Rig Veda Sukta 18
Mandala 2Sukta 188 Mantras

Sukta 18

Sukta 2.18

Rishi

Gṛtsamada (Bhārgava) (traditional for RV 2.18)

Devata

Indra (hymn context), with chariot imagery central

Chandas

Triṣṭubh (probable)

इन्द्र के प्रति यह स्तुति उषा से जुते “नए रथ” का आह्वान करती है, जिसके अनेक जुए, लगामें और चप्पू जैसे समृद्ध प्रतीकात्मक अंग हैं; प्रार्थना है कि कवियों की आहुतियों और प्रेरित मनन से वह रथ तीव्रगामी बने। इन्द्र को अत्यन्त आग्रह से, और भी अधिक संख्या तथा बल के साथ, सोम-पान के यज्ञ में आमंत्रित किया जाता है—उनका आगमन यजमानों के लिए विजय, रक्षा और उचित भाग (भग) सुनिश्चित करे। अंत में दृष्टि दक्षिणा (पुरोहित-दान) और सामुदायिक समृद्धि की ओर मुड़ती है: दानशीलता का प्रवाह बना रहे, सभा में वाणी “विस्तृत” हो, और प्रजा वीर संतानों से संपन्न हो।

Sanskrit recitationRig Veda 2.18

Mantras

Mantra 1

प्राता रथो नवो योजि सस्निश्चतुर्युगस्त्रिकशः सप्तरश्मिः । दशारित्रो मनुष्यः स्वर्षाः स इष्टिभिर्मतिभी रंह्यो भूत् ॥

प्रातःकाल नया रथ जोता गया—सस्नि (हार्नेस) धारण किए; चार युगों वाला, त्रिकश (त्रिविध कोड़ा) युक्त, सप्त-रश्मि (सात लगामों) वाला। दश-अरित्र (दस पतवारों) वाला, मनुष्य-रचित, स्वर्षाः—सूर्यलोक-विजयी। हमारी इष्टियों (यज्ञ-आहुतियों) और मतियों (चेतना-प्रेरणाओं) से वह हमें वहन करने में रंह्यः—अत्यन्त वेगवान—हो जाए।

Mantra 2

सास्मा अरं प्रथमं स द्वितीयमुतो तृतीयं मनुषः स होता । अन्यस्या गर्भमन्य ऊ जनन्त सो अन्येभिः सचते जेन्यो वृषा ॥

वह इसके लिए प्रथम में समर्थ है, वही द्वितीय के लिए, और वही तृतीय के लिए भी; वही मनुष्यों के भीतर का होता (होतृ) है। एक दूसरे के गर्भ को जनाता है; और वह जेन्य वृषभ—श्रेष्ठ, वीर्यवान—अन्यों के साथ संगति करता है, शक्तियों को एक ही कर्म में जोड़ता हुआ।

Mantra 3

हरी नु कं रथ इन्द्रस्य योजमायै सूक्तेन वचसा नवेन । मो षु त्वामत्र बहवो हि विप्रा नि रीरमन्यजमानासो अन्ये ॥

इन्द्र के दो हरि (ताम्रवर्ण अश्व) मैं निश्चय ही उसके आगमन हेतु रथ में जोतता हूँ—नए, सुगढ़ वचन-युक्त सूक्त से। यहाँ बहुत से विप्र तुम्हें भटका न दें; अन्य यजमान, अन्य—तुम्हें अपनी पुकार की ओर खींचते हुए।

Mantra 4

आ द्वाभ्यां हरिभ्यामिन्द्र याह्या चतुर्भिरा षड्भिर्हूयमानः । आष्टाभिर्दशभिः सोमपेयमयं सुतः सुमख मा मृधस्कः ॥

हे इन्द्र, दो हरियों के साथ आ; चार के साथ आ, छह के साथ—आहूत होते हुए। आठ के साथ, दस के साथ सोमपान हेतु आ; यह सुता (निचोड़ा हुआ) सोम यहाँ है। हे सुमख—यज्ञ में शोभित—हमारे भीतर हिंसा/हानि का कारण न बन।

Mantra 5

आ विंशत्या त्रिंशता याह्यर्वाङा चत्वारिंशता हरिभिर्युजानः । आ पञ्चाशता सुरथेभिरिन्द्रा षष्ट्या सप्तत्या सोमपेयम् ॥

बीस के साथ, तीस के साथ हमारी ओर आ; चालीस के साथ भी आ—अपने हरि (ताम्रवर्ण अश्वों/शक्तियों) को जोतकर। हे इन्द्र, पचास के साथ उत्तम रथों में आ; साठ के साथ, सत्तर के साथ—सोमपान के लिए; तेरा अवतरण विशाल और पूर्ण हो।

Mantra 6

आशीत्या नवत्या याह्यर्वाङा शतेन हरिभिरुह्यमानः । अयं हि ते शुनहोत्रेषु सोम इन्द्र त्वाया परिषिक्तो मदाय ॥

अस्सी के साथ, नब्बे के साथ हमारी ओर आ; सौ हरियों के साथ वहन किया हुआ आ। क्योंकि यह सोम, हे इन्द्र, शुनहोत्र-यज्ञों में तेरे लिए है—तेरे मद के लिए चारों ओर से परिषिक्त; आकर उसमें प्रविष्ट हो, और हमारे भीतर आनंद को विजयी कर।

Mantra 8

न म इन्द्रेण सख्यं वि योषदस्मभ्यमस्य दक्षिणा दुहीत । उप ज्येष्ठे वरूथे गभस्तौ प्रायेप्राये जिगीवांसः स्याम ॥

मेरी इन्द्र के साथ सख्यता कभी न टूटे; उसकी दक्षिणा—धर्म्य दान-शक्ति—हमारे लिए दूध दुहे। ज्येष्ठ, परम वरूथ (रक्षा) में, उसके हस्त-ग्रह में निकट धरे हुए, हम-हमेशा, हर प्रस्थान पर, बार-बार जीतने वाले हों।

Mantra 9

नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी । शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः ॥

अब, हे इन्द्र, तेरे वरदान के प्रत्युत्तर में गायक के लिए वह समृद्ध दाक्षिणा—मघोनी—दुग्ध-सी फलवती हो। स्तोताओं को शिक्षा दे, उनकी बुद्धि-वृद्धि कर; हमारा भग—हमारा सौभाग्य-भाग—क्षतिग्रस्त न हो। हम विदथ (सभा) में बृहद् वचन बोलें, वीर-आत्मा से युक्त हों।

Frequently Asked Questions

The ‘new chariot’ is a poetic and ritual image for freshly mobilized divine power at dawn. It also suggests the disciplined harnessing of faculties—reins, yokes, and direction—so the rite and the mind move swiftly toward success.

They intensify the summons, portraying Indra’s approach as ever larger and more complete. The escalating count signals urgency, abundance, and a wish for the deity’s full presence and strength at the Soma-drinking.

Dakṣiṇā is the ritual gift given to priests/singers, and more broadly the principle of generous recompense that sustains the rite. The hymn asks that this generosity ‘yield’ fruitfully, while safeguarding Bhaga—the community’s rightful share of good fortune.

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