ऑपन--माजण बछ। अकाल एकादशोब< ध्याय: शल्यका पराक्रम, कौरव-पाण्डवयोद्धाओंके दन्ड्ययुद्ध तथा भीमसेनके द्वारा शल्यकी पराजय संजय उवाच तस्मिन् विलुलिते सैन्ये वध्यमाने परस्परम् । द्रवमाणेषु योधेषु विनदत्सु च दन्तिषु,संजय कहते हैं--महाराज! उस महासमरमें जब दोनों पक्षोंकी सेनाएँ परस्परकी मार खाकर भयसे व्याकुल हो उठीं, दोनों दलोंके योद्धा पलायन करने लगे, हाथी चिग्घाड़ने तथा पैदल सैनिक कराहने और चिल्लाने लगे; बहुत-से घोड़े मारे गये, सम्पूर्ण देहधारियोंका घोर भयंकर एवं विनाशकारी संहार होने लगा, नाना प्रकारके अस्त्र-शस्त्र परस्पर टकराने लगे, रथ और हाथी एक-दूसरेसे उलझ गये, युद्धकुशल योद्धाओंका हर्ष और कायरोंका भय बढ़ानेवाला संग्राम होने लगा, एक-दूसरेके वधकी इच्छासे उभयपक्षकी सेनाओंमें दोनों दलोंके योद्धा प्रवेश करने लगे, प्राणोंकी बाजी लगाकर महाभयंकर युद्धका जूआ आरम्भ हो गया तथा यमराजके राज्यकी वृद्धि करनेवाला घोर संग्राम चलने लगा, उस समय पाण्डव अपने तीखे बाणोंसे आपकी सेनाका संहार करने लगे। इसी प्रकार आपके योद्धा भी पाण्डव-सैनिकोंके वधर्में प्रवृत्त हो गये
sañjaya uvāca | tasmin vilulite sainye vadhyamāne parasparam | dravamāṇeṣu yodheṣu vinadatsu ca dantiṣu ||
সঞ্জয় বললেন—মহারাজ, সেই মহাসমরে যখন সেনা-বাহিনী বিপর্যস্ত হয়ে পড়ল এবং পরস্পরকে বধ করতে লাগল; যখন যোদ্ধারা পালাতে শুরু করল এবং হাতিরা গর্জন করতে লাগল—তখন ভয় ও বিনাশে যুদ্ধক্ষেত্র আচ্ছন্ন হল। অস্ত্রশস্ত্র পরস্পর সংঘর্ষে লিপ্ত হল, রথ ও গজ একে অপরের সঙ্গে জড়িয়ে পড়ল। তখন পাণ্ডবেরা তীক্ষ্ণ বাণে আপনার সেনাকে সংহার করতে লাগল, আর তেমনি আপনার যোদ্ধারাও পাণ্ডবসৈন্যের বধে প্রবৃত্ত হল।
संजय उवाच
The verse underscores the moral gravity of war: once violence is unleashed, it becomes reciprocal and destabilizing—fear, flight, and chaos spread through both sides. It invites reflection on the ethical cost of pursuing aims through mutual slaughter, even within a kṣatriya framework.
Sañjaya reports to the king that the battle has reached a frantic pitch: the armies are disordered, warriors are being killed by one another, many begin to flee, and elephants roar—signs that the fight has turned into a terrifying rout-like melee.