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सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘मंगल के संस्कार’ का द्वार। बालकाण्ड में रामकथा केवल कथानक नहीं, साधक के चित्त में ‘श्रद्धा–प्रेम–मंगल’ की प्रथम स्थापना है। यहाँ विवाह-उत्सव जैसे सामाजिक संस्कार भी ‘ईश्वर-सान्निध्य’ में रूपान्तरित होकर साधना बनते हैं—सुनना/गाना/स्मरण करना ही सीढ़ी का पहला पायदान है।
यह प्रकरण ‘सोपान-प्रवेश’ का द्वार है जहाँ सामाजिक संस्कार (कंकण, शुभ-लग्न, विवाह-उत्सव) आध्यात्मिक अनुशासन में रूपान्तरित हो जाता है। ‘सुदिन सोधि’ समय-शुद्धि का प्रतीक है—बाह्य शुभ-मुहूर्त के साथ अंतःकरण का भी शुभ-क्षण। ‘कंकन’ बंधन नहीं, व्रत-संयम और मंगल-संकल्प का संकेत है—भक्ति का ‘संस्कार-बंधन’ जो चित्त को राम-सीय-स्मरण में बाँधता है। ‘मंगल मोद बिनोद’ उत्सव-रस को साधक के लिए साधना-रस बनाता है: हर्ष का स्रोत इन्द्रिय-विलास नहीं, ईश्वर-सान्निध्य। ‘नित नव सुख’ भक्ति के नित्य-नूतन अनुभव का संकेत है—एक ही नाम/लीला बार-बार सुनने पर भी रस घटता नहीं, बढ़ता है। देवताओं का ‘सिहाह’ (रोमांच) बताता है कि यह मंगल केवल मानवीय नहीं, ब्रह्माण्डीय स्वीकृति वाला कल्याण-आश्रय है। समग्रतः प्रतीक-धारा कहती है: श्रवण-कीर्तन ही प्रथम पायदान है; कथा-वाणी तीर्थ है; और विवाह-उत्सव ‘मंगल के संस्कार’ बनकर चित्त में श्रद्धा–प्रेम–मंगल की स्थापना करता है।
Verse 756 (चौपाई)
सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।। नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं।। बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं।। दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ।। मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे।। नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी।। करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू।। अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी।। दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती।। रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई।।
दिन अच्छे चल रहे थे, हर पल खुशी और मस्ती में गुज़र रहा था। देवता दिन भर नए नए सुख देख के खुश थे। अयोध्या के लोग ब्रह्मा के दर्शन के लिए तरस रहे थे। लोग विश्वामित्र के जाने का इंतज़ार करते थे, लेकिन राम अपनी विनम्रता में वही रुक गए। राजा के गुण दिन भर चमक रहे थे, जिसे देख के मुनि ने उनकी तारीफ की। राजा ने प्यार से विदाई माँगी, और अपने बेटों के साथ आगे खड़ा हो गया। राजा ने कहा, नाथ, जो कुछ भी मेरा है वो सब आपका है। मैं, मेरे बेटे और पत्नी, सब आपके सेवक हैं। मैं इन बच्चों पर हमेशा प्यार रखूँगा। मुनि, मुझे आपका दर्शन मिलता रहे। ऐसा कह के राजा अपने बेटों और रानियों के साथ मुनि के पैरों में गिर गया, उसका मुँह से बोल नहीं निकल रहा था। मुनि ने उन्हें बहुत तरीके से आशीर्वाद दिया, फिर भी वो प्यार और रिवाज़ में ही रुके हुए थे। राम ने अपने सब भाइयों के साथ विदाई ले ली और मुनि को छोड़ने गए।
Verse 757 (दोहा/सोरठा)
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु। जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु।।360।।
राजा को राम के रूप में, भक्ति में, शादी में, खुशी और आनंद में बहुत मज़ा आया। जब वो जा रहे थे, तो राजा ने दिल ही दिल में उनकी तारीफ की। गधि वंश का यह चाँद, यानी विश्वामित्र, खुशी से भरा हुआ था।
Verse 758 (चौपाई)
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।। सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ।। बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।। जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा।। आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।। प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू।। कबिकुल जीवनु पावन जानी।।राम सीय जसु मंगल खानी।। तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।
बामदेव, जो रघु वंश के गुरु थे और ज्ञान में माहिर थे, उन्होंने फिर से गधि पुत्र की कथा सुनाई। मुनि की यह अच्छी बड़ाई सुन के राजा ने दिल में सोचा और अपने पुण्य और शक्ति का ज़िक्र किया। लोगों ने राजा की आज्ञा लेकर वापस अपने घर चले गए, राजा भी अपने बेटों के साथ वापस गया। हर तरफ लोग राम की शादी के बारे में गाने लगे। राम की यह साफ़ बड़ाई तीनों दुनिया में फैल गई। जिस दिन से राम शादी करके घर आए, उस दिन से अयोध्या में खुशी बस गई। भगवान की शादी में जो खुशी हुई, वो हज़ारों साल में भी बयान नहीं हो सकती। कवि तुलसीदास ने जाना कि राम और सीता की बड़ाई मंगल का खानी है, जो सबको पवित्र करती है। इसलिए मैंने थोड़ा बता दिया, ताकि मेरी भी बानी पवित्र हो जाए।
Verse 759 (छंद)
निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसी कह्यो। रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो।। उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं। बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं।।
तुलसीदास ने राम की बड़ाई इसलिए बताई ताकि उनकी बानी भी पवित्र हो जाए। रघु वंश के वीर के कर्तूतों का समुंदर इतना बड़ा है, किसी कवि ने भी उसका किनारा नहीं छुआ। जो लोग शादी की खुशी और मंगल के बारे में सुनते हैं और प्यार से गाते हैं, उन्हें राम और सीता की कृपा से हमेशा सुख मिलता है।
Verse 760 (दोहा/सोरठा)
सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।361।।
जो लोग सीता और रघु वीर राम की शादी को प्यार से गाते हैं या सुनते हैं, उनके दिल में हमेशा खुशी रहती है। राम की बड़ाई सब मंगल का घर है।
छंद/दोहा 361 की वाणी के अनुसार जो लोग विवाह-उत्सव का मंगल ‘सादर’ सुनते-गाते हैं, वे ‘बैदेहि-राम प्रसाद’ से ‘सर्बदा सुखु’ पाते हैं—अर्थात् चित्त में स्थायी उत्साह, मंगल-बुद्धि, और भक्ति-वृद्धि।
परम्परा में विवाह-प्रसंग/मंगल-गान के साथ ‘सीता-राम’ नाम-स्मरण का सम्पुट प्रचलित है—उदा. ‘सियावर रामचंद्र की जय’ या ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ को कीर्तन-आवृत्ति के रूप में जोड़ा जाता है (स्थानीय संप्रदायानुसार भेद संभव)।
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