
Sukta 2.17
Gṛtsamada (Bhārgava) (traditional attribution for RV 2.17)
Indra (with Agni/Vahni as operative power in the imagery)
Triṣṭubh (probable for RV 2.17; verse length and cadence consistent)
यह संक्षिप्त त्रिष्टुभ सूक्त इन्द्र की स्तुति करता है—उनके उस विस्तीर्ण अधिपत्य की, जो बढ़कर समस्त लोकों को अपने में समेट लेता है, और उस विजयी शक्ति की, जो विश्व में प्रकाश और व्यवस्था की स्थापना करती है। इन्द्र की क्रिया को यहाँ कार्यकारी “अग्नि-शक्ति” (अग्नि/वह्नि) के रूप में चित्रित किया गया है, जो दोनों लोकों को फैलाती है और फटी हुई अन्धकार-रात्रि को “सी” देती है। इसके पश्चात् कवि गायक-समुदाय के लिए वाज (विजयकारी बल), रक्षा, और उदार दक्षिणा की याचना करता है।
Mantra 4
अधा यो विश्वा भुवनाभि मज्मनेशानकृत्प्रवया अभ्यवर्धत । आद्रोदसी ज्योतिषा वह्निरातनोत्सीव्यन्तमांसि दुधिता समव्ययत् ॥
तब वह, जो अपने महत्त्व से समस्त भुवनों पर फैलकर बढ़ा, प्रभुत्व का कर्ता, अग्रगामी प्रेरणा से उन्नत हुआ; उसने अपने ज्योति से दोनों दृढ़ लोकों (द्यावा-पृथिवी) को विस्तृत किया। अन्धकार के फटे हुए अंशों को सीते हुए, प्रेरक अग्नि-शक्ति ने उन्हें एक ही संगति में दृढ़ कर दिया।
Mantra 7
अमाजूरिव पित्रोः सचा सती समानादा सदसस्त्वामिये भगम् । कृधि प्रकेतमुप मास्या भर दद्धि भागं तन्वो येन मामहः ॥
जैसे बालक माता-पिता के साथ सटकर चलता है, वैसे ही एक ही चेतना-गृह में स्थित होकर, समान आसन से, हे भग, मैं तेरे पास आता हूँ। हमारे लिए स्पष्ट प्रकेत (सही बोध) कर; उसे उसकी मर्यादा में निकट ला; और देहधारी जीवन को वह उचित भाग प्रदान कर, जिससे हम कल्याण में बढ़ें।
Mantra 8
भोजं त्वामिन्द्र वयं हुवेम ददिष्ट्वमिन्द्रापांसि वाजान् । अविड्ढीन्द्र चित्रया न ऊती कृधि वृषन्निन्द्र वस्यसो नः ॥
हे इन्द्र! हम तुम्हें ‘भोज’—समृद्धियों के स्वामी—के रूप में पुकारते हैं। हे इन्द्र! तुम ही कर्मों (अपांसि) और वाज-बल (वाजान्) को प्रदान करते हो। हे इन्द्र! अपनी चित्र-विविध, प्रकाशमयी ऊति से हमारे लिए मार्ग भेद दो; हे वृषन् इन्द्र! हमें उत्तम अवस्था (वस्यस्) के अधिकारी बना।
Mantra 9
नूनं सा ते प्रति वरं जरित्रे दुहीयदिन्द्र दक्षिणा मघोनी । शिक्षा स्तोतृभ्यो माति धग्भगो नो बृहद्वदेम विदथे सुवीराः ॥
अब, हे इन्द्र! गायक-जरितृ के लिए तुम्हारी प्रत्युत्तर-वर-भेंट के रूप में वह उदार दक्षिणा (मघोनी) दुही जाए। स्तोताओं को इसका शिक्षण दो; हमारा भग (भाग्य-देव) दग्ध न हो। हम विदथ (सभा) में बृहद्—महान वाणी—बोलें, और सुवीराः—वीर-शक्ति से सम्पन्न—हों।
It praises Indra’s supreme power that spreads over all worlds and establishes light and order, then asks him for strength (vāja), protection, and prosperity for the worshippers.
The hymn keeps Indra as the main deity, but uses “Vahni” (Fire-Power) as the operative image of luminous force—showing how Indra’s power works to extend light and bind the worlds into coherence.
It is a poetic way of saying that the divine power repairs the ‘rips’ of confusion and obstruction, joining what is scattered into unity and establishing clarity and stability (light) in the cosmos and in life.
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