Adhyaya 8
Sauptika ParvaAdhyaya 8203 Versesरणभूमि से हटकर रात्रि-आक्रमण द्वारा कौरव-शेष का ‘प्रतिशोधात्मक’ प्रहार; पर निर्णायक विजय नहीं—केवल भय और शोक का विस्तार।

Adhyaya 8

Sauptika Parva, Adhyaya 8 — Dhṛṣṭadyumna-vadha and the Camp’s Nocturnal Rout

Upa-parva: Sauptika Upaparva (Aśvatthāmā’s Night Raid on the Camp)

Dhṛtarāṣṭra questions Sañjaya about whether Kṛpa and Kṛtavarmā remained steadfast as Aśvatthāmā advanced toward the camp. Sañjaya reports that the two guarded the gate while Aśvatthāmā, confident and intent on total neutralization, entered by a non-gated route. He locates Dhṛṣṭadyumna asleep in a richly prepared chamber and kills him through forceful restraint rather than formal weapon-duel, rejecting Dhṛṣṭadyumna’s request for a weapon-based death on grounds of ‘ācārya-ghātin’ stigma. The commotion awakens attendants and guards who, perceiving Aśvatthāmā’s ferocity as superhuman, hesitate in fear. Aśvatthāmā proceeds to kill other sleeping leaders (including Uttamaujā) and engages those who rise in confusion. He cuts down the Draupadeyas and associated troops amid darkness, panic, and stampede-like disorder; some interpret the event as demonic or fated (kāla/daiva), reinforced by visions of Kālarātri. Meanwhile, Kṛpa and Kṛtavarmā prevent escape at the camp gate and ignite fires in multiple locations, compounding chaos. By pre-dawn, the raid yields mass casualties; Sañjaya explains that such an act was undertaken in the absence of the Pāṇḍavas and Kṛṣṇa, whose presence would have deterred it. The chapter closes with the perpetrators reporting success and anticipating informing Duryodhana if he still lives.

Chapter Arc: रात्रि के अंधकार में शिव-पूजा से उन्मत्त द्रोणपुत्र अश्वत्थामा अपने कृत्य के बाद भी चैन नहीं पाता; वह पूछता-सा लगता है—क्या वे दोनों महारथी (द्रुपदपुत्र/पांचाल-वीर) सचमुच मारे गए, या कहीं अपमान की आग लिये लौट तो नहीं आए? → शिविर में कोलाहल उठता है—अचानक शब्द, चीखें, भागते सैनिक, और पहचान खो चुके योद्धा “हा तात! हा पुत्र!” पुकारते हुए अंधेरे में भटकते हैं। द्वार पर कृतवर्मा और कृपाचार्य पलायन करने वालों को रोककर वहीं काट डालते हैं, जिससे भय और घिरता है। → रक्त में नहाया अश्वत्थामा प्रातः के निकट आते ही शिविर से बाहर निकलने का विचार करता है; भीतर नरसंहार की प्रतिध्वनि और बाहर निकलने की विवशता—यही क्षण उसके अपराध-बोध, भय और प्रतिशोध का चरम बनता है। → रात्रि का उन्माद थमता नहीं, पर दृश्य स्पष्ट होता है: शिविर में भगदड़, द्वार पर संहार, और अश्वत्थामा के मन में पाण्डवों, श्रीकृष्ण और सात्यकि का स्थायी भय—जिसने उसे यह कर्म साधने को प्रेरित किया—अब भी बना रहता है। → प्रभात के साथ प्रश्न टिका रहता है—क्या यह रात्रि-हत्या युद्ध का पलड़ा पलट देगी, या पाण्डव पक्ष से प्रतिशोध की अग्नि और भयानक रूप लेगी?

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमें द्रोणपुत्रद्वारा की हुई भगवान्‌ शिवकी पूजाविषयक सातवाँ अध्याय पूरा हुआ ॥/ ७ ॥। अपन करा बछ। जज स:ॉ:ः: - वह मन्त्र इस प्रकार है--'आप्यायस्व समेतु ते विश्वत: सोम वृष्ण्यम्‌ । भवा वाजस्य सड़थे ।। ! अष्टमो<ड ध्याय: अश्र॒त्थामाके द्वारा रात्रिमें सोये 33482 पांचाल आदि समस्त वीरोंका संहार तथा फाटकसे भागते हुए योद्धाओंका कृतवर्मा और कृपाचार्य द्वारा वध घतयाट्र उवाच तथा प्रयाते शिबिरं द्रोणपुत्रे महारथे । कच्चित्‌ कृपश्च भोजश्च भयार्तो न व्यवर्तताम्‌,धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! जब महारथी द्रोणपुत्र इस प्रकार शिविरकी ओर चला, तब कृपाचार्य और कृतवर्मा भयसे पीड़ित हो लौट तो नहीं गये?

धृतराष्ट्र बोले—संजय! जब महारथी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा इस प्रकार शिविर की ओर चला, तब कृपाचार्य और भोजवंशी कृतवर्मा—भय से व्याकुल होकर—कहीं लौट तो नहीं गए?

Verse 2

कच्चिन्न वारितौ क्षुद्रे रक्षिभिनोंपलक्षितौ । असहामिति मन्वानौ न निवृत्ती महारथौ

क्या वे दोनों महारथी तुच्छ पहरेदारों द्वारा रोके तो नहीं गए, या उनके द्वारा पहचाने तो नहीं गए? ‘हम यह अपमान/पराजय सह नहीं सकते’—ऐसा सोचकर वे अपने संकल्प से लौट तो नहीं पड़े?

Verse 3

दुर्योधनस्यथ पदवीं गतौ परमिकां रणे,वे दोनों वीर पांचालोंके द्वारा मारे जाकर धरतीपर सदाके लिये सो तो नहीं गये? रणभूमिमें मरकर दुर्योधनके ही उत्तम मार्गपर चले तो नहीं गये? क्या उन दोनोंने भी वहाँ कोई पराक्रम किया? संजय! ये सब बातें मुझे बताओ

क्या वे दोनों वीर पाञ्चालों को मारकर रण में उसी परम गति को प्राप्त हुए, जिस मार्ग पर दुर्योधन गया? या वे धरती पर गिरकर सदा के लिए सो तो नहीं गए? क्या वहाँ उन्होंने कोई और पराक्रम भी किया? संजय! यह सब मुझे बताओ।

Verse 4

पज्चालैर्निहतौ वीरौ कच्चिन्नास्वपतां क्षितौ | कच्चित्‌ ताभ्यां कृतं कर्म तन्‍्ममाचक्ष्व संजय,वे दोनों वीर पांचालोंके द्वारा मारे जाकर धरतीपर सदाके लिये सो तो नहीं गये? रणभूमिमें मरकर दुर्योधनके ही उत्तम मार्गपर चले तो नहीं गये? क्या उन दोनोंने भी वहाँ कोई पराक्रम किया? संजय! ये सब बातें मुझे बताओ

धृतराष्ट्र बोले—पाञ्चालों के द्वारा मारे गए वे दोनों वीर कहीं धरती पर अनंत निद्रा तो नहीं सो गए? क्या उन दोनों ने वहाँ कोई कर्म/पराक्रम किया? संजय! वह मुझे बताओ।

Verse 5

संजय उवाच तस्मिन्‌ प्रयाते शिबिरं द्रोणपुत्रे महात्मनि | कृपश्च कृतवर्मा च शिविरद्वार्यतिष्ठताम्‌

संजय बोले—जब महात्मा द्रोणपुत्र शिविर की ओर प्रस्थान कर चुके, तब कृप और कृतवर्मा शिविर-द्वार पर ही डटे रहे।

Verse 6

संजयने कहा--राजन्‌! महामनस्वी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा जब शिविरके भीतर जाने लगा, उस समय कृपाचार्य और कृतवर्मा भी उसके दरवाजेपर जा खड़े हुए ।। अश्वत्थामा तु तौ दृष्टवा यत्नवन्ती महारथौ । प्रह्ृष: शनकै राजन्निदं वचनमत्रवीत्‌,महाराज! उन दोनों महारथियोंको अपना साथ देनेके लिये प्रयत्नशील देख अश्वृत्थामाको बड़ी प्रसन्नता हुई। उसने उनसे धीरेसे इस प्रकार कहा--

संजय ने कहा—राजन्! महामनस्वी द्रोणपुत्र अश्वत्थामा जब शिविर में प्रवेश करने लगा, उसी समय कृपाचार्य और कृतवर्मा भी उसके द्वार पर आकर खड़े हो गए। उन दोनों महारथियों को अपने साथ देने के लिए प्रयत्नशील देखकर अश्वत्थामा अत्यन्त प्रसन्न हुआ और धीरे से उनसे यह वचन बोला।

Verse 7

यत्तौ भवन्तौ पर्याप्तौ सर्वक्षत्रस्थ नाशने । कि पुनर्योधशेषस्य प्रसुप्तस्य विशेषत:,“यदि आप दोनों सावधान होकर चेष्टा करें तो सम्पूर्ण क्षत्रियोंका विनाश करनेके लिये पर्याप्त हैं। फिर इन बचे-खुचे और विशेषतः सोये हुए योद्धाओंको मारना कौन बड़ी बात है?

यदि आप दोनों सावधान रहकर प्रयत्न करें, तो सम्पूर्ण क्षत्रियों के विनाश के लिए पर्याप्त हैं। फिर बचे-खुचे—और विशेषतः सोए हुए—योद्धाओं का वध करना कौन-सी बड़ी बात है?

Verse 8

अहं प्रवेक्ष्ये शिबिरं चरिष्यामि च कालवत्‌ । यथा न ककश्रिदपि वा जीवन्‌ मुच्येत मानव:,इति श्रीमहा भारते सौप्तिकपर्वणि रात्रियुद्धे पाज्चालादिवधेडष्टमो5ध्याय:

मैं शिविर में प्रवेश करूँगा और काल के समान उसमें विचरूँगा, जिससे वहाँ कोई भी मनुष्य—एक भी—जीवित न बच सके।

Verse 9

इत्युक्त्वा प्राविशद्‌ द्रौणि: पार्थानां शिबिरं महत्‌

ऐसा कहकर द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) पाण्डवों के महान् शिविर में प्रविष्ट हुआ।

Verse 10

स प्रविश्य महाबाहुरुद्देशज्ञश्व तस्य ह

वह महाबाहु वहाँ प्रवेश करके—उस स्थान का भली-भाँति जानकार—निश्चयपूर्वक आगे बढ़ा।

Verse 11

धृष्टद्युम्नस्य निलयं शनकैरभ्युपागमत्‌ । वह महाबाहु वीर शिविरके प्रत्येक स्थानसे परिचित था, अतः धीरे-धीरे धृष्टद्युम्नके खेमेमें जा पहुँचा ।। ते तु कृत्वा महत्‌ कर्म श्रान्ताश्ष बलवद्‌ रणे

वह धीरे-धीरे और चुपचाप धृष्टद्युम्न के निवास-तंबू की ओर बढ़ा। शिविर की रचना और प्रत्येक स्थान से परिचित होने के कारण वह महाबाहु वीर क्रमशः आगे बढ़ता हुआ धृष्टद्युम्न के पंडाल तक जा पहुँचा।

Verse 12

अथ प्रविश्य तद्‌ वेश्म धृष्टद्युम्नस्थ भारत

फिर, हे भारत, धृष्टद्युम्न जहाँ ठहरा था, उस निवास में प्रवेश करके वह आगे बढ़ा।

Verse 13

पाज्चाल्यं शयने द्रौणिरपश्यत्‌ सुप्तमन्तिकात्‌ | क्षौीमावदाते महति स्पर्ध्यास्तरणसंवृते

द्रोणपुत्र ने पास ही पाँचालराजकुमार को शय्या पर सोते देखा—एक विशाल पलंग पर, उज्ज्वल श्वेत मलमल की प्रशंसनीय चादर बिछी हुई थी।

Verse 14

माल्यप्रवरसंयुक्ते धूपैश्नूर्णश्व वासिते । भरतनन्दन! धृष्टद्युम्नके उस डेरेमें प्रवेश करके द्रोणकुमारने देखा कि पांचालराजकुमार पास ही बहुमूल्य बिछौनोंसे युक्त तथा रेशमी चादरसे ढकी हुई एक विशाल शपय्यापर सो रहा है। वह शय्या श्रेष्ठ मालाओंसे सुसज्जित तथा धूप एवं चन्दन चूर्णसे सुवासित थी ।। १२-१३ ई || तं॑ शयानं महात्मानं विश्रब्धमकुतो भयम्‌

भरतनन्दन! धृष्टद्युम्न के डेरे में प्रवेश करके द्रोणकुमार ने देखा कि पाँचालराजकुमार पास ही बहुमूल्य बिछौनों से युक्त तथा रेशमी चादर से ढकी विशाल शय्या पर सो रहा है। वह शय्या श्रेष्ठ मालाओं से सुसज्जित तथा धूप और चन्दन-चूर्ण से सुवासित थी। वहाँ वह महात्मा निश्चिन्त, निर्भय होकर शयन कर रहा था।

Verse 15

सम्बुध्य चरणस्पर्शादुत्थाय रणदुर्मद:

पैरों के स्पर्श से चौंककर वह उठ बैठा—अब भी रण के उन्माद से उद्दीप्त।

Verse 16

तमुत्पतन्तं शयनाददश्व॒त्थामा महाबल:

संजय बोले—तब महाबली अश्वत्थामा ने उसे शय्या से सहसा उछलते हुए देखा।

Verse 17

सबल तेन निष्पिष्ट: साध्वसेन च भारत

संजय बोले—हे भारत! वह उस बलवान् द्वारा और साध्वसेन द्वारा भी कुचला गया।

Verse 18

तमाक्रम्य पदा राजन्‌ कण्ठे चोरसि चोभयो:

संजय बोले—हे राजन्! उसे पाँव से रौंदकर उसने उसके कण्ठ पर और दोनों ओर वक्षस्थल पर दबाव डाला।

Verse 19

तुदन्नखैस्तु स द्रौ्णिं नातिव्यक्तमुदाहरत्‌,उसने अपने नखोंसे द्रोणकुमारको बकोटते हुए अस्पष्ट वाणीमें कहा--“मनुष्योंमें श्रेष्ठ आचार्यपुत्र! अब देरी न करो। मुझे किसी शस्त्रसे मार डालो, जिससे तुम्हारे कारण मैं पुण्यलोकोंमें जा सकूँ”

संजय बोले—वह नखों से द्रोणकुमार को नोचते हुए अस्पष्ट वाणी में बोला—“मनुष्यों में श्रेष्ठ, आचार्यपुत्र! अब विलम्ब मत करो। किसी शस्त्र से मुझे मार डालो, जिससे तुम्हारे कारण मैं पुण्यलोकों को जा सकूँ।”

Verse 20

आचार्य पुत्र शस्त्रेण जहि मां मा चिरं कृथा: । त्वत्कृते सुकृताललोकान्‌ गच्छेयं द्विपदां वर,उसने अपने नखोंसे द्रोणकुमारको बकोटते हुए अस्पष्ट वाणीमें कहा--“मनुष्योंमें श्रेष्ठ आचार्यपुत्र! अब देरी न करो। मुझे किसी शस्त्रसे मार डालो, जिससे तुम्हारे कारण मैं पुण्यलोकोंमें जा सकूँ”

“आचार्यपुत्र! शस्त्र से मुझे मार डालो, देर मत करो। हे द्विपदों में श्रेष्ठ! तुम्हारे कारण मैं सुकृत से प्राप्त लोकों को जाऊँ।”

Verse 21

एवमुक्‍त्वा तु वचनं विरराम परंतप: । सुत: पाज्चालराजस्य आक्रान्तो बलिना भृूशम्‌,ऐसा कहकर बलवान शत्रुके द्वारा बड़े जोरसे दबाया हुआ शत्रुसंतापी पांचालराजकुमार धृष्टद्युम्न चुप हो गया

यह वचन कहकर शत्रुसंतापी पाञ्चालराजपुत्र धृष्टद्युम्न चुप हो गया; वह बलवान आक्रमणकारी द्वारा बड़े जोर से दबा दिया गया था।

Verse 22

तस्याव्यक्तां तु तां वाचं संभश्रुत्य द्रौणिरब्रवीत्‌ । आचार्यघातिनां लोका न सन्ति कुलपांसन

उसकी अस्पष्ट वाणी सुनकर द्रोणपुत्र बोला—“जो अपने आचार्य का वध करते हैं, उनके लिए कोई लोक नहीं। हे कुलकलंक!”

Verse 23

कच्चिदुन्मथ्य शिविरं हत्वा सोमकपाण्डवान्‌ | (कृता प्रतिज्ञा सफला कच्चित्‌ संजय सा निशि ।) कहीं नीच द्वार-रक्षकोंने उन्हें रोक तो नहीं दिया? किसीने उन्हें देखा तो नहीं? कहीं ऐसा तो नहीं हुआ कि वे दोनों महारथी इस कार्यको असहाु मानकर लौट गये हों? संजय! क्या उस शिविरको मथकर सोमकों और पाण्डवोंकी हत्या करके रातमें अश्वत्थामाने अपनी प्रतिज्ञा सफल कर ली?,एवं ब्रुवाणस्तं वीरं सिंहो मत्तमिव द्विपम्‌

धृतराष्ट्र ने पूछा—“संजय! क्या अश्वत्थामा ने रात में शिविर को मथकर सोमकों और पाण्डवों का वध करके अपनी प्रतिज्ञा सफल कर ली? कहीं नीच द्वार-रक्षकों ने उसे रोक तो नहीं दिया? किसी ने देख तो नहीं लिया? और वे दोनों महारथी इस कर्म को असह्य मानकर लौट तो नहीं गए?” ऐसा कहते हुए राजा उस वीर से वैसे ही आग्रह कर रहा था जैसे सिंह मतवाले हाथी से भिड़ता है।

Verse 24

मर्मस्वभ्यवधीत्‌ क्रुद्ध: पादाष्ठीलै: सुदारुणै: । उस वीरसे ऐसा कहते हुए क्रोधी अश्वत्थामाने मतवाले हाथीपर चोट करनेवाले सिंहके समान अपनी अत्यन्त भयंकर एड़ियोंसे उसके मर्मस्थानोंपर प्रहार किया ।। तस्य वीरस्य शब्देन मार्यमाणस्य वेश्मनि

क्रोध में भरकर अश्वत्थामा ने अपनी अत्यन्त कठोर और भयानक एड़ियों से उसके मर्मस्थानों पर प्रहार किया। उस वीर के घर के भीतर पिटते हुए जो चीत्कार उठे, उन्हीं शब्दों से सबको ज्ञात हो गया।

Verse 25

ते दृष्टवा धर्षयन्तं तमतिमानुषविक्रमम्‌

वे उसे देखते रहे—जो अतिमानुष पराक्रम के साथ धावा बोलकर सबको रौंदता चला जा रहा था।

Verse 26

त॑ तु तेनाभ्युपायेन गमयित्वा यमक्षयम्‌,रथेन शिबिरं प्रायाज्जिघांसुर्द्धिषतो बली | राजन! इस उपायसे धृष्टद्युम्मको यमलोक भेजकर तेजस्वी अश्वत्थामा उसके खेमेसे बाहर निकला और सुन्दर दिखायी देनेवाले अपने रथके पास आकर उसपर सवार हो गया। इसके बाद वह बलवान वीर अन्य शत्रुओंको मार डालनेकी इच्छा रखकर अपनी गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ रथके द्वारा प्रत्येक शिविरपर आक्रमण करने लगा

उस उपाय से धृष्टद्युम्न को यम के अक्षय लोक में भेजकर बलवान अश्वत्थामा, शत्रुओं का वध करने की इच्छा से, रथ द्वारा शिविर की ओर चला। राजन्, वह उसके डेरे से बाहर निकलकर अपने सुदर्शन रथ के पास आया और उस पर आरूढ़ हो गया। फिर वह पराक्रमी वीर गर्जना करके समस्त दिशाओं को गुँजाता हुआ, एक-एक करके प्रत्येक शिविर पर रथ से धावा बोलने लगा।

Verse 27

अध्यतिष्ठत तेजस्वी रथं प्राप्प सुदर्शनम्‌ स तस्य भवनादू राजन्‌ निष्क्रम्यानादयन्‌ दिश:

तेजस्वी वीर सुदर्शन रथ को पाकर उस पर आरूढ़ हुआ। फिर, राजन्, वह उस निवास से निकलकर दिशाओं की ओर प्रस्थान कर गया।

Verse 28

अफक्रान्ते ततस्तस्मिन्‌ द्रोणपुत्रे महारथे

तत्पश्चात जब द्रोणपुत्र वह महारथी वहाँ से हट गया,

Verse 29

राजानं निहतं दृष्टवा भूशं॑ शोकपरायणा:

राजा को मरा हुआ देखकर वे अत्यन्त शोक में डूब गए।

Verse 30

तासां तु तेन शब्देन समीपे क्षत्रियर्षभा:

परन्तु, हे क्षत्रियश्रेष्ठ, उस शब्द को सुनकर वे पास आ गए।

Verse 31

स्त्रियस्तु राजन्‌ वित्रस्ता भारद्वाजं निरीक्ष्य ता:,हत्वा पाज्चालराजानं रथमारुह्म तिष्ठति । राजन! वे सारी स्त्रियाँ अश्वत्थामाको देखकर बहुत डर गयी थीं; अतः दीन कण्ठसे बोलीं--'अरे! जल्दी दौड़ो! जल्दी दौड़ो! हमारी समझमें नहीं आता कि यह कोई राक्षस है या मनुष्य। देखो, यह पांचालराजकी हत्या करके रथपर चढ़कर खड़ा है”

संजय बोले—राजन्! भारद्वाजपुत्र अश्वत्थामा को देखकर सारी स्त्रियाँ अत्यन्त भयभीत हो उठीं और दीन कण्ठ से चिल्ला उठीं—“जल्दी भागो, जल्दी भागो! हमें नहीं समझ आता कि यह राक्षस है या मनुष्य। देखो—यह पाञ्चालराज को मारकर रथ पर चढ़कर खड़ा है।”

Verse 32

अब्लुवन्‌ दीनकण्ठेन क्षिप्रमाद्रवतेति वै । राक्षसो वा मनुष्यो वा नैनं जानीमहे वयम्‌

वे दीन कण्ठ से बोलीं—“यह तो बहुत तेजी से भागा जा रहा है। यह राक्षस है या मनुष्य—हम इसे नहीं जानतीं।”

Verse 33

ततस्ते योधमुख्याश्च॒ सहसा पर्यवारयन्‌

तब वे प्रधान योद्धा एकाएक आगे बढ़े और उसे चारों ओर से घेर लिया।

Verse 34

धृष्टद्युम्नं च हत्वा स तांश्वैवास्प पदानुगान्‌

धृष्टद्युम्न को मारकर उसने उसके पदचिह्नों पर चलने वाले उन अन्य लोगों को भी मार गिराया।

Verse 35

तमप्याक्रम्य पादेन कण्ठे चोरसि तेजसा

उसको भी उसने पाँव से रौंदकर—गले और छाती पर—अत्यन्त बलपूर्वक मार डाला।

Verse 36

तथैव मारयामास विनर्दन्तमरिंदमम्‌ | फिर तो शत्रुदमन उत्तमौजाके भी कण्ठ और छातीको बलपूर्वक पैरसे दबाकर उसने उसी प्रकार पशुकी तरह मार डाला। वह बेचारा भी चीखता-चिल्लाता रह गया था ।। ३५६ || युधामन्युश्न सम्प्राप्तो मत्वा तं रक्षसा हतम्‌

फिर उसने उसी निष्ठुर रीति से, चीखते-चिल्लाते शत्रुदमन वीर को भी मार डाला। तभी युधामन्यु वहाँ आ पहुँचा और उसे राक्षस-तुल्य आक्रमणकारी द्वारा मारा गया समझा।

Verse 37

तमभिद्रुत्य जग्राह क्षितौ चैनमपातयत्‌

उसकी ओर झपटकर वह उसे पकड़ लाया और उसे धरती पर पटक दिया।

Verse 38

तथा स वीरो हत्वा तं ततो<न्यान्‌ समुपाद्रवत्‌,राजेन्द्र! इस प्रकार युधामन्युका वध करके वीर अअश्वत्थामाने अन्य महारथियोंपर भी वहाँ सोते समय ही आक्रमण किया। वे सब भयसे काँपने और छटपटाने लगे। परंतु जैसे हिंसाप्रधान यज्ञमें वधके लिये नियुक्त हुआ पुरुष पशुओंको मार डालता है, उसी प्रकार उसने भी उन्हें मार डाला

इस प्रकार उसे मारकर वह वीर फिर अन्य लोगों पर टूट पड़ा। हे राजेन्द्र! युधामन्यु का वध करके अश्वत्थामा ने वहाँ सोए हुए अन्य महारथियों पर भी आक्रमण किया। वे भय से काँपते और छटपटाते रहे; पर जैसे हिंसाप्रधान यज्ञ में वध के लिए नियुक्त पुरुष पशुओं को मार डालता है, वैसे ही उसने उन्हें भी मार डाला।

Verse 39

संसुप्तानेव राजेन्द्र तत्र तत्र महारथान्‌ । स्फुरतो वेपमानांश्व शमितेव पशून्‌ मखे,राजेन्द्र! इस प्रकार युधामन्युका वध करके वीर अअश्वत्थामाने अन्य महारथियोंपर भी वहाँ सोते समय ही आक्रमण किया। वे सब भयसे काँपने और छटपटाने लगे। परंतु जैसे हिंसाप्रधान यज्ञमें वधके लिये नियुक्त हुआ पुरुष पशुओंको मार डालता है, उसी प्रकार उसने भी उन्हें मार डाला

हे राजेन्द्र! वहाँ-वहाँ वह सोए हुए महारथियों पर टूट पड़ा। वे भय से स्फुरित होते, काँपते रहे; पर उसने उन्हें वैसे ही मार डाला जैसे यज्ञ में पशुओं का वध करने वाला नियुक्त पुरुष उन्हें शान्त कर देता है।

Verse 40

ततो निस्त्रिंशभादाय जघानान्यान्‌ पृथक्‌ पृथक्‌ । भागशो विचरन्‌ मार्गानसियुद्धविशारद:,तदनन्तर तलवारसे युद्ध करनेमें कुशल अश्वत्थामाने हाथमें खड्ग लेकर प्रत्येक भागमें विभिन्न मार्गोंसे विचरते हुए वहाँ बारी-बारीसे अन्य वीरोंका भी वध कर डाला

तदनन्तर तलवार उठाकर, असियुद्ध में निपुण अश्वत्थामा मार्ग-मार्ग पर, भाग-भाग में विचरता हुआ, एक-एक करके अन्य वीरों का भी वध करने लगा।

Verse 41

तथैव गुल्मे सम्प्रेक्ष्य शयानान्‌ मध्यगौल्मिकान्‌ | भ्रान्तान्‌ व्यस्तायुधान्‌ सर्वान्‌ क्षणेनैव व्यपोथयत्‌,इसी प्रकार खेमेमें मध्य श्रेणीके रक्षक सैनिक भी थककर सो रहे थे। उनके अस्त्र-शस्त्र अस्त-व्यस्त होकर पड़े थे। उन सबको उस अवस्थामें देखकर अभ्र॒त्थामाने क्षणभरमें मार डाला

उसी प्रकार खेमे की मध्य-पंक्ति में तैनात रक्षक सैनिक भी थककर सो रहे थे; उनके अस्त्र-शस्त्र अस्त-व्यस्त पड़े थे। उनकी उस असहाय दशा को देखकर अश्वत्थामा ने क्षणभर में ही उन सबका संहार कर दिया।

Verse 42

योधानश्चान्‌ द्विपांश्वैव प्राच्छिनत्‌ स वरासिना । रुधिरोक्षितसर्वाड्र: कालसृष्ट इवान्तक:,उसने अपनी अच्छी तलवारसे योद्धाओं, घोड़ों और हाथियोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले। उसके सारे अंग खूनसे लथपथ हो रहे थे, वह कालप्रेरित यमराजके समान जान पड़ता था

उसने अपनी उत्तम तलवार से योद्धाओं को, घोड़ों को और हाथियों को भी काट-काटकर टुकड़े कर डाला। उसके समस्त अंग रक्त से भीगे थे; वह काल-प्रेरित यमराज के समान प्रतीत होता था।

Verse 43

विस्फुरद्धिश्व तैद्रोंणिर्निस्त्रिंशस्पोद्यमेन च । आक्षेपणेन चैवासेस्त्रिधा रक्तोक्षितो5भवत्‌,मारे जानेवाले योद्धाओंका हाथ-पैर हिलाना, उन्हें मारनेके लिये तलवारको उठाना तथा उसके द्वारा सब ओर प्रहार करना--इन तीन कारणोंसे द्रोणपुत्र अश्वत्थामा खूनसे नहा गया था

मारे जानेवाले योद्धाओं के हाथ-पैर का फड़कना, उन्हें मारने के लिए तलवार का उठना और उसी से चारों ओर प्रहार होना—इन तीन कारणों से द्रोणपुत्र अश्वत्थामा रक्त से नहा गया था।

Verse 44

तस्य लोहितरक्तस्य दीप्तखड्गस्य युध्यत: । अमानुष इवाकारो बभौ परमभीषण:,वह खूनसे रँग गया था। जूझते हुए उस वीरकी तलवार चमक रही थी। उस समय उसका आकार मानवेतर प्राणीके समान अत्यन्त भयंकर प्रतीत होता था

वह रक्त से रँगा हुआ था; युद्ध करते हुए उस वीर की तलवार दीप्तिमान हो रही थी। उस समय उसका रूप मानवेत्तर प्राणी के समान अत्यन्त भयानक प्रतीत होता था।

Verse 45

ये त्वजाग्रन्त कौरव्य तेडपि शब्देन मोहिता: । निरीक्ष्यमाणा अन्योन्यं दृष्टवा दृष्टवा प्रविव्यथु:,कुरुनन्दन! जो जाग रहे थे, वे भी उस कोलाहलसे किंकर्तव्यविमूढ हो गये थे। परस्पर देखे जाते हुए वे सभी सैनिक अश्वत्थामाको देख-देखकर व्यथित हो रहे थे

कुरुनन्दन! जो जाग रहे थे, वे भी उस कोलाहल से किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए थे। परस्पर एक-दूसरे को देखते हुए वे सब सैनिक अश्वत्थामा को बार-बार देखकर व्यथित और काँप उठते थे।

Verse 46

तद्‌ रूप॑ तस्य ते दृष्टवा क्षत्रिया: शत्रुकर्षिण: । राक्षसं मन्‍्यमानास्तं नयनानि न्यमीलयन्‌,वे शत्रुसूदन क्षत्रिय अश्वत्थामाका वह रूप देख उसे राक्षस समझकर आँखें मूँद लेते थे

संजय बोले—उसका वह रूप देखकर शत्रुओं को रौंदने वाले वे क्षत्रिय उसे राक्षस समझ बैठे। उस अमानुष दृश्य से भयभीत होकर उन्होंने अपनी आँखें मूँद लीं।

Verse 47

स घोररूपो व्यचरत्‌ कालवच्छिविरे ततः । अपश्यद्‌ द्रौपदीपुत्रानवशिष्टांश्व सोमकान्‌,वह भयानक रूपधारी द्रोणकुमार सारे शिविरमें कालके समान विचरने लगा। उसने द्रौपदीके पाँचों पुत्रों और मरनेसे बचे हुए सोमकोंको देखा

संजय बोले—फिर वह भयानक रूप धारण करके शिविर में काल के समान विचरने लगा। वहाँ उसने द्रौपदी के पुत्रों को और बचे हुए सोमकों को देखा।

Verse 48

तेन शब्देन वित्रस्ता धनुर्हस्ता महारथा: । धृष्टझुम्नं हत॑ श्रुत्वा द्रौपदेया विशाम्पते,प्रजानाथ! धृष्टद्युम्नको मारा गया सुनकर द्रौपदीके पाँचों महारथी पुत्र उस शब्दसे भयभीत हो हाथमें धनुष लिये आगे बढ़े

संजय बोले—उस शब्द से चौंककर द्रौपदी के महारथी पुत्र धनुष हाथ में लेकर खड़े हो गए। हे प्रजानाथ! धृष्टद्युम्न के मारे जाने का समाचार सुनकर वे भयाकुल होकर आगे बढ़े।

Verse 49

अवाकिरन्‌ शयव्रातैर्भारेद्वाजम भीतवत्‌ । ततस्तेन निनादेन सम्प्रबुद्धा: प्रभद्रका:

संजय बोले—वे निर्भय होकर भारद्वाज-पुत्र (अश्वत्थामा) पर बाणों की वर्षा करने लगे। फिर उस कोलाहलपूर्ण निनाद से प्रभद्रक जाग उठे।

Verse 50

भारद्वाज: स तान्‌ दृष्टवा शरवर्षाणि वर्षत:

संजय बोले—उनके द्वारा बरसाए जा रहे बाणों की वर्षा देखकर भारद्वाज-पुत्र क्रुद्ध हो उठा। परबल को मर्दन करने वाला वह स्वयं भी घोर बाणों की वर्षा करने लगा।

Verse 51

ततः परमसंक्रुद्धः पितुर्वधमनुस्मरन्‌

तब वह अत्यन्त क्रोध से भर उठा और अपने पिता-वध का स्मरण करता रहा; शोक और प्रतिशोध से उसका मन व्याकुल था, और उस अन्याय की स्मृति ने उसकी बुद्धि को आच्छादित कर दिया।

Verse 52

अवरुह्य रथोपस्थात्‌ त्वरमाणो<भिदुद्रुवे । सहस्रचन्द्रविमलं गृहीत्वा चर्म संयुगे

संजय बोले: वह रथ की बैठक से कूदकर उतर पड़ा और शीघ्रता से दौड़ पड़ा; और रण के घोर कोलाहल में उसने सहस्र चन्द्रमा-सा उज्ज्वल, निर्मल ढाल उठा ली।

Verse 53

खड्गं च विमलं दिव्यं जातरूपपरिष्कृतम्‌ । तदनन्तर पिताके वधका स्मरण करके वह अत्यन्त कुपित हो उठा और रथकी बैठकसे उतरकर सहसों चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त चमकीली ढाल और सुवर्णभूषित दिव्य एवं निर्मल खडग लेकर युद्धमें बड़ी उतावलीके साथ उनकी ओर दौड़ा ।। ५१-५२ ह ।। द्रौपदेयानभिद्रुत्य खड्गेन व्यधमद्‌ बली,उस बलवान वीरने द्रौपदीके पुत्रोंपर आक्रमण करके उन्हें खड़्गसे छिन्न-भिन्न कर दिया। राजन! उस समय पुरुषसिंह अश्वत्थामाने उस महासमरमें प्रतिविन्ध्यको उसकी कोखमें तलवार भोंककर मार डाला। वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा

संजय बोले: वह निर्मल, दिव्य, सुवर्ण-भूषित खड्ग लेकर—और पिता-वध का स्मरण कर क्रोध से भरकर—रथ की बैठक से उतर पड़ा। रणभूमि में उसने सहस्र चन्द्रमा-सी उज्ज्वल, चमकती ढाल भी उठा ली और बड़ी उतावली से उनकी ओर दौड़ पड़ा। द्रौपदी के पुत्रों पर धावा करके उस बलवान ने खड्ग से उन्हें छिन्न-भिन्न कर दिया। राजन्, उसी महासमर में पुरुषसिंह अश्वत्थामा ने प्रतिविन्ध्य की कोख में तलवार भोंककर उसे मार डाला; वह मारा जाकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

Verse 54

ततः स नरशार्दूल: प्रतिविन्धयं महाहवे । कुक्षिदेशेडवधीद्‌ राजन्‌ स हतो न्यपतद्‌ भुवि,उस बलवान वीरने द्रौपदीके पुत्रोंपर आक्रमण करके उन्हें खड़्गसे छिन्न-भिन्न कर दिया। राजन! उस समय पुरुषसिंह अश्वत्थामाने उस महासमरमें प्रतिविन्ध्यको उसकी कोखमें तलवार भोंककर मार डाला। वह मरकर पृथ्वीपर गिर पड़ा

संजय बोले: तब उस नरशार्दूल अश्वत्थामा ने महायुद्ध में प्रतिविन्ध्य को मार डाला। राजन्, उसने तलवार से उसकी कोख के प्रदेश में प्रहार किया; वह मारा जाकर पृथ्वी पर गिर पड़ा।

Verse 55

प्रासेन विद्ध॒वा द्रौ्णिं तु सुतसोमः प्रतापवान्‌ । पुनश्चासिं समुद्यम्य द्रोणपुत्रमुपाद्रवत्‌,तत्पश्चात्‌ प्रतापी सुतसोमने द्रोणकुमारकों पहले प्राससे घायल करके फिर तलवार उठाकर उसपर धावा किया

संजय बोले: प्रतापी सुतसोम ने प्रास से द्रौणि (अश्वत्थामा) को घायल किया; फिर तलवार उठाकर वह द्रोणपुत्र पर टूट पड़ा।

Verse 56

सुतसोमस्य सासिं त॑ बाहुं छित्त्वा नरर्षभ । पुनरप्याहनत्‌ पाश्वें स भिन्नहृदयो5पतत्‌,नरश्रेष्ठ तब अश्वत्थामाने तलवारसहित सुतसोमकी बाँह काटकर पुनः उसकी पसलीमें आघात किया। इससे उसकी छाती फट गयी और वह धराशायी हो गया

संजय बोले—हे नरश्रेष्ठ! अश्वत्थामा ने सुतसोम की तलवार सहित बाँह काट दी और फिर उसकी पसली में पुनः प्रहार किया। हृदय-प्रदेश फट जाने से सुतसोम धरती पर गिर पड़ा।

Verse 57

नाकुलिस्तु शतानीको रथचक्रेण वीर्यवान्‌ । दोर्भ्यामुत्क्षिप्प वेगेन वक्षस्येनमताडयत्‌,इसके बाद नकुलके पराक्रमी पुत्र शतानीकने अपनी दोनों भुजाओंसे रथचक्रको उठाकर उसके द्वारा बड़े वेगसे अश्वत्थामाकी छातीपर प्रहार किया

संजय बोले—तब नकुलपुत्र पराक्रमी शतानीक ने दोनों भुजाओं से रथचक्र उठाकर बड़े वेग से उससे अश्वत्थामा की छाती पर प्रहार किया।

Verse 58

अताडयच्छतानीकं मुक्तचक्रं द्विजस्तु सः । स विह्दलो ययौ भूमिं ततो5स्यापाहरच्छिर:,शतानीकने जब चक्र चला दिया, तब ब्राह्मण अश्वत्थामाने भी उसपर गहरा आघात किया। इससे व्याकुल होकर वह पृथ्वीपर गिर पड़ा। इतनेहीमें अश्वत्थामाने उसका सिर काट लिया

संजय बोले—जब शतानीक के हाथ से चक्र छूट गया, तब उस ब्राह्मण अश्वत्थामा ने उस पर घोर प्रहार किया। वह व्याकुल होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा; तभी अश्वत्थामा ने उसका सिर काट लिया।

Verse 59

श्रुतकर्मा तु परिघं गृहीत्वा समताडयत्‌ । अभिद्रुत्य ययौ द्रौर्णिं सव्ये सफलके भृशम्‌,अब श्रुतकर्मा परिघ लेकर अश्वत्थामाकी ओर दौड़ा। उसने उसके ढालयुक्त बायें हाथमें भारी चोट पहुँचायी

संजय बोले—तब श्रुतकर्मा परिघ लेकर दौड़ा और प्रहार करने लगा। द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पर झपटकर उसने ढालयुक्त उसके बाएँ हाथ पर भारी चोट की।

Verse 60

सतुतं श्रुतकर्माणमास्ये जघ्ने वरासिना | स हतो न्यपतद्‌ भूमौ विमूढो विकृतानन:,अश्वत्थामाने अपनी तेज तलवारसे श्रुतकर्मके मुखयर आघात किया। वह चोट खाकर बेहोश हो पृथ्वीपर गिर पड़ा। उस समय उसका मुख विकृत हो गया था

संजय बोले—अश्वत्थामा ने अपनी उत्तम तलवार से श्रुतकर्मा के मुख पर प्रहार किया। उस चोट से वह मूर्छित होकर पृथ्वी पर गिर पड़ा; उसका मुख विकृत हो गया।

Verse 61

तेन शब्देन वीरस्तु श्रुतकीर्ति्महारथ: । अश्वत्थामानमासाद्य शरवर्षरवाकिरत्‌,वह कोलाहल सुनकर वीर महारथी श्रुतकीर्ति अश्वत्थामाके पास आकर उसके ऊपर बाणोंकी वर्षा करने लगा

उस कोलाहलपूर्ण शब्द को सुनकर वीर महारथी श्रुतकीर्ति अश्वत्थामा के पास जा पहुँचा और गरजती हुई बाण-वृष्टि से उसे ढक दिया।

Verse 62

तस्यापि शरवर्षाणि चर्मणा प्रतिवार्य सः । सकुण्डलं शिर: कायाद्‌ भ्राजमानमुपाहरत्‌,उसकी बाण-वर्षाको ढालसे रोककर अअभश्वत्थामाने उसके कुण्डलमण्डित तेजस्वी मस्तकको धड़से अलग कर दिया

उसकी बाण-वृष्टि को भी ढाल से रोककर उसने कुण्डल-मण्डित, तेजस्वी मस्तक को धड़ से अलग कर उठा लिया।

Verse 63

ततो भीष्मनिहन्ता तं॑ सह सर्व: प्रभद्रकै: । अहनत्‌ सर्वतो वीरं नानाप्रहरणैर्बली

तब भीष्म-वधकर्ता (शिखण्डी) ने समस्त प्रभद्रकों सहित, अनेक प्रकार के शस्त्रों से उस वीर पर चारों ओर से प्रहार किया।

Verse 64

शिलीमुखेन चान्येन भ्रुवोर्मध्ये समार्पयत्‌ । तदनन्तर समस्त प्रभद्रकोंसहित बलवान्‌ भीष्महन्ता शिखण्डी नाना प्रकारके अस्त्रोंद्वारा अश्वत्थामापर सब ओरसे प्रहार करने लगा तथा एक दूसरे बाणसे उसने उसकी दोनों भौंहोंके बीचमें आधात किया ।। ६३ ई ।। स तु क्रोधसमाविष्टो द्रोणपुत्रो महाबल:

और एक अन्य शिलीमुख बाण से उसने उसकी दोनों भौंहों के बीच में प्रहार किया।

Verse 65

शिखण्डिनं समासाद्य द्विधा चिच्छेद सो5सिना । तब महाबली द्रोणपुत्रने क्रोधोके आवेशमें आकर शिखण्डीके पास जा अपनी तलवारसे उसके दो टुकड़े कर डाले ।। ६४ ई ।। शिखण्डिनं ततो हत्वा क्रोधाविष्ट: परंतप:,क्रोधसे भरे हुए शत्रुसंतापी अश्वत्थामाने इस प्रकार शिखण्डीका वध करके समस्त प्रभद्रकोंपर बड़े वेगसे धावा किया। साथ ही, राजा विराटकी जो सेना शेष थी, उसपर भी जोरसे चढ़ाई कर दी

शिखण्डी के पास पहुँचकर अश्वत्थामा ने उसे अपनी तलवार से दो टुकड़े कर दिया।

Verse 66

प्रभद्रकगणान्‌ सर्वानिभिदुद्राव वेगवान्‌ । यच्च शिष्टं विराटस्य बल॑ तु भृशमाद्रवत्‌,क्रोधसे भरे हुए शत्रुसंतापी अश्वत्थामाने इस प्रकार शिखण्डीका वध करके समस्त प्रभद्रकोंपर बड़े वेगसे धावा किया। साथ ही, राजा विराटकी जो सेना शेष थी, उसपर भी जोरसे चढ़ाई कर दी

क्रोध से भरे, शत्रुओं को संताप देने वाले अश्वत्थामा ने इस प्रकार शिखण्डी का वध करके समस्त प्रभद्रकों पर बड़े वेग से धावा किया। और राजा विराट की जो सेना शेष थी, उस पर भी वह अत्यन्त जोर से टूट पड़ा।

Verse 67

द्रुपदस्य च पुत्राणां पौत्राणां सुहदामपि । चकार कदनं घोरें दृष्टवा दृष्टवा महाबल:

महाबली ने बार-बार देखते हुए द्रुपद के पुत्रों, पौत्रों और उनके सुहृदों तक का भी भयंकर संहार कर डाला।

Verse 68

उस महाबली वीरने द्रुपदके पुत्रों, पौत्रों और सुहृदोंको ढूँढ़-दूँढ़कर उनका घोर संहार मचा दिया ।। अन्यानन्यांश्व॒ पुरुषानभिसृत्याभिसृत्य च । न्यकृन्तदसिना द्रौणिरसिमार्गविशारद:,तलवारके पैंतरोंमें कुशल द्रोणपुत्रने दूसरे-दूसरे पुरुषोंक भी निकट जाकर तलवारसे ही उनके टुकड़े-टुकड़े कर डाले

उस महाबली वीर ने द्रुपद के पुत्रों, पौत्रों और सुहृदों को ढूँढ़-ढूँढ़कर उनका घोर संहार मचा दिया। और तलवार के पैंतरों में कुशल द्रोणपुत्र, दूसरे- दूसरे पुरुषों के पास बार-बार जाकर, अपनी तलवार से उन्हें टुकड़े-टुकड़े कर डालता था।

Verse 69

कालीं रक्तास्यनयनां रक्तमाल्यानुलेपनाम्‌ | रक्ताम्बरधरामेकां पाशहस्तां कुटुम्बिनीम्‌,उस समय पाण्डवपक्षके योद्धाओंने मूर्तिमती कालरात्रिको देखा, जिसके शरीरका रंग काला था, मुख और नेत्र लाल थे। वह लाल फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये हुए थी। उसने लाल रंगकी ही साड़ी पहन रखी थी। वह अपने ढंगकी अकेली थी और हाथमें पाश लिये हुए थी। उसकी सखियोंका समुदाय भी उसके साथ था। वह गीत गाती हुई खड़ी थी और भयंकर पाशोंद्वारा मनुष्यों, घोड़ों एवं हाथियोंको बाँधकर लिये जाती थी

उस समय पाण्डवपक्ष के योद्धाओं ने मूर्तिमती कालरात्रि को देखा—जिसका रंग काला था, पर मुख और नेत्र रक्तवर्ण थे। वह लाल फूलों की माला पहने, लाल चन्दन का लेप किये और लाल वस्त्र धारण किये थी। वह अपने ढंग की अकेली, हाथ में पाश लिये, अपनी सखियों के समुदाय से घिरी हुई थी। वह गीत गाती खड़ी थी और भयंकर पाशों से मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों को बाँधकर लिये जाती थी।

Verse 70

ददृशु: कालरात्रिं ते गायमानामवस्थिताम्‌ । नराश्वकुण्जरान्‌ पाशैर्बद्धवा घोरै: प्रतस्थुषीम्‌,उस समय पाण्डवपक्षके योद्धाओंने मूर्तिमती कालरात्रिको देखा, जिसके शरीरका रंग काला था, मुख और नेत्र लाल थे। वह लाल फूलोंकी माला पहने और लाल चन्दन लगाये हुए थी। उसने लाल रंगकी ही साड़ी पहन रखी थी। वह अपने ढंगकी अकेली थी और हाथमें पाश लिये हुए थी। उसकी सखियोंका समुदाय भी उसके साथ था। वह गीत गाती हुई खड़ी थी और भयंकर पाशोंद्वारा मनुष्यों, घोड़ों एवं हाथियोंको बाँधकर लिये जाती थी

उन्होंने कालरात्रि को देखा—वह गीत गाती हुई वहीं खड़ी थी; और भयंकर पाशों से मनुष्यों, घोड़ों तथा हाथियों को बाँधकर उन्हें लिये चली जा रही थी।

Verse 71

वहन्तीं विविधान्‌ प्रेतान्‌ पाशबद्धान्‌ विमूर्धजान्‌ | तथैव च सदा राजन्‌ न्यस्तशस्त्रान्‌ महारथान्‌,माननीय नरेश! मुख्य-मुख्य योद्धा अन्य रात्रियोंमें भी सपनेमें उस कालरात्रिको देखते थे। राजन! वह सदा नाना प्रकारके केशरहित प्रेतोंको अपने पाशोंमें बाँधकर लिये जाती दिखायी देती थी, इसी प्रकार हथियार डालकर सोये हुए महारथियोंको भी लिये जाती हुई स्वप्नमें दृष्टिगोचर होती थी। वे योद्धा सबका संहार करते हुए द्रोणकुमारको भी सदा सपनोंमें देखा करते थे

संजय बोले—राजन्! वह (कालरात्रि) स्वप्न में नाना प्रकार के प्रेतों को, जिनके सिर मुँडे थे और जो उसके पाशों में जकड़े थे, घसीटती हुई दिखाई देती थी। और हे राजन्! वह सदा उन महारथियों को भी ले जाती हुई दिखती थी, जिन्होंने शस्त्र रख दिए थे।

Verse 72

स्वप्ले सुप्तान्नयन्तीं तां रात्रिष्वन्यासु मारिष | ददृशुर्यो धमुख्यास्ते घ्नन्तं द्रौणिं च सर्वदा,माननीय नरेश! मुख्य-मुख्य योद्धा अन्य रात्रियोंमें भी सपनेमें उस कालरात्रिको देखते थे। राजन! वह सदा नाना प्रकारके केशरहित प्रेतोंको अपने पाशोंमें बाँधकर लिये जाती दिखायी देती थी, इसी प्रकार हथियार डालकर सोये हुए महारथियोंको भी लिये जाती हुई स्वप्नमें दृष्टिगोचर होती थी। वे योद्धा सबका संहार करते हुए द्रोणकुमारको भी सदा सपनोंमें देखा करते थे

हे मान्यवर! अन्य रात्रियों में भी वे अग्रणी योद्धा स्वप्न में उस कालरात्रि को सोए हुए मनुष्यों को ले जाती हुई देखते थे। वह सदा नाना प्रकार के मुंडे सिर वाले प्रेतों को पाशों में बाँधकर घसीटती हुई दिखती थी; और वैसे ही शस्त्र रखकर सोए हुए महारथियों को भी ले जाती हुई दिखाई देती थी। वे बार-बार स्वप्न में द्रोणपुत्र को भी संहार करते हुए देखते थे।

Verse 73

यतः प्रभृति संग्राम: कुरुपाण्डवसेनयो: । ततः प्रभृति तां कन्यामपश्यन्‌ द्रौणिमेव च

संजय बोले—जिस समय से कौरव और पाण्डव सेनाओं का संग्राम आरम्भ हुआ, उसी समय से न तो उस कन्या (कालरात्रि) को देखा गया और न ही द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) को।

Verse 74

तांस्तु दैवहतान्‌ पूर्व पश्चाद्‌ द्रौणिव्यपातयत्‌ । त्रासयन्‌ सर्वभूतानि विनदन्‌ भैरवान्‌ रवान्‌

संजय बोले—वे पुरुष पहले ही दैव से आहत थे; फिर द्रोणपुत्र ने उन्हें भी ढा दिया। वह आगे-पीछे विचरता हुआ, भयानक गर्जनाएँ करता, समस्त प्राणियों को त्रस्त कर रहा था।

Verse 75

जबसे कौरव-पाण्डव सेनाओंका संग्राम आरम्भ हुआ था, तभीसे वे योद्धा कन्यारूपिणी कालरात्रिको और कालरूपधारी अभश्व॒त्थामाको भी देखा करते थे। पहलेसे ही दैवके मारे हुए उन वीरोंका द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पीछे वध किया था। वह अभश्वत्थामा भयानक स्वरसे गर्जना करके समस्त प्राणियोंको भयभीत कर रहा था ।। तदनुस्मृत्य ते वीरा दर्शन पूर्वकालिकम्‌ । इदं तदित्यमन्यन्त दैवेनोपनिपीडिता:,वे दैवपीडित वीरगण पूर्वकालके देखे हुए सपनेको याद करके ऐसा मानने लगे कि “यह वही स्वप्न इस रूपमें सत्य हो रहा है!

दैव से पीड़ित वे वीर पूर्वकाल में देखे हुए उस दर्शन को स्मरण करके मानने लगे—“यह वही है; वही स्वप्न अब इसी रूप में सत्य हो रहा है।”

Verse 76

ततस्तेन निनादेन प्रत्यबुद्धयन्त धन्विन: । शिबिरे पाण्डवेयानां शतशो5थ सहस्रश:

तब उस कोलाहल से चौंककर पाण्डवों के शिविर में धनुर्धर योद्धा सैकड़ों और हजारों की संख्या में जाग उठे।

Verse 77

तदनन्तर अश्व॒त्थामाके उस सिंहनादसे पाण्डवोंके शिविरमें सैकड़ों और हजारों धनुर्धर वीर जाग उठे ।। सो<च्छिनत्‌ कस्यचित्‌ पादौ जघनं चैव कस्यचित्‌ । कांश्चिद्‌ बिभेद पाश्वेषु कालसृष्ट इवान्तक:,उस समय कालप्रेरित यमराजके समान उसने किसीके पैर काट लिये, किसीकी कमर टूक-टूक कर दी और किन्हींकी पसलियोंमें तलवार भोंककर उन्हें चीर डाला

इसके बाद द्रोणपुत्र अश्वत्थामा, मानो काल-प्रेरित यमराज हो, पाण्डवों के शिविर में सोए हुए वीरों पर टूट पड़ा—किसी के पैर काट डाले, किसी की कमर चूर-चूर कर दी, और किसी की पसलियों में शस्त्र भोंककर उन्हें चीर डाला।

Verse 78

अत्युग्रप्रतिपिशैश्व नदद्धिश्व भूशोत्कटै: । गजाश्रमथितैश्रान्यैर्मही कीणाभवत्‌ प्रभो,वे सब-के-सब भयानक रूपसे कुचल दिये गये थे, अतः उन्मत्त-से होकर जोर-जोरसे चीखते और चिल्लाते थे। इसी प्रकार छूटे हुए घोड़ों और हाथियोंने भी अन्य बहुत-से योद्धाओंको कुचल दिया था। प्रभो! उन सबकी लाशोंसे धरती पट गयी थी

हे प्रभो! वे सब भयानक रूप से कुचले गए थे, इसलिए उन्मत्त-से होकर जोर-जोर से चीखते-चिल्लाते थे। इसी प्रकार छूटे हुए घोड़ों और हाथियों ने भी बहुत-से अन्य योद्धाओं को कुचल दिया। उन सबकी लाशों से धरती पट गई थी।

Verse 79

क्रोशतां किमिदं को5यं क: शब्द: कि नु कि कृतम्‌ । एवं तेषां तथा द्रौणिरन्तक: समपद्यत,घायल वीर चिल्ला-चिल्लाकर कहते थे कि “यह क्या है? यह कौन है? यह कैसा कोलाहल हो रहा है? यह क्या कर डाला?' इस प्रकार चीखते हुए उन सब योद्धाओंके लिये द्रोणकुमार अश्वत्थामा काल बन गया था

घायल वीर चिल्ला-चिल्लाकर कहते थे—“यह क्या है? यह कौन है? यह कैसा शब्द है? यह क्या कर डाला?” इस प्रकार क्रंदन करते हुए उन सब योद्धाओं के लिए द्रोणकुमार अश्वत्थामा मृत्यु बन गया।

Verse 80

अपेतशस्त्रसन्नाहान्‌ सन्नद्धान्‌ पाण्डुसूंजयान्‌ । प्राहिणोन्मृत्युलोकाय द्रौणि: प्रहरतां वर:,पाण्डवों और सूंजयोंमेंसे जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र और कवच उतार दिये थे तथा जिन लोगोंने पुन: कवच बाँध लिये थे, उन सबको प्रहार करनेवाले योद्धाओंमें श्रेष्ठ द्रोणपुत्रने मृत्युके लोकमें भेज दिया

पाण्डवों और सृंजयों में से जिन्होंने अस्त्र-शस्त्र और कवच उतार दिए थे तथा जिन्होंने फिर से कवच बाँध लिया था—उन सबको प्रहार करने वालों में श्रेष्ठ द्रोणपुत्र ने मृत्यु-लोक में भेज दिया।

Verse 81

जो लोग नींदके कारण अंधे और अचेत-से हो रहे थे, वे उसके शब्दसे चौंककर उछल पड़े; किंतु पुन: भयसे व्याकुल हो जहाँ-तहाँ छिप गये

संजय बोले— जो लोग नींद के कारण मूढ़, मानो अंधे और अचेत हो रहे थे, वे उस शब्द से चौंककर उछल पड़े; पर फिर भय से व्याकुल होकर इधर-उधर भागे और जहाँ-तहाँ छिप गए।

Verse 82

ऊरुस्तम्भगृहीताश्व कश्मलाभिहतौजस: । विनदन्तो भुशं त्रस्ता: समासीदन्‌ परस्परम्‌,उनकी जाँघें अकड़ गयी थीं। मोहवश उनका बल और उत्साह मारा गया था। वे भयभीत हो जोर-जोरसे चीखते हुए एक-दूसरेसे लिपट जाते थे

संजय बोले— उनकी जाँघें अकड़ गई थीं, मानो ऐंठन ने जकड़ लिया हो, और उनके घोड़े भी जैसे थम गए थे; मोह ने उनका बल और उत्साह नष्ट कर दिया था। वे अत्यन्त भयभीत होकर जोर-जोर से चिल्लाते और एक-दूसरे से लिपट जाते थे।

Verse 83

तथा भवदश्यां कार्य स्यादिति मे निश्चिता मति: । “मैं तो इस शिविरके भीतर घुस जाऊँगा और वहाँ कालके समान विचरूँगा। आपलोग ऐसा करें जिससे कोई भी मनुष्य आप दोनोंके हाथसे जीवित न बच सके, यही मेरा दृढ़ विचार है”,ततो रथं पुनद्रौणिरास्थितो भीमनि:स्वनम्‌ | धनुष्पाणि: शरैरन्यान्‌ प्रैषयद्‌ वै यमक्षयम्‌

संजय बोले— “मेरा निश्चय दृढ़ है कि यह कार्य इसी प्रकार होना चाहिए। मैं इस शिविर के भीतर घुसकर वहाँ काल के समान विचरूँगा; तुम दोनों ऐसा करो कि तुम्हारे हाथ से कोई भी मनुष्य जीवित न बच सके— यही मेरा दृढ़ विचार है।” यह कहकर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा फिर भयंकर गर्जना करने वाले रथ पर चढ़ा; धनुष हाथ में लेकर उसने बाणों से अन्य योद्धाओं को यमलोक भेजना आरम्भ किया।

Verse 84

इसके बाद द्रोणकुमार अश्वत्थामा पुनः: भयानक शब्द करनेवाले अपने रथपर सवार हुआ और हाथमें धनुष ले बाणोंद्वारा दूसरे योद्धाओंको यमलोक भेजने लगा ।। पुनरुत्पततश्चापि दूरादपि नरोत्तमान्‌ | शूरान्‌ सम्पततश्वान्यान्‌ कालरात््यै न्‍न्यवेदयत्‌

संजय बोले— इसके बाद द्रोणकुमार अश्वत्थामा फिर भयानक शब्द करने वाले अपने रथ पर सवार हुआ; धनुष हाथ में लेकर वह बाणों द्वारा दूसरे योद्धाओं को यमलोक भेजने लगा। फिर वह उछलकर, दूर से भी प्रहार करके, अन्य दिशाओं से दौड़ते हुए आने वाले नरश्रेष्ठ शूरों को कालरात्रि के हवाले कर देता था।

Verse 85

अश्वत्थामा पुन: उछलने और अपने ऊपर आक्रमण करनेवाले दूसरे-दूसरे नरश्रेष्ठ शूरवीरोंको दूरसे भी मारकर कालरात्रिके हवाले कर देता था ।। तथैव स्यन्दनाग्रेण प्रमथन्‌ स विधावति । शरवर्षैश्ष॒ विविधैरवर्षच्छात्रवांस्तत:,वह अपने रथके अग्रभागसे शत्रुओंको कुचलता हुआ सब ओर दौड़ लगाता और नाना प्रकारके बाणोंकी वर्षासे शत्रुसैनिकोंको घायल करता था

संजय बोले— अश्वत्थामा बार-बार उछलकर, उस पर आक्रमण करने को दौड़ते हुए नरश्रेष्ठ शूरवीरों को दूर से ही मारकर कालरात्रि के हवाले कर देता था। उसी प्रकार वह रथ के अग्रभाग से शत्रुओं को कुचलता हुआ सब ओर दौड़ता और नाना प्रकार के बाणों की वर्षा से शत्रु-सैनिकों को घायल कर गिरा देता था।

Verse 86

पुनश्न सुविचित्रेण शतचन्द्रेण चर्मणा । तेन चाकाशवर्णेन तथाचरत सो5डसिना,फिर वह सौ चन्द्राकार चिह्नोंसे युक्त विचित्र ढाल और आकाशके रंगवाली चमचमाती तलवार लेकर सब ओर विचरने लगा

फिर वह सौ चन्द्र-चिह्नों से युक्त विचित्र ढाल और आकाश-रंग की चमचमाती तलवार धारण कर चारों ओर विचरने लगा।

Verse 87

तथा च शिबिरं तेषां द्रौणिराहवदुर्मद: । व्यक्षो भयत राजेन्द्र महाह्नदमिव द्विप:,राजेन्द्र! रणदुर्मद द्रोणकुमारने उन शत्रुओंके शिविरको उसी प्रकार मथ डाला, जैसे कोई गजराज किसी विशाल सरोवरको विक्षुब्ध कर डालता है

राजेन्द्र! रणोन्मत्त द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने उन शत्रुओं के शिविर को उसी प्रकार मथ डाला, जैसे कोई गजराज किसी विशाल सरोवर को विक्षुब्ध कर देता है।

Verse 88

उत्पेतुस्तेन शब्देन योधा राजन्‌ विचेतस: । निद्रार्ताश्ष भयात॑'॒क्ष व्यधावन्त ततस्तत:,राजन्‌! उस मार-काटके कोलाहलसे निद्रामें अचेत पड़े हुए योद्धा चौंककर उछल पड़ते और भयसे व्याकुल हो इधर-उधर भागने लगते थे

राजन्! उस कोलाहल से निद्रा में अचेत पड़े योद्धा चौंककर उछल पड़े; भय से व्याकुल होकर वे इधर-उधर दौड़ने लगे।

Verse 89

विस्वरं चुक्रुशुश्वान्ये बह्दबद्धं तथा वदन्‌ | न च स्म प्रत्यपद्यन्त शस्त्राणि वसनानि च,कितने ही योद्धा गला फाड़-फाड़कर चिल्लाते और बहुत-सी ऊटपटाँग बातें बकने लगते थे। वे अपने अस्त्र-शस्त्र तथा वस्त्रोंको भी नहीं ढूँढ़ पाते थे

और कितने ही लोग बेसुरे स्वर में चिल्लाते, बहुत-सी ऊटपटाँग बातें बकते थे; वे अपने शस्त्र और वस्त्र तक नहीं पा रहे थे।

Verse 90

विमुक्तकेशाश्षाप्यन्ये नाभ्यजानन्‌ परस्परम्‌ । उत्पतन्तो5पतन_ श्रान्ता: केचित्‌ तत्रा भ्रमंस्‍तदा,दूसरे बहुत-से योद्धा बाल बिखेरे हुए भागते थे। उस दशामें वे एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। कोई उछलते हुए भागते और थककर गिर जाते थे तथा कोई उसी स्थानपर चक्कर काटते रहते थे

और बहुत-से लोग केश बिखेरे हुए भागते थे; उस दशा में वे एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते थे। कोई उछल-उछलकर भागता और थककर गिर पड़ता, तो कोई वहीं चक्कर काटता भटकता रहता था।

Verse 91

पुरीषमसृजन्‌ केचित्‌ केचिन्मूत्रं प्रसुख्ुवुः । बन्धनानि च राजेन्द्र संच्छिद्य तुरगा द्विपा:

संजय बोले—कुछ लोग भय से मल त्यागने लगे और कुछ मूत्र छोड़ बैठे। और हे राजेन्द्र! घोड़े और हाथी अपने बंधन तोड़कर छूट पड़े।

Verse 92

तत्र केचिन्नरा भीता व्यलीयन्त महीतले,तथैव तान्‌ निपतितानपिंषन्‌ गजवाजिन: । कितने ही योद्धा भयभीत हो पृथ्वीपर छिपे पड़े थे। उन्हें उसी अवस्थामें भागते हुए घोड़ों और हाथियोंने अपने पैरोंसे कुचल दिया

संजय बोले—वहाँ कुछ मनुष्य भयभीत होकर भूमि पर दुबक गए। और जो उसी प्रकार गिर पड़े थे, उन्हें भागते हुए हाथियों और घोड़ों ने पैरों से कुचल डाला।

Verse 93

।। तस्मिंस्तथा वर्तमाने रक्षांसि पुरुषर्षभ

संजय बोले—जब सब कुछ उसी प्रकार चल रहा था, हे पुरुषर्षभ! तब राक्षस सक्रिय हो उठे।

Verse 94

हृष्टानि व्यनदन्नुच्चैर्मुदा भरतसत्तम । पुरुषप्रवर! भरतश्रेष्ठ! इस प्रकार जब वह मार-काट मची हुई थी, उस समय हर्षमें भरे हुए राक्षस बड़े जोर-जोरसे गर्जना करते थे ।। ९३ $ ।। स शब्द: पूरितो राजन्‌ भूतसंघैर्मुदायुतै:

संजय बोले—हे भरतश्रेष्ठ! उस मार-काट के बीच हर्ष से भरे हुए वे ऊँचे स्वर में गर्जना करने लगे। हे राजन्! आनंदित भूत-समूहों से वह प्रदेश उस शब्द से भर गया।

Verse 95

तेषामार्तरवं श्रुत्वा वित्रस्ता गजवाजिन:

संजय बोले—उनकी आर्त-ध्वनि सुनकर हाथी और घोड़े भय से व्याकुल हो उठे।

Verse 96

अद्वारेणाभ्यवस्कन्द्र विहाय भयमात्मन: । ऐसा कहकर द्रोणकुमार पाण्डवोंके विशाल शिविरमें बिना दरवाजेके ही कूदकर घुस गया। उसने अपने जीवनका भय छोड़ दिया था,मुक्ता: पर्यपतन्‌ राजन्‌ मृद्नन्त: शिबिरे जनम्‌ | राजन! मारे जानेवाले योद्धाओंका आर्तनाद सुनकर हाथी और घोड़े भयसे थर्रा उठे और बन्धनमुक्त हो शिविरमें रहनेवाले लोगोंको रौंदते हुए चारों ओर दौड़ लगाने लगे ।। ९५ “| तैस्तत्र परिधावद्धिश्चवरणोदीरितं रज:

संजय बोले—द्वाररहित स्थान से कूदकर, अपने प्राणों का भय त्यागकर द्रोणपुत्र पाण्डवों के विशाल शिविर में घुस गया। फिर, राजन्, मारे जाते योद्धाओं की करुण चीत्कार सुनकर हाथी और घोड़े भयभीत हो बन्धन तोड़कर शिविर के लोगों को रौंदते हुए चारों ओर उन्मत्त-से दौड़ पड़े।

Verse 97

तस्मिंस्तमसि संजाते प्रमूढा: सर्वतो जना:

संजय बोले—जब वह घोर अन्धकार छा गया, तब चारों ओर के लोग मोहित-से, किंकर्तव्यविमूढ़ हो गए।

Verse 98

गजा गजानतिक्रम्य निर्मनुष्या हया हयान्‌

संजय बोले—हाथी हाथियों को लाँघते चले गए और घोड़े घोड़ों को पछाड़ते हुए दौड़ पड़े; मानो वह दृश्य मनुष्यों से रिक्त हो गया हो।

Verse 99

ते भग्ना: प्रपतन्ति सम निध्नन्तश्न॒ परस्परम्‌

संजय बोले—वे भग्न होकर गिरते-पड़ते, उस कोलाहल में एक-दूसरे को ही कुचलते और मारते चले गए।

Verse 100

विचेतस: सनिद्राश्न तमसा चावृता नरा:

संजय बोले—मनुष्य चेतनाहीन-से थे; उनींदे थे और अन्धकार से घिरे हुए थे।

Verse 101

जग्मुः स्वानेव तत्राथ कालेनैव प्रचोदिता: । कितने ही मनुष्य निद्रामें अचेत पड़े थे और घोर अन्धकारसे घिर गये थे। वे सहसा उठकर कालसे प्रेरित हो आत्मीय जनोंका ही वध करने लगे || १०० $ ।। त्यक्त्वा द्वाराणि च द्वा:स्थास्तथा गुल्मानि गौल्मिका:

तब काल से प्रेरित होकर वे अपने-अपने स्थानों की ओर दौड़ पड़े। द्वार, द्वारपाल, चौकियाँ और उनके रक्षक—सबको छोड़कर आक्रमणकारी आगे बढ़े; रात्रि-आक्रमण के उस घोर कोलाहल में रक्षा की सारी मर्यादाएँ टूट गईं और हिंसा विवेकहीन होकर फैलने लगी।

Verse 102

विप्रणष्टाश्ष॒ तेडन्योन्यं नाजानन्त तथा विभो

हे महाबाहो, वे लोग घोर भ्रम में पड़कर एक-दूसरे को पहचान नहीं पा रहे थे।

Verse 103

पलायतां दिशस्तेषां स्वानप्युत्सृज्य बान्धवान्‌

वे सब दिशाओं में भागते हुए अपने ही लोगों और बन्धु-बान्धवों को भी छोड़ गए।

Verse 104

गोत्रनामभिरन्योन्यमाक्रन्दन्त ततो जना: । हाहाकारं च कुर्वाणा: पृथिव्यां शेरते परे

तब लोग एक-दूसरे को गोत्र और कुल-नाम लेकर पुकारने लगे। और “हाय! हाय!” का हाहाकार करते हुए कितने ही अन्य लोग पृथ्वी पर पड़े रह गए।

Verse 105

अपने सगे सम्बन्धियोंको भी छोड़कर सम्पूर्ण दिशाओंमें भागते हुए योद्धाओंके नाम और गोत्रको पुकार-पुकारकर लोग परस्पर बुला रहे थे। कितने ही मनुष्य हाहाकार करते हुए धरतीपर पड़ गये थे ।। तान्‌ बुद्धवा रणमत्तो5सौ द्रोणपुत्रो व्यपोथयत्‌ | तत्रापरे वध्यमाना मुहुर्मुहुरचेतस:

यह देखकर रणोन्मत्त द्रोणपुत्र ने उन्हें काट गिराया। वहाँ अन्य लोग भी, वध किए जाते हुए, बार-बार अचेत हो जाते थे—भय और भ्रम से विवेक नष्ट हो गया था।

Verse 106

तांस्तु निष्पतितांस्त्रस्तानू शिबिराज्जीवितैषिण:

संजय बोले—जो लोग प्राण बचाने की चाह में शिविर से घबराकर बाहर निकल पड़े थे, वे काँपते हुए, भय से व्याकुल होकर आतंक में भाग चले।

Verse 107

विस्नस्तयन्त्रकवचान्‌ मुक्तकेशान्‌ कृताञज्जलीन्‌

संजय बोले—वे अस्त्र‑शस्त्र और कवच ढीले‑बिखरे हुए, केश खुले हुए, और हाथ जोड़कर दीन भाव से याचना करते हुए दिखाई देते थे।

Verse 108

वेपमानान्‌ क्षितौ भीतान्‌ नैव कांश्रचिदमुज्चताम्‌ । नामुच्यत तयो: वक्षिन्निष्क्रान्त: शिबिराद्‌ बहि:

संजय बोले—वे धरती पर पड़े काँपते‑डरते थे; पर उन दोनों ने किसी को भी छोड़ना स्वीकार न किया। शिविर से बाहर निकलकर भी उन दोनों के हाथों से कोई न बच सका; वे संहार करते रहे, एक भी जीवित न छोड़ा।

Verse 109

उनके यन्त्र और कवच गिर गये थे। वे बाल खोले, हाथ जोड़े, भयभीत हो थरथर काँपते हुए पृथ्वीपर खड़े थे, किंतु उन दोनोंने उनमेंसे किसीको भी जीवित नहीं छोड़ा। शिविरसे निकला हुआ कोई भी क्षत्रिय उन दोनोंके हाथसे जीवित नहीं छूट सका ।। कृपश्चैव महाराज हार्दिक्यश्चैव दुर्मति: । भूयश्वैव चिकीर्षन्तौ द्रोणपुत्रस्य तौ प्रियम्‌

संजय बोले—उनके यन्त्र और कवच गिर पड़े थे; वे बाल खोले, हाथ जोड़े, भयभीत होकर थरथर काँपते हुए पृथ्वी पर खड़े थे। फिर भी उन दोनों ने किसी को जीवित न छोड़ा; शिविर से निकला कोई भी क्षत्रिय उन दोनों के हाथों से बचकर न निकल सका। हे महाराज, कृप और दुर्बुद्धि हार्दिक्य कृतवर्मा—वे दोनों फिर द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को प्रसन्न करने का निश्चय करने लगे।

Verse 110

त्रिषु देशेषु ददतु: शिविरस्थ हुताशनम्‌ । महाराज! कृपाचार्य तथा दुर्बुद्धि कृतवर्मा दोनों ही द्रोणपुत्र अश्वत्थामाका अधिक-से- अधिक प्रिय करना चाहते थे; अतः उन्होंने उस शिविरमें तीन ओरसे आग लगा दी ।। १०९ न ! ततः प्रकाशे शिबिरे खड़्गेन पितृनन्दन:

संजय बोले—हे महाराज, द्रोणपुत्र अश्वत्थामा को अत्यन्त प्रसन्न करने की इच्छा से आचार्य कृप और दुर्बुद्धि कृतवर्मा—इन दोनों ने शिविर में तीन ओर से आग लगा दी। फिर उस ज्वाला से प्रकाशित शिविर में, पिता को आनन्द देने वाला पुत्र खड्ग लेकर आगे बढ़ा।

Verse 111

कांश्रिदापततो वीरानपरांश्ैव धावत:

Sañjaya said: Some warriors were seen rushing forward to attack, while others were fleeing in panic—revealing how, in the chaos of night-war, courage and fear arise side by side and moral order collapses into confusion.

Verse 112

कांश्चिद्‌ योधान्‌ स खड्गेन मध्ये संछिद्य वीर्यवान्‌

Sañjaya said: The mighty warrior, cutting down some of the fighters with his sword in the midst of the fray, continued his ruthless work—an image of night-battle violence where valor is severed from restraint and the ethical order of war is eclipsed by slaughter.

Verse 113

प्रसुप्ताश्नैव विश्वस्ता: स्वसैन्यपरिवारिता: । वहाँ वे पांचाल वीर रणभूमिमें महान्‌ पराक्रम करके बहुत थक गये थे और अपने सैनिकोंसे घिरे हुए निश्चिन्त सो रहे थे,निनदद्धिर्भशायस्तैर्नराश्वद्विरदोत्तमै:

Sañjaya said: The Pāñcāla warriors, having grown weary after displaying great valor on the battlefield, lay asleep in trust and unguarded confidence, surrounded by their own troops. Around them the finest of men, horses, and elephants lay down, their presence filling the camp with the low, rumbling sounds of rest—an ominous calm in the midst of war, where vigilance is itself a form of dharma.

Verse 114

पतितैरभवत्‌ कीर्णा मेदिनी भरतर्षभ । भरतश्रेष्ठ! अत्यन्त घायल हो पृथ्वीपर गिरकर चिल्लाते हुए मनुष्यों, घोड़ों और बड़े- बड़े हाथियोंसे वहाँकी भूमि ढँक गयी थी ।। ११३ $ ।। मानुषाणां सहस्नरेषु हतेषु पतितेषु च

Sañjaya said: When thousands of men had been slain and had fallen, the earth was strewn with bodies—an image of war’s moral collapse, where the cost of adharma is measured not in victory but in the suffering and ruin spread across the battlefield.

Verse 115

सायुधान्‌ साज्रदान्‌ बाहून्‌ विचकर्त शिरांसि च

Sañjaya said: He hewed off arms that still held weapons, and he also severed heads—an image of ruthless slaughter that underscores how, in the darkness of the Sauptika episode, warfare slips into indiscriminate violence and the collapse of restraint.

Verse 116

पृष्ठच्छिन्नान्‌ पार्श्वच्छिन्नान्‌ शिरश्छिन्नांस्तथा परान्‌

संजय बोले—किसी को पीछे से काट डाला गया, किसी को बगल से चीर दिया गया, और कितनों के तो सिर भी धड़ से अलग कर दिए गए।

Verse 117

मध्यदेशे नरानन्यांश्रिच्छेदान्यांक्ष कर्णत:

संजय बोले—मध्य भाग में उसने कुछ मनुष्यों के सिर कटवा दिए, और कुछ के कान काट डाले।

Verse 118

एवं विचरतस्तस्य निधघ्नतः सुबहून्‌ नरान्‌

संजय बोले—इस प्रकार घूमते हुए और प्रहार करते हुए, उसने बहुत-से मनुष्यों का वध कर डाला।

Verse 119

किज्वित्प्राणैश्न पुरुषै्हतै श्चान्यी: सहस्रश:

संजय बोले—कुछ अभी प्राणों से जुड़े थे, और अन्य—हज़ारों की संख्या में—पहले ही मारे जा चुके थे।

Verse 120

यक्षरक्ष:समाकीर्णे रथाश्वद्धिपदारुणे

संजय बोले—वह स्थान यक्षों और राक्षसों से भरा था, और रथों, घोड़ों तथा हाथियों की रौंद से अत्यन्त भयावह हो उठा था।

Verse 121

क्रुद्धेन द्रोणपुत्रेण संछन्ना: प्रापतन्‌ भुवि । यक्षों तथा राक्षसोंसे भरे हुए एवं रथों, घोड़ों और हाथियोंसे भयंकर दिखायी देनेवाले रणक्षेत्रमें कुपित हुए द्रोणपुत्रके हाथोंसे कटकर कितने ही क्षत्रिय पृथ्वीपर पड़े थे || १२० $ई || भ्रातृनन्ये पितृनन्ये पुत्रानन्ये विचुक्रुशु:

संजय बोले—द्रोणपुत्र के क्रोध से आच्छादित होकर बहुत-से योद्धा धरती पर गिर पड़े। कोई अपने भाइयों को, कोई अपने पिताओं को, और कोई अपने पुत्रों को पुकार-पुकारकर रोने लगे—वध के बीच स्वजन-वियोग का करुण क्रंदन उठ रहा था।

Verse 122

केचिदूचुर्न तत्‌ क्लुद्धैर्धार्तराष्ट्र: कृतं रणे । यत्‌ कृतं नः प्रसुप्तानां रक्षोभि: क्रूरकर्मभि:

संजय बोले—कुछ लोग कहने लगे—“यह कर्म क्रोध में भरे धृतराष्ट्र-पुत्रों ने रण में धर्मयुक्त युद्ध से नहीं किया। हम जो सोए पड़े थे, हमारे साथ जो हुआ, वह तो क्रूरकर्मा राक्षसों का ही काम है।”

Verse 123

कुछ लोग भाइयोंको, कुछ पिताओंको और दूसरे लोग पुत्रोंको पुकार रहे थे। कुछ लोग कहने लगे--“भाइयो! रोषमें भरे हुए धृतराष्ट्रके पुत्रोंने भी रणभूमिमें हमारी वैसी दुर्गति नहीं की थी, जो आज इन क्रूरकर्मा राक्षसोंने हम सोये हुए लोगोंकी कर डाली है ।। असांनिध्याद्धि पार्थानामिदं न: कदनं कृतम्‌ न चासुरैर्न गन्धर्वर्न यक्षैर्न च राक्षसै:,“आज कुन्तीके पुत्र हमारे पास नहीं हैं, इसीलिये हमलोगोंका यह संहार किया गया है। कुन्तीपुत्र अर्जुनको तो असुर, गन्धर्व, यक्ष तथा राक्षस कोई भी नहीं जीत सकते; क्योंकि साक्षात्‌ श्रीकृष्ण उनके रक्षक हैं। वे ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय तथा सम्पूर्ण भूतोंपर दया करनेवाले हैं

संजय बोले—कुछ लोग भाइयों को, कुछ पिताओं को और कुछ पुत्रों को पुकार-पुकारकर विलाप कर रहे थे। कुछ कहने लगे—“भाइयो! क्रोध में भरे धृतराष्ट्र-पुत्रों ने भी रणभूमि में हमारी वैसी दुर्गति नहीं की थी, जैसी आज इन क्रूरकर्मा राक्षसों ने हमें सोते हुए कर दी है। पाण्डव यहाँ नहीं हैं, इसी से हमारा यह संहार हुआ। कुन्तीपुत्र अर्जुन को असुर, गन्धर्व, यक्ष या राक्षस कोई भी नहीं जीत सकता; क्योंकि स्वयं श्रीकृष्ण उसके रक्षक हैं। वह ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियों पर दया करने वाला है।”

Verse 124

शक्यो विजेतुं कौन्तेयो गोप्ता यस्य जनार्दन: । ब्रह्मण्य: सत्यवाग दान्त: सर्वभूतानुकम्पक:,“आज कुन्तीके पुत्र हमारे पास नहीं हैं, इसीलिये हमलोगोंका यह संहार किया गया है। कुन्तीपुत्र अर्जुनको तो असुर, गन्धर्व, यक्ष तथा राक्षस कोई भी नहीं जीत सकते; क्योंकि साक्षात्‌ श्रीकृष्ण उनके रक्षक हैं। वे ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय तथा सम्पूर्ण भूतोंपर दया करनेवाले हैं

संजय बोले—“कुन्तीपुत्र (अर्जुन) को जीतना संभव नहीं; क्योंकि जनार्दन (श्रीकृष्ण) स्वयं उसके रक्षक हैं। वह ब्राह्मणभक्त, सत्यवादी, जितेन्द्रिय और समस्त प्राणियों पर करुणा करने वाला है।”

Verse 125

न च सुप्तं प्रमत्तं वा न्यस्तशस्त्रं कृताउ्जलिम्‌ | धावन्तं मुक्तकेशं वा हन्ति पार्थो धनंजय:,“कुन्तीनन्दन अर्जुन सोये हुए, असावधान, शस्त्रहीन, हाथ जोड़े हुए, भागते हुए अथवा बाल खोलकर दीनता दिखाते हुए मनुष्यको कभी नहीं मारते हैं

संजय बोले—पार्थ धनञ्जय (अर्जुन) न तो सोए हुए को, न असावधान को, न शस्त्र त्याग चुके को, न हाथ जोड़कर शरण माँगने वाले को, न भागते हुए को, और न ही बाल खोलकर दीनता दिखाने वाले को मारते हैं।

Verse 126

तदिदं नः कृतं घोर रक्षोभि: क्रूरकर्मभि: । इति लालप्यमाना: सम शेरते बहवो जना:,“आज क्र्रकर्मा राक्षसोंद्वारा हमारी यह भयंकर दुर्दशा की गयी है।” इस प्रकार विलाप करते हुए बहुत-से मनुष्य रणभूमिमें सो रहे थे

“क्रूरकर्मा राक्षसों ने हम पर यह घोर विपत्ति ढा दी है।” ऐसा विलाप करते हुए बहुत-से मनुष्य रणभूमि में एक साथ पड़े सो रहे थे।

Verse 127

स्तनतां च मनुष्याणामपरेषां च कूजताम्‌ । ततो मुहूर्तात्‌ प्राशाम्यत्‌ स शब्दस्तुमुलो महान्‌

मनुष्यों के कराहने और दूसरों के चीत्कार करने का वह महान्, घोर कोलाहल था; पर थोड़ी ही देर में वह शब्द शांत हो गया।

Verse 128

तदनन्तर दो ही घड़ीमें कराहते और विलाप करते हुए मनुष्योंका वह भयंकर कोलाहल शान्त हो गया ।। शोणितव्यतिषिक्तायां वसुधायां च भूमिप । तद्रजस्तुमुलं घोर क्षणेनान्तरधीयत,राजन! खूनसे भीगी हुई पृथ्वीपर गिरकर वह भयानक धूल क्षणभरमें अदृश्य हो गयी

तदनन्तर दो ही घड़ी में कराहते और विलाप करते हुए मनुष्यों का वह भयंकर कोलाहल शांत हो गया। राजन्! खून से भीगी हुई पृथ्वी पर गिरकर वह भयानक, तूमुल धूल क्षणभर में अदृश्य हो गई।

Verse 129

स चेष्टमानानुद्धिग्नान्‌ निरुत्साहानू सहस्रश: । न्यपातयन्नरान्‌ क्रुद्ध: पशून्‌ पशुपतिर्यथा,जैसे प्रलयके समय क्रोधमें भरे हुए पशुपति रुद्र समस्त पशुओं (प्राणियों)-का संहार कर डालते हैं, उसी प्रकार कुपित हुए अभश्वत्थामाने ऐसे सहस्रों मनुष्योंको भी मार डाला, जो किसी प्रकार प्राण बचानेके प्रयत्नमें लगे हुए थे, एकदम घबराये हुए थे और सारा उत्साह खो बैठे थे

कुपित होकर उसने सहस्रों मनुष्यों को गिरा दिया—जो प्राण बचाने को छटपटा रहे थे, घबराए हुए थे और जिनका सारा उत्साह नष्ट हो चुका था—जैसे प्रलयकाल में क्रोध से भरे पशुपति रुद्र समस्त प्राणियों का संहार कर डालते हैं।

Verse 130

अन्योन्यं सम्परिष्वज्य शयानान्‌ द्रवतो5परान्‌ | संलीनान्‌ युद्धयमानांश्व सर्वान्‌ द्रौणिरपोथयत्‌

कोई परस्पर आलिंगन किए पड़े थे, कोई घबराकर भाग रहे थे; कोई छिपे हुए थे, और कोई युद्ध करने का प्रयत्न कर रहे थे—द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने उन सबको मार गिराया।

Verse 131

कुछ लोग एक-दूसरेसे लिपटकर सो रहे थे, दूसरे भाग रहे थे, तीसरे छिप गये थे और चौथी श्रेणीके लोग जूझ रहे थे, उन सबको द्रोणकुमारने वहाँ मार गिराया ।। दहामाना हुताशेन वध्यमानाश्च तेन ते परस्परं तदा योधा अनयन्‌ यमसादनम्‌

कुछ लोग एक-दूसरे से लिपटकर सो रहे थे, कुछ भय से भाग रहे थे, कुछ छिप गए थे और कुछ जूझ रहे थे—उन सबको वहीं द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने मार गिराया। अग्नि से दहकते और उसके हाथों कटते हुए वे योद्धा उस घोर कोलाहल में परस्पर ही एक-दूसरे को यमसदन की ओर ढकेलने लगे।

Verse 132

एक ओर लोग आगसे जल रहे थे और दूसरी ओर अश्वत्थामाके हाथसे मारे जाते थे, ऐसी दशामें वे सब योद्धा स्वयं ही एक-दूसरेकी यमलोक भेजने लगे ।। तस्या रजन्यास्त्वर्धेन पाण्डवानां महद्‌ बलम्‌ | गमयामास राजेन्द्र द्रेणियमनिवेशनम्‌,राजेन्द्र! उस रातका आधा भाग बीतते-बीतते द्रोणपुत्र अश्वत्थामाने पाण्डवोंकी उस विशाल सेनाको यमराजके घर भेज दिया

राजेन्द्र! उस रात का आधा भाग बीतते-बीतते द्रोणपुत्र अश्वत्थामा ने पाण्डवों की उस विशाल सेना को यमलोक पहुँचा दिया। उस आतंक में कोई आग से जल रहा था, कोई उसके हाथों कट रहा था; और मोहग्रस्त योद्धा परस्पर ही एक-दूसरे को मृत्यु की ओर धकेलने लगे।

Verse 133

निशाचराणां सत्त्वानां रात्रि: सा हर्षवर्धिनी । आसीजक्नरगजाश्चानां रौद्री क्षयकरी भूशम्‌,वह भयानक रात्रि निशाचर प्राणियोंका हर्ष बढ़ानेवाली थी और मनुष्यों, घोड़ों तथा हाथियोंके लिये अत्यन्त विनाशकारिणी सिद्ध हुई

वह रात्रि निशाचर प्राणियों के हर्ष को बढ़ानेवाली थी, पर मनुष्यों, घोड़ों और हाथियों के लिए अत्यन्त रौद्र और विनाशकारिणी सिद्ध हुई।

Verse 134

तत्रादृश्यन्त रक्षांसि पिशाचाश्न पृथग्विधा: । खादन्तो नरमांसानि पिबन्त: शोणितानि च,वहाँ नाना प्रकारकी आकृतिवाले बहुत-से राक्षस और पिशाच मनुष्योंके मांस खाते और खून पीते दिखायी देते थे

वहाँ नाना प्रकार के राक्षस और पिशाच दिखाई देते थे—जो मनुष्यों का मांस खा रहे थे और रक्त पी रहे थे।

Verse 135

कराला: पिड़लाश्चैव शैलदन्ता रजस्वला: । जटिला दीर्घशड्खाश्न॒ पजचपादा महोदरा:,वे बड़े ही विकराल और पिंगलवर्णके थे। उनके दाँत पहाड़ों-जैसे जान पड़ते थे। वे सारे अंगोंमें धूल लपेटे और सिरपर जटा रखाये हुए थे। उनके माथेकी हड्डी बहुत बड़ी थी। उनके पाँच-पाँच पैर और बड़े-बड़े पेट थे

वे अत्यन्त विकराल और पिंगलवर्ण के थे; उनके दाँत पर्वत-शिखरों जैसे प्रतीत होते थे। वे धूल से लथपथ, सिर पर जटाएँ धारण किए हुए थे; उनके ललाट की अस्थि उभरी और बड़ी थी। उनके पाँच-पाँच पैर और विशाल-विशाल पेट थे।

Verse 136

पश्चादड्गुलयो रूक्षा विरूपा भैरवस्वना: । घण्टाजालावसक्ताश्ष नीलकण्ठा विभीषणा:

संजय बोले—तत्पश्चात् रूखी उँगलियों वाले, विकृत आकृति के, भयानक गर्जना करने वाले प्राणी प्रकट हुए। वे घंटियों के गुच्छों से लदे थे, उनके कंठ नील थे और वे देखने में अत्यन्त भयावह थे।

Verse 137

सपुत्रदारा: सक्रूरा: सुदुर्दर्शा: सुनिर्घणा: । विविधानि च रूपाणि तत्रादृश्यन्त रक्षसाम्‌

संजय बोले—वहाँ राक्षसों के नाना प्रकार के रूप दिखाई दिए। कुछ अपने पुत्रों और स्त्रियों सहित थे; वे अत्यन्त क्रूर, देखने में दारुण और सर्वथा निर्दय थे।

Verse 138

उनकी अंगुलियाँ पीछेकी ओर थीं। वे रूखे, कुरूप और भयंकर गर्जना करनेवाले थे। बहुतोंने घंटोंकी मालाएँ पहन रखी थीं। उनके गलेमें नील चिह्न था। वे बड़े भयानक दिखायी देते थे। उनके स्त्री और पुत्र भी साथ ही थे। वे अत्यन्त क्रूर और निर्दय थे। उनकी ओर देखना भी बहुत कठिन था। वहाँ उन राक्षसोंके भाँति-भाँतिके रूप दृष्टिगोचर हो रहे थे।। पीत्वा च शोणितं हृष्टा: प्रानृत्यन्‌ गणशो<5परे । इदं परमिदं मेध्यमिदं स्वाद्धिति चाब्रुवन्‌,कोई रक्त पीकर हर्षसे खिल उठे थे। दूसरे अलग-अलग झुंड बनाकर नाच रहे थे। वे आपसमें कहते थे--“यह उत्तम है, यह पवित्र है और यह बहुत स्वादिष्ट है”

संजय बोले—उनकी उँगलियाँ पीछे की ओर थीं। वे रूखे, कुरूप और भयंकर गर्जना करने वाले थे। बहुतों ने घंटों की मालाएँ पहन रखी थीं; उनके गले में नील चिह्न था; वे बड़े भयानक दिखायी देते थे। उनके स्त्री और पुत्र भी साथ ही थे। वे अत्यन्त क्रूर और निर्दय थे; उनकी ओर देखना भी कठिन था। वहाँ उन राक्षसों के भाँति-भाँति के रूप दृष्टिगोचर हो रहे थे। रक्त पीकर कुछ हर्ष से उन्मत्त हो उठे थे; दूसरे अलग-अलग झुंड बनाकर नाच रहे थे। वे आपस में कहते थे—“यह उत्तम है, यह पवित्र है, यह बहुत स्वादिष्ट है।”

Verse 139

मेदोमज्जास्थिरक्तानां वसानां च भशाशिता: । परमांसानि खादन्त: क्रव्यादा मांसजीविन:,मेदा, मज्जा, हड्डी, रक्त और चर्बीका विशेष आहार करनेवाले मांसजीवी राक्षस एवं हिंसक जन्तु दूसरोंके मांस खा रहे थे

संजय बोले—मेदा, मज्जा, हड्डी, रक्त और चर्बी के भक्षक, मांसजीवी क्रव्याद राक्षस और हिंसक जन्तु मनुष्यों के श्रेष्ठ मांस-भागों को खा रहे थे।

Verse 140

वसाश्रैवापरे पीत्वा पर्यधावन्‌ विकुक्षिका: । नानावक्त्रास्तथा रौद्रा: क्रव्यादा: पिशिताशना:,दूसरे कुक्षिरहित राक्षस चर्बियोंका पान करके चारों ओर दौड़ लगा रहे थे। कच्चा मांस खानेवाले उन भयंकर राक्षसोंके अनेक मुख थे

संजय बोले—दूसरे कुक्षिरहित राक्षस चर्बी पीकर चारों ओर दौड़ रहे थे। वे क्रव्याद, कच्चा मांस खाने वाले, भयंकर और अनेक मुखों वाले थे।

Verse 141

अयुतानि च तत्रासन्‌ प्रयुतान्यर्बुदानि च । रक्षसां घोररूपाणां महतां क्रूरकर्मणाम्‌,वहाँ उस महान्‌ जनसंहारमें तृप्त और आनन्दित हुए क्रूर कर्म करनेवाले घोर रूपधारी महाकाय राक्षसोंके कई दल थे। किसी दलमें दस हजार, किसीमें एक लाख और किसीमें एक अर्बुद (दस लाख) राक्षस थे। नरेश्वर! वहाँ और भी बहुत-से मांसभक्षी प्राणी एकत्र हो गये थे

उस महान् जनसंहार में तृप्त और आनन्दित, घोर रूपधारी, महाकाय, क्रूरकर्मा राक्षसों के अनेक दल थे—कहीं दस हजार, कहीं एक लाख, और कहीं अर्बुद (दस लाख) की संख्या में। नरेश्वर! वहाँ और भी बहुत-से मांसभक्षी प्राणी उस विनाशस्थल पर एकत्र हो गये थे।

Verse 142

मुदितानां वितृप्तानां तस्मिन्‌ महति वैशसे । समेतानि बहून्यासन्‌ भूतानि च जनाधिप,वहाँ उस महान्‌ जनसंहारमें तृप्त और आनन्दित हुए क्रूर कर्म करनेवाले घोर रूपधारी महाकाय राक्षसोंके कई दल थे। किसी दलमें दस हजार, किसीमें एक लाख और किसीमें एक अर्बुद (दस लाख) राक्षस थे। नरेश्वर! वहाँ और भी बहुत-से मांसभक्षी प्राणी एकत्र हो गये थे

नरेश्वर! उस महान् जनसंहार में तृप्त और मुदित होकर बहुत-से भूत-प्रेतादि तथा अन्य घोर प्राणी भी वहाँ एकत्र हो गये थे।

Verse 143

प्रत्यूषकाले शिबिरात्‌ प्रतिगन्तुमियेष सः । नृशोणितावसिक्तस्य द्रौणेरासीदसित्सरु:

प्रातःकाल होते ही वह शिविर से लौट जाना चाहता था; पर द्रोणपुत्र की तलवार की धार मनुष्य-रक्त से लथपथ होकर काली पड़ गयी थी।

Verse 144

दुर्गमां पदवीं गत्वा विरराज जनक्षये

दुर्गम मार्ग पर पहुँचकर वह मनुष्यों के संहार के बीच भी दीप्तिमान-सा विराजमान था।

Verse 145

यथाप्रतिज्ञं तत्‌ कर्म कृत्वा द्रौणायनि: प्रभो

हे प्रभो! द्रोणपुत्र ने अपनी प्रतिज्ञा के अनुसार वह कर्म कर दिखाया।

Verse 146

प्राबोधयत पादेन शयनस्थं महीपते । भूपाल! अअभश्वत्थामाने निश्चिन्त एवं निर्भय होकर शय्यापर सोये हुए महामनस्वी धृष्टद्युम्मको पैरसे ठोकर मारकर जगाया,यथैव संसुप्तजने शिबिरे प्राविशन्निशि

संजय बोले—महाराज! अश्वत्थामा निश्चिन्त और निर्भय होकर शय्या पर सोए हुए महामनस्वी धृष्टद्युम्न को पैर से ठोकर मारकर जगा उठा। उसी प्रकार वह रात में, जब सब लोग गहरी नींद में थे, अपने घोर उद्देश्य को साधने के लिए शिविर में घूमता रहा।

Verse 147

निष्क्रम्य शिबिरात्‌ तस्मात्‌ ताभ्यां संगम्य वीर्यवान्‌

फिर उस शिविर से निकलकर वह पराक्रमी उन दोनों से जा मिला।

Verse 148

तावथाचख्यतुस्तस्मै प्रियं प्रियकरी तदा

तब उन दोनों ने उसे वही समाचार कहे जो उसे प्रिय लगें—मन को भाने वाली बातें।

Verse 149

प्रीत्या चोच्चैरुदक्रोशंस्तथैवास्फोटयंस्तलान्‌,फिर तो वे तीनों प्रसन्नताके मारे उच्चस्वरसे गर्जने और ताल ठोकने लगे। इस प्रकार वह रात्रि उस जन-संहारकी वेलामें असावधान होकर सोये हुए सोमकोंके लिये अत्यन्त भयंकर सिद्ध हुई

आनंद में वे ऊँचे स्वर से गर्जने लगे और तालियाँ ठोकने लगे। इस प्रकार जन-संहार की उस घड़ी में, असावधान होकर सोए हुए सोमकों के लिए वह रात अत्यन्त भयानक सिद्ध हुई।

Verse 150

एवंविधा हि सा रात्रि: सोमकानां जनक्षये । प्रसुप्तानां प्रमत्तानामासीत्‌ सुभूशदारुणा,फिर तो वे तीनों प्रसन्नताके मारे उच्चस्वरसे गर्जने और ताल ठोकने लगे। इस प्रकार वह रात्रि उस जन-संहारकी वेलामें असावधान होकर सोये हुए सोमकोंके लिये अत्यन्त भयंकर सिद्ध हुई

सोमकों के जन-क्षय के लिए वैसी ही वह रात थी—जो सोए हुए और असावधान लोगों के लिए अत्यन्त भयंकर बन गई।

Verse 151

असंशयं हि कालस्य पर्यायो दुरतिक्रम: । तादृशा निहता यत्र कृत्वास्माकं जनक्षयम्‌,राजन! इसमें संशय नहीं कि कालकी गतिका उल्लंघन करना अत्यन्त कठिन है। जहाँ हमारे पक्षके लोगोंका संहार करके विजयको प्राप्त हुए वैसे-वैसे वीर मार डाले गये

संजय ने कहा—राजन्! इसमें कोई संदेह नहीं कि काल की गति और उसका परिवर्तन अत्यन्त दुस्तर है। उसी स्थान पर, जिन्होंने हमारे पक्ष का संहार करके विजय पाई थी, वे ही महावीर वैसे ही मारे गए।

Verse 152

धृतराष्ट उवाच प्रागेव सुमहत्‌ कर्म द्रौणिरेतन्महारथ: । नाकरोदीदृशं कस्मान्मत्पुत्रविजये धृत:,राजा धृतराष्ट्रने पूछा--संजय! अश्वत्थामा तो मेरे पुत्रको विजय दिलानेका दृढ़ निश्चय कर चुका था। फिर उस महारथी वीरने पहले ही ऐसा महान्‌ पराक्रम क्‍यों नहीं किया?

धृतराष्ट्र ने कहा—संजय! द्रोणपुत्र अश्वत्थामा तो मेरे पुत्र की विजय के लिए दृढ़ निश्चय कर चुका था। फिर उस महारथी ने पहले ही ऐसा महान् पराक्रम क्यों नहीं किया?

Verse 153

अथ कम्माद्धते क्षुद्रे कर्मेंदे कृतवानसौ । द्रोणपुत्रो महात्मा स तन्मे शंसितुमहसि,जब दुर्योधन मार डाला गया, तब उस महामनस्वी द्रोणपुत्रने ऐसा नीच कर्म क्‍यों किया? यह सब मुझे बताओ

धृतराष्ट्र ने कहा—जब दुर्योधन मारा गया, तब उस महामनस्वी द्रोणपुत्र ने ऐसा नीच कर्म क्यों किया? यह सब मुझे बताओ।

Verse 154

संजय उवाच तेषां नूनं भयान्नासौ कृतवान्‌ कुरुनन्दन । असांनिध्याद्धि पार्थानां केशवस्य च धीमत:

संजय ने कहा—कुरुनन्दन! निश्चय ही उसने उनके भय से यह नहीं किया; क्योंकि उस समय पाण्डव और बुद्धिमान केशव वहाँ उपस्थित नहीं थे।

Verse 155

को हि तेषां समक्ष तान्‌ हन्यादपि मरुत्पति:

संजय ने कहा—उनके सामने उन्हें कौन मार सकता है, चाहे वह स्वयं मरुत्पति (इन्द्र) ही क्यों न हो?

Verse 156

अभ्यजानादमेयात्मा द्रोणपुत्रं महारथम्‌ | अमेय आत्मबलसे सम्पन्न रणदुर्मद धृष्टद्युम्न उसके पैर लगते ही जाग उठा और जागते ही उसने महारथी द्रोणपुत्रको पहचान लिया,एतदीदृशकं वृत्तं राजन्‌ सुप्तजने विभो । उन पाण्डव आदिके समक्ष कौन उन्हें मार सकता था? साक्षात्‌ देवराज इन्द्र भी उस दशामें उनका कुछ नहीं बिगाड़ सकते थे। प्रभो! नरेश्वर! उस रात्रिमें सब लोगोंके सो जानेपर यह इस प्रकारकी घटना घटित हुई ।। ततो जनक्षयं कृत्वा पाण्डवानां महात्ययम्‌

संजय बोले—अमेय आत्मबल से सम्पन्न, रण में उन्मत्त और धृष्ट द्रोणपुत्र महारथी अश्वत्थामा ने जैसे ही धृष्टद्युम्न के चरणों को छुआ, वह उसी क्षण जाग उठा; और जागते ही उसने द्रोणपुत्र को पहचान लिया। हे राजन्, हे प्रभो! जब सब जन सो रहे थे, तब ऐसी ही यह घटना घटी। उस दशा में तो साक्षात् देवराज इन्द्र भी उन्हें रोक नहीं सकते थे। फिर उसने मनुष्यों का संहार करके पाण्डवों पर महान् आपत्ति ला दी।

Verse 157

दिष्टया दिष्टयैव चान्योन्यं समेत्योचुर्महारथा: । उस समय पाण्डवोंके लिये महान्‌ विनाशकारी जनसंहार करके वे तीनों महारथी जब परस्पर मिले, तब आपसमें कहने लगे--'“बड़े सौभाग्यसे यह कार्य सिद्ध हुआ है ।। पर्यष्वजत्‌ ततो द्रौणिस्ताभ्यां सम्प्रतिनन्दित:

संजय बोले—वे महारथी परस्पर मिलकर बोले—“दिष्टया! दिष्टया!” उस समय पाण्डवों के लिये अत्यन्त विनाशकारी जनसंहार करके वे तीनों महारथी जब एकत्र हुए, तब आपस में कहने लगे—“बड़े सौभाग्य से यह कार्य सिद्ध हुआ।” तब दोनों के द्वारा भली-भाँति अभिनन्दित द्रोणपुत्र (अश्वत्थामा) ने उन्हें आलिंगन किया।

Verse 158

इदं हर्षात्‌ तु सुमहदाददे वाक्यमुत्तमम्‌ । तदनन्तर उन दोनोंका अभिनन्दन स्वीकार करके द्रोणपुत्रने उन्हें हृदयसे लगाया और बड़े हर्षसे यह महत्त्वपूर्ण उत्तम वचन मुँहसे निकाला-- ।। १५७ $ ।। पज्चाला निहताः: सर्वे द्रौपदेयाश्व॒ सर्वशः

संजय बोले—उन दोनों का अभिनन्दन स्वीकार करके द्रोणपुत्र ने उन्हें हृदय से लगा लिया और बड़े हर्ष से यह उत्तम वचन कहा—“समस्त पांचाल मारे गये, और द्रौपदी के पुत्र भी—एक भी शेष नहीं रहा।”

Verse 159

सोमका मत्स्यशेषाश्न सर्वे विनिहता मया । 'सारे पांचाल, द्रौपदीके सभी पुत्र, सोमकवंशी क्षत्रिय तथा मत्स्य देशके अवशिष्ट सैनिक ये सभी मेरे हाथसे मारे गये || १५८ ई ।। इदानीं कृतकृत्या: सम याम तत्रैव मा चिरम्‌ | यदि जीवति नो राजा तस्मै शंसमहे वयम्‌,“इस समय हम कृतकृत्य हो गये। अब हमें शीघ्र वहीं चलना चाहिये। यदि हमारे राजा दुर्योधन जीवित हों तो हम उन्हें भी यह समाचार कह सुनावें"

संजय बोले—“सोमक और मत्स्य देश के जो शेष सैनिक थे, वे सब मेरे हाथों मारे गये। अब हम कृतकृत्य हो गये; बिना विलम्ब वहीं चलें। यदि हमारा राजा (दुर्योधन) जीवित हो, तो हम उसे यह समाचार सुनाएँ।”

Verse 163

केशेष्वालभ्य पाणि भ्यां निष्पिपेष महीतले । अब वह शगय्यासे उठनेकी चेष्टा करने लगा। इतनेहीमें महाबली अभ्वत्थामाने दोनों हाथसे उसके बाल पकड़कर पृथ्वीपर पटक दिया और वहाँ अच्छी तरह रगड़ा

संजय बोले—अश्वत्थामा ने दोनों हाथों से उसके केश पकड़कर उसे पृथ्वी पर पटक दिया और वहीं उसे कुचल डाला।

Verse 176

निद्रया चैव पाउचाल्यो नाशकच्चेष्टितुं तदा । भारत! धृष्टद्युम्न भय और निद्रासे दबा हुआ था। उस अवस्थामें जब अश्वत्थामाने उसे जोरसे पटककर रगड़ना आरम्भ किया, तब उससे कोई भी चेष्टा करते न बना

निद्रा से आक्रान्त पाञ्चालकुमार उस समय कोई चेष्टा न कर सका। हे भारत! भय और उनींदापन से दबा धृष्टद्युम्न, जब अश्वत्थामा ने उसे बलपूर्वक पटककर रगड़ना आरम्भ किया, तब सर्वथा असहाय रह गया।

Verse 186

नदन्तं विस्फुरन्तं च पशुमारममारयत्‌ । राजन! उसने पैरसे उसकी छाती और गला दोनोंको दबा दिया और उसे पशुकी तरह मारना आरम्भ किया। वह बेचारा चीखता और छटपटाता रह गया

दहाड़ता और छटपटाता हुआ भी वह पशु की भाँति मार डाला गया। राजन्! उसने अपने पैरों से उसकी छाती और गला दबाकर उसे पशु की तरह मारना आरम्भ किया; वह अभागा केवल चीखता और तड़पता रह गया।

Verse 223

तस्माच्छस्त्रेण निधन न त्वमर्हसि दुर्मते । उसकी उस अस्पष्ट वाणीको सुनकर द्रोणपुत्रने कहा--'रे कुलकलंक! अपने आचार्यकी हत्या करनेवाले लोगोंके लिये पुण्यलोक नहीं है; अतः दुर्मते! तू शस्त्रके द्वारा मारे जानेके योग्य नहीं है”

अतः, दुर्मते! तू शस्त्र से मारे जाने के योग्य नहीं है। उसकी अस्पष्ट वाणी सुनकर द्रोणपुत्र बोला—“अरे कुलकलंक! अपने आचार्य के वध करने वालों के लिए पुण्यलोक नहीं; इसलिए, दुर्मते! तुझे शस्त्र-मृत्यु का सम्मान नहीं मिल सकता।”

Verse 246

अबुध्यन्त महाराज स्त्रियो ये चास्य रक्षिण: । महाराज! उस समय मारे जाते हुए वीर धृष्टद्युम्नके आर्तनादसे उस शिविरकी स्त्रियाँ तथा सारे रक्षक जाग उठे

महाराज! उस समय मारे जाते हुए वीर धृष्टद्युम्न के आर्तनाद से उस शिविर की स्त्रियाँ और उसके सब रक्षक जाग उठे।

Verse 256

भूतमेवाध्यवस्यन्तो न सम प्रव्याहरन्‌ भयात्‌ । उन्होंने उस अलौकिक पराक्रमी पुरुषको धृष्टद्युम्नपर प्रहार करते देख उसे कोई भूत ही समझा; इसीलिये भयके मारे वे कुछ बोल न सके

उस अलौकिक पराक्रमी पुरुष को धृष्टद्युम्न पर प्रहार करते देख वे उसे भूत ही समझ बैठे; इसलिए भय के मारे वे एक भी स्पष्ट वाक्य न बोल सके।

Verse 273

रथेन शिबिरं प्रायाज्जिघांसुर्द्धिषतो बली | राजन! इस उपायसे धृष्टद्युम्मको यमलोक भेजकर तेजस्वी अश्वत्थामा उसके खेमेसे बाहर निकला और सुन्दर दिखायी देनेवाले अपने रथके पास आकर उसपर सवार हो गया। इसके बाद वह बलवान वीर अन्य शत्रुओंको मार डालनेकी इच्छा रखकर अपनी गर्जनासे सम्पूर्ण दिशाओंको प्रतिध्वनित करता हुआ रथके द्वारा प्रत्येक शिविरपर आक्रमण करने लगा

संजय बोले—राजन्! इस उपाय से धृष्टद्युम्न को यमलोक भेजकर तेजस्वी अश्वत्थामा उस खेमे से बाहर निकला, अपने सुन्दर रथ के पास आया और उस पर चढ़ गया। फिर वह बलवान वीर शेष शत्रुओं को मारने की इच्छा से गर्जना करता हुआ, जिससे सारी दिशाएँ गूँज उठीं, रथ द्वारा एक-एक शिविर पर आक्रमण करने लगा।

Verse 283

सहितै रक्षिश्रि: सर्वे: प्राणेदुर्योषितस्तदा । महारथी द्रोणपुत्रके वहाँसे हट जानेपर एकत्र हुए सम्पूर्ण रक्षकोंसहित धृष्टद्युम्नकी रानियाँ फ़ूट-फ़ूटकर रोने लगीं

संजय बोले—तब सब रक्षकों के साथ वे स्त्रियाँ शोक से व्याकुल हो उठीं। जब महारथी द्रोणपुत्र वहाँ से हट गया, तब धृष्टद्युम्न की रानियाँ समस्त रक्षकों के साथ एकत्र होकर फूट-फूटकर रोने लगीं।

Verse 296

व्याक्रोशन्‌ क्षत्रिया: सर्वे धृष्टद्युम्नस्य भारत । भरतनन्दन! अपने राजाको मारा गया देख धूृष्टद्युम्नकी सेनाके सारे क्षत्रिय अत्यन्त शोकमें मग्न हो आर्तस्वरसे विलाप करने लगे

संजय बोले—हे भारत! धृष्टद्युम्न की सेना के सब क्षत्रिय अपने राजा को मरा हुआ देखकर तीव्र शोक में डूब गये। हे भरतनन्दन! वे आर्त स्वर से चिल्लाकर विलाप करने लगे।

Verse 306

क्षिप्रं च समनहान्त किमेतदिति चाब्रुवन्‌ । स्त्रियोंके रोनेकी आवाज सुनकर आस-पासके सारे क्षत्रियशिरोमणि वीर तुरंत कवच बाँधकर तैयार हो गये और बोले--'अरे! यह क्या हुआ?”

संजय बोले—स्त्रियों के रोने की आवाज सुनकर आस-पास के सब क्षत्रिय-शिरोमणि वीर तुरंत कवच बाँधकर तैयार हो गये और बोले—“अरे! यह क्या हुआ? यह क्या है?”

Verse 323

हत्वा पाज्चालराजानं रथमारुह्म तिष्ठति । राजन! वे सारी स्त्रियाँ अश्वत्थामाको देखकर बहुत डर गयी थीं; अतः दीन कण्ठसे बोलीं--'अरे! जल्दी दौड़ो! जल्दी दौड़ो! हमारी समझमें नहीं आता कि यह कोई राक्षस है या मनुष्य। देखो, यह पांचालराजकी हत्या करके रथपर चढ़कर खड़ा है”

संजय बोले—“पांचालराज को मारकर वह रथ पर चढ़कर खड़ा है।” राजन्! वे सब स्त्रियाँ अश्वत्थामा को देखकर अत्यन्त भयभीत हो गयीं; इसलिए दीन कण्ठ से बोलीं—“अरे! जल्दी दौड़ो, जल्दी दौड़ो! हमें समझ नहीं आता कि यह राक्षस है या मनुष्य। देखो, यह पांचालराज की हत्या करके रथ पर खड़ा है।”

Verse 336

स तानापततः: सर्वान्‌ रुद्रास्त्रेण व्यपोथयत्‌ । तब जन श्रेष्ठ योद्धाओंने सहसा पहुँचकर अभश्वत्थामाको चारों ओरसे घेर लिया; परंतु अश्व॒त्थामाने पास आते ही उन सबको रुद्रास्त्रसे मार गिराया

वे सब श्रेष्ठ योद्धा सहसा दौड़कर अश्वत्थामा को चारों ओर से घेरने लगे; परन्तु पास आते ही अश्वत्थामा ने रुद्रास्त्र का प्रयोग करके उन सबको धराशायी कर दिया।

Verse 346

अपश्यच्छयने सुप्तमुत्तमौजसमन्तिके । इस प्रकार धृष्टद्युम्म और उसके सेवकोंका वध करके अभश्व॒त्थामाने निकटके ही खेमेमें पलंगपर सोये हुए उत्तमौजाको देखा

धृष्टद्युम्न और उसके सेवकों का वध करके अश्वत्थामा ने निकट के ही खेमे में पलंग पर सोए हुए उत्तमौजा को देखा।

Verse 363

गदामुद्यम्य वेगेन हृदि द्रौणिमताडयत्‌ । उत्तमौजाको राक्षसद्वारा मारा गया समझकर युधामन्यु भी वहाँ आ पहुँचा। उसने बड़े वेगसे गदा उठाकर अश्वत्थामाकी छातीमें प्रहार किया

उत्तमौजा को द्वार पर राक्षस द्वारा मारा गया समझकर युधामन्यु भी वहाँ आ पहुँचा। उसने बड़े वेग से गदा उठाकर अश्वत्थामा की छाती में प्रहार किया।

Verse 373

विस्फुरन्तं च पशुवत्‌ तथैवैनममारयत्‌ | अश्वत्थामाने झपटकर उसे पकड़ लिया और पृथ्वीपर दे मारा। वह उसके चंगुलसे छूटनेके लिये बहुतेरा हाथ-पैर मारता रहा; किंतु अश्वत्थामाने उसे भी पशुकी तरह गला घोंटकर मार डाला

अश्वत्थामा ने झपटकर उसे पकड़ लिया और पृथ्वी पर दे मारा। वह उसके चंगुल से छूटने के लिए बहुत हाथ-पैर मारता रहा; किंतु अश्वत्थामा ने उसे भी पशु की तरह गला घोंटकर मार डाला।

Verse 493

शिलीमुखै: शिखण्डी च द्रोणपुत्रं समार्दयन्‌ । उन्होंने निर्भय-से होकर अश्वत्थामापर बाण-समूहोंकी वर्षा आरम्भ कर दी। तदनन्तर वह कोलाहल सुनकर वीर प्रभद्रकगण जाग उठे। शिखण्डी भी उनके साथ हो लिया। उन सबने द्रोणपुत्रको पीड़ा देना आरम्भ किया

शिखण्डी ने निर्भय होकर तीक्ष्ण बाणों से द्रोणपुत्र अश्वत्थामा पर बाण-समूहों की वर्षा आरम्भ कर दी और उसे पीड़ा देने लगा। वह कोलाहल सुनकर वीर प्रभद्रकगण जाग उठे; शिखण्डी भी उनके साथ हो लिया, और उन सबने मिलकर द्रोणपुत्र को कष्ट देना आरम्भ किया।

Verse 506

ननाद बलवन्नादं जिघांसुस्तान्‌ महारथान्‌ । उन महारथियोंको बाणोंकी वर्षा करते देख अअश्वत्थामा उन्हें मार डालनेकी इच्छासे जोर-जोरसे गर्जना करने लगा

संजय बोले—उन महारथियों का वध करने की इच्छा से अश्वत्थामा ने बलपूर्वक गर्जना की। उन्हें रण में बाणों की वर्षा करते देख वह क्रोध से उन्मत्त होकर ऊँचे स्वर में दहाड़ उठा।

Verse 831

ततस्तच्छब्दवित्रस्ता उत्पतन्तो भयातुरा: । निद्रान्धा नष्ट्सज्ञाक्ष तत्र तत्र निलिल्यिरे

तब उस शब्द से भयभीत होकर वे घबराकर उछल पड़े। निद्रा से अन्धे और चेतना-विवेक खोए हुए वे इधर-उधर बिखरकर छिपने लगे।

Verse 916

सम॑ पर्यपतंश्वान्ये कुर्वन्तो महदाकुलम्‌ । कितने ही मलत्याग करने लगे। कितनोंके पेशाब झड़ने लगे। राजेन्द्र! दूसरे बहुत-से घोड़े और हाथी बन्धन तोड़कर एक साथ ही सब ओर दौड़ने और लोगोंको अत्यन्त व्याकुल करने लगे

संजय बोले—और लोग चारों ओर दौड़ने लगे, जिससे बड़ा कोलाहल मच गया। कितने ही मलत्याग करने लगे, कितनों का मूत्र छूट गया। राजेन्द्र! बहुत-से घोड़े और हाथी बन्धन तोड़कर एक साथ ही सब ओर दौड़ पड़े और लोगों को अत्यन्त व्याकुल करने लगे।

Verse 943

अपूरयद्‌ दिश: सर्वा दिवं चातिमहान्‌ स्वनः । राजन्‌! आनन्दमग्न हुए भूतसमुदायोंके द्वारा किया हुआ वह महान्‌ कोलाहल सम्पूर्ण दिशाओं तथा आकाशमें गूँज उठा

संजय बोले—राजन्! अत्यन्त महान् शब्द ने समस्त दिशाओं और आकाश को भर दिया। आनन्द में मग्न भूतसमुदायों द्वारा किया हुआ वह महान् कोलाहल सर्वत्र गूँज उठा।

Verse 963

अकरोच्छिबिरे तेषां रजन्यां द्विगुणं तम:ः । उन दौड़ते हुए घोड़ों और हाथियोंने अपने पैरोंसे जो धूल उड़ायी थी, उसने पाण्डवोंके शिविरमें रात्रिके अन्धकारको दुगुना कर दिया

संजय बोले—उनके शिविर में रात्रि के समय अन्धकार दुगुना हो गया। दौड़ते हुए घोड़ों और हाथियों के पैरों से उड़ी धूल ने पाण्डवों के शिविर में रात की तमिस्रा को और घना कर दिया।

Verse 973

नाजानन्‌ पितर:ः पुत्रान्‌ भ्रातृन्‌ भ्रातर एव च । वह घोर अन्धकार फैल जानेपर वहाँ सब लोगोंपर मोह छा गया। उस समय पिता पुत्रोंकी और भाई भाइयोंको नहीं पहचान पाते थे

संजय बोले—उस घोर अंधकार में सब लोगों पर मोह छा गया। पिता अपने पुत्रों को और भाई अपने ही भाइयों को पहचान नहीं पाते थे; रात के भय और भ्रम ने सबकी बुद्धि हर ली थी।

Verse 983

अताडयंस्तथाभज्जंस्तथामृदनंश्च॒ भारत । भारत! हाथी हाथियोंपर और बिना सवारके घोड़े घोड़ोंपर आक्रमण करके एक- दूसरेपर चोट करने लगे। उन्होंने अंग-भंग करके एक-दूसरेको रौंद डाला

संजय बोले—हे भारत! वे एक-दूसरे को मारते, तोड़ते और रौंदते थे। हाथी हाथियों पर टूट पड़े और बिना सवार के घोड़े घोड़ों पर झपटे; एक-दूसरे को घायल करके, अंग-भंग कर, वे पैरों तले कुचल डालते थे।

Verse 993

न्यपातयंस्तथा चान्यान्‌ पातयित्वा तदापिषन्‌ | परस्पर आघात करते हुए वे हाथी, घोड़े स्वयं भी घायल होकर गिर जाते थे तथा दूसरोंको भी गिरा देते और गिराकर उनका कचूमर निकाल देते थे

संजय बोले—वे हाथी और घोड़े परस्पर आमने-सामने टक्कर मारते थे। स्वयं भी घायल होकर गिर पड़ते और दूसरों को भी गिरा देते; और गिराकर उन्हें बुरी तरह कुचल डालते थे।

Verse 1013

प्राद्रवन्त यथाशक्ति कांदिशीका विचेतस: । द्वारपाल दरवाजोंको और तम्बूकी रक्षा करनेवाले सैनिक तम्बुओंको छोड़कर यथाशक्ति भागने लगे। वे सब-के-सब अपनी सुध-बुध खो बैठे थे और यह भी नहीं जानते थे कि “उन्हें किस दिशामें भागकर जाना है”

संजय बोले—वे सुध-बुध खोए, दिग्भ्रांत होकर, यथाशक्ति भागने लगे। द्वारपाल और तम्बुओं की रक्षा करने वाले सैनिक भी तम्बू छोड़कर दौड़ पड़े; सबके सब घबरा गए थे और यह भी नहीं जानते थे कि किस दिशा में भागें।

Verse 1023

क्रोशन्तस्तात पुत्रेति दैवोपहतचेतस: । प्रभो! वे भागे हुए सैनिक एक-दूसरेको पहचान नहीं पाते थे। दैववश उनकी बुद्धि मारी गयी थी। वे “हा तात! हा पुत्र!” कहकर अपने स्वजनोंको पुकार रहे थे

संजय बोले—दैववश जिनकी बुद्धि मारी गई थी, वे “हा तात! हा पुत्र!” कहकर चिल्लाते थे। भागदौड़ और संहार के उस कोलाहल में वे एक-दूसरे को पहचान नहीं पाते थे; विवेकहीन होकर अपने स्वजनों को करुण स्वर में पुकारते थे।

Verse 1053

शिबिरान्‌ निष्पतन्ति सम क्षत्रिया भयपीडिता: । युद्धके लिये उन्मत्त हुआ द्रोणपुत्र अश्वत्थामा उन सबको पहचान-पहचानकर मार गिराता था। बारंबार उसकी मार खाते हुए दूसरे बहुत-से क्षत्रिय भयसे पीड़ित और अचेत हो शिविरसे बाहर निकलने लगे

संजय बोले— भय से पीड़ित क्षत्रिय शिविर से बाहर भागने लगे। युद्ध के उन्माद में डूबा द्रोणपुत्र अश्वत्थामा उन्हें एक-एक कर पहचानता और मार गिराता था। उसकी मार बार-बार सहकर बहुत-से अन्य योद्धा भयाकुल होकर मूर्छित-से लड़खड़ाते हुए शिविर से बाहर निकलने लगे।

Verse 1106

अश्वत्थामा महाराज व्यचरत्‌ कृतहस्तवत्‌ | महाराज! उससे सारे शिविरमें उजाला हो गया और उस उजालेमें पिताको आनन्दित करनेवाला अभश्व॒त्थामा हाथमें खड़ग लिये एक सिद्धहस्त योद्धाकी भाँति बेखटके विचरने लगा

संजय बोले— महाराज, अश्वत्थामा सिद्धहस्त योद्धा की भाँति विचर रहा था। उसके कारण समूचा शिविर प्रकाशमान हो उठा; और उसी उजाले में, पिता को प्रसन्न करने वाला अश्वत्थामा हाथ में खड्ग लिये निडर होकर सर्वत्र घूमता रहा।

Verse 1116

व्ययोजयत खडगेन प्राणैर्द्धिजवरोत्तम: । उस समय कुछ वीर क्षत्रिय आक्रमण कर रहे थे और दूसरे पीठ दिखाकर भागे जा रहे थे। ब्राह्मणशिरोमणि अभ्वत्थामाने उन दोनों ही प्रकारके योद्धाओंको तलवारसे मारकर प्राणहीन कर दिया

संजय बोले— द्विजश्रेष्ठ अश्वत्थामा ने खड्ग से उन्हें प्राणों से वियुक्त कर दिया। उस समय कुछ शूर क्षत्रिय आक्रमण कर रहे थे और कुछ पीठ दिखाकर भाग रहे थे; उसने दोनों ही प्रकार के योद्धाओं को तलवार से काटकर निर्जीव कर दिया।

Verse 1123

अपातयद्‌ द्रोणपुत्र: संरब्धस्तिलकाण्डवत्‌ | क्रोधसे भरे हुए शक्तिशाली द्रोणपुत्रने कुछ योद्धाओंको तिलके डंठलोंकी भाँति बीचसे ही तलवारसे काट गिराया

संजय बोले— क्रोध से भरा द्रोणपुत्र कुछ योद्धाओं को खड्ग से तिल के डंठलों की भाँति बीच से ही काटकर गिरा देता था।

Verse 1143

उदतिष्ठन्‌ कबन्धानि बहुन्युत्थाय चापतन्‌ । सहसौरों मनुष्य मारे जाकर पृथ्वीपर पड़े थे। उनमेंसे बहुतेरे कबन्ध (धड़) उठकर खड़े हो जाते और पुनः गिर पड़ते थे

संजय बोले— बहुत-से कबन्ध उठ खड़े होते और उठकर फिर गिर पड़ते थे। सहस्रों मनुष्य मारे जाकर पृथ्वी पर पड़े थे; उनमें से अनेक धड़ उठते और फिर धरती पर ढह जाते थे।

Verse 1156

हस्तिहस्तोपमानूरून्‌ हस्तान्‌ पादांश्व भारत | भारत! उसने आयुधों और भुजबंदोंसहित बहुत-सी भुजाओं तथा मस्तकोंको काट डाला। हाथीकी सूँड़के समान दिखायी देनेवाली जाँघों, हाथों और पैरोंके भी टुकड़े-टुकड़े कर डाले

Sañjaya said: O Bhārata, he hewed down many arms and heads, along with their weapons and armlets. Thighs that looked like an elephant’s trunk, and hands and feet as well, he cut into pieces. The scene underscores the unchecked ferocity of night-war, where the warrior’s prowess turns into indiscriminate slaughter, pressing the ethical tension between victory and the collapse of restraint.

Verse 1163

स महात्माकरोद्‌ द्रौणि: कांश्चिच्चापि पराड्मुखान्‌ | महामनस्वी द्रोणकुमारने किन्हींकी पीठ काट डाली, किन्हींकी पसलियाँ उड़ा दीं, किन्हींके सिर उतार लिये तथा कितनोंकों उसने मार भगाया

Sañjaya said: That high-souled Aśvatthāman (Drona’s son) dealt with some who had turned their backs—cutting down the fleeing and the helpless. In the frenzy of night-slaughter he struck from behind, severing bodies and heads, driving men into rout; a grim image of war’s collapse of restraint and the ethical darkness that follows when combat turns into massacre.

Verse 1173

अंसदेशे निहत्यान्यान्‌ काये प्रावेशयच्छिर: । बहुत-से मनुष्योंको अश्वत्थामाने कटिभागसे ही काट डाला और कितनोंको कर्णहीन कर दिया। दूसरे-दूसरे योद्धाओंके कंधेपर चोट करके उनके सिरको धड़में घुसेड़ दिया

Sañjaya said: Having struck down others by blows upon the shoulder-region, he forced their severed heads back into their bodies. In that night of ruthless slaughter, Aśvatthāmā cut many men down at the waist and mutilated others, leaving them earless—an act marked not by righteous combat but by cruel, indiscriminate violence.

Verse 1183

तमसा रजनी घोरा बभौ दारुणदर्शना । इस प्रकार अनेकों मनुष्योंका संहार करता हुआ वह शिविरमें विचरण करने लगा। उस समय दारुण दिखायी देनेवाली वह रात्रि अन्धकारके कारण और भी घोर तथा भयानक प्रतीत होती थी

Sañjaya said: The night grew dreadful, made grim to behold by its thick darkness. Thus, while slaughtering many men, he moved about within the camp. At that time the night, already terrible in appearance, seemed even more fierce and terrifying because of the enveloping gloom.

Verse 1196

बहुना च गजाश्वेन भूरभूद्‌ भीमदर्शना । मरे और अधमरे सहस्रों मनुष्यों और बहुसंख्यक हाथी-घोड़ोंसे पटी हुई भूमि बड़ी डरावनी दिखायी देती थी

Sañjaya said: The ground had become terrifying to behold, strewn everywhere with countless elephants and horses, and with thousands of men—some dead, others not yet fully dead—so that the battlefield itself appeared dreadful and morally chilling in the wake of the night’s slaughter.

Verse 1443

युगान्ते सर्वभूतानि भस्म कृत्वेव पावक: । जैसे प्रलयकालमें आग सम्पूर्ण प्राणियोंको भस्म करके प्रकाशित होती है, उसी प्रकार वह नरसंहार हो जानेपर अपने दुर्गम लक्ष्यतक पहुँचकर अश्वत्थामा अधिक शोभा पाने लगा

संजय बोले—युगान्त में जैसे अग्नि समस्त प्राणियों को भस्म करके प्रज्वलित होती है, वैसे ही वह नरसंहार कर के, अपने दुर्गम लक्ष्य तक पहुँचकर, अश्वत्थामा और अधिक शोभायमान हो उठा।

Verse 1456

दुर्गमां पदवीं गच्छन्‌ पितुरासीद्‌ गतज्वर: । नरेश्वर! अपने पिताके दुर्गगन पथपर चलता हुआ द्रोणकुमार अपनी प्रतिज्ञाके अनुसार सारा कार्य पूर्ण करके शोक और चिन्तासे रहित हो गया

संजय बोले—दुर्गम पथ पर अपने पिता की ओर जाते हुए द्रोणपुत्र का ज्वर उतर गया। नरेश्वर! प्रतिज्ञा के अनुसार कार्य पूर्ण कर के वह शोक और चिन्ता से रहित हो गया।

Verse 1463

तथैव हत्वा निःशब्दे निश्चक्राम नरर्षभ: । जिस प्रकार रातके समय सबके सो जानेपर शान्त शिविरमें उसने प्रवेश किया था, उसी प्रकार वह नरश्रेष्ठ वीर सबको मारकर कोलाहलशून्य हुए शिविरसे बाहर निकला

संजय बोले—उसी प्रकार सबको मारकर वह नरश्रेष्ठ निःशब्द शिविर से बाहर निकल आया। जैसे रात में सबके सो जाने पर वह शान्त शिविर में घुसा था, वैसे ही सबको मारकर कोलाहल-शून्य हुए शिविर से निकल गया।

Verse 1473

आचर्ख्यौ कर्म तत्‌ सर्व हृष्ट: संहर्षयन्‌ विभो । प्रभो! उस शिविरसे निकलकर शक्तिशाली अअभश्वत्थामा उन दोनोंसे मिला और स्वयं हर्षमग्न हो उन दोनोंका हर्ष बढ़ाते हुए उसने अपना किया हुआ सारा कर्म उनसे कह सुनाया

संजय बोले—प्रभो! हर्षित होकर और उनका उत्साह बढ़ाते हुए उसने अपना सारा किया हुआ कर्म कह सुनाया। शिविर से निकलकर शक्तिशाली अश्वत्थामा उन दोनों से मिला; स्वयं उल्लसित होकर उसने उन दोनों का हर्ष बढ़ाया और सब वृत्तान्त कह दिया।

Verse 1486

पज्चालान्‌ सृञ्जयांश्वैव विनिकृत्तानू सहस्रश: । अश्वत्थामाका प्रिय करनेवाले उन दोनों वीरोंने भी उस समय उससे यह प्रिय समाचार निवेदन किया कि हम दोनोंने भी सहस्रों पांचालों और सूंजयोंके टुकड़े-टुकड़े कर डाले हैं

संजय बोले—हजारों पांचाल और सृञ्जय काटकर टुकड़े-टुकड़े कर दिए गए थे। तब उसे प्रिय करने वाले उन दोनों वीरों ने भी यह प्रिय समाचार कहा—कि हमने भी सहस्रों पांचालों और सृञ्जयों को काट डाला है।

Frequently Asked Questions

The chapter presents a dharma-sankat concerning whether lethal action against sleeping or unprepared opponents can be justified as retaliation, and whether personal grievance can supersede established kṣātra norms of fair encounter.

The narrative emphasizes that when restraint collapses, violence escalates beyond intended targets, producing collective suffering; it also illustrates how actors and observers invoke kāla/daiva to interpret events that exceed ordinary moral categories.

No explicit phalaśruti is stated; however, the meta-commentary appears through Sañjaya’s causal framing—especially the claim that the act depended on the absence of the Pāṇḍavas and Kṛṣṇa—positioning moral and strategic constraints as decisive narrative conditions.