
अध्याय १६ — शङ्कर-उमा-वरदानम् तथा तण्डि-स्तुतिः (Śaṅkara–Umā Boon-Granting and Taṇḍi’s Hymn)
Upa-parva: Śiva-stuti and Vara-pradāna (Śarva/Īśāna praise and boon-bestowal episode)
Chapter 16 presents a composite devotional narrative framed as Vāsudeva-Kṛṣṇa’s speech. It opens with Kṛṣṇa’s prostration and petition for qualities and prosperities—steadfastness in dharma, victory in conflict, eminent fame, strength, affinity for yoga, closeness to the deity, and abundant progeny—followed by Śaṅkara’s assent. Umā (Śarvāṇī) then grants additional boons, including the birth of Sāmba and further social goods (non-anger among dvijas, parental favor, lineage harmony, calmness, competence), along with statements about marital abundance and enduring affection. The narrative transitions to a report addressed to Upamanyu, culminating in a panegyric: a ṛṣi named Taṇḍi performs long austerities, beholds Mahādeva, and praises him as the supreme principle underlying time, gods, elements, guṇas, and the paths of sacrifice, asceticism, renunciation, and knowledge. The hymn articulates a monistic-theological synthesis (Śiva as source, support, and dissolution of all), asserts liberation through knowing him, and enumerates multiple ‘gatis’ (destinations) obtainable only by divine grace. The chapter closes with Śiva granting Taṇḍi a boon (firm devotion), the ṛṣi’s later transmission of the account, and the introduction of secret names of Śarva said to be vast in the Vedas and condensed in śāstric lists.
Chapter Arc: उपमन्यु शिष्य-भाव से कथा का द्वार खोलते हैं—सत्ययुग के ऋषि तण्डि ने कठोर तप से महादेव को प्रसन्न किया और स्तुतियों द्वारा उस दुर्विद्य परमात्मा का साक्षात्कार किया। → तण्डि की स्तुति शिव को ‘आत्मदेहस्थ’—सबके भीतर स्थित, देवताओं के लिए भी दुर्जेय—रूप में पहचानती हुई गहराती जाती है; वह बताता है कि अनेक जन्मों के प्रयत्नों से उसे साक्षात् भक्ति-जन्य अनुभूति मिली है, और उसी भक्ति से अमृत-तत्त्व का ज्ञान होता है। → महादेव का विराट-कालस्वरूप उद्घाटित होता है—रात-दिन उनके नेत्र-कर्ण, पक्ष-मास उनके अंग, और मृत्यु-यम-अग्नि तथा संहार-वेगवान काल उनके ही रूप; वे काल के भी परम कारण और सनातन क्षय हैं—यह ब्रह्माण्ड-देह का दर्शन अध्याय की चरम ऊँचाई बनता है। → स्तुति वेद-मार्ग से स्थिर होती है—ऋग, यजुः आदि वेदज्ञ यज्ञ में जिनकी महिमा गाते हैं; पितृयान-देवयान के द्वार, दिशाएँ, संवत्सर-युग आदि सब उन्हीं में प्रतिष्ठित बताए जाते हैं, और निष्कर्ष यह कि भक्तानुग्रहकारी देव को जानकर अमृतत्व की ओर गति होती है। → उपमन्यु की वाणी संकेत देती है कि इस स्तुति-परंपरा का फल केवल दर्शन नहीं—वरदान/अनुग्रह की अगली कड़ी में शिव-भक्ति का प्रत्यक्ष प्रतिफल प्रकट होने वाला है।
Verse 1
/ अपन बछ। है २ >> - यहाँ श्रीकृष्णके माँगे हुए आठ वरोंको एवं 'भविष्यति' इस वाक्यके द्वारा देनेके पश्चात् पार्वतीजी अपनी ओरसे आठ वर और देती हैं। इनमें 'अमरप्रभाव” इस सम्बोधनके द्वारा देवोपम प्रभावका दान ही पहला वरदान सूचित किया गया है। “मैं कभी झूठ नहीं बोलती” इस कथनके द्वारा “तुम भी कभी झूठ नहीं बोलोगे” यह दूसरा वर सूचित होता है। सोलह हजार रानियोंके प्राप्त होनेका वर तीसरा है। उनका प्रिय होना चौथा वर है। अक्षय धनधान्यकी प्राप्ति पाँचवाँ वर है। बान्धवोंकी प्रीति छठा, शरीरकी कमनीयता सातवाँ और सात हजार अतिथियोंका भोजन आठवाँ वर है। इससे पहले जो सोलह और आठ वरके प्राप्त होनेकी बात कही गयी थी, उसकी संगति लग जाती है। घोडशो< ध्याय: उपमन्यु-श्रीकृष्ण-संवाद--महात्मा तण्डिद्वारा की गयी महादेवजीकी स्तुति, प्रार्थना और उसका फल उपमन्युरुवाच ऋषिरासीत् कृते तात तण्डिरित्येव विश्रुत: । दशवर्षसहस्राणि तेन देव: समाधिना,उपमन्यु कहते हैं--तात! सत्ययुगमें तण्डि नामसे विख्यात एक ऋषि थे जिन्होंने भक्तिभावसे ध्यानके द्वारा दस हजार वर्षोतक महादेवजीकी आराधना की थी। उन्हें जो फल प्राप्त हुआ था, उसे बता रहा हूँ, सुनिये। उन्होंने महादेवजीका दर्शन किया और स्तोत्रोंद्वारा उन प्रभुकी स्तुति की
ઉપમન્યુએ કહ્યું—તાત! કૃતયુગમાં તંડિ નામે પ્રસિદ્ધ એક ઋષિ હતા. તેમણે ભક્તિભાવથી સમાધિમાં સ્થિત રહી દસ હજાર વર્ષો સુધી દેવ મહાદેવની આરાધના કરી. તેમને જે ફળ પ્રાપ્ત થયું, તે હું કહું છું—સાંભળો.
Verse 2
आराधितो<भूद् भक्तेन तस्योदर्क निशामय । स दृष्टवान् महादेवमस्तौषीच्च स्तवैर्विभुम्,उपमन्यु कहते हैं--तात! सत्ययुगमें तण्डि नामसे विख्यात एक ऋषि थे जिन्होंने भक्तिभावसे ध्यानके द्वारा दस हजार वर्षोतक महादेवजीकी आराधना की थी। उन्हें जो फल प्राप्त हुआ था, उसे बता रहा हूँ, सुनिये। उन्होंने महादेवजीका दर्शन किया और स्तोत्रोंद्वारा उन प्रभुकी स्तुति की
વાયુ બોલ્યા—આ ભક્તિનું ફળ સાંભળો. ભક્તે શ્રદ્ધાપૂર્વક આરાધના કરતાં પ્રભુએ તેનું ફળ આપ્યું; તેણે મહાદેવનું દર્શન કર્યું અને સ્તોત્રોથી તે સર્વવ્યાપી વિભુની સ્તુતિ કરી.
Verse 3
इति तण्डिस्तपोयोगात् परमात्मानमव्ययम् | चिन्तयित्वा महात्मानमिदमाह सुविस्मित:,इस तरह तण्डिने तपस्यामें संलग्न होकर अविनाशी परमात्मा महामना शिवका चिन्तन करके अत्यन्त विस्मित हो इस प्रकार कहा था--
આ રીતે તપ અને યોગમાં લીન તંડિએ અવિનાશી પરમાત્મા, મહાત્મા શિવનું ચિંતન કર્યું અને અત્યંત વિસ્મિત થઈને આ વચનો કહ્યા.
Verse 4
यं पठन्ति सदा सांख्याश्षिन्तयन्ति च योगिन: । परं प्रधानं पुरुषमधिष्ठातारमी श्वरम्,'सांख्यशास्त्रके विद्वान् पर, प्रधान, पुरुष, अधिष्ठाता और ईश्वर कहकर सदा जिनका गुणगान करते हैं, योगीजन जिनके चिन्तनमें लगे रहते हैं, विद्वान् पुरुष जिन्हें जगत्की उत्पत्ति और विनाशका कारण समझते हैं, देवताओं, असुरों और मुनियोंमें भी जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है, उन अजन्मा, अनादि, अनन्त, अनघ और अत्यन्त सुखी, प्रभावशाली ईश्वर महादेवजीकी मैं शरण लेता हूँ
જેનાં સાંખ્યના ઋષિઓ સદા પાઠ અને સ્તુતિ કરે છે અને યોગીઓ સતત ધ્યાન કરે છે—જેનાંને તેઓ પરમ, પ્રધાન, પુરુષ, અધિષ્ઠાતા અને ઈશ્વર કહે છે—તે પરમ પ્રભુને હું શરણ જાઉં છું.
Verse 5
उत्पत्तौ च विनाशे च कारण य॑ विदुर्बुधा: । देवासुरमुनीनां च परं यस्मान्न विद्यते,'सांख्यशास्त्रके विद्वान् पर, प्रधान, पुरुष, अधिष्ठाता और ईश्वर कहकर सदा जिनका गुणगान करते हैं, योगीजन जिनके चिन्तनमें लगे रहते हैं, विद्वान् पुरुष जिन्हें जगत्की उत्पत्ति और विनाशका कारण समझते हैं, देवताओं, असुरों और मुनियोंमें भी जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है, उन अजन्मा, अनादि, अनन्त, अनघ और अत्यन्त सुखी, प्रभावशाली ईश्वर महादेवजीकी मैं शरण लेता हूँ
જેનાંને બુદ્ધિમાનો જગતની ઉત્પત્તિ અને વિનાશનું કારણ જાણે છે, અને જેમનાથી શ્રેષ્ઠ દેવો, અસુરો અને મુનિઓમાં પણ કોઈ નથી—તે પરમ પ્રભુને હું શરણ જાઉં છું.
Verse 6
अजं तमहमीशानमनादिनिधन प्रभुम् अत्यन्तसुखिनं देवमनघं शरणं व्रजे,'सांख्यशास्त्रके विद्वान् पर, प्रधान, पुरुष, अधिष्ठाता और ईश्वर कहकर सदा जिनका गुणगान करते हैं, योगीजन जिनके चिन्तनमें लगे रहते हैं, विद्वान् पुरुष जिन्हें जगत्की उत्पत्ति और विनाशका कारण समझते हैं, देवताओं, असुरों और मुनियोंमें भी जिनसे श्रेष्ठ दूसरा कोई नहीं है, उन अजन्मा, अनादि, अनन्त, अनघ और अत्यन्त सुखी, प्रभावशाली ईश्वर महादेवजीकी मैं शरण लेता हूँ
હું તે અજન્મા ઈશાનને શરણ જાઉં છું—જે અનાદિ અને અનંત પ્રભુ છે, પરમાનંદમય, દિવ્ય અને નિષ્કલંક.
Verse 7
एवं ब्रुवन्नेव तदा ददर्श तपसां निधिम् । तमव्ययमनौपम्यमचिन्त्यं शाश्वतं ध्रुवम्,इतना कहते ही तण्डिने उन तपोनिधि, अविकारी, अनुपम, अचिन्त्य, शाश्वत, ध्रुव, निष्कल, सकल, निर्गुण एवं सगुण ब्रह्मका दर्शन प्राप्त किया, जो योगियोंके परमानन्द, अविनाशी एवं मोक्षस्वरूप हैं
એવું બોલતાં બોલતાં જ તેણે તપસ્યાનો તે નિધિ પ્રત્યક્ષ જોયો—અવ્યય, અનુપમ, અચિંત્ય, શાશ્વત અને ધ્રુવ એવા બ્રહ્મનું દર્શન થયું; જે યોગીઓનું પરમાનંદ, અક્ષર તત્ત્વ અને સ્વયં મોક્ષસ્વરૂપ છે।
Verse 8
निष्कलं सकल ब्रह्म निर्गुणं गुणणोचरम् । योगिनां परमानन्दमक्षरं मोक्षसंज्ञितम्,इतना कहते ही तण्डिने उन तपोनिधि, अविकारी, अनुपम, अचिन्त्य, शाश्वत, ध्रुव, निष्कल, सकल, निर्गुण एवं सगुण ब्रह्मका दर्शन प्राप्त किया, जो योगियोंके परमानन्द, अविनाशी एवं मोक्षस्वरूप हैं
વાયુદેવે કહ્યું—“એ બ્રહ્મ નિષ્કલ પણ છે અને સકલ પણ; નિર્ગુણ હોવા છતાં ગુણોના દ્વારા અનુભૂતિગમ્ય છે. યોગીઓ માટે એ જ પરમાનંદ—અક્ષર, અને ‘મોક્ષ’ નામે પ્રસિદ્ધ।” આ શબ્દો ઉચ્ચારાતા જ તપોનિધિ તંડિનને તે અવ્યય, અનુપમ, અચિંત્ય, શાશ્વત, ધ્રુવ તત્ત્વનું સાક્ષાત્ દર્શન થયું।
Verse 9
मनोरिन्द्राग्निमरुतां विश्वस्य ब्रह्मणो गतिम् । अग्राह्ममचलं शुद्ध बुद्धिग्राह्मा मनोमयम्,वे ही मनु, इन्द्र, अग्नि, मरुद्गण, सम्पूर्ण विश्व तथा ब्रह्माजीकी भी गति हैं। मन और इन्द्रियोंके द्वारा उनका ग्रहण नहीं हो सकता। वे अग्राह्यु, अचल, शुद्ध, बुद्धिके द्वारा अनुभव करने योग्य तथा मनोमय हैं
વાયુએ કહ્યું—“મન, ઇન્દ્ર, અગ્નિ અને મરુદ્ગણ—અથવા સમગ્ર વિશ્વ અને બ્રહ્માજીની પણ—ગતિ અને પરમ ગંતવ્ય તે જ છે. પરંતુ મન અને ઇન્દ્રિયોથી તેઓ ગ્રહણ થતા નથી. તેઓ અગ્રાહ્ય, અચલ, શુદ્ધ છે; જાગૃત બુદ્ધિથી અનુભૂતિગમ્ય અને મનના આંતરિક સારરૂપે સ્થિત છે.”
Verse 10
दुर्विज्ञेगमसंख्येयं दुष्प्रपमकृतात्मभि: । योनिं विश्वस्थ जगतस्तमस: परत: परम्,उनका ज्ञान होना अत्यन्त कठिन है। वे अप्रमेय हैं। जिन्होंने अपने अन्त:ः:करणको पवित्र एवं वशीभूत नहीं किया है, उनके लिये वे सर्वथा दुर्लभ हैं। वे ही सम्पूर्ण जगत्के कारण हैं। अज्ञानमय अन्धकारसे अत्यन्त परे हैं
વાયુએ કહ્યું—“તેમને જાણવું અતિ કઠિન છે; તેઓ અસંખ્ય, અપ્રમેય છે. જેમણે આત્માને વશમાં કરી શુદ્ધ નથી કર્યો, તેમના માટે તેઓ દુષ્પ્રાપ્ય છે. તેઓ જ સમગ્ર જગતની યોનિ—કારણ—છે અને અજ્ઞાનના તમસથી પણ પરે, પરાત્પર છે।”
Verse 11
यः प्राणवन्तमात्मानं ज्योतिर्जीवस्थितं मन: । त॑ देवं दर्शनाकाड्क्षी बहून् वर्षमणानूषि:
વાયુએ કહ્યું—“જે પોતાના અંદર પ્રાણવંત આત્માને—જીવંત જ્યોતિમાં સ્થિત મનને—ઓળખે છે, તે તે દૈવ તત્ત્વના દર્શનની આકાંક્ષા રાખે છે; અને એ આકાંક્ષાના આધારથી તે ઘણા વર્ષો સુધી સ્થિર રહે છે।”
Verse 12
तण्डिस्वाच पवित्राणां पवित्रस्त्वं गतिर्गतिमतां वर
તંડીએ કહ્યું—હે ગતિમાનોમાં શ્રેષ્ઠ! તમે પવિત્રોમાં પણ પરમ પવિત્ર છો અને સન્માર્ગ શોધનારાઓ માટે પરમ આશ્રય તથા સર્વોચ્ચ ગતિ છો.
Verse 13
अत्युग्रं तेजसां तेजस्तपसां परमं तप: । तण्डिने कहा--सर्वश्रेष्ठ परमेश्वर! आप पवित्रोंमें भी परम पवित्र तथा गतिशील प्राणियोंकी उत्तम गति हैं। तेजोंमें अत्यन्त उग्र तेज और तपस्याओंमें उत्कृष्ट तप हैं ।। १२ ई || विश्वावसुहिरण्याक्षपुरुहूतनमस्कृत
તંડીએ કહ્યું—હે સર્વશ્રેષ્ઠ પરમેશ્વર! તમે પવિત્રોમાં પણ પરમ પવિત્ર છો અને ગતિમાન પ્રાણીઓની ઉત્તમ ગતિ છો. તેજોમાં તમે અત્યંત ઉગ્ર તેજ છો અને તપોમાં પરમ તપ છો.
Verse 14
जातीमरणभीरूणां यतीनां यततां विभो
હે વિભો! જન્મ-મરણના ચક્રથી ભયભીત થઈ મુક્તિ માટે સંયમપૂર્વક પ્રયત્ન કરનાર યતિઓ વિષે આ કહેવાયું છે.
Verse 15
ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षय:,ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, विश्वेदेव तथा महर्षि भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं। फिर हम कैसे जान सकते हैं। आपसे ही सबकी उत्पत्ति होती है तथा आपमें ही यह सारा जगत् प्रतिष्ठित है
વાયુએ કહ્યું—બ્રહ્મા, શતક્રતુ (ઇન્દ્ર), વિષ્ણુ, વિશ્વેદેવો અને મહર્ષિઓ પણ તમને યથાર્થરૂપે જાણતા નથી; તો અમે કેવી રીતે જાણી શકીએ? તમારાથી જ સર્વની ઉત્પત્તિ થાય છે અને તમામાં જ આ સમગ્ર જગત્ પ્રતિષ્ઠિત છે.
Verse 16
न विदुस्त्वां तु तत्त्वेन कुतो वेत्स्यामहे वयम् । त्वत्त: प्रवर्तते सर्व त्वयि सर्व प्रतिष्ठितम्,ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, विश्वेदेव तथा महर्षि भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं। फिर हम कैसे जान सकते हैं। आपसे ही सबकी उत्पत्ति होती है तथा आपमें ही यह सारा जगत् प्रतिष्ठित है इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि मेघवाहनपवख्याने षोडशो<ध्याय:
વાયુએ કહ્યું—તેઓ પણ તમને તત્ત્વરૂપે જાણતા નથી; તો અમે કેવી રીતે જાણી શકીએ? તમારાથી જ સર્વ પ્રવર્તે છે અને તમામાં જ સર્વ પ્રતિષ્ઠિત છે—બ્રહ્મા, વિષ્ણુ, ઇન્દ્ર, વિશ્વેદેવો અને મહર્ષિઓ પણ.
Verse 17
कालाख्य: पुरुषाख्यश्ष ब्रह्माख्यश्न त्वमेव हि । तनवस्ते स्मृतास्तिस््र: पुराणज्ञै: सुर्िभि:,काल, पुरुष और ब्रह्म--इन तीन नामोंद्वारा आप ही प्रतिपादित होते हैं। पुराणवेत्ता देवर्षियोंने आपके ये तीन रूप बताये हैं
વાયુએ કહ્યું—કાળ, પુરુષ અને બ્રહ્મ—આ ત્રણ નામોથી ખરેખર તમે જ પ્રતિપાદિત થાઓ છો. પુરાણજ્ઞ દેવર્ષિઓએ તમારા આ ત્રણ સ્વરૂપો જાહેર કર્યા છે.
Verse 18
अधिपौरुषमध्यात्ममधि भूताधिदैवतम् । अधिलोकाधिविज्ञानमधियज्ञस्त्वमेव हि,अधिपौरुष, अध्यात्म, अधिभूत, अधिदैवत, अधिलोक, अधिविज्ञान और अधियज्ञ आप ही हैं
વાયુએ કહ્યું—અધિપૌરુષ, અધ્યાત્મ, અધિભૂત, અધિદૈવત, અધિલોક, અધિવિજ્ઞાન અને અધિયજ્ઞ—આ બધું તમે જ છો.
Verse 19
त्वां विदित्वात्मदेहस्थं दुर्विदं दैवतैरपि । विद्वांसो यान्ति निर्मुक्ता: परं भावमनामयम्,आप देवताओंके लिये भी दुर्ज्ेय हैं। विद्वान् पुछण आपको अपने ही शरीरमें स्थित अन्तर्यामी आत्माके रूपमें जानकर संसार-बन्धनसे मुक्त हो रोग-शोकसे रहित परमभावको प्राप्त होते हैं
દેવતાઓ માટે પણ તમે દુર્વિજ્ઞેય છો. પરંતુ વિદ્વાનો તમને પોતાના જ શરીરમાં સ્થિત અંતર્યામી આત્મા રૂપે જાણી સંસારબંધનથી મુક્ત થઈ રોગ-શોક રહિત પરમ ભાવને પ્રાપ્ત કરે છે.
Verse 20
अनिच्छतस्तव विभो जन्ममृत्युरनेकत: । द्वारं तु स्वर्गमोक्षाणामाक्षेप्ता त्वं ददासि च,प्रभो! यदि आप स्वयं ही कृपा करके जीवका उद्धार करना न चाहें तो उसके बारंबार जन्म और मृत्यु होते रहते हैं। आप ही स्वर्ग और मोक्षके द्वार हैं। आप ही उनकी प्राप्तिमें बाधा डालनेवाले हैं तथा आप ही ये दोनों वस्तुएँ प्रदान करते हैं
વાયુએ કહ્યું—હે વિભો! જો તમે કૃપા કરવા ઇચ્છો નહીં તો જીવ અનેક રીતે વારંવાર જન્મ-મૃત્યુ ભોગવે છે. સ્વર્ગ અને મોક્ષના દ્વાર તમે જ છો; તેમની પ્રાપ્તિમાં અવરોધક પણ તમે જ અને દાતા પણ તમે જ છો.
Verse 21
आप ही स्वर्ग और मोक्ष हैं। आप ही काम और क्रोध हैं तथा आप ही सत्त्व, रज, तम, अधोलोक और ऊर्ध्वलोक हैं
તમે જ સ્વર્ગ અને મોક્ષ છો. તમે જ કામ અને ક્રોધ છો; તેમજ તમે જ સત્ત્વ, રજ, તમ અને અધોલોક તથા ઊર્ધ્વલોક છો.
Verse 22
ब्रह्मा भवश्व विष्णुश्न स्कन्देन्द्री सविता यम: । वरुणेन्दू मनुर्धाता विधाता त्वं धनेश्वर:,ब्रह्मा, विष्णु, शिव, स्कन्द, इन्द्र, सूर्य, यम, वरुण, चन्द्रमा, मनु, धाता, विधाता और धनाध्यक्ष कुबेर भी आप ही हैं
વાયુએ કહ્યું— તમે જ બ્રહ્મા, ભવ (શિવ) અને વિષ્ણુ છો; તમે જ સ્કંદ, ઇન્દ્ર, સવિતા (સૂર્ય) અને યમ છો. તમે જ વરુણ, ચંદ્ર, મનુ, ધાતા અને વિધાતા છો; અને તમે જ ધનાધિપતિ કુબેર છો.
Verse 23
त्वं वै स्वर्गश्न मोक्षक्ष॒ काम: क्रोधस्त्वमेव च । सत्त्वं रजस्तमश्नैव अधश्चोर्थ्व त्वमेव हि,भूर्वायु: सलिलान्निश्च खं बाग्बुद्धि: स्थितिर्मति: । कर्म सत्यानृते चोभे त्वमेवास्ति च नास्ति च पृथ्वी, वायु, जल, अग्नि, आकाश, वाणी, बुद्धि, स्थिति, मति, कर्म, सत्य, असत्य तथा अस्ति और नास्ति भी आप ही हैं
વાયુદેવે કહ્યું— તમે જ સ્વર્ગ અને તમે જ મોક્ષ; તમે જ કામ અને તમે જ ક્રોધ. તમે જ સત્ત્વ, રજ અને તમ—ત્રણે ગુણ; અને ઊર્ધ્વ તથા અધઃ—બંને અવસ્થાઓ પણ તમે જ. પૃથ્વી, વાયુ, જળ, અગ્નિ અને આકાશ; વાણી, બુદ્ધિ, સ્થિરતા અને મતિ; કર્મ, સત્ય અને અસત્ય—આ બધું તમે જ; અને ‘અસ્તિ’ તથા ‘નાસ્તિ’ પણ તમે જ.
Verse 24
इन्द्रियाणीन्द्रियार्थाश्व॒ प्रकृतिभ्य: परं ध्रुवम् । विश्वाविश्वपरोभावद्चिन्त्याचिन्त्यस्त्वमेव हि,आप ही इन्द्रियाँ और इन्द्रियोंक विषय हैं। आप ही प्रकृतिसे परे निश्चल एवं अविनाशी तत्त्व हैं। आप ही विश्व और अविश्व--दोनोंसे परे विलक्षण भाव हैं तथा आप ही चिन्त्य और अचिन्त्य हैं
વાયુએ કહ્યું— તમે જ ઇન્દ્રિયો અને ઇન્દ્રિયોના વિષયો પણ. તમે જ પ્રકૃતિથી પરે ધ્રુવ, અવિનાશી તત્ત્વ. તમે જ વિશ્વ અને અવિશ્વ—બંનેથી પરે તે વિશિષ્ટ ભાવ; અને તમે જ ચિંત્ય તથા અચિંત્ય છો.
Verse 25
यच्चैतत् परमं ब्रह्म यच्च तत् परमं पदम् । या गति: सांख्ययोगानां स भवान् नात्र संशय:,जो यह परम ब्रह्म है, जो वह परमपद है तथा जो सांख्यवेत्ताओं और योगियोंकी गति है, वह आप ही हैं--इसमें संशय नहीं है
વાયુદેવે કહ્યું— જે પરમ બ્રહ્મ છે, જે પરમ પદ છે, અને સાંખ્યજ્ઞો તથા યોગીઓની ગતિ (લક્ષ્ય) જે છે—તે તમે જ છો; તેમાં કોઈ સંશય નથી.
Verse 26
नूनमद्य कृतार्था: सम नून॑ प्राप्ता: सतां गतिम् । यां गतिं प्रार्थयन्तीह ज्ञाननिर्मलबुद्धयः,ज्ञानसे निर्मल बुद्धिवाले ज्ञानी पुरुष यहाँ जिस गतिको प्राप्त करना चाहते हैं, सत्पुरुषोंकी उसी गतिको निश्चित रूपसे हम प्राप्त हो गये हैं; अतः आज हम निश्चय ही कृतार्थ हो गये
વાયુએ કહ્યું— નિશ્ચયે આજે અમે કૃતાર્થ થયા; નિશ્ચયે સજ્જનોની તે ગતિ અમે પ્રાપ્ત કરી. જ્ઞાનથી નિર્મળ બુદ્ધિવાળા જ્ઞાની પુરુષો અહીં જે ગતિની પ્રાર્થના કરે છે, એ જ ગતિ અમે નિશ્ચિતરૂપે મેળવી; તેથી આજે અમે ખરેખર સિદ્ધ થયા.
Verse 27
अहो मूढा: सम सुचिरमिमं कालमचेतसा । यन्न विद्य: परं देवं शाश्व॒तं यं विदुर्बुधा:,अहो, हम अज्ञानवश इतने दीर्घकालतक मोहमें पड़े रहे हैं, क्योंकि जिन्हें विद्वान् पुरुष जानते हैं, उन्हीं सनातन परमदेवको हम अबतक नहीं जान सके थे
વાયુ બોલ્યા—અહો! અમે કેટલા મોહગ્રસ્ત રહ્યા; એટલો દીર્ઘ સમય અચેત રહ્યા! જેને બુદ્ધિમાન પુરુષો જાણે છે, તે શાશ્વત પરમદેવને અમે ઓળખી ન શક્યા.
Verse 28
सेयमासादिता साक्षात् त्वद्धक्तिजन्मभिमया । भक्तानुग्रहकृद् देवो य॑ ज्ञात्वामृतमश्लुते,अब अनेक जन्मोंके प्रयत्नसे मैंने यह साक्षात् आपकी भक्ति प्राप्त की है। आप ही भक्तोंपर अनुग्रह करनेवाले महान् देवता हैं, जिन्हें जानकर ज्ञानी पुरुष मोक्ष प्राप्त कर लेते हैं
અनेक જન્મોના પ્રયત્નથી મેં હવે પ્રત્યક્ષ તમારી ભક્તિ પ્રાપ્ત કરી છે. તમે જ ભક્તો પર અનુગ્રહ કરનાર મહાન દેવ છો; તમને જાણીને જ્ઞાની અમૃતત્વ—મોક્ષ—પ્રાપ્ત કરે છે.
Verse 29
देवासुरमुनीनां तु यच्च गुहां सनातनम् । गुहायां निहितं ब्रह्म दुर्विज्ञेयं मुनेरपि,जो सनातन ब्रह्म देवताओं, असुरों और मुनियोंके लिये भी गुह् है, जो हृदयगुहामें स्थित रहकर मननशील मुनिके लिये भी दुर्विज्ञेय बने हुए हैं, वही ये भगवान् हैं। ये ही सबकी सृष्टि करनेवाले देवता हैं। इनके सब ओर मुख हैं। ये सर्वात्मा, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं
દેવો, અસુરો અને મુનિઓ માટે પણ જે સનાતન રહસ્ય-ગુહા છે—હૃદયગુહામાં નિહિત તે બ્રહ્મ, જે મનનશીલ મુનિ માટે પણ દુર્વિજ્ઞેય છે—એ જ આ ભગવાન છે.
Verse 30
स एष भगवान् देव: सर्वकृत् सर्वतोमुख: । सर्वात्मा सर्वदर्शी च सर्वग: सर्ववेदिता,जो सनातन ब्रह्म देवताओं, असुरों और मुनियोंके लिये भी गुह् है, जो हृदयगुहामें स्थित रहकर मननशील मुनिके लिये भी दुर्विज्ञेय बने हुए हैं, वही ये भगवान् हैं। ये ही सबकी सृष्टि करनेवाले देवता हैं। इनके सब ओर मुख हैं। ये सर्वात्मा, सर्वदर्शी, सर्वव्यापी और सर्वज्ञ हैं
વાયુ બોલ્યા—એ જ ભગવાન દેવ છે—સર્વકર્તા, સર્વતોમુખ. તેઓ સર્વાત્મા, સર્વદર્શી, સર્વવ્યાપી અને સર્વજ્ઞ છે.
Verse 31
देहकृद् देहभद् देही देहभुगदेहिनां गति: । प्राणकृत् प्राणभृत् प्राणी प्राणद: प्राणिनां गति:,आप शरीरके निर्माता और शरीरधारी हैं, इसीलिये देही कहलाते हैं। देहके भोक्ता और देहधारियोंकी परम गति हैं। आप ही प्राणोंके उत्पादक, प्राणधारी, प्राणी, प्राणदाता तथा प्राणियोंकी गति हैं
તમે દેહના કર્તા, દેહના ધારક—એથી દેહી; દેહના ભોક્તા અને દેહધારીઓની પરમ ગતિ છો. તમે જ પ્રાણોના ઉત્પાદક, પ્રાણોના ધારક, પ્રાણી-સ્વરૂપ, પ્રાણદાતા તથા સર્વ પ્રાણીઓની ગતિ છો.
Verse 32
अध्यात्मगतिरिष्टानां ध्यायिनामात्मवेदिनाम् | अपुनर्भवकामानां या गति: सोडयमी श्वरः,ध्यान करनेवाले प्रियभक्तोंकी जो अध्यात्मगति हैं तथा पुनर्जन्मकी इच्छा न रखनेवाले आत्मज्ञानी पुरुषोंकी जो गति बतायी गयी है, वह ये ईश्वर ही हैं
વાયુદેવે કહ્યું—ધ્યાન કરનારા પ્રિય ભક્તોની જે આધ્યાત્મિક ગતિ છે, અને પુનર્જન્મ ન ઇચ્છનારા આત્મજ્ઞાની પુરુષોની જે ગતિ જણાવાઈ છે—તે લક્ષ્ય આ જ ઈશ્વર છે.
Verse 33
अयं च सर्वभूतानां शुभाशुभगतिप्रद: । अयं च जन्ममरणे विदध्यात् सर्वजन्तुषु,ये ही समस्त प्राणियोंको शुभ और अशुभ गति प्रदान करनेवाले हैं। ये ही समस्त प्राणियोंको जन्म और मृत्यु प्रदान करते हैं
વાયુએ કહ્યું—આ જ સર્વ પ્રાણીઓને શુભ અને અશુભ ગતિ આપે છે; અને સર્વ જીવોમાં જન્મ તથા મૃત્યુનું વિધાન કરે છે.
Verse 34
अयं संसिद्धिकामानां या गति: सो5यमीश्वर: । भूराद्यान् सर्वभुवनानुत्पाद्य सदिवौकस: । दधाति देवस्तनुभिरष्टाभियों बिभर्ति च,संसिद्धि (मुक्ति)-की इच्छा रखनेवाले पुरुषोंकी जो परम गति है, वह ये ईश्वर ही हैं। देवताओंसहित भू आदि समस्त लोकोंको उत्पन्न करके ये महादेव ही (पृथ्वी, जल, वायु, अग्नि, आकाश, सूर्य, चन्द्र, यजमान--इन) अपनी आठ मूर्तियोंद्वारा उनका धारण और पोषण करते हैं
વાયુએ કહ્યું—સંસિદ્ધિ (મુક્તિ) ઇચ્છનારાઓની જે પરમ ગતિ છે, તે આ જ ઈશ્વર છે. ભૂમિ વગેરે સર્વ લોકોને દેવતાઓসহ ઉત્પન્ન કરીને, આ મહાદેવ પોતાની અષ્ટમૂર્તિઓ દ્વારા તેમનું ધારણ અને પોષણ કરે છે.
Verse 35
अतः: प्रवर्तते सर्वमस्मिन् सर्व प्रतिष्ठितम् । अम्मिंक्ष प्रलयं याति अयमेक: सनातन:,इन्हींसे सबकी उत्पत्ति होती है और इन्हींमें सारा जगत् प्रतिष्ठित है और इन्हींमें सबका लय होता है। ये ही एक सनातन पुरुष हैं
અતએવ સર્વનું પ્રવર્તન તેમના પરથી જ થાય છે; સર્વ જગત્ તેમામાં જ પ્રતિષ્ઠિત છે; અને પ્રલયકાળે સર્વ તેમામાં જ લય પામે છે. એ જ એક સનાતન પુરુષ છે.
Verse 36
अयं स सत्यकामानां सत्यलोक: परं सताम् | अपवर्गश्न मुक्तानां कैवल्यं चात्मवेदिनाम्,ये ही सत्यकी इच्छा रखनेवाले सत्पुरुषोंके लिये सर्वोत्तम सत्यलोक हैं। ये ही मुक्त पुरुषोंके अपवर्ग (मोक्ष) और आत्मज्ञानियोंके कैवल्य हैं
વાયુએ કહ્યું—સત્યની ઇચ્છા ધરાવતા સત્પુરુષો માટે આ જ પરમ સત્યલોક છે. આ જ મુક્ત પુરુષોનું અપવર્ગ (મોક્ષ) અને આત્મજ્ઞાનીઓનું કૈવલ્ય છે.
Verse 37
अयं ब्रह्मादिभि: सिद्धैर्गुहायां गोपित: प्रभु: । देवासुरमनुष्याणामप्रकाशो भवेदिति,देवता, असुर और मनुष्योंको इनका पता न लगने पाये, मानो इसीलिये ब्रह्मा आदि सिद्ध पुरुषोंने इन परमेश्वरको अपनी हृदयगुफामें छिपा रखा है
વાયુ બોલ્યા— આ પરમ પ્રભુને બ્રહ્મા આદિ સિદ્ધોએ હૃદય-ગુહામાં ગોપિત રાખ્યા છે, જાણે દેવ, અસુર અને મનુષ્યોને તેઓ પ્રગટ ન થાય એ હેતુથી.
Verse 38
त॑ त्वां देवासुरनरास्तत्त्वेन न विदुर्भवम् मोहिता: खल्वनेनैव हृदिस्थेनाप्रकाशिना,हृदयमन्दिरमें गूढ़भावसे रहकर प्रकाशित न होनेवाले इन परमात्मदेवने सबको अपनी मायासे मोहित कर रखा है। इसीलिये देवता, असुर और मनुष्य आप महादेवको यथार्थ रूपसे नहीं जान पाते हैं
વાયુ બોલ્યા— હે ભવ (મહાદેવ)! દેવ, અસુર અને મનુષ્યો તમને તત્ત્વરૂપે જાણતા નથી; કારણ કે હૃદયમાં સ્થિત અને અપ્રકાશિત એવી આ જ શક્તિથી તેઓ મોહિત થયા છે.
Verse 39
ये चैन॑ प्रतिपद्यन्ते भक्तियोगेन भाविता: । तेषामेवात्मना5>त्मानं दर्शयत्येष हृच्छय:,जो लोग भक्तियोगसे भावित होकर उन परमेश्वरकी शरण लेते हैं, उन्हींको यह हृदय- मन्दिरमें शयन करनेवाले भगवान् स्वयं अपना दर्शन देते हैं
જે ભક્તિયોગથી ભાવિત થઈ તે પરમેશ્વરની શરણ લે છે, તેમને જ હૃદય-મંદિરમાં નિવાસ કરનાર આ ભગવાન પોતાના આત્મસ્વરૂપથી પોતાનું દર્શન કરાવે છે.
Verse 40
य॑ ज्ञात्वा न पुनर्जन्म मरणं चापि विद्यते । यं विदित्वा पर वेद्यं वेदितव्यं न विद्यते,जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत््वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य हास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। 3>काररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं
વાયુ બોલ્યા— જેમને જાણવાથી ફરી જન્મ થતો નથી અને મૃત્યુ પણ બંધનરૂપ રહેતું નથી; અને જેમને જાણ્યા પછી તેમનાથી પરે કોઈ પરમ જ્ઞેય બાકી રહેતું નથી.
Verse 41
यं लब्ध्वा परमं लाभ॑ नाधिकं मन्यते बुध: । यां सूक्ष्मां परमां प्राप्तिं गच्छन्नव्ययमक्षयम्,जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत््वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य हास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। 3>काररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं
વાયુ બોલ્યા— જેમને પ્રાપ્ત કરીને બુદ્ધિમાન અન્ય કોઈ લાભને તેનાથી મોટો માનતો નથી; અને તે સૂક્ષ્મ, પરમ પ્રાપ્તિ પ્રાપ્ત કરીને અવ્યય, અક્ષય અવસ્થાને પામે છે.
Verse 42
यं सांख्या गुणतत्त्वज्ञा: सांख्यशास्त्रविशारदा: । सूक्ष्मज्ञानतरा: सूक्ष्मं ज्ञात्वा मुच्यन्ति बन्धनै:,जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत््वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य हास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। 3>काररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं
વાયુએ કહ્યું—ગુણો અને તત્ત્વોના જ્ઞાતા, સાંખ્યશાસ્ત્રમાં નિષ્ણાત અને અતિસૂક્ષ્મ દૃષ્ટિવાળા સાંખ્યજ્ઞો જે સૂક્ષ્મ પરમ તત્ત્વને જાણે છે—તે સૂક્ષ્મ તત્ત્વને જાણી તેઓ સર્વ બંધનોથી મુક્ત થાય છે.
Verse 43
यं च वेदविदो वेद्यं वेदान्ते च प्रतिष्ठितम् । प्राणायामपरा नित्यं यं विशन्ति जपन्ति च,जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत््वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य हास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। 3>काररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं
વાયુએ કહ્યું—જે તત્ત્વને વેદવિદો જાણવાનું યોગ્ય માને છે અને જે વેદાંતમાં પ્રતિષ્ઠિત છે, તે નિત્ય તત્ત્વમાં પ્રાણાયામ-પરાયણ સાધકો સતત પ્રવેશ કરે છે અને તેનું જ જપ તથા ધ્યાન કરે છે.
Verse 44
ओंकाररथमारुह्य ते विशन्ति महेश्वरम् । अयं स देवयानानामादित्यो द्वारमुच्यते,जिन्हें जान लेनेपर फिर जन्म और मरणका बन्धन नहीं रह जाता तथा जिनका ज्ञान प्राप्त हो जानेपर फिर दूसरे किसी उत्कृष्ट ज्ञेय तत््वका जानना शेष नहीं रहता है, जिन्हें प्राप्त कर लेनेपर विद्वान् पुरुष बड़े-से-बड़े लाभको भी उनसे अधिक नहीं मानता है, जिस सूक्ष्म परम पदार्थको पाकर ज्ञानी मनुष्य हास और नाशसे रहित परमपदको प्राप्त कर लेता है, सत्त्व आदि तीन गुणों तथा चौबीस तत्त्वोंको जाननेवाले सांख्यज्ञान-विशारद सांख्ययोगी विद्वान् जिस सूक्ष्म तत्वको जानकर उस सूक्ष्मज्ञानरूपी नौकाके द्वारा संसारसमुद्रसे पार होते और सब प्रकारके बन्धनोंसे मुक्त हो जाते हैं, प्राणायाम-परायण पुरुष वेदवेत्ताओंके जानने योग्य तथा वेदान्तमें प्रतिष्ठित जिस नित्य तत्त्वका ध्यान और जप करते हैं और उसीमें प्रवेश कर जाते हैं; वही ये महेश्वर हैं। 3>काररूपी रथपर आरूढ़ होकर वे सिद्ध पुरुष इन्हींमें प्रवेश करते हैं। ये ही देवयानके द्वाररूप सूर्य कहलाते हैं
વાયુએ કહ્યું—ઓંકારરૂપ રથ પર આરોહણ કરીને તે સિદ્ધ પુરુષો મહેશ્વરમાં પ્રવેશ કરે છે. આ જ આદિત્ય દેવયાન—દેવમાર્ગ—નું દ્વાર કહેવાય છે.
Verse 45
अयं च पितृयानानां चन्द्रमा द्वारमुच्यते । एष काष्ठा दिशश्वैव संवत्सरयुगादि च
વાયુએ કહ્યું—પિતૃયાનના માર્ગિકો માટે ચંદ્રમા દ્વાર કહેવાય છે. એમાંથી જ કાષ્ઠા, દિશાઓ તેમજ સંવત્સર અને યુગ વગેરે કાળ-પરિમાણોની ગણતરી પણ થાય છે.
Verse 46
एन॑ प्रजापति: पूर्वमाराध्य बहुभि: स्तवै:
પૂર્વકાળે પ્રજાપતિએ અનેક સ્તુતિઓ દ્વારા તેમની આરાધના કરીને તેમને પ્રસન્ન કર્યા હતા.
Verse 47
ऋग्भिर्यमनुशासन्ति तत्त्वे कर्मणि बहवृचा:,ऋग्वेदके विद्वान तात्चिक यज्ञकर्ममें ऋग्वेदके मन्त्रोंद्वारा जिनकी महिमाका गान करते हैं, यजुर्वेदके ज्ञाता द्विज यज्ञमें यजुर्मन्त्रोंद्वारा दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय--इन त्रिविध रूपोंसे जाननेयोग्य जिन महादेवजीके उद्देश्यसे आहुति देते हैं तथा शुद्ध बुद्धिसे युक्त सामवेदके गानेवाले विद्वान् साममन्त्रोंद्वारा जिनकी स्तुति गाते हैं, अथर्ववेदी ब्राह्मण ऋत, सत्य एवं परब्रह्मगामसे जिनकी स्तुति करते हैं, जो यज्ञके परम कारण हैं, वे ही ये परमेश्वर समस्त यज्ञोंके परमपति माने गये हैं
વાયુએ કહ્યું—ઋગ્વેદના બહ્વૃચ વિદ્વાનો તત્ત્વ અને કર્મના યથાર્થ સિદ્ધાંતોમાં ઋગ્મંત્રો દ્વારા તેમનું ઉપદેશ અને સ્તુતિ કરે છે. યજુર્વેદના જ્ઞાતા દ્વિજ યજ્ઞમાં યજુઃસૂત્રોથી તેમને આહુતિ અર્પે છે અને તેમને જ દક્ષિણાગ્નિ, ગાર્હપત્ય અને આહવનીય—આ ત્રિવિધ પવિત્ર અગ્નિરૂપે ઓળખે છે. શુદ્ધબુદ્ધિ સામગાયક સામસ્વરો દ્વારા તેમની પ્રશંસા ગાય છે. અથર્વવેદી બ્રાહ્મણો ઋત, સત્ય અને પરબ્રહ્મગામી માર્ગ દ્વારા તેમની સ્તુતિ કરે છે. કારણ કે તેઓ યજ્ઞના પરમ કારણ છે, તેથી તેઓ જ સર્વ યજ્ઞોના પરમ સ્વામી અને અધિપતિ માનવામાં આવ્યા છે.
Verse 48
यजुर्भियत्र्तरिधा वेद्यं जुद्धत्यध्वर्यवो5ध्वरे । सामभिर्य॑ च गायन्ति सामगा: शुद्धबुद्धयः
વાયુએ કહ્યું—તે પવિત્ર યજ્ઞમાં અધ્વર્યુ યાજકો યજુઃમંત્રોથી વેદીને ત્રિવિધ રીતે શુદ્ધ કરે છે. અને ત્યાં શુદ્ધબુદ્ધિ સામગાયક સામના સ્તોત્રો ગાય છે.
Verse 49
ऋतं सत्य परं ब्रह्म स्तुवन्त्याथर्वणा द्विजा: । यज्ञस्य परमा योनि: पतिश्नायं पर: स्मृत:
વાયુએ કહ્યું—અથર્વણ દ્વિજ યાજકો ઋત, સત્ય અને પરબ્રહ્મની સ્તુતિ કરે છે. તેઓ જ યજ્ઞની પરમ યોનિ (મૂળ) છે અને તેઓ જ પરમ પ્રભુ—વંદનીય—રૂપે સ્મૃત છે.
Verse 50
रात्यहः:श्रोत्रनयन: पक्षमासशिरो भुज: । ऋतुवीर्यस्तपोधैर्यो हृब्दगुह्दोौरुपादवान्,रात और दिन इनके कान और नेत्र हैं, पक्ष और मास इनके मस्तक और भुजाएंँ हैं, ऋतु वीर्य है, तपस्या धैर्य है तथा वर्ष गुह्मु-इन्द्रिय, ऊरु और पैर हैं
વાયુએ કહ્યું—રાત અને દિવસ તેના કાન અને નેત્ર છે; પક્ષ અને માસ તેનું મસ્તક અને ભુજાઓ છે. ઋતુઓ તેનું પરાક્રમ છે; તપસ્યા તેનું ધૈર્ય છે; અને વર્ષ તેના ગુહ્ય અંગો, ઊરુ અને પગ છે.
Verse 51
मृत्युर्यमो हुताशश्व॒ काल: संहारवेगवान् । कालस्य परमा योनि: कालक्षायं सनातन:,मृत्यु, यम, अग्नि, संहारके लिये वेगशशाली काल, कालके परम कारण तथा सनातन काल भी--ये महादेव ही हैं
વાયુદેવે કહ્યું—મૃત્યુ, યમ અને અગ્નિ; સંહાર માટે વેગવાન કાળ; કાળનું પરમ કારણ; અને જેમાં કાળનો પણ ક્ષય થાય તે સનાતન તત્ત્વ—આ બધું મહાદેવ જ છે.
Verse 52
चन्द्रादित्यौ सनक्षत्रौ ग्रहाश्न सह वायुना । ध्रुव: सप्तर्षयश्चैव भुवना: सप्त एव च
વાયુદેવે કહ્યું—ચંદ્ર અને સૂર્ય, નક્ષત્રો તથા ગ્રહો સહિત, અને વાયુ સાથે; ધ્રુવ તથા સપ્તઋષિ; તેમજ સાતે ભુવન—આ બધાં આ વિશ્વવ્યવસ્થામાં સાક્ષી છે.
Verse 53
प्रधानं महदव्यक्तं विशेषान्तं सवैकृतम् । ब्रह्मादिस्तम्बपर्यन्तं भूतादि सदसच्च यत्
વાયુદેવે કહ્યું—પ્રધાન, મહત્તત્ત્વ, અવ્યક્ત, અને વિકારો સહિત વિશેષાંત સુધીના સર્વ તત્ત્વ; બ્રહ્માથી લઈને તૃણ-સ્તંભ (ઘાસની કાંડી) સુધી; ભૂતાદિ, તેમજ જે સત્ અને અસત્ (વ્યક્ત-અવ્યક્ત) છે—આ બધું (તે વ્યાપક તત્ત્વમાં) સમાયેલું છે.
Verse 54
अष्टौ प्रकृतयश्चैव प्रकृतिभ्यश्न यः पर: । चन्द्रमा, सूर्य, नक्षत्र, ग्रह, वायु, ध्रुव, सप्तर्षि, सात भुवन, मूल प्रकृति, महत्तत्त्व, विकारोंके सहित विशेषपर्यन्त समस्त तत्त्व, ब्रह्माजीसे लेकर कीटपर्यन्त सम्पूर्ण जगत्, भूतादि, सत् और असत् आठ प्रकृतियाँ तथा प्रकृतिसे परे जो पुरुष है, इन सबके रूपमें ये महादेवजी ही विराजमान हैं || ५२-५३ ह || अस्य देवस्य यद् भागं कृत्स्नं सम्परिवर्तते,इन महादेवजीका अंशभूत जो सम्पूर्ण जगत् चक्रकी भाँति निरन्तर चलता रहता है, वह भी ये ही हैं। ये परमानन्दस्वरूप हैं। जो शाश्वत ब्रह्म है, वह भी ये ही हैं। ये ही विरक्तोंकी गति हैं और ये ही सत्पुरुषोंके परमभाव हैं
વાયુદેવે કહ્યું—આઠ પ્રકૃતિઓ અને પ્રકૃતિથી પરે જે પુરુષ છે; ચંદ્ર, સૂર્ય, નક્ષત્રો, ગ્રહો, વાયુ, ધ્રુવ, સપ્તઋષિ અને સાત ભુવન; મૂળ પ્રકૃતિ, મહત્તત્ત્વ, વિકારો સહિત વિશેષાંત સુધીના સર્વ તત્ત્વ; બ્રહ્માથી લઈને કીટ સુધીનું સમગ્ર જગત; ભૂતાદિ તથા સત્-અસત્—આ સર્વ રૂપોમાં મહાદેવ જ વિરાજમાન છે. અને આ દેવનો તે પૂર્ણ અંશ, જે ચક્રની જેમ અવિરત ફરતો રહી સમગ્ર જગતને ચલાવે છે—તે પણ એ જ છે. એ જ પરમાનંદસ્વરૂપ છે, એ જ શાશ્વત બ્રહ્મ છે; એ જ વિરક્તોની ગતિ છે અને એ જ સತ್ಪુરુષોનો પરમભાવ છે.
Verse 55
एतत् परममानन्दं यत् तच्छाश्वतमेव च । एषा गतिर्विरेक्तानामेष भाव: पर: सताम्,इन महादेवजीका अंशभूत जो सम्पूर्ण जगत् चक्रकी भाँति निरन्तर चलता रहता है, वह भी ये ही हैं। ये परमानन्दस्वरूप हैं। जो शाश्वत ब्रह्म है, वह भी ये ही हैं। ये ही विरक्तोंकी गति हैं और ये ही सत्पुरुषोंके परमभाव हैं
વાયુદેવે કહ્યું—આ જ પરમાનંદ છે અને આ જ શાશ્વત છે. આ જ વિરક્તોની ગતિ છે અને આ જ સತ್ಪુરુષોનો પરમભાવ છે.
Verse 56
एतत् पदमनुद्धिग्नमेतद् ब्रह्म सनातनम् । शास्त्रवेदाड़विदुषामेतद् ध्यानं परं पदम्,ये ही उद्वेगरहित परमपद हैं। ये ही सनातन ब्रह्म हैं। शास्त्रों और वेदाड़ोंके ज्ञाता पुरुषोंके लिये ये ही ध्यान करनेके योग्य परमपद हैं
વાયુદેવે કહ્યું—આ જ ઉદ્વેગરહિત પરમપદ છે; આ જ સનાતન બ્રહ્મ છે. શાસ્ત્રો અને વેદાંગોના જાણકારો માટે આ જ ધ્યાન કરવા યોગ્ય પરમપદ છે.
Verse 57
इयं सा परमा काष्ठा इयं सा परमा कला । इयं सा परमा सिद्धिरियं सा परमा गति:
વાયુએ કહ્યું— આ જ પરમ પરાકાષ્ઠા છે, આ જ પરમ કલા છે. આ જ પરમ સિદ્ધિ છે અને આ જ પરમ ગતિ છે.
Verse 58
इयं सा परमा शान्तिरियं सा निर्वति: परा । य॑ं प्राप्प कृतकृत्या: सम इत्यमन्यन्त योगिन:
વાયુએ કહ્યું— આ જ પરમ શાંતિ છે, આ જ પરમ નિર્વૃતિ છે. તેને પામી કૃતકૃત્ય યોગીઓએ સર્વને સમ માન્યું.
Verse 59
यही वह पराकाष्छठा, यही वह परम कला, यही वह परम सिद्धि और यही वह परम गति हैं एवं यही वह परम शान्ति और वह परम आनन्द भी हैं, जिसको पाकर योगीजन अपनेको कृतकृत्य मानते हैं ।। इयं तुष्टिरियं सिद्धिरियं श्रुतिरियं स्मृति: । अध्यात्मगतिरिष्टानां विदुषां प्राप्तिरव्यया
આ જ તે પરમ પરાકાષ્ઠા છે, આ જ પરમ કલા; આ જ પરમ સિદ્ધિ અને આ જ પરમ ગતિ; આ જ પરમ શાંતિ અને પરમ આનંદ પણ છે. તેને પામી યોગીઓ પોતાને કૃતકૃત્ય માને છે. આ જ તૃપ્તિ, આ જ સિદ્ધિ, આ જ શ્રુતિ અને આ જ સ્મૃતિ; ભક્તોની આ જ અધ્યાત્મગતિ અને વિદ્વાનોની આ જ અક્ષય પ્રાપ્તિ છે.
Verse 60
यह तुष्टि, यह सिद्धि, यह श्रुति, यह स्मृति, भक्तोंकी यह अध्यात्मगति तथा ज्ञानी पुरुषोंकी यह अक्षय प्राप्ति (पुनरावृत्तिरहित मोक्षलाभ) आप ही हैं ।। यजतां कामयानानां मर्खैर्विपुलदक्षिणै: । या गतिर्यज्ञशीलानां सा गतिस्त्वं न संशय:,प्रचुर दक्षिणावाले यज्ञोंद्वारा सकाम भावसे यजन करनेवाले यजमानोंकी जो गति होती है, वह गति आप ही हैं। इसमें संशय नहीं है
વાયુદેવે કહ્યું— આપ જ તે તૃપ્તિ અને તે સિદ્ધિ છો; આપ જ શ્રુતિનું પ્રામાણ્ય અને સ્મૃતિની શક્તિ છો. ભક્તોની અધ્યાત્મગતિ આપ જ છો અને જ્ઞાની પુરુષોની અક્ષય પ્રાપ્તિ—પુનરાવર્તનરહિત મોક્ષ—પણ આપ જ છો. અને જે લોકો કામનાસહ યજ્ઞ કરે છે, વિપુલ દક્ષિણાઓ આપે છે, યજ્ઞશીલોને જે ગતિ મળે છે—એ ગતિ પણ નિઃસંદેહ આપ જ છો.
Verse 61
सम्यग् योगजपै: शान्तिर्नियमैदेहतापनै: । तप्यतां या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान्,देव! उत्तम योग-जप तथा शरीरको सुखा देनेवाले नियमोंद्वारा जो शान्ति मिलती है और तपस्या करनेवाले पुरुषोंको जो दिव्य गति प्राप्त होती है, वह परम गति आप ही हैं
વાયુએ કહ્યું— સમ્યક યોગસાધના અને જપથી, તેમજ દેહને તપાવનારા નિયમોથી જે શાંતિ મળે છે; અને તપ કરનારાઓને, હે દેવ, જે પરમ ગતિ પ્રાપ્ત થાય છે—એ પરમ ગતિ આપ જ છો.
Verse 62
कर्मन्यासकृतानां च विरक्तानां ततस्तत: । या गतिर्ब्रह्मयसदने सा गतिस्त्वं सनातन,सनातन देव! कर्म-संन्यासियोंको और विरक्तोंको ब्रह्मलोकमें जो उत्तम गति प्राप्त होती है, वह आप ही हैं
વાયુએ કહ્યું—કર્મ-સંન્યાસ કરનારાઓને અને વિરક્તોને બ્રહ્મસદનમાં જે પરમ ગતિ કહેવાય છે, હે સનાતન, હે સનાતન દેવ! એ જ ગતિ તમે જ છો.
Verse 63
अपुनर्भवकामानां वैराग्ये वर्ततां च या । प्रकृतीनां लयानां च सा गतिस्त्वं सनातन,सनातन परमेश्वर! जो मोक्षकी इच्छा रखकर वैराग्यके मार्गपर चलते हैं उन्हें, और जो प्रकृतिमें लयको प्राप्त होते हैं उन्हें, जो गति उपलब्ध होती है, वह आप ही हैं
વાયુએ કહ્યું—હે સનાતન, હે સનાતન પરમેશ્વર! પુનર્જન્મથી મુક્તિ ઇચ્છી વૈરાગ્યના માર્ગે ચાલનારાઓને જે ગતિ મળે છે, અને જે પ્રકૃતિમાં લય પામે છે તેમને જે ગતિ પ્રાપ્ત થાય છે—એ ગતિ તમે જ છો.
Verse 64
ज्ञानविज्ञानयुक्तानां निरुपाख्या निरज्जना | कैवल्या या गतिर्देव परमा सा गतिर्भवान्,देव! ज्ञान और विज्ञानसे युक्त पुरुषोंको जो सारूप्य आदि नामसे रहित, निरञ्जन एवं कैवल्यरूप परमगति प्राप्त होती है, वह आप ही हैं
વાયુએ કહ્યું—હે દેવ! જ્ઞાન અને વિજ્ઞાનથી યુક્ત પુરુષોને જે ‘સારૂપ્ય’ વગેરે નામોથી રહિત, નિરંજન અને કૈવલ્યરૂપ પરમ ગતિ પ્રાપ્ત થાય છે—એ પરમ ગતિ તમે જ છો.
Verse 65
वेदशास्त्रपुराणोक्ता: पञ्चैता गतय: स्मृता: । त्वत्प्रसादाद्धि लभ्यन्ते न लभ्यन्तेडन्यूथा विभो,प्रभो! वेद-शास्त्र और पुराणोंमें जो ये पाँच गतियाँ बतायी गयी हैं, ये आपकी कृपासे ही प्राप्त होती हैं, अन्यथा नहीं
પ્રભુ! વેદ, શાસ્ત્ર અને પુરાણોમાં કહેલી આ પાંચ ગતિઓ સ્મૃત છે; પરંતુ હે વિભો! તે તમારી કૃપાથી જ પ્રાપ્ત થાય છે—અન્યથા નહીં.
Verse 66
इति तण्डिस्तपोराशिस्तुष्टावेशानमात्मना । जगौ च परमं ब्रह्म यत् पुरा लोककृज्जगौ,इस प्रकार तपस्याकी निधिरूप तण्डिने अपने मनसे महादेवजीकी स्तुति की और पूर्वकालमें ब्रह्माजीने जिस परम ब्रह्मस्वरूप स्तोत्रका गान किया था, उसीका स्वयं भी गान किया
આ રીતે તપસ્યાનો ખજાનો તંડિ એકાગ્ર મનથી ઈશાન (મહાદેવ)ની સ્તુતિ કરી; અને પ્રાચીન કાળમાં લોકસર્જક બ્રહ્માએ જે પરમ બ્રહ્મસ્વરૂપ સ્તોત્ર ગાયું હતું, એ જ સ્તોત્ર તેણે પણ ગાયું.
Verse 67
उपमन्युरुवाच एवं स्तुतो महादेवस्तण्डिना ब्रह्म॒वादिना । उवाच भगवान् देव उमया सहित: प्रभु:,उपमन्यु कहते हैं--ब्रह्मगादी तण्डिके इस प्रकार स्तुति करनेपर पार्वतीसहित प्रभावशाली भगवान् महादेव उनसे बोले--
ઉપમન્યુએ કહ્યું—બ્રહ્મવાદી તંડીએ આ રીતે સ્તુતિ કરતાં, ઉમાસહિત પ્રભાવશાળી ભગવાન મહાદેવે તેને સંબોધીને કહ્યું।
Verse 68
ब्रह्मा शतक्रतुर्विष्णुर्विश्वेदेवा महर्षय: । न विदुस्त्वामिति ततस्तुष्ट: प्रोवाच तं शिव:,तण्डिने स्तुति करते हुए यह बात कही थी कि “ब्रह्मा, विष्णु, इन्द्र, विश्वेदेव और महर्षि भी आपको यथार्थरूपसे नहीं जानते हैं', इससे भगवान् शंकर बहुत संतुष्ट हुए और बोले --
“બ્રહ્મા, શતક્રતુ (ઇન્દ્ર), વિષ્ણુ, વિશ્વેદેવો અને મહર્ષિઓ પણ તમને યથાર્થરૂપે જાણતા નથી”—આ સાંભળીને ભગવાન શિવ અત્યંત પ્રસન્ન થયા અને તંડીને બોલ્યા।
Verse 69
श्रीभगवानुवाच अक्षयश्चाव्ययश्वैव भविता दुःखवर्जित: । यशस्वी तेजसा युक्तो दिव्यज्ञानसमन्वित:,भगवान् श्रीशिवने कहा--ब्रह्मन! तुम अक्षय, अविकारी, दुःखरहित, यशस्वी, तेजस्वी एवं दिव्यज्ञानसे सम्पन्न होओगे
ભગવાને કહ્યું—હે બ્રાહ્મણ! તું અક્ષય અને અવ્યય બનશે, દુઃખથી રહિત રહેશે; યશસ્વી, તેજસ્વી અને દિવ્ય જ્ઞાનથી સમ્પન્ન થશે।
Verse 70
ऋषीणामभिगम्यश्न सूत्रकर्ता सुतस्तव । मत्प्रसादाद् द्विजश्रेष्ठ भविष्यति न संशय:
તારો પુત્ર ઋષિઓ પાસે જઈ તેમની સેવા કરશે અને સૂત્રોનો રચયિતા બનશે. મારી કૃપાથી તે દ્વિજોમાં શ્રેષ્ઠ બનશે—એમાં સંશય નથી।
Verse 71
कं वा काम॑ ददाम्यद्य ब्रूहि यद् वत्स काड्क्षसे । द्विजश्रेष्ठ! मेरी कृपासे तुम्हें एक विद्वान पुत्र प्राप्त होगा, जिसके पास ऋषिलोग भी शिक्षा ग्रहण करनेके लिये जायँगे। वह कल्पसूत्रका निर्माण करेगा, इसमें संशय नहीं है। वत्स! बोलो, तुम क्या चाहते हो? अब मैं तुम्हें कौन-सा मनोवांछित वर प्रदान करूँ? || ७० कल | प्राउज्जलि: स उवाचेदं त्वयि भक्तिर्द॒ढास्तु मे,तब तण्डिने हाथ जोड़कर कहा--'प्रभो! आपके चरणारविन्दमें मेरी सुदृढ़ भक्ति हो”
વત્સ! કહો, આજે હું તમને કયો વર આપું? તમે જે ઇચ્છો તે બોલો. (ત્યારે તંડીએ હાથ જોડીને કહ્યું—) પ્રભો! આપમાં મારી ભક્તિ દૃઢ રહે।
Verse 72
उपमन्युरुवाच एतान् दत्त्वा वरान् देवो वन्द्यमान: सुरभि: | स्तूयमानश्व विबुधैस्तत्रैवान्तरधीयत,उपमन्युने कहा--देवर्षियोंद्वारा वन्दित और देवताओंद्वारा प्रशंसित होते हुए महादेवजी इन वरोंको देकर वहीं अन्तर्धान हो गये
ઉપમન્યુએ કહ્યું—સુરભિ દ્વારા વંદિત અને દેવતાઓ દ્વારા સ્તુત થયેલા દેવાધિદેવે આ વરો આપી તે જ સ્થળે અંતર્ધાન થયા।
Verse 73
अन्तरहिते भगवति सानुगे यादवेश्वर । ऋषिराश्रममागम्य ममैतत् प्रोक्ततानिह,यादवेश्वर! जब पार्षदोंसहित भगवान् अन्तर्धान हो गये, तब ऋषिने मेरे आश्रमपर आकर यहाँ मुझसे ये सब बातें बतायीं
યાદવેશ્વર! જ્યારે ભગવાન્ પરિષદો સહિત અંતર્ધાન થયા, ત્યારે ઋષિ મારા આશ્રમમાં આવી અહીં મને આ બધું કહી સંભળાવ્યું।
Verse 74
यानि च प्रथितान्यादौ तण्डिराख्यातवान् मम । नामानि मानवश्रेष्ठ तानि त्वं शृणु सिद्धये,मानवश्रेष्ठ! तण्डिमुनिने जिन आदिकालके प्रसिद्ध नामोंका मेरे सामने वर्णन किया, उन्हें आप भी सुनिये। वे सिद्धि प्रदान करनेवाले हैं
માનવશ્રેષ્ઠ! આદિકાળથી પ્રખ્યાત જે નામો તંડિ મુનિએ મને કહ્યા હતા, તે તું પણ સિદ્ધિ માટે સાંભળ।
Verse 75
दशनामसहस््राणि देवेष्वाह पितामह: । शर्वस्य शास्त्रेषु तथा दशनामशतानि च,पितामह ब्रह्माने पूर्वकालमें देवताओंके निकट महादेवजीके दस हजार नाम बताये थे और शास््त्रोंमें भी उनके सहस्र नाम वर्णित हैं
પૂર્વકાળમાં પિતામહ બ્રહ્માએ દેવતાઓ સમક્ષ શર્વ (મહાદેવ) ના દસ હજાર નામો કહ્યા હતા; તેમજ શાસ્ત્રોમાં પણ તેમના સૈકડો નામો વર્ણિત છે।
Verse 76
गुह्वानीमानि नामानि तण्डिर्भगवतो<च्युत । देवप्रसादाद् देवेश: पुरा प्राह महात्मने,अच्युत! पहले देवेश्वर ब्रह्माजीने महादेवजीकी कृपासे महात्मा तण्डिके निकट जिन नामोंका वर्णन किया था, महर्षि तण्डिने भगवान् महादेवके उन्हीं समस्त गोपनीय नामोंका मेरे समक्ष प्रतिपादन किया था
અચ્યૂત! આ ભગવાનના ગુહ્ય નામો છે, જે મહાત્મા તંડિએ મને કહ્યા હતા—જે પ્રાચીનકાળમાં દેવ (મહાદેવ) ની કૃપાથી દેવેશ બ્રહ્માએ મહાત્મા તંડિને કહ્યા હતા।
Verse 113
तपस्युग्रे स्थितो भूत्वा दृष्टवा तुष्टाव चेश्वरम् ।। जो देवता अपनेको प्राणवान--जीवस्वरूप बनाकर उसमें मनोमय ज्योति बनकर स्थित हुए थे, उन्हींके दर्शनकी अभिलाषासे तण्डि मुनि बहुत वर्षोतक उग्र तपस्यामें लगे रहे। जब उनका दर्शन प्राप्त कर लिया तब उन मुनीश्वरने जगदीश्वर शिवकी इस प्रकार स्तुति की
વાયુ બોલ્યા—ઉગ્ર તપમાં સ્થિત રહી, પ્રભુના દર્શન કરીને તેમણે ઈશ્વરની સ્તુતિ કરી. જે દેવતા પ્રાણરૂપ, જીવસ્વરૂપ બની અંતરમાં મનોભાવથી રચાયેલી જ્યોતિરૂપે સ્થિત રહે છે—તેમના દર્શનની અભિલાષાથી તંડિ મુનિ અનેક વર્ષો સુધી કઠોર તપ કરતા રહ્યા. જ્યારે તેમને તે દિવ્ય દર્શન પ્રાપ્ત થયું, ત્યારે તે મુનીશ્વરે જગદીશ્વર શિવની આ રીતે સ્તુતિ કરી.
Verse 133
भूरिकल्याणद विभो परं सत्यं नमोस्तु ते गन्धर्वराज विश्वावसु, दैत्यराज हिरण्याक्ष और देवराज इन्द्र भी आपकी वन्दना करते हैं। सबको महान् कल्याण प्रदान करनेवाले प्रभो! आप परम सत्य हैं। आपको नमस्कार है
વાયુ બોલ્યા—હે વિભો! અઢળક કલ્યાણ આપનાર પ્રભુ, તમને નમસ્કાર. ગંધર્વરાજ વિશ્વાવસુ, દૈત્યરાજ હિરણ્યાક્ષ અને દેવરાજ ઇન્દ્ર પણ તમારી વંદના કરે છે. સર્વને મહાન કલ્યાણ આપનાર પ્રભુ! તમે પરમ સત્ય છો. તમને નમસ્કાર.
Verse 146
निर्वाणद सहस्रांशो नमस्ते<5स्तु सुखाश्रय । विभो! जो जन्म-मरणसे भयभीत हो संसार-बन्धनसे मुक्त होनेके लिये प्रयत्न करते हैं, उन यतियोंको निर्वाण (मोक्ष) प्रदान करनेवाले आप ही हैं। आप ही सहस्रों किरणोंवाले सूर्य होकर तप रहे हैं। सुखके आश्रयरूप महेश्वर! आपको नमस्कार है
હે નિર્વાણદાતા, સહસ્રાંશુ, સુખાશ્રય—તમને નમસ્કાર. હે વિભો! જે યતિઓ જન્મ-મરણથી ભયભીત થઈ સંસારબંધનથી મુક્ત થવા પ્રયત્ન કરે છે, તેમને નિર્વાણ (મોક્ષ) આપનાર તમે જ છો. તમે જ સહસ્ર કિરણોવાળા સૂર્ય બની તપો છો. સુખના આશ્રય મહેશ્વર! તમને નમસ્કાર.
Verse 453
दिव्यादिव्य: परो लाभ अयने दक्षिणोत्तरे । ये ही पितृयान-मार्गके द्वार चन्द्रमा कहलाते हैं। काष्ठा, दिशा, संवत्सर और युग आदि भी ये ही हैं। दिव्य लाभ (देवलोकका सुख), अदिव्य लाभ (इस लोकका सुख), परम लाभ (मोक्ष), उत्तरायण और दक्षिणायन भी ये ही हैं
વાયુ બોલ્યા—લાભ ત્રણ પ્રકારના છે: દિવ્ય લાભ, અદિવ્ય લાભ અને પરમ લાભ; તેમજ સમયની બે ગતિઓ—ઉત્તરાયણ અને દક્ષિણાયન—એ પણ છે. પિતૃયાન માર્ગનું દ્વાર ચંદ્રમા કહેવાય છે. કાષ્ઠા, દિશાઓ, સંવત્સર અને યુગ વગેરે પણ એ જ વ્યવસ્થામાં સમાયેલાં છે. દેવલોકનું સુખ દિવ્ય લાભ છે, આ લોકનું સુખ અદિવ્ય લાભ છે, અને મોક્ષ પરમ લાભ છે; ઉત્તરાયણ-દક્ષિણાયન પણ એ જ તત્ત્વાધીન છે.
Verse 459
ऋग्वेदके विद्वान तात्चिक यज्ञकर्ममें ऋग्वेदके मन्त्रोंद्वारा जिनकी महिमाका गान करते हैं, यजुर्वेदके ज्ञाता द्विज यज्ञमें यजुर्मन्त्रोंद्वारा दक्षिणाग्नि, गार्हपत्य और आहवनीय--इन त्रिविध रूपोंसे जाननेयोग्य जिन महादेवजीके उद्देश्यसे आहुति देते हैं तथा शुद्ध बुद्धिसे युक्त सामवेदके गानेवाले विद्वान् साममन्त्रोंद्वारा जिनकी स्तुति गाते हैं, अथर्ववेदी ब्राह्मण ऋत, सत्य एवं परब्रह्मगामसे जिनकी स्तुति करते हैं, जो यज्ञके परम कारण हैं, वे ही ये परमेश्वर समस्त यज्ञोंके परमपति माने गये हैं
વાયુ બોલ્યા—ઋગ્વેદમાં નિષ્ણાત વિદ્વાનો યજ્ઞકર્મમાં ઋગ્મંત્રો દ્વારા તે પ્રભુની મહિમાનું ગાન કરે છે. યજુર્વેદના જ્ઞાતા દ્વિજ યજુર્મંત્રોથી દક્ષિણાગ્નિ, ગાર્હપત્ય અને આહવનીય—આ ત્રિવિધ અગ્નિરૂપે જાણવાપાત્ર મહાદેવના હિતાર્થે આહુતિ અર્પે છે. શુદ્ધ બુદ્ધિવાળા સામવેદગાયક સામમંત્રોથી તેમની સ્તુતિ ગાય છે. અથર્વવેદી બ્રાહ્મણો ઋત અને સત્યના માર્ગે, પરબ્રહ્મગામી બની, તેમની સ્તુતિ કરે છે. તેઓ જ યજ્ઞના પરમ કારણ છે; તેઓ જ સર્વ યજ્ઞોના પરમપતિ માનવામાં આવ્યા છે.
Verse 4636
प्रजार्थ वरयामास नीललोहितसंज्ञितम् | पूर्वकालमें प्रजापतिने नाना प्रकारके स्तोत्रोंद्वारा इन्हीं नीललोहित नामवाले भगवान्की आराधना करके प्रजाकी सृष्टिके लिये वर प्राप्त किया था
વાયુએ કહ્યું—પ્રજાઓની સૃષ્ટિ માટે પ્રજાપતિએ પ્રાચીન કાળે ‘નીલલોહિત’ નામે પ્રસિદ્ધ ભગવાન પાસે વર માગ્યો હતો. અનેક પ્રકારના સ્તોત્રોથી એ જ નીલલોહિતની આરાધના કરીને પ્રજાસૃષ્ટિ માટે જરૂરી વર પ્રજાપતિએ પ્રાપ્ત કર્યો.
How worldly aims (strength, reputation, lineage, social harmony) can be sought without severing liberation-oriented discipline—answered by framing boons within bhakti, tapas, and a theology where grace and right intention govern outcomes.
Śiva is presented as the comprehensive ground of reality—time, gods, elements, guṇas, and the highest brahman—and knowing/approaching him through devotion and disciplined practice is depicted as a decisive condition for release from rebirth.
Yes: the text asserts that multiple recognized ‘gatis’ (destinations across ritual, ascetic, renunciant, and knowledge paths) are attainable ‘only by his favor’ (tvadprasādāt), making grace a governing interpretive key for the chapter’s theology.