
Sukta 7.19
Vasiṣṭha
Indra
Triṣṭubh
वसिष्ठ का यह त्रिष्टुभ् सूक्त इन्द्र का आवाहन करता है—उन्हें भयानक, तीक्ष्ण-शृंग वाले वृषभ के रूप में, जो जनों और शक्तियों को उचित गति में प्रवृत्त करते हैं और यजमान को अधिक उज्ज्वल मार्ग की ओर ले जाते हैं। यह इन्द्र के प्राचीन दानों और विजयों को यज्ञकर्ता राजा (सुदास) की समृद्धि से जोड़ता है; मन्त्र और हवि द्वारा इन्द्र के हरित/पिंगल अश्वों को युक्त कर वाज (पूर्णता, बल) प्राप्त करने की कामना करता है। अंत में ‘ब्रह्मन्’ (सत्य-वचन) से प्रेरित होकर इन्द्र की सहायता से निरन्तर रक्षा, स्थिर निवास-स्थान और कल्याण के लिए सीधी प्रार्थना की जाती है।
Mantra 1
यस्तिग्मशृङ्गो वृषभो न भीम एकः कृष्टीश्च्यावयति प्र विश्वाः । यः शश्वतो अदाशुषो गयस्य प्रयन्तासि सुष्वितराय वेदः ॥
जो तीक्ष्ण-शृंग वाला, पराक्रमी वृषभ, भयानक है—वह अकेला ही समस्त जनों को उचित गति में प्रवृत्त कर देता है। जो सदा अयजमान (अदा॑शुष) की जीवन-शक्ति (गय) का अग्रणी-प्रेरक है—हे इन्द्र, तुम ही वह वेद (जानने वाले) हो, जो अधिक सुखद और अधिक प्रकाशमय पथ की ओर ले जाते हो।
Mantra 2
त्वं ह त्यदिन्द्र कुत्समावः शुश्रूषमाणस्तन्वा समर्ये । दासं यच्छुष्णं कुयवं न्यस्मा अरन्धय आर्जुनेयाय शिक्षन् ॥
हे इन्द्र, तुमने ही कुत्स की रक्षा की—जब वह समर में अपने सम्पूर्ण तन-मन से तुम्हारी सेवा में तत्पर था। जब तुमने दास—छलिया शुष्ण, कुयव—को नीचे गिराकर इस जन के लिए वश में किया, तब तुम अर्जुनेय को विजय की यथार्थ कला सिखा रहे थे।
Mantra 3
त्वं धृष्णो धृषता वीतहव्यं प्रावो विश्वाभिरूतिभिः सुदासम् । प्र पौरुकुत्सिं त्रसदस्युमावः क्षेत्रसाता वृत्रहत्येषु पूरुम् ॥
हे धृष्णु (साहसी), धृषता (प्रबल) बल से तुमने सुदास—सुयज्ञ (वीतहव्य)—की समस्त सहायताओं (ऊतियों) से रक्षा की। तुमने पौरुकुत्सि की सहायता की, तुमने त्रसदस्यु की सहायता की; क्षेत्र-विजय में, वृत्र-वधों में, तुमने पूरु को संभाला।
Mantra 4
त्वं नृभिर्नृमणो देववीतौ भूरीणि वृत्रा हर्यश्व हंसि । त्वं नि दस्युं चुमुरिं धुनिं चास्वापयो दभीतये सुहन्तु ॥
हे हर्यश्व इन्द्र! देव-प्रेरित अभियान में, वीरों के साथ आनन्दित होकर, तू अनेक आवरणों/वृत्रों का संहार करता है। तूने दस्यु—चुमुरि और धुनि—को गिराकर सुला दिया, ताकि दभीति उन्हें भली-भाँति मारकर विजय पाए।
Mantra 5
तव च्यौत्नानि वज्रहस्त तानि नव यत्पुरो नवतिं च सद्यः । निवेशने शततमाविवेषीरहञ्च वृत्रं नमुचिमुताहन् ॥
हे वज्रहस्त! वे पराक्रम तेरे ही हैं—जब तूने एक ही क्षण में नब्बे दुर्गों को तोड़ डाला; (वे) नौ (कृत्य) थे। निवेशन-स्थल में तू सौवें (पूर्णत्व) के रूप में प्रविष्ट हुआ; और तूने वृत्र को मारा, और नमुचि को भी मारा।
Mantra 6
सना ता त इन्द्र भोजनानि रातहव्याय दाशुषे सुदासे । वृष्णे ते हरी वृषणा युनज्मि व्यन्तु ब्रह्माणि पुरुशाक वाजम् ॥
हे इन्द्र! प्राचीन काल से वे भोग/अनुग्रह तेरे ही हैं—स्वीकृत हवि अर्पित करने वाले सुदास दाता के लिए। हे वृषन्! तेरे लिए मैं तेरे दोनों बलवान हरि (ताम्रवर्ण अश्व) योकता हूँ। हे पुरुशाक (अनेक कर्म-साधक)! हमारे मन्त्र फैलें और हमारे लिए बल-सम्पदा का वाज (विजयी पराक्रम) प्राप्त करें।
Mantra 7
मा ते अस्यां सहसावन्परिष्टावघाय भूम हरिवः परादै । त्रायस्व नोऽवृकेभिर्वरूथैस्तव प्रियासः सूरिषु स्याम ॥
हे सहसावन् (अत्यन्त पराक्रमी), इस सर्वतो-व्याप्त संकट-घड़ी में हम तेरे लिए अहित का कारण न बनें, न हे हरिवः (हरि-अश्वों के स्वामी) तुझसे परा हो जाएँ। हमें अवृक (भेड़ियों से रहित) वरूथों—रक्षाकवचों—से बचा; हम सू॒रि (प्रकाशमान नायकों) के बीच तेरे प्रिय जन हों।
Mantra 8
प्रियास इत्ते मघवन्नभिष्टौ नरो मदेम शरणे सखायः । नि तुर्वशं नि याद्वं शिशीह्यतिथिग्वाय शंस्यं करिष्यन् ॥
हे मघवन् (इन्द्र), तेरी प्रिय और अभिष्ट निकटता में हम नर (बलवान जन) शरण में सखा होकर आनन्दित हों। अतिथिग्व के लिए—यशस्वी कर्म करने को उद्यत—तू तुर्वश को दबा, यद्व को दबा; (उसके लिए) संकल्प को तीक्ष्ण कर।
Mantra 9
सद्यश्चिन्नु ते मघवन्नभिष्टौ नरः शंसन्त्युक्थशास उक्था । ये ते हवेभिर्वि पणीँरदाशन्नस्मान्वृणीष्व युज्याय तस्मै ॥
हे मघवन्, तेरी अभिष्ट सहायता में तो तत्क्षण ही नर (बलवान जन) उक्थ—स्तुति-वचन—का शंसन करते हैं; उक्थ-शास (वाणी के गायक) उक्थ को ही घोषित करते हैं। जिन्होंने अपने हवों से पणियों को तितर-बितर किया, उस युज्या (योजन/जोड़) के लिए, उस कर्म के लिए, हमें भी चुन ले।
Mantra 10
एते स्तोमा नरां नृतम तुभ्यमस्मद्र्यञ्चो ददतो मघानि । तेषामिन्द्र वृत्रहत्ये शिवो भूः सखा च शूरोऽविता च नृणाम् ॥
हे नृतम (अत्यन्त पुरुषार्थी) नरश्रेष्ठ! ये स्तोत्र हमसे तेरी ओर प्रवाहित होते हैं, तेरे मघ (दान-वैभव) अर्पित करते हुए। हे इन्द्र! वृत्र-वध में उनके लिए तू शिव (कल्याणकारी) हो; सखा भी, शूर भी, और नरों का अविता (रक्षक) भी हो।
Mantra 11
नू इन्द्र शूर स्तवमान ऊती ब्रह्मजूतस्तन्वा वावृधस्व । उप नो वाजान्मिमीह्युप स्तीन्यूयं पात स्वस्तिभिः सदा नः ॥
अब, हे शूर इन्द्र! स्तुत्य होकर, ब्रह्म-प्रेरित अपनी ऊति (सहायता) में बढ़; अपने तनु (देह-बल) में विस्तार पा। हमारे लिए वाज (बल-समृद्धियाँ) रच, हमारे दृढ़ आसन (स्थिर ठिकाने) भी सुदृढ़ कर; और तुम हमें सदा स्वस्ति (कल्याण) से सुरक्षित रखो।
It praises Indra as the supreme force who clears the way, empowers the community, and rewards the one who offers rightly, asking him to grant strength (vāja), stability, and well-being (svasti).
Sudās is presented as the exemplary patron who gives proper oblations; the hymn claims Indra’s ancient gifts and victories for such a generous offerer and his people.
It means Indra is ‘impelled by brahman’—moved by effective sacred speech and truth-word—so the hymn asks that praise itself activate Indra’s protective power and increase strength and security.
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