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कैवल्य उपनिषद् (अथर्ववेद से संबद्ध, 26 मंत्र) एक संक्षिप्त किन्तु अत्यन्त प्रभावशाली वेदान्त-ग्रन्थ है। इसमें ऋषि आश्वलायन ब्रह्मा से ‘परम ज्ञान’ पूछते हैं और ब्रह्मा संन्यास, तप, श्रद्धा, शम-दम आदि साधनों के साथ ब्रह्मविद्या का उपदेश देते हैं। उपनिषद् का लक्ष्य ‘कैवल्य’—अर्थात् परम स्वतंत्रता/मोक्ष—को आत्मा-ब्रह्म की अभिन्नता के प्रत्यक्ष ज्ञान से सिद्ध बताना है। यह ग्रन्थ आत्मा को जाग्रत्-स्वप्न-सुषुप्ति तीनों अवस्थाओं का साक्षी, स्वप्रकाश और कर्मासंग मानता है। बाह्य कर्मकाण्ड की अपेक्षा अन्तर्मुख ध्यान को प्रधानता दी गई है—हृदय-कमल में स्थित ब्रह्म का ध्यान, देह-मन की पहचान का त्याग, और विवेक-वैराग्य द्वारा ‘मैं’ की शुद्ध पहचान। विशेष रूप से रुद्र/शिव की स्तुति के माध्यम से यह उपनिषद् देवताओं की बहुलता को एक परम तत्त्व में समाहित करती है—ब्रह्मा, विष्णु, रुद्र, इन्द्र आदि सब उसी एक ब्रह्म के रूप हैं। अन्ततः भक्ति और ध्यान परिपक्व होकर अद्वैत-बोध में परिणत होते हैं, जिससे जीवन्मुक्ति, शोक-भय का क्षय और पुनर्जन्म से निवृत्ति का प्रतिपादन होता है।
Start ReadingKaivalya (liberation) as non-dual realization of Ātman = Brahman, beyond all limitation
Saṃnyāsa, tapas, śraddhā, and inner purity as prerequisites for Brahma-jñāna
The Self as the witness of waking, dream, and deep sleep; self-luminous consciousness (svayaṃ-prakāśa)
Reinterpretation of ritual: inner contemplation supersedes external sacrifice; knowledge is the highest “offering”
Śiva/Rudra as the supreme principle, ultimately non-different from the Self (non-sectarian culmination)
Dissolution of deity plurality into one Brahman: all gods and cosmic functions are expressions of the one reality
Jīvanmukti: freedom here and now through knowledge, not merely after death
Detachment from body-mind identification; the knower remains untouched by karma
26 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.
Verse 1
ॐ अथाश्वलायनो भगवन्तं परमेष्ठिनमुपसमेत्योवाच । अधीहि भगवन् ब्रह्मविद्यां वरिष्ठां सदा सद्भिः सेव्यमानां निगूढाम् । यथाऽचिरात् सर्वपापं व्यपोह्य परात्परं पुरुषं याति विद्वान् ॥१॥
ॐ तब आश्वलायन भगवान् परमेष्ठी के पास जाकर बोले—हे भगवन्, मुझे ब्रह्मविद्या का उपदेश कीजिए—जो सर्वोत्तम है, सदा सत्पुरुषों द्वारा सेवित है और गूढ़ है; जिसके द्वारा ज्ञानी शीघ्र ही समस्त पापों को दूर करके परात्पर पुरुष को प्राप्त होता है॥१॥
Brahmavidyā leading to mokṣa (purification from pāpa and realization of the Parātpara Puruṣa/Brahman)Verse 2
तस्मै स होवाच पितामहश्च श्रद्धाभक्तिध्यानयोगादवैहि ॥२॥
तब पितामह (ब्रह्मा) ने उससे कहा—श्रद्धा, भक्ति और ध्यान-योग के द्वारा इसे जानो॥२॥
Sādhana for brahmajñāna: śraddhā, bhakti, dhyāna-yogaVerse 3
न कर्मणा न प्रजया धनेन त्यागेनैके अमृतत्वमानशुः । परेण नाकं निहितं गुहायां विभ्राजते यद्यतयो विशन्ति ॥३॥
न कर्म से, न संतान से, न धन से—केवल त्याग से ही कुछ लोग अमृतत्व को प्राप्त हुए। स्वर्ग से भी परे, हृदय-गुहा में स्थित वह तत्त्व प्रकाशमान है; जिसमें यति (संन्यासी) प्रवेश करते हैं॥३॥
Tyāga/saṃnyāsa as the decisive means; amṛtatva (immortality) through realization of the heart-indwelling BrahmanVerse 4
वेदान्तविज्ञानसुनिश्चितार्थाः संन्यासयोगाद्यतयः शुद्धसत्त्वाः । ते ब्रह्मलोकेषु परान्तकाले परामृताः परिमुच्यन्ति सर्वे ॥४॥
जिन्होंने वेदान्त-ज्ञान से तत्त्वार्थ का निश्चय कर लिया है, वे संन्यास-योग में स्थित, शुद्ध-सत्त्व यति हैं। वे ब्रह्मलोकों में, काल के परम अन्त पर, परम अमृतत्व को प्राप्त होकर सबके सब पूर्णतः मुक्त हो जाते हैं।
Mokṣa through Vedānta-jñāna and saṃnyāsa; liberation (krama-mukti imagery via Brahmaloka)Verse 5
विविक्तदेशे च सुखासनस्थः शुचिः समग्रीवशिरःशरीरः । अन्त्याश्रमस्थः सकलेन्द्रियाणि निरुध्य भक्त्या स्वगुरुं प्रणम्य ॥५॥
एकान्त स्थान में सुखासन पर बैठकर, शुद्ध होकर, ग्रीवा-शिर-शरीर को सम रखकर; अन्त्याश्रम (संन्यास) में स्थित साधक, समस्त इन्द्रियों को निरुद्ध कर, भक्ति से अपने गुरु को प्रणाम करे।
Upāsanā/dhyāna as a preparatory discipline for Brahma-jñāna; saṃnyāsa and indriya-nigrahaVerse 6
हृत्पुण्डरीकं विरजं विशुद्धं विचिन्त्य मध्ये विशदं विशोकम् । अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तरूपं शिवं प्रशान्तममृतं ब्रह्मयोनिम् ॥ तमादिमध्यान्तविहीनमेकं विभुं चिदानन्दमरूपमद्भुतम् । उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्...
हृदय-कमल को—रज-रहित, परम विशुद्ध—और उसके मध्य में स्थित उस निर्मल, शोक-रहित तत्त्व का चिन्तन करे; जो अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त-रूप, शिव, परम शान्त, अमृत, ब्रह्म-योनि है। उस आदि-मध्य-अन्त से रहित एक, सर्वव्यापक, चिदानन्द, निराकार, अद्भुत—उमा-सहित परमेश्वर, प्रभु, त्रिलोचन, नीलकण्ठ, प्रशान्त—का ध्यान करके मुनि भूत-योनि (सर्व-उत्पत्ति-स्थान), समस्त के साक्षी, तम से परे उस तत्त्व को प्राप्त होता है।
Īśvara-upāsanā leading to Brahman-realization; Brahman as sākṣin (witness), beyond tamas; heart-lotus meditation; nirguṇa–saguṇa integrationVerse 7
हृत्पुण्डरीकं विरजं विशुद्धं विचिन्त्य मध्ये विशदं विशोकम् । अचिन्त्यमव्यक्तमनन्तरूपं शिवं प्रशान्तममृतं ब्रह्मयोनिम् ॥ तमादिमध्यान्तविहीनमेकं विभुं चिदानन्दमरूपमद्भुतम् । उमासहायं परमेश्वरं प्रभुं त्...
हृदय-कमल को निर्मल, रज-रहित और पूर्णतः शुद्ध मानकर, उसके मध्य में स्थित उज्ज्वल, शोक-रहित तत्त्व का ध्यान करे। वह अचिन्त्य, अव्यक्त, अनन्त-रूप, शिव, परम-शान्त, अमृत, ब्रह्म-योनि है। वही एक—आदि, मध्य और अन्त से रहित; सर्वव्यापी; चित्-आनन्द-स्वरूप; निराकार, अद्भुत; उमा-सहाय परमेश्वर, प्रभु, त्रिलोचन, नीलकण्ठ, प्रशान्त—उसका ध्यान करके मुनि समस्त का साक्षी, तमस् से परे, भूतों के मूल-कारण को प्राप्त होता है।
Brahman/Īśvara-dhyāna leading to mokṣa; Brahman as sākṣin (witness) and as the source of allVerse 8
स ब्रह्मा स शिवः सेन्द्रः सोऽक्षरः परमः स्वराट् । स एव विष्णुः स प्राणः स कालोऽग्निः स चन्द्रमाः ॥
वही ब्रह्मा है, वही शिव है, वही इन्द्र सहित (समस्त देव-शक्ति) है; वही अक्षर, परम और स्वराज् (स्वयं-शासक) है। वही विष्णु है; वही प्राण है; वही काल है; वही अग्नि है; वही चन्द्रमा है।
Nondual Brahman as the one reality underlying all deities and cosmic functions (ekaṃ sat / īśvara as sarvātmakatva)Verse 9
स एव सर्वं यद्भूतं यच्च भव्यं सनातनम् । ज्ञात्वा तं मृत्युमत्येति नान्यः पन्था विमुक्तये ॥
वही सब कुछ है—जो भूतकाल में हुआ और जो भविष्य में होगा—वह सनातन है। उसे जानकर मनुष्य मृत्यु को पार कर जाता है; मुक्ति के लिए दूसरा कोई मार्ग नहीं है।
Mokṣa through brahma-jñāna; Brahman as sarva (all) and sanātana (eternal)Verse 10
सर्वभूतस्थमात्मानं सर्वभूतानि चात्मनि । सम्पश्यन् ब्रह्म परमं याति नान्येन हेतुना ॥१०॥
जो साधक सम्यक् देखता है कि आत्मा सब प्राणियों में स्थित है और सब प्राणी आत्मा में ही स्थित हैं, वह परम ब्रह्म को प्राप्त होता है—इसके अतिरिक्त कोई अन्य उपाय नहीं।
Atman–Brahman identity; sarvātma-bhāva (the Self as all) leading to mokṣaVerse 11
आत्मानमरणिं कृत्वा प्रणवं चोत्तरारणिम् । ज्ञाननिर्मथनाभ्यासात् पापं दहति पण्डितः ॥११॥
आत्मा को अधर-अरणि और प्रणव (ॐ) को उत्तर-अरणि बनाकर, ज्ञान-निर्मथन के निरन्तर अभ्यास से पण्डित पुरुष पाप को भस्म कर देता है।
Praṇava-upāsanā and jñāna as the purifier; tapas of inquiry; destruction of pāpa/avidyā through knowledgeVerse 12
स एव मायापरिमोहितात्मा शरीरमास्थाय करोति सर्वम् । स्त्र्यन्नपानादिविचित्रभोगैः स एव जाग्रत्परितृप्तिमेति ॥१२॥
वही आत्मा माया से मोहित होकर शरीर का आश्रय लेकर सब कर्म करता है; और स्त्री, अन्न, पान आदि के विविध भोगों से वही जाग्रत अवस्था में तृप्ति को प्राप्त होता है।
Māyā/avidyā causing dehābhimāna (body-identification), kartṛtva-bhoktṛtva (doership/enjoyership), and saṃsāraVerse 13
स्वप्ने स जीवः सुखदुःखभोक्ता स्वमायया कल्पितजीवलोके । सुषुप्तिकाले सकले विलीने तमोऽभिभूतः सुखरूपमेति ॥१३॥
स्वप्न में वही जीव अपनी ही माया से कल्पित जीव-लोक में सुख-दुःख का भोक्ता बनता है। गहरी निद्रा के समय, जब सब कुछ लीन हो जाता है, तब तमस् से आच्छादित होकर वह सुखस्वरूप अवस्था को प्राप्त होता है॥१३॥
Jīva, māyā, the three states (avasthā-traya), suṣupti and ānandaVerse 14
पुनश्च जन्मान्तरकर्मयोगात् स एव जीवः स्वपिति प्रबुद्धः । पुरत्रये क्रीडति यश्च जीवस् ततस्तु जातं सकलं विचित्रम् । आधारमानन्दमखण्डबोधं यस्मिँल्लयं याति पुरत्रयं च ॥ एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रि...
फिर भी, पूर्व-जन्मों के कर्म-संयोग से वही जीव कभी सोता है और कभी जागता है। जो जीव त्रिपुर (तीन नगरों) में क्रीड़ा करता है, उसी से यह समस्त विचित्र जगत उत्पन्न होता है। वही आधार, आनन्द और अखण्ड बोध है, जिसमें त्रिपुर भी लय को प्राप्त होता है॥१४॥
Karma-saṃskāra and rebirth; puratraya (three bodies/states); Brahman/Ātman as ādhāra (substratum), ānanda, akhaṇḍa-bodha; emanation of prāṇa, mind, indriyas, and pañca-bhūtasVerse 15
एतस्माज्जायते प्राणो मनः सर्वेन्द्रियाणि च । खं वायुर्ज्योतिरापश्च पृथ्वी विश्वस्य धारिणी ॥१५॥
इसी से प्राण, मन और समस्त इन्द्रियाँ उत्पन्न होती हैं; तथा आकाश, वायु, तेज, जल और पृथ्वी—जो विश्व को धारण करने वाली है—भी इसी से प्रकट होते हैं॥१५॥
Brahman as source/support; emergence of prāṇa-manas-indriyas and pañca-bhūtas; non-dual causalityVerse 16
यत्परं ब्रह्म सर्वात्मा विश्वस्यायतनं महत् । सूक्ष्मात्सूक्ष्मतरं नित्यं तत्त्वमेव त्वमेव तत् ॥१६॥
जो परम ब्रह्म है—सबका आत्मा, विश्व का महान आधार, सूक्ष्म से भी अधिक सूक्ष्म और नित्य—वही परम तत्त्व है; तू ही वही है।
Brahman–Ātman identity (non-duality)Verse 17
जाग्रत्स्वप्नसुषुप्त्यादिप्रपञ्चं यत्प्रकाशते । तद्ब्रह्माहमिति ज्ञात्वा सर्वबन्धैः प्रमुच्यते ॥१७॥
जिसके प्रकाश से जाग्रत्, स्वप्न, सुषुप्ति आदि का यह प्रपञ्च प्रकाशित होता है—‘मैं वही ब्रह्म हूँ’ ऐसा जानकर मनुष्य सब बंधनों से मुक्त हो जाता है।
Sākṣī-caitanya (witness-consciousness) and mokṣa through jñānaVerse 18
त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद्भवेत् । तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ॥ मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । मयि सर्वं लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्म्यहम् ॥१८-१९॥
तीनों अवस्थाओं में जो भोग्य, भोक्ता और भोग रूप से प्रकट होता है—उन सबसे विलक्षण मैं साक्षी हूँ, केवल चैतन्य-स्वरूप; मैं सदाशिव हूँ। मुझमें ही सब उत्पन्न हुआ, मुझमें ही सब प्रतिष्ठित है, मुझमें ही सब लीन हो जाता है—मैं वही अद्वैत ब्रह्म हूँ।
Sākṣī beyond bhoktṛ-bhogya-bhoga; Brahman as source-support-dissolution (janma-sthiti-laya) and advaya (non-duality)Verse 19
त्रिषु धामसु यद्भोग्यं भोक्ता भोगश्च यद्भवेत् । तेभ्यो विलक्षणः साक्षी चिन्मात्रोऽहं सदाशिवः ॥ मय्येव सकलं जातं मयि सर्वं प्रतिष्ठितम् । मयि सर्वं लयं याति तद्ब्रह्माद्वयमस्म्यहम् ॥
तीनों अवस्थाओं में जो भोग्य, भोक्ता और भोग है—उन सबसे मैं भिन्न हूँ; मैं साक्षी, शुद्ध चैतन्य हूँ; मैं सदाशिव हूँ। मुझमें ही यह सब उत्पन्न होता है, मुझमें ही सब प्रतिष्ठित है, और मुझमें ही सब लीन हो जाता है। मैं वही अद्वैत ब्रह्म हूँ।
Sākṣī-caitanya (witness-consciousness) and non-dual Brahman as the substratum of the three statesVerse 20
अणोरणीयानहमेव तद्वन्महानहं विश्वमहं विचित्रम् । पुरातनोऽहं पुरुषोऽहमीशो हिरण्मयोऽहं शिवरूपमस्मि ॥
मैं अणु से भी अणु हूँ; और उसी प्रकार महान से भी महान हूँ। मैं ही विश्व हूँ; मैं ही यह विचित्र बहुरूपता हूँ। मैं पुरातन हूँ; मैं पुरुष हूँ; मैं ईश्वर हूँ। मैं स्वर्ण-प्रभा से युक्त हूँ; मैं शिव-स्वरूप हूँ।
Brahman/Ātman as both immanent and transcendent (aṇu–mahat), all-pervasive SelfVerse 21
अपाणिपादोऽहमचिन्त्यशक्तिः पश्याम्यचक्षुः स शृणोम्यकर्णः । अहं विजानामि विविक्तरूपो न चास्ति वेत्ता मम चित्सदाऽहम् ॥ वेदैरनेकैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥
मैं हाथ-पाँव रहित हूँ, अचिन्त्य शक्ति वाला हूँ; मैं नेत्रों के बिना देखता हूँ और कानों के बिना सुनता हूँ। मैं विविक्त-स्वरूप होकर जानता हूँ; मेरा कोई ज्ञाता नहीं है—मैं सदा चैतन्य हूँ। अनेक वेदों द्वारा मैं ही जानने योग्य हूँ; मैं वेदान्त का कर्ता हूँ और मैं ही वेद का ज्ञाता हूँ।
Nirguṇa Brahman as self-luminous consciousness beyond sense-organs; the Self as the ultimate subject (cannot be objectified)Verse 22
अपाणिपादोऽहमचिन्त्यशक्तिः पश्याम्यचक्षुः स शृणोम्यकर्णः । अहं विजानामि विविक्तरूपो न चास्ति वेत्ता मम चित्सदाऽहम् ॥ वेदैरनेकैरहमेव वेद्यो वेदान्तकृद्वेदविदेव चाहम् ॥२१–२२॥
मैं हाथ-पाँव रहित, अचिन्त्य शक्ति वाला हूँ; नेत्रों के बिना देखता हूँ, और कानों के बिना सुनता हूँ। मैं विविक्त, परातीत स्वरूप होकर सब जानता हूँ; मेरा कोई ज्ञाता नहीं—मैं सदा चित् और सत् हूँ। अनेक वेदों से मैं ही जानने योग्य हूँ; मैं वेदान्त का कर्ता और वेद का ज्ञाता भी हूँ।
Ātman/Brahman as nirguṇa, self-luminous consciousness beyond sense-organs; svayaṃprakāśa-caitanyaVerse 23
न पुण्यपापे मम नास्ति नाशो न जन्म देहेन्द्रियबुद्धिरस्ति । न भूमिरापो न च वह्निरस्ति न चानिलो मेऽस्ति न चाम्बरं च ॥२३॥
मेरे लिए न पुण्य है न पाप; न विनाश है, न जन्म। देह, इन्द्रियाँ और बुद्धि भी नहीं हैं। न पृथ्वी है, न जल, न अग्नि; न मेरे लिए वायु है, न आकाश भी।
Asaṅgatva (non-attachment) and pañca-bhūta-ātīta Ātman; negation of karma and embodiment (neti-neti)Verse 24
एवं विदित्वा परमात्मरूपं गुहाशयं निष्कलमद्वितीयम् । समस्तसाक्षिं सदसद्विहीनं प्रयाति शुद्धं परमात्मरूपम् । यः शतरुद्रियमधीते सोऽग्निपूतो भवति सुरापानात्पूतो भवति स ब्रह्महत्यायाः पूतो भवति स सुवर्णस्त...
इस प्रकार परमात्मा के स्वरूप को जानकर—जो हृदय-गुहा में स्थित, निष्कल, अद्वितीय, समस्त का साक्षी और सत्-असत् से रहित है—साधक शुद्ध परमात्म-स्वरूप को प्राप्त होता है। जो शतरुद्रीय का अध्ययन करता है, वह अग्नि से शुद्ध होता है; मद्यपान के दोष से शुद्ध होता है; ब्रह्महत्या से शुद्ध होता है; सुवर्ण-चोरी से शुद्ध होता है; निषिद्ध कर्म और कर्तव्य-त्याग के पाप से भी शुद्ध होता है। इसलिए वह अविमुक्त का आश्रय लेता है; वह सामान्य आश्रम-सीमाओं से परे हो जाता है; सदा, एक बार भी करके, उसका जप करे।
Mokṣa through brahmajñāna; hṛdaya-guhā (cave of the heart); advaita (non-duality); sākṣitva (witnesshood); śuddhi and upāsanā (Śatarudrīya) as ancillaryVerse 25
एवं विदित्वा परमात्मरूपं गुहाशयं निष्कलमद्वितीयम् । समस्तसाक्षिं सदसद्विहीनं प्रयाति शुद्धं परमात्मरूपम् । यः शतरुद्रियमधीते सोऽग्निपूतो भवति सुरापानात्पूतो भवति स ब्रह्महत्यायाः पूतो भवति स सुवर्णस्त...
इस प्रकार हृदय-गुहा में स्थित, निष्कल, अद्वितीय, समस्त का साक्षी तथा सत्-असत् के भेद से रहित परमात्म-स्वरूप को जानकर साधक शुद्ध परमात्म-स्वरूप को प्राप्त होता है। जो शतरुद्रीय का अध्ययन करता है, वह अग्नि से पवित्र होता है; मद्यपान के दोष से शुद्ध होता है; ब्राह्मण-हत्या के पाप से शुद्ध होता है; सुवर्ण-चोरी से शुद्ध होता है; तथा निषिद्ध कर्म और कर्तव्य-त्याग के दोषों से भी शुद्ध होता है। इसलिए अविमुक्त का आश्रय लेकर, सामान्य आश्रम-धर्मों से परे होकर, इसे सदा या कम से कम एक बार जपना चाहिए।
Brahman/Ātman as non-dual witness; purification (śuddhi) and liberation (mokṣa) through knowledge and sacred recitationVerse 26
अनेन ज्ञानमाप्नोति संसारार्णवनाशनम् । तस्मादेवं विदित्वैनं कैवल्यं पदमश्नुते । कैवल्यं पदमश्नुत इति ॥२६॥
इस (उपदेश/साधना) से वह ज्ञान प्राप्त होता है जो संसार-रूपी महासागर का नाश करता है। इसलिए इसे इस प्रकार जानकर साधक कैवल्य-पद को प्राप्त होता है—कैवल्य-पद को ही प्राप्त होता है, ऐसा कहा गया है।
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