Mahabharata Adhyaya 11
Shalya ParvaAdhyaya 1173 Versesभीम के आघात से कौरव पक्ष क्षणिक रूप से डगमगाता है; शल्य पुनः संभलकर प्रतिरोध की तैयारी करते हैं।

Adhyaya 11

Śalya–Bhīma Gadā-saṃnipāta and Śalya’s Bāṇa-jāla against Yudhiṣṭhira (Book 9, Chapter 11)

Upa-parva: Gadā-yuddha and the Madra–Pāṇḍava Engagements (Śalya Parva, episodic battle unit)

Sañjaya describes Śalya arming himself with an all-iron mace upon seeing the charioteer fallen, standing immovable and compared through a chain of similes to cosmic and royal powers. Bhīma charges with his own heavy gadā, and the battlefield responds with conches, instruments, and acclamations as both sides acknowledge the rarity of such force. The two circle in regulated patterns (maṇḍala movement), exchanging heavy strikes; their maces flash with metallic brilliance, and impacts are rendered as sparks and showers of embers, emphasizing the material physics of iron-on-iron combat. Both are repeatedly struck yet remain steady, and the sound of blows is likened to thunderbolt resonance. In a synchronized collision, both fall stunned; Kṛpa withdraws Śalya, while Bhīma rises and calls him back. The narrative then widens: Kaurava forces surge, Pāṇḍavas counter-advance, and Cekitāna is slain by Duryodhana’s spear, prompting intensified missile exchanges. Śalya engages Yudhiṣṭhira directly, wounding him; Yudhiṣṭhira responds with precise arrows, cuts Śalya’s banner, and Śalya answers with a dense arrow-net that obscures directions and visibly reduces Yudhiṣṭhira’s momentum, marking a tactical shift from duel spectacle to suppressive ranged pressure.

Chapter Arc: संजय धृतराष्ट्र से कहते हैं—जब दोनों सेनाएँ एक-दूसरे को रौंदती हुई विलुलित हो चलीं, पदातियों की कूजन-स्तनन और रथ-द्विपों की टक्कर से रणभूमि स्वयं एक गर्जन बन गई। → घोर संहार में नाना शस्त्रों का समावेश, रथ-हाथी-घोड़े की व्यतिषक्ति, और आकाश से उल्काओं का सूर्य-मण्डल से टकराकर गिरना—ये अपशकुन युद्ध को ‘अंतकाल’ की छाया देते हैं। इसी उन्माद में जगह-जगह सैकड़ों द्वंद्व-युद्ध भड़क उठते हैं; भीमसेन का प्रचण्ड वेग कृतवर्मा के रथ और घोड़ों को रौंदता हुआ आगे बढ़ता है। → भीमसेन शल्य पर टूट पड़ते हैं—भयंकर शब्द करने वाली गदा से शल्य के चारों महावेगवान घोड़े गिरा देते हैं और फिर उसी क्षण शल्य के सारथी का हृदय भेद देते हैं; मद्रराज का रथ-तंत्र टूटता है और शल्य क्षणभर के लिए रण-गति से विच्छिन्न हो जाते हैं। → शल्य अपने प्रहार का प्रत्युत्तर देखकर आश्चर्यचकित होते हैं; वे गदा का आश्रय लेकर प्रतिद्वन्द्वी को देखते हैं—अर्थात् पराजय के झटके के बाद भी उनका धैर्य और युद्ध-धर्म जाग्रत रहता है, और युद्ध का प्रवाह फिर से शल्य-केंद्रित द्वंद्व की ओर मुड़ता है। → शल्य गदा संभालकर भीम के सामने स्थिर होते हैं—अब प्रश्न यह है कि क्या मद्रराज इस अपमान का प्रतिशोध लेकर भीम को रोकेंगे, या भीम की प्रचण्डता शल्य-सेना को और पीछे ढकेलेगी?

Shlokas

Verse 1

ऑपन--माजण बछ। अकाल एकादशोब< ध्याय: शल्यका पराक्रम

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, সেই মহাসমরে যখন সেনা-বাহিনী বিপর্যস্ত হয়ে পড়ল এবং পরস্পরকে বধ করতে লাগল; যখন যোদ্ধারা পালাতে শুরু করল এবং হাতিরা গর্জন করতে লাগল—তখন ভয় ও বিনাশে যুদ্ধক্ষেত্র আচ্ছন্ন হল। অস্ত্রশস্ত্র পরস্পর সংঘর্ষে লিপ্ত হল, রথ ও গজ একে অপরের সঙ্গে জড়িয়ে পড়ল। তখন পাণ্ডবেরা তীক্ষ্ণ বাণে আপনার সেনাকে সংহার করতে লাগল, আর তেমনি আপনার যোদ্ধারাও পাণ্ডবসৈন্যের বধে প্রবৃত্ত হল।

Verse 2

कूजतां स्तनतां चैव पदातीनां महाहवे । निहतेषु महाराज हयेषु बहुधा तदा

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, সেই মহাযুদ্ধে যখন নানাভাবে বহু ঘোড়া নিহত হচ্ছিল, তখন পদাতিকেরা কাতরাতে ও চিৎকার করতে লাগল; যুদ্ধের কোলাহল আরও ঘনীভূত হল।

Verse 3

प्रक्षये दारुणे घोरे संहारे सर्वदेहिनाम्‌ । नानाशस्त्रसमावाये व्यतिषक्तरथद्विपे

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! যখন সকল দেহধারীর জন্য সেই দারুণ, ভয়ংকর সংহার বিস্তার লাভ করছিল, এবং নানাবিধ অস্ত্রশস্ত্র পরস্পর সংঘর্ষে লিপ্ত হচ্ছিল, তখন রথ ও হস্তী একে অপরের সঙ্গে জড়িয়ে পড়ল।

Verse 4

हर्षणे युद्धशौण्डानां भीरूणां भयवर्धने । गाहमानेषु योधेषु परस्परवधैषिषु

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! সেই যুদ্ধ ছিল যুদ্ধকুশলদের আনন্দবর্ধক এবং ভীরুদের ভয়বর্ধক; উভয় পক্ষের যোদ্ধারা পরস্পরের বধের বাসনায় একে অপরের মধ্যে ঢুকে পড়ছিল।

Verse 5

प्राणादाने महाघोरे वर्तमाने दुरोदरे । संग्रामे घोररूपे तु यमराष्ट्रविवर्धने

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! যখন প্রাণের পণ ধরা সেই মহাভয়ংকর, সহ্য করা কঠিন, যমরাজ্যের বৃদ্ধি ঘটানো ভীষণ যুদ্ধ চলছিল, তখন পরস্পর বধের বাসনায় যোদ্ধারা একে অপরের মধ্যে ঢুকে পড়ল।

Verse 6

पाण्डवास्तावकं सैन्यं व्यधमन्निशितै: शरै: । तथैव तावका योधा जघ्नु: पाण्डवसैनिकान्‌

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ! পাণ্ডবরা তীক্ষ্ণ বাণে আপনার সেনাকে নিধন করছিল; আর তেমনি আপনার যোদ্ধারাও পাণ্ডবদের সৈন্যদের হত্যা করছিল।

Verse 7

तस्मिंस्तथा वर्तमाने युद्धे भीरुभयावहे । पूर्वाह्न चापि सम्प्राप्ते भास्करोदयनं प्रति

রাজন! যখন ভীরুদের ভয় বাড়ানো সেই যুদ্ধ এভাবেই চলছিল এবং পূর্বাহ্নে সূর্যোদয়ের দিকে সময় অগ্রসর হচ্ছিল, তখন মহাত্মা অর্জুনের আঘাত থেকে সুরক্ষিত, লক্ষ্যভেদে নিপুণ শত্রুযোদ্ধারা—মৃত্যুকেই প্রত্যাবর্তনের শেষ সীমা স্থির করে—আপনার সেনার সঙ্গে যুদ্ধে লিপ্ত হল।

Verse 8

लब्धलक्षा: परे राजन्‌ रक्षितास्तु महात्मना | अयोधयंस्तव बल मृत्युं कृत्वा निवर्तनम्‌

সঞ্জয় বললেন—হে রাজন, শত্রু-যোদ্ধারা লক্ষ্যভেদে নিপুণ এবং মহাত্মা অর্জুনের রক্ষায় নিরাপদ ছিল। তারা তোমার সেনার সঙ্গে যুদ্ধে প্রবৃত্ত হল, আর প্রত্যাবর্তনের সীমা হিসেবে মৃত্যুকেই স্থির করল। সূর্যোদয়ের সময় সেই ভয়ংকর সংঘর্ষে তারা ভীরুদের ভয় বাড়াতে অগ্রসরই রইল—পিছু হটা নয়, রণসম্মানই তাদের বরণ।

Verse 9

बलिभि: पाण्डवैर्दप्तैर्लब्धलक्षै: प्रहारिभि: । कौरव्यसीदत्‌ पृतना मृगीवाग्निसमाकुला

সঞ্জয় বললেন—বলবান, বীর্যগর্বী, লক্ষ্যসিদ্ধ ও আঘাতে নিপুণ পাণ্ডবদের প্রহারে কৌরবসেনা ভেঙে পড়তে লাগল; দাউদাউ অরণ্যাগ্নিতে ঘেরা হরিণীর মতো সে অতিশয় ব্যাকুল হয়ে উঠল।

Verse 10

इस प्रकार श्रीमह्याभारत शल्यपर्वमें संकुलयुद्धाविषयक दसवाँ अध्याय पूरा हुआ

কাদায় আটকে পড়া দুর্বল গাভীর মতো কৌরবসেনাকে দুঃখে ডুবে যেতে দেখে, তাকে উদ্ধার করতে ইচ্ছুক হয়ে রাজা শল্য তখন পাণ্ডুপুত্রদের দিকে অগ্রসর হলেন।

Verse 11

मद्रराज: सुसंक्रुद्धों गृहीत्वा धनुरुत्तमम्‌ । अभ्यद्रवत संग्रामे पाण्डवानाततायिन:

সঞ্জয় বললেন—মদ্ররাজ শল্য প্রবল ক্রোধে উত্তম ধনুক ধারণ করে রণক্ষেত্রে পাণ্ডবদের দিকে ঝাঁপিয়ে পড়লেন, যেন তারা তাঁর বধে উদ্যত আক্রমণকারী।

Verse 12

पाण्डवा अपि भूपाल समरे जितकाशिन: । मद्रराजं समासाद्य बिभिदुर्निशितै: शरै:,भूपाल! समरमें विजयसे सुशोभित होनेवाले पाण्डव भी मद्रराज शल्यके निकट जाकर उन्हें अपने पैने बाणोंसे बींधने लगे

সঞ্জয় বললেন—হে ভূপাল! সমরে জয়ের দীপ্তিতে উজ্জ্বল পাণ্ডবরাও মদ্ররাজ শল্যের নিকট গিয়ে তীক্ষ্ণ শর দিয়ে তাঁকে বিদ্ধ করতে লাগল।

Verse 13

तत:ः शरशतैस्ती&णैर्मद्रराजो महारथ: । अर्दयामास तां सेनां धर्मराजस्य पश्यत:,तब महारथी मद्रराज धर्मराज युधिष्ठिरके देखते-देखते उनकी सेनाको अपने सैकड़ों तीखे बाणोंसे संतप्त करने लगे

তখন মহারথী মদ্ররাজ ধর্মরাজ যুধিষ্ঠিরের চোখের সামনেই শত শত তীক্ষ্ণ শর নিক্ষেপ করে সেই সেনাকে পীড়িত ও দগ্ধ করতে লাগলেন।

Verse 14

प्रादुरासन्‌ निमित्तानि नानारूपाण्यनेकश: । चचाल शब्दं कुर्वाणा मही चापि सपर्वता,उस समय नाना प्रकारके बहुत-से अशुभसूचक निमित्त प्रकट होने लगे। पर्वतोंसहित पृथ्वी महान्‌ शब्द करती हुई डोलने लगी

সেই সময় নানা রকম বহু অশুভ লক্ষণ চারিদিকে প্রকাশ পেতে লাগল। পর্বতসমেত পৃথিবী মহাশব্দ করতে করতে কেঁপে উঠল ও দুলতে লাগল।

Verse 15

सदण्डशूला दीप्ताग्रा: शीर्यमाणा: समन्ततः । उल्का भूमिं दिव: पेतुराहत्य रविमण्डलम्‌

আকাশ থেকে বহু উল্কা যেন সূর্যমণ্ডলকে আঘাত করে পৃথিবীতে পতিত হতে লাগল। তাদের সঙ্গে দণ্ডযুক্ত শূলও পড়ছিল। উল্কাগুলির অগ্রভাগ দীপ্তিতে জ্বলজ্বল করছিল এবং তারা চারদিকে ভেঙে ছিটকে পড়ছিল।

Verse 16

मृगाश्न महिषाश्चापि पक्षिणश्न विशाम्पते । अपसव्य॑ं तदा चक्रुः सेनां ते बहुशो नूप,प्रजानाथ! नरेश्वर! उस समय मृग, महिष और पक्षी आपकी सेनाको बारंबार दाहिने करके जाने लगे

হে প্রজাপতি, হে নরেশ! তখন হরিণ, মহিষ ও পাখিরা বারবার আপনার সেনার চারদিকে অশুভভাবে (ডানদিকে রেখে) পরিক্রমা করতে লাগল।

Verse 17

भगुसूनुधरापुत्रौो शशिजेन समन्वितौ । चरम॑ पाण्डुपुत्राणां पुरस्तात्‌ सर्वभूभुजाम्‌,शुक्र और मंगल बुधसे संयुक्त हो पाण्डवोंके पृष्ठभागमें तथा अन्य सब नरेशोंके सम्मुख उदित हुए थे

ভৃগুপুত্র শুক্র এবং ধরাপুত্র মঙ্গল চন্দ্রের সঙ্গে যুক্ত হয়ে উদিত হল—পাণ্ডুপুত্রদের পশ্চাতে এবং অন্যান্য সকল নরপতির সম্মুখে।

Verse 18

शस्त्राग्रेष्वभवज्ज्वाला नेत्राण्याहत्य वर्षती | शिर:स्वलीयन्त भृशं काकोलूकाश्व केतुषु

অস্ত্রের অগ্রভাগে যেন শিখা জ্বলে উঠত; তা চোখে ঝলক লাগিয়ে বর্ষার মতো মাটিতে ঝরে পড়ত। যোদ্ধাদের শিরোদেশ ও ধ্বজদণ্ডে কাক ও পেঁচা বারবার এসে ভিড় করতে লাগল।

Verse 19

ततस्तद्‌ युद्धमत्युग्रमभवत्‌ सहचारिणाम्‌ | तथा सर्वाण्यनीकानि संनिपत्य जनाधिप

তারপর সেই সহযোদ্ধাদের যুদ্ধ অতিশয় উগ্র হয়ে উঠল। হে জনাধিপ! তদ্রূপ সকল সেনাবিভাগ একত্রে মিলিত হয়ে প্রবল সংঘর্ষে লিপ্ত হল।

Verse 20

शल्यस्तु शरवर्षेण वर्षन्निव सहस्रदूक्‌

কিন্তু শল্য সহস্রদৃষ্টিসম মেঘের ন্যায় শরবৃষ্টি করতে লাগল।

Verse 21

अभ्यवर्षत धर्मात्मा कुन्तीपुत्रं युधिष्ठिरम्‌ । धर्मात्मा राजा शल्यने वर्षा करनेवाले इन्द्रकी भाँति कुन्तीपुत्र युधिष्ठिरपर बाणोंकी वर्षा आरम्भ कर दी ।।

সঞ্জয় বললেন: ধর্মাত্মা রাজা শল্য কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরের উপর, বর্ষাদাতা ইন্দ্রের ন্যায়, বাণবর্ষণ আরম্ভ করলেন। আর ভীমসেনকেও শিলায় শানিত স্বর্ণপক্ষযুক্ত শর দ্বারা বিদ্ধ করলেন।

Verse 22

द्रौपदेयांस्तथा सर्वान्‌ माद्रीपुत्रौी च पाण्डवौ । धृष्टद्युम्नं च शैनेयं शिखण्डिनमथापि च

সঞ্জয় বললেন: তিনি দ্রৌপদীর সকল পুত্রকে, মাদ্রীর দুই পাণ্ডবপুত্রকে, এবং ধৃষ্টদ্যুম্ন, শৈনেয় (সাত্যকি) ও শিখণ্ডীকেও আঘাত করলেন।

Verse 23

एकैकं दशभिर्बाणैविव्याध स महाबल: । ततो5सृजद्‌ बाणवर्ष घर्मान्ति मघवानिव

সঞ্জয় বললেন—সেই মহাবলী শল্য তাদের প্রত্যেককে দশটি করে বাণে বিদ্ধ করল। তারপর গ্রীষ্মশেষে মঘবান ইন্দ্র যেমন বৃষ্টি বর্ষণ করেন, তেমনি সে তীরের প্রবল বর্ষা নামাল।

Verse 24

ततः प्रभद्रका राजन्‌ सोमकाश्न सहस्रश: । पतिता: पात्यमानाश्च दृश्यने शल्यसायकै:,राजन! तत्पश्चात्‌ सहस्रों प्रभ)द्रक और सोमक योद्धा शल्यके बाणोंसे घायल होकर गिरे और गिरते हुए दिखायी देने लगे

সঞ্জয় বললেন—তারপর, হে রাজন, সহস্র সহস্র প্রভদ্রক ও সোমক যোদ্ধা শল্যের তীরে বিদ্ধ হয়ে—কেউ পতিত, কেউ পতনশীল—দেখা গেল।

Verse 25

भ्रमराणामिव व्राता: शलभानामिव व्रजा: । ह्वादिन्य इव मेघेभ्य: शल्यस्य न्यपतन्‌ शरा:,शल्यके बाण भ्रमरोंके समूह, टिड्डियोंके दल और मेघोंकी घटासे प्रकट होनेवाली बिजलियोंके समान पृथ्वीपर गिर रहे थे

সঞ্জয় বললেন—শল্যের তীরগুলি ঘন ঝাঁকে পৃথিবীতে পড়ছিল—যেন ভ্রমরের গুচ্ছ, যেন পঙ্গপালের দল, আর যেন মেঘমালা থেকে ঝলকে ওঠা বিদ্যুৎ।

Verse 26

द्विरदास्तुरगाश्चार्ता: पत्तयो रथिनस्तथा । शल्यस्य बाणैरपतन्‌ बश्रमुर्व्यनदंस्तथा,शल्यके बाणोंकी मार खाकर पीड़ित हुए हाथी, घोड़े, रथी और पैदल-सैनिक गिरने, चक्कर काटने और आर्तनाद करने लगे

সঞ্জয় বললেন—শল্যের তীরে আঘাত পেয়ে কাতর হাতি ও ঘোড়া, আর রথী ও পদাতিকেরা পড়ে যেতে লাগল; কেউ কেউ মাটিতে দিশেহারা হয়ে ঘুরে বেড়াল এবং আর্তনাদ করল।

Verse 27

आविष्ट इव मद्रेशो मन्‍्युना पौरुषेण च | प्राच्छादयदरीन्‌ संख्ये कालसृष्ट इवान्तक:

সঞ্জয় বললেন—মদ্ররাজ শল্য যেন আবিষ্ট; ক্রোধ ও পৌরুষে উদ্দীপ্ত হয়ে সে রণক্ষেত্রে শত্রুসেনাকে আচ্ছন্ন করে ফেলল—যেন কালের দ্বারা প্রেরিত অন্তক, স্বয়ং মৃত্যু।

Verse 28

प्रलयकालमें प्रकट हुए यमराजके समान मद्रराज शल्य क्रोधसे आविष्ट हुए पुरुषकी भाँति अपने पुरुषार्थसे युद्धस्थलमें शत्रुओंको बाणोंद्वारा आच्छादित करने लगे ।।

সঞ্জয় বললেন—মেঘগর্জনের ন্যায় গর্জন করতে করতে মহাবলী মদ্ররাজ শল্য, প্রলয়কালে প্রকাশিত যমরাজের মতো ক্রোধে আবিষ্ট হয়ে রণক্ষেত্রে নিজের পরাক্রমে শত্রুদের উপর বাণবর্ষা ঢেলে দিলেন। শল্যের আঘাতে পাণ্ডবদের সেনাবাহিনী ছিন্নভিন্ন ও ব্যতিব্যস্ত হতে লাগল।

Verse 29

अजातशत्रुं कौन्तेयम भ्यधावद्‌ युधिष्ठिरम्‌ । महाबली मद्रराज मेघोंकी गर्जनाके समान सिंहनाद कर रहे थे। उनके द्वारा मारी जाती हुई पाण्डव-सेना भागकर अजातशत्रु कुन्तीकुमार युधिष्ठिरके पास चली गयी ।।

সঞ্জয় বললেন—মহাবলী মদ্ররাজ শল্য অজাতশত্রু কুন্তীপুত্র যুধিষ্ঠিরের দিকে ধাবিত হলেন। তিনি মেঘগর্জনের মতো সিংহনাদ করছিলেন। তাঁর আঘাতে পাণ্ডবসেনা ভেঙে পালিয়ে অজাতশত্রু যুধিষ্ঠিরের কাছে এসে পড়ল। তখন রণক্ষেত্রে তাদের পদদলিত করে সেই দ্রুতহস্ত যোদ্ধা তীক্ষ্ণ বাণে বিদ্ধ করল।

Verse 30

तमापततन्तं पत्त्यश्वै: क्रुद्धो राजा युधिछिर:

সঞ্জয় বললেন—তাঁর দিকে ধেয়ে আসতে দেখে রাজা যুধিষ্ঠির ক্রুদ্ধ হয়ে পদাতিক ও অশ্বারোহী বাহিনীসহ অগ্রসর হলেন।

Verse 31

तस्य शल्य: शरं घोरं मुमोचाशीविषोपमम्‌

সঞ্জয় বললেন—তখন শল্য বিষধর সাপের মতো এক ভয়ংকর বাণ নিক্ষেপ করলেন।

Verse 32

स निर्भिद्य महात्मानं वेगेनाभ्यपतच्च गाम्‌ । उस समय शल्यने युधिष्ठिरपर विषैले सर्पके समान एक भयंकर बाणका प्रहार किया। वह बाण बड़े वेगसे महात्मा युधिष्ठिरको घायल करके पृथ्वीपर गिर पड़ा ।।

সঞ্জয় বললেন—সে বাণ প্রবল বেগে মহাত্মা যুধিষ্ঠিরকে বিদ্ধ করে ভূমিতে পড়ে গেল। তা দেখে বৃকোদর ভীম ক্রোধে জ্বলে উঠে শল্যকে সাতটি বাণে বিদ্ধ করলেন। তারপর সহদেব পাঁচটি, নকুল দশটি এবং দ্রৌপদীর পুত্রেরা বহু বাণে শত্রুসূদন বীর শল্যকে আহত করল।

Verse 33

पजञ्चभि: सहदेवस्तु नकुलो दशभि: शरै: । द्रौपदेयाश्न शत्रुघ्नं शूरमार्तायनिं शरै:

সঞ্জয় বললেন—সহদেব পাঁচটি শর দিয়ে এবং নকুল দশটি শর দিয়ে শল্যকে বিদ্ধ করলেন। দ্রৌপদীর পুত্ররাও শত্রুনাশক বীর আর্তায়নি শল্যের উপর অসংখ্য শর বর্ষণ করল। তা দেখে ভীমসেন ক্রোধে জ্বলে উঠে সাতটি শর দিয়ে শল্যকে বিদ্ধ করলেন। এভাবে যুদ্ধের ঘোর সংঘর্ষে পাণ্ডব ও দ্রৌপদেয়েরা একত্রে শল্যকে চারদিক থেকে আহত করল।

Verse 34

अभ्यवर्षन्‌ महाराज मेघा इव महीधरम्‌ | ततो दृष्ट्वा वार्यमाणं शल्यं पार्थ: समनन्‍्ततः

সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, যেমন মেঘ পর্বতের উপর বৃষ্টি ঢালে, তেমনই তারা শল্যের উপর তীরের বর্ষণ করছিল। তখন কুন্তীপুত্রদের দ্বারা শল্যকে চারদিক থেকে রুদ্ধ ও প্রতিহত হতে দেখে পার্থ সর্বদিক থেকে আক্রমণ আরও তীব্র করলেন।

Verse 35

कृतवर्मा कृपश्चैव संक्रुद्धाव भ्यधावताम्‌ । उलूकश्च महावीर्य: शकुनिश्चापि सौबल:

সঞ্জয় বললেন—ক্রোধে উন্মত্ত কৃতবর্মা ও কৃপাচার্য ছুটে এলেন। তাঁদের সঙ্গে মহাবীর্য উলূক এবং সুবলপুত্র শকুনিও উপস্থিত হলেন। কুন্তীপুত্রদের দ্বারা চারদিক থেকে ঘেরা শল্যকে রক্ষা করতে তারা সকলেই রণক্ষেত্রে এগিয়ে এল।

Verse 36

समागम्याथ शनकैर श्वत्थामा महाबल: । तव पुत्राश्च कार्त्स्न्येन जुगुपु: शल्यमाहवे

সঞ্জয় বললেন—তারপর মহাবলী অশ্বত্থামা ধীরে ধীরে সেখানে এসে পৌঁছালেন, আর আপনার সকল পুত্র একত্রে রণক্ষেত্রে শল্যকে রক্ষা করলেন।

Verse 37

भीमसेन त्रिभिर्विद्ध्वा कृतवर्मा शिलीमुखै: । बाणवर्षेण महता क्रुद्धस-पमवारयत्‌,कृतवमनि क्रोधमें भरे हुए भीमसेनको तीन बाणोंसे घायल करके भारी बाण-वर्षकि द्वारा आगे बढ़नेसे रोक दिया

সঞ্জয় বললেন—কৃতবর্মা তিনটি তীক্ষ্ণ তীর দিয়ে ভীমসেনকে বিদ্ধ করল; তারপর প্রবল তীরবৃষ্টিতে ক্রুদ্ধ বীরের অগ্রগতি রুদ্ধ করে দিল।

Verse 38

धृष्टद्युम्न॑ कृप: क्रुद्धो बाणवर्षैरपीडयत्‌ । द्रौपदेयांश्व शकुनिर्यमौ च द्रौणिरभ्ययात्‌

সঞ্জয় বললেন—ক্রুদ্ধ কৃপ ধৃষ্টদ্যুম্নকে বাণবৃষ্টিতে জর্জরিত করলেন। শকুনি দ্রৌপদীর পুত্রদের দিকে অগ্রসর হল, আর দ্রোণপুত্র অশ্বত্থামা যমজ নকুল-সহদেবের উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।

Verse 39

दुर्योधनो युधां श्रेष्ठ आहवे केशवार्जुनौ । समभ्ययादुग्रतेजा: शरैश्लाप्पहनद्‌ बली

সঞ্জয় বললেন—যোদ্ধাদের শ্রেষ্ঠ দুর্যোধন, উগ্র তেজে দীপ্ত ও বলবান, রণক্ষেত্রে কেশব ও অর্জুনের দিকে ধেয়ে এল এবং বাণবৃষ্টিতে তাদের আঘাত করতে লাগল।

Verse 40

एवं द्वन्द्शशतान्यासंस्त्वदीयानां परै:ः सह । घोररूपाणि चित्राणि तत्र तत्र विशाम्पते,प्रजानाथ! इस प्रकार जहाँ-तहाँ आपके सैनिकोंके शत्रुओंके साथ सैकड़ों भयानक एवं विचित्र द्वन्द्ययुद्ध होने लगे

সঞ্জয় বললেন—হে প্রজানাথ! এভাবে আপনার সৈন্যদের সঙ্গে শত্রুপক্ষের যেখানে-সেখানে শত শত ভয়ংকর ও বিচিত্র একক দ্বন্দ্বযুদ্ধ শুরু হয়ে গেল।

Verse 41

ऋक्षवर्णाञ्जघानाश्वान्‌ भोजो भीमस्य संयुगे । सो<वतीर्य रथोपस्थाद्धताश्वात्‌ पाण्डुनन्दन:

সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধের মধ্যে ভোজ বীর ভীমের ভালুক-রঙা ঘোড়াগুলিকে হত্যা করল। অশ্বহীন হয়ে পাণ্ডুনন্দন ভীম রথমঞ্চ থেকে নেমে পদাতিক হয়ে যুদ্ধ চালিয়ে গেল।

Verse 42

प्रमुखे सहदेवस्य जघानाश्वान्‌ स मद्रराट्‌

সঞ্জয় বললেন—যুদ্ধের অগ্রভাগে মদ্ররাজ সহদেবের ঘোড়াগুলিকে হত্যা করল।

Verse 43

गौतम: पुनराचार्यों धृष्टद्युम्मनमयोधयत्‌

সঞ্জয় বললেন—তখন শ্রদ্ধেয় আচার্য গৌতম পুনরায় ধৃষ্টদ্যুম্নকে রণক্ষেত্রে যুদ্ধে প্রবৃত্ত করলেন।

Verse 44

असम्भ्रान्तमसमश्रान्तो यत्नवान्‌ यत्नवत्तरम्‌ | कृपाचार्य बिना किसी घबराहटके विजयके लिये यत्नशील हो सम्भ्रमरहित और अधिक प्रयत्नशील धृष्टद्युम्नके साथ युद्ध करने लगे ।।

সঞ্জয় বললেন—কৃপাচার্য অচঞ্চল ও অক্লান্ত হয়ে, জয়ের জন্য আরও অধিক প্রচেষ্টা করে ধৃষ্টদ্যুম্নের সঙ্গে যুদ্ধ করলেন; আর দ্রৌপদীর বীর পুত্রদের প্রত্যেককে দশটি করে শর দিয়ে বিদ্ধ করলেন।

Verse 45

अविद्धयदाचार्यसुतो नातिक्ुद्धों हसन्निव | आचार्य द्रोणके पुत्र अश्वत्थामाने अधिक क़्ुद्ध न होकर हँसते हुए-से दस-दस बाणोंद्वारा द्रौपदीके वीर पुत्रोंमेंसे प्रयेकको घायल कर दिया ।।

সঞ্জয় বললেন—আচার্য দ্রোণের পুত্র অশ্বত্থামা অতিরিক্ত ক্রুদ্ধ না হয়ে, যেন হাসতে হাসতে, দ্রৌপদীর বীর পুত্রদের প্রত্যেককে দশটি করে শর দিয়ে আহত করল। এদিকে রণক্ষেত্রে কৃতবর্মা আবার ভীমসেনের অশ্বদের বধ করল। অশ্ব নিহত হলে মহাবলী পাণ্ডুনন্দন ভীম দ্রুত রথ থেকে নেমে পড়লেন; ক্রোধে, দণ্ডোদ্ধত মৃত্যুর ন্যায় গদা ধারণ করে, তিনি কৃতবর্মার অশ্ব ও রথ চূর্ণ করে দিলেন। তখন কৃতবর্মা সেই রথ থেকে লাফিয়ে নেমে পলায়ন করল।

Verse 46

सो<वतीर्य रथात्तूर्ण हताश्वः पाण्डुनन्दन: । कालो दण्डमिवोद्यम्य गदां क्रुद्धो महाबल:

সঞ্জয় বললেন—অশ্ব নিহত হলে পাণ্ডুনন্দন মহাবলী ভীম দ্রুত রথ থেকে নেমে পড়লেন। ক্রুদ্ধ হয়ে, দণ্ডোদ্ধত মৃত্যুর ন্যায় তিনি গদা তুললেন।

Verse 47

पोथयामास तुरगान्‌ रथं च कृतवर्मण: । कृतवर्मा त्ववप्लुत्य रथात्‌ तस्मादपाक्रमत्‌

সঞ্জয় বললেন—তিনি কৃতবর্মার অশ্ব ও রথ চূর্ণ করে দিলেন। কিন্তু কৃতবর্মা সেই রথ থেকে লাফিয়ে নেমে সরে গেল।

Verse 48

शल्यो<पि राजन संक्रुद्धो निध्नन्‌ सोमकपाण्डवान्‌ । पुनरेव शितैर्बाणैर्युधेष्टिमपीडयत्‌

রাজন! শল্যও ক্রোধে উন্মত্ত হয়ে সোমক ও পাণ্ডবদের নিধন করতে লাগল; এবং আবারও তীক্ষ্ণ বাণে যুধিষ্ঠিরকে প্রবলভাবে পীড়িত করল।

Verse 49

राजन! इधर शल्य भी अत्यन्त क्रोधमें भरकर सोमकों और पाण्डवयोद्धाओंका संहार करने लगे। उन्होंने पुनः पैने बाणोंद्वारा युधिष्ठिरको पीड़ा देना प्रारम्भ किया ।।

এ দৃশ্য দেখে রণক্ষেত্রে ভীম ক্রোধে দন্তচ্ছদ চেপে ধরল। শল্যকে বিনাশ করার সংকল্প করে সেই বীর গদা তুলে নিল।

Verse 50

यमदण्डप्रतीकाशां कालरात्रिमिवोद्यताम्‌ | गजवाजिमनुष्याणां देहान्तकरणीमपि

সে গদা যমদণ্ডের ন্যায় ভয়ংকর, কালরাত্রির মতো উর্ধ্বে উত্তোলিত, এবং হাতি-ঘোড়া-মানুষের দেহেরও অন্ত ঘটাতে সক্ষম ছিল।

Verse 51

यह देख पराक्रमी भीमसेन कुपित हो ओठ चबाते हुए रणभूमिमें शल्यके विनाशका संकल्प लेकर यमदण्डके समान भयंकर गदा लिये उनपर टूट पड़े। हाथी

সোনার বেষ্টনীতে আবদ্ধ সেই লৌহ-নির্মিত বজ্রসম গদা জ্বলন্ত উল্কার মতো দীপ্ত ছিল; আর শাণপাথরে কুণ্ডলী পাকানো সাপিনীর ন্যায় অতিশয় উগ্র প্রতীয়মান হচ্ছিল।

Verse 52

चन्दनागुरुपड्काक्तां प्रमदामीप्सितामिव । वसामेदोपदिग्धाज़ीं जिह्दां वैवस्चतीमिव

চন্দন ও অগুরুর লেপে সুশোভিত কাম্য প্রেয়সীর মতোই সে যেন মনে হচ্ছিল; কিন্তু প্রকৃতপক্ষে তার অঙ্গপ্রত্যঙ্গ চর্বি ও মজ্জায় লেপিত—আর দর্শনে তা বৈবস্বত যমের জিহ্বার ন্যায় ভয়ংকর ছিল।

Verse 53

पटुघण्टाशतरवां वासवीमशनीमिव । निर्मुक्ताशीविषाकारां पृक्तां गजमदैरपि

সঞ্জয় বললেন—শত শত ঘণ্টার তীক্ষ্ণ ধ্বনিতে প্রতিধ্বনিত সেই গদা ইন্দ্রের বজ্রের মতো ভয়ংকর দেখাত। খোলস ঝরানো বিষধর সাপের ন্যায় তা সকল প্রাণীর হৃদয়ে ত্রাস সঞ্চার করত এবং নিজের সেনার উল্লাস বাড়িয়ে দিত; তাতে হাতির মদরসও লেপা ছিল।

Verse 54

त्रासनीं सर्वभूतानां स्वसैन्यपरिहर्षिणीम्‌ । मनुष्यलोके विख्यातां गिरिशृज्भविदारणीम्‌

সঞ্জয় বললেন—সে গদা সকল প্রাণীর জন্য ত্রাসস্বরূপ, আর নিজের সেনার জন্য উল্লাসবর্ধক ছিল। মানুষের জগতে তা সর্বত্র প্রসিদ্ধ, এবং পর্বতশৃঙ্গ বিদীর্ণ করতে সক্ষম বলে কথিত ছিল।

Verse 55

यया कैलासभवने महेश्वरसखं बली । आह्वयामास युद्धाय भीमसेनो महाबल:,यह वही गदा है, जिसके द्वारा महाबली भीमसेनने कैलासशिखरपर भगवान्‌ शंकरके सखा कुबेरको युद्धके लिये ललकारा था

সঞ্জয় বললেন—এই গদা দিয়েই মহাবলী ভীমসেন কৈলাস-ধামে মহেশ্বরের সখা ধনদ কুবেরকে যুদ্ধের জন্য আহ্বান করেছিলেন।

Verse 56

यया मायामयान्‌ दृप्तान्‌ सुबहून्‌ धनदालये । जघान गुह्ुकान क्रुद्धो नदन्‌ पार्थो महाबल:

সঞ্জয় বললেন—এই অস্ত্রেই মহাবলী পার্থ ধনদের আলয়ে ক্রোধে গর্জন করতে করতে মায়াবলে যুদ্ধকারী বহু উদ্ধত গুহ্যককে সংহার করেছিলেন।

Verse 57

तां वज़्मणिरत्नौचकल्मषां वज्रगौरवाम्‌

সঞ্জয় বললেন—সে ছিল বজ্রসম গৌরবে ভাস্বর, হীরা-মণি-রত্নের দীপ্তিতে ঝলমল করে উঠেছিল।

Verse 58

गदया युद्धकुशलस्तया दारुणनादया

সঞ্জয় বললেন—গদাযুদ্ধে পারদর্শী সেই বীর ভয়ংকর গর্জনকারী গদা হাতে এগিয়ে গেল। তার নিনাদ সমরের উগ্রতা ঘোষণা করল—যুদ্ধের নির্মম কারুকার্যের এমনই ছবি, যেখানে বীরত্ব ও হিংসা পাশাপাশি চলে, আর ধর্মের কোমল দাবি প্রায়ই আড়াল হয়ে যায়।

Verse 59

ततः शल्यो रणे क्रुद्ध: पीने वक्षसि तोमरम्‌

সঞ্জয় বললেন—তখন রণে ক্রুদ্ধ শল্য প্রতিপক্ষের প্রশস্ত, সুগঠিত বক্ষস্থলে এক তোমর নিক্ষেপ করল, এবং উগ্র সংকল্পে যুদ্ধকে আরও তীব্র করে তুলল।

Verse 60

निचखान नदन्‌ वीरो वर्म भित्त्वा च सो5भ्ययात्‌ | तब रणभूमिमें कुपित हो गर्जना करते हुए वीर शल्यने भीमसेनके विशाल वक्ष:स्थलमें एक तोमर धँसा दिया। वह उनके कवचको छेदकर छातीमें गड़ गया ।।

সঞ্জয় বললেন—গর্জন করতে করতে বীর শল্য বর্ম ভেদ করে তোমর গেঁথে দিল এবং তারপর এগিয়ে এল। রণভূমিতে ক্রোধে গর্জে উঠে সে ভীমসেনের প্রশস্ত বক্ষস্থলে তোমর বসাল; তা তাঁর কবচ চিরে বুকে গভীরভাবে ঢুকে গেল। কিন্তু বৃকোদর ভীম বিচলিত না হয়ে সেই তোমরটিই ধরে টেনে বের করে নিল।

Verse 61

स भिजन्नमर्मा रुधिरं वमन्‌ वित्रस्तमानस:

সঞ্জয় বললেন—তার মর্মস্থল বিদীর্ণ হয়ে গেল; সে রক্ত বমি করতে লাগল, আর ভয়ে তার মন কেঁপে উঠল—ভীষণভাবে আহত অবস্থায় পড়ে রইল। এ দৃশ্য দেখায়, যুদ্ধের হিংসা কত দ্রুত মহাবলীকেও অসহায় যন্ত্রণায় নামিয়ে আনে।

Verse 62

पपाताभिमुखो दीनो मद्रराजस्त्वपाक्रमत्‌ | इससे सारथिका मर्मस्थल विदीर्ण हो गया और वह मुहसे रक्त वमन करता हुआ दीन एवं भयभीतचित्त होकर शल्यके सामने ही रथसे नीचे गिर पड़ा। फिर तो मद्रराज शल्य वहाँसे पीछे हट गये ।।

সঞ্জয় বললেন—সে দীন হয়ে সামনের দিকেই লুটিয়ে পড়ল, আর মদ্ররাজ শল্য পিছু হটল। প্রতিঘাতের পূর্ণ প্রতিকার হয়ে গেছে—এ দেখে শল্যের মন বিস্ময়ে আচ্ছন্ন হল।

Verse 63

ततः सुमनस: पार्था भीमसेनमपूजयन्‌ । ते दृष्टवा कर्म संग्रामे घोरमक्लिष्टकर्मण:

তখন কুন্তীপুত্রেরা আনন্দচিত্তে ভীমসেনকে সম্মান জানাল। যুদ্ধক্ষেত্রে অনায়াসে মহৎ কর্ম সাধনকারী সেই অক্লিষ্টকর্মা ভীমের ভয়ংকর পরাক্রম দেখে তারা বারংবার তার ভূরি-ভূরি প্রশংসা করতে লাগল।

Verse 193

अभ्ययु: कौरवा राजन्‌ पाण्डवानामनीकिनीम्‌ । नरेश्वर! तत्पश्चात्‌ एक साथ संगठित होकर जूझनेवाले दोनों पक्षोंके वीरोंका वह युद्ध बड़ा भयंकर हो गया। राजन! कौरव-योद्धाओंने अपनी सारी सेनाओंको एकत्र करके पाण्डव-सेनापर धावा बोल दिया

রাজন! কৌরবরা পাণ্ডবদের সেনাবাহিনীর দিকে ধেয়ে গেল। তারপর, নরেশ্বর! উভয় পক্ষের বীরেরা একত্রে গুচ্ছবদ্ধ হয়ে সংঘর্ষে লিপ্ত হলে যুদ্ধটি অতিশয় ভয়ংকর হয়ে উঠল। রাজন! কৌরব যোদ্ধারা তাদের সমস্ত বাহিনী একত্র করে পাণ্ডব-সেনার উপর ঝাঁপিয়ে পড়ল।

Verse 293

बाणवर्षेण महता युधिष्ठिरमताडयत्‌ । शीघ्रतापूर्वक हाथ चलानेवाले शल्यने युद्धस्थलमें पैने बाणोंद्वारा पाण्डव-सेनाका मर्दन करके बड़ी भारी बाण-वर्षके द्वारा युधिष्ठिरको भी गहरी चोट पहुँचायी

সঞ্জয় বললেন—মহা বাণবৃষ্টিতে শল্য যুধিষ্ঠিরকে আঘাত করল। ক্ষিপ্রহস্ত শল্য যুদ্ধক্ষেত্রে তীক্ষ্ণ শর দ্বারা পাণ্ডবসেনাকে দমন করল, এবং পরে আরও প্রবল বাণবৃষ্টিতে যুধিষ্ঠিরকেও গভীরভাবে বিদ্ধ করল।

Verse 303

अवारयच्छरैस्ती4॥णैर्महाद्विपमिवाड्कुशै: । तब क्रोधमें भरे हुए राजा युधिष्ठिरने पैदलों और घुड़सवारोंके साथ आते हुए शल्यको अपने तीखे बाणोंसे उसी प्रकार रोक दिया

সঞ্জয় বললেন—ক্রোধে উদ্দীপ্ত রাজা যুধিষ্ঠির পদাতিক ও অশ্বারোহীদের সঙ্গে অগ্রসরমান শল্যকে তীক্ষ্ণ শর দ্বারা এমনভাবে রোধ করলেন, যেমন মাহুত অঙ্কুশের আঘাতে বিশাল হাতিকে ধাবিত হতে বাধা দেয়।

Verse 416

कालो दण्डमिवोद्यम्य गदापाणिरयुध्यत । कृतवमनि युद्धस्थलमें भीमसेनके रीछके समान रंगवाले घोड़ोंको मार डाला। घोड़ोंके मारे जानेपर पाण्डुनन्दन भीमसेन रथकी बैठकसे नीचे उतरकर हाथमें गदा ले युद्ध करने लगे

সঞ্জয় বললেন—কাল যেন দণ্ড তুলে নিয়েছে, তেমনই গদাধারী যোদ্ধা যুদ্ধ করল। যুদ্ধক্ষেত্রে কৃতবর্মা ভীমসেনের ভালুকবর্ণ ঘোড়াগুলিকে হত্যা করল। ঘোড়াগুলি নিহত হলে পাণ্ডুনন্দন ভীম রথের আসন থেকে নেমে হাতে গদা তুলে যুদ্ধ করতে লাগল—যেন যমরাজ দণ্ড উঁচিয়ে প্রহার করছেন।

Verse 426

ततः शल्यस्य तनयं सहदेवोडसिनावधीत्‌ । मद्रराज शल्यने अपने सामने आये हुए सहदेवके घोड़ोंको मार डाला। तब सहदेवने भी शल्यके पुत्रको तलवारसे मार गिराया

তখন সহদেব তলোয়ার দিয়ে শল্যের পুত্রকে নিপাত করলেন। মদ্ররাজ শল্য নিজের সামনে আসা সহদেবের অশ্বগুলিকে বধ করল। তারই প্রতিশোধে সহদেবও শল্যপুত্রকে অস্ত্রাঘাতে ভূমিসাৎ করলেন।

Verse 563

निवार्यमाणो बहुभिद्रौपद्या: प्रियमास्थित: । तथा जिसके द्वारा क्रोधमें भरे हुए महाबलवान्‌ कुन्तीकुमार भीमने बहुतोंके मना करनेपर भी द्रौपदीका प्रिय करनेके लिये उद्यत हो गर्जना करते हुए कुबेरभवनमें रहनेवाले बहुत-से मायामय अभिमानी गुह्य॒कोंका वध किया था

অনেকে বাধা দিলেও তিনি দ্রৌপদীর প্রিয় কাজ করতেই স্থির রইলেন। এভাবে ক্রোধে উন্মত্ত মহাবলী কুন্তীপুত্র ভীম, দ্রৌপদীকে তুষ্ট করতে গর্জন করতে করতে কুবেরের ভবনে বাস করা বহু মায়াবী অহংকারী গুহ্যককে বধ করলেন।

Verse 573

समुद्यम्य महाबाहु: शल्यमभ्यपतद्‌ रणे । जिसमें वज्जकी गुरुता भरी है और जो हीरे

মহাবাহু শল্য ভারী বর্শা তুলে রণক্ষেত্রে ঝাঁপিয়ে পড়ল। বজ্রসম গুরুতা-ধারী, হীরা-মণি-রত্নখচিত বিচিত্র দীপ্তিময় সেই অস্ত্র হাতে নিয়ে শল্য মহাবাহু ভীমসেনকে আঘাত করতে ধেয়ে এল।

Verse 583

पोथयामास शल्यस्य चतुरो<श्चवान्‌ महाजवान्‌ | युद्धकुशल भीमसेनने भयंकर शब्द करनेवाली उस गदाके द्वारा शल्यके महान्‌ वेगशाली चारों घोड़ोंको मार गिराया

যুদ্ধকুশল ভীমসেন ভয়ংকর গর্জনকারী গদা চালিয়ে শল্যের চারটি মহাবেগবান অশ্বকে আঘাতে নিপাত করলেন।

Verse 603

यन्तारं मद्रराजस्य निर्बिभेद ततो हृदि । इससे भीमसेनको तनिक भी घबराहट नहीं हुई। उन्होंने उसी तोमरको निकालकर उसके द्वारा मद्रराज शल्यके सारथिकी छाती छेद डाली

তারপর ভীমসেন মদ্ররাজ শল্যের সারথিকে বুকে—হৃদয়ে—বিদ্ধ করলেন। সেই আঘাতেও তিনি বিচলিত হলেন না; সেই একই তোমর টেনে বের করে তিনি শল্যের সারথির বক্ষ বিদীর্ণ করলেন।

Verse 623

गदाम॒श्रित्य धर्मात्मा प्रत्यमित्रमवैक्षत । अपने प्रहारका भरपूर उत्तर प्राप्त हुआ देख धर्मात्मा शल्यका चित्त आश्वर्यसे चकित हो उठा। वे गदा हाथमें लेकर अपने शत्रुकी ओर देखने लगे

গদা ধারণ করে ধর্মাত্মা শল্য প্রতিপক্ষ শত্রুর দিকে চেয়ে রইলেন। নিজের আঘাতের পূর্ণ প্রতিউত্তর প্রত্যক্ষ করে শল্যের চিত্ত বিস্ময়ে স্তম্ভিত হল। গদা হাতে তিনি শত্রুর দিকেই দৃষ্টি স্থির করলেন।

Frequently Asked Questions

The chapter frames the tension between personal heroics and command responsibility: whether to pursue decisive single combat or shift to broader tactical measures that protect one’s side while increasing collective harm.

It illustrates that technique and endurance alone do not conclude conflicts; battlefield outcomes depend on timely transitions—regrouping, extraction, and ranged suppression—integrated with disciplined conduct.

No explicit phalaśruti appears here; the chapter functions as embedded war-chronicle, where meaning is conveyed through narrative sequencing, similes, and tactical causality rather than overt doctrinal closure.

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