Atharva Veda Anuvaka 1
Kanda 910 Suktas257 Mantras

Anuvaka 1

मुख्य विषय: ऋत/काल (ब्रह्माण्डीय व्यवस्था और समय) को गृह्य कर्मों से युक्त करके समृद्धि और यज्ञ-प्रभाव को स्थिर करना—जिससे तेज/वर्चस्, गो-धन, रक्षा और आरोग्य सुरक्षित तथा दीर्घकाल तक टिके रहें। उप-विषय: (1) वर्चस् (दीप्तिमय तेज) की स्थापना और दृढ़ीकरण। (2) काम/आकर्षण-शक्ति का अनुशासन, उसे प्रतिद्वन्द्वी-विनाशक बल में रूपान्तरित करना। (3) शाला तथा दिशाओं का अभिषेक/प्रतिष्ठा: दिशाओं और उनके देवताओं द्वारा स्थान की सुरक्षा। (4) ऋषभ (वृषभ) को केन्द्र मानकर गो-समृद्धि और प्रजनन/उर्वरता की वृद्धि। (5) बन्धु-प्रमाणन: अथर्वणीय विधान को ऋत/काल के साथ समन्वित कर कर्म-सिद्धि को पुष्ट करना।

Suktas in Anuvaka 1

Sukta 1

अथर्ववेद 9.1 एक पौष्टिक सूक्त है, जो वर्चस् (दीप्तिमय तेज) की स्थापना और स्थिरीकरण करता है, तथा समृद्धि की पारंपरिक त्रयी—संतति, प्राणबल और दीर्घायु—को भी दृढ़ करता है। इसमें अग्नि को अंतःस्थ तेज का संहर्ता/स्थापक माना गया है; आपः (जल) को स्वाधीन, बल और वर्षा के स्रोत रूप में; और इन्द्र, देवगण तथा ऋषिगण को सार्वजनिक अनुमोदक के रूप में, जिससे प्राप्तकर्ता की पहचान हो, उसे स्वीकृति मिले और वह सफल बनाया जाए।

Rishi: Atharvanic tradition (sūkta-level attribution uncertain in this excerpt) | Devata: Agni; also Indra and the collective Devas/Ṛṣis as ratifiers | 24 Mantras

Sukta 2

अथर्ववेद 9.2 एक प्रबल अथर्वणिक ‘काम’-सूक्त है, जो घृत-आहुतियों और मंत्र-प्रयोग द्वारा इच्छा/वशीकरण-शक्ति (काम) को ‘प्रशिक्षित’ करता है, ताकि वह यजमान के लिए सपत्न-हन् (प्रतिद्वन्द्वी-विनाशक) बनकर कार्य करे। इस सूक्त में बार-बार विरोधियों को अधोगति, अपमान और अन्धकार में ढकेलने, उनकी शक्ति, कर्तृत्व और सामाजिक प्रतिष्ठा छीन लेने, तथा यजमान की अजेय और अनिवार्य अभिलाषा/संकल्प को बढ़ाने का विधान है। साथ ही काम को एक सर्वग्रासी, विश्वव्यापी शक्ति के रूप में निरूपित किया गया है—स्थैर्य से, समय-सदृश पलक-झपकने से, और यहाँ तक कि समुद्र से भी महान—जिससे इस कर्मकाण्ड का दमनकारी प्रभाव अपरिहार्य प्रतीत होता है।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Angiras lineages for Kāma material) | Devata: Kāma (personified Desire/Compulsion) as rival-slayer | 25 Mantras

Sukta 3

यह सूक्त अथर्वणिक शाला–दिक्-अभिषेक-चक्र का अंग है, जिसमें नव-नापित यज्ञशाला को उसकी दिशाओं—विशेषतः दक्षिण दिशा—और उनमें निवास करने वाले तथा उनकी रक्षा करने वाले देवों को संबोधित करके सुरक्षित किया जाता है। यह स्थान को शुभ और कर्मोपयुक्त परिधि के रूप में स्थिर करता है, जहाँ अग्नि गर्भवत् विश्राम कर सके; साथ ही शत्रुतापूर्ण बन्धनों को काटता और अशुभ दिशागत प्रवेश को रोकता है। इसकी शक्ति स्थानगत और अपोत्प्रायिक है: यजुस्-सदृश मन्त्र-प्रयोग और स्वाहा-आहुतियों द्वारा वास्तु को संरक्षित याज्ञिक भूगोल में रूपान्तरित कर देती है।

Rishi: Atharvanic tradition (directional/śālā consecration series; specific ṛṣi not individually marked for each verse in many listings) | Devata: Dik (Southern Quarter) and the Devas as recipients; the quarter’s 'mahimán' personified | 31 Mantras

Sukta 4

अथर्ववेद 9.4 एक पौष्टिक सूक्त है, जो ऋषभ (वृषभ) को गो-समृद्धि, दुग्ध-प्रदाय, और यजमान के गो-समूह तथा वंश की प्रजनन-परम्परा के संकेन्द्रित स्रोत के रूप में अभिषिक्त करता है। यह बृहस्पति की पावन अधिसत्ता के अधीन गौ-प्रजनन और उर्वरता को प्रतिष्ठित करता है, तथा अनेक दैवी शक्तियों को एक ‘सुसंयोजित’ सामर्थ्य में एकत्र कर देता है, जो पशुओं के शरीर, सीमाओं और प्रतिष्ठा की रक्षा करते हुए समृद्धि को बहुगुणित करता है।

Rishi: Not specified in the provided excerpt (AV 9.4 tradition associates with cattle/prosperity themes) | Devata: Ṛṣabha / bovine prosperity under Bṛhaspati’s sacral authority | 24 Mantras

Sukta 5

अथर्ववेद 9.5 में अजा-पञ्चौदन (बकरी के साथ पाँच प्रकार का ओदन) को ‘अपरिमित’ यज्ञ कहा गया है, जिसका शरीर स्वयं समस्त ब्रह्माण्ड है; इस प्रकार वह सामान्य माप से परे यज्ञ-फल को अनेकगुणित करता है। पीड़ित/कर्म को सत्य, ऋत, श्रद्धा और विराट् के साथ एकीकृत करके यह सूक्त अर्पण को ‘सम्पूर्ण-जगत्’ का पवित्र कर्म ठहराता है, जो यजमान को ‘अपरिमित लोक’ तथा स्थायी रक्षा प्रदान करता है।

Rishi: Atharvanic/Brāhmaṇa-style anonymous (as typical for AV ritual-prose hymnic units) | Devata: Yajña (sacrifice personified) / Virāj as cosmic principle | 38 Mantras

Sukta 6

AVŚ 9.6 एक ‘बन्धु’‑सूक्त है, जो अनुष्ठान की सामग्री और क्रियाओं को उनके प्रामाणिक ब्रह्माण्डीय तथा श्रौत प्रतिरूपों से ‘सम्बद्ध’ करके दिखाता है, ताकि घरेलू/तकनीकी कर्म भी यज्ञ का वैध माध्यम बन सके। प्रत्येक उपकरण और द्रव्य (बर्हिस्, पवित्र, आपः, उपोत्पाद, लेपन/विस्तार आदि) को उसकी ‘सच्ची’ याज्ञिक पहचान देकर यह सूक्त ऋत (सही क्रम) को स्थिर करता है और कर्म को अनुष्ठानिक रूप से ‘असम्बद्ध’ होने से बचाता है। इसकी शक्ति सूक्ष्म और सटीक अभिज्ञान में है: वाणी (यजुस्‑सदृश गद्य) से आहवनीय‑क्षेत्र और उपकरण महायज्ञ में सहभागी बनते हैं।

Rishi: Uncertain from the excerpt alone (requires Anukramaṇī for AVŚ 9.6). | Devata: Ritual bandhu (sacrificial implements/acts as correlates of cosmic entities). | 17 Mantras

Sukta 7

अथर्ववेद 9.7 एक रक्षात्मक तथा समृद्धि-साधक सूक्त है, जो स्थापन-शक्ति (धातृ) और प्रेरण-शक्ति (सवितृ) को “स्थिर” करके ऐसा विधान करता है कि हानि-अपाय पलट जाए और कल्याण ऊपर उठे। इसमें अनुष्ठान-क्षेत्र को सर्वव्यापक रूप में—वायु और स्वर्गलोक तक—परिकल्पित किया गया है, और दिशा/स्थापन के सूत्रों द्वारा गौ-धन, प्राण-बल तथा गृह-लक्ष्मी को सुरक्षित किया जाता है। अंत में यह जानने वाले के लिए फलश्रुति के साथ समाप्त होता है।

Rishi: Atharvanic tradition (specific ṛṣi attribution varies by anukramaṇī for AV 9.7; requires edition-specific confirmation). | Devata: Dhātṛ and Savitar (functional deities of stabilization and impulsion). | 26 Mantras

Sukta 8

अथर्ववेद 9.8 एक व्यापक अथर्वणीय चिकित्सासूक्त है, जो रोग (रोग/तक्ष्मन् तथा यक्ष्मा-सदृश क्षयकारी व्याधियों) को देह में स्थित, व्यक्तित्व-धारी शत्रु मानकर उसका सामना करता है और उसे रोगी के शरीर से बलपूर्वक बाहर निकाल देता है। सिर और अंगों के विशेष कष्टों सहित अनेक स्थानीय तथा सर्वांग पीड़ाओं का नाम लेकर, और प्राणाधार अंगों का मानो शारीरिक ‘मानचित्रण’ करके, यह सूक्त सर्वग्रासी निष्कासन करता है—व्याधि को वाणी से उघाड़ा जाता है, मंत्रबल से बाहर खींचा जाता है, और देह-सीमा के पार हाँक दिया जाता है। अंत में उपचार को आदित्य की किरणों द्वारा होने वाली पुनर्स्थापना से जोड़ा गया है, जिससे कपाल-हृदय की व्यवस्था का पुनः एकीकरण दृढ़ होता है और अंग-विदारक पीड़ा शांत पड़ जाती है।

Rishi: Atharvanic tradition (healing seer; specific r̥ṣi not stated in the provided excerpt) | Devata: Roga/Takman complex as personified disease to be expelled (apotropaic address) | 22 Mantras

Sukta 9

अथर्ववेद 9.9 एक ब्रह्माण्डीय पहेली-स्वरूप सूक्त है, जो समृद्धि और रक्षण को ऋत/काल के अजर “चक्र” से जोड़ता है—मास, ऋतुएँ और लोकों की सुव्यवस्थित गति। इस विश्व-व्यवस्था के भीतर यज्ञीय उपस्थिती के रूप में अग्नि का आह्वान करके, यह सूक्त पाठक के जीवन—संतति, परम्परा की निरन्तरता और स्थैर्य—को संवत्सर की नियत चाल के साथ समन्वित करता है।

Rishi: Traditionally associated with cosmological seers in AV Book 9 (often Atharvanic/Angirasic attribution in ancillary lists). | Devata: Agni; and implicitly Ṛta/Time (kāla/saṃvatsara) as cosmic principle. | 22 Mantras

Sukta 10

अथर्ववेद 9.10 एक विचारात्मक-विश्वात्मक सूक्त है, जो सर्वव्यापी “गोपाः” (पालक/रक्षक) का ध्यान करता है—जो प्रत्येक पथ पर विचरता है और भीतर से लोकों को स्थिर करता है। आदिम दर्शन-दृश्यों—ब्रह्माण्डीय गति, यज्ञ-धूम, और प्रथम-प्रतिष्ठित धर्मों—का स्मरण कर यह कर्मकाण्ड-स्थल को पवित्र बनाता है तथा यजमान और समुदाय पर ऋत-रक्षण (व्यवस्था-पालक संरक्षण) की स्थापना करता है।

Rishi: Traditionally attributed within AV 9 as speculative seers (often Angiras/Atharvanic attribution in anukramaṇī traditions; exact r̥ṣi assignment depends on the AV anukramaṇī). | Devata: Gopā (cosmic guardian; interpreted as Sūrya/Brahman). | 28 Mantras

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