
Sukta 7.18
Vasiṣṭha (Mandala 7 attribution; hymn-level rishi not provided in input)
Indra
Trishtubh (likely; not specified in input)
वसिष्ठ-प्रदत्त यह इन्द्र-सूक्त इन्द्र को भरतों का पैतृक आश्रय बताता है—गौ, अश्व और विजय का दाता—और जनजातीय संघर्षों में उसकी निर्णायक सहायता का स्मरण करता है। यह प्रेरित ऋषियों के साथ इन्द्र की मैत्री की स्तुति करता है और वर्णन करता है कि विरोधी कैसे परास्त होकर गिरा दिए जाते हैं, जबकि जो इन्द्र की सख्यता चुनते हैं वे “उज्ज्वल दिन”, समृद्धि और सुरक्षित नेतृत्व प्राप्त करते हैं।
Mantra 1
त्वे ह यत्पितरश्चिन्न इन्द्र विश्वा वामा जरितारो असन्वन् । त्वे गावः सुदुघास्त्वे ह्यश्वास्त्वं वसु देवयते वनिष्ठः ॥
हे इन्द्र! सचमुच तुममें ही हमारे पितर भी स्तोता होकर समस्त वाञ्छित वर पाते थे। तुममें ही समृद्ध दुग्ध देने वाली गौएँ हैं, तुममें ही बलवान् अश्व हैं; देव-सेवा चाहने वाले के लिए तुम ही सबसे अधिक वरणीय वसु (धन) हो।
Mantra 2
राजेव हि जनिभिः क्षेष्येवाव द्युभिरभि विदुष्कविः सन् । पिशा गिरो मघवन्गोभिरश्वैस्त्वायतः शिशीहि राये अस्मान् ॥
जनसमूहों में राजा के समान तुम शासन करते हो; विद्वान् कवि होकर अपने दीप्तिमान दिनों से सबको आच्छादित करते हो। हे मघवन्! उज्ज्वल वाणी से, गौओं और अश्वों सहित, हमें तेजस्वी करो—हमें राये (समृद्धि) की ओर, धन-पूर्णता की ओर प्रवृत्त करो।
Mantra 3
इमा उ त्वा पस्पृधानासो अत्र मन्द्रा गिरो देवयन्तीरुप स्थुः । अर्वाची ते पथ्या राय एतु स्याम ते सुमताविन्द्र शर्मन् ॥
हे इन्द्र! देव की ओर उन्मुख, आनन्दमयी ये स्तुतिगिरें यहाँ तुम्हारे पास स्पर्धा करती हुई आ खड़ी हुई हैं। समृद्धि (राय) का धर्म्य पथ हमारी ओर प्रवृत्त हो; हम तुम्हारी सुमति में, तुम्हारे शरण-रूप शान्ति में निवास करें।
Mantra 4
धेनुं न त्वा सूयवसे दुदुक्षन्नुप ब्रह्माणि ससृजे वसिष्ठः । त्वामिन्मे गोपतिं विश्व आहा न इन्द्रः सुमतिं गन्त्वच्छ ॥
जैसे हरी घास के लिए गौ का दुहन किया जाता है, वैसे ही वसिष्ठ ने तुम्हारे लिए मन्त्रों को दुहा कर, निचोड़ कर, निकट प्रस्तुत किया है। सब तुम्हें गोपति—किरण-गवों के स्वामी—कहते हैं; इन्द्र हमारे पास सुमति लेकर आए।
Mantra 5
अर्णांसि चित्पप्रथाना सुदास इन्द्रो गाधान्यकृणोत्सुपारा । शर्धन्तं शिम्युमुचथस्य नव्यः शापं सिन्धूनामकृणोदशस्तीः ॥
जब प्रलय-सी बाढ़ की धाराएँ भी दूर-दूर तक फैल गई थीं, तब इन्द्र ने सुदास के लिए घाट और सुरक्षित पार-उतार बना दिए। नव-नव प्रेरित वाणी वाले उस इन्द्र ने पंक्तिबद्ध होकर दबाव डालने वाले शत्रु शिम्यु को वश में किया, और नदियों के शाप को ऐसा प्रवाह बना दिया जो अपमान/दूषण न कर सके।
Mantra 6
पुरोळा इत्तुर्वशो यक्षुरासीद्राये मत्स्यासो निशिता अपीव । श्रुष्टिं चक्रुर्भृगवो द्रुह्यवश्च सखा सखायमतरद्विषूचोः ॥
समृद्धि-लाभ के लिए तुर्वश और यक्षु मानो पुरोळा (यज्ञ-केक) ही बन गए; मत्स्य जन, धार की तरह तीक्ष्ण होकर, उसे पी जाने को बढ़े। भृगुओं और द्रुह्युओं ने आक्रमण का कोलाहल उठाया; संघर्ष की विपरीत धाराओं में मित्र ने मित्र को भी पार कर लिया।
Mantra 7
आ पक्थासो भलानसो भनन्तालिनासो विषाणिनः शिवासः । आ योऽनयत्सधमा आर्यस्य गव्या तृत्सुभ्यो अजगन्युधा नॄन् ॥
पक्थ, भलानस, अलिन और सींगधारी शिव—सब दबाव डालते हुए आगे बढ़े। पर जिसने आर्य के सहचर-समूह को आगे निकाला—दीप्तिमान गौ-धन लाते हुए—उसने युद्ध के लिए नर-वीरों को तृत्सुओं के पास पहुँचा दिया।
Mantra 8
दुराध्यो अदितिं स्रेवयन्तोऽचेतसो वि जगृभ्रे परुष्णीम् । मह्नाविव्यक्पृथिवीं पत्यमानः पशुष्कविरशयच्चायमानः ॥
दुराध्य (वश में न आने वाले) वे अचेत होकर अदिति का अतिक्रमण करने को उद्यत हुए; और विवेक-रहित होकर उन्होंने परुष्णी (नदी) को अलग कर पकड़ लिया। पर वह (इन्द्र), अपनी महिमा से, पृथ्वी को विस्तृत कर प्रभुत्व में स्थित हुआ; पशु-सा बाँधा हुआ-सा भी कवि (ऋषि) पीछा किए जाते हुए भी आक्रमणकारी को गिरा देता है।
Mantra 9
ईयुरर्थं न न्यर्थं परुष्णीमाशुश्चनेदभिपित्वं जगाम । सुदास इन्द्रः सुतुकाँ अमित्रानरन्धयन्मानुषे वध्रिवाचः ॥
वे अर्थ के लिए चले, निरर्थकता के लिए नहीं; और शीघ्र ही परुष्णी के निकट-निवास तक पहुँच गए। सुदास के लिए इन्द्र ने सु-प्रहारक शत्रुओं को दबा दिया; मनुष्यों के क्षेत्र में फूट और विकृति बोलने वाली वाणी को मौन कर दिया।
Mantra 10
ईयुर्गावो न यवसादगोपा यथाकृतमभि मित्रं चितासः । पृश्निगावः पृश्निनिप्रेषितासः श्रुष्टिं चक्रुर्नियुतो रन्तयश्च ॥
वे चरागाह से निकली गौओं की भाँति चले—अगोपा, बिना रक्षक के; किए हुए कर्म के अनुसार वे मित्र तक पर दबाव डालने लगे—दीप्त-चित्त। चितकबरे (पृश्नि) गौओं-से, पृश्नि-प्रेरणा से प्रेरित होकर, उन्होंने धावा बोला; और नियुत (जुते हुए) रन्तय भी कोलाहल में सम्मिलित हुए।
Mantra 11
एकं च यो विंशतिं च श्रवस्या वैकर्णयोर्जनान्राजा न्यस्तः । दस्मो न सद्मन्नि शिशाति बर्हिः शूरः सर्गमकृणोदिन्द्र एषाम् ॥
जो वैकर्ण जनों के राजा—एक और बीस—को यश-प्राप्ति के हेतु नीचे बिठा/स्थापित कर देता है। वह दास्म (अद्भुत-कर्मा) गृह में जैसे बर्हि (यज्ञ-आसन) को ठीक-ठाक बिछाता है; वही शूर इन्द्र ने इनके लिए निर्णायक ‘सर्ग’—छूट/प्रक्षेप—कर दिया।
Mantra 12
अध श्रुतं कवषं वृद्धमप्स्वनु द्रुह्युं नि वृणग्वज्रबाहुः । वृणाना अत्र सख्याय सख्यं त्वायन्तो ये अमदन्ननु त्वा ॥
तब वज्रबाहु ने जलों में द्रुह्यु को चुन लिया, और प्रसिद्ध वृद्ध कवष को गिरा दिया। यहाँ सख्य के बदले सख्य चुनते हुए वे तुम्हारे पास आए; जो आनन्दित हुए, वे तुम्हारे पीछे—तुम्हारे वेग के अनुगामी—चल पड़े।
Mantra 13
वि सद्यो विश्वा दृंहितान्येषामिन्द्रः पुरः सहसा सप्त दर्दः । व्यानवस्य तृत्सवे गयं भाग्जेष्म पूरुं विदथे मृध्रवाचम् ॥
इन्द्र अपने बल से उनके सामने के सब दृढ़ दुर्गों को तत्क्षण तोड़ देता है—अवरोधक शक्तियों की सात गुनी बाधाएँ। तृत्सु-प्रयत्न के लिए वह ‘गय’ (जीवन-ऊर्जा का क्षेत्र) को भाग रूप में जीतता है; और चेतना की सभा (विदथ) में वह मृध्रवाच—कुटिल व शत्रु वाणी वाले—पूरु को पराजित करता है।
Mantra 14
नि गव्यवोऽनवो द्रुह्यवश्च षष्टिः शता सुषुपुः षट् सहस्रा । षष्टिर्वीरासो अधि षड्दुवोयु विश्वेदिन्द्रस्य वीर्या कृतानि ॥
गव्य, अनव और द्रुह्यु—ये सब दल—साठ-सौ और छह-सहस्र की संख्या में, निश्चेष्ट निद्रा में ढकेल दिए गए। साठ वीर भी—समस्त—इन्द्र के पराक्रमों के ही कृत्य हैं; वह उग्र वेगों को थाम देता है और शत्रु-समूहों को शक्तिहीन शान्ति में गिरा देता है।
Mantra 15
इन्द्रेणैते तृत्सवो वेविषाणा आपो न सृष्टा अधवन्त नीचीः । दुर्मित्रासः प्रकलविन्मिमाना जहुर्विश्वानि भोजना सुदासे ॥
इन्द्र के साथ ये तृत्सु, बल-उत्साह से उछलते हुए, मुक्त जलधाराओं की भाँति नीचे की ओर दौड़ पड़े। कुटिल माप करने वाले दुर्मित्र दल, अपने समस्त भोग और पोषण-शक्तियाँ सुदास—सुग्राही दाता—को छोड़ गए।
Mantra 16
अर्धं वीरस्य शृतपामनिन्द्रं परा शर्धन्तं नुनुदे अभि क्षाम् । इन्द्रो मन्युं मन्युम्यो मिमाय भेजे पथो वर्तनिं पत्यमानः ॥
वीर की आधी शक्ति—जो इन्द्र-बल से रहित थे—पृथ्वी-क्षेत्र पर चढ़ते हुए, इन्द्र ने पीछे ढकेल दी। उसने क्रोध के विरुद्ध क्रोध को मापा; और मार्गों का स्वामी बनकर, उसने अपना चुना हुआ पथ और अग्रगति की गति धारण की।
Mantra 17
आध्रेण चित्तद्वेकं चकार सिंह्यं चित्पेत्वेना जघान । अव स्रक्तीर्वेश्यावृश्चदिन्द्रः प्रायच्छद्विश्वा भोजना सुदासे ॥
कमज़ोर-से साधन से भी उसने उसे एक ही निर्णायक कर्म बना दिया; सिंह-सदृश बल को भी उसने केवल एक प्रहार से गिरा दिया। इन्द्र ने सामान्य जन-जीवन की लटकती बेड़ियाँ काट दीं और सुदास—उस सत्-दाता—को समस्त भोग और पोषण के साधन प्रदान किए।
Mantra 18
शश्वन्तो हि शत्रवो रारधुष्टे भेदस्य चिच्छर्धतो विन्द रन्धिम् । मर्ताँ एनः स्तुवतो यः कृणोति तिग्मं तस्मिन्नि जहि वज्रमिन्द्र ॥
क्योंकि शत्रु निरन्तर हैं और वे तुझे दबाते हैं; भेदन के बीच भी वे झुंड-झुंड होकर उमड़ते हैं—हमारे लिए वह दरार, वह मार्ग-छिद्र खोज दे। जो कोई मर्त्य स्तुति करने वाले पर पाप लाता है, उस पर तीक्ष्ण वज्र-शक्ति का प्रहार कर, हे इन्द्र।
Mantra 19
आवदिन्द्रं यमुना तृत्सवश्च प्रात्र भेदं सर्वताता मुषायत् । अजासश्च शिग्रवो यक्षवश्च बलिं शीर्षाणि जभ्रुरश्व्यानि ॥
यमुना और प्रयत्नशील तृत्सुओं ने इन्द्र का आह्वान किया; यहाँ सर्वताताने शत्रु से भेदन—विभाजन का साधन—छीन लिया। अजास, शिग्रु और यक्षु कर-रूप बलि लाए—शीर्ष और अश्व-सदृश शीघ्र शक्तियाँ—विजयी ऋत-व्यवस्था को अपनी प्राण-शक्ति समर्पित करते हुए।
Mantra 20
न त इन्द्र सुमतयो न रायः संचक्षे पूर्वा उषसो न नूत्नाः । देवकं चिन्मान्यमानं जघन्थाव त्मना बृहतः शम्बरं भेत् ॥
हे इन्द्र, तेरी सुमतियाँ और तेरे रय (समृद्धि-दान) क्षीण नहीं होते—उषाओं की भाँति, जो सदा प्राचीन भी हैं और नित्य नवीन भी। देवक, जो अपने को महान मानता था, उसे भी तूने मार गिराया; और अपने ही विराट् आत्मबल से तूने शम्बर—उस विशाल दुर्ग/आवरण—को भेद डाला।
Mantra 21
प्र ये गृहादममदुस्त्वाया पराशरः शतयातुर्वसिष्ठः । न ते भोजस्य सख्यं मृषन्ताधा सूरिभ्यः सुदिना व्युच्छान् ॥
जो ‘गृह’ से—अस्तित्व के निवास से—तुझे आनन्दित करते आए हैं, वे पराशर और शत-यातु वसिष्ठ; वे तेरे ‘भोज’ (भोग-स्वामी) के साथ सख्य को न तोड़ें। तब सूरीभ्यः—ऋषि-नेताओं के लिए—सुदिन, उज्ज्वल दिन, व्यापक रूप से उदित हों।
Mantra 22
द्वे नप्तुर्देववतः शते गोर्द्वा रथा वधूमन्ता सुदासः । अर्हन्नग्ने पैजवनस्य दानं होतेव सद्म पर्येमि रेभन् ॥
देवव्रत वंशज से सुदास दो सौ दिव्य-दीप्त गौएँ जीतता है, और दो रथ—वधूमन्त, वधुओं से समृद्ध—(पूर्ण-संयोग की शक्तियाँ)। हे अग्ने, मैं पैजवन के दान का आदर करता हूँ; हे रेभन्, होता की भाँति मैं सद्म—पवित्र आसन—के चारों ओर परिक्रमा करता हुआ प्रेरित वाणी गाता हूँ।
Mantra 23
चत्वारो मा पैजवनस्य दानाः स्मद्दिष्टयः कृशनिनो निरेके । ऋज्रासो मा पृथिविष्ठाः सुदासस्तोकं तोकाय श्रवसे वहन्ति ॥
पैजवन (सुदास) के चार दान मुझे आगे बढ़ाते हैं—सुमुख्य, सु-नियत, तीक्ष्ण-धार शक्तियाँ, जो निर्णायक विभाजन में (सहायक) हैं। सुदास की ऋजु-गामी, पृथ्वी-स्थिर शक्तियाँ मेरे लिए आत्मा के ‘शिशु’ को वहन करती हैं—शिशु की वृद्धि के लिए और उज्ज्वल यश के विस्तार के लिए।
Mantra 24
यस्य श्रवो रोदसी अन्तरुर्वी शीर्ष्णेशीर्ष्णे विबभाजा विभक्ता । सप्तेदिन्द्रं न स्रवतो गृणन्ति नि युध्यामधिमशिशादभीके ॥
जिसका प्रेरित यश दो लोकों (रोदसी) के बीच उनकी विशालता में भर जाता है, और शिखर-से-शिखर तक अपना प्रभुत्व बाँटता, विभाजित करता है—उस इन्द्र की सात ऋषि प्रवहमान धाराओं की भाँति स्तुति करते हैं। निकट संग्राम में उसने युद्धरत आक्रान्ता को दबा दिया है और संघर्ष को झुका दिया है।
Mantra 25
इमं नरो मरुतः सश्चतानु दिवोदासं न पितरं सुदासः । अविष्टना पैजवनस्य केतं दूणाशं क्षत्रमजरं दुवोयु ॥
हे मरुतो, हे वीरों, इस सुदास के साथ चलो—जैसे पुत्र पिता के साथ चलते हैं, वैसे ही (जन) दिवोदास के पीछे चलते हैं। तुमने पैजवन के केतु (ध्वज-चिह्न) को अस्तित्व में ठहराया है—अविच्छिन्न, अजेय, अजर क्षत्र, जो यज्ञ-सेवा के कर्म के लिए उत्सुक है।
It praises Indra as the giver of prosperity (cows, horses, wealth) and as the power who grants victory and protection in conflict when the community keeps faith with him.
It stresses continuity: the forefathers gained boons through Indra, and the same results come when poets and patrons maintain reciprocal ‘friendship’ (sakhya) through praise and offerings.
It is a simple blessing for fortunate, successful times—clear outcomes, safety on the journey, and flourishing leadership for the seers and their patrons.
Read Rig Veda in the Vedapath app
Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.