernment.
gūrtavacā brahma (well-uttered inspired Word)
bhargo ha nāma… agnir ha nāma… hotādhru k
nicetāro amūrāḥ (discerning, unbewildered)
It presents mantra (brahman) as a powerful, even fierce force that overcomes inner and outer obstacles, then identifies the purifying radiance (Bharga) with Agni Jātavedas and ends by asking all the gods to help in unity.
It uses the language of conflict to describe how disciplined speech and will defeat obstruction and division—an ‘inner battle’ where scattered impulses are brought back into one coherent sacrifice and purpose.
Bharga is the radiant, purifying brilliance associated here with Agni (Jātavedas). It is portrayed as the light in which divine powers can ‘take their seat,’ supporting truth (ṛta) and clear discernment.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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