
Ayodhya Mahatmya
This section is anchored in the sacral topography of Ayodhyā on the banks of the Sarayū river, a city represented as a paradigmatic Vaiṣṇava kṣetra. The narrative treats Ayodhyā as a ritually operative landscape: riverbanks, confluences, and named tīrthas become nodes for snāna (bathing), dāna (gifting), pitṛ rites, and deity-darśana. Ayodhyā is also linked to the Solar Dynasty (Sūryavaṃśa) and to Rāma as a theological exemplar, while the Sarayū is framed as a purifying river with cosmological origin motifs. The section’s geography is thus both historical-sacred (royal lineage, urban description) and liturgical (pilgrimage circuits and calendrical observances).
10 chapters to explore.

अयोध्यामाहात्म्यप्रश्न-प्रारम्भः (Commencement of the Inquiry into Ayodhyā’s Sacred Greatness)
अध्याय का आरम्भ मंगलाचरण और पुराणोक्त आवाहन से होता है—नारायण, नर और देवी सरस्वती का स्मरण। दीर्घ सत्र में अनेक प्रदेशों से आए वेदवेत्ता ऋषि एकत्र होकर व्यास-शिष्य, पुराण-ज्ञाता सूत (रोमहर्षण) से निवेदन करते हैं कि वे अयोध्या का क्रमबद्ध माहात्म्य सुनाएँ—उसकी पवित्रता, स्वरूप, राजवंश, तीर्थ, नदियाँ-संगम तथा दर्शन, स्नान और दान के फल। सूत व्यास की कृपा का स्मरण कर परम्परा बताकर कथा स्वीकार करते हैं—स्कन्द से नारद, नारद से अगस्त्य, अगस्त्य से व्यास और व्यास से सूत। फिर अगस्त्य का व्यास को दिया गया वृत्तान्त आता है: अयोध्या विष्णु की आद्यपुरी है, सरयू तट पर शोभायमान, सुदृढ़ दुर्ग-प्राकारों से युक्त और सूर्यवंश से सम्बद्ध। सरयू की उत्पत्ति-कथाओं से उसकी पावनता प्रतिपादित होती है और उसे गंगा के समान परम शुद्धिकारिणी कहा गया है। इसके बाद स्थानीय आख्यान में ब्राह्मण विष्णुशर्मा का घोर तप वर्णित है। वे विष्णु की स्तुति करते हैं और भगवान से अचल भक्ति का वर पाते हैं; तब भगवान पवित्र जलस्रोत प्रकट कर चक्रतीर्थ की स्थापना करते हैं और विष्णुहरि की सन्निधि प्रतिष्ठित करते हैं। कार्तिक शुक्ल दशमी से पूर्णिमा तक वार्षिक तीर्थयात्रा का काल बताया गया है तथा चक्रतीर्थ में स्नान, दान और पितृ-तर्पण के महान फल का प्रतिपादन किया गया है।

Brahmakūṇḍa–Ṛṇamocana–Pāpamocana–Sahasradhārā Māhātmya (Ayodhyā–Sarayū Tīrtha-Nibandha)
यह अध्याय सूतजी की कथा-परंपरा और अगस्त्य मुनि के प्रमाणिक उपदेश से प्रवाहित है। आरम्भ में ब्रह्मा, अयोध्या में हरि के नित्य निवास को जानकर विधिवत् तीर्थ-क्रम का पालन करते हैं और ‘ब्रह्मकूण्ड’ नामक विशाल पवित्र सरोवर की स्थापना करते हैं। उसके जल की शुद्धिकारक महिमा तथा शुभ वनस्पति-पक्षी आदि का वर्णन है; देवता वहाँ स्नान करके तत्काल पवित्र हो जाते हैं। ब्रह्मा बताते हैं कि यहाँ स्नान के साथ दान, होम, जप करने से महान पुण्य मिलता है, बड़े यज्ञों के तुल्य फल प्राप्त होता है; कार्तिक शुक्ल चतुर्दशी को वार्षिक व्रत, स्वर्ण-वस्त्र दान और ब्राह्मण-संतोष को धर्म-नीति के रूप में कहा गया है। इसके बाद अगस्त्य, ब्रह्मकूण्ड से दिशा और दूरी के अनुसार सरयू के अन्य तीर्थों का मानचित्र-सा निर्देश करते हैं। ‘ऋणमोचन’ तीर्थ का परिचय लोमश के अनुभव-वचन से होता है—वहाँ स्नान करने से त्रिविध ऋण (देव, ऋषि, पितृ आदि के कर्तव्य-ऋण) तुरंत कट जाते हैं, इसलिए नियमित स्नान-दान की प्रेरणा दी गई है। ‘पापमोचन’ तीर्थ में नरहरि नामक ब्राह्मण का दृष्टान्त है, जो कुसंग से घोर पापों में गिरता है; पर सत्संग और तीर्थ-स्नान से तत्काल शुद्ध होकर विष्णुलोक को प्राप्त होता है—यह संदेश कि नियमबद्ध तीर्थ-आचरण से सुधार और शुद्धि संभव है। अन्त में ‘सहस्रधारा’ का माहात्म्य रामायण-संबद्ध प्रसंग से बताया गया है—काल के प्रति राम की प्रतिज्ञा, दुर्वासा का आगमन, और सत्य-धर्म की रक्षा हेतु लक्ष्मण का सरयू तट पर योगपूर्वक देह-त्याग, तथा शेषरूप में प्रकट होना। कहा गया है कि भूमि ‘हज़ार प्रकार से छिदी’ इसलिए यह नाम पड़ा। शेष-पूजन, स्नान, स्वर्ण-अन्न-वस्त्र दान और उत्सवों का विधान है—विशेषतः श्रावण शुक्ल पंचमी (नाग-सम्बन्धी) और वैशाख-स्नान; इस प्रकार तीर्थ को स्थायी शुद्धि-केन्द्र और इच्छित फल (विष्णुलोक आदि) देने वाला बताया गया है।

स्वर्गद्वार-माहात्म्य तथा चन्द्रहरेः उत्पत्तिः (Svargadvāra Māhātmya and the Origin of Candra-hari)
अध्याय का आरम्भ सूत के संवाद-प्रसंग से होता है। पूर्व तीर्थ-माहात्म्य सुनकर व्यास तत्त्व-ज्ञान की निरन्तर प्यास प्रकट करते हुए और उपदेश माँगते हैं। अगस्त्य सरयू-तट पर स्थित ‘स्वर्गद्वार’ तीर्थ का परिचय देते हैं—यह पाप-नाशक और मोक्ष-प्रद कहा गया है, तथा स्थान-चिह्नों सहित इसे अन्य तीर्थों से श्रेष्ठ बताया गया है। यहाँ प्रातः-स्नान, देव-सान्निध्य के कारण मध्याह्न-स्नान, उपवास और मास-पर्यन्त व्रत, अन्न-भूमि-गौ-वस्त्र-दान तथा ब्राह्मण-सत्कार के फल बताए गए हैं। स्वर्गद्वार में देहान्त होने पर विष्णु के परम धाम की प्राप्ति, मेरु-सम पापों का भी वहाँ पहुँचते ही क्षय, और वहाँ किया गया कर्म ‘अक्षय’ होने का दृढ़ फल-तर्क प्रस्तुत है। ब्रह्मा, शिव और हरि का उस क्षेत्र से नित्य सम्बन्ध बताकर वैष्णव भाव में भी उसकी सर्वदेव-पावनता स्थापित की गई है। उत्तर भाग में ‘चन्द्र-सहस्र’ व्रत और ‘चन्द्रहर’ प्रसंग का काल-क्रम तथा विधि-विधान आता है। चन्द्र अयोध्या जाकर तप करता है, अनुग्रह पाता है और हरि की स्थापना करता है; फिर शुद्धि-नियम, प्रतिमा/मण्डल-निर्माण, चन्द्र के सोलह नामों से स्तुति, अर्घ्य-दान, सोम-मन्त्र से होम, कलश-व्यवस्था, पुरोहित-तृप्ति, ब्राह्मण-भोजन और व्रत-समापन के बाद नियम-शैथिल्य का निर्देश दिया गया है। अंत में कहा गया है कि यह तीर्थ सभी वर्णों तथा मनुष्येतर प्राणियों के लिए भी फलदायी है, यद्यपि आचार-धर्म की मर्यादा बनी रहती है।

धर्महरि-स्तवः, प्रायश्चित्त-विधानम्, स्वर्णवृष्टि-उत्पत्तिकथा (Dharmāhari Hymn, Expiatory Guidelines, and the Gold-Rain Origin Legend)
इस अध्याय में तीन परस्पर जुड़े प्रसंग आते हैं। पहले अगस्त्य बताते हैं कि वेद‑वेदाङ्ग में निपुण और धर्मनिष्ठ ‘धर्म’ तीर्थयात्रा करते हुए अयोध्या की अनुपम पवित्रता देखकर विस्मित हो जाता है और भक्तिभाव से नगर तथा उसके तीर्थ‑महात्म्य की स्तुति करता है। तभी पीताम्बरधारी हरि प्रकट होते हैं और धर्म क्षीराब्धिवासी, योगनिद्रा, शार्ङ्गी, चक्रधारी आदि दिव्य नामों से विस्तृत स्तोत्र करता है। भगवान् प्रसन्न होकर वर देते हैं और फलश्रुति कहते हैं कि नित्य स्तुति से अभीष्ट सिद्धि और स्थायी समृद्धि मिलती है। धर्म भगवान् की “धर्महरि” नाम से प्रतिष्ठा की प्रार्थना करता है; सरयू‑स्नान, दर्शन और स्मरण से शुद्धि व मोक्ष, तथा वहाँ किए कर्मों का ‘अक्षय’ फल बताया जाता है। आगे प्रायश्चित्त‑विधान आता है—अज्ञान या ज्ञान से हुए दोष, तथा बाधा/परिस्थिति से नित्यकर्म छूटने पर भी यथाशक्ति सावधानी से प्रायश्चित्त करना चाहिए; आषाढ़ शुक्ल एकादशी को वार्षिक यात्रा का निर्देश भी है। अंत में दक्षिण भाग के सुवर्ण‑स्थान की उत्पत्ति‑कथा आती है, जहाँ कुबेर ने स्वर्णवृष्टि कराई। व्यास के पूछने पर अगस्त्य रघु के दिग्विजय, विश्वजित यज्ञ में सर्वस्व‑दान, गुरु‑दक्षिणा हेतु कौत्स के अपार स्वर्ण‑याचन, दान के बाद भी रघु के धन जुटाने के संकल्प, और कुबेर द्वारा स्वर्णवृष्टि व स्वर्ण‑निधि प्रकट करने का वर्णन करते हैं। कौत्स राजा को आशीर्वाद देकर उस स्थान को पापहर तीर्थ ठहराता है, वैशाख शुक्ल द्वादशी की वार्षिक यात्रा बताता है और वहाँ स्नान‑दान से लक्ष्मी (समृद्धि) की प्राप्ति कहता है।

कौत्स-विश्वामित्र-प्रसङ्गः तथा तिलोदकीसरयूसङ्गम-माहात्म्यम् (Kautsa–Viśvāmitra Episode and the Glory of the Tilodakī–Sarayū Confluence)
इस अध्याय में व्यास पूछते हैं कि महर्षि विश्वामित्र ने अपने शिष्य कौत्स पर बिना रोक-टोक क्रोध क्यों किया और इतनी कठिन गुरु-दक्षिणा क्यों माँगी। अगस्त्य बताते हैं कि भूखे दुर्वासा विश्वामित्र के आश्रम में आए और गरम, शुद्ध पायस माँगा; विश्वामित्र ने आदर से परोसा। दुर्वासा स्नान करने गए और प्रतीक्षा करने को कहा; तब विश्वामित्र तप और संयम से हजार दिव्य वर्षों तक अचल खड़े रहे—धैर्य और व्रत-निष्ठा का अद्भुत उदाहरण। कौत्स आज्ञाकारी, अनुशासित और ईर्ष्या-रहित है; मुक्त होने पर भी वह बार-बार दक्षिणा देने का आग्रह करता है। इसी आग्रह से विश्वामित्र क्रुद्ध होकर चौदह करोड़ स्वर्ण की दक्षिणा निर्धारित करते हैं। कौत्स उस दान के लिए राजा काकुत्स्थ के पास जाता है। इसके बाद तीर्थ-माहात्म्य आता है—दक्षिण दिशा में तिलोदकी और सरयू का संगम सिद्धों द्वारा सेवित और जगत्-प्रसिद्ध है। वहाँ स्नान का फल दस अश्वमेध के समान कहा गया है; वेदज्ञ ब्राह्मणों को दान शुभ गति देता है; अन्नदान और विधिपूर्वक कर्म पुनर्जन्म-निवारक बताए गए हैं। उपवास और ब्राह्मण-भोजन से सौत्रामणि यज्ञ का फल, तथा एक मास तक एक-भुक्त व्रत से संचित पाप नष्ट होते हैं; भाद्रपद कृष्ण अमावस्या को वार्षिक यात्रा का विधान है। तिलोदकी तिल-जल जैसी श्याम कही गई है और घोड़ों के पीने में सहायक होने से उसका नाम प्रसिद्ध है। अंत में कहा है कि हरि-भक्ति से स्नान, दान, व्रत और होम अक्षय हो जाते हैं और पाप-त्याग से परम धाम की प्राप्ति होती है।

सीताकुण्ड–गुप्तहरि–चक्रहरि–गोप्रतार–संगममाहात्म्य (Sītākuṇḍa, Guptahari, Cakrahari, Gopratāra, and the Confluence Māhātmya)
इस अध्याय में अगस्त्य मुनि अयोध्या के पश्चिम तट पर स्थित सीताकुण्ड का परिचय देकर उसकी परम पावनता बताते हैं। श्रीराम वहाँ के फल-तत्त्व को स्पष्ट करते हैं कि विधिपूर्वक स्नान, दान, जप, होम और तप किया जाए तो उसका फल अक्षय होता है; विशेष रूप से मार्गशीर्ष कृष्ण-चतुर्दशी तथा मार्गशीर्ष-स्नान को दुर्गति और अशुभ जन्म-फल से रक्षा करने वाला कहा गया है। आगे चक्रहरि (सुदर्शन-सम्बन्ध) और हरिस्मृति नामक विष्णु-आयतन का वर्णन है, जहाँ केवल दर्शन से भी पाप क्षय होता है। देव–असुर संग्राम में पराजित देव क्षीरोदशायी विष्णु की शरण लेते हैं; शिव की ईश्वर-स्तुति में विष्णु को परात्पर तत्त्व और उद्धार-शक्ति के रूप में प्रणाम किया गया है। विष्णु देवों को अयोध्या जाने की आज्ञा देते हैं, जहाँ वे गुप्त तप करेंगे—इसी से ‘गुप्तहरि’ नाम प्रसिद्ध होता है। वहाँ पूजा-स्थल की प्रतिष्ठा, नियमबद्ध तीर्थयात्रा, और विशेषतः योग्य ब्राह्मण को विधिवत गोदान की विस्तृत विधि बताई गई है। फिर सरयू–घर्घरा संगम का माहात्म्य और निकटस्थ गोप्रतार तीर्थ का वर्णन आता है; इनके पुण्य को अनेक यज्ञों से भी श्रेष्ठ कहा गया है। दीपदान, रात्रि-जागरण, अर्पण-उपहार तथा कार्तिक और पौष में वार्षिक अनुष्ठानों का विधान है, और स्त्री-पुरुष सभी के लिए कल्याण व मोक्ष-प्राप्ति का आश्वासन दिया गया है। अंत में श्रीराम के महाप्रस्थान की कथा—नगरवासियों का साथ चलना, सरयू तट पर पहुँचना, और दिव्य आरोहण का तात्त्विक संकेत—गोप्रतार को अयोध्या की मुक्तिदायिनी भूमि के रूप में स्थापित करता है।

तीर्थसंग्रहः—क्षीरोदकादिकुण्डमाहात्म्यम् (Tīrtha Compendium: The Glories of Kṣīrodaka and Associated Kundas)
इस अध्याय में अयोध्या के भीतर तीर्थों का क्रमबद्ध वर्णन ऋषि-वचन के रूप में आता है। आरम्भ में सीताकुण्ड के निकट स्थित क्षीरोदक का माहात्म्य कहा गया है—दशरथ के पुत्रेष्टि-यज्ञ में दिव्य हवि-पात्र प्रकट हुआ, उसी वैष्णव-प्रभाव से इस तीर्थ का नाम और पावन-शक्ति सिद्ध होती है। फिर बृहस्पतिकुण्ड का वर्णन है, जहाँ पाप-नाश, बृहस्पति और विष्णु-पूजन, तथा गुरु-ग्रह पीड़ा के शमन हेतु होम और स्वर्ण-गुरु-प्रतिमा का जल में विसर्जन जैसे उपाय बताए गए हैं। इसके बाद रुक्मिणीकुण्ड का प्रसंग है, जिसे रुक्मिणी ने स्थापित किया और जिसके जल में विष्णु का निवास माना गया है। ऊर्ज मास की कृष्ण नवमी को यात्रा का विशेष समय बताया गया है; लक्ष्मी-सम्बन्धी दान, ब्राह्मण-सत्कार और श्रद्धापूर्वक अर्पण पर बल दिया गया है। धनयक्ष-तीर्थ की उत्पत्ति में हरिश्चन्द्र के धन-निधि, प्रमान्थुर नामक यक्ष-रक्षक और विश्वामित्र द्वारा संस्कार का वर्णन है, जिससे दुर्गन्ध दूर होकर सुगन्ध और शुचिता प्राप्त होती है; यह तीर्थ देह-सौन्दर्य और धन-सौभाग्य देने वाला कहा गया है, साथ ही दान-नियम और निधि-लक्ष्मी-पूजा भी बताई गई है। आगे वसिष्ठकुण्ड (अरुन्धती-वामदेव-सन्निधि), सागरकुण्ड (पूर्णिमा पर समुद्र-स्नान तुल्य फल), योगिनीकुण्ड (64 योगिनियाँ, अष्टमी-महिमा), उर्वशीकुण्ड (रैभ्य के शाप से सौन्दर्य-हानि और स्नानोपदेश से पुनः प्राप्ति) तथा अंत में घोषार्ककुण्ड आता है, जहाँ स्नान और सूर्य-स्तोत्र से राजा का रोग मिटता है; सूर्य देव वर देकर तीर्थ की कीर्ति और फल-प्रतिज्ञा स्थापित करते हैं।

रतिकुण्ड–कुसुमायुधकुण्ड–मन्त्रेश्वरादि तीर्थविधानम् (Ratikunda, Kusumāyudha-kunda, Mantreśvara and allied tīrthas: rites and merits)
इस अध्याय में अगस्त्य पश्चिम दिशा के तीर्थों का क्रम से वर्णन करते हैं—रतिकुण्ड और कुसुमायुध-कुण्ड। यहाँ युगल-स्नान और दान से आरोग्य, सौभाग्य तथा लावण्य की प्राप्ति बताई गई है; विशेषतः माघ शुक्ल पंचमी को दम्पति द्वारा सुगंध, वस्त्र, पुष्प और नैवेद्य से पूजन का विधान है। आगे मन्त्रेश्वर का दुर्लभ लिङ्ग-स्थल आता है, जो श्रीराम के अनुष्ठान से सम्बद्ध प्रतिष्ठा के कारण प्रसिद्ध है; स्नान-दर्शन से महान फल और पुनर्जन्म-निवृत्ति का दावा किया गया है। उत्तर की ओर शीतला तीर्थ में सोमवार-पूजा से रोग-भय का नाश, देवी बन्दी के स्मरण से बन्धन व राजबन्धन से मुक्ति तथा मंगलवार-यात्रा, और देवी चुडकी में संशयपूर्ण कार्यों की सिद्धि हेतु दीपदान व चतुर्दशी-दर्शन कहा गया है। अध्याय में महा-रत्न तीर्थ की भाद्रपद कृष्ण चतुर्दशी की वार्षिक यात्रा, दान और जागरण; दुर्भरा/महाभरा सरस् में शिव-पूजा और भाद्रपद-व्रत; तथा महाविद्या/सिद्धपीठ में मासिक अष्टमी-नवमी यात्रा, विविध परम्पराओं सहित मन्त्र-जप, होम-दान और नवरात्रि-शुद्धि का वर्णन है। राम-कथा के प्रसंग से क्षीर-कुण्ड में दुग्धेश्वर का प्रादुर्भाव और सीता-कुण्ड का नामकरण बताया गया है; सीता-राम-लक्ष्मण की उपासना सहित स्नान, जप, होम से पवित्रता और अक्षय पुण्य का फल कहा गया है। अंत में वसिष्ठ अयोध्या को परम मोक्ष-क्षेत्र बताते हैं और बहुदिवसीय यात्रा-नियम—उपवास, क्रमिक स्नान, देव-दर्शन, श्राद्ध, ब्राह्मण-पूजन, दान तथा विधिवत समापन—निर्दिष्ट करते हैं।

गयाकूप-तमसा-तीर्थप्रशंसा (Gayākūpa, Tamasā, and Kuṇḍa-Ritual Topography)
अगस्त्य मुनि अयोध्या-क्षेत्र के तीर्थों का क्रम और उनके अनुष्ठान-विधि बताते हैं। आरम्भ में जटाकुण्ड के निकट आग्नेय दिशा में स्थित गयाकूप को अत्यन्त फलदायी श्राद्ध-स्थल कहा गया है—यहाँ स्नान, यथाशक्ति दान और पिण्डदान सहित श्राद्ध (तिल और पायस से, या विकल्प रूप में पिण्याक व गुड़ आदि से) करने से पितर तृप्त होते हैं और देवता भी प्रसन्न होते हैं; पितरों की विष्णुलोक-प्राप्ति फलश्रुति के रूप में कही गई है। अमावस्या यदि सोमवार से युक्त हो तो ‘अनन्त’ फल मिलता है, और सोमवार को किया गया श्राद्ध दीर्घकाल तक प्रभावी माना गया है। फिर पूर्व दिशा में पिशाचमोचन तीर्थ का वर्णन है, जहाँ स्नान-दान-श्राद्ध से पिशाच-दोष का निवारण होता है; मार्गशीर्ष शुक्ल चतुर्दशी का विशेष व्रत बताया गया है। पास ही मानसतीर्थ मन, वाणी और शरीर के दोषों को शुद्ध करने वाला कहा गया है; प्रौष्ठपदी काल में, विशेषतः पूर्णिमा को, यात्रा का विधान है। इसके बाद दक्षिण में तमसा नदी का माहात्म्य आता है—महापाप-नाशिनी, वन-समृद्ध तटों वाली, माण्डव्य आदि ऋषियों के आश्रमों से पावन; यहाँ भी स्नान-दान-श्राद्ध से काम और अर्थ की सिद्धि, तथा मार्गशीर्ष शुक्ल पञ्चदशी का विशेष अनुष्ठान बताया गया है। अन्त में सीताकुण्ड (श्री दुग्धेश्वर के निकट) की भाद्रपद शुक्ल चतुर्थी यात्रा, क्षेत्ररक्षक भैरव की मार्गशीर्ष कृष्ण अष्टमी का वार्षिक उत्सव-पूजन, भरतकुण्ड में भरत के राम-ध्यान और प्रतिष्ठा के साथ स्नान व पितृ-श्राद्ध, तथा जटाकुण्ड में राम और सहचरों की पूजा व चैत्र कृष्ण चतुर्दशी की वार्षिक यात्रा का निर्देश है। उपसंहार में तीर्थ-यात्रा का क्रम दिया है—पहले राम-सीता की पूजा, फिर भरतकुण्ड में लक्ष्मण-पूजन, और आगे निर्धारित स्नान-विधियों सहित क्रमबद्ध परिक्रमा।

Ayodhyā-yātrākrama, Sarayū-māhātmya, and Mānasatīrtha Teaching (अयोध्यायात्राक्रमः सरयू-माहात्म्यं च मानसतीर्थोपदेशः)
इस अध्याय में सूत के कथन के भीतर अगस्त्य और व्यास का उपदेशात्मक संवाद है, जिसमें अयोध्या-यात्रा का क्रम और तीर्थों की महिमा बताई गई है। आरम्भ में अयोध्या के रक्षक-वीर, विष्णु-भक्ता राक्षसी सुरसा की रक्षणार्थ प्रतिष्ठा, तथा इच्छापूर्ति/रक्षा देने वाले देवस्थानों की पूजा और उत्सव-विधि का निर्देश मिलता है। आगे पश्चिम दिशा के पिण्डारक आदि स्थलों का उल्लेख और विघ्नों के नाश हेतु विघ्नेश्वर-पूजन कहा गया है। फिर दिशाओं की सीमाओं से ‘जन्मस्थान’ का निरूपण कर उसकी अत्यन्त उद्धारक महिमा बताई जाती है—केवल दर्शन भी महान दान-तप से बढ़कर फलदायक है; नवमी के व्रती को स्नान और दान से ‘जन्म-बन्धन’ से मुक्ति कही गई है। इसके बाद सरयू का विस्तृत माहात्म्य आता है—उसका दर्शन अन्यत्र दीर्घ-निवास और प्रसिद्ध कर्मकाण्डों के फल के तुल्य माना गया है, और अयोध्या का स्मरण स्वयं एक शक्तिशाली मोक्ष-साधन कहा गया है। सरयू को जलरूप ब्रह्म तथा नित्य मोक्षदायिनी बताया गया है। फिर ‘मानसतीर्थ’ का उपदेश है—सत्य, क्षमा, इन्द्रिय-निग्रह, दया, सत्य-वचन, ज्ञान और तप—ये भीतर के तीर्थ हैं; मन की शुद्धि ही वास्तविक स्नान है, और अन्तःशुद्धि के बिना बाह्य कर्म निष्फल हैं। अन्त में सुव्यवस्थित यात्रा-क्रम दिया गया है—प्रातः उठना, प्रमुख कुण्डों में स्नान, क्रम से देव-दर्शन, तथा एकादशी, अष्टमी/चतुर्दशी और अङ्गारक-चतुर्थी आदि तिथियों का समय-निर्देश। नियमित रूप से इस विधि का पालन करने से शुभ फल और पुनरावृत्ति (फिर जन्म) का निवारण बताया गया है।
Ayodhyā is portrayed as a uniquely sanctified city where divine presence is narratively and ritually localized—especially through Viṣṇu/Rāma-centered memory, the Sarayū’s purificatory status, and named tīrthas that operationalize merit through prescribed acts.
Merits are framed as pāpa-kṣaya (diminution of demerit), elevation to higher worlds (svarga/Vaiṣṇava loka), stabilization of devotion, and efficacy for ancestral rites—particularly through Sarayū-related bathing, tīrtha-dāna, and deity-darśana at specific sites.
Key legends include the narrative relay from Skanda → Nārada → Agastya → Vyāsa → Sūta, the depiction of Ayodhyā’s urban-sacred splendor, the origin framing of Sarayū, and the establishment of Cakratīrtha and the Viṣṇuhari mūrti through the tapas of the brāhmaṇa Viṣṇuśarman.