Upanishads - Devi
Shakta & VaishnavaAtharva Veda32 Verses

Devi

Shakta & VaishnavaAtharva Veda

देवी उपनिषद् (अथर्ववेद) शाक्त उपनिषदों में अत्यंत महत्त्वपूर्ण ग्रंथ है, जिसमें देवी को परब्रह्म के रूप में प्रतिपादित किया गया है। यह उपनिषद् देवी को सृष्टि-स्थिति-लय की अधिष्ठात्री शक्ति, तथा जगत् की निमित्त और उपादान—दोनों कारण—बताती है। यहाँ निर्गुण और सगुण का समन्वय है: देवी निराकार ब्रह्म भी हैं और विश्वरूपा भी। माया/शक्ति के माध्यम से बंधन और विद्या के माध्यम से मोक्ष का विवेचन मिलता है। मंत्र, वाणी (वाक्) और उपासना को ब्रह्मज्ञान की दिशा में ले जाने वाला साधन मानकर यह ग्रंथ भक्ति और ज्ञान का संगम प्रस्तुत करता है।

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Key Teachings

Devī as Parabrahman: the supreme, non-dual reality underlying all names and forms

Nirguṇa–saguṇa unity: Devī is both beyond attributes and manifest as the cosmos and deities

Devī as both material and efficient cause (upādāna and nimitta kāraṇa) of creation

Māyā/Śakti doctrine: Devī veils (avidyā) and reveals (vidyā), enabling bondage and liberation

Antaryāmin: Devī as the indwelling consciousness in all beings, the inner ruler of mind and senses

Integration of guṇas and prakṛti within Devī’s sovereignty; nature is her dynamic power

Mantra and vāc: sacred sound and speech as Devī’s expressive body; realization is aided by mantra-knowledge

Bhakti–jñāna convergence: devotion culminates in non-dual knowledge of Devī as Ātman/Brahman

Soteriology: liberation (mokṣa) arises from recognizing Devī as one’s own Self and the ground of the world

Verses of the Devi

32 verses with Sanskrit text, transliteration, and translation.

Verse 1

सर्वे वै देवा देवीम् उपतस्थुः । कासि त्वं महादेवि । सा अब्रवीत्—अहं ब्रह्मस्वरूपिणी । मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत् शून्यं च अशून्यं च । अहम् आनन्दानानन्दाः, विज्ञानाविज्ञाने अहम् । ब्रह्मा ब्रह्मणि व...

सभी देवगण देवी के समीप श्रद्धापूर्वक उपस्थित हुए। बोले—“हे महादेवी! आप कौन हैं?” देवी ने कहा—“मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ। मुझसे प्रकृति‑पुरुषात्मक जगत् प्रकट होता है—शून्य भी और अशून्य भी। मैं ही आनन्द और अनानन्द हूँ; मैं ही विज्ञान और अविज्ञान हूँ। ब्रह्मा का ज्ञान ब्रह्म में ही जानने योग्य है।” ऐसा अथर्वणीय श्रुति कहती है।

Brahman as Devī; non-duality encompassing opposites (knowledge/ignorance, void/non-void)

Verse 2

सर्वे वै देवा देवीम् उपतस्थुः । कासि त्वं महादेवि । सा अब्रवीत्—अहं ब्रह्मस्वरूपिणी । मत्तः प्रकृतिपुरुषात्मकं जगत् शून्यं च अशून्यं च । अहम् आनन्दानानन्दाः, विज्ञानाविज्ञाने अहम् । ब्रह्मा ब्रह्मणि व...

सभी देवगण देवी के समीप श्रद्धापूर्वक उपस्थित हुए। बोले—“हे महादेवी! आप कौन हैं?” देवी ने कहा—“मैं ब्रह्मस्वरूपिणी हूँ। मुझसे प्रकृति‑पुरुषात्मक जगत् प्रकट होता है—शून्य भी और अशून्य भी। मैं ही आनन्द और अनानन्द हूँ; मैं ही विज्ञान और अविज्ञान हूँ। ब्रह्मा का ज्ञान ब्रह्म में ही जानने योग्य है।” ऐसा अथर्वणीय श्रुति कहती है।

Identity of Devī with Brahman; transcendence of dualities

Verse 3

अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि । अहमखिलं जगत् । वेदोऽहमवेदोऽहम् । विद्याहमविद्याहम् । अजाहमनजाहम् । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम् । अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणावुभौ बि...

मैं ही पंचमहाभूत हूँ और पंचमहाभूतों से परे भी; मैं ही समस्त जगत् हूँ। मैं वेद हूँ और अवेद भी; मैं विद्या हूँ और अविद्या भी। मैं अज (अजन्मा) हूँ और अनज भी; मैं नीचे, ऊपर और तिर्यक् (चारों ओर) हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरती हूँ; आदित्यों तथा विश्वदेवों के साथ भी। मैं ही मित्र और वरुण को धारण करती हूँ; मैं ही इन्द्र और अग्नि हूँ; मैं ही दोनों अश्विनीकुमार हूँ। मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को धारण करती हूँ; मैं उरुक्रम विष्णु, ब्रह्मा तथा प्रजापति को भी धारण करती हूँ। मैं हवि अर्पित करने वाले, सुरक्षित यजमान और सोम निचोड़ने वाले को धन प्रदान करती हूँ।

Sarvātmatva (all-as-Self); Brahman/Devī as immanent and transcendent; integration of deities as functions of one Reality

Verse 4

अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि । अहमखिलं जगत् । वेदोऽहमवेदोऽहम् । विद्याहमविद्याहम् । अजाहमनजाहम् । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम् । अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणावुभौ बि...

मैं पाँच महाभूत भी हूँ और पंचभूतों से परे भी; मैं ही समस्त जगत् हूँ। मैं वेद हूँ और अवेद भी; मैं विद्या हूँ और अविद्या भी। मैं अज (अजन्मा) हूँ और अनज भी। नीचे, ऊपर और तिर्यक्—सभी दिशाओं में मैं ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरती हूँ; आदित्यों तथा विश्वदेवों के साथ भी। मैं मित्र और वरुण—दोनों को धारण करती हूँ; मैं ही इन्द्र और अग्नि हूँ, मैं ही दोनों अश्विनीकुमार हूँ। मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को स्थापित करती हूँ। मैं उरुक्रम विष्णु, ब्रह्मा तथा प्रजापति को भी धारण करती हूँ। हवि अर्पित करने वाले, सु-रक्षित यजमान और सोम-निष्पीडन करने वाले को मैं द्रविण (समृद्धि) प्रदान करती हूँ।

Brahman as Devī (non-dual identity; immanence and transcendence)

Verse 5

अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि । अहमखिलं जगत् । वेदोऽहमवेदोऽहम् । विद्याहमविद्याहम् । अजाहमनजाहम् । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम् । अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणावुभौ बि...

मैं पाँच महाभूत भी हूँ और पंचभूतों से परे भी; मैं ही समस्त जगत् हूँ। मैं वेद हूँ और अवेद भी; मैं विद्या हूँ और अविद्या भी। मैं अज (अजन्मा) हूँ और अनज भी। नीचे, ऊपर और तिर्यक्—सभी दिशाओं में मैं ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरती हूँ; आदित्यों तथा विश्वदेवों के साथ भी। मैं मित्र और वरुण—दोनों को धारण करती हूँ; मैं ही इन्द्र और अग्नि हूँ, मैं ही दोनों अश्विनीकुमार हूँ। मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को स्थापित करती हूँ। मैं उरुक्रम विष्णु, ब्रह्मा तथा प्रजापति को भी धारण करती हूँ। हवि अर्पित करने वाले, सु-रक्षित यजमान और सोम-निष्पीडन करने वाले को मैं द्रविण (समृद्धि) प्रदान करती हूँ।

Non-duality (Advaita) expressed as Devī’s all-inclusive Selfhood

Verse 6

अहं पञ्चभूतान्यपञ्चभूतानि । अहमखिलं जगत् । वेदोऽहमवेदोऽहम् । विद्याहमविद्याहम् । अजाहमनजाहम् । अधश्चोर्ध्वं च तिर्यक्चाहम् । अहं रुद्रेभिर्वसुभिश्चराम्यहमादित्यैरुत विश्वदेवैः । अहं मित्रावरुणावुभौ बि...

मैं पाँच महाभूत भी हूँ और पंचभूतों से परे भी; मैं ही समस्त जगत् हूँ। मैं वेद हूँ और अवेद भी; मैं विद्या हूँ और अविद्या भी। मैं अज (अजन्मा) हूँ और अनज भी। नीचे, ऊपर और तिर्यक्—सभी दिशाओं में मैं ही हूँ। मैं रुद्रों और वसुओं के साथ विचरती हूँ; आदित्यों तथा विश्वदेवों के साथ भी। मैं मित्र और वरुण—दोनों को धारण करती हूँ; मैं ही इन्द्र और अग्नि हूँ, मैं ही दोनों अश्विनीकुमार हूँ। मैं सोम, त्वष्टा, पूषा और भग को स्थापित करती हूँ। मैं उरुक्रम विष्णु, ब्रह्मा तथा प्रजापति को भी धारण करती हूँ। हवि अर्पित करने वाले, सु-रक्षित यजमान और सोम-निष्पीडन करने वाले को मैं द्रविण (समृद्धि) प्रदान करती हूँ।

Śakti as Brahman; identity of the Self with the totality (sarvātmatva)

Verse 7

अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनाम् अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् । मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे । य एवं वेद स देवीपदमाप्नोति । ते देवा अब्रुवन् । नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः...

मैं राष्ट्र की अधिष्ठात्री, वसुओं को एकत्र करने वाली हूँ; मैं इस जगत् के पिता को शिखर पर प्रकट करती हूँ। मेरी योनि जलों में, समुद्र के भीतर है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह देवी-पद को प्राप्त होता है। तब देवों ने कहा—देवी को नमस्कार, महादेवी को नमस्कार; शिवा को निरन्तर नमः। कल्याणमयी प्रकृति को नमः; संयमित होकर हम उसे प्रणाम करते हैं।

Brahman as Devī (Śakti/Prakṛti) and mokṣa through vidyā (realization)

Verse 8

अहं राष्ट्री सङ्गमनी वसूनाम् अहं सुवे पितरमस्य मूर्धन् । मम योनिरप्स्वन्तः समुद्रे । य एवं वेद स देवीपदमाप्नोति । ते देवा अब्रुवन् । नमो देव्यै महादेव्यै शिवायै सततं नमः । नमः प्रकृत्यै भद्रायै नियताः...

मैं राष्ट्र की अधिष्ठात्री, वसुओं को एकत्र करने वाली हूँ; मैं इस जगत् के पिता को शिखर पर प्रकट करती हूँ। मेरी योनि जलों में, समुद्र के भीतर है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह देवी-पद को प्राप्त होता है। तब देवों ने कहा—देवी को नमस्कार, महादेवी को नमस्कार; शिवा को निरन्तर नमः। कल्याणमयी प्रकृति को नमः; संयमित होकर हम उसे प्रणाम करते हैं।

Brahman as Devī (Śakti/Prakṛti) and mokṣa through vidyā (realization)

Verse 9

तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरां नाशयते तमः ॥ देवीं वाचमजनयन्त देवाः तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्...

अग्निवर्णा, तप से दहकती, वैरोचनी, कर्मफलों में प्रसन्न—उस दुर्गा देवी की मैं शरण लेता हूँ; वह अन्धकार को पूर्णतः नष्ट करती है। देवों ने देवी-वाणी को उत्पन्न किया; विश्वरूप प्राणी उसी को बोलते हैं। वह वाणी—धेनु के समान—हमारे लिए मधुर रस और बल दुहती हुई, सुस्तुत होकर हमारे पास आए।

Śakti as liberating power (avidyā-tamo-nāśa), Vāk/Śabda as manifestation of Brahman

Verse 10

तामग्निवर्णां तपसा ज्वलन्तीं वैरोचनीं कर्मफलेषु जुष्टाम् । दुर्गां देवीं शरणमहं प्रपद्ये सुतरां नाशयते तमः ॥ देवीं वाचमजनयन्त देवास्तां विश्वरूपाः पशवो वदन्ति । सा नो मन्द्रेषमूर्जं दुहाना धेनुर्वागस्...

मैं उस दुर्गा देवी की शरण लेता/लेती हूँ—जो अग्नि-सी वर्णवाली, तप से प्रज्वलित, तेजस्विनी और कर्म-फलों में रमण करने वाली हैं; वे अन्धकार का पूर्णतः नाश करती हैं। देवताओं ने देवी-वाणी को उत्पन्न किया; अनेक रूपों वाले प्राणी उसी को बोलते हैं। वह वाणी—धेनु के समान, हमारे लिए मधुर उच्चारण और पोषण देने वाली—भली प्रकार स्तुत होकर हमारे पास आए।

Māyā-śakti / Devī as Brahma-śakti; removal of tamas (avidyā) through divine power and Vāk

Verse 11

कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥ महालक्ष्मीश्च विद्महे सर्वसिद्धिश्च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

हम ब्रह्मा द्वारा स्तुत कालरात्रि को, वैष्णवी को—जो स्कन्द की माता हैं—सरस्वती को, और दक्ष की पुत्री अदिति को—पावन, शिवा—नमस्कार करते हैं। हम महालक्ष्मी को जानते हैं; सर्वसिद्धि-स्वरूपा का ध्यान करते हैं। वह देवी हमें प्रेरित करें।

Devī as the one Brahma-śakti appearing as multiple deities (eka-śakti, aneka-rūpa); grace (anugraha) as the impetus for knowledge and siddhi

Verse 12

कालरात्रिं ब्रह्मस्तुतां वैष्णवीं स्कन्दमातरम् । सरस्वतीमदितिं दक्षदुहितरं नमामः पावनां शिवाम् ॥ महालक्ष्मीश्च विद्महे सर्वसिद्धिश्च धीमहि । तन्नो देवी प्रचोदयात् ॥

हम ब्रह्मा द्वारा स्तुत कालरात्रि को, वैष्णवी को—जो स्कन्द की माता हैं—सरस्वती को, और दक्ष की पुत्री अदिति को—पावन, शिवा—नमस्कार करते हैं। हम महालक्ष्मी को जानते हैं; सर्वसिद्धि-स्वरूपा का ध्यान करते हैं। वह देवी हमें प्रेरित करें।

Devī as one reality with many names/forms; anugraha leading to jñāna and mokṣa

Verse 13

अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव । तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ॥ कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहा हसा । मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः पुनर्गुहा सकला मायया च पुनः कोशा विश्वमाता दिवि द्योम् ॥१३–१४॥

हे दक्ष! अदिति सचमुच तुम्हारी पुत्री रूप में उत्पन्न हुई। अमृत-सम्बन्धी, कल्याणकारी देवताओं ने क्रमशः उसे प्रकट किया। काम ही योनि है; कामकला, वज्रधारी, गुहा, हास; मातरिश्वा (वायु), मेघ, इन्द्र; फिर गुहा, फिर सकलता; माया से तथा पुनः कोशों के रूप में—वह विश्वमाता दिव्य आकाश में प्रकाशमान है।

Māyā-śakti and the manifestation of Brahman as the cosmic Mother; kośa-doctrine; guhā (heart-cave) as locus of realization

Verse 14

अदितिर्ह्यजनिष्ट दक्ष या दुहिता तव । तां देवा अन्वजायन्त भद्रा अमृतबन्धवः ॥ कामो योनिः कामकला वज्रपाणिर्गुहा हसा । मातरिश्वाभ्रमिन्द्रः पुनर्गुहा सकला मायया च पुनः कोशा विश्वमाता दिवि द्योम् ॥१३–१४॥

हे दक्ष! अदिति निश्चय ही तुम्हारी पुत्री रूप में उत्पन्न हुई। अमृत-सम्बन्धी, शुभ देवताओं ने उसे क्रमशः प्रकट किया। काम ही योनि है; कामकला, वज्रधारी, गुहा, हास; मातरिश्वा, मेघ, इन्द्र; फिर गुहा, फिर समग्रता; माया से तथा पुनः कोशों के रूप में—वह विश्वमाता दिव्य आकाश में प्रकाशमान है।

Non-dual immanence of Devī as Śakti across cosmic functions and inner psychophysical layers (kośas)

Verse 15

एषात्मशक्तिः । एषा विश्वमोहिनी पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा । एषा श्रीमहाविद्या । य एवं वेद स शोकं तरति । नमस्ते अस्तु भगवति भवति मातरः अस्मान्पातु सर्वतः ॥१५–१७॥

यह आत्मशक्ति है। यह विश्व को मोहित करने वाली है, जो पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करती है। यही श्रीमहाविद्या है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह शोक से पार हो जाता है। हे भगवती, हे भवति, हे माता! आपको नमस्कार; वह हमारी सर्वतः रक्षा करे।

Ātma-śakti; vidyā leading to mokṣa (śoka-taraṇa); Devī as both māyā’s binding and liberating wisdom

Verse 16

एषात्मशक्तिः। एषा विश्वमोहिनी पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा। एषा श्रीमहाविद्या। य एवं वेद स शोकं तरति। नमस्ते अस्तु भगवति भवति मातः अस्मान् पातु सर्वतः॥१५–१७॥

यह आत्म-शक्ति है। यह विश्व को मोहित करने वाली, पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करने वाली है। यही श्रीमहाविद्या है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह शोक से पार हो जाता है। हे भगवती, हे भवति, हे माता, आपको नमस्कार; आप हमारी सर्वतः रक्षा करें।

Shakti as Atman/Brahman; Maya and Moksha

Verse 17

एषात्मशक्तिः। एषा विश्वमोहिनी पाशाङ्कुशधनुर्बाणधरा। एषा श्रीमहाविद्या। य एवं वेद स शोकं तरति। नमस्ते अस्तु भगवति भवति मातः अस्मान् पातु सर्वतः॥१५–१७॥

यह आत्म-शक्ति है। यह विश्व को मोहित करने वाली, पाश, अंकुश, धनुष और बाण धारण करने वाली है। यही श्रीमहाविद्या है। जो इसे इस प्रकार जानता है, वह शोक से पार हो जाता है। हे भगवती, हे भवति, हे माता, आपको नमस्कार; आप हमारी सर्वतः रक्षा करें।

Non-dual Shakti-Brahman identity; liberation through knowledge

Verse 18

सैषाष्टौ वसवः। सैषैकादश रुद्राः। सैषा द्वादशादित्याः। सैषा विश्वेदेवाः सोमपा असोमपाश्च। सैषा यातुधान्यः असुरा रक्षांसि पिशाचयक्षाः सिद्धाः। सैषा सत्त्व-रजस्-तमांसि। सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः। सैषा ग्रहा ...

वही आठ वसु हैं; वही ग्यारह रुद्र हैं; वही बारह आदित्य हैं; वही विश्वेदेव हैं—सोमपान करने वाले भी और असोमपान भी। वही यातुधान, असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं। वही सत्त्व, रजस् और तमस्—ये तीन गुण हैं। वही प्रजापति, इन्द्र और मनु हैं। वही ग्रह, नक्षत्र और ज्योतियाँ हैं, तथा कला, काष्ठा आदि काल-रूपिणी है। मैं नित्य उसी को प्रणाम करता हूँ—ताप हरने वाली देवी को, भोग और मोक्ष देने वाली को; अनन्त, विजयी, शुद्ध, शरण देने वाली, शिव-प्रदा, स्वयं शिवा को।

Brahman/Devī as sarvātmakatva (all-encompassing reality); guṇas and māyā; bhukti–mukti

Verse 19

सैषा अष्टौ वसवः । सैषा एकादश रुद्राः । सैषा द्वादश आदित्याः । सैषा विश्वेदेवाः सोमपाः असोमपाश्च । सैषा यातुधान्यः असुराः रक्षांसि पिशाचयक्षाः सिद्धाः । सैषा सत्त्व-रजस्-तमांसि । सैषा प्रजापतीन्द्रमनवः...

वही देवी आठ वसु हैं, वही ग्यारह रुद्र हैं, वही बारह आदित्य हैं; वही विश्वेदेव हैं—सोमपान करने वाले और सोमपान न करने वाले भी। वही यातुधान, असुर, राक्षस, पिशाच, यक्ष और सिद्ध हैं। वही सत्त्व-रज-तम—तीनों गुण हैं। वही प्रजापति, इन्द्र और मनु हैं। वही ग्रह, नक्षत्र और ज्योतियाँ हैं, जो कला, काष्ठा आदि काल-रूप में प्रकट होती हैं। मैं उस देवी को नित्य प्रणाम करता/करती हूँ—जो ताप और पाप का हरण करती है, भोग और मोक्ष देती है; अनन्त, विजयी, शुद्ध, शरण देने वाली, शिवदायिनी, स्वयं शिवस्वरूपा।

Brahman/Śakti as the immanent-totality (sarvātmakatva), including guṇas and kāla; mokṣa through devotion/knowledge

Verse 20

वियदाकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ॥ एवमेकाक्षरं मन्त्रं यतयः शुद्धचेतसः । ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ॥२०–२१॥

देवी का सर्वार्थसाधक बीज ‘वियत्’ के आकार से संयुक्त, ‘वीतिहोत्र’ से समन्वित और अर्धचन्द्र से सुशोभित है। इस प्रकार उस एकाक्षर मन्त्र का शुद्धचित्त यति ध्यान करते हैं—जो परमानन्दमय हैं और ज्ञान-जल के महासागर के समान हैं।

Mantra-bīja as a support for Brahman/Śakti-realization; jñāna leading to ānanda (mokṣa)

Verse 21

वियदाकारसंयुक्तं वीतिहोत्रसमन्वितम् । अर्धेन्दुलसितं देव्या बीजं सर्वार्थसाधकम् ॥ एवमेकाक्षरं मन्त्रं यतयः शुद्धचेतसः । ध्यायन्ति परमानन्दमया ज्ञानाम्बुराशयः ॥२०–२१॥

देवी का सर्वार्थसाधक बीज ‘वियत्’ के आकार से संयुक्त, ‘वीतिहोत्र’ से समन्वित और अर्धचन्द्र से सुशोभित है। इस प्रकार उस एकाक्षर मन्त्र का शुद्धचित्त यति ध्यान करते हैं—जो परमानन्दमय हैं और ज्ञान-जल के महासागर के समान हैं।

Mantra-upāsanā culminating in jñāna-ānanda (mokṣa)

Verse 22

वाङ्मया ब्रह्मभूतस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् । सूर्यो वामश्रोत्रबिन्दुः संयुताष्टकतृतीयकः ॥ नारायणेन संयुक्तो वायुश्चाधरसंयुतः । विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥२२–२३॥

ब्रह्मस्वरूपिणी वाङ्मया से छठा अक्षर/तत्त्व, मुख (उच्चारण) से युक्त होकर प्रकट होता है। बाएँ कान में सूर्य बिन्दु-रूप है और अष्टक के तृतीय से संयुक्त है। वह नारायण से संयुक्त है और वायु अधर-भाग से संयुक्त है। ‘विच्चे’—यह नवाक्षरी मन्त्र महान् आनन्द देने वाला कहा गया है।

Mantra-śakti as Brahman (Śabda-Brahman), Devī as the ground of speech and liberation

Verse 23

वाङ्मया ब्रह्मभूतस्मात् षष्ठं वक्त्रसमन्वितम् । सूर्यो वामश्रोत्रबिन्दुः संयुताष्टकतृतीयकः ॥ नारायणेन संयुक्तो वायुश्चाधरसंयुतः । विच्चे नवार्णकोऽर्णः स्यान्महदानन्ददायकः ॥२२–२३॥

ब्रह्मस्वरूपिणी वाङ्मया से छठा अक्षर/तत्त्व, मुख (उच्चारण) से युक्त होकर प्रकट होता है। बाएँ कान में सूर्य बिन्दु-रूप है और अष्टक के तृतीय से संयुक्त है। वह नारायण से संयुक्त है और वायु अधर-भाग से संयुक्त है। ‘विच्चे’—यह नवाक्षरी मन्त्र महान् आनन्द देने वाला कहा गया है।

Mantra as liberating knowledge (vidyā) and Devī as Brahman

Verse 24

हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् । त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥ नमामि त्वामहं देवीं महाभयविनाशिनीम् । महादुर्गप्रशमनीं महाकारुण्यरूपिणीम् ॥...

मैं उस देवी का भजन करता हूँ जो हृदय-कमल के मध्य में विराजती हैं, जिनकी प्रभा प्रातःकालीन सूर्य के समान है; जो पाश और अंकुश धारण करती हैं, सौम्य हैं, जिनके हाथ वर और अभय देते हैं; जो त्रिनेत्री हैं, लाल वस्त्र धारण करती हैं और भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करती हैं। हे देवी! मैं आपको नमस्कार करता हूँ—आप महान् भय का नाश करने वाली, महान् दुर्गति/दुर्ग (दुर्गा) को शांत करने वाली, और महाकरुणा-स्वरूपिणी हैं।

Upāsanā leading to mokṣa; Devī as inner Antaryāmin and compassionate Brahman-power

Verse 25

हृत्पुण्डरीकमध्यस्थां प्रातःसूर्यसमप्रभाम् । पाशाङ्कुशधरां सौम्यां वरदाभयहस्तकाम् । त्रिनेत्रां रक्तवसनां भक्तकामदुघां भजे ॥ नमामि त्वामहं देवीं महाभयविनाशिनीम् । महादुर्गप्रशमनीं महाकारुण्यरूपिणीम् ॥...

मैं उस देवी का भजन करता/करती हूँ जो हृदय-कमल के मध्य विराजमान हैं, जिनकी प्रभा प्रातःकालीन सूर्य के समान है; जो पाश और अंकुश धारण करती हैं, सौम्य हैं, जिनके हाथ वर और अभय प्रदान करते हैं; जो त्रिनेत्री हैं, रक्तवस्त्रधारिणी हैं और भक्तों की कामनाएँ पूर्ण करती हैं। हे देवी, मैं आपको नमस्कार करता/करती हूँ—आप महान भय का नाश करने वाली, महान दुःख का शमन करने वाली और महाकरुणा-स्वरूपिणी हैं॥

Saguna Brahman (Devī as immanent Brahman in the heart); Bhakti as a means toward mokṣa

Verse 26

यस्याः स्वरूपं ब्रह्मादयो न जानन्ति तस्मादुच्यतेऽज्ञेया । यस्या अन्तो न विद्यते तस्मादुच्यतेऽनन्ता । यस्या ग्रहणं नोपलभ्यते तस्मादुच्यतेऽलक्ष्या । यस्या जननं नोपलभ्यते तस्मादुच्यतेऽजा । एकैव सर्वत्र व...

जिसका स्वरूप ब्रह्मा आदि भी नहीं जानते, इसलिए वह ‘अज्ञेया’ कही जाती है। जिसका अंत नहीं मिलता, इसलिए ‘अनन्ता’। जिसका ग्रहण/बोध उपलब्ध नहीं होता, इसलिए ‘अलक्ष्या’। जिसका जन्म नहीं पाया जाता, इसलिए ‘अजा’। जो अकेली ही सर्वत्र विद्यमान है, इसलिए ‘एका’। और जो अकेली ही विश्व-रूप है, इसलिए ‘नैका’ (एक होकर भी अनेक-रूपिणी)। अतः उसे ‘अज्ञेया, अनन्ता, अलक्ष्या, अजा, एका, नैका’ कहा जाता है॥

Nirguṇa Brahman; apophatic theology (neti-neti); non-duality with apparent multiplicity (māyā/śakti)

Verse 27

मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी । ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ॥ यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता । तां दुर्गां दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम् । नमामि भवभीतोऽ...

देवी मंत्रों की मातृका हैं; शब्दों में वे ज्ञान-स्वरूप हैं। समस्त ज्ञानों से परे वे चैतन्य-स्वरूपातीत हैं; शून्यों में वे शून्य की साक्षिणी हैं। जिनसे परे कुछ नहीं—वही दुर्गा कही गई हैं। उस दुर्गम दुर्गा देवी को, दुराचार का विनाश करने वाली को, मैं—भव से भयभीत—नमस्कार करता/करती हूँ; वही मुझे संसार-सागर से पार उतारने वाली हैं॥

Śabda-śakti and Cit (consciousness) as Brahman; mokṣa as crossing saṃsāra; sākṣin (witness)

Verse 28

मन्त्राणां मातृका देवी शब्दानां ज्ञानरूपिणी । ज्ञानानां चिन्मयातीता शून्यानां शून्यसाक्षिणी ॥ यस्याः परतरं नास्ति सैषा दुर्गा प्रकीर्तिता । तां दुर्गां दुर्गमां देवीं दुराचारविघातिनीम् । नमामि भवभीतोऽ...

देवी मंत्रों की मातृका हैं; शब्दों में वे ज्ञानस्वरूपिणी हैं। ज्ञान से भी परे वे चिन्मयी हैं; शून्यों की वे शून्य-साक्षिणी हैं। जिनसे परे कुछ नहीं—वे ही दुर्गा कही गई हैं। उस दुर्गम दुर्गा देवी को, दुराचार का विनाश करने वाली को, मैं—भव से भयभीत—नमस्कार करता हूँ; वे संसार-सागर से पार उतारने वाली हैं।

Brahman/Śakti as Cit (pure consciousness) and sākṣin (witness); Mokṣa (liberation)

Verse 29

इदमथर्वशीर्षं योऽधीते पञ्चाथर्वशीर्षजपफलमवाप्नोति । इदमथर्वशीर्षं ज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति । शतलक्षं प्रजप्त्वापि सोऽर्चासिद्धिं च विन्दति । शतमष्टोत्तरं चास्याः पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ॥ दशवारं पठेद...

जो इस अथर्वशीर्ष का अध्ययन करता है, वह पाँच अथर्वशीर्षों के जप का फल प्राप्त करता है। इस अथर्वशीर्ष को जानकर जो पूजा हेतु प्रतिमा/अर्चा की स्थापना करता है, वह एक लाख जप करके उस अर्चा में भी सिद्धि पाता है। इसके लिए एक सौ आठ जप ‘पुरश्चर्या-विधि’ के रूप में स्मृत है। जो इसे दस बार पढ़ता है, वह तत्क्षण पापों से मुक्त हो जाता है; महादेवी की कृपा से वह महान् दुर्गम संकटों को पार कर जाता है।

Upāsanā (devotional practice) as a means toward purification (pāpa-kṣaya) and liberation-supporting merit; grace (prasāda)

Verse 30

इदमथर्वशीर्षं योऽधीते पञ्चाथर्वशीर्षजपफलमवाप्नोति । इदमथर्वशीर्षं ज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति । शतलक्षं प्रजप्त्वापि सोऽर्चासिद्धिं च विन्दति । शतमष्टोत्तरं चास्याः पुरश्चर्याविधिः स्मृतः ॥ दशवारं पठेद...

जो इस अथर्वशीर्ष का अध्ययन करता है, वह पाँच अथर्वशीर्षों के जप का फल प्राप्त करता है। इस अथर्वशीर्ष को जानकर जो पूजा हेतु प्रतिमा/अर्चा की स्थापना करता है, वह एक लाख जप करके उस अर्चा में भी सिद्धि पाता है। इसके लिए एक सौ आठ जप ‘पुरश्चर्या-विधि’ के रूप में स्मृत है। जो इसे दस बार पढ़ता है, वह तत्क्षण पापों से मुक्त हो जाता है; महादेवी की कृपा से वह महान् दुर्गम संकटों को पार कर जाता है।

Upāsanā (devotional practice) and prasāda (grace) as purification and obstacle-removal

Verse 31

इदमथर्वशीर्षं योऽधीते पञ्चाथर्वशीर्षजपफलमवाप्नोति । इदमथर्वशीर्षं ज्ञात्वा योऽर्चां स्थापयति शतलक्षं प्रजप्त्वापि सोऽर्चासिद्धिं च विन्दति । शतमष्टोत्तरं चास्याः पुरश्चर्याविधिः स्मृतः । दशवारं पठेद्य...

जो इस देवी-अथर्वशीर्ष का अध्ययन करता है, वह पाँच अथर्वशीर्षों के जप का फल प्राप्त करता है। इस अथर्वशीर्ष को जानकर जो देवी की अर्चा/प्रतिमा की स्थापना करता है, वह—लाख बार जप करने पर भी—उस अर्चा में सिद्धि प्राप्त करता है। देवी के लिए पुरश्चर्या-विधि एक सौ आठ मानी गई है। जो इसे दस बार पढ़ता है, वह तुरंत पापों से मुक्त हो जाता है; महादेवी की कृपा से महान संकटों को पार कर जाता है।

Mokṣa (purification and grace as means toward liberation)

Verse 32

प्रातरधीयानो रात्रिकृतं पापं नाशयति । सायमधीयानो दिवसकृतं पापं नाशयति । तत्सायं प्रातः प्रयुञ्जानः पापोऽपापो भवति । निशीथे तुरीयसन्ध्यायां जप्त्वा वाक्सिद्धिर्भवति । नूतनप्रतिमायां जप्त्वा देवतासांनिध...

प्रातःकाल इसका पाठ करने से रात्रि में किया हुआ पाप नष्ट होता है; सायंकाल पाठ करने से दिन में किया हुआ पाप नष्ट होता है। जो इसे इस प्रकार प्रातः और सायं प्रयोग करता है, वह पाप से रहित हो जाता है। मध्यरात्रि में, तुरीय-संध्या में जप करने से वाक्-सिद्धि होती है। नवीन प्रतिमा के समक्ष जप करने से देवता का सान्निध्य प्राप्त होता है। प्राण-प्रतिष्ठा के समय जप करने से प्राणों की प्रतिष्ठा होती है। मंगलवार और अश्विनी-नक्षत्र के संयोग में, महादेवी के सन्निधि में जप करने से महामृत्यु को पार कर जाता है। जो ऐसा जानता है—यही उपनिषद् का उपदेश है।

Mokṣa (overcoming pāpa and mṛtyu through upāsanā and Devī-anugraha)

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