
Sukta 7.97
Vasiṣṭha (Vasiṣṭha-gotra tradition for Maṇḍala 7; hymn to Bṛhaspati/Brāhmaṇaspati)
Bṛhaspati / Brāhmaṇaspati (with a relational horizon that includes Indra as allied power in the hymn)
Triṣṭubh (11-syllable pādas; typical for Maṇḍala 7 praise/invocation)
वसिष्ठ का यह सूक्त बृहस्पति/ब्रह्मणस्पति का आवाहन करता है—उन्हें दिव्य मित्र और याज्ञिक-पुरोहितीय शक्ति के रूप में, जो यज्ञ को सफल बनाते, वाणी को शुद्ध करते और समृद्धि का मार्ग खोलते हैं। स्तुति को सोम-पीड़न के प्रसंग में रखा गया है, जहाँ इन्द्र का भी स्वागत होता है; प्रार्थना है कि उपासक उदार दाता के सामने “निर्दोष” हों और बल, आनंद तथा सम्यक् मार्गदर्शन प्राप्त करें।
Mantra 1
यज्ञे दिवो नृषदने पृथिव्या नरो यत्र देवयवो मदन्ति । इन्द्राय यत्र सवनानि सुन्वे गमन्मदाय प्रथमं वयश्च ॥
यज्ञ में—द्यौ और पृथ्वी के मनुष्य-आसन में—जहाँ देव-प्रार्थी नर आनन्दित होते हैं; जहाँ इन्द्र के लिए सवनों का सोम निचोड़ा जाता है—वह इन्द्र मद के लिए आए, और हमारे अस्तित्व का प्रथम विस्तार भी प्रदान करे।
Mantra 2
आ दैव्या वृणीमहेऽवांसि बृहस्पतिर्नो मह आ सखायः । यथा भवेम मीळ्हुषे अनागा यो नो दाता परावतः पितेव ॥
हम दिव्य सहायताओं का वरण करते हैं, उन्हें अपने पास बुलाते हैं। हे सखाओ, हमारे महान् मित्र बृहस्पति हमारे निकट आएँ—ताकि हम उदार दाता के सामने निरपराध हों; वह जो दूर परावत से भी पिता की भाँति हमें प्रदान करता है।
Mantra 3
तमु ज्येष्ठं नमसा हविर्भिः सुशेवं ब्रह्मणस्पतिं गृणीषे । इन्द्रं श्लोको महि दैव्यः सिषक्तु यो ब्रह्मणो देवकृतस्य राजा ॥
उस ज्येष्ठ को मैं नमस्कार और हवियों सहित स्तुति करता हूँ—कल्याणकारी ब्रह्मणस्पति को। देव-प्रेरित महान् श्लोक इन्द्र से जुड़ जाए—उस इन्द्र से, जो देवकृत ब्रह्म (वाणी) का राजा है।
Mantra 4
स आ नो योनिं सदतु प्रेष्ठो बृहस्पतिर्विश्ववारो यो अस्ति । कामो रायः सुवीर्यस्य तं दात्पर्षन्नो अति सश्चतो अरिष्टान् ॥
सब वांछित वरों का धारक, अति प्रिय बृहस्पति हमारे ‘योनि’—वृद्धि-स्थान—में आकर आसन ग्रहण करें। जो समृद्धि और सुवीर्य की कामना-स्वरूप है—वह हमें वही दे, और जो हमें दबाते हैं उन अरिष्टों के पार हमें ले जाए, हमें अक्षत रखे।
Mantra 5
तमा नो अर्कममृताय जुष्टमिमे धासुरमृतासः पुराजाः । शुचिक्रन्दं यजतं पस्त्यानां बृहस्पतिमनर्वाणं हुवेम ॥
हम अमृत के लिए प्रिय यह स्तुति-ऋक अर्पित करते हैं; प्राचीन-जन्मा अमर दाता-देव इसे धारण करते हैं। शुद्ध-नाद करने वाले, गृह-आश्रयों के पूज्य, अनथक बृहस्पति को हम आह्वान करते हैं।
Mantra 6
तं शग्मासो अरुषासो अश्वा बृहस्पतिं सहवाहो वहन्ति । सहश्चिद्यस्य नीलवत्सधस्थं नभो न रूपमरुषं वसानाः ॥
बलवान अरुण-वर्ण अश्व, एकत्र वहन करते हुए, बृहस्पति को ले जाते हैं। जिसका आसन नील-गहन, आकाश-सा है; और वह अरुण रूप धारण करता है—समवेत वेग से प्रबल गतिमान।
Mantra 7
स हि शुचिः शतपत्रः स शुन्ध्युर्हिरण्यवाशीरिषिरः स्वर्षाः । बृहस्पतिः स स्वावेश ऋष्वः पुरू सखिभ्य आसुतिं करिष्ठः ॥
वह निश्चय ही शुद्ध है, शत-पत्र (शत-विस्तार) वाला; वही शोधक-शुद्धिकर्ता, स्वर्ण-स्वर वाला, प्रेरक, तेजस्वी बल का धारक है। बृहस्पति—सुगम प्रवेश वाला, ऊँचा और महान—अनेक सखाओं के लिए सोम-रस का अभिषव, आनंद-प्रवाह, कर देगा।
Mantra 8
देवी देवस्य रोदसी जनित्री बृहस्पतिं वावृधतुर्महित्वा । दक्षाय्याय दक्षता सखायः करद्ब्रह्मणे सुतरा सुगाधा ॥
देव की जननी वे दो देवियाँ—द्यावा-पृथिवी—अपने महत्त्व से बृहस्पति को बढ़ाएँ। हे सखाओ, दक्षता के कार्य के लिए कुशल बनो; ब्रह्म के लिए सुरक्षित और सुगम तीर्थ-घाट (पार) बना दो।
Mantra 9
इयं वां ब्रह्मणस्पते सुवृक्तिर्ब्रह्मेन्द्राय वज्रिणे अकारि । अविष्टं धियो जिगृतं पुरंधीर्जजस्तमर्यो वनुषामरातीः ॥
हे ब्रह्मणस्पते, यह सु-रचित स्तुति-वाणी तुम्हारे लिए रची गई है—वज्रधारी इन्द्र के लिए ब्रह्म-रूप। धियाँ सुरक्षित रहें और उन्नत हों; पुरंधियाँ (प्रज्ञा-समृद्धियाँ) संकीर्ण-हृदय वालों की शत्रुताओं को दूर भगाएँ।
Mantra 10
बृहस्पते युवमिन्द्रश्च वस्वो दिव्यस्येशाथे उत पार्थिवस्य । धत्तं रयिं स्तुवते कीरये चिद्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
हे बृहस्पते, तुम और इन्द्र—दोनों—दिव्य और पार्थिव धन के स्वामी हो। स्तुति करने वाले गायक, प्रशंसक में रयि (समृद्धि) धरो; और तुम—स्वस्तियों से—सदा हमारी रक्षा करो।
The hymn mainly addresses Bṛhaspati (also called Brāhmaṇaspati), the divine lord of sacred speech and priestly power. Indra appears in the background as the Soma-drinking ally within the sacrifice.
It asks Bṛhaspati to come as a close Friend, remove fault, and make the sacrifice—especially the Soma outpouring—successful, so the worshippers receive strength, joy, and prosperity.
These titles point to his role as the power of luminous, truthful speech that cleanses the rite and the mind. In Vedic thought, right utterance sustains the sacrifice and brings the desired divine response.
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