Atharva Veda Anuvaka 1
Kanda 134 Suktas145 Mantras

Anuvaka 1

मुख्य विषय: रोहित–सूर्य को विश्व-सम्राट के रूप में—सौर सृष्टि-कल्पना का राजसत्ता, संरक्षण और दण्ड-न्याय के साथ एकीकरण। उपविषय: (1) विश्व-व्यवस्था: द्यावा-पृथिवी की स्थापना और ऋत का धारण-पोषण। (2) राजधर्म/राज-आदर्श: विजय, गो-धन, वैधता और सर्वोच्चता। (3) अपोत्प्रायिक सौर तेज: रात्रि-जन्य संकटों का निवारण। (4) ब्राह्मण-रक्षा और पवित्र विधि: विद्वानों को हानि पहुँचाने पर दण्ड। (5) एक ही परम शक्ति की अनेक देवताओं (अग्नि, सूर्य, यम आदि) से तादात्म्य-भावना।

Suktas in Anuvaka 1

Sukta 1

अथर्ववेद 13.1 रोहित का एक भव्य स्तोत्र है, जो सृष्टि-उत्पत्ति (कोस्मोगोनी) को राज-धर्म/राजसत्ता की विचारधारा से जोड़ता है। अरुण-रक्तिम सौर-शक्ति रोहित की स्तुति उस धुरी के रूप में की गई है जिस पर द्यावा-पृथिवी प्रतिष्ठित हैं, और उसे विजय, धन, पशु तथा संचित लाभ का स्रोत कहा गया है। रोहित के अनेक ‘जन्मों’ तथा जगत् की नाभि और स्थिरकर्ता के रूप में उसकी भूमिका का वर्णन करके यह सूक्त यजमान/राजा की केन्द्रीयता को पवित्र ठहराता है, जिससे प्रभुत्व मानवीय व्यवस्था नहीं, बल्कि एक ब्रह्माण्डीय तथ्य के रूप में प्रकट होता है।

Rishi: Traditionally connected with Atharvanic seers of the Rohita cycle (Aṅgiras/Atharvan milieu; hymn-level attribution varies by anukramaṇī tradition) | Devata: Rohita (solar/royal power; cosmic support) | 60 Mantras

Sukta 2

अथर्ववेद 13.2 एक सूर्य-सूक्त है, जो सूर्य की सर्वदर्शी प्रभा को उपचारक और रक्षक शक्ति के रूप में प्रतिष्ठित करता है। जो कुछ रात्रि में छिपता है—रोग-कारक, चोर, और शत्रु-प्रेरित अभिचार—वह अन्धकार के हटते ही दूर भगाया जाता है। यह सूक्त सूर्य/आदित्य की ‘महिमा’ का भी स्तवन करता है, ताकि दिन-रात के नियमित ब्रह्माण्डीय परिक्रमण द्वारा प्राण-बल, सामाजिक प्रतिष्ठा और मंगलमय ऋत-व्यवस्था स्थिर बनी रहे।

Rishi: Traditionally ascribed within the Sūrya-cycle of AV 13; seer attribution varies by anukramaṇī tradition. | Devata: Sūrya (Viśvacakṣas, the All-seeing Sun) | 46 Mantras

Sukta 3

अथर्ववेद 13.3 एक दण्डात्मक-रक्षात्मक सूक्त है, जो विद्वान् ब्राह्मण को पहुँचाई गई हानि को क्रुद्ध स्रष्टा-सूर्य-सत्ता के विरुद्ध एक ब्रह्माण्डीय अपराध के रूप में प्रस्तुत करता है और प्रतिशोध के निष्पादन हेतु रोहित को आह्वान करता है। बार-बार लौटने वाले पदों (“उसे काँपने दे… उसे क्षीण कर दे… फन्दों को ढीला/छोड़ दे”) के माध्यम से यह विश्व-आवरण, काल-चक्र और सर्वव्यापी पग जैसे ब्रह्माण्डीय प्रभुत्व को विधि-यज्ञीय दण्ड-व्यवस्था में रूपान्तरित करता है, जो ब्रह्म-शक्ति को आहत करने वाले को बाँधकर क्षीण करता है।

Rishi: Atharvanic/Angiras-type attribution (book-level tradition; specific r̥ṣi varies by anukramaṇī) | Devata: Rohita (as punitive solar/royal power) together with the wrathful cosmic creator (Prajāpati/Āditya-like overlord) | 26 Mantras

Sukta 4

AVŚ 13.4 ब्रह्माण्डीय सार्वभौमत्व की एक लितानी है, जो एक ही सर्वव्यापक शक्ति की पहचान अनेक देवताओं—अग्नि, सूर्य, यम, महेन्द्र (इन्द्र) तथा आर्यमन्, वरुण, रुद्र, महादेव आदि सहचर रूपों—से कराती है। किरणों और आकाश का बार-बार आने वाला ध्रुवक इस देवता को घेरने वाली, स्थिर करने वाली उपस्थिति के रूप में रचता है, जो द्युलोक को भरकर—और उसी के विस्तार से—राज्य को भी सुरक्षित करता है: समृद्धि, ऋत/व्यवस्था, और शत्रु शक्तियों से रक्षा। सूक्त का प्रभाव सर्वग्राही तादात्म्य (“वह ही है…”) और आवरण-कल्पना (किरणें मानो बन्ध/पट्टियाँ) में निहित है, जिससे राजकीय-आकाशीय अपोत्प्रायिक कवच निर्मित होता है।

Rishi: Atharvanic tradition (specific r̥ṣi attribution varies by anukramaṇī for this section; commonly treated as anonymous/collective in late books) | Devata: Composite sovereignty: Agni–Sūrya–Yama–Mahendra (Indra) as a single power | 13 Mantras

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