Adhyaya 150
Udyoga ParvaAdhyaya 15075 VersesPre-war escalation: Pandava forces fully mobilized and entering Kurukshetra; battle imminent but not yet engaged.

Adhyaya 150

Kaurava Mobilization at Kurukṣetra (Duryodhana Orders War Preparations) / कुरुक्षेत्रे धार्तराष्ट्र-सैन्यसज्जा

Upa-parva: Kurukṣetra-śibira-nirmāṇa (War-camp Mobilization Episode)

Janamejaya asks for a detailed account of events in the turbulent Kurujāṅgala region upon hearing that Yudhiṣṭhira, supported by Vāsudeva and allied kings (Virāṭa, Drupada, Kekayas, Vṛṣṇis, and many rulers), has taken position at Kurukṣetra with formidable warriors. Vaiśaṃpāyana responds that after Kṛṣṇa’s departure without completing the intended political task, Duryodhana anticipates escalation and interprets Kṛṣṇa as likely to speak against the Kauravas. He asserts that Vāsudeva favors conflict with him and that Bhīma and Arjuna align with Kṛṣṇa’s view; he recalls prior injuries inflicted upon the Pāṇḍavas and notes Virāṭa and Drupada as hostile commanders. Duryodhana then instructs Karṇa, Duḥśāsana, and Śakuni to execute comprehensive war preparations: building well-spaced, defensible camps on Kurukṣetra; ensuring access to water and wood; securing supply routes; stockpiling valuables and equipment; and readying standards, banners, armor, weapons, chariots, horses, and elephants. The chapter closes with a vivid civic tableau: rulers and warriors rise, adjust attire and ornaments, and the city becomes a roaring, ocean-like mass of troops and instruments—an administrative-military mobilization rendered as an organized public surge toward campaign.

Chapter Arc: Vaishampayana recalls that the Pandavas have already heard every detail of what transpired in the Kuru court—Krishna’s words, the temper of the assembly, and the closing of peace—so the hour turns from counsel to marching. → Yudhishthira is urged to order the division and arrangement of the army: seven akshauhinis are to be set in disciplined formation, with renowned leaders named and assigned, each capable of crushing the foe and even striking fear into Indra in battle. → The Pandava host surges forward into Kurukshetra: the earth seems to tremble under the tumult of horses, elephants, and chariots; conches and kettledrums roar from every side as banners rise and armor is fastened in haste. → The march becomes a complete war-camp in motion—wagons, markets, tents, treasury, engines, weapons, physicians and veterinarians—an entire kingdom converted into a fighting body, now fully committed to the field. → With the Pandava formations established on the sacred plain, the inevitable question hangs: how will the Kauravas answer this thunder with their own, and who will be the first to break the stillness into slaughter?

Shlokas

Verse 1

अत-#--#क्रञ (सैन्यनिर्याणपर्व) एकपज्चाशदधिकशततमो< ध्याय: पाण्डवपक्षके है 2000 05208 2 नाव तथा पाण्डव-सेनाका कुरुक्षेत्रमें प्रवेश वैशम्पायन उवाच जनार्दनवच: श्रुत्वा धर्मराजो युधिष्ठिर: । भ्रातृनुवाच धर्मात्मा समक्षं केशवस्य ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! भगवान्‌ श्रीकृष्णकी यह बात सुनकर धर्ममें ही मन लगाये रखनेवाले धर्मराज युधिष्ठिरने भगवानके सामने ही अपने भाइयोंसे कहा --

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! জনার্দন (শ্রীকৃষ্ণ)-এর বচন শুনে ধর্মে স্থিত ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির কেশবের সম্মুখেই তাঁর ভ্রাতৃগণকে বললেন—

Verse 2

श्रुतं भवद्धिर्यद्‌ वृत्त सभायां कुरुसंसदि । केशवस्यापि यद्‌ वाक्‍्यं तत्‌ सर्वमवधारितम्‌,“कौरवसभामें जो कुछ हुआ है वह सब वृत्तान्त तुमलोगोंने सुन लिया। फिर भगवान्‌ श्रीकृष्णने भी जो बात कही है, उसे भी अच्छी तरह समझ लिया होगा

বৈশম্পায়ন বললেন—কুরুসভায় যা কিছু ঘটেছিল, তা তোমরা সম্পূর্ণরূপে শুনেছ; আর কেশব (শ্রীকৃষ্ণ) সেখানে যে বাক্য বলেছিলেন, তাও তোমরা স্পষ্টভাবে উপলব্ধি করেছ।

Verse 3

तस्मात्‌ सेनाविभागं मे कुरुध्वं नरसत्तमा: । अक्षौहिण्यश्व सप्तैता: समेता विजयाय वै,“अत: नरश्रेष्ठ वीरो! अब तुमलोग भी अपनी सेनाका विभाग करो। ये सात अक्षौहिणी सेनाएँ एकत्र हो गयी हैं, जो अवश्य ही हमारी विजय करानेवाली होंगी

বৈশম্পায়ন বললেন—অতএব, হে নরশ্রেষ্ঠগণ, আমার নির্দেশমতো সেনাবিভাগ করো। এই সাত অক্ষৌহিণী সেনা একত্র হয়েছে—নিশ্চয়ই বিজয়ের জন্য।

Verse 4

तासां ये पतयः सप्त विख्यातास्तान्‌ निबोधत । द्रुपदश्न विराटश्न धृष्टदुम्नशिखण्डिनौ,“इन सातों अक्षौहिणियोंके जो सात विख्यात सेनापति हैं, उनके नाम बताता हूँ, सुनो। द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सात्यकि, चेकितान और पराक्रमी भीमसेन। ये सभी वीर हमारे लिये अपने शरीरका भी त्याग कर देनेको उद्यत हैं; अतः ये ही पाण्डवसेनाके संचालक होनेयोग्य हैं

বৈশম্পায়ন বললেন—ঐ সাত সেনার যে সাতজন প্রসিদ্ধ অধিনায়ক, তাদের নাম শোনো: দ্রুপদ ও বিরাট, ধৃষ্টদ্যুম্ন ও শিখণ্ডী।

Verse 5

सात्यकिश्नलेकितानश्नव भीमसेनश्न वीर्यवान्‌ । एते सेनाप्रणेतारो वीरा: सर्वे तनुत्यज:,“इन सातों अक्षौहिणियोंके जो सात विख्यात सेनापति हैं, उनके नाम बताता हूँ, सुनो। द्रुपद, विराट, धृष्टद्युम्न, शिखण्डी, सात्यकि, चेकितान और पराक्रमी भीमसेन। ये सभी वीर हमारे लिये अपने शरीरका भी त्याग कर देनेको उद्यत हैं; अतः ये ही पाण्डवसेनाके संचालक होनेयोग्य हैं

সাত্যকি, চেকিতান এবং পরাক্রমী ভীমসেন—এরাই সেনানায়ক; এ সকল বীর প্রাণ পর্যন্ত ত্যাগ করতে প্রস্তুত।

Verse 6

सर्वे वेदविद: शूरा: सर्वे सुचरितव्रता: । ह्वीमन्तो नीतिमन्तश्न सर्वे युद्धविशारदा:,“ये सब-के-सब वेदवेत्ता, शूरवीर, उत्तम व्रतका पालन करनेवाले, लज्जाशील, नीतिज्ञ और युद्धकुशल हैं

তাঁরা সকলেই বেদজ্ঞ, শূরবীর এবং সুশীল ব্রতপালক; লজ্জাশীল, নীতিজ্ঞ এবং যুদ্ধবিদ্যায় পারদর্শী।

Verse 7

इष्वस्त्रकुशला: सर्वे तथा सर्वास्त्रयोधिन: । सप्तानामपि यो नेता सेनानां प्रविभागवित्‌,“इन सबने धरनुर्वेदमें निपुणता प्राप्त की है तथा ये सब प्रकारके अस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेमें समर्थ हैं। अब यह विचार करना चाहिये कि इन सातोंका भी नेता कौन हो? जो सभी सेना- विभागोंको अच्छी तरह जानता हो तथा युद्धमें बाणरूपी ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भीष्मका आक्रमण सह सकता हो। पुरुषसिंह कुरुनन्दन सहदेव! पहले तुम अपना विचार प्रकट करो। हमारा प्रधान सेनापति होनेयोग्य कौन है

বৈশম্পায়ন বললেন—“এরা সকলেই ধনুর্বিদ্যায় পারদর্শী এবং সর্বপ্রকার অস্ত্রে যুদ্ধ করতে সক্ষম। এখন বিচার্য—এই সাতজনের মধ্যে কে নেতা হবে, যে সেনাবিভাগ ও বিন্যাস যথাযথভাবে জানে?”

Verse 8

यः सहेत रणे भीष्मं शरार्चि: पावकोपमम्‌ | त॑ तावत्‌ सहदेवात्र प्रब्रूहि कुरुनन्दन । स्वमतं पुरुषव्याप्र को नः सेनापति: क्षम:,“इन सबने धरनुर्वेदमें निपुणता प्राप्त की है तथा ये सब प्रकारके अस्त्रोंद्वारा युद्ध करनेमें समर्थ हैं। अब यह विचार करना चाहिये कि इन सातोंका भी नेता कौन हो? जो सभी सेना- विभागोंको अच्छी तरह जानता हो तथा युद्धमें बाणरूपी ज्वालाओंसे प्रज्वलित अग्निके समान तेजस्वी भीष्मका आक्रमण सह सकता हो। पुरुषसिंह कुरुनन्दन सहदेव! पहले तुम अपना विचार प्रकट करो। हमारा प्रधान सेनापति होनेयोग्य कौन है

“যে রণে তীরের শিখায় অগ্নিসদৃশ দীপ্ত ভীষ্মকে সহ্য করতে পারে—হে কুরু-নন্দন সহদেব, তুমি আগে এখানে তোমার মত বলো। হে পুরুষব্যাঘ্র, আমাদের সেনাপতি হওয়ার যোগ্য কে?”

Verse 9

सहदेव उवाच संयुक्त एकदुःखश्न वीर्यवांश्व महीपति: । यं समाश्रित्य धर्मज्ञं स्वमंशमनुयुञ्ज्महे,सहदेव बोले--जो हमारे सम्बन्धी हैं, दुःखमें हमारे साथ एक होकर रहनेवाले और पराक्रमी भूपाल हैं, जिन धर्मज्ञ वीरका आश्रय लेकर हम अपना राज्यभाग प्राप्त कर सकते हैं तथा जो बलवान, अस्त्रविद्यामें निपुण और युद्धमें उन्‍्मत्त होकर लड़नेवाले हैं, वे मत्स्यनरेश विराट संग्रामभूमिमें भीष्म तथा अन्य महारथियोंका सामना अच्छी तरह सहन कर सकेंगे

সহদেব বললেন—“এক পরাক্রমী রাজা আছেন—আমাদের আত্মীয়—যিনি দুঃখে আমাদের সঙ্গে এক হয়ে থেকেছেন। সেই ধর্মজ্ঞ ও বিচক্ষণ বীরের আশ্রয় নিলে আমরা রাজ্যের ন্যায্য অংশ পুনরুদ্ধার করতে পারি।”

Verse 10

मत्स्यो विराटो बलवान कृतास्त्रो युद्धदुर्मद: । प्रसहिष्यति संग्रामे भीष्म तांश्ष॒ महारथान्‌,सहदेव बोले--जो हमारे सम्बन्धी हैं, दुःखमें हमारे साथ एक होकर रहनेवाले और पराक्रमी भूपाल हैं, जिन धर्मज्ञ वीरका आश्रय लेकर हम अपना राज्यभाग प्राप्त कर सकते हैं तथा जो बलवान, अस्त्रविद्यामें निपुण और युद्धमें उन्‍्मत्त होकर लड़नेवाले हैं, वे मत्स्यनरेश विराट संग्रामभूमिमें भीष्म तथा अन्य महारथियोंका सामना अच्छी तरह सहन कर सकेंगे

সহদেব বললেন—“মৎস্যরাজ বিরাট বলবান, অস্ত্রবিদ্যায় প্রশিক্ষিত এবং যুদ্ধে উন্মত্ত-প্রতাপী। তিনি রণক্ষেত্রে ভীষ্ম ও সেই সকল মহারথীর আঘাত সহ্য করতে সক্ষম হবেন।”

Verse 11

वैशम्पायन उवाच तथोक्ते सहदेवेन वाक्ये वाक्यविशारद: । नकुलो<नन्तरं तस्मादिदं वचनमाददे,वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! सहदेवके इस प्रकार कहनेपर प्रवचनकुशल नकुलने उनके बाद यह बात कही--

বৈশম্পায়ন বললেন—“সহদেব এভাবে বলার পর, বাক্যপ্রয়োগে নিপুণ নকুল তাঁর পরপরই এই কথা বললেন।”

Verse 12

वयसा शाम्त्रतो धैर्यात्‌ कुलेनाभिजनेन च । ह्वीमान्‌ बलान्वित: श्रीमान्‌ सर्वशास्त्रविशारद:

তিনি বয়সের পরিপক্বতায় সমৃদ্ধ, শাস্ত্রপ্রমাণে প্রতিষ্ঠিত, ধৈর্যে অচঞ্চল, কুল ও অভিজাত্যে ভূষিত। লজ্জাশীল, বলবান, শ্রীসম্পন্ন এবং সর্বশাস্ত্রে বিশারদ—ধর্মরক্ষায় উপযুক্ত নেতা ছিলেন।

Verse 13

वेद चास्त्रं भरद्वाजाद्‌ दुर्धर्ष: सत्यसड्गर: । यो नित्यं स्पर्धते द्रोणं भीष्मं चैव महाबलम्‌

তিনি ভরদ্বাজের নিকট থেকে বেদ ও অস্ত্রবিদ্যা শিখেছিলেন। তিনি দুর্ধর্ষ, সত্যযুদ্ধে অটল; যিনি নিত্যই দ্রোণ ও মহাবলী ভীষ্মের সঙ্গে প্রতিদ্বন্দ্বিতা করতেন।

Verse 14

श्लाघ्य: पार्थिववंशस्य प्रमुखे वाहिनीपति: । पुत्रपौत्रै: परिवृत: शतशाख इव द्रुम:

তিনি রাজবংশের শ্লাঘ্য পুরুষ, অগ্রভাগে সেনাপতি ছিলেন। পুত্র-পৌত্রে পরিবৃত তিনি শতশাখী বৃক্ষের ন্যায় শোভিত ছিলেন।

Verse 15

यस्तताप तपो घोर सदार: पृथिवीपति: । रोषाद द्रोणविनाशाय वीर: समितिशोभन:

সেই পৃথিবীপতি, পত্নীসহ, ঘোর তপস্যা করলেন। ক্রোধবশত দ্রোণবধের উদ্দেশ্যে সেই বীর—সমরে শোভন—কঠোর তপে রত রইলেন।

Verse 16

पितेवास्मान्‌ समाधत्ते यः सदा पार्थिवर्षभ: । श्वशुरो द्रुपदो5स्माकं सेनाग्रं स प्रकर्षतु

যিনি সর্বদা পিতার মতো আমাদের সামলে ও স্থির রাখেন, সেই রাজশ্রেষ্ঠ—আমাদের শ্বশুর দ্রুপদ—এখন সেনার অগ্রভাগ গ্রহণ করে তাকে অগ্রসর করুন।

Verse 17

स द्रोणभीष्मावायातौ सहेदिति मतिर्मम । स हि दिव्यास्त्रविद्‌ राजा सखा चाड्रिरसो नृप:

বৈশম্পায়ন বললেন—“দ্রোণ ও ভীষ্ম যদি আমার বিরুদ্ধে আসেন, তবু আমি সহ্য করব—এই আমার সংকল্প। কারণ সেই রাজা দিব্যাস্ত্রবিদ, আর হে নৃপ, পর্বতজাত (যোদ্ধা)-এরও বন্ধু।”

Verse 18

“जो अवस्था, शास्त्रज्ञान, धैर्य, कुल और स्वजनसमूह सभी दृष्टियोंसे बड़े हैं, जिनमें लज्जा, बल और श्री तीनों विद्यमान हैं, जो समस्त शास्त्रोंके ज्ञानमें प्रवीण हैं, जिन्हें महर्षि भरद्वाजसे अस्त्रोंकी शिक्षा प्राप्त हुई है, जो सत्यप्रतिज्ञ एवं दुर्धर्ष योद्धा हैं, महाबली भीष्म और द्रोणाचार्यसे सदा स्पर्धा रखते हैं, जो समस्त राजाओंके समूहकी प्रशंसाके पात्र हैं और युद्धके मुहानेपर खड़े हो समस्त सेनाओंकी रक्षा करनेमें समर्थ हैं, बहुत-से पुत्र-पौत्रोंद्वारा घिरे रहनेके कारण जिनकी सैकड़ों शाखाओंसे सम्पन्न वृक्षकी भाँति शोभा होती है, जिन महाराजने रोषपूर्वक द्रोणाचार्यके विनाशके लिये पत्नीसहित घोर तपस्या की है, जो संग्रामभूमिमें सुशोभित होनेवाले शूरवीर हैं और हमलोगोंपर सदा ही पिताके समान स्नेह रखते हैं, वे हमारे श्वशुर भूपालशिरोमणि ट्रुपद हमारी सेनाके प्रमुख भागका संचालन करें। मेरे विचारसे राजा ट्रुपद ही युद्धके लिये सम्मुख आये हुए द्रोणाचार्य और भीष्मपितामहका सामना कर सकते हैं; क्योंकि वे दिव्यास्त्रोंके ज्ञाता और द्रोणाचार्यके सखा हैं || १२-- १७ || माद्रीसुताभ्यामुक्ते तु स्‍्वमते कुरुनन्दन: । वासविर्वासवसम: सव्यसाच्यब्रवीद्‌ वच:,माद्रीकुमारोंक इस प्रकार अपना विचार प्रकट करनेपर कुरुकुलको आनन्दित करनेवाले इन्द्रके समान पराक्रमी, इन्द्रपुत्र सव्यसाची अर्जुनने इस प्रकार कहा--

বৈশম্পায়ন বললেন—মাদ্রীর দুই পুত্র যখন নিজেদের সুচিন্তিত মত প্রকাশ করল, তখন কুরুবংশের আনন্দ, ইন্দ্রসম পরাক্রমী ইন্দ্রপুত্র সব্যসাচী অর্জুন এই বাক্য বললেন।

Verse 19

यो<यं तपःप्रभावेण ऋषिसंतोषणेन च । दिव्य: पुरुष उत्पन्नो ज्वालावर्णो महाभुज:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान्‌ महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान्‌ वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है

বৈশম্পায়ন বললেন—“এই দিব্য পুরুষ, অগ্নিশিখার ন্যায় দীপ্তিমান ও মহাবাহু, পিতার তপস্যার প্রভাবে এবং ঋষিদের সন্তোষ লাভে জন্ম নিয়েছে।”

Verse 20

धनुष्मान्‌ कवची खड्गी रथमारुहा[ दंशित: । दिव्यैरहयवरैर्युक्तमग्निकुण्डात्‌ समुत्थित:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान्‌ महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान्‌ वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है

বৈশম্পায়ন বললেন—ধনুকধারী, বর্মধারী, খড়্গধারী, যুদ্ধসজ্জায় সজ্জিত হয়ে সে রথে আরোহণ করল। উৎকৃষ্ট দিব্য অশ্বে যুক্ত রথসহ সে অগ্নিকুণ্ড থেকে উদ্ভূত হয়েছিল।

Verse 21

गर्जन्निव महामेघो रथघोषेण वीर्यवान्‌ । सिंहसंहननो वीर: सिंहतुल्यपराक्रम:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान्‌ महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान्‌ वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है

বৈশম্পায়ন বললেন—পরাক্রমী সেই বীর রথের গর্জনে যেন মহামেঘের মতো গর্জে ওঠে। সিংহসম গঠনের সেই যোদ্ধা সিংহতুল্য পরাক্রমশালী।

Verse 22

सिंहोरस्क: सिंहभुज: सिंहवक्षा महाबल: । सिंहप्रगर्जनो वीर: सिंहस्कन्धो महाद्युति:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान्‌ महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान्‌ वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है

তিনি সিংহবক্ষ, সিংহবাহু, সিংহবক্ষস্থল-সম, মহাবলী। সিংহের ন্যায় গর্জনকারী সেই বীর সিংহস্কন্ধ ও মহাদ্যুতিমান।

Verse 23

सुभू: सुदंष्ट्र: सुहनु: सुबाहु: सुमुखो5कृश: । सुजन्रु: सुविशालाक्ष: सुपाद: सुप्रतिक्तित:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान्‌ महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान्‌ वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है

তিনি শুভদেহী, সুদংশ্ট্র, সুহনু, সুবাহু, সুমুখ এবং অকৃশ। তাঁর জানু সুন্দর, নয়ন বিশাল, পদযুগল মনোহর, এবং তিনি সুপ্রতিষ্ঠিত (অভেদ্যরূপে সুরক্ষিত)।

Verse 24

अभेद्य: सर्वशस्त्राणां प्रभिन्न इव वारण: । जज्ञे द्रोणविनाशाय सत्यवादी जितेन्द्रिय:,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान्‌ महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान्‌ वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है

তিনি সকল অস্ত্রে অভেদ্য—বন্ধন ভেঙে বেরোনো গজরাজের ন্যায়। সত্যবাদী ও জিতেন্দ্রিয় তিনি দ্রোণের বিনাশার্থে জন্মেছেন।

Verse 25

धृष्टद्युम्नमहं मन्‍्ये सहेद्‌ भीष्मस्य सायकान्‌ । वज्जाशनिसमस्पर्शान्‌ दीप्तास्यथानुरगानिव,“जो अग्निकी ज्वालाके समान कान्तिमान्‌ महाबाहु वीर अपने पिताकी तपस्याके प्रभावसे तथा महर्षियोंके कृपा-प्रसादसे उत्पन्न हुआ दिव्य पुरुष है, जो अग्निकुण्डसे कवच, धनुष और खड्ग धारण किये प्रकट हुआ और तत्काल ही दिव्य एवं उत्तम अअश्वोंसे जुते हुए रथपर आरूढ़ हो युद्धके लिये सुसज्जित देखा गया था, जो पराक्रमी वीर अपने रथकी घरघराहटसे गर्जते हुए महामेघके समान जान पड़ता है, जिसके शरीरकी गठन, पराक्रम, हृदय, वक्ष:स्थल, बाहु, कंधे और गर्जना--ये सभी सिंहके समान हैं, जो महाबली, महातेजस्वी और महान्‌ वीर है, जिसकी भौंहें, दन्तपंक्ति, ठोड़ी, भुजाएँ और मुख बहुत सुन्दर हैं, जो सर्वथा हृष्ट-पुष्ट है, जिसके गलेकी हँसुली सुन्दर दिखायी देती है, जिसके बड़े- बड़े नेत्र और चरण परम सुन्दर हैं, जिसका किसी भी अस्त्र-शस्त्रसे भेद नहीं हो सकता, जो मदकी धारा बहानेवाले गजराजके सदृश पराक्रमी वीर द्रोणाचार्यका विनाश करनेके लिये उत्पन्न हुआ है तथा जो सत्यवादी एवं जितेन्द्रिय है, उस धृष्टद्युम्नको ही मैं प्रधान सेनापति बनानेके योग्य मानता हूँ। पितामह भीष्मके बाण प्रज्वलित मुखवाले सर्पोके समान भयंकर हैं, उनका स्पर्श वज़ और अशनिके समान दुः:सह है, वीर धृष्टद्युम्न ही उन बाणोंका आघात सह सकता है

আমি মনে করি ধৃষ্টদ্যুম্ন ভীষ্মের সেই শরসমূহ সহ্য করতে সক্ষম—যাদের স্পর্শ বজ্র ও অশনির ন্যায় অসহনীয়, আর যারা দীপ্তমুখ সর্পের মতো ধেয়ে আসে।

Verse 26

यमदूतसमान्‌ वेगे निपाते पावकोपमान्‌ | रामेणाजौ विषहितान्‌ वज्ननिष्पेषदारुणान्‌,“पितामह भीष्मके बाण आघात करनेमें अग्निके समान तेजस्वी एवं यमदूतोंके समान प्राणोंका हरण करनेवाले हैं। वज्की गड़गड़ाहटके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उन बाणोंको पहले युद्धमें परशुरामजीने ही सहा था। राजन! मैं धृष्टद्युम्नके सिवा ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता, जो महान्‌ व्रतधारी भीष्मका वेग सह सके। मेरा तो यही निश्चय है

বেগে তারা যমদূতের ন্যায়, আঘাতে অগ্নির ন্যায়। সেই বাণসমূহ—বজ্রাঘাতের মতো নিষ্পেষণকারী ও ভয়ংকর—যুদ্ধে রাম (পরশুরাম) একদা সহ্য করেছিলেন।

Verse 27

पुरुषं तं॑ न पश्यामि य: सहेत महाव्रतम्‌ । धृष्टद्युम्नमृते राजन्निति मे धीयते मति:,“पितामह भीष्मके बाण आघात करनेमें अग्निके समान तेजस्वी एवं यमदूतोंके समान प्राणोंका हरण करनेवाले हैं। वज्की गड़गड़ाहटके समान गम्भीर शब्द करनेवाले उन बाणोंको पहले युद्धमें परशुरामजीने ही सहा था। राजन! मैं धृष्टद्युम्नके सिवा ऐसे किसी पुरुषको नहीं देखता, जो महान्‌ व्रतधारी भीष्मका वेग सह सके। मेरा तो यही निश्चय है

বৈশম্পায়ন বললেন—হে রাজন, মহাব্রতধারী ভীষ্মের প্রবল আঘাত সহ্য করতে পারে এমন কোনো পুরুষকে আমি দেখি না। ধৃষ্টদ্যুম্ন ব্যতীত আর কাউকে আমি তাঁর বল সহ্য করতে সক্ষম মনে করি না—এটাই আমার স্থির সিদ্ধান্ত।

Verse 28

क्षिप्रहस्तश्चित्रयोधी मत: सेनापतिर्मम । अभेद्यकवच: श्रीमान्‌ मातड़ इव यूथप:,'जो शीघ्रतापूर्वक हस्तसंचालन करनेवाला, विचित्र पद्धतिसे युद्ध करनेमें कुशल, अभेद्य कवचसे सम्पन्न एवं यूथयति गजराजकी भाँति सुशोभित होनेवाला है, मेरी सम्मतिमें वह श्रीमान्‌ धृष्टद्युम्न ही सेनापति होनेके योग्य है”

আমার মতে ধৃষ্টদ্যুম্নই সেনাপতি হওয়ার যোগ্য—তিনি দ্রুতহস্ত, বিচিত্র কৌশলে যুদ্ধে পারদর্শী, অভেদ্য কবচে সুরক্ষিত এবং দলের অগ্রগণ্য গজরাজের ন্যায় দীপ্তিমান।

Verse 29

(वैशग्पायन उवाच अर्जुनेनैवमुक्ते तु भीमो वाक्यं समाददे ।।) वैशम्पायनजी कहते हैं--जनमेजय! अर्जुनके ऐसा कहनेपर भीमसेनने अपना विचार इस प्रकार प्रकट किया। भीमसेन उवाच वधार्थ य: समुत्पन्न: शिखण्डी द्रुपदात्मज: । वदन्ति सिद्धा राजेन्द्र ऋषयश्च॒ समागता:

বৈশম্পায়ন বললেন—জনমেজয়! অর্জুন এ কথা বলার পর ভীম এই বাক্য বললেন। ভীমসেন বললেন—হে রাজেন্দ্র! দ্রুপদপুত্র শিখণ্ডী তো বধের উদ্দেশ্যেই জন্মেছে। সিদ্ধগণ ও সমবেত ঋষিরা এ কথাই বলেন।

Verse 30

यस्य संग्राममध्ये तु दिव्यमस्त्र प्रकुर्वत: । रूप॑ द्रक्ष्यन्ति पुरुषा रामस्येव महात्मन:

যুদ্ধের মাঝখানে তিনি যখন দিব্য অস্ত্র প্রয়োগ করবেন, তখন মানুষ তাঁর রূপ মহাত্মা রামের ন্যায় দেখবে।

Verse 31

नतं युद्धे प्रपश्यामि यो भिन्द्यात्‌ तु शिखण्डिनम्‌ । शस्त्रेण समरे राजन्‌ संनद्ध॑ स्यन्दने स्थितम्‌

হে রাজন! সমরে অস্ত্র দিয়ে শিখণ্ডীকে বিদ্ধ করতে পারে—যিনি সম্পূর্ণ সজ্জিত হয়ে রথে অবস্থান করেন—এমন কাউকে আমি যুদ্ধে দেখি না।

Verse 32

द्वैरथे समरे नान्यो भीष्म॑ हन्यान्महाव्रतम्‌ । शिखण्डिनमृते वीर॑ स मे सेनापतिर्मत:

ভীমসেন বললেন—বীর! রথযুদ্ধে, মহাব্রতধারী পিতামহ ভীষ্মকে শিখণ্ডী ব্যতীত আর কেউ বধ করতে পারে না। অতএব আমার মতে সেই-ই আমাদের সেনাপতি।

Verse 33

भीमसेनने कहा--राजेन्द्र! ट्रपदकुमार शिखण्डी पितामह भीष्मका वध करनेके लिये ही उत्पन्न हुआ है। यह बात यहाँ पधारे हुए सिद्धों एवं महर्षियोंने बतायी है! संग्रामभूमिमें जब वह अपना दिव्यास्त्र प्रकट करता है, उस समय लोगोंको उसका स्वरूप महात्मा परशुरामके समान दिखायी देता है। मैं ऐसे किसी वीरको नहीं देखता, जो युद्धमें शिखण्डीको मार सके। राजन! जब महाव्रती भीष्म रथपर बैठकर अस्त्र-शस्त्रोंसे सुसज्जित हो सामने आयेंगे, उस समय द्वैरथ युद्धमें शूरवीर शिखण्डीके सिवा दूसरा कोई योद्धा उन्हें नहीं मार सकता। अतः मेरे मतमें वही प्रधान सेनापति होनेके योग्य है ।। २९-- ३२ || युधिषछिर उवाच सर्वस्य जगतस्तात सारासारं बलाबलम्‌ | सर्व जानाति धर्मात्मा मतमेषां च केशव:,युधिष्ठिर बोले--तात! धर्मात्मा भगवान्‌ श्रीकृष्ण सम्पूर्ण जगत्‌के समस्त सारासार और बलाबलको जानते हैं तथा इस विषयमें इन सब राजाओंका क्‍या मत है--इससे भी ये पूर्ण परिचित हैं

ভীমসেন বললেন—রাজেন্দ্র! দ্রুপদপুত্র শিখণ্ডী পিতামহ ভীষ্মবধের জন্যই জন্মেছে—এ কথা এখানে আগত সিদ্ধ ও মহর্ষিগণ বলেছেন। যুদ্ধক্ষেত্রে যখন সে তার দিব্যাস্ত্র প্রকাশ করে, তখন লোকেরা তাকে মহাত্মা পরশুরামের ন্যায় দেখতে পায়। আমি এমন কোনো বীর দেখি না যে যুদ্ধে শিখণ্ডীকে বধ করতে পারে। রাজন! মহাব্রতধারী ভীষ্ম যখন রথে আরোহণ করে অস্ত্রশস্ত্রে সজ্জিত হয়ে সম্মুখে আসবেন, তখন রথদ্বন্দ্বে শিখণ্ডী ব্যতীত অন্য কোনো যোদ্ধা তাঁকে বধ করতে পারবে না। অতএব আমার মতে সেই-ই প্রধান সেনাপতি হওয়ার যোগ্য। যুধিষ্ঠির বললেন—পিতা! ধর্মাত্মা কেশব সমগ্র জগতের সার-অসার ও বল-অবল জানেন, এবং এই বিষয়ে এই সকল রাজাদের মতও তিনি সম্পূর্ণ অবগত।

Verse 34

यमाह कृष्णो दाशार्ह: सो<स्तु सेनापतिर्मम । कृतास्त्रो5प्यकृतास्त्रो वा वृद्धो वा यदि वा युवा,अतः दशाहकुलभूषण श्रीकृष्ण जिसका नाम बतावें, वही हमारी सेनाका प्रधान सेनापति हो। फिर वह अस्त्र-विद्यामें निपुण हो या न हो, वृद्ध हो या युवा हो (इसकी चिन्ता अपने लोगोंको नहीं करनी चाहिये)

যুধিষ্ঠির বললেন—দাশার্হ কৃষ্ণ যাঁর নাম উচ্চারণ করবেন, তিনিই আমার সেনাপতি হোন। তিনি অস্ত্রবিদ্যায় প্রশিক্ষিত হোন বা না হোন, বৃদ্ধ হোন বা যুবা—এ নিয়ে আমাদের লোকদের উদ্বিগ্ন হওয়া উচিত নয়।

Verse 35

एष नो विजये मूलमेष तात विपर्यये । अत्र प्राणाश्न राज्यं च भावाभावौ सुखासुखे,तात! ये भगवान्‌ ही हमारी विजय अथवा पराजयके मूल कारण हैं। हमारे प्राण, राज्य, भाव, अभाव तथा सुख और दु:ख इन्हींपर अवलम्बित हैं

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতা! তিনিই আমাদের বিজয়ের মূল, এবং বিপর্যয়েরও মূল। আমাদের প্রাণ, আমাদের রাজ্য, লাভ-ক্ষতি, সুখ-দুঃখ—সবই তাঁর উপর নির্ভরশীল।

Verse 36

एष धाता विधाता च सिद्धिरत्र प्रतिष्ठिता । यमाह कृष्णो दाशार्ह: सो<स्तु नो वाहिनीपति:,यही सबके कर्ता-धर्ता हैं। हमारे समस्त कार्योंकी सिद्धि इन्हींपर निर्भर करती है। अतः भगवान्‌ श्रीकृष्ण जिसके लिये प्रस्ताव करें, वही हमारी विशाल वाहिनीका प्रधान अधिनायक हो

যুধিষ্ঠির বললেন—তিনিই ধাতা ও বিধাতা; আমাদের সকল কার্যের সিদ্ধি তাঁর মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত। অতএব দাশার্হ কৃষ্ণ যাঁকে বলবেন, তিনিই আমাদের বাহিনীর অধিনায়ক হোন।

Verse 37

ब्रवीतु वदतां श्रेष्ठो निशा समभिवर्तते । ततः सेनापतिं कृत्वा कृष्णस्य वशवर्तिन:,अतः वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण अपना विचार प्रकट करें। इस समय रात्रि है। हम अभी सेनापतिका निर्वाचन करके रात बीतनेपर अस्त्र-शस्त्रोंका अधिवासन (गन्ध आदि उपचारोंद्वारा पूजन), कौतुक (रक्षाबन्धन आदि) तथा मंगलकृत्य (स्वस्तिवाचन आदि) करनेके अनन्तर श्रीकृष्णके अधीन हो समरांगणकी यात्रा करेंगे

বক্তাদের মধ্যে শ্রেষ্ঠ শ্রীকৃষ্ণ তাঁর মত প্রকাশ করুন; রাত্রি ঘনিয়ে আসছে। তারপর সেনাপতি নিযুক্ত করে আমরা কৃষ্ণের নির্দেশাধীন থাকব; রাত্রি অতিক্রান্ত হলে অস্ত্র-শস্ত্রের অধিবাসন, কৌতুক-রক্ষা ও মঙ্গলকর্ম সম্পন্ন করে শৃঙ্খলাবদ্ধভাবে রণক্ষেত্রের পথে যাত্রা করব।

Verse 38

रात्रे: शेषे व्यतिक्रान्ते प्रयास्यामो रणाजिरम्‌ । अधिवासितश्त्राश्व॒ कृतकौतुकमड़ला:,अतः वक्ताओंमें श्रेष्ठ श्रीकृष्ण अपना विचार प्रकट करें। इस समय रात्रि है। हम अभी सेनापतिका निर्वाचन करके रात बीतनेपर अस्त्र-शस्त्रोंका अधिवासन (गन्ध आदि उपचारोंद्वारा पूजन), कौतुक (रक्षाबन्धन आदि) तथा मंगलकृत्य (स्वस्तिवाचन आदि) करनेके अनन्तर श्रीकृष्णके अधीन हो समरांगणकी यात्रा करेंगे

রাত্রির অবশিষ্ট অংশ অতিক্রান্ত হলে আমরা রণক্ষেত্রে যাত্রা করব। অস্ত্র-শস্ত্র ও অশ্বের অধিবাসন করে, কৌতুক-রক্ষা ও মঙ্গলকর্ম সম্পন্ন করে, শ্রীকৃষ্ণের নির্দেশে আমরা যুদ্ধভূমির দিকে অগ্রসর হব।

Verse 39

वैशम्पायन उवाच तस्य तद्‌ वचन श्रुत्वा धर्मराजस्य धीमत: । अब्रवीत्‌ पुण्डरीकाक्षो धनंजयमवेक्ष्य ह,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णने अर्जुनकी ओर देखते हुए कहा--“महाराज! आपलोगोंने जिन-जिन वीरोंके नाम लिये हैं, ये सभी मेरी रायमें भी सेनापति होनेके योग्य हैं; क्योंकि ये सभी बड़े पराक्रमी योद्धा हैं

বৈশম্পায়ন বললেন—বুদ্ধিমান ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের সেই কথা শুনে পদ্মনয়ন শ্রীকৃষ্ণ ধনঞ্জয় (অর্জুন)-এর দিকে চেয়ে বললেন।

Verse 40

ममाप्येते महाराज भवद्धिर्य उदाहता: । नेतारस्तव सेनाया मता विक्रान्तयोधिन:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन! बुद्धिमान्‌ धर्मराज युधिष्ठिरकी यह बात सुनकर कमलनयन भगवान्‌ श्रीकृष्णने अर्जुनकी ओर देखते हुए कहा--“महाराज! आपलोगोंने जिन-जिन वीरोंके नाम लिये हैं, ये सभी मेरी रायमें भी सेनापति होनेके योग्य हैं; क्योंकि ये सभी बड़े पराक्रमी योद्धा हैं

হে মহারাজ! আপনি যাঁদের যাঁদের নাম করেছেন, তাঁরা সকলেই আমার মতেও আপনার সেনার নেতা হওয়ার যোগ্য; কারণ তাঁরা সবাই বীর বিক্রমশালী যোদ্ধা।

Verse 41

सर्व एव समर्था हि तव शत्रु प्रबाधितुम्‌ । इन्द्रस्यापि भयं होते जनयेयुर्महाहवे

তাঁরা সকলেই আপনার শত্রুদের দমন করতে সক্ষম। মহাযুদ্ধে তাঁরা ইন্দ্রের মনেও ভয় সঞ্চার করতে পারেন।

Verse 42

मयापि हि महाबाहो त्वत्प्रियार्थ महाहवे,“महाबाहु भरतनन्दन! मैंने भी महान्‌ युद्धकी सम्भावना देखकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये शान्ति-स्थापनके निमित्त महान्‌ प्रयत्न किया था। इससे हमलोग धर्मके ऋणसे भी उऋण हो गये हैं। दूसरोंके दोष बतानेवाले लोग भी अब हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं कर सकते

বৈশম্পায়ন বললেন—হে মহাবাহু! মহাযুদ্ধের সম্ভাবনা আগেই দেখে তোমার প্রিয়ার্থে শান্তি স্থাপনের জন্য আমিও মহাপ্রয়াস করেছি। তাতে আমরা ধর্মের ঋণ থেকেও মুক্ত হয়েছি; অতএব যারা সর্বদা অন্যের দোষ খোঁজে, তারাও এখন আমাদের উপর দোষারোপ করতে পারে না।

Verse 43

कृतो यत्नो महांस्तत्र शम: स्यथादिति भारत । धर्मस्य गतमानृण्यं न सम वाच्या विवक्षताम्‌,“महाबाहु भरतनन्दन! मैंने भी महान्‌ युद्धकी सम्भावना देखकर तुम्हारा प्रिय करनेके लिये शान्ति-स्थापनके निमित्त महान्‌ प्रयत्न किया था। इससे हमलोग धर्मके ऋणसे भी उऋण हो गये हैं। दूसरोंके दोष बतानेवाले लोग भी अब हमारे ऊपर दोषारोपण नहीं कर सकते

বৈশম্পায়ন বললেন—হে ভারত! সেখানে শান্তি প্রতিষ্ঠিত হোক—এই উদ্দেশ্যে মহাপ্রয়াস করা হয়েছিল। তাতে আমরা ধর্মের অবশিষ্ট ঋণ থেকেও মুক্ত হয়েছি; অতএব যারা অন্যের দোষ বলতে উদ্‌গ্রীব, তারাও এখন আমাদের বিরুদ্ধে সমান দোষ আরোপ করতে পারে না।

Verse 44

कृतास्त्रं मन्यते बाल आत्मानमविचक्षण: । धार्तराष्ट्रो बलस्थं च पश्यत्यात्मानमातुर:,धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन युद्धके लिये आतुर हो रहा है। वह मूर्ख और अयोग्य होकर भी अपनेको अस्त्रविद्यामें पारंगत मानता है और दुर्बल होकर भी अपनेको बलवान्‌ समझता है

ধৃতরাষ্ট্রপুত্র দুর্যোধন যুদ্ধের জন্য ব্যাকুল। অবিবেচক সেই বালক নিজেকে অস্ত্রবিদ্যায় সিদ্ধ বলে মনে করে; আর দুর্বল হয়েও নিজেকেই শক্তিমান বলে দেখে।

Verse 45

युज्यतां वाहिनी साधु वधसाध्या हि मे मता: । न धार॑राष्ट्रा: शक्ष्यन्ति स्थातुं दृष्टवा धनंजयम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—সেনাদলকে যথাযথভাবে সাজাও। আমার বিচারে তারা বধেরই যোগ্য। ধনঞ্জয় (অর্জুন)কে দেখামাত্র ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রেরা স্থির থাকতে পারবে না।

Verse 46

भीमसेनं च संक्रुद्धं यमौ चापि यमोपमौ । युयुधानद्वितीयं च धृष्टद्युम्नममर्षणम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—তিনি ক্রোধে দগ্ধ ভীমসেনকে, যমসম পরাক্রমী যমজ দুই ভাইকে, যুদ্ধে অদ্বিতীয় যুযুধান (সাত্যকি)কে এবং অপমান অসহ্যকারী তীব্র ধৃষ্টদ্যুম্নকে দেখলেন।

Verse 47

अभिमन्यु द्रौपदेयान्‌ विराटद्रुपदावपि । अक्षौहिणीपतीं क्षान्यान्‌ नरेन्द्रान्‌ भीमविक्रमान्‌

অভিমন্যু, দ্রৌপদীর পুত্রগণ, এবং বিরাট ও দ্রুপদ—আরও বহু ভীমবিক্রম রাজা, যাঁরা অক্ষৌহিণী সেনার অধিপতি—সকলেই সেখানে সমবেত ছিলেন।

Verse 48

अतः आप अपनी सेनाको युद्धके लिये अच्छी तरहसे सुसज्जित कीजिये; क्योंकि मेरे मतमें वे शत्रुवधसे ही वशीभूत हो सकते हैं। वीर अर्जुन, क्रोधमें भरे हुए भीमसेन यमराजके समान नकुल-सहदेव, सात्यकिसहित अमर्षशील धृष्टद्युम्न, अभिमन्यु, द्रौपदीके पाँचों पुत्र, विराट, द्रुपद तथा अक्षौहिणी सेनाओंके अधिपति अन्यान्य भयंकर पराक्रमी नरेशोंको युद्धके लिये उद्यत देखकर धृतराष्ट्रके पुत्र रणभूमिमें टिक नहीं सकेंगे || ४५-- ४७ || सारवद्‌ बलमस्माकं दुष्प्रधर्ष दुरासदम्‌ । धार्तराष्ट्रबलं संख्ये हनिष्पति न संशय:

আমাদের বাহিনী সুসংগঠিত, দৃঢ়, দুর্ধর্ষ ও দুরাসদ। রণক্ষেত্রে তা ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের সেনাকে বিনাশ করবে—এতে কোনো সন্দেহ নেই।

Verse 49

धृष्टद्युम्नमहं मन्‍्ये सेनापतिमरिंदम । “हमारी सेना अत्यन्त शक्तिशाली, दुर्धर्ष और दुर्गम है। वह युद्धमें धृतराष्ट्रपुत्रोंकी सेनाका संहार कर डालेगी, इसमें संशय नहीं है। शत्रुदमन! मैं धृष्टद्युम्नको ही प्रधान सेनापति होनेयोग्य मानता हूँ || ४८ है ।। वैशम्पायन उवाच एवमुक्ते तु कृष्णेन सम्प्राह्ष्यन्नरोत्तमा:,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। फिर तो युद्धके लिये 'सुसज्जित हो जाओ, सुसज्जित हो जाओ' ऐसा कहते हुए समस्त सैनिक बड़ी उतावलीके साथ दौड़-धूप करने लगे। उस समय प्रसन्न चित्तवाले उन वीरोंका महान्‌ हर्षनबाद सब ओर गूँज उठा

হে শত্রুদমন! আমি ধৃষ্টদ্যুম্নকেই সেনাপতি বলে মনে করি।

Verse 50

तेषां प्रहषमनसां नाद: समभवन्महान्‌ । योग इत्यथ सैन्यानां त्वरतां सम्प्रधावताम्‌,वैशम्पायनजी कहते हैं--राजन्‌! भगवान्‌ श्रीकृष्णके ऐसा कहनेपर वे नरश्रेष्ठ पाण्डव बड़े प्रसन्न हुए। फिर तो युद्धके लिये 'सुसज्जित हो जाओ, सुसज्जित हो जाओ' ऐसा कहते हुए समस्त सैनिक बड़ी उतावलीके साथ दौड़-धूप करने लगे। उस समय प्रसन्न चित्तवाले उन वीरोंका महान्‌ हर्षनबाद सब ओर गूँज उठा

তাদের প্রহৃষ্টচিত্তে মহা-নাদ উঠল। তারপর ত্বরিত গতিতে ছুটে চলা সৈন্যদের মধ্যে ‘যোগ! যোগ!’—অর্থাৎ ‘জোত দাও, প্রস্তুত হও’—ধ্বনি প্রতিধ্বনিত হতে লাগল।

Verse 51

हयवारणशब्दाशक्ष नेमिघोषाश्ष सर्वतः | शड्खदुन्दुभिघोषाश्व तुमुला: सर्वतो5भवन्‌,सब ओर घोड़े, हाथी और रथोंका घोष होने लगा। सभी ओर शंख और दुन्दुभियोंकी भयानक ध्वनि गूँजने लगी

চারদিকে ঘোড়া-হাতির শব্দ এবং রথচক্রের গর্জন উঠল। সর্বত্র শঙ্খ ও দুন্দুভির তুমুল ধ্বনি প্রতিধ্বনিত হতে লাগল।

Verse 52

तदुग्र॑ सागरनिभ क्षुब्धं बलसमागमम्‌ | रथपात्तिगजोदग्रं महोर्मिभिरिवाकुलम्‌,रथ, पैदल और हाथियोंसे भरी हुई वह भयंकर सेना उत्ताल तरंगोंसे व्याप्त महासागरके समान क्षुब्ध हो उठी

রথ, পদাতিক ও হাতিতে পরিপূর্ণ সেই ভয়ংকর সেনাসমাবেশ উত্তাল তরঙ্গে আচ্ছন্ন মহাসাগরের ন্যায় ক্ষুব্ধ হয়ে উঠল।

Verse 53

धावतामाद्दयानानां तनुत्राणि च बध्नताम्‌ | प्रयास्यतां पाण्डवानां ससैन्यानां समन्तत:

পাণ্ডবরা সেনাসহ চারিদিক থেকে যাত্রা শুরু করতেই তৎক্ষণাৎ তীব্র ব্যস্ততা দেখা দিল—কেউ দৌড়াচ্ছে, কেউ যান আরোহন করছে, কেউ বর্ম বাঁধছে।

Verse 54

अग्रानीके भीमसेनो माद्रीपुत्रो च दंशितो,सेनाके आगे-आगे भीमसेन, कवचधारी माद्रीकुमार नकुल-सहदेव, सुभद्राकुमार अभिमन्यु, द्रौपदीके सभी पुत्र, ट्रपदकुमार धृष्टद्युम्न, प्रभद्रकमण और पांचालदेशीय क्षत्रिय वीर चले। इन सबने भीमसेनको अपने आगे कर लिया था

সেনার অগ্রভাগে ছিলেন ভীমসেন, আর তাঁর পাশে বর্মধারী মাদ্রীপুত্রগণ। সুভদ্রাপুত্র অভিমন্যু, দ্রৌপদীর পুত্রগণ, দ্রুপদপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন, প্রভদ্রকগণ ও পাঞ্চালের ক্ষত্রিয় বীরেরা—সকলেই ভীমসেনকে অগ্রে স্থাপন করে অগ্রসর হলেন।

Verse 55

सौभद्रो द्रौपदेयाश्न धृष्टय्युम्नश्न पार्षतः । प्रभद्रकाश्नव पडचाला भीमसेनमुखा ययु:,सेनाके आगे-आगे भीमसेन, कवचधारी माद्रीकुमार नकुल-सहदेव, सुभद्राकुमार अभिमन्यु, द्रौपदीके सभी पुत्र, ट्रपदकुमार धृष्टद्युम्न, प्रभद्रकमण और पांचालदेशीय क्षत्रिय वीर चले। इन सबने भीमसेनको अपने आगे कर लिया था

সৌভদ্র অভিমন্যু, দ্রৌপদেয়গণ, পৃষতপুত্র ধৃষ্টদ্যুম্ন, প্রভদ্রকগণ ও পাঞ্চালের বীরেরা—সকলেই ভীমসেনকে অগ্রে রেখে অগ্রসর হলেন।

Verse 56

तत: शब्द: समभवत्‌ समुद्रस्येव पर्वणि । हृष्टानां सम्प्रयातानां घोषो दिवमिवास्पृशत्‌,तदनन्तर जैसे पूर्णिमाके दिन बढ़ते हुए समुद्रका कोलाहल सुनायी देता है, उसी प्रकार हर्ष और उत्साहमें भरकर युद्धके लिये यात्रा करनेवाले उन सैनिकोंका महान्‌ घोष सब ओर फैलकर मानो स्वर्गलोकतक जा पहुँचा

তারপর পূর্ণিমার দিনে স্ফীত সমুদ্রের গর্জনের মতো এক মহাশব্দ উঠল। আনন্দোৎসাহে যুদ্ধযাত্রায় বেরোনো সৈন্যদের সেই মহান্‌ ধ্বনি চারদিকে ছড়িয়ে যেন স্বর্গলোক পর্যন্ত পৌঁছে গেল।

Verse 57

प्रह्दश् दंशिता योधा: परानीकविदारणा: । तेषां मध्ये ययौ राजा कुन्तीपुत्रो युधिष्ठिर:,हर्षमें भरे हुए और कवच आदिसे सुसज्जित वे समस्त सैनिक शत्रु-सेनाको विदीर्ण करनेका उत्साह रखते थे। कदुन्तीपुत्र राजा युधिष्ठिर समस्त सैनिकोंके बीचमें होकर चले

হর্ষে উল্লসিত ও সম্পূর্ণ সজ্জিত সেই সকল যোদ্ধা শত্রুসেনার ব্যূহ বিদীর্ণ করতে উদ্‌গ্রীব ছিল। তাদের মধ্য দিয়ে কুন্তীপুত্র রাজা যুধিষ্ঠির অগ্রসর হলেন।

Verse 58

शकटापणवेशाश्व यानयुग्यं च सर्वश: । कोशं यन्त्रायुधं चैव ये च वैद्याश्विकित्सका:,सामान ढोनेवाली गाड़ी, बाजार, डेरे-तम्बू, रथ आदि सवारी, खजाना, यन्त्रचालित अस्त्र और चिकित्साकुशल वैद्य भी उनके साथ-साथ चले

তাদের সঙ্গে সর্বপ্রকার সেনা-সহায়তাও চলল—বোঝা বহনের গাড়ি, বাজার-রসদ ও শিবির-সামগ্রী, জোয়াল-যোগ্য অশ্ব ও যান, কোষাগার, যন্ত্রচালিত অস্ত্র, এবং অশ্বচিকিৎসায় দক্ষ বৈদ্যগণও।

Verse 59

फल्गु यच्च बल॑ किंचिद्‌ यच्चापि कृशदुर्बलम्‌ । तत्‌ संगृह ययौ राजा ये चापि परिचारका:,राजा युधिष्ठिरने जो कोई भी सेना सारहीन, कृशकाय अथवा दुर्बल थी, सबको एवं अन्य परिचारकोंको उपप्लव्यमें एकत्र करके वहाँसे प्रस्थान कर दिया

রাজা অল্পবল, কৃশ ও দুর্বল যে সৈন্য ছিল, এবং যে সকল পরিচারক ছিল—সকলকে একত্র করলেন; তারপর তাদের সঙ্গে নিয়ে উপপ্লব্যের উদ্দেশে যাত্রা করলেন।

Verse 60

उपप्लव्ये तु पाञ्चाली द्रौपदी सत्यवादिनी । सह स्त्रीभिर्निववृते दासीदाससमावृता,पांचालराजकुमारी सत्यवादिनी द्रौपदी दास-दासियोंसे घिरी हुई कुछ दूरतक महाराजके साथ गयी। फिर सभी स्त्रियोंके साथ उपप्लव्य नगरमें लौट आयी

উপপ্লব্যে সত্যবাদিনী পাঞ্চালী দ্রৌপদী দাস-দাসী ও পরিচারিকাদের বেষ্টিত হয়ে অন্যান্য নারীদের সঙ্গে ফিরে এলেন।

Verse 61

कृत्वा मूलप्रतीकारं गुल्मै: स्थावरजड़मै: । स्कन्धावारेण महता प्रययु: पाण्डुनन्दना:,पाण्डवलोग दुर्गकी रक्षाके लिये आवश्यक स्थावर (परकोटे और खाईं आदि) तथा जंगम (पहरेदार सैनिकोंकी नियुक्ति आदि) उपायोंद्वारा स्त्रियों और धन आदिकी सुरक्षाकी समुचित व्यवस्था करके बहुत-से खेमे और तम्बू आदि साथ लेकर प्रस्थित हुए

স্থাবর ও জঙ্গম—উভয় প্রকার ব্যবস্থায় প্রথমে প্রয়োজনীয় প্রতিরক্ষা-আয়োজন করে, এবং বৃহৎ শিবিরসহ, পাণ্ডুপুত্রগণ যাত্রা করলেন।

Verse 62

ददतो गां हिरण्यं च ब्राह्म॒णैरभिसंवृता: । स्तूयमाना ययू राजन्‌ रथैर्मणिविभूषितै:,राजन! ब्राह्मणलोग चारों ओरसे घेरकर पाण्डवोंके गुण गाते और पाण्डवलोग उन्हें गौओं तथा सुवर्ण आदिका दान देते थे। इस प्रकार वे मणिभूषित रथोंपर बैठकर यात्रा कर रहे थे

হে রাজন! ব্রাহ্মণদের দ্বারা চারিদিক থেকে পরিবেষ্টিত ও তাঁদের স্তবধ্বনিতে প্রশংসিত হয়ে পাণ্ডবেরা গাভী ও স্বর্ণাদি দান করতে করতে অগ্রসর হলেন; মণি-ভূষিত রথে আরূঢ় হয়ে তাঁরা যাত্রা করলেন।

Verse 63

केकया धृष्टकेतुश्च पुत्र: काश्यस्य चाभिभू: । श्रेणिमान्‌ वसुदानश्व शिखण्डी चापराजित:,(पाँचों भाई) केकयराजकुमार, धृष्टकेतु, काशिराजके पुत्र अभिभू, श्रेणिमान्‌, वसुदान और अपराजित वीर शिखण्डी--ये सब लोग आभूषण और कवच धारण करके हाथेोंमें शस्त्र लिये हर्ष और उल्लासमें भरकर राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनके साथ- साथ जा रहे थे

কেকয়দেশের রাজপুত্রগণ, ধৃষ্টকেতু, কাশিরাজার পুত্র অভিভূ, শ্রেণিমান, বসুদান এবং অপরাজিত বীর শিখণ্ডী—এরা সকলেই অলংকারে ভূষিত, বর্ম পরিহিত, হাতে অস্ত্র ধারণ করে আনন্দোচ্ছ্বাসে ভরে রাজা যুধিষ্ঠিরকে চারিদিক থেকে ঘিরে তাঁর সঙ্গে সঙ্গে অগ্রসর হল।

Verse 64

ह्ृष्ास्तुष्टा: कवचिन: सशस्त्रा: समलंकृता: । राजानमन्वयु: सर्वे परिवार्य युधिष्ठिरम्‌,(पाँचों भाई) केकयराजकुमार, धृष्टकेतु, काशिराजके पुत्र अभिभू, श्रेणिमान्‌, वसुदान और अपराजित वीर शिखण्डी--ये सब लोग आभूषण और कवच धारण करके हाथेोंमें शस्त्र लिये हर्ष और उल्लासमें भरकर राजा युधिष्ठिरको सब ओरसे घेरकर उनके साथ- साथ जा रहे थे

তাঁরা সকলেই হর্ষিত ও তৃপ্ত, বর্মধারী, অস্ত্রসজ্জিত এবং অলংকারে ভূষিত হয়ে রাজার অনুসরণ করল; যুধিষ্ঠিরকে চারিদিক থেকে ঘিরে তারা তাঁর সঙ্গে অগ্রসর হল।

Verse 65

जघनार्धे विराटश्न याज्ञसेनिश्ष॒ सौमकि: । सुधर्मा कुन्तिभोजश्व धृष्टद्युम्नस्य चात्मजा:,सेनाके पिछले आधे भागमें राजा विराट, सोमकवंशी द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, सुधर्मा, कुन्तिभोज और धृष्टद्युम्नके पुत्र जा रहे थे। इनके साथ चालीस हजार रथ, दो लाख घोड़े, चार लाख पैदल और साठ हजार हाथी थे

সেনার পশ্চাদ্ভাগে রাজা বিরাট, যাজ্ঞসেনী, সোমক, সুধর্মা, কুন্তিভোজ এবং ধৃষ্টদ্যুম্নের পুত্রগণ অগ্রসর হচ্ছিলেন।

Verse 66

रथायुतानि चत्वारि हया: पञ्चगुणास्तथा । पत्तिसैन्यं दशगुणं गजानामयुतानि षट्‌,सेनाके पिछले आधे भागमें राजा विराट, सोमकवंशी द्रुपदकुमार धृष्टद्युम्न, सुधर्मा, कुन्तिभोज और धृष्टद्युम्नके पुत्र जा रहे थे। इनके साथ चालीस हजार रथ, दो लाख घोड़े, चार लाख पैदल और साठ हजार हाथी थे

রথ ছিল চার অযুত; অশ্ব ছিল তার পাঁচগুণ; পদাতিক ছিল দশগুণ; আর গজ ছিল ছয় অযুত।

Verse 67

अनाधष्टिश्वेकितानो धृष्टकेतुश्च सात्यकि: । परिवार्य ययु: सर्वे वासुदेवधनंजयौ,अनाधृष्टि, चेकितान, धृष्टकेतु तथा सात्यकि--ये सब लोग भगवान्‌ श्रीकृष्ण और अर्जुनको घेरकर चल रहे थे

বৈশম্পায়ন বললেন— অনাদৃষ্টী, চেকিতান, ধৃষ্টকেতু ও সাত্যকি—সকলেই ভাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ) ও ধনঞ্জয় (অর্জুন)-কে চারিদিক থেকে ঘিরে, বিশ্বস্ত সঙ্গী-রক্ষীরূপে অগ্রসর হলেন।

Verse 68

आसाद्य तु कुरुक्षेत्र व्यूढानीका: प्रहारिण: । पाण्डवा: समदृश्यन्त नर्दन्तो वृषभा इव,इस प्रकार सेनाकी व्यूहरचना करके प्रहार करनेके लिये उद्यत हुए पाण्डवसैनिक कुरक्षेत्रमें पहँचकर साँड़ोंके समान गर्जन करते हुए दिखायी देने लगे

বৈশম্পায়ন বললেন— কুরুক্ষেত্রে পৌঁছে, ব্যূহবদ্ধ ও আঘাত হানতে উদ্যত পাণ্ডববাহিনী ষাঁড়ের মতো গর্জন করতে করতে দৃশ্যমান হল।

Verse 69

तेडवगाहा कुरुक्षेत्र शड्खान्‌ दध्मुररिंदमा: | तथैव दश्मतु: शड्खं वासुदेवधनंजयौ,उन शत्रुदमन वीरोंने कुरुक्षेत्रकी सीमामें पहुँचकर अपने-अपने शंख बजाये। इसी प्रकार श्रीकृष्ण और अर्जुनने भी शंखध्वनि की

বৈশম্পায়ন বললেন— কুরুক্ষেত্রের সীমায় প্রবেশ করে, সেই শত্রুদমন বীরেরা নিজেদের শঙ্খ বাজালেন; তেমনি ভাসুদেব (শ্রীকৃষ্ণ) ও ধনঞ্জয় (অর্জুন)ও শঙ্খধ্বনি করলেন।

Verse 70

पाञ्चजन्यस्य निर्घोषं विस्फूर्जितमिवाशने: । निशम्य सर्वसैन्यानि समहृष्यन्त सर्वश:,बिजलीकी गड़गड़ाहटके समान पांचजन्यका गम्भीर घोष सुनकर सब ओर फैले हुए समस्त पाण्डवसैनिक हर्षसे उललसित एवं रोमांचित हो उठे

বৈশম্পায়ন বললেন— বিদ্যুতের গর্জনের মতো পাঞ্চজন্যের গভীর ধ্বনি শুনে, সেনার সকল বিভাগ চারিদিক থেকে আনন্দ ও রোমাঞ্চে ভরে উঠল।

Verse 71

शड्खदुन्दुभिसंसृष्ट: सिंहनादस्तरस्विनाम्‌ । पृथिवीं चान्तरिक्षं च सागरांश्वान्चनादयत्‌,शंख और दुन्दुभियोंकी ध्वनिसे मिला हुआ वेगवान्‌ वीरोंका सिंहनाद पृथ्वी, आकाश तथा समुद्रोंतक फैलकर उन सबको प्रतिध्वनित करने लगा

বৈশম্পায়ন বললেন— শঙ্খ ও দুন্দুভির ধ্বনির সঙ্গে মিশে বেগবান বীরদের সিংহনাদ পৃথিবী, আকাশ এবং সমুদ্রসমূহ পর্যন্ত ছড়িয়ে পড়ে, সর্বত্র প্রতিধ্বনি তুলল।

Verse 150

इस प्रकार श्रीमह्याभारत उद्योगपर्वके अन्तर्गत भगवद्यानपर्वमें श्रीकृष्णवाक्यविषयक एक सौ पचासवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বের অন্তর্গত ভগবদ্যানপর্বে শ্রীকৃষ্ণের বাক্যবিষয়ক একশো পঞ্চাশতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 151

इति श्रीमहाभारते उद्योगपर्वणि सैन्यनिर्याणपर्वणि कुरुक्षेत्रप्रवेशे एकपज्चाशदधिकशततमो<ध्याय:

এইভাবে শ্রীমহাভারতের উদ্যোগপর্বে, বিশেষত সৈন্যনির্যাণপর্বে, কুরুক্ষেত্র-প্রবেশ প্রসঙ্গে একশো একান্নতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 413

कि पुनर्धात॑राष्ट्राणां लुब्धानां पापचेतसाम्‌ । “आपके शत्रुओंको परास्त करनेकी शक्ति इन सबमें विद्यमान है। ये महान्‌ संग्राममें इन्द्रके मनमें भी भय उत्पन्न कर सकते हैं; फिर पापात्मा और लोभी धृतराष्ट्रपुत्रोंकी तो बात ही क्या है?

তবে ধৃতরাষ্ট্রের পুত্রদের কথা আর কী—যারা লোভী ও পাপবুদ্ধিসম্পন্ন! এ সকল বীরের মধ্যেই তোমার শত্রুদের পরাস্ত করার শক্তি বিদ্যমান। মহাসংগ্রামে এরা ইন্দ্রের মনেও ভয় সঞ্চার করতে পারে—তাহলে পাপাত্মা, লোভী ধৃতরাষ্ট্রপুত্রদের কথা আলাদা করে বলারই বা কী!

Verse 536

गड्ेव पूर्णा दुर्धर्षा समदृश्यत वाहिनी । रणयात्राके लिये उद्यत हुए पाण्डव और उनके सैनिक सब ओर दौड़ते, पुकारते और कवच बाँधते दिखायी दिये। उनकी वह विशाल वाहिनी जलसे परिपूर्ण गंगाके समान दुर्गम दिखायी देती थी

বৈশম্পায়ন বললেন—তাদের বাহিনী সম্পূর্ণ সজ্জিত ও দুর্ধর্ষ বলে প্রতীয়মান হল। রণযাত্রার জন্য উদ্যত পাণ্ডব ও তাদের সৈন্যরা চারিদিকে ছুটোছুটি করছিল, পরস্পরকে ডাকছিল এবং বর্ম বাঁধছিল। সেই বিশাল সেনাসমূহ জলপূর্ণ, উচ্ছ্বসিত গঙ্গার ন্যায় অতিক্রম-অসাধ্য মনে হচ্ছিল।

Frequently Asked Questions

The dilemma is implicit in leadership choice: whether to interpret an incomplete diplomatic outcome as a cue for renewed negotiation or as justification for immediate mobilization, thereby increasing the likelihood of large-scale harm.

The chapter illustrates how perception, prior wrongdoing, and counsel shape policy: preparedness and administrative competence can be ethically neutral tools, but when driven by resentment or fear, they accelerate conflict and magnify consequences.

No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as narrative causality and institutional description, emphasizing how strategic decisions and logistics become the enabling conditions for later events.