Atharva Veda Anuvaka 2
Kanda 210 Suktas56 Mantras

Anuvaka 2

मुख्य विषय: वैर-प्रत्यावर्तन तथा रक्षात्मक (अपोत्प्रायिक) विधियों द्वारा प्राण-शक्ति और गृह-परिसर की रक्षा। उपविषय: (1) शत्रु/प्रतिद्वन्द्वी के द्वेष का प्रत्यावर्तन (द्वेष-प्रतिप्रसव) और भ्रातृव्य का क्षय। (2) आयुष्य-प्रयोग: प्राण–अपान का स्थिरीकरण और मृत्यु (मृत्यु-देव) का निवारण। (3) रक्षोघ्न गृह-रक्षा: भूत/राक्षस तथा स्त्री-उत्पीड़क शक्तियों से संरक्षण। (4) क्षेत्र का ब्रह्माण्डीय आवरण: द्यौः–पृथिवी–अन्तरिक्ष को रक्षक सीमाओं के रूप में स्थापित करना। (5) इन्द्रियों/शक्तियों की स्थापना/पुनर्स्थापना (इन्द्रिय-सम्स्थापन)।

Suktas in Anuvaka 2

Sukta 11

अथर्ववेद 2.11 प्रतिद्वन्द्विता और वैर के लिए एक संक्षिप्त अथर्वणीय अभिचार-मंत्र है: यह शत्रुतापूर्ण द्वेष को द्वेष करने वाले पर ही पलटा देता है, और यजमान/आश्रयदाता को ‘श्रेष्ठ भाग’ (श्रेयस्) प्राप्त कराने तथा प्रतिद्वन्द्वी की सम-स्थिति से आगे बढ़ने की शक्ति देता है। पाँच अनुष्टुभ-प्रायः ऋचाओं में यह विनाशकारी शक्तियों (हानि पहुँचाने वाली प्रवृत्ति, शस्त्र, क्रोध) को नए नाम देकर लक्ष्यित करता है, फिर कर्ता/यजमान को तेज और प्रकाश से पुनः अभिषिक्त-सा करता है, यह प्रतिपादित करते हुए कि मंत्र-बल (वाक्/ब्रह्म) आक्रमण को रोक भी सकता है और श्रेष्ठ समृद्धि भी सुनिश्चित कर सकता है।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (ascribed at the hymn level in many indices; verse-level r̥ṣi not separately specified). | Devata: Dveṣa (enmity) as a hostile force to be reversed; implicitly the mantra’s own brahman-power (vac) as agent. | 5 Mantras

Sukta 12

AVŚ 2.12 एक मिश्रित-उद्देश्यीय अथर्वणिक सूक्त है, जो साधक के अनुभूत/जीवित क्षेत्र (क्षेत्र) को द्यावा–पृथिवी और अन्तरिक्ष—इन महान् ब्रह्माण्डीय आवरणों के भीतर स्थापित करता है, ताकि शत्रुजन्य पीड़ा उसी के प्रेषक पर पलटकर जा पड़े। इसमें अपोत्पादक प्रतिमंत्र-विद्या का संयोग है—तपस् द्वारा आक्रमणकारी को ‘झुलसाकर’ प्रत्याघात करना, तथा इन्द्र के द्वारा मन को हानि पहुँचाने वाले को गिरा देना—और अंत में एक पुनर्स्थापनात्मक मोड़ आता है, जहाँ अग्नि जातवेदस् पीड़ित की स्थिरता, प्राण (असु) और वाणी (वाक्) को फिर से प्रतिष्ठित करते हैं।

Rishi: Atharvanic tradition (attribution varies by anukramaṇī; commonly classed under Atharvan/Āṅgirasa protective charms) | Devata: Dyāvāpr̥thivī and Antárikṣa (cosmic regions) with Vāta as guardian; also the personified Kṣetrasya Patnī (Field’s Lady) | 8 Mantras

Sukta 13

अथर्ववेद संहिता 2.13 दीर्घायु और संरक्षण का सूक्त है, जिसमें अग्नि को ‘आयुर्दाः’ (जीवन-प्रदाता) मानकर उनसे परिपक्व वृद्धावस्था (जरस्) प्रदान करने की प्रार्थना की जाती है, और यह भी कि वे पिता की भाँति अपने बच्चों को चारों ओर से घेरकर प्राप्तकर्ता की रक्षा करें। अग्नि के पोषणकारी ‘घृत-और-मधु’ रूपक के साथ, यह सूक्त एक रक्षात्मक वस्त्र (वासः) को शापों और अनिष्ट से बचाने वाली चल-ढाल के रूप में प्रतिष्ठित करता है, जिससे गृह और पशुधन के लिए कल्याण, धन और वृद्धि सुनिश्चित हो।

Rishi: Atharvanic tradition (often transmitted under Atharvan/Āṅgiras lineages; specific r̥ṣi attribution depends on anukramaṇī tradition for AVŚ 2.13). | Devata: Agni (as āyurdāḥ—bestower of longevity and protector). | 5 Mantras

Sukta 14

AVŚ 2.14 एक रक्षोघ्न, गृह-रक्षा हेतु अपोत्प्रायिक सूक्त है, जो भूतों, राक्षसों तथा नामोल्लिखित स्त्री-पीड़क शक्तियों को घर और उसके संवेदनशील संधि-स्थानों (नींव, गोशाला, गाड़ी/धुरी) से बलपूर्वक बाहर निकालता है। इसमें इन्द्र को वज्रधारी, अचल प्रहरी के रूप में गृह पर प्रतिष्ठित किया गया है, जबकि भूतपति समस्त प्राणियों के अधिपति/नियन्ता के रूप में शत्रु-भूतों को बाहर हाँकने वाला है। सूक्त की शक्ति को पूर्ण निष्कासन के रूप में निरूपित किया गया है—आक्रान्ताओं को घरेलू सीमाओं के पार धकेलकर घर को सीलबन्द, सुरक्षित क्षेत्र बना देना।

Rishi: Atharvanic tradition (seer attribution varies by anukramaṇī for this hymn) | Devata: Indra (as rakṣas-slayer) and Bhūtapati (as overlord/controller of beings) | 6 Mantras

Sukta 15

यह संक्षिप्त अथर्ववैदिक भैषज्य–रक्षा सूक्त प्राण (जीवन-श्वास) को सीधे संबोधित करता है और उसे रोगी के भीतर स्थिर, निर्भय तथा अहिंसित बने रहने की आज्ञा देता है। रोगी के प्राण को अजेय ब्रह्माण्डीय और सामाजिक आदर्शों—अहः–रात्रि (दिन और रात), ब्रह्मन् और क्षत्र, भूत और भविष्य—के साथ समरूप करके यह आघात, घबराहट और उस घातक ‘प्राण-प्रस्थान’ का प्रतिरोध करता है जो पतन से पहले होता है। इसकी शक्ति ‘यथा… एव…’ प्रकार की पुनरुक्त, स्थापनकारी उपमा में है, जो अनुष्ठानतः प्राण को फिर से दृढ़ता और निरन्तरता में ‘स्थापित’ कर देती है।

Rishi: Atharvanic tradition (exact r̥ṣi attribution depends on anukramaṇī tradition for AVŚ 2.15) | Devata: Prāṇa (vital breath), with implicit support of Ahaḥ–Rātrī (Day and Night) as cosmic exemplars | 6 Mantras

Sukta 16

यह संक्षिप्त अथर्वणीय मंत्र एक सघन आयुष्य-रक्षा (आयुस्य) सूत्र है, जो मृत्यु (मृत्यु) के निकट आने पर प्राण और अपान—इन जीवन-वायुओं—को स्थिर करता है। स्वाहा से मुद्रित आह्वानों द्वारा जीवन-वायुओं तथा विश्व-रक्षकों (सूर्य का नेत्र, वैश्वानर अग्नि और समस्त देवगण) का आवाहन करके यह एक रक्षात्मक आवरण स्थापित करता है, जिसका उद्देश्य अकाल या हिंसक मृत्यु को दूर करना और जीवित व्यक्ति में स्थैर्य पुनः स्थापित करना है।

Rishi: Atharvanic tradition (specific ṛṣi not securely determinable from the single mantra alone in isolation). | Devata: Prāṇa and Apāna (vital breaths) as deified life-agents; apotropaic opposition to Mṛtyu. | 5 Mantras

Sukta 17

अथर्ववेद संहिता 2.17 एक संक्षिप्त अथर्वणीय “इन्द्रिय-प्रतिष्ठापन” सूक्त है, जो रोगी में प्राणधारक शक्तियों को इन्द्रिय-रूप से व्यक्त देव-शक्तियों को प्रत्यक्ष संबोधित करके पुनः स्थापित करता है। विशेषतः आयुस् (जीवन) और श्रोत्र (श्रवण) के लिए लघु स्वाहा-प्रयोगों के द्वारा यह श्रवणादि इन्द्रिय-क्षमता की पुनर्स्थापना, जीवन-शक्ति का स्थिरीकरण, तथा आगे होने वाली क्षति से रक्षा हेतु परिपाण (परिरक्षा) का विस्तार करने का लक्ष्य रखता है।

Rishi: Atharvanic tradition (specific ṛṣi attribution varies by anukramaṇī for this hymn; commonly Atharvan/Angiras-type attributions in this register). | Devata: Śrotra (Hearing) personified as an indriya-power; implicitly supported by the general indriya-deities. | 6 Mantras

Sukta 18

अथर्ववेद 2.18 एक संक्षिप्त, ‘स्वाहा’-चिह्नित कर्मसूत्रों का समूह है, जिसका लक्ष्य शत्रु प्रतिद्वन्द्वियों—विशेषतः भ्रातृव्य (प्रतिस्पर्धी समकक्ष/दावेदार) और अराय (वैरकारी शक्ति)—का क्षय (क्षयण) करना और उन्हें दूर भगाना (चातन) है। प्रत्येक मंत्र में अनुष्ठान के उपकरण/कृत्य को ही शत्रु-विनाश की शक्ति के रूप में पहचाना जाता है, और फिर उसी शक्ति से यजमान के लिए रक्षा, विजय तथा अखण्ड सुरक्षा का हस्तान्तरण माँगा जाता है। बार-बार आने वाला ‘स्वाहा’ इस जप-प्रयोग को अग्निहोत्र-स्वरूप आहुति-कर्म के रूप में बाँधता है, जिसमें मंत्र-शक्ति (ब्रह्मन्) अग्नि द्वारा वहन होकर ‘मुद्रित’/स्थापित की जाती है।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (individual r̥ṣi not specified in the provided excerpt; to be resolved via Anukramaṇī data). | Devata: Mantra as operative power (brahman); implicitly Agni as carrier due to svāhā. | 5 Mantras

Sukta 19

यह संक्षिप्त अग्नि-स्तोत्र अथर्वण परम्परा का एक सघन प्रतिचार (काउंटर-चार्म) है, जो अग्नि की अर्चिष् (ज्वाला), शोचिष् (दाहक उष्णता) और तेजस् (दीप्ति) को साधकर शत्रुतापूर्ण अभिप्राय को उसके प्रेषक पर ही प्रत्यावर्तित करता है। यह ‘प्रति-’ रूपी अनुष्ठानिक उलटाव के रूप में कार्य करता है—यजमान से द्वेष रखने वाले को दग्ध, दहाकर और निर्बल करने की कामना करता है, तथा साथ ही अग्नि की नियंत्रित शक्ति द्वारा गृहस्थ-परिवार की रक्षा करता है।

Rishi: Atharvanic tradition (specific ṛṣi attribution for this verse is not securely determinable from the single mantra alone) | Devata: Agni | 5 Mantras

Sukta 20

अथर्ववेद संहिता 2.20 एक संक्षिप्त शत्रुनाशन (अभिचारिक) सूक्त है, जिसमें वायु से प्रार्थना की जाती है कि वह अपने ही तपस्, शोचिष् (दहकती ज्वाला) और तेजस् का प्रयोग करके शत्रु की वैर-भावना को उलट दे और द्वेष करने वाले पर दण्डात्मक प्रत्यावर्तन करे। बार-बार आने वाला पद “यो ’स्मान् द्वेष्टि यं वयं द्विष्मः” इस कर्म को प्रतिशोधात्मक उलटाव के रूप में बाँधता है—विरोधी का द्वेष वायु की दाहक शक्ति से प्रत्युत्तर पाता है और उसकी शत्रुत्व-शक्ति/प्रभाव को छीन लिया जाता है।

Rishi: Atharvanic/Angirasa tradition (enemy-destroying hymns are typically attributed to Atharvan/Angiras lineages; specific r̥ṣi attribution depends on the Anukramaṇī). | Devata: Vāyu (as bearer of tapas/tejas used for punitive reversal) | 5 Mantras

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