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सोपान-आरम्भ: ‘भक्ति का जन्म’—जहाँ रामकथा को गृह-आनन्द, मंगलाचार, गुरु-आज्ञा और लोक-रीति के माध्यम से साधक के मन में ‘श्रद्धा’ का स्थिर आसन मिलता है। इस खण्ड में विवाहोत्तर गृह-प्रवेश, पूजन, दान, आशीष, और रात्रि-विश्राम जैसे दृश्य ‘धर्म-समाज’ की स्थापना करते हैं: भक्ति केवल अंतःभाव नहीं, बल्कि संस्कार-रूप जीवन-यज्ञ है।
यह प्रकरण ‘भक्ति का जन्म’ को गृह-आनन्द के संस्कार-रूप में दिखाता है: (1) चार सिंहासन—चार भाइयों की सहज शोभा के साथ ‘धर्म-स्थिरता’ और राज-व्यवस्था का प्रतीक; मनोज-निर्मित उपमा से संकेत कि राम-सम्बन्धित सौन्दर्य लौकिक कारीगरी से परे, चित्त-कल्पना से भी श्रेष्ठ है। (2) विवाहोत्तर गृह-प्रवेश—जीवन में भक्ति का ‘स्थायी आसन’; घर ही यज्ञ-वेदी बनता है। (3) पाय-पखारना, आरती, दान, गुरु-पूजन, देव-पितृ-तर्पण—कर्मकाण्ड नहीं, ‘राम-सम्बन्ध’ से पवित्र हुआ जीवन-यज्ञ; लोक-रीति साधना का अनुशासन बनती है। (4) ‘जनु’ उपमाएँ—आध्यात्मिक रूपान्तरण का उपकरण: योगी/रोगी/अन्धे की छवियाँ बताती हैं कि राम-दर्शन का फल तत्काल अनुभूत मुक्ति-आनन्द है। (5) वशिष्ठ–कौसिक का आगमन—लीला और शास्त्र का सेतु; सगुण-माधुर्य ही निर्गुण-ब्रह्म का सुलभ द्वार।
Verse 736 (चौपाई)
चारि सिंघासन सहज सुहाए। जनु मनोज निज हाथ बनाए।। तिन्ह पर कुअँरि कुअँर बैठारे। सादर पाय पुनित पखारे।। धूप दीप नैबेद बेद बिधि। पूजे बर दुलहिनि मंगलनिधि।। बारहिं बार आरती करहीं। ब्यजन चारु चामर सिर ढरहीं।। बस्तु अनेक निछावर होहीं। भरीं प्रमोद मातु सब सोहीं।। पावा परम तत्व जनु जोगीं। अमृत लहेउ जनु संतत रोगीं।। जनम रंक जनु पारस पावा। अंधहि लोचन लाभु सुहावा।। मूक बदन जनु सारद छाई। मानहुँ समर सूर जय पाई।।
चारों तरफ चार सिंहासन थे, बिल्कुल खूबसूरत। जैसे कामदेव ने अपने हाथ से बनाए हो। राजा-कुमारी और रानी-कुमारी सब बैठ गए। लोगों ने उनके पाँव धोए और साफ किए। धूप, दीप, खाना, सब से पूजा हुई। दूल्हा और दुल्हन दोनों की पूजा की गई। बारह बार आरती हुई। उनके सिर के ऊपर चामर हिलाए गए। माँ-बाप खुश हो गए। जैसे कोई योगी को परम तत्व मिल गया हो। जैसे कोई बीमार आदमी को अमृत मिल गया हो। जैसे कोई गरीब आदमी को पारस पत्थर मिल गया हो। जैसे अंधे आदमी को आँखें मिल गई हो। जैसे गूँगे आदमी को बोलना आगया हो। जैसे किसी योधा ने जंग जीत ली हो।
Verse 737 (दोहा/सोरठा)
एहि सुख ते सत कोटि गुन पावहिं मातु अनंदु।। भाइन्ह सहित बिआहि घर आए रघुकुलचंदु।।350(क)।। लोक रीत जननी करहिं बर दुलहिनि सकुचाहिं। मोदु बिनोदु बिलोकि बड़ रामु मनहिं मुसकाहिं।।350(ख)।।
माँ-बाप को इतना खुशी हुई कि बता नहीं सकते। राम अपने भाइयों के साथ दुल्हन लेके घर वापस आए। माँ-बाप ने दुल्हन को छेड़ना शुरू किया, दुल्हन शर्मा गई। राम को देख के सब खुश हो गए। राम अंदर से मुस्कुरा रहे थे।
Verse 738 (चौपाई)
देव पितर पूजे बिधि नीकी। पूजीं सकल बासना जी की।। सबहिं बंदि मागहिं बरदाना। भाइन्ह सहित राम कल्याना।। अंतरहित सुर आसिष देहीं। मुदित मातु अंचल भरि लेंहीं।। भूपति बोलि बराती लीन्हे। जान बसन मनि भूषन दीन्हे।। आयसु पाइ राखि उर रामहि। मुदित गए सब निज निज धामहि।। पुर नर नारि सकल पहिराए। घर घर बाजन लगे बधाए।। जाचक जन जाचहि जोइ जोई। प्रमुदित राउ देहिं सोइ सोई।। सेवक सकल बजनिआ नाना। पूरन किए दान सनमाना।।
देवता और पूर्वज सब की पूजा की गई। सब के दिल की ख्वाहिश पूरी हुई। सब से आशीर्वाद लिया, राम और उनके भाइयों के लिए। देवता आशीर्वाद दिए, माँ-बाप ने आशीर्वाद लिया। राजा ने मेहमानों को बुलाया। उन्हें कपड़े, गहने दिए। सब लोग खुश-खुश अपने घर चले गए। शहर के लोगों ने नए कपड़े पहने। हर घर में ढोल बजने लगा। जो कुछ माँगा, राजा ने वो दिया। नौकरों को भी तोहफा दिया गया।
Verse 739 (दोहा/सोरठा)
देंहिं असीस जोहारि सब गावहिं गुन गन गाथ। तब गुर भूसुर सहित गृहँ गवनु कीन्ह नरनाथ।।351।।
सब ने आशीर्वाद दिया और राम की तारीफ की। फिर राजा गुरु और पंडितों के साथ निकल गए।
Verse 740 (चौपाई)
जो बसिष्ठ अनुसासन दीन्ही। लोक बेद बिधि सादर कीन्ही।। भूसुर भीर देखि सब रानी। सादर उठीं भाग्य बड़ जानी।। पाय पखारि सकल अन्हवाए। पूजि भली बिधि भूप जेवाँए।। आदर दान प्रेम परिपोषे। देत असीस चले मन तोषे।। बहु बिधि कीन्हि गाधिसुत पूजा। नाथ मोहि सम धन्य न दूजा।। कीन्हि प्रसंसा भूपति भूरी। रानिन्ह सहित लीन्हि पग धूरी।। भीतर भवन दीन्ह बर बासु। मन जोगवत रह नृप रनिवासू।। पूजे गुर पद कमल बहोरी। कीन्हि बिनय उर प्रीति न थोरी।।
गुरु वशिष्ठ ने जो कहा, राजा ने वही किया। पंडित आए, रानियाँ उठ के आशीर्वाद लिया। राजा ने उनका ख्याल रखा, खाना खिलाया। गुरु खुश हो गए। राजा ने सोचा, मैं दुनिया का सबसे खुशकिस्मत आदमी हूँ। गुरु ने आशीर्वाद दिया और चले गए। राजा ने उन्हें अंदर अच्छे कमरे दिए। राजा गुरु के चरणों की पूजा करते रहे।
Verse 741 (दोहा/सोरठा)
बधुन्ह समेत कुमार सब रानिन्ह सहित महीसु। पुनि पुनि बंदत गुर चरन देत असीस मुनीसु।।352।।
राजा अपने बेटों और बहुओं के साथ गया। रानियाँ भी साथ थी। सब ने गुरु के चरणों को बार-बार प्रणाम किया। मुनियों के गुरु ने उन्हें आशीर्वाद दिया।
Verse 742 (चौपाई)
बिनय कीन्हि उर अति अनुरागें। सुत संपदा राखि सब आगें।। नेगु मागि मुनिनायक लीन्हा। आसिरबादु बहुत बिधि दीन्हा।। उर धरि रामहि सीय समेता। हरषि कीन्ह गुर गवनु निकेता।। बिप्रबधू सब भूप बोलाई। चैल चारु भूषन पहिराई।। बहुरि बोलाइ सुआसिनि लीन्हीं। रुचि बिचारि पहिरावनि दीन्हीं।। नेगी नेग जोग सब लेहीं। रुचि अनुरुप भूपमनि देहीं।। प्रिय पाहुने पूज्य जे जाने। भूपति भली भाँति सनमाने।। देव देखि रघुबीर बिबाहू। बरषि प्रसून प्रसंसि उछाहू।।
राजा ने दिल से विनय की। अपने बेटों और दौलत को आगे रख के कहा। मुनियों के गुरु से शादी का नेग माँगा और लिया। उन्होंने बहुत तरीकों से आशीर्वाद दिया। राजा ने दिल में राम और सीता को बसाया। खुश होके गुरु से विदाई ली और घर के लिए निकले। ब्राह्मण औरतों को बुलाया। उन्हें अच्छे कपड़े और गहने पहनाए। फिर सुहागन औरतों को बुलाया। उनकी पसंद देख के उन्हें कपड़े दिए। मेहमान लोगों को जो गिफ्ट्स मिलने चाहिए थे वो मिले। राजा ने सब की पसंद के हिसाब से दिए। जो लोग समझे कि मेहमान पूजा के लायक हैं, राजा ने उनकी अच्छे से इज्जत की। देवियों ने रघु कुल के स्वामी राम की शादी देखी। फूल बरसाए और खुशी से उनकी तारीफ की।
Verse 743 (दोहा/सोरठा)
चले निसान बजाइ सुर निज निज पुर सुख पाइ। कहत परसपर राम जसु प्रेम न हृदयँ समाइ।।353।।
राजा ने सब का बहुत इज्जत किया। उसका दिल खुशी से भरा हुआ था। वो रानियों के महल में गया। बहुओं के साथ बेटों को देखा। खुशी से उन्हें गोद में उठाया। कितना सुख था वो कौन बता सकता है। बहुओं ने प्यार से उन्हें गोद में बिठाया। बार-बार दिल से लगा के प्यार किया। रानियों ने यह सब देख के बहुत खुशी मनाई। सब के दिल में आनंद आया। राजा ने बताया कि शादी कैसी हुई। सुन के सब खुश हुए। जनक राजा के गुण, उसका चरित्र, उसकी बड़ी, उसका प्यार, उसका रिवाज और उसकी दौलत सब अच्छी थी। राजा ने बहुत तरीकों से बताया जैसे कवि गाते हैं। रानियाँ सब सुन के खुश हुई।
Verse 744 (चौपाई)
सब बिधि सबहि समदि नरनाहू। रहा हृदयँ भरि पूरि उछाहू।। जहँ रनिवासु तहाँ पगु धारे। सहित बहूटिन्ह कुअँर निहारे।। लिए गोद करि मोद समेता। को कहि सकइ भयउ सुखु जेता।। बधू सप्रेम गोद बैठारीं। बार बार हियँ हरषि दुलारीं।। देखि समाजु मुदित रनिवासू। सब कें उर अनंद कियो बासू।। कहेउ भूप जिमि भयउ बिबाहू। सुनि हरषु होत सब काहू।। जनक राज गुन सीलु बड़ाई। प्रीति रीति संपदा सुहाई।। बहुबिधि भूप भाट जिमि बरनी। रानीं सब प्रमुदित सुनि करनी।।
राजा ने अपने बेटों के साथ नहाया। ब्राह्मण, गुरु और रिश्तेदार सब को बुलाया। उन्हें बहुत तरीकों से खिलाया। रात के पहर गुजर गए।
Verse 745 (दोहा/सोरठा)
सुतन्ह समेत नहाइ नृप बोलि बिप्र गुर ग्याति। भोजन कीन्ह अनेक बिधि घरी पंच गइ राति।।354।।
राजा ने अपने बेटों के साथ नहाया। ब्राह्मण, गुरु और रिश्तेदार सब को बुलाया। उन्हें बहुत तरीकों से खिलाया। रात के पहर गुजर गए।
Verse 746 (चौपाई)
मंगलगान करहिं बर भामिनि। भै सुखमूल मनोहर जामिनि।। अँचइ पान सब काहूँ पाए। स्त्रग सुगंध भूषित छबि छाए।। रामहि देखि रजायसु पाई। निज निज भवन चले सिर नाई।। प्रेम प्रमोद बिनोदु बढ़ाई। समउ समाजु मनोहरताई।। कहि न सकहि सत सारद सेसू। बेद बिरंचि महेस गनेसू।। सो मै कहौं कवन बिधि बरनी। भूमिनागु सिर धरइ कि धरनी।। नृप सब भाँति सबहि सनमानी। कहि मृदु बचन बोलाई रानी।। बधू लरिकनीं पर घर आईं। राखेहु नयन पलक की नाई।।
सुंदर ब्राह्मण औरतें मंगल गाने लगी, और रात इतनी सुहावनी हो गई जैसे खुशी का ही रूट हो। साबको पान बाँटा गया, सारी जगह महक रही थी और साफ नज़र आ रही थी। सब लोग राम को देख के खुश हो गए, सिर झुका के अपने घर चले गए। प्यार और खुशी बढ़ती गई, वक़्त और सब लोग और भी अच्छे लगने लगे। शेष, ब्रह्मा, शिव, गणेश, वेद और सरस्वती भी इसको पूरा बता नहीं सकते। तो मैं कैसे बताऊं? यह बात समझ में नहीं आती। राजा ने सबको इज़्ज़त दी और प्यार से रानियों को बुलाया। नई दुल्हन जैसे छोरियां घर आई थी, उन्हें राजा ने अपनी आँखों की तरह रखा।
Verse 747 (दोहा/सोरठा)
लरिका श्रमित उनीद बस सयन करावहु जाइ। अस कहि गे बिश्रामगृहँ राम चरन चितु लाइ।।355।।
बच्चे थक गए हैं और नींद आ रही है, जाके उन्हें सुला दो। यह कह के राजा रेस्ट रूम में चले गए, उनका मन राम के चरणों में लगा था।
Verse 748 (चौपाई)
भूप बचन सुनि सहज सुहाए। जरित कनक मनि पलँग डसाए।। सुभग सुरभि पय फेन समाना। कोमल कलित सुपेतीं नाना।। उपबरहन बर बरनि न जाहीं। स्त्रग सुगंध मनिमंदिर माहीं।। रतनदीप सुठि चारु चँदोवा। कहत न बनइ जान जेहिं जोवा।। सेज रुचिर रचि रामु उठाए। प्रेम समेत पलँग पौढ़ाए।। अग्या पुनि पुनि भाइन्ह दीन्ही। निज निज सेज सयन तिन्ह कीन्ही।। देखि स्याम मृदु मंजुल गाता। कहहिं सप्रेम बचन सब माता।। मारग जात भयावनि भारी। केहि बिधि तात ताड़का मारी।।
राजा की बात सुन के सब खुश हो गए। सोने के बिस्तर बिछाए गए जिसमें ज्वैल्स जड़े थे। बिस्तर सुंदर और महकते थे, दूध के झाग की तरह साफ, नरम और अच्छे डिज़ाइन में। ऊपर से अच्छे कंबल दिए गए, जो बता नहीं सकते। पूरी रूम महक रही थी। ज्वैल्स वाले लैंप्स और सुंदर छत दिए गए। इतना अच्छा था कि बता नहीं सकते। राम को उठा के सुंदर बिस्तर पे सुलाया गया, प्यार से। बार बार भाइयों को जाने की इजाज़त दी, फिर वो अपने बिस्तर पे सो गए। राम का सुंदर और नरम बदन देख के सारी माओं ने प्यार से बातें की। रास्ते में जंगल बहुत डरावना था, बेटा तुमने ताड़का को कैसे मारा?
Verse 749 (दोहा/सोरठा)
घोर निसाचर बिकट भट समर गनहिं नहिं काहु।। मारे सहित सहाय किमि खल मारीच सुबाहु।।356।।
रात के भूत और जंगल बहुत खतरनाक थे। लड़ाई में दुश्मन इतने बड़े थे कि कोई सामने नहीं जा सकता। बेटा तुमने मारिच और सुबाहू को उनके साथियों के साथ कैसे मारा?
Verse 750 (चौपाई)
मुनि प्रसाद बलि तात तुम्हारी। ईस अनेक करवरें टारी।। मख रखवारी करि दुहुँ भाई। गुरु प्रसाद सब बिद्या पाई।। मुनितय तरी लगत पग धूरी। कीरति रही भुवन भरि पूरी।। कमठ पीठि पबि कूट कठोरा। नृप समाज महुँ सिव धनु तोरा।। बिस्व बिजय जसु जानकि पाई। आए भवन ब्याहि सब भाई।। सकल अमानुष करम तुम्हारे। केवल कौसिक कृपाँ सुधारे।। आजु सुफल जग जनमु हमारा। देखि तात बिधुबदन तुम्हारा।। जे दिन गए तुम्हहि बिनु देखें। ते बिरंचि जनि पारहिं लेखें।।
बेटा, ऋषि की कृपा से तुमने बहुत बड़े लोगों को हराया। यज्ञ की रक्षा करके दोनों भाइयों ने गुरु की कृपा से सब विद्या पा ली। वो हमेशा ऋषि के चरणों की धूल में रहते, उनकी बड़ाई पूरी दुनिया में फैल गई। राजा की सभा में तुमने शिव का धनुष ऐसे तोड़ा जैसे कोई नरम लकड़ी तोड़ दे। पूरी दुनिया में नाम कमाके सब भाइयों की शादी करके घर आए। तुम्हारे काम आम आदमी के नहीं हैं, बस ऋषि की कृपा से हो पाए। आज हमारा जन्म सफल हो गया तुम्हारा चेहरा देख के। जो दिन तुम्हें बिना देखे बीत गए, उनको ब्रह्मा काउंट करे, हम नहीं मानते।
Verse 751 (दोहा/सोरठा)
राम प्रतोषीं मातु सब कहि बिनीत बर बैन। सुमिरि संभु गुर बिप्र पद किए नीदबस नैन।।357।।
राम ने अपनी माताओं को बहुत अच्छे से मनाया। उन्होंने शिव, गुरु और ब्राह्मणों के पाँव झुकाए। फिर आँखें बंद करके सो गए।
Verse 752 (चौपाई)
नीदउँ बदन सोह सुठि लोना। मनहुँ साँझ सरसीरुह सोना।। घर घर करहिं जागरन नारीं। देहिं परसपर मंगल गारीं।। पुरी बिराजति राजति रजनी। रानीं कहहिं बिलोकहु सजनी।। सुंदर बधुन्ह सासु लै सोई। फनिकन्ह जनु सिरमनि उर गोई।। प्रात पुनीत काल प्रभु जागे। अरुनचूड़ बर बोलन लागे।। बंदि मागधन्हि गुनगन गाए। पुरजन द्वार जोहारन आए।। बंदि बिप्र सुर गुर पितु माता। पाइ असीस मुदित सब भ्राता।। जननिन्ह सादर बदन निहारे। भूपति संग द्वार पगु धारे।।
सोते हुए राम का चेहरा इतना सुंदर लग रहा था, जैसे शाम को कमल खिलता है। घर घर की औरतें जाग रही थीं और अच्छे गीत गा रही थीं। रात में शहर चमक रहा था। रानियाँ बोली थीं कि देखो कितना सुंदर दूल्हा है। सासू ने उस दूल्हे को दिल में बसा लिया, जैसे शेषनाग अपने सिर पर मणि रखता है। सुभह जब भगवान जागे तो तोते बोलने लगे। गायक ने उनकी तारीफ की और शहर के लोग दरवाज़े पर आए। ब्राह्मण, देवता, गुरु, पिता और माता को प्रणाम किया। आशीर्वाद मिलते ही सब भाई खुश हो गए। माताओं ने प्यार से उसका चेहरा देखा। राजा के साथ वो दरवाज़े पर खड़ा था।
Verse 753 (दोहा/सोरठा)
कीन्ह सौच सब सहज सुचि सरित पुनीत नहाइ। प्रातक्रिया करि तात पहिं आए चारिउ भाइ।।358।।
राम नहा धोके पानी में गए। सुभह की पूजा करके चारों भाई अपने पिता के पास आए।
Verse 754 (चौपाई)
भूप बिलोकि लिए उर लाई। बैठै हरषि रजायसु पाई।। देखि रामु सब सभा जुड़ानी। लोचन लाभ अवधि अनुमानी।। पुनि बसिष्टु मुनि कौसिक आए। सुभग आसनन्हि मुनि बैठाए।। सुतन्ह समेत पूजि पद लागे। निरखि रामु दोउ गुर अनुरागे।। कहहिं बसिष्टु धरम इतिहासा। सुनहिं महीसु सहित रनिवासा।। मुनि मन अगम गाधिसुत करनी। मुदित बसिष्ट बिपुल बिधि बरनी।। बोले बामदेउ सब साँची। कीरति कलित लोक तिहुँ माची।। सुनि आनंदु भयउ सब काहू। राम लखन उर अधिक उछाहू।।
राजा ने उन्हें देखते ही दिल में जगा दिया। खुशी से बैठ गए क्योंकि उनका सपना पूरा हुआ। राम को देखकर सब लोग खुश हो गए। आँखों को इतना अच्छा लगा जैसे कोई बड़ा तोहफा मिल गया। फिर वशिष्ठ और रिशि कौशिक आए। रिशियों को अच्छे आसन पर बिठाया। अपने बेटों के साथ रिशियों के पाँव पूजे। दोनों गुरु राम को प्यार से देखने लगे। वशिष्ठ ने धरम की कहानी सुनाई। राजा और रानियाँ दोनों सुनते रहे। गाधि के बेटे के काम इतने अच्छे थे कि रिशि भी सोच नहीं पा रहे थे। वशिष्ठ ने खुशी से पूरा डिटेल में बताया। वामदेव बोले कि यह सब सच है। तीनों दुनिया में उनकी क्या क्या तारीफ है। यह सुनके सब खुश हो गए। राम और लक्ष्मण के दिल में बहुत खुशी आई।
Verse 755 (दोहा/सोरठा)
मंगल मोद उछाह नित जाहिं दिवस एहि भाँति। उमगी अवध अनंद भरि अधिक अधिक अधिकाति।।359।।
दिन भर ऐसे ही खुशी और मस्ती में गुज़रता गया। अयोध्या में इतना आनंद था कि दिन भर और बढ़ता गया।
परम्परा में यह खण्ड ‘गृह-मंगल’ और ‘दाम्पत्य-संस्कार’ को राम-सम्बन्ध से पवित्र करने वाला माना जाता है—श्रवण/पाठ से घर में सौहार्द, दान-प्रवृत्ति, गुरु-भक्ति और ‘वात्सल्य-रस’ की वृद्धि होती है; विशेषतः विवाह, गृह-प्रवेश, या कुल-देवता पूजन के अवसर पर मंगल-पाठ के रूप में फलदायक कहा जाता है।
मंगल-सम्पुट के रूप में अनेक परम्पराएँ ‘श्रीराम जय राम जय जय राम’ या ‘सियाराममय सब जग जानी’ का जप-सम्पुट जोड़ती हैं; गृह-मंगल प्रसंगों में ‘राम’ नाम-सम्पुट (प्रत्येक दोहा/चौपाई के बाद ‘राम राम’) भी लोक-प्रचलित है।
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