Adhyaya 80
Anushasana ParvaAdhyaya 8042 Verses

Adhyaya 80

Go-mahātmyam: Pavitrāṇāṃ Pavitraṃ (Cows and Ghee as Supreme Purifiers)

Upa-parva: Dāna-dharma (Gavāṃ-dāna & Pavitra-vicāra) — Instructional Unit on the sanctity of cows and ghee

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to identify what is supremely purifying among purifiers. Bhīṣma asserts the exceptional sanctity and salvific value of cows, describing them as sustaining beings through milk and sacrificial utility, and states that gifting cows leads to exalted realms, citing exemplary kings. He then introduces an ancient account: Śuka approaches Vyāsa after daily rites and asks a cluster of systematic questions—what is the foremost sacrifice, what act yields highest heaven, what purifier sustains the gods, and what is the best gift. Vyāsa replies by positioning cows as the foundation and refuge of beings, narrating a cosmogonic motif where Brahmā grants cows horns according to their intent, rendering them auspicious providers of offerings. The chapter elaborates the “world of cows” with ornate heavenly imagery as the merit-result of go-dāna. It prescribes reverence and non-malice toward cows, mentions a daily japa formula, and elevates ghṛta (ghee) as “pavitrāṇāṃ pavitram,” outlining its ritual uses (offerings, auspicious recitations, gifting, consumption). A structured purification regimen involving pañcagavya-related elements is described as expiatory. The chapter closes by affirming cows as yajñiya and wish-fulfilling, urging consistent worship by example of Śuka.

Chapter Arc: युधिष्ठिर, गोदान के अमृत-तुल्य गुणों को सुनकर भी तृप्त नहीं होते और भीष्म (शान्तनव) से पुनः विस्तारपूर्वक पूछते हैं कि गौ-दान का महात्म्य क्या है और गौओं की उत्पत्ति व प्रतिष्ठा कैसे हुई। → भीष्म क्रमशः सृष्टि-क्रम और श्रेष्ठता-क्रम बताते हैं—स्थावर से जंगम, जंगम में मनुष्य, मनुष्य में ब्राह्मण; और ब्राह्मणों में यज्ञ की प्रतिष्ठा। फिर यज्ञ, सोम और गौ—इन तीनों की परस्पर-आश्रयता दिखाकर यह प्रश्न तीखा होता जाता है कि गौ को ‘अमृत’ क्यों कहा गया और उसका ‘उच्छिष्ट’ क्यों नहीं माना जाता। → गौओं की ‘अमृत-सम्भव’ महिमा का निर्णायक प्रतिपादन होता है—जैसे सोम/अमृत का प्रवाह और देवोपभोग उच्छिष्ट नहीं कहलाता, वैसे ही बछड़े के पीने पर भी गौ का दूध जूठा नहीं होता; गौओं में सोम-तत्त्व प्रतिष्ठित है, इसलिए वे यज्ञ, देव, प्रजा और वृत्ति—सबकी आधार-शिला हैं। → भीष्म गो-दान को केवल दान नहीं, सृष्टि-पालन की धुरी बताते हैं—प्राणी जन्म लेते ही वृत्ति की पुकार करते हैं और गौ ‘माता-पिता’ की भाँति वृत्ति देने वाली है; अतः गो-दान से देवता प्रसन्न, यज्ञ पुष्ट, ब्राह्मण-धर्म स्थिर और लोक-कल्याण सुनिश्चित होता है। → गो-दान के फल-विशेष और विविध विधानों/उपदानों (किसे, कब, कैसे) का आगे और सूक्ष्म विस्तार संकेतित रहता है।

Shlokas

Verse 1

अपन क्ाा बछ। 2 सप्तसप्ततितमो< ध्याय: कपिला गौओंकी उत्पत्ति और महिमाका वर्णन वैशम्पायन उवाच ततो युधिष्ठटिरो राजा भूय: शान्तनवं नृपम्‌ | गोदानविस्तरं धर्मान्‌ पप्रच्छ विनयान्वितः

বৈশম্পায়ন বললেন—তদনন্তর রাজা যুধিষ্ঠির বিনয়ের সঙ্গে পুনরায় শান্তনুনন্দন ভীষ্মকে গোদান-এর বিস্তৃত বিধি এবং তৎসংক্রান্ত ধর্মসমূহ সম্পর্কে জিজ্ঞাসা করলেন।

Verse 2

युधिछिर उवाच गोप्रदानगुणान्‌ सम्यक्‌ पुनर्मे ब्रूहि भारत । न हि तृप्याम्यहं वीर शृण्वानो$मृतमीदृशम्‌

যুধিষ্ঠির বললেন—হে ভারত! গোদান-এর গুণ ও মহিমা আমাকে আবারও স্পষ্টভাবে ও সম্পূর্ণরূপে বলুন। হে বীর, এমন অমৃতসম উপদেশ শুনেও আমার তৃপ্তি হয় না; শ্রবণের আকাঙ্ক্ষা আরও বাড়ে।

Verse 3

वैशम्पायन उवाच इत्युक्तो धर्मराजेन तदा शान्तनवो नृप: । सम्यगाह गुणांस्तस्मै गोप्रदानस्य केवलान्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—ধর্মরাজ যুধিষ্ঠির এভাবে বললে, তখন শান্তনুবংশীয় রাজা ভীষ্ম গোদান-সম্পর্কিত গুণ ও ফলকে যথাযথভাবে ও ক্রমান্বয়ে বর্ণনা করতে লাগলেন।

Verse 4

भीष्म उवाच वत्सलां गुणसम्पन्नां तरुणीं वस्त्रसंयुताम्‌ । दत्त्वेदृशीं गां विप्राय सर्वपापै: प्रमुच्यते

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি স্নেহশীলা, গুণসম্পন্ন ও তরুণী গাভীকে বস্ত্রসহ সাজিয়ে ব্রাহ্মণকে দান করে, সে সর্বপাপ থেকে মুক্ত হয়।

Verse 5

असुर्या नाम ते लोका गां दत्त्वा तानू न गच्छति । पीतोदकां जग्धतृणां नष्टक्षीरां निरिन्द्रियाम्‌

‘অসুর্যা’ নামে যে অন্ধকারময় লোকসমূহ আছে, যথাযথ গোদানকারী সেখানে যায় না। কিন্তু যার জল কেড়ে নেওয়া হয়েছে, যার ঘাস-খাদ্য নিঃশেষ করা হয়েছে, যার দুধ নষ্ট, এবং যার ইন্দ্রিয়-শক্তি লুপ্ত—এমন গাভী দান করলে দাতা ব্রাহ্মণকে অনর্থক কষ্ট দেয় এবং নিজেও ভয়ংকর নরকে পতিত হয়।

Verse 6

जरारोगोपसम्पन्नां जीर्णा वापीमिवाजलाम्‌ | दत्त्वा तम: प्रविशति द्विजं क्लेशेन योजयेत्‌

ভীষ্ম বললেন—যে গাভী বার্ধক্য ও রোগে জর্জরিত, জলশূন্য ভগ্ন কূপের মতো নিঃসার ও জীর্ণ, তাকে দান করলে দাতা ঘোর অন্ধকারময় নরকে পতিত হয়। এমন দান ব্রাহ্মণ গ্রহীতাকে কেবল অনর্থক কষ্টে ফেলে। অতএব দান হতে হবে যোগ্য ও কল্যাণকর; যা অকেজো ও কষ্টদায়ক, তা দান নয়—পাপের কারণ।

Verse 7

रुष्टा दुष्टा व्याधिता दुर्बला वा नो दातव्या याश्र मूल्यैरदत्तै: । क्लेशैविंप्रं योडफलै: संयुनक्ति तस्यावीर्याश्षवाफलाश्वैव लोका:

ভীষ্ম বললেন—যে গাভী ক্রুদ্ধ, দুষ্টস্বভাব, রোগাক্রান্ত বা দুর্বল, এবং যার মূল্য যথাযথভাবে পরিশোধ করা হয়নি, তাকে দান করা উচিত নয়। যে এমন নিষ্ফল দানে ব্রাহ্মণকে কেবল কষ্টে ফেলে, সে নিজেও শক্তিহীন ও ফলহীন লোকই লাভ করে।

Verse 8

बलान्विता: शीलवयोपपन्ना: सर्वे प्रशंसन्ति सुगन्धवत्य: । यथा हि गंगा सरितां वरिष्ठा तथार्जुनीनां कपिला वरिष्ठा

ভীষ্ম বললেন—বলসম্পন্ন, সদাচার ও যৌবনবলে ভূষিত, এবং সুগন্ধযুক্ত গাভীদের সকলেই প্রশংসা করে। যেমন নদীগণের মধ্যে গঙ্গা শ্রেষ্ঠ, তেমনি অর্জুনী গাভীদের মধ্যে কপিলা শ্রেষ্ঠ।

Verse 9

हृष्ट-पुष्ट, सुलक्षणा, जवान तथा उत्तम गन्धवाली गायकी सभी लोग प्रशंसा करते हैं। जैसे नदियोंमें गंगा श्रेष्ठ हैं, वैसे ही गौओंमें कपिला गौ उत्तम मानी गयी है ।।

যুধিষ্ঠির বললেন—পিতামহ! যখন যে-কোনো বর্ণের গাভী দান করলে প্রচুর পুণ্য সমানভাবে লাভ হয়, তখন সদ্জনেরা কেন বিশেষ করে কপিলা গাভী দানের প্রশংসা করেছেন? আমি সেই দানের মহান ও ব্যতিক্রমী প্রভাব বিশেষভাবে শুনতে চাই। আমি শুনতে সক্ষম, আর আপনি ব্যাখ্যা করতে সক্ষম।

Verse 10

भीष्म उवाच वृद्धानां ब्रुवतां तात श्रुतं मे यत्‌ पुरातनम्‌ । वक्ष्यामि तदशेषेण रोहिण्यो निर्मिता यथा

ভীষ্ম বললেন—বৎস! প্রবীণদের মুখে আমি রোহিণী (কপিলা) গাভীর উৎপত্তি সম্বন্ধে যে প্রাচীন কাহিনি শুনেছি, তা আমি তোমাকে সম্পূর্ণরূপে বলছি—রোহিণী কীভাবে নির্মিত হয়েছিল।

Verse 11

प्रजा: सृजेति चादिष्ट: पूर्व दक्ष: स्वयम्भुवा । असृजद्‌ वृत्तिमेवाग्रे प्रजानां हितकाम्यया

ভীষ্ম বললেন—সৃষ্টির আদিতে স্বয়ম্ভূ ব্রহ্মা পূর্বে দক্ষকে আদেশ দিলেন—“প্রজাসৃষ্টি কর।” কিন্তু জীবসমূহের মঙ্গল কামনা করে দক্ষ প্রথমে তাদের জীবিকার ব্যবস্থা স্থাপন করলেন; তারপর প্রজাসৃষ্টিতে প্রবৃত্ত হলেন।

Verse 12

यथा हाामृतमाश्रित्य वर्तयन्ति दिवौकस: । तथा वृत्तिं समाश्रित्य वर्तयन्ति प्रजा विभो,प्रभो! जैसे देवता अमृतका आश्रय लेकर जीवन-निर्वाह करते हैं, उसी प्रकार समस्त प्रजा आजीविकाके सहारे जीवन धारण करती है

প্রভো! যেমন দেবতারা অমৃতের আশ্রয়ে জীবনধারণ করেন, তেমনি সকল প্রজা জীবিকার আশ্রয়ে জীবিত থাকে।

Verse 13

अचरेभ्यश्व भूतेभ्यश्वरा: श्रेष्ठा: सदा नरा: । ब्राह्मणाश्व तत: श्रेष्ठास्तेषु यज्ञा: प्रतिष्ठिता:

স্থাবর প্রাণীদের চেয়ে জঙ্গম প্রাণী সর্বদা শ্রেষ্ঠ। তাদের মধ্যে মানুষ শ্রেষ্ঠ; আর মানুষের মধ্যে ব্রাহ্মণ শ্রেষ্ঠ—কারণ যজ্ঞ তাঁদের মধ্যেই প্রতিষ্ঠিত।

Verse 14

यज्जैरवाप्यते सोम: स च गोषु प्रतिष्ठित: । ततो देवा: प्रमोदन्ते पूर्व वृत्तिस्तत: प्रजा:

যজ্ঞের দ্বারা সোম লাভ হয়, আর সেই যজ্ঞ গাভীদের উপর প্রতিষ্ঠিত। তাতে দেবতারা প্রমোদিত হন; অতএব আগে জীবিকা, তারপর প্রজা।

Verse 15

प्रजातान्येव भूतानि प्राक्रोशन्‌ वृत्तिकांक्षया । वृत्तिदं चान्वपद्यन्त तृषिता: पितृमातृवत्‌

সকল প্রাণী জন্ম নিয়েই জীবিকার আকাঙ্ক্ষায় কোলাহল করতে লাগল। যেমন ক্ষুধার্ত-পিপাসার্ত শিশু পিতা-মাতার কাছে যায়, তেমনি সকল জীব জীবিকাদাতার শরণ নিল।

Verse 16

इतीदं मनसा गत्वा प्रजासर्गार्थमात्मन: । प्रजापतिस्तु भगवानमृतं प्रापिबत्‌ तदा,प्रजाजनोंकी इस स्थितिपर मन-ही-मन विचार करके भगवान्‌ प्रजापतिने प्रजावर्गकी आजीविकाके लिये उस समय अमृतका पान किया

প্রজাদের এই অবস্থার কথা মনে মনে বিবেচনা করে, প্রজাসৃষ্টি ও তাদের ধারণের উদ্দেশ্যে ভগবান প্রজাপতি তখন অমৃত পান করলেন।

Verse 17

स गतस्तस्य तृप्तिं तु गन्धं सुरभिमुद्विरन्‌ । ददर्शोद्वारसंवृत्तां सुरभिं मुखजां सुताम्‌

অমৃত পান করে তিনি যখন সম্পূর্ণ তৃপ্ত হলেন, তখন তাঁর মুখ থেকে মনোহর সুগন্ধ বেরোতে লাগল। সেই সুগন্ধের সঙ্গেই ‘সুরভি’ নামে এক গাভী প্রকাশ পেল—যাকে প্রজাপতি নিজের মুখজাত কন্যা রূপে দেখলেন।

Verse 18

सासृजत्‌ सौरभेयीस्तु सुरभिलोकमातृका: । सुवर्णवर्णा: कपिला: प्रजानां वृत्तिधेनव:

সেই সুরভি ‘সৌরভেয়ী’ নামে বহু গাভী উৎপন্ন করলেন—যারা সমগ্র জগতের জন্য মাতৃসমা। তাদের বর্ণ ছিল স্বর্ণের মতো দীপ্ত, তারা কপিলা; আর প্রজাদের জীবিকা ও পোষণের জন্য দুধদাত্রী ধেনু রূপে প্রতিষ্ঠিত হল।

Verse 19

तासाममृतवर्णानां क्षरन्तीनां समन्ततः । बभूवामृतज: फेन: स्रवन्तीनामिवोर्मिज:

অমৃতসম (স্বর্ণোজ্জ্বল) বর্ণের সেই গাভীদের দুধ চারদিকে ধারার মতো প্রবাহিত হতে লাগল। সেই প্রবহমান দুধ থেকে ফেনা উঠল—যেমন নদীর ঢেউ থেকে ফেনা জন্মায়।

Verse 20

स वत्समुखविश्रष्टो भवस्य भुवि तिष्ठत: । शिरस्यवाप तत्‌ क्रुद्ध: स तदैक्षत च प्रभु:

সে (দুধের ফেনা) বাছুরের মুখ থেকে খসে পড়ে, ভূমিতে অবস্থানরত ভব (শিব)-এর শিরে গিয়ে পড়ল। এতে ক্রুদ্ধ হয়ে প্রভু ভব তৎক্ষণাৎ তার দিকে দৃষ্টি নিক্ষেপ করলেন।

Verse 21

तत्तेजस्तु ततो रौद्रं कपिलास्ता विशाम्पते

ভীষ্ম বললেন—তখন সেই তেজ রুদ্ররূপ ধারণ করল, আর তারা সকলেই কপিলবর্ণ হয়ে উঠল, হে প্রজাপতি।

Verse 22

यास्तु तस्मादपक्रम्य सोममेवाभिसंश्रिता:

ভীষ্ম বললেন—কিন্তু যে গাভীগুলি সেখান থেকে সরে গিয়ে কেবল সোম (চন্দ্র)-এর শরণ নিল, তারা জন্মের মতোই নিজ নিজ বর্ণে স্থির রইল; তাদের রং বদলাল না। তখন ক্রোধে পূর্ণ মহাদেবকে লক্ষ্য করে দক্ষ প্রজাপতি এইভাবে বললেন—

Verse 23

यथोत्पन्ना: स्ववर्णास्थास्ता होता नान्यवर्णगा: । अथ कुद्ध॑ महादेवं प्रजापतिरभाषत

তারা জন্মের মতোই নিজ বর্ণে স্থির রইল; অন্য বর্ণে গেল না। তখন ক্রুদ্ধ মহাদেবকে লক্ষ্য করে প্রজাপতি বললেন—

Verse 24

अमृतेनावसिक्तस्त्वं नोच्छिष्टं विद्यते गवाम्‌ । यथा हामृतमादाय सोमो विस्यन्दते पुन:

ভীষ্ম বললেন—তুমি অমৃতে অভিষিক্ত; তাই গাভীদের ক্ষেত্রে উচ্ছিষ্ট (অশুদ্ধ অবশিষ্ট) বলে কিছু নেই। যেমন সোম অমৃত গ্রহণ করে আবার প্রবাহিত হয়।

Verse 25

न दुष्यत्यनिलो नाग्निर्न सुवर्ण न चोदथधि:

ভীষ্ম বললেন—বায়ু দুষিত হয় না, অগ্নিও নয়; স্বর্ণও নয়, সমুদ্রও নয়। তেমনি বাছুরের পান করার পর যে অবশিষ্ট থাকে তাতে এই গাভীগুলি অশুদ্ধ হয় না। সকলেই এই গাভীদের মঙ্গলময়, অমৃতসম ঐশ্বর্য কামনা করে—যেন তারা দুধ ও ঘৃত দ্বারা সমগ্র জগতকে ধারণ করে।

Verse 26

नामृतेनामृतं पीतं वत्सपीता न वत्सला | इमॉल्लोकान्‌ भरिष्यन्ति हविषा प्रस्नरवेण च

ভীষ্ম বললেন—সদাচারের সত্য ‘অমৃত’ ব্যতীত যা পান করা হয়, তা আদৌ অমৃত নয়; আর বাছুর দুধ খেয়েছে বলেই গাভীকে সত্যিকার বৎসলা বলা যায় না। যজ্ঞের হবি এবং বিধিপূর্বক উচ্চারিত পবিত্র প্রস্নরব (মন্ত্রোচ্চারণ/আহ্বান) দ্বারাই এই সকল লোক ধারণ হয়।

Verse 27

वृषभं च ददौ तस्मै सह गोभि: प्रजापति:

ভীষ্ম বললেন—প্রজাপতি তাঁকে গাভীদের সঙ্গে একটি বৃষও দান করেছিলেন।

Verse 28

प्रीतश्चापि महादेवश्चकार वृषभं तदा

ভীষ্ম বললেন—তখন সন্তুষ্ট হয়ে মহাদেব একটি বৃষ সৃষ্টি করলেন।

Verse 29

ध्वजं च वाहनं चैव तस्मात्‌ स वृषभध्वज: । महादेवजी प्रसन्न हुए। उन्होंने वृषभको अपना वाहन बनाया और उसीकी आकृतिसे अपनी ध्वजाको चिह्नित किया, इसीलिये वे “वृषभध्वज” कहलाये ।।

ভীষ্ম বললেন—তিনি বৃষকে নিজের বাহনও করলেন এবং ধ্বজেও তারই চিহ্ন ধারণ করলেন; তাই তিনি ‘বৃষভধ্বজ’ নামে খ্যাত হলেন। এরপর দেবগণ মহাদেবকে ‘পশুপতি’—সমস্ত জীবের অধিপতি—রূপে প্রতিষ্ঠা করলেন; আর গাভীদের মধ্যে সেই পরমেশ্বর ‘বৃষভাঙ্ক’, অর্থাৎ বৃষচিহ্নধারী, নামে প্রসিদ্ধ হলেন।

Verse 30

एवमव्यग्रवर्णानां कपिलानां महौजसाम्‌ । प्रदाने प्रथम: कल्प: सर्वासामेव कीर्तित:,इस प्रकार कपिला गौएँ अत्यन्त तेजस्विनी और शान्त वर्णवाली हैं। इसीसे दानमें उन्हें सब गौओंसे प्रथम स्थान दिया गया है

ভীষ্ম বললেন—এইভাবে কপিলা (তামাটে) গাভীরা শান্ত বর্ণের এবং মহাতেজস্বিনী; তাই দানের ক্ষেত্রে সকল গাভীর মধ্যে তাদেরই প্রথম স্থান বলা হয়েছে।

Verse 31

लोकमज्येष्ठा लोकवृत्तिप्रवृत्ता रुद्रोपेता: सोमविष्यन्दभूता: । सौम्या: पुण्या: कामदा: प्राणदाश्न गा वै दत्त्वा सर्वकामप्रद: स्थात्‌

ভীষ্ম বললেন—গরুই জগতের শ্রেষ্ঠ সম্পদ। সকল প্রাণীর জীবন ও জীবিকা ধারণে তারা সদা নিয়োজিত। রুদ্রদেব তাদের সঙ্গে অধিষ্ঠান করেন। সোম থেকে ঝরে-পড়া অমৃতজাত, তারা কোমল ও পবিত্র—ইচ্ছিত বরদানকারী এবং প্রাণধারিণী। অতএব যে গোদান করে, তাকে সর্বকামদাতা বলে গণ্য করা হয়।

Verse 32

इदं गवां प्रभवविधानमुत्तमं पठन्‌ सदाशुचिरपि मंगलप्रिय: । विमुच्यते कलिकलुषेण मानव: श्रियं सुतान्‌ धनपशुमाप्तुयात्‌ सदा

ভীষ্ম বললেন—গরুর উৎপত্তি ও মহিমা-বিষয়ক এই উৎকৃষ্ট বর্ণনা যে ব্যক্তি নিয়মিত পাঠ করে, সে অশুচি হলেও মঙ্গলপ্রিয় হয়ে ওঠে। কলিযুগের কলুষ থেকে সে মুক্ত হয় এবং সর্বদা পুত্র, লক্ষ্মী, ধন ও পশুধন লাভ করে।

Verse 33

हव्यं कव्यं तर्पणं शान्तिकर्म यान॑ वासो वृद्धबालस्यथ तुष्टि: । एतान्‌ सर्वान्‌ गोप्रदाने गुणान्‌ वै दाता राजज्नाप्तुयाद्‌ वै सदैव

ভীষ্ম বললেন—গোদান করলে দাতা দেবতার উদ্দেশ্যে হব্য, পিতৃকার্যে কব্য, তर्पণ ও শান্তিকর্মের ফল সদা লাভ করে। সে যানবাহন ও বস্ত্রের সুফল পায়, আর বৃদ্ধ ও শিশুর সন্তোষও অর্জন করে। হে রাজন, এগুলিই গোদানের গুণ ও ফল; দাতা তা বারংবার পায়।

Verse 34

वैशम्पायन उवाच पितामहस्याथ निशम्य वाक्य राजा सह भ्रातृभिराजमीढ: । सुवर्णवर्णानडुहस्तथा गा: पार्थो ददौ ब्राह्मणसत्तमेभ्य:

বৈশম্পায়ন বললেন—পিতামহ ভীষ্মের বাণী শুনে অজমীঢ়বংশীয় রাজা যুধিষ্ঠির ভ্রাতৃগণের সঙ্গে শ্রেষ্ঠ ব্রাহ্মণদের ধর্মানুগ দান করলেন—সোনালি বর্ণের বলদ এবং উৎকৃষ্ট গাভী।

Verse 35

तथैव तेभ्योडपि ददौ द्विजेभ्यो गवां सहस्राणि शतानि चैव । यज्ञान्‌ समुद्दिश्य च दक्षिणार्थे लोकान्‌ विजेतुं परमां च कीर्तिम्‌

বৈশম্পায়ন বললেন—তদ্রূপ রাজা যজ্ঞের দক্ষিণার উদ্দেশ্যে সেই দ্বিজ ব্রাহ্মণদের শত শত ও সহস্র সহস্র গাভী দান করলেন। পুণ্যলোক জয় করতে এবং এই জগতে নিজের পরম কীর্তি বিস্তার করতে তিনি বারংবার এই দান সম্পন্ন করলেন।

Verse 76

इस प्रकार श्रीमह्या भारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें गोदानकथनविषयक छिह्वत्तरवाँ अध्याय पूरा हुआ

এইভাবে পবিত্র শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বের অন্তর্গত দানধর্মপর্বে গোদান-বর্ণনাবিষয়ক ছিয়াত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত হল।

Verse 77

इति श्रीमहाभारते अनुशासनपर्वणि दानधर्मपर्वणि गोप्रभवकथने सप्तसप्ततितमो<ध्याय:

ইতি শ্রীমহাভারতের অনুশাসনপর্বে দানধর্মপর্বের অন্তর্গত গোপ্রভব-বর্ণনায় সাতাত্তরতম অধ্যায় সমাপ্ত।

Verse 206

ललाटप्रभवेणाक्ष्णा रोहिणीं प्रदहन्निव । एक दिन भगवान्‌ शंकर पृथ्वीपर खड़े थे। उसी समय सुरभिके एक बछड़ेके मुँहसे फेन निकलकर उनके मस्तकपर गिर पड़ा। इससे वे कुपित हो उठे और अपने ललाटजनित नेत्रसे

ভীষ্ম বললেন—একদিন ভগবান শঙ্কর পৃথিবীতে দাঁড়িয়ে ছিলেন। সেই সময় সুরভির এক বাছুরের মুখ থেকে ফেন বেরিয়ে এসে তাঁর মস্তকে পড়ল। তাতে তিনি ক্রুদ্ধ হলেন এবং ললাটজাত নয়নে, যেন রোহিণীকে ভস্ম করে দেবেন—এইভাবে তার দিকে দৃষ্টি নিক্ষেপ করলেন।

Verse 213

नानावर्णत्वमनयन्मेघानिव दिवाकर: । प्रजानाथ! रुद्रका वह भयंकर तेज जिन-जिन कपिलाओंपर पड़ा

ভীষ্ম বললেন—হে প্রজানাথ! রুদ্রজাত সেই ভয়ংকর তেজ যেসব কপিলার উপর পড়ল, তারা নানা বর্ণ ধারণ করল। যেমন সূর্য তার কিরণে মেঘকে বিচিত্রবর্ণ করে তোলে, তেমনি সেই তেজ তাদের সকলকে নানাবর্ণা করে দিল।

Verse 246

तथा क्षीरं क्षरन्त्येता रोहिण्यो5मृतसम्भवम्‌ । प्रभो! आपके ऊपर अमृतका छींटा पड़ा है। गौओंका दूध बछड़ोंके पीनेसे जूठा नहीं होता। जैसे चन्द्रमा अमृतका संग्रह करके फिर उसे बरसा देता है

ভীষ্ম বললেন—প্রভো! আপনার উপর অমৃতের ছিটে পড়েছে। এই রোহিণী গাভীগণ অমৃতসম্ভূত দুধ ক্ষরণ করে। বাছুর পান করলেও তাদের দুধ জুঠো হয় না। যেমন চন্দ্র অমৃতের সার সংগ্রহ করে পুনরায় তা বর্ষণ করে, তেমনি এই রোহিণীরা অমৃতজাত দুধ প্রদান করে।

Verse 263

आसामैश्वर्यमिच्छन्ति सर्वेडमृतमयं शुभम्‌ | 'जैसे वायु

ভীষ্ম বললেন—সকলেই এই গাভীগুলির জন্য মঙ্গলময়, অমৃতসম সমৃদ্ধি কামনা করে। যেমন বায়ু, অগ্নি, স্বর্ণ, সমুদ্র এবং দেবতাদের পান করা অমৃত—এগুলি ‘উচ্ছিষ্ট’ বা দুষিত বলে গণ্য হয় না; তেমনি বাছুরদের প্রতি স্নেহবশত দুধ পান করানো গাভীও বাছুরের পান করার ফলে অপবিত্র বা উচ্ছিষ্ট হয় না। অতএব দুধ পানকালে বাছুরের মুখ থেকে পড়ে যাওয়া ফেনাও অশুচি বলে ধরা হয় না। এই গাভীগুলি তাদের দুধ ও ঘৃত দ্বারা সমগ্র জগতকে ধারণ করে; তাই সকলেই চায়, তাদের কল্যাণকর অমৃতময় দুধের ঐশ্বর্য চিরকাল অক্ষুণ্ণ থাকুক।

Verse 2736

प्रसादयामास मनस्तेन रुद्रस्य भारत । भरतनन्दन! ऐसा कहकर प्रजापतिने महादेवजीको बहुत-सी गौएँ और एक बैल भेंट किये तथा इसी उपायके द्वारा उनके मनको प्रसन्न किया

ভীষ্ম বললেন—হে ভারত, এই উপায়েই প্রজাপতি রুদ্রের মন প্রসন্ন করেছিলেন। হে ভরতনন্দন! এ কথা বলে প্রজাপতি মহাদেবকে বহু গাভী ও একটি বলদ নিবেদন করলেন, এবং এই একই পদ্ধতিতেই প্রভুকে সন্তুষ্ট করলেন।

Frequently Asked Questions

The question asks what is the greatest purifier; the answer privileges cows (go) as uniquely purifying and socially sustaining, and further identifies ghṛta (ghee) as the supreme purifier among purifiers in ritual practice.

The chapter recommends disciplined reverence: avoid malice toward cows, honor them with respectful conduct, and treat go-dāna and ghṛta-centered rites as structured means of purification and merit-making within regulated ethical behavior.

Yes. It repeatedly asserts result-claims: go-dāna leads to attainment of exalted realms (the “world of cows”), while ghṛta use in offering, gifting, and sanctioned consumption is framed as yielding auspicious purification and welfare outcomes.