
Daiva–Puruṣakāra Saṃvāda (Kṛpa’s Counsel on Destiny and Human Effort)
Upa-parva: Kṛpa–Nīti Discourse on Daiva and Puruṣakāra (Sauptika Parva, Adhyāya 2 context)
This chapter presents Kṛpa’s systematic argument that human outcomes are bound to two operative causes: daiva (destiny/circumstance) and puruṣakāra (initiative/effort). He rejects one-sided explanations—neither fate alone nor effort alone reliably produces results—arguing instead for their conjunction. Through agricultural analogies, he explains that rain without cultivation and cultivation without rain are both insufficient, making success contingent on coordinated conditions. Kṛpa then differentiates prudent diligence from sloth, noting that the wise exert themselves while recognizing uncertainty, whereas the idle disparage exertion. He observes that effort can still fail due to adverse conditions, and that unearned gain attracts social censure. The discourse turns to governance: proper initiative includes reverence to the divine, ethical intent, and especially consultation with elders and competent advisors; he proposes approaching Dhṛtarāṣṭra, Gāndhārī, and Vidura for guidance. Finally, Kṛpa critiques Duryodhana’s earlier policy failures—ignoring well-wishers and engaging in hostility against more virtuous opponents—framing the present crisis as the consequence of deficient deliberation and ethically compromised motivation.
Chapter Arc: रात्रि के रक्त-धुएँ के बाद, अश्वत्थामा के भीतर प्रतिशोध की ज्वाला धधकती है; तभी कृपाचार्य उसे रोककर कहते हैं—जो वचन तुमने कहा, उसे मैंने सुन लिया, पर पहले विचार करो कि कर्तव्य क्या है। → कृप ‘दैव’ और ‘पुरुषकार’ के द्वंद्व को सामने रखते हैं—मनुष्य दोनों से बँधा है; न केवल दैव से कार्य सिद्ध होते हैं, न केवल कर्म से, सिद्धि उनके योग से आती है। वे चेताते हैं कि मोह में पड़ा मनुष्य हित-अहित का निर्णय खो देता है, इसलिए सत्पुरुषों से सलाह लेना ही रक्षा है। → कृप का निर्णायक उपदेश: जब बुद्धि भ्रमित हो जाए, तब सुहृदों/विद्वानों से पूछो; वे कारण-निर्णय करके जैसी सलाह दें, वैसा ही करना चाहिए—और दैव-पुरुषार्थ में दैव की प्रबलता को पहचानकर भी पुरुषार्थ से विमुख न हो। → अध्याय का निष्कर्ष ‘आचरण-नीति’ बनता है—कार्य आरम्भ किए बिना प्रयोजन सिद्ध नहीं होता; यदि पुरुषार्थ के बाद भी सिद्धि न मिले तो उसे दैव-आघात मानकर अनावश्यक आत्मदाह/विवाद न करो। → कृप का प्रस्ताव उभरता है—चलो धृतराष्ट्र, गांधारी और महामति विदुर से पूछें; अब प्रश्न है कि यह सलाह अश्वत्थामा के उग्र संकल्प को मोड़ेगी या उसे और घातक दिशा देगी।
Verse 1
/ द्वितीयो5 ध्याय: कृपाचार्यका अश्वत्थामाको दैवकी प्रबलता बताते कर्तव्यके विषयमें सत्पुरुषोंसे सलाह लेनेकी प्रेरणा कृप उवाच श्रुतं ते वचनं सर्व यद् यदुक्त त्वया विभो । ममापि तु वच: किंचिच्छृणुष्वाद्य महाभुज,तब कृपाचार्यने कहा--शक्तिशाली महाबाहो! तुमने जो-जो बात कही है, वह सब मैंने सुन ली। अब कुछ मेरी भी बात सुनो
Kṛpa sprach: „O Mächtiger, ich habe alles, was du gesagt hast, vollständig vernommen. Nun aber, o Held mit starken Armen, höre heute auch ein paar Worte von mir.“
Verse 2
आबद्धा मानुषा: सर्वे निबद्धा: कर्मणोर्द्दयो: । दैवे पुरुषकारे च परं ताभ्यां न विद्यते,सभी मनुष्य प्रारब्ध और पुरुषार्थ दो प्रकारके कर्मोंसे बँधे हुए हैं। इन दोके सिवा दूसरा कुछ नहीं है इति श्रीमहाभारते सौप्तिकपर्वणि द्रौणिकृपसंवादे द्वितीयोडध्याय:
Kṛpa sprach: „Alle Menschen sind gebunden—ja, fest gebunden—durch zwei Arten von Wirkursachen im Handeln: das Schicksal (das Verordnete) und die eigene Anstrengung (das, was man unternimmt). Jenseits dieser beiden gibt es keinen dritten Faktor, auf den man sich berufen könnte.“
Verse 3
न हि दैवेन सिध्यन्ति कार्याण्येकेन सत्तम । न चापि कर्मणैकेन द्वाभ्यां सिद्धस्तु योगत:
Kṛpa sprach: „O Bester der Menschen, Vorhaben gelingen nicht durch das Schicksal allein; und sie gelingen auch nicht durch menschliche Anstrengung allein. Wahrer Erfolg wird durch das rechte Zusammenwirken beider erreicht.“
Verse 4
सत्पुरुषोंमें श्रेष्ठ अश्वत्थामन्! केवल दैव या प्रारब्धसे अथवा अकेले पुरुषार्थसे भी कार्योंकी सिद्धि नहीं होती है। दोनोंके संयोगसे ही सिद्धि प्राप्त होती है ।। ताभ्यामुभाभ्यां सर्वार्था निबद्धा अधमोत्तमा: । प्रवृत्ताश्वैव दृश्यन्ते निवृत्ताश्विव सर्वश:,उन दोनोंसे ही उत्तम-अधम सभी कार्य बँधे हुए हैं। उन्हींसे प्रवृत्ति और निवृत्ति- सम्बन्धी कार्य होते देखे जाते हैं
Kṛpa sprach: „O Aśvatthāman, Bester unter den Edlen: Vollendung entsteht weder aus dem Schicksal (oder dem bereits zu wirken begonnenen Vorherbestimmten) allein, noch aus menschlicher Anstrengung allein. Erfüllung wird nur durch das Zusammenwirken beider erlangt. Von diesen beiden hängen alle Ziele ab—hohe wie niedrige; und durch sie sieht man überall Taten des Sich-Einlassens wie Taten des Rückzugs.“
Verse 5
पर्जन्य: पर्वते वर्षन् किन्नु साधयते फलम् । कृष्टे क्षेत्रे तथा वर्षन् किन्न साधयते फलम्,बादल पर्वतपर वर्षा करके किस फलकी सिद्धि करता है? वही यदि जोते हुए खेतमें वर्षा करे तो वह कौन-सा फल नहीं उत्पन्न कर सकता?
Kṛpa sprach: „Wenn Regen auf einen Berg fällt, welche Frucht bringt er da zustande? Fällt derselbe Regen jedoch auf ein gepflügtes Feld, welche Frucht könnte er nicht hervorbringen?“
Verse 6
उत्थान चाप्यदैवस्य हानुत्थानं च दैवतम् । व्यर्थ भवति सर्वत्र पूर्वस्तत्र विनिश्चय:,दैवरहित पुरुषका पुरुषार्थ व्यर्थ है और पुरुषार्थशून्य दैव भी व्यर्थ हो जाता है। सर्वत्र ये दो ही पक्ष उठाये जाते हैं। इन दोनोंमें पहला पक्ष ही सिद्धान्तभूत एवं श्रेष्ठ है (अर्थात् दैवके सहयोगके बिना पुरुषार्थ नहीं काम देता है)
Kṛpa sprach: „Anstrengung ohne die Stütze des Schicksals (daiva) wird überall zunichte; und das Schicksal, wenn es nicht von Anstrengung begleitet ist, bleibt ebenso fruchtlos. Überall streitet man diese beiden Standpunkte, doch hier ist das Urteil gefällt: Der erste ist der tragfähigere und höhere—ohne das Zusammenwirken des Fügungswillens vermag bloßes menschliches Streben nicht zu gelingen.“
Verse 7
सुवृष्टे च यथा देवे सम्यक क्षेत्रे च कर्षिते । बीजं महागुणं भूयात् तथा सिद्धिर्हि मानुषी,जैसे मेघने अच्छी तरह वर्षा की हो और खेतको भी भलीभाँति जोता गया हो, तब उसमें बोया हुआ बीज अधिक लाभदायक हो सकता है। इसी प्रकार मनुष्योंकी सारी सिद्धि दैव और पुरुषार्थके सहयोगपर ही अवलम्बित है
Kṛpa sprach: „Wie der Same überaus fruchtbar wird, wenn die Götter zur rechten Zeit Regen senden und das Feld ordentlich gepflügt ist, so entsteht auch menschlicher Erfolg nur aus dem Zusammenwirken göttlicher Gunst und eigener Anstrengung.“
Verse 8
तयोर्देवं विनिश्ित्य स्वयं चैव प्रवर्तते | प्राज्ञा: पुरुषकारेषु वर्तन्ते दाक्ष्यमाश्रिता:,इन दोनोंमें दैव बलवान् है। वह स्वयं ही निश्चय करके पुरुषार्थकी अपेक्षा किये बिना ही फल-साधमननमें प्रवृत्त हो जाता है, तथापि विद्वान् पुरुष कुशलताका आश्रय ले पुरुषार्थमें ही प्रवृत्त होते हैं
Von beiden erweist sich das Schicksal (daiva) als stärker: als hätte es den Ausgang aus sich selbst heraus festgesetzt, setzt es den Gang der Folgen in Bewegung, ohne auf menschliche Anstrengung zu warten. Dennoch wenden sich die Weisen, gestützt auf Geschick und praktische Tüchtigkeit, weiterhin dem überlegten Handeln zu—sie wählen Tat und Strategie, selbst im Schatten des Verhängnisses.
Verse 9
इस प्रकार श्रीमह्याभारत सौप्तिकपर्वमें अश्वत्थामाकी मन्त्रणाविषयक पहला अध्याय पूरा हुआ,ताभ्यां सर्वे हि कार्यार्था मनुष्याणां नरर्षभ | विचेष्टन्त: सम दृश्यन्ते निवृत्तास्तु तथैव च नरश्रेष्ठ! मनुष्योंके प्रवृत्ति और निवृत्ति-सम्बन्धी सारे कार्य दैव और पुरुषार्थ दोनोंसे ही सिद्ध होते देखे जाते हैं
Sañjaya sprach: O Stier unter den Menschen, alle menschlichen Unternehmungen werden als durch beides vollbracht gesehen—durch Schicksal und eigene Anstrengung. Ob Menschen tatkräftig streben oder sich vom Handeln zurückziehen, ihre Ergebnisse scheinen gleichermaßen aus dem Zusammenwirken von Fügung und menschlichem Bemühen hervorzuwachsen.
Verse 10
कृत: पुरुषकारश्न सो5पि दैवेन सिध्यति । तथास्य कर्मण: कर्तुरभिनिर्वर्ततेी फलम्,किया हुआ पुरुषार्थ भी दैवके सहयोगसे ही सफल होता है तथा दैवकी अनुकूलतासे ही कर्ताको उसके कर्मका फल प्राप्त होता है
Kṛpa sprach: „Selbst ein von einem Menschen ordnungsgemäß vollbrachtes Bemühen gelingt nur mit der Stütze des Schicksals. Ebenso erlangt der Handelnde die Frucht seiner Tat wahrhaftig nur dann, wenn das Geschick günstig ist.“
Verse 11
उत्थानं च मनुष्याणां दक्षाणां दैववर्जितम् । अफल दृश्यते लोके सम्यगप्युपपादितम्,चतुर मनुष्योंद्वारा अच्छी तरह सम्पादित किया हुआ पुरुषार्थ भी यदि दैवके सहयोगसे वंचित है तो वह संसारमें निष्फल होता दिखायी देता है
Kṛpa sprach: Selbst das tatkräftige Streben fähiger Menschen wird, wenn ihm die Stütze des Schicksals (दैव) fehlt, in dieser Welt als fruchtlos sichtbar—obwohl es mit voller Sorgfalt und Tüchtigkeit ausgeführt wurde.
Verse 12
तत्रालसा मनुष्याणां ये भवन्त्यमनस्विन: । उत्थान ते विगर्हन्ति प्राज्ञानां तन्न रोचते,मनुष्योंमें जो आलसी और मनपर काबू न रखनेवाले होते हैं, वे पुरुषार्थकी निन्दा करते हैं। परंतु विद्वानोंको यह बात अच्छी नहीं लगती
Hier schmähen die Trägen, die ihren Geist nicht zu zügeln vermögen, das Bemühen und das zielgerichtete Streben. Doch eine solche Verachtung der Initiative missfällt den Weisen.
Verse 13
प्रायशो हि कृतं कर्म नाफलं दृश्यते भुवि । अकृत्वा च पुनर्दु:खं कर्म पश्येन्महाफलम्,प्राय: किया हुआ कर्म इस भूतलपर कभी निष्फल होता नहीं देखा जाता है; परंतु कर्म न करनेसे दुःखकी प्राप्ति ही देखनेमें आती है; अतः कर्मको महान् फलदायक समझना चाहिये
Kṛpa sprach: „In dieser Welt sieht man zumeist nicht, dass eine unternommene Tat fruchtlos bleibt. Doch wenn man nicht handelt, sieht man abermals nur das Herannahen des Leids. Darum soll man das Handeln als reich an großem Ertrag ansehen.“
Verse 14
चेष्टामकुर्वल्लैभते यदि किंचिद् यदृच्छया । यो वा न लभते कृत्वा दुर्दर्शा तावुभावषि,यदि कोई पुरुषार्थ न करके दैवेच्छासे ही कुछ पा जाता है अथवा जो पुरुषार्थ करके भी कुछ नहीं पाता, इन दोनों प्रकारके मनुष्योंका मिलना बहुत कठिन है
Kṛpa sprach: „Wenn einer ohne Anstrengung durch bloßen Zufall etwas erlangt, oder wenn ein anderer trotz Anstrengung nichts erlangt — einem von diesen beiden Menschenschlägen zu begegnen, ist überaus selten.“
Verse 15
शवक्नोति जीवितुं दक्षो नालस: सुखमेधते । दृश्यन्ते जीवलोकेडस्मिन् दक्षा: प्रायो हितैषिण:,पुरुषार्थमें लगा हुआ दक्ष पुरुष सुखसे जीवन-निर्वाह कर सकता है; परंतु आलसी मनुष्य कभी सुखी नहीं होता है। इस जीव-जगतमें प्राय: तत्परतापूर्वक कर्म करनेवाले ही अपना हित साधन करते देखे जाते हैं
Kṛpa sprach: „Ein fähiger und fleißiger Mann kann sein Leben erhalten und sogar im Glück gedeihen; doch ein Träger wird niemals glücklich. In dieser Welt der Lebewesen sieht man zumeist, dass es die Tüchtigen sind, die sich tatkräftig mühen und so ihr eigenes Wohl sichern.“
Verse 16
यदि दक्ष: समारम्भात् कर्मणो नाश्लुते फलम् | नास्य वाच्यं भवेत् किंचिल्लब्धव्यं वाधिगच्छति,यदि कार्य-दक्ष मनुष्य कर्मका आरम्भ करके भी उसका कोई फल नहीं पाता है तो उसके लिये उसकी कोई निन्दा नहीं की जाती अथवा वह अपने प्राप्तव्य लक्ष्यको पा ही लेता है
Wenn ein tüchtiger Mann, selbst nachdem er eine Tat begonnen hat, deren Frucht nicht erlangt, soll man ihm keinen Tadel nachsagen; oder aber: zur rechten Zeit erreicht er gewiss, was zu erreichen bestimmt ist.
Verse 17
अकृत्वा कर्म यो लोके फलं विन्दति घिछित: । स तु वक्तव्यतां याति द्वेष्पो भवति भूयश:,परंतु जो इस जगत्में कोई काम न करके बैठा-बैठा फल भोगता है; वह प्राय: निन्दित होता है और दूसरोंके द्वेषका पात्र बन जाता है
Doch in dieser Welt wird, wer ohne die verdiente Arbeit einen Lohn genießt, zum Gegenstand des Tadels; immer wieder gilt er als verwerflich und wird zum Ziel des Hasses anderer.
Verse 18
एवमेतदनादृत्य वर्तते यस्त्वतो5न्यथा । स करोत्यात्मनो5नर्थनिष बुद्धिमतां नयः:,इस प्रकार जो पुरुष इस मतका अनादर करके इसके विपरीत बर्ताव करता है अर्थात् जो दैव और पुरुषार्थ दोनोंके सहयोगको न मानकर केवल एकके भरोसे ही बैठा रहता है, वह अपना ही अनर्थ करता है, यही बुद्धिमानोंकी नीति है
So ist es. Doch wer dieses Prinzip missachtet und anders handelt—indem er das Zusammenwirken von Geschick und menschlichem Bemühen nicht anerkennt und sich nur auf eines von beiden verlässt—zieht Unheil über sich selbst. Dies ist die gefestigte Maxime der Weisen.
Verse 19
हीन॑ पुरुषकारेण यदि दैवेन वा पुनः । कारणाभ्यामथैताभ्यामुत्थानमफलं भवेत्,पुरुषार्थहीन दैव अथवा दैवहीन पुरुषार्थ--इन दो ही कारणोंसे मनुष्यका उद्योग निष्फल होता है
Ist ein Mensch entweder im persönlichen Bemühen oder wiederum im günstigen Geschick mangelhaft, so wird aus einem dieser beiden Gründe sein Aufstieg—sein Unternehmen und sein Ringen—fruchtlos.
Verse 20
हीनं पुरुषकारेण कर्म त्विह न सिद्धयति । दैवतेभ्यो नमस्कृत्य यस्त्वर्थान् सम्यगीहते
Ein Werk, dem menschliches Bemühen fehlt, gelingt hier nicht. Doch wer zuerst den göttlichen Mächten ehrerbietig huldigt und dann mit rechtem Streben seine Ziele verfolgt—mit klarem Urteil und Entschlossenheit—kann sein Vorhaben zur Vollendung bringen.
Verse 21
सम्यगीहा पुनरियं यो वृद्धानुपसेवते
Kṛpa sprach: „Dies ist wahrlich erneut der rechte Weg: wer den Ältesten beisteht und ihnen dient.“
Verse 22
उत्थायोत्थाय हि सदा प्रष्टव्या वृद्धसम्मता:
Immer wieder soll man sich erheben und fortwährend Rat bei jenen Ältesten suchen, die weithin als weise anerkannt sind; denn in Zeiten der Gefahr und sittlicher Ungewissheit festigt eine auf Erfahrung gegründete Führung Verhalten und Entschluss.
Verse 23
वृद्धानां वचन श्रुत्वा यो<भ्युत्थानं प्रयोजयेत्
Kṛpa sprach: „Wer, nachdem er den Rat der Ältesten vernommen hat, (andere) dazu antreibt, aufzustehen und zu handeln …“
Verse 24
रागात् क्रोधाद् भयाल्लो भाद् यो<र्थानीहति मानव:
Kṛpa sprach: „Ein Mensch, der unter der Herrschaft von Anhaftung, Zorn, Furcht oder Gier nach weltlichem Gewinn strebt, verliert die moralische Klarheit; ein vom Begehren getriebenes Ringen wird sittlich verdorben und führt ins Verderben.“
Verse 25
सो<यं दुर्योधनेनार्थों लुब्धेनादीर्घदर्शिना,वार्यमाणो5करोद् वैरं पाण्डवैर्गुणवत्तरै: । दुर्योधन लोभी और अदूरदर्शी था। उसने मूर्खतावश न तो किसीका समर्थन प्राप्त किया और न स्वयं ही अधिक सोच-विचार किया। उसने अपना हित चाहनेवाले लोगोंका अनादर करके दुष्टोंक साथ सलाह की और सबके मना करनेपर भी अधिक गुणवान् पाण्डवोंके साथ वैर बाँध लिया
So war es Duryodhana —gierig und ohne weitsichtige Urteilskraft—, der dieses verhängnisvolle Ende über sich selbst brachte: obwohl man ihn wieder und wieder zurückhielt und warnte, entschied er sich, Feindschaft mit den Pāṇḍavas zu schmieden, die an Tugend und Vorzüglichkeit reicher waren. Der Vers betont, dass Verachtung für Wohlmeinende und kurzsichtiger, von Begierde getriebener Rat schließlich in einen verderblichen Konflikt ausreift.
Verse 26
असमर्थ्य समारब्धो मूढत्वादविचिन्तित: । हितबुद्धीननादृत्य सम्मन्त्रयासाधुभि: सह
Kṛpa sprach: „Ohne die Kraft, es zu Ende zu führen, hast du dieses Unternehmen dennoch begonnen—aus Verblendung und ohne rechte Erwägung. Den Rat der Verständigen missachtend, hast du dich mit den Bösen beraten.“
Verse 27
पूर्वमप्यतिदु:शीलो न धैर्य कर्तुमहति
Kṛpa sprach: „Schon früher war er von überaus schlechter Lebensart; er taugt weder zur Standhaftigkeit noch zur Selbstbeherrschung.“
Verse 28
तपत्यर्थे विपन्ने हि मित्राणां न कृतं वच: । पहले भी वह बड़े दुष्ट स्वभावका था। धैर्य रखना तो वह जानता ही नहीं था। उसने मित्रोंकी बात नहीं मानी; इसलिये अब काम बिगड़ जानेपर पश्चात्ताप करता है ।। अनुवर्तामहे यत्तु तं वयं पापपूरुषम्
Kṛpa sprach: „Wenn das Unternehmen zusammengebrochen ist, brennt er vor Reue, weil er den Rat seiner Freunde nicht befolgte. Schon zuvor war er durch und durch von böser Art; Geduld zu wahren verstand er nie. Den Zuspruch seiner Verbündeten schlug er in den Wind; darum leidet er jetzt, da der Plan missraten ist, an bitterem Bedauern. Und doch sind wir weiterhin jenem sündigen Mann gefolgt.“
Verse 29
अनेन तु ममाद्यापि व्यसनेनोपतापिता
„Noch heute werde ich von diesem Unheil gequält.“
Verse 30
बुद्धिश्चिन्तयते किंचित् स्वं श्रेयो नावबुद्धयते । इस संकटसे सर्वथा संतप्त होनेके कारण मेरी बुद्धि आज बहुत सोचने-विचारनेपर भी अपने लिये किसी हितकर कार्यका निर्णय नहीं कर पाती है ।। मुहता तु मनुष्येण प्रष्टव्या: सुह्ददो जना:
Kṛpa sprach: „Mein Geist wälzt Gedanken, doch vermag er nicht zu erkennen, was mir wahrhaft zum Besten gereicht. Von dieser Krise ringsum verbrannt, kann mein Verstand selbst nach vielem Nachsinnen heute keinen Weg bestimmen, der mir heilsam wäre. Darum soll der Mensch in solcher Stunde vertrauenswürdige Wohlgesinnte zu Rate ziehen.“
Verse 31
ततोअस्य मूल कार्याणां बुद्धया निश्चित्य वै बुध:
Daraufhin fasste der Weise, nachdem er mit klarem Urteilsvermögen nachgedacht hatte, den festen Entschluss über den grundlegenden Gang des Handelns, der in dieser Sache zu ergreifen war.
Verse 32
ते वयं धृतराष्ट्रं च गान्धारीं च समेत्य ह
Dann gingen wir gemeinsam zu Dhṛtarāṣṭra und auch zu Gāndhārī und traten wahrhaftig vor sie hin.
Verse 33
ते पृष्टास्तु वदेयुर्यच्छेयो न: समनन्तरम्
Wenn man sie befragt, sollen sie unverzüglich, ohne Aufschub, aussprechen, was wahrhaft das Beste für uns ist. Kripa drängt darauf, dass in dieser Krise der Rat rasch sein und dem Wohl der Gemeinschaft dienen muss, nicht dem Zögern oder der Selbstrechtfertigung.
Verse 34
तदस्माभि: पुनः कार्यमिति मे नैष्ठिकी मति: । हमारे पूछनेपर वे लोग अब हमारे लिये जो श्रेयस्कर कार्य बतावें, वही हमें करना चाहिये; मेरी बुद्धिका तो यही दृढ़ निश्चय है ।। ३३ $ ।। अनारम्भात् तु कार्याणां नार्थ: सम्पद्यते क्वचित्,कार्यको आरम्भ न करनेसे कहीं कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है; परंतु पुरुषार्थ करनेपर भी जिनका कार्य सिद्ध नहीं होता है, वे निश्चय ही दैवके मारे हुए हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
Kṛpa sprach: „Darum müssen wir erneut handeln — das ist meine unbeirrbare Überzeugung. Denn wer ein Vorhaben nicht einmal beginnt, erreicht nirgends irgendeinen Zweck. Doch jene, deren Ziele selbst nach Anstrengung nicht gelingen, sind gewiss vom Geschick niedergestreckt; daran darf kein Zweifel sein.“
Verse 35
कृते पुरुषकारे तु येषां कार्य न सिद्धयति । दैवेनोपहतास्ते तु नात्र कार्या विचारणा,कार्यको आरम्भ न करनेसे कहीं कोई भी प्रयोजन सिद्ध नहीं होता है; परंतु पुरुषार्थ करनेपर भी जिनका कार्य सिद्ध नहीं होता है, वे निश्चय ही दैवके मारे हुए हैं। इसमें कोई अन्यथा विचार नहीं करना चाहिये
Kṛpa sprach: Wenn wahrhaftige Anstrengung getan wird und doch das beabsichtigte Werk bei manchen nicht gelingt, dann sind sie gewiss vom Schicksal getroffen. Doch ohne das Handeln zu beginnen, wird kein Zweck erreicht. Darüber bedarf es keiner weiteren Debatte: Man muss handeln, im Bewusstsein, dass das Ergebnis dennoch vom Geschick überstimmt werden kann.
Verse 206
दक्षो दाक्षिण्यसम्पन्नो न स मोघधैर्विहन्यते । पुरुषार्थके बिना तो यहाँ कोई कार्य सिद्ध नहीं हो सकता। जो दैवको मस्तक झुकाकर सभी कार्योके लिये भलीभाँति चेष्टा करता है, वह दक्ष एवं उदार पुरुष असफलताओंका शिकार नहीं होता
Kṛpa sprach: „Ein tüchtiger Mann, reich an Wohlwollen und Anstand, wird nicht durch nutzloses Schwanken zu Fall gebracht. Ohne menschliches Bemühen gelangt hier kein Vorhaben zum Erfolg. Wer jedoch das Haupt vor dem Geschick neigt und dennoch in jeder Aufgabe rechtmäßig strebt—ein solcher fähiger und edler Mann wird durch Rückschläge nicht zugrunde gerichtet.“
Verse 213
आपृच्छति च यच्छेय: करोति च हित॑ वच: । यह भलीभाँति चेष्टा उसीकी मानी जाती है जो बड़े-बूढ़ोंकी सेवा करता है, उनसे अपने कल्याणकी बात पूछता है और उनके बताये हुए हितकारक वचनोंका पालन करता है
Kṛpa sprach: „Geachtet ist das Verhalten dessen, der den Ältesten dient, sie fragt, was zum wahren Wohl führt, und dann nach ihren heilsamen Worten handelt.“
Verse 226
ते सम योगे पर मूलं तन्मूला सिद्धिरुच्यते । प्रतिदिन सबेरे उठ-उठकर वृद्धजनोंद्वारा सम्मानित पुरुषोंसे अपने हितकी बात पूछनी चाहिये; क्योंकि वे अप्राप्तकी प्राप्ति करानेवाले उपायके मुख्य हेतु हैं। उनका बताया हुआ वह उपाय ही सिद्धिका मूल कारण कहा जाता है
Kṛpa sprach: „In jener rechten Zucht des Handelns liegt die höchste Wurzel; und man sagt, der Erfolg habe darin sein Fundament. Darum soll man jeden Tag früh aufstehen und ehrerbietig die verehrungswürdigen Ältesten befragen, was wahrhaft heilsam ist; denn sie sind die Hauptursache der Mittel, durch die das Unerreichte erreicht wird. Die von ihnen gelehrte Methode heißt die Wurzel des Gelingens.“
Verse 236
उत्थानस्य फलं सम्यक् तदा स लभते5चिरात् | जो वृद्ध पुरुषोंका वचन सुनकर उसके अनुसार कार्य आरम्भ करता है, वह उस कार्यका उत्तम फल शीघ्र ही प्राप्त कर लेता है
Kṛpa sprach: „Wer auf den Rat erfahrener Ältester hört und sogleich nach ihm ans Werk geht, erlangt bald die rechte und vortreffliche Frucht seines Bemühens.“
Verse 246
अनीशक्षावमानी च स शीतघ्र॑ भ्रश्यते श्रिय: । अपने मनको वशगमें न रखते हुए दूसरोंकी अवहेलना करनेवाला जो मानव राग, क्रोध, भय और लोभसे किसी कार्यकी सिद्धिके लिये चेष्टा करता है, वह बहुत जल्दी अपने ऐश्वर्यसे भ्रष्ट हो जाता है
Kṛpa sprach: „Ein Mann, dem Selbstbeherrschung fehlt und der andere verachtet, fällt rasch aus dem Wohlstand. Wenn er, ohne den eigenen Geist zu zügeln, ein Ziel unter der Herrschaft von Begierde, Zorn, Furcht und Gier zu erreichen sucht, wird er bald seines Reichtums und seiner Macht beraubt.“
Verse 266
वार्यमाणो5करोद् वैरं पाण्डवैर्गुणवत्तरै: । दुर्योधन लोभी और अदूरदर्शी था। उसने मूर्खतावश न तो किसीका समर्थन प्राप्त किया और न स्वयं ही अधिक सोच-विचार किया। उसने अपना हित चाहनेवाले लोगोंका अनादर करके दुष्टोंक साथ सलाह की और सबके मना करनेपर भी अधिक गुणवान् पाण्डवोंके साथ वैर बाँध लिया
Obwohl man ihn immer wieder zurückhielt und beriet, wählte er dennoch die Feindschaft mit den Pāṇḍava, die an Tugend und Vorzüglichkeit überlegen waren. Duryodhana war gierig und kurzsichtig; aus Torheit suchte er weder die Unterstützung anderer noch dachte er selbst gründlich nach. Er verachtete die, die sein Wohl wollten, und beriet sich mit den Schlechten; und obwohl alle ihn davon abhielten, band er sich an eine verderbliche Feindschaft gegen die an Verdiensten reicheren Pāṇḍava.
Verse 283
अस्मानप्यनयस्तस्मात् प्राप्तोडयं दारुणो महान् | हमलोग जो उस पापीका अनुसरण करते हैं, इसीलिये हमें भी यह अत्यन्त दारुण अनर्थ प्राप्त हुआ है
Weil wir uns entschieden haben, jenem sündhaften Weg zu folgen, ist nun auch über uns dieses große, furchtbar grausame Unheil gekommen.
Verse 303
तत्रास्य बुद्धिर्विनयस्तत्र श्रेयश्व॒ पश्यति । जब मनुष्य मोहके वशीभूत हो हिताहितका निर्णय करनेमें असमर्थ हो जाय, तब उसे अपने सुहृदोंसे सलाह लेनी चाहिये। वहीं उसे बुद्धि और विनयकी प्राप्ति हो सकती है और वहीं उसे अपने हितका साधन भी दिखायी देता है
Kṛpa sprach: „Im Rat vertrauenswürdiger, wohlmeinender Freunde gewinnt der Mensch klare Einsicht und Demut; und dort erkennt er auch, was ihm wahrhaft nützt. Wenn einer von Verblendung überwältigt wird und nicht mehr zu entscheiden vermag, was heilsam und was unheilsam ist, soll er den Rat seiner Freunde suchen — durch sie erlangt er das Unterscheidungsvermögen zurück und ihm wird der Weg zu seinem eigenen Wohl gewiesen.“
Verse 316
तेअत्र पृष्टा यथा ब्रूयुस्तत् कर्तव्यं तथा भवेत् | पूछनेपर वे विद्वान् हितैषी अपनी बुद्धिसे उसके कार्योंके मूल कारणका निश्चय करके जैसी सलाह दें, वैसा ही उसे करना चाहिये
Kṛpa sprach: „Wenn man in dieser Sache die weisen, wohlmeinenden Männer befragt, dann soll, nachdem sie mit ihrem Verstand die Wurzelursache der Handlungen festgestellt haben, jeder Rat, den sie geben, als das zu Tuende gelten und entsprechend ausgeführt werden.“
Verse 326
उपपृच्छामहे गत्वा विदुरं च महामतिम् । अतः हमलोग राजा धुृतराष्ट्र, गान्धारी देवी तथा परम बुद्धिमान् विदुरजीके पास चलकर पूछें
Kṛpa sprach: „Lasst uns hingehen und Vidura befragen, den Hochgesinnten. Darum lasst uns zu König Dhṛtarāṣṭra, zu Königin Gāndhārī und zu Vidura, dem überaus Weisen, treten und Rat einholen.“
The dilemma concerns whether to attribute outcomes to fate or to personal agency, and how to act responsibly when effort may still fail—balancing diligence with humility and avoiding both fatalism and reckless overconfidence.
Sustained, competent effort guided by ethical intent and wise counsel is the recommended norm; success is most likely when initiative aligns with favorable conditions, and failure should be interpreted without collapsing into either blame-only or fate-only explanations.
No explicit phalaśruti is stated; the chapter’s meta-function is normative—establishing a practical-ethical framework for action and consultation that supports later decisions in the post-war narrative.