
Sukta 7.20
Vasiṣṭha
Indra
Triṣṭubh (likely; verify)
वसिष्ठ का यह इन्द्र‑सूक्त उग्र, युवावस्था से दीप्त देव की स्तुति करता है, जो जलों को सुव्यवस्थित करता और मनुष्यों के हितकारी कर्म सिद्ध करता है, तथा भक्तों को बड़े दोष और मोह‑भ्रम से भी उबारता है। यह सिखाता है कि इन्द्र की श्रद्धापूर्वक सेवा और यज्ञ मनुष्य तथा उसके मन को स्थिर करते हैं और ऋत (विश्व‑व्यवस्था) में प्रतिष्ठित स्थायी समृद्धि प्रदान करते हैं। सूक्त का अंत कवि और उस उदार यजमान‑वर्ग के लिए—जो यज्ञकर्म को बल देता है—इन्द्र‑केन्द्रित प्रेरणा (इष्) और चिरस्थायी कल्याण की प्रार्थना से होता है।
Mantra 1
उग्रो जज्ञे वीर्याय स्वधावाञ्चक्रिरपो नर्यो यत्करिष्यन् । जग्मिर्युवा नृषदनमवोभिस्त्राता न इन्द्र एनसो महश्चित् ॥
उग्र (प्रचण्ड) देव वीर्य के लिए जन्मा है; स्वधावान (स्व-नियंत्रित) होकर उसने महती आपः (प्रबल धाराएँ) सिद्ध कर दीं—उस मानुष कर्म के लिए जिसे वह करेगा। युवा, नृषदन (वीरों के आसन) पर अपने अवोभि: (सहायताओं) सहित आया है; इन्द्र हमारे त्राता हैं—महान् एनस् (पाप/दोष) से भी।
Mantra 2
हन्ता वृत्रमिन्द्रः शूशुवानः प्रावीन्नु वीरो जरितारमूती । कर्ता सुदासे अह वा उ लोकं दाता वसु मुहुरा दाशुषे भूत् ॥
वृत्र का संहारक इन्द्र, उत्कट उत्साह से उद्दीप्त होकर, सचमुच आगे बढ़कर गायक-स्तुतिकर्ता की रक्षा- सहायता को आया। उसने सुदास के लिए विस्तृत लोक रचा; और जो यज्ञ-दान अर्पित करता है, उसे वह बार-बार वसु (धन-सम्पदा) देने वाला हुआ।
Mantra 3
युध्मो अनर्वा खजकृत्समद्वा शूरः सत्राषाड्जनुषेमषाळ्हः । व्यास इन्द्रः पृतनाः स्वोजा अधा विश्वं शत्रूयन्तं जघान ॥
युद्धमय, अडिग, संग्राम के धक्के में प्रतिरोध को तोड़ने वाला—वीर, सदा विजयी, जन्म से ही अजेय—इन्द्र ने अपने ही ओज से युद्धों को फैलाकर वश में किया; तब उसने शत्रुता से चलने वाले समस्त को परास्त कर दिया।
Mantra 4
उभे चिदिन्द्र रोदसी महित्वा पप्राथ तविषीभिस्तुविष्मः । नि वज्रमिन्द्रो हरिवान्मिमिक्षन्त्समन्धसा मदेषु वा उवोच ॥
हे इन्द्र, अपनी महिमा से तूने दोनों रोदसी—द्यावा-पृथिवी—को भी विस्तृत कर दिया; हे प्रबल, अपनी प्रचण्ड शक्तियों से। हरिवान् इन्द्र ने सोम-रस (अन्धस्) को मिलाते हुए वज्र को नीचे स्थापित किया; और मदों (उन्माद-आनन्द) में उसने निर्णायक वचन उच्चारित किया।
Mantra 5
वृषा जजान वृषणं रणाय तमु चिन्नारी नर्यं ससूव । प्र यः सेनानीरध नृभ्यो अस्तीनः सत्वा गवेषणः स धृष्णुः ॥
वृषभ ने रण के लिए वृषभ को जन्म दिया; और नारी ने भी उस नर-वीर्य, मानव-वीरत्व को जना। जो बलवानों के लिए सेनाओं का सेनानी बनकर आगे बढ़ता है—वह सत्त्ववान, गो-खोजी (दीप्त किरणों का अन्वेषक), वही धृष्ट है।
Mantra 6
नू चित्स भ्रेषते जनो न रेषन्मनो यो अस्य घोरमाविवासात् । यज्ञैर्य इन्द्रे दधते दुवांसि क्षयत्स राय ऋतपा ऋतेजाः ॥
अब भी वह जन नहीं डगमगाता, न उसका मन हानि में गिरता—जो उसके घोर (तेज) का श्रद्धा से उपासक रहा है। जो यज्ञों द्वारा इन्द्र में अपने दुवांसि (अर्पण) स्थापित करता है, वह समृद्धि में वास करता है—ऋतपा, ऋत से जन्मा, ऋत का पान करने वाला।
Mantra 7
यदिन्द्र पूर्वो अपराय शिक्षन्नयज्ज्यायान्कनीयसो देष्णम् । अमृत इत्पर्यासीत दूरमा चित्र चित्र्यं भरा रयिं नः ॥
यदि, हे इन्द्र, पूर्वज (ज्येष्ठ) ने अपर (कनिष्ठ) को शिक्षा दी, और जो अधिक बलवान था उसने छोटे को दान दिया—तो अमृत (अमर) सचमुच चारों ओर, और दूर के पार भी, स्थित रहा। हे चित्रकर्मन्, हमारे लिए चित्र्य (बहुरूप, दीप्त) धन—रयि—ले आ।
Mantra 8
यस्त इन्द्र प्रियो जनो ददाशदसन्निरेके अद्रिवः सखा ते । वयं ते अस्यां सुमतौ चनिष्ठाः स्याम वरूथे अघ्नतो नृपीतौ ॥
हे इन्द्र, जो जन तुम्हें प्रिय है, जो दान देता है और एकान्त अन्तरिक्ष में तुम्हारा सखा बनता है—हे अद्रि-धारी—हम भी तुम्हारी इसी सुमति में सबसे अधिक प्रिय हों; तुम्हारे वरूथ (रक्षण) में, अहिंसित, नृपति-तुल्य तुम्हारी अधिपत्य-रक्षा के अधीन रहें।
Mantra 9
एष स्तोमो अचिक्रदद्वृषा त उत स्तामुर्मघवन्नक्रपिष्ट । रायस्कामो जरितारं त आगन्त्वमङ्ग शक्र वस्व आ शको नः ॥
यह स्तोम-नाद तुम्हारे लिए गूँज उठा है, हे बलवान वृषभ; और हे मघवन्, सोम-पीषण भी सम्पन्न हुआ है। रयि की कामना से यह जरितृ तुम्हारे पास आया है; आओ, हे शक्र, और हमारे भीतर वसु-सम्पदा को समर्थ कर दो।
Mantra 10
स न इन्द्र त्वयताया इषे धास्त्मना च ये मघवानो जुनन्ति । वस्वी षु ते जरित्रे अस्तु शक्तिर्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
अतः, हे इन्द्र, अपने स्व-बल से हमारे लिए वह प्रेरणा स्थापित करो जो पूर्णतः तुम्हारी ओर उन्मुख हो; और उन मघवानों के लिए भी जो शक्तियों को जगाते हैं। तुम्हारे जरितृ के लिए समृद्ध शक्ति हो; और तुम सदा हमें स्वस्तियों से रक्षित करो।
It presents Indra as both formidable and protective: when approached with reverence and offerings, he removes great fault and confusion and grants stable prosperity aligned with ṛta.
Indra’s power is overwhelming because it breaks obstacles and disorder; the same force becomes protective for the devotee who honors him rightly, turning danger into safeguarding strength.
It suggests a life nourished by ṛta (cosmic order): the worshipper who offers to Indra gains prosperity and steadiness that are not random, but rooted in truth, right action, and harmony.
Answers come straight from the texts, with the shlokas they draw on. Ask in your own words.
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