सोपान-प्रवेश: ‘भक्ति का जन्म’ और ‘मंगल के संस्कार’ का द्वार। बालकाण्ड में रामकथा केवल कथानक नहीं, साधक के चित्त में ‘श्रद्धा–प्रेम–मंगल’ की प्रथम स्थापना है। यहाँ विवाह-उत्सव जैसे सामाजिक संस्कार भी ‘ईश्वर-सान्निध्य’ में रूपान्तरित होकर साधना बनते हैं—सुनना/गाना/स्मरण करना ही सीढ़ी का पहला पायदान है।
இக்கண்ட-கண்டிகையில் ரச-முதன்மை ‘மங்கள’மும் ‘உத்சாஹ’மும் (ஆனந்த-ரசம்); அதன் உள்ளே கருணை கலந்த மென்மையான விநயம் (தாஸ்ய-பாவம்) ஓடுகிறது. காட்சி நிலையில் ராஜா தசரதனின் அனுராகம், குடும்பத்துடன் சரணங்களில் விழுதல், விஸ்வாமித்ரரின் பிரசன்னம்—இவை ‘ராஜதர்ம’மும் ‘பக்திதர்ம’மும் சங்கமிக்கும் இடமாகின்றன. துளசியின் காவிய-சில்பம் இங்கு கதையைவிட ‘அனுபவ-ப்ரமாணம்’ ஆகிறது: “நிஜ கிரா பாவனி கரன காரன” என்று சொல்லி வாணியைத் தீர்த்தமாக்குகிறார். விவாக-உத்சவத்தின் ஒலியை சாதகனுக்கான சாதனா-நியமமாக மாற்றுகிறார்—சாதரமாகப் பாடுபவரும் கேட்பவரும் ‘சதா ஸுக’ம் பெறுவர் என்ற உறுதி. இவ்வாறு பாலகாண்டத்தின் இவ்வடிப்பு சோபான-யாத்திரையில் ‘ஸ்ரவண-கீர்த்தனம்’ என்பதையே மூல சாதனமாக அறிவித்து, ராம-சீய-யசஸை ‘மங்களாயதனம்’ (கல்யாண-ஆஸ்ரயம்) என நிறுவுகிறது.
Verse 756 (चौपाई)
सुदिन सोधि कल कंकन छौरे। मंगल मोद बिनोद न थोरे।। नित नव सुखु सुर देखि सिहाहीं। अवध जन्म जाचहिं बिधि पाहीं।। बिस्वामित्रु चलन नित चहहीं। राम सप्रेम बिनय बस रहहीं।। दिन दिन सयगुन भूपति भाऊ। देखि सराह महामुनिराऊ।। मागत बिदा राउ अनुरागे। सुतन्ह समेत ठाढ़ भे आगे।। नाथ सकल संपदा तुम्हारी। मैं सेवकु समेत सुत नारी।। करब सदा लरिकनः पर छोहू। दरसन देत रहब मुनि मोहू।। अस कहि राउ सहित सुत रानी। परेउ चरन मुख आव न बानी।। दीन्ह असीस बिप्र बहु भाँती। चले न प्रीति रीति कहि जाती।। रामु सप्रेम संग सब भाई। आयसु पाइ फिरे पहुँचाई।।
Verse 757 (दोहा/सोरठा)
राम रूपु भूपति भगति ब्याहु उछाहु अनंदु। जात सराहत मनहिं मन मुदित गाधिकुलचंदु।।360।।
Verse 758 (चौपाई)
बामदेव रघुकुल गुर ग्यानी। बहुरि गाधिसुत कथा बखानी।। सुनि मुनि सुजसु मनहिं मन राऊ। बरनत आपन पुन्य प्रभाऊ।। बहुरे लोग रजायसु भयऊ। सुतन्ह समेत नृपति गृहँ गयऊ।। जहँ तहँ राम ब्याहु सबु गावा। सुजसु पुनीत लोक तिहुँ छावा।। आए ब्याहि रामु घर जब तें। बसइ अनंद अवध सब तब तें।। प्रभु बिबाहँ जस भयउ उछाहू। सकहिं न बरनि गिरा अहिनाहू।। कबिकुल जीवनु पावन जानी।।राम सीय जसु मंगल खानी।। तेहि ते मैं कछु कहा बखानी। करन पुनीत हेतु निज बानी।।
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Verse 759 (छंद)
निज गिरा पावनि करन कारन राम जसु तुलसी कह्यो। रघुबीर चरित अपार बारिधि पारु कबि कौनें लह्यो।। उपबीत ब्याह उछाह मंगल सुनि जे सादर गावहीं। बैदेहि राम प्रसाद ते जन सर्बदा सुखु पावहीं।।
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Verse 760 (दोहा/सोरठा)
सिय रघुबीर बिबाहु जे सप्रेम गावहिं सुनहिं। तिन्ह कहुँ सदा उछाहु मंगलायतन राम जसु।।361।।
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