
Sukta 1.168
Agastya Mānavā (traditional for RV 1.168, Marut hymn)
Triṣṭubh
This hymn invokes the Maruts as a unified, swift-moving host who travel from sacrifice to sacrifice, setting inspired thoughts in motion and granting “right-going” progress across the two worlds. The poet wonders at their vast range and storm-power that breaks open what is compacted, clearing passages and releasing forces for life and victory. It ends by offering a crafted praise-song and inviting the Maruts to come with nourishment and strengthening energy for embodied wellbeing.
Mantra 1
यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियंधियं वो देवया उ दधिध्वे । आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः ॥
यह शक्तियाँ एक यज्ञ से दूसरे यज्ञ तक जाती हैं, सब मिलकर। वो तेज़ी से आगे बढ़ती हैं। हर सोच को भगवान की तरफ ले जाती हैं। हम उनकी तरफ मोड़के आते हैं सही शब्दों के साथ। दोनों दुनिया में सही रास्ता मिले, बड़ी मदद मिले।
Mantra 2
वव्रासो न ये स्वजाः स्वतवस इषं स्वरभिजायन्त धूतयः । सहस्रियासो अपां नोर्मय आसा गावो वन्द्यासो नोक्षणः ॥
यह शक्तियाँ खुद से पैदा हुई हैं, खुद में बलवान। आसमान की तरफ जाते हुए उनमें ताकत भर जाती है। पानी की लहरों की तरह हज़ारों की संख्या में आती हैं। गायों की तरह सब उनकी तारीफ करते हैं, बैलों की तरह मज़बूत हैं।
Mantra 3
सोमासो न ये सुतास्तृप्तांशवो हृत्सु पीतासो दुवसो नासते । ऐषामंसेषु रम्भिणीव रारभे हस्तेषु खादिश्च कृतिश्च सं दधे ॥
यह सोम रस की तरह हैं जो निचोड़ा गया हो, दिल में पिया गया हो। सब को तृप्ति देते हैं, देनेवालों की तरह बैठ जाते हैं। उनके कंधों पर बोझ जैसे चिपका होता है। हाथों में तोड़ने की शक्ति और बनाने की शक्ति दोनों आती है।
Mantra 4
अव स्वयुक्ता दिव आ वृथा ययुरमर्त्याः कशया चोदत त्मना । अरेणवस्तुविजाता अचुच्यवुर्दृळ्हानि चिन्मरुतो भ्राजदृष्टयः ॥
यह अमर शक्तियाँ आसमान से नीचे आई हैं, खुद को जोड़के। अपने आप से चलके आगे बढ़ती हैं। बिना किसी दाग के पैदा हुई, मरुत शक्तियाँ चमकते भालों के साथ। मज़बूत चीज़ें भी हिल जाती हैं जब यह आते हैं।
Mantra 5
को वोऽन्तर्मरुत ऋष्टिविद्युतो रेजति त्मना हन्वेव जिह्वया । धन्वच्युत इषां न यामनि पुरुप्रैषा अहन्यो नैतशः ॥
मरुत शक्तियों में कौन है जो बिजली की तरह चमकता है? वो खुद से काँपता है जैसे जीभ हिलती है। एक तीर की तरह दौड़ता है, बहुत ताकत के साथ। दिन के उजाले घोड़े की तरह तेज़ी से आता है।
Mantra 6
क्व स्विदस्य रजसो महस्परं क्वावरं मरुतो यस्मिन्नायय । यच्च्यावयथ विथुरेव संहितं व्यद्रिणा पतथ त्वेषमर्णवम् ॥
मरुत, तुम इस दुनिया में घूम रहे हो। बताओ, इसका आखिर किनारा कहाँ है? दूर वाला किनारा कहाँ, पास वाला कहाँ? जब तुम हिलो, जो भी पक्का है वो हिलने लगता है। तुम पत्थर जैसी ताकत से आगे बढ़ते हो, उस चमकते समुंदर को पार करके।
Mantra 7
सातिर्न वोऽमवती स्वर्वती त्वेषा विपाका मरुतः पिपिष्वती । भद्रा वो रातिः पृणतो न दक्षिणा पृथुज्रयी असुर्येव जञ्जती ॥
मरुत, तुम्हारी ताकत हमारे लिए काम करे। वो ताकत सूरज जैसी चमकदार हो, और हमारे लिए अच्छी चीज़ें लाती रहे। तुम्हारा देना अच्छा है, जैसे कोई बड़ा इंसान देनेवाले को खुश कर दे। यह ताकत हमें आगे बढ़ाती है, बड़ी जगह की तरफ ले जाती है।
Mantra 8
प्रति ष्टोभन्ति सिन्धवः पविभ्यो यदभ्रियां वाचमुदीरयन्ति । अव स्मयन्त विद्युतः पृथिव्यां यदी घृतं मरुतः प्रुष्णुवन्ति ॥
नदियाँ तुम्हारी ताकत को देख के जवाब देती हैं जब तुम बादल से आवाज़ उठाते हो। बिजली चमकती है और धरती पे मुस्कुराती है। मरुत, जब तुम घी जैसी चीज़ बरसाते हो, धरती तैयार हो जाती है।
Mantra 9
असूत पृश्निर्महते रणाय त्वेषमयासां मरुतामनीकम् । ते सप्सरासोऽजनयन्ताभ्वमादित्स्वधामिषिरां पर्यपश्यन् ॥
पृश्नि माता ने मरुत को पैदा किया बड़ी लड़ाई के लिए। वो चमकते हैं और थकते नहीं हैं। वो तेज़ चलने वाले हैं, उन्होंने बड़ी दुनिया बनाई। फिर उन्होंने देखा कि उनमें खुद की ताकत है, जो ऐसे ही चलती रहती है।
Mantra 10
एष वः स्तोमो मरुत इयं गीर्मान्दार्यस्य मान्यस्य कारोः । एषा यासीष्ट तन्वे वयां विद्यामेषं वृजनं जीरदानुम् ॥
मरुत, यह हमारी प्रार्थना है और यह गाना है। हम तुम्हारे लिए गाते हैं क्योंकि तुम्हारे लिए गाना अच्छी बात है। आओ और हमें ताकत दो। हम यह ताकत पहचानें, जो जल्दी देती है और हमें सफल बनाती है।
The Maruts are summoned as a coordinated power who move from sacrifice to sacrifice, establishing inspired thoughts and divine-minded intent.
Their immense range is contemplated: the poet asks where the far and near limits of their mid-world domain lie, and describes their shaking loose of what is compacted.
The Maruts’ decisive action—flying forth with the ‘stone-weapon’ across the blazing surge—symbolizes the breaking open of obstruction and the clearing of passage.
The hymn seals the relationship through a final stotra: ‘this is your chant,’ and invites them to arrive with nourishment and strengthening force for embodied life and victory.
यज्ञायज्ञा वः समना तुतुर्वणिर्धियंधियं वो देवया उ दधिध्वे । आ वोऽर्वाचः सुविताय रोदस्योर्महे ववृत्यामवसे सुवृक्तिभिः ॥क्व स्विदस्य रजसो महस्परं क्वावरं मरुतो यस्मिन्नायय । यच्च्यावयथ विथुरेव संहितं व्यद्रिणा पतथ त्वेषमर्णवम् ॥eṣa vaḥ stomo maruta
The Maruts are a band of youthful storm-deities—wind, thunder, and radiant power—moving together and helping to break obstacles and bring strength and rain.
The poet asks for ‘suvitā’ (right-going success), great help and protection, and for nourishing force (iṣ) that strengthens embodied life and supports victory.
It is a poetic way of describing the Maruts’ storm-power that loosens and shatters blockages—both in nature (clouds, barriers) and inwardly (stagnation, fear)—so progress becomes possible.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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