
Sukta 7.96
Vasiṣṭha (explicit)
Sarasvatī
Jagatī or Triṣṭubh (uncertain from excerpt; Sarasvatī hymns often Triṣṭubh/Jagatī—requires full metrical count)
वसिष्ठ का यह छह-ऋचा सूक्त सरस्वती की स्तुति करता है—उन्हें अधिराज्ञी, जीवनदायिनी नदी के रूप में, जिनका प्रेरित प्रवाह दोनों लोकों को विस्तृत करता है और वाणी, बल तथा समृद्धि का पोषण करता है। कवि सरस्वती (और सरस्वन्त) से जनन-शक्ति—संतान, वृद्धि और धारण करने वाले अन्न—की याचना करता है, और उन्हें प्रत्यक्ष, छलकते हुए थन के समान कल्पित करता है, जिससे समुदाय भाग ले सके। समग्रतः यह सूक्त देवता की शुद्धिकारिणी धारा के अधीन प्रचुरता, सम्यक् उच्चारण और फलदायी निरन्तरता के लिए आह्वान है।
Mantra 1
बृहदु गायिषे वचोऽसुर्या नदीनाम् । सरस्वतीमिन्महया सुवृक्तिभिः स्तोमैर्वसिष्ठ रोदसी ॥
नदियों में असुर्या (अधिष्ठात्री, प्रभुता-युक्त) उस सरस्वती के लिए तू विशाल वचन गा। हे वसिष्ठ, सुवृक्तियों और स्तोत्रों से सरस्वती को ही महिमा दे—जब तक दोनों लोक (रोदसी) तुझमें विस्तृत न हो जाएँ।
Mantra 2
उभे यत्ते महिना शुभ्रे अन्धसी अधिक्षियन्ति पूरवः । सा नो बोध्यवित्री मरुत्सखा चोद राधो मघोनाम् ॥
हे शुभ्रे सरस्वती! जब तेरी महिमा से वे दोनों उज्ज्वल शक्तियाँ (अन्धसी—प्रकाश-धाराएँ) पूरवः (समृद्धियों) के ऊपर आसन ग्रहण करती हैं, तब तू हमारी अवित्री (रक्षिका) बनकर हमें जगा। मरुत्सखा, दाताओं (मघोनाम्) की प्रचुर राधस् (समृद्धि-कल्याण) को हमारे लिए प्रेरित कर।
Mantra 3
भद्रमिद्भद्रा कृणवत्सरस्वत्यकवारी चेतति वाजिनीवती । गृणाना जमदग्निवत्स्तुवाना च वसिष्ठवत् ॥
कल्याणी सरस्वती—अजेय, चेतना को जगाने वाली, बल-समृद्ध—हमारे लिए सच्चा कल्याण ही रचे। जमदग्नि की भाँति स्तुति करते हुए और वसिष्ठ की भाँति गान करते हुए, हम उसे प्रकट होने के लिए आवाहन करते हैं।
Mantra 4
जनीयन्तो न्वग्रवः पुत्रीयन्तः सुदानवः । सरस्वन्तं हवामहे ॥
नव-सृजन की चाह से, अग्रसर होकर, पुत्र-शक्ति (अंतर्यामी संतान-बल) की अभिलाषा रखते हुए—हम सुदानव जन सरस्वन्त का आवाहन करते हैं।
Mantra 5
ये ते सरस्व ऊर्मयो मधुमन्तो घृतश्चुतः । तेभिर्नोऽविता भव ॥
हे सरस्वत! तेरी जो ऊर्मियाँ मधुमयी हैं और घृत-धारा से स्रवित हैं—उन्हीं के द्वारा तू हमारा रक्षक और सहायक बन।
Mantra 6
पीपिवांसं सरस्वतः स्तनं यो विश्वदर्शतः । भक्षीमहि प्रजामिषम् ॥
हम सरस्वती के परिपूर्ण स्तन—उस दुग्धधारा—का भाग लें, जो सबको प्रत्यक्ष है। हम प्रजाजनक अन्न-रस का भक्षण करें और संतति तथा पोषण-समृद्धि प्राप्त करें।
She is praised as the sovereign river among rivers—purifying, nourishing, and powerful—who also supports inspired, well-formed speech used in ritual.
It asks for abundance and nourishment (iṣ), generative strength and progeny (prajā), and the widening, strengthening power that comes with true, effective praise.
It is a poetic image for overflowing nourishment: Sarasvatī/Sarasvat is envisioned as a visible source of sustenance from which the community may ‘partake’ and be strengthened.
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