Adhyaya 111
Anushasana ParvaAdhyaya 111181 Verses

Adhyaya 111

मानसतीर्थ-शौचप्रशंसा | Praise of the ‘Mental Tīrtha’ and the Marks of Purity

Upa-parva: Tīrtha-Śauca-Anuśāsana (Discourse on Pilgrimage and Purity)

Yudhiṣṭhira asks Bhīṣma to identify the श्रेष्ठ (best) among all tīrthas and to explain where ‘parama śauca’ (supreme purity) is found. Bhīṣma responds that all tīrthas have value for the discerning, yet the highest tīrtha is internal: an ‘agādha, vimala, śuddha’ mental ford filled with satya (truth) and sustained by dhṛti (steadfastness). He enumerates purity-markers as ethical and psychological disciplines—gentleness, sincerity, straightforwardness, ahiṃsā, compassion, dama and śama—along with non-possessiveness and absence of ego. He reframes ‘snāna’ (bathing) as ‘dama-snāta’ (bathed in restraint), yielding both external and internal cleanliness. While affirming the sanctity of earthly tīrthas and their rites (prayer, bathing, ancestral offerings) as purifying, he concludes that accomplishment arises from combining bodily/ritual purity with tīrtha-purity understood as inner discipline, paralleling the need to unite ‘strength’ and ‘action’ for success.

Chapter Arc: युधिष्ठिर का प्रश्न—जब यज्ञ बहु-सामग्री, धन और राजवैभव मांगते हैं, तब दरिद्र मनुष्य किस उपाय से वही पुण्य-फल प्राप्त कर सकता है? → भीष्म समझाते हैं कि अनेक यज्ञ ‘बहूपकरण’ हैं; निर्धन के लिए उनका अनुष्ठान कठिन है। तब वे उपवास-विधियों का क्रमबद्ध विधान खोलते हैं—मिताहार, इन्द्रिय-निग्रह, अहिंसा, और अग्निहोत्र-जैसे जप-हवन के साथ दीर्घकालिक व्रत—जिनसे यज्ञ-फल की समता संभव होती है। → भीष्म का निर्णायक प्रतिपादन—उपवास-धर्म का फल यज्ञ-फल के तुल्य है; जो बारह मास तक नियम, मिताहार, जितेन्द्रियता और वैराग्य के साथ आचरण करता है, वह उच्च लोकों का दर्शन/प्राप्ति करता है और दिव्य भोग-सम्पदा से युक्त होकर दीर्घकाल सुख भोगता है। → उपवास के फल का ‘अनुपूर्व्येण’ (क्रमशः) व्याख्यान पूर्ण होता है: दरिद्र मनुष्य भी शुद्ध आचरण, संयम और अहिंसा-प्रधान व्रत से वही आध्यात्मिक उपलब्धि पा सकता है जो सम्पन्न जन यज्ञों से पाते हैं। → भीष्म आगे के अध्यायों के लिए संकेत छोड़ते हैं कि दान-धर्म और व्रत-धर्म के अन्य सूक्ष्म भेदों/फल-विशेषों का विस्तार आगे क्रमशः कहा जाएगा।

Shlokas

Verse 1

इस प्रकार श्रीमह्याभारत अनुशासनपर्वके अन्तर्गत दानधर्मपर्वमें उपवासविधिविषयक एक सौ छठा अध्याय पूरा हुआ ॥/ १०६ ॥/ ऑपन-माज बछ। अफि्-छऋाज सप्ताधिकशततमो< ध्याय: दरिद्रोंके लिये यज्ञतुल्य फल देनेवाले उपवास-व्रत और उसके फलका विस्तारपूर्वक वर्णन युधिछिर उवाच पितामहेन विधिवद्‌ यज्ञा: प्रोक्ता महात्मना । गुणाश्रैषां यथातथ्यं प्रेत्य चेह च सर्वश:

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! মহাত্মা বিধিপূর্বক যজ্ঞসমূহের বর্ণনা করেছেন এবং ইহলোকে ও পরলোকে তাদের সমস্ত গুণও যথাযথভাবে প্রকাশ করেছেন।

Verse 2

न ते शक्‍्या दरिद्रेण यज्ञा: प्राप्तुं पितामह । बहूपकरणा यज्ञा नानासम्भारविस्तरा:

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! দরিদ্র মানুষের পক্ষে সেই যজ্ঞগুলির ফল লাভ করা সম্ভব নয়; কারণ যজ্ঞে বহু উপকরণ লাগে এবং নানা সামগ্রী ও আয়োজনের ফলে তার বিস্তার অত্যন্ত বৃদ্ধি পায়।

Verse 3

पार्थिवै राजपुत्रैर्वा शक्‍्या: प्राप्तुं पितामह । नार्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतै:

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! রাজা বা রাজপুত্রই কেবল সেই যজ্ঞগুলির ফল লাভ করতে সক্ষম। যাদের ধন কম, যারা গুণহীন, একাকী ও নিরাশ্রয়—তারা সে ধরনের যজ্ঞ করতে পারে না।

Verse 4

यो दरिद्रैरपि विधि: शकक्‍य: प्राप्तुं सदा भवेत्‌ | अर्थन्यूनैरवगुणैरेकात्मभिरसंहतै:

যুধিষ্ঠির বললেন— যে বিধিসংগত ধর্মাচরণ দরিদ্রের পক্ষেও সর্বদা সম্ভব—ধনহীন, ত্রুটিযুক্ত হলেও একনিষ্ঠ ও অবিভক্তচিত্ত লোকের দ্বারাও—সে ধর্ম আমাকে বলুন।

Verse 5

तुल्यो यज्ञफलैरेतैस्तन्मे ब्रूहि पितामह । इसलिये जिस कर्मका अनुष्ठान दरिद्रों, गुणहीनों, एकाकी और असहायोंके लिये भी सुगम तथा बड़े-बड़े यज्ञोंके समान फल देनेवाला हो, उसीका मुझसे वर्णन कीजिये ।।

যুধিষ্ঠির বললেন— পিতামহ! এই মহাযজ্ঞগুলির ফলের সমান ফলদায়ক যে সাধনা, তা আমাকে বলুন। ভীষ্ম বললেন— উপবাসফল-স্বরূপ এই ধর্ম অঙ্গিরা মুনি উপদেশ করেছিলেন।

Verse 6

यस्तु कल्यं तथा सायं भुञज्जानो नान्तरा पिबेत्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি কেবল প্রাতে ও সায়ং আহার করে, মাঝখানে জল পর্যন্ত পান করে না, এবং অহিংসায় স্থিত থেকে নিত্য অগ্নিহোত্র সম্পাদন করে, সে মাত্র ছয় বছরের মধ্যেই সিদ্ধি লাভ করে—এ বিষয়ে কোনো সংশয় নেই।

Verse 7

अहिंसानिरतो नित्यं जुह्नमानो जातवेदसम्‌ | षड्भिरेव स वर्षैस्तु सिध्यते नाज संशय:

যে ব্যক্তি নিত্য অহিংসায় রত থেকে জাতবেদস্‌ (অগ্নি)-এ আহুতি প্রদান করে, সে মাত্র ছয় বছরের মধ্যেই সিদ্ধি লাভ করে—এতে কোনো সংশয় নেই।

Verse 8

तप्तकाञ्चनवर्ण च विमान लभते नर: । देवस्त्रीणामधीवासे नृत्यगीतनिनादिते

মানুষ উত্তপ্ত স্বর্ণবর্ণ দীপ্তিমান এক বিমান লাভ করে এবং দেবস্ত্রীদের নিবাসে বাস পায়—যেখানে নৃত্য ও গীতের ধ্বনি সদা প্রতিধ্বনিত হয়।

Verse 9

त्रीणि वर्षाणि य: प्राशेत्‌ सततं त्वेकभोजनम्‌

যে ব্যক্তি তিন বছর ধরে অবিরত দিনে একবারই আহার করে…

Verse 10

यज्ञ बहुसुवर्ण वा वासवप्रियमाचरेत्‌

যজ্ঞ করুক অথবা প্রচুর স্বর্ণ দান করুক—যা বাসব (ইন্দ্র)-এর বিশেষ প্রিয়, সেই কর্মই করুক।

Verse 11

सत्यवान्‌ दानशीलबश्र ब्रह्माण्यश्वञानसूयक: । क्षान्तो दान्तो जितक्रोध: स गच्छति परां गतिम्‌

যে সত্যবাদী ও দানশীল, ব্রাহ্মণভক্ত এবং ঈর্ষাহীন; যে ক্ষমাশীল, সংযমী ও ক্রোধজয়ী—সে পরম গতি লাভ করে।

Verse 12

जो बहुत-सी सुवर्णकी दक्षिणासे युक्त इन्द्रप्रिय यज्ञका अनुष्ठान करता है तथा सत्यवादी, दानशील, ब्राह्मणभक्त, अदोषदर्शी, क्षमाशील, जितेन्द्रिय और क्रोधविजयी होता है, वह उत्तम गतिको प्राप्त होता है ।।

যে ইন্দ্রপ্রিয় যজ্ঞ প্রচুর স্বর্ণদক্ষিণাসহ সম্পন্ন করে, যে সত্যবাদী, দানশীল, ব্রাহ্মণভক্ত, দোষ না-দেখা, ক্ষমাশীল, ইন্দ্রিয়জয়ী ও ক্রোধজয়ী—সে উত্তম গতি লাভ করে। শ্বেত মেঘসম দীপ্ত, হংসচিহ্নিত বিমানে আরূঢ় হয়ে সে দুই ‘পদ্ম’ কাল সম্পূর্ণ হওয়া পর্যন্ত অপ্সরাদের সঙ্গে সেখানে বাস করে।

Verse 13

द्वितीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्‌ | सदा द्वादशमासांस्तु जुह्मानो जातवेदसम्‌

যে দ্বিতীয় দিনে একবারই আহার করে এবং বারো মাস ধরে নিরন্তর জাতবেদস অগ্নিতে আহুতি প্রদান করে—এমন সংযম ও অবিচল উপাসনা ধর্ম্য ব্রতরূপে প্রশংসিত।

Verse 14

अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधन: । अग्निष्टोमस्य यज्ञस्य फल प्राप्रोति मानव:

যে মানুষ নিত্য অগ্নিকার্যে নিবিষ্ট থাকে এবং নিত্য যথাসময়ে জাগে, সে অগ্নিষ্টোম যজ্ঞের ফল লাভ করে।

Verse 15

जो मनुष्य नित्य अग्निमें होम करता हुआ एक वर्षतक प्रति दूसरे दिन एक बार भोजन करता है तथा प्रतिदिन अग्निकी उपासनामें तत्पर रहकर नित्य सबेरे जागता है, वह अग्निष्टोम यज्ञका फल पाता है ।।

যে মানুষ নিত্য অগ্নিতে হোম করে এক বছর ধরে প্রতি দ্বিতীয় দিনে একবার আহার করে, প্রতিদিন অগ্নি-উপাসনায় নিবিষ্ট থেকে প্রভাতে নিয়মিত জাগে—সে অগ্নিষ্টোম যজ্ঞের ফল লাভ করে। সে হংস ও সারসযুত বিমানে আরূঢ় হয়ে ইন্দ্রলোকে উৎকৃষ্ট নারীদের পরিবেষ্টিত হয়ে বাস করে।

Verse 16

तृतीये दिवसे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्‌ | सदा द्वादशमासांस्तु जुह्दानो जातवेदसम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি প্রতি তৃতীয় দিনে কেবল একবার আহার করে এবং বারো মাস ধরে অবিরত জাতবেদস্‌ (অগ্নি)-তে আহুতি প্রদান করে, সে অতিরাত্র যজ্ঞের পরম উৎকৃষ্ট ফল লাভ করে।

Verse 17

अग्निकार्यपरो नित्यं नित्यं कल्यप्रबोधन: । अतितात्रस्य यज्ञस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्‌

যে ব্যক্তি নিত্য অগ্নিকার্যে নিবিষ্ট থাকে এবং প্রতিদিন প্রাতে জাগে, সে অতিরাত্র যজ্ঞের অনুত্তম ফল লাভ করে।

Verse 18

मयूरहंसयुक्तं च विमानं लभते नर: । सप्तर्षीणां सदा लोके सो5प्सरोभिव॑सेत्‌ सह

সে ব্যক্তি ময়ূর ও হংসযুক্ত এক দিব্য বিমান লাভ করে এবং সপ্তর্ষিদের লোকেতে অপ্সরাদের সঙ্গে সর্বদা বাস করে।

Verse 19

निवर्तनं च तत्रास्य त्रीणि पद्मानि चैव ह । उसे मोरोंसे जुता हुआ विमान प्राप्त होता है और वह सदा सप्तर्षियोंके लोकमें अप्सराओंके साथ निवास करता है। वहाँ तीन पद्म वर्षोतक वह निवास करता है ॥| १८३ || दिवसे यश्नतुर्थे तु प्राश्नीयादेकभोजनम्‌

তার জন্য সেখানে আরও উচ্চতর অবস্থায় প্রত্যাবর্তনও আছে, এবং তিন ‘পদ্ম’ কাল পর্যন্ত সেখানে বাসও আছে। আর যে ব্যক্তি নিত্য অগ্নিহোত্র পালন করে বারো মাস ধরে প্রতি চতুর্থ দিনে কেবল একবার আহার করে, সে বাজপেয় যজ্ঞের অনুত্তম ফল লাভ করে।

Verse 20

सदा द्वादशमासान्‌ वै जुह्बमानो जातवेदसम्‌ | वाजपेयस्य यज्ञस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्‌

যে ব্যক্তি নিশ্চয়ই বারো মাস ধরে অবিরত জাতবেদস্‌ (অগ্নি)-তে আহুতি প্রদান করে, সে বাজপেয় যজ্ঞের অনুত্তম ফল লাভ করে।

Verse 21

इन्द्रकन्याभिरूढं च विमानं लभते नर: । सागरस्य च पर्यन्ते वासवं लोकमावसेत्‌

মানুষ ইন্দ্রকন্যাদের আরূঢ় দিব্য বিমান লাভ করে; এবং সাগরের শেষ প্রান্তে গিয়ে বাসব (ইন্দ্র)-লোকেই বাস করে।

Verse 22

दिवसे पउ्चमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्‌

যে ব্যক্তি প্রতি পঞ্চম দিনে একবারই আহার করে, ঈর্ষাহীন ও পাপ থেকে দৃঢ়ভাবে দূরে থাকে, সে দ্বাদশাহ যজ্ঞের সমান ফল লাভ করে।

Verse 23

सदा द्वादशमासांस्तु जुह्दानो जातवेदसम्‌ | अलुब्ध: सत्यवादी च ब्रह्मण्यश्वाविहिंसक:

যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে অবিরত জাতবেদস্‌ (অগ্নি)-তে আহুতি দেয়, লোভহীন, সত্যবাদী, ব্রাহ্মণ্যধর্মে শ্রদ্ধাবান এবং অহিংস—সে ধর্মের লক্ষণে ভূষিত।

Verse 24

जाम्बूनदमयं दिव्यं विमान हंसलक्षणम्‌

জাম্বূনদ স্বর্ণে নির্মিত, হংস-চিহ্নাঙ্কিত দিব্য বিমান।

Verse 25

सूर्यमालासमाभासमारोहेत्‌ पाण्डुरं गृहम्‌ आवर्तनानि चत्वारि तथा पद्मानि द्वादशश

সূর্যমালার ন্যায় দীপ্ত শ্বেত গৃহে সে আরোহণ করে; তাতে চারটি আবর্তন (পরিক্রমা-প্রাঙ্গণ) এবং বারোটি পদ্মসদৃশ চিহ্ন থাকে।

Verse 26

शराग्निपरिमाणं च तत्रासौ वसते सुखम्‌ । वह सूर्यकी किरणमालाओंके समान प्रकाशमान तथा जाम्बूनद नामक सुवर्णके बने हुए श्वेतकान्तिवाले हंसलक्षित दिव्य विमानकर आरूढ़ होता तथा चार

ভীষ্ম বললেন—যে মুনি সংযতচিত্তে প্রতি ষষ্ঠ দিনে একবার মাত্র আহার করেন, তিনি গো-মেধ যজ্ঞের ফলস্বরূপ অতুল্য পুণ্য লাভ করেন।

Verse 27

सदा द्वादशमासान्‌ वै जुह्मानो जातवेदसम्‌ | सदा त्रिषवणस्नायी ब्रह्मचार्यनसूयक:

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পূর্ণ বারো মাস অবিরত জাতবেদ (অগ্নি)-তে আহুতি দেয়, যে সর্বদা ত্রিসন্ধ্যায় স্নান করে, যে ব্রহ্মচর্যে স্থিত এবং যে ঈর্ষাহীন—সে ধর্মে প্রশংসিত স্থির, আত্মশুদ্ধিকারী আচরণকে ধারণ করে।

Verse 28

अग्निज्वालासमाभासं हंसबर्हिणसेवितम्‌

তা অগ্নিশিখার ন্যায় দীপ্তিমান, এবং রাজহাঁস ও ময়ূর দ্বারা পরিবৃত ও সেবিত।

Verse 29

शातकुम्भसमायुक्त साधयेद्‌ यानमुत्तमम्‌ | तथैवाप्सरसामड्के प्रतिसुप्त: प्रबोध्यते

ভীষ্ম বললেন—শাতকুম্ভ (বিশুদ্ধ স্বর্ণ) দ্বারা অলংকৃত এক উৎকৃষ্ট যান প্রস্তুত করা উচিত; আর যেমন অপ্সরাদের অঙ্কে গভীর নিদ্রায় নিমগ্ন ব্যক্তি জাগ্রত হয়, তেমনি সে (ভোগনিদ্রায় আচ্ছন্ন) জাগিয়ে তোলা হয়।

Verse 30

नूपुराणां निनादेन मेखलानां च नि:स्वनै: । उसे अग्निकी ज्वालाके समान प्रकाशमान, हंस और मयूरोंसे सेवित, सुवर्णजटित उत्तम विमान प्राप्त होता है और वह अप्सराओंके अंकमें सोकर उन्हींके कांचीकलाप तथा नूपुरोंकी मधुर ध्वनिसे जगाया जाता है ।।

ভীষ্ম বললেন—নূপুরের ঝংকার ও মেখলার মধুর ধ্বনিতে তাকে জাগানো হয়। সে অগ্নিশিখার ন্যায় দীপ্ত, স্বর্ণালংকৃত, রাজহাঁস ও ময়ূর-সেবিত এক দিব্য বিমান লাভ করে; অপ্সরাদের অঙ্কে শয়ন করে এবং তাদের রত্নখচিত কটিবন্ধ ও নূপুরের সুমধুর নিনাদে জাগ্রত হয়। অগণিত বছরের মহাগণনায়—উপমায় উল্লিখিত রোমসংখ্যা যত—তত বছর সে ব্রহ্মলোকে সম্মানিত থাকে।

Verse 31

पद्मान्यष्टादश तथा पताके द्वे तथैव च । अयुतानि च पज्चाशदृक्षचर्मशतस्य च

ভীষ্ম বললেন—“অষ্টাদশ পদ্মচিহ্ন, তদ্রূপ দুই পতাকা; আরও পঞ্চাশ অযুত—এবং একশো ভালুকচর্ম।”

Verse 32

दिवसे सप्तमे यस्तु प्राश्नीयादेकभोजनम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে প্রতি সপ্তম দিনে একবারই আহার করে, প্রতিদিন পবিত্র অগ্নিতে আহুতি দেয়, বাক্‌সংযম করে ও ব্রহ্মচর্য পালন করে; এবং পুষ্পমালা, চন্দন, মধু ও মাংস চিরতরে ত্যাগ করে—সে মরুদ্গণের সহিত ইন্দ্রলোকে গমন করে।

Verse 33

सदा द्वादशमासान्‌ वै जुह्मानो जातवेदसम्‌ | सरस्वती गोपयानो ब्रह्मचर्य समाचरन्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পূর্ণ বারো মাস ধরে অবিরত জাতবেদস অগ্নিতে আহুতি দেয়, সরস্বতীস্বরূপ বাক্‌কে রক্ষা করে সংযত রাখে এবং ব্রহ্মচর্য পালন করে; আর পুষ্পমালা, চন্দন, মধু ও মাংস চিরতরে ত্যাগ করে—সে মরুতদের লোক ও ইন্দ্রলোক প্রাপ্ত হয়।

Verse 34

सुमनोवर्णकं चैव मधुमांसं च वर्जयन्‌ । पुरुषो मरुतां लोकमिन्द्रलोक॑ च गच्छति

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পুষ্পমালা ও চন্দন, এবং মধু ও মাংসও ত্যাগ করে—সে মরুতদের লোক ও ইন্দ্রলোক প্রাপ্ত হয়।

Verse 35

तत्र तत्र हि सिद्धार्थों देवकन्याभिरच्र्यते । फलं॑ बहुसुवर्णस्य यज्ञस्य लभते नर:

ভীষ্ম বললেন—“সেই সব লোকেই সিদ্ধার্থ পুরুষকে দেবকন্যারা পূজা-সম্মানে অভ্যর্থনা করে। সে বহুসুবর্ণ-সম্পন্ন যজ্ঞের সমান ফল লাভ করে।”

Verse 36

यस्तु संवत्सरं क्षान्तो भुड्क्तेडहन्यष्टमे नर:

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পূর্ণ এক বছর সকলের প্রতি ক্ষমাশীল ও ধৈর্যবান থাকে, প্রতি অষ্টম দিনে একবার মাত্র আহার করে, দেবকার্যে নিবিষ্ট থাকে এবং প্রতিদিন অগ্নিহোত্র সম্পাদন করে—সে পৌণ্ডরীক যজ্ঞের সর্বোত্তম ফল লাভ করে।

Verse 37

देवकार्यपरो निन्‍्यं॑ जुह्मानो जातवेदसम्‌ | पौण्डरीकस्य यज्ञस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি সদা দেবকার্যে নিবিষ্ট থাকে এবং প্রতিদিন জাতবেদস অগ্নিতে আহুতি প্রদান করে, সে পৌণ্ডরীক যজ্ঞের অনুত্তম ফল লাভ করে।

Verse 38

पद्मवर्णनिभं चैव विमानमधिरोहति । कृष्णा: कनकगोर्यश्व नार्य: श्यामास्तथापरा:

ভীষ্ম বললেন—তারপর সে পদ্মবর্ণের ন্যায় দীপ্তিমান বিমানে আরোহণ করে। তার চারদিকে নারীরা থাকে—কেউ কৃষ্ণবর্ণা, কেউ স্বর্ণাভ-গৌরী, আর কেউ শ্যামল—এক অপূর্ব পরিকর রচনা করে।

Verse 39

यस्तु संवत्सरं भुड्क्ते नवमे नवमे5हनि,जो एक वर्षतक नौ-नौ दिनपर एक समय भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, उसे एक हजार अश्वमेध यज्ञका परम उत्तम फल प्राप्त होता है

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পূর্ণ এক বছর প্রতি নবম দিনে একবার আহার করে এবং বারো মাস জুড়ে প্রতিদিন অগ্নিতে আহুতি প্রদান করে, সে সহস্র অশ্বমেধ যজ্ঞের সমান পরম উৎকৃষ্ট ফল লাভ করে।

Verse 40

सदा द्वादशमासान्‌ वै जुह्मानो जातवेदसम्‌ | अश्वमेधसहस्रस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস জুড়ে নিরন্তর জাতবেদস অগ্নিতে আহুতি প্রদান করে, সে সহস্র অশ্বমেধ যজ্ঞের সমান অনুত্তম ফল লাভ করে।

Verse 41

पुण्डरीकप्रकाशं च विमानं लभते नर: । दीप्तसूर्याग्नितेजोभिर्दिव्यमालाभिरेव च

মানুষ শ্বেত পদ্মের ন্যায় দীপ্তিমান এক দিব্য বিমান লাভ করে—সূর্য ও অগ্নির তেজে জ্বলজ্বল করে এবং দেবমালায় ভূষিত থাকে।

Verse 42

नीयते रुद्रकन्याभि: सो<न्तरिक्षं सनातनम्‌ | अष्टादश सहस््राणि वर्षाणां कल्पमेव च

রুদ্রের কন্যারা তাকে চিরন্তন অন্তরীক্ষলোকে নিয়ে যায়; সেখানে সে আঠারো হাজার বছর—অর্থাৎ এক কল্পসম দীর্ঘ কাল—অবস্থান করে।

Verse 43

कोटीशतसहस्रं च तेषु लोकेषु मोदते । तथा वह पुण्डरीकके समान श्वेत वर्णोका विमान पाता है। दीप्तिमान्‌ सूर्य और अग्निके समान तेजस्विनी और दिव्यमालाधारिणी रुद्रकन्याएँ उसे सनातन अन्तरिक्ष-लोकमें ले जाती हैं और वहाँ वह एक कल्प लाख करोड़ एवं अठारह हजार वर्षोतक सुख भोगता है ।।

সে সেই লোকসমূহে কোটি-শত-সহস্রের মধ্যে আনন্দ করে। শ্বেত পদ্মসম দ্যুতিমান বিমান লাভ করে, সূর্য ও অগ্নির ন্যায় তেজস্বিনী, দেৱমালাধারিণী রুদ্রকন্যারা তাকে চিরন্তন অন্তরীক্ষলোকে নিয়ে যায়। সেখানে সে কল্পসম দীর্ঘ কাল—লক্ষ-কোটি এবং আঠারো হাজার বছর পর্যন্ত—সুখ ভোগ করে। (পরবর্তী অংশ:) কিন্তু যে এক বছর ধরে, প্রতি দশদিন অতিক্রান্ত হলে হলে, ভোগ করে…

Verse 44

सदा द्वादशमासान्‌ वै जुह्मानो जातवेदसम्‌ | ब्रह्मकन्यानिवासे च सर्वभूतमनोहरे

যে বারো মাস অবিরত জাতবেদস্‌ (অগ্নি)-এ আহুতি প্রদান করে, সে ব্রহ্মকন্যাদের নিবাসে—যা সকল প্রাণীর মন হরণকারী—অবস্থান লাভ করে।

Verse 45

अश्वमेधसहस्रस्य फल प्राप्रोत्यनुत्तमम्‌ रूपवत्यश्नल तं कन्या रमयन्ति सनातनम्‌

সে সহস্র অশ্বমেধ যজ্ঞের তুল্য অনুত্তম ফল লাভ করে; আর রূপসী কন্যারা সেই চিরন্তনকে আনন্দিত করে।

Verse 46

जो एक वर्षतक दस-दस दिन बीतनेपर एक बार भोजन करता है और बारहों महीने प्रतिदिन अग्निमें आहुति देता है, वह सम्पूर्ण भूतोंके लिये मनोहर ब्रह्मकन्याओंके निवास- स्थानमें जाकर एक हजार अभश्व-मेध यज्ञोंका परम उत्तम फल पाता है और उस सनातन पुरुषका वहाँकी रूपवती कन्याएँ मनोरंजन करती हैं ।।

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি এক বছর ধরে প্রতি দশ দিন অন্তর একবার আহার করে এবং বারো মাস প্রতিদিন অগ্নিতে আহুতি দেয়, সে সকল জীবের মনোহর ব্রহ্মকন্যাদের রম্য নিবাসে গিয়ে সহস্র অশ্বমেধ যজ্ঞের সমতুল্য পরম শ্রেষ্ঠ ফল লাভ করে। সেখানে সেই সনাতন পুরুষকে রূপসী কন্যারা ক্রীড়া-বিনোদে আপ্যায়িত করে। সেই ধাম নীল ও রক্ত পদ্মসম বর্ণে ঝলমল, বিমানমণ্ডলের ঘূর্ণি-চক্র ও গভীর আবর্তে ঘন হয়ে আছে।

Verse 47

सागरोर्मिप्रतीकाशं लभेद्‌ यानमनुत्तमम्‌ | विचित्रमणिमालाभिननदितं शंखनि:स्वनै:

ভীষ্ম বললেন—সে সাগরের তরঙ্গসম দীপ্তিমান এক অনুত্তম যান লাভ করে; বিচিত্র মণিমালার ঝংকারে এবং শঙ্খধ্বনির প্রতিধ্বনিতে তা নিনাদিত হয়।

Verse 48

वह नीले और लाल कमलके समान अनेक रंगोंसे सुशोभित, मण्डलाकार घूमनेवाला, भँवरके समान गहन चक्कर लगानेवाला, सागरकी लहरोंके समान ऊपर-नीचे होनेवाला, विचित्र मणिमालाओंसे अलंकृत और शंखध्वनिसे परिपूर्ण सर्वोत्तम विमान प्राप्त करता है ।।

ভীষ্ম বললেন—সে নীল ও রক্ত পদ্মসম নানা বর্ণে শোভিত, মণ্ডলাকারে ঘূর্ণায়মান, ভাঁটার মতো গভীর আবর্তে ঘেরা, সাগরতরঙ্গের মতো ওঠানামা করা, বিচিত্র মণিমালায় অলংকৃত এবং শঙ্খধ্বনিতে পরিপূর্ণ এক শ্রেষ্ঠ বিমান লাভ করে। স্ফটিক ও বজ্রসার স্তম্ভে ভর করা, সুগঠিত বেদিযুক্ত সেই মহান যান হংস ও সারসের কলরবে নিনাদিত; তাতেই সে আরূঢ় হয়।

Verse 49

उसमें स्फटिक और वज्रसारमणिके खम्भे लगे होते हैं। उसपर सुन्दर ढंगसे बनी हुई वेदी शोभा पाती है तथा वहाँ हंस और सारस पक्षी कलरव करते रहते हैं। ऐसे विशाल विमानपर चढ़ता और स्वच्छन्द घूमता है ।।

ভীষ্ম বললেন—সেই বিমানে স্ফটিক ও বজ্রসার মণির স্তম্ভ থাকে; তার উপর সুগঠিত বেদি শোভা পায় এবং সেখানে হংস ও সারস পাখি অবিরত কলরব করে। এমন বিশাল বিমানে আরূঢ় হয়ে সে স্বচ্ছন্দে বিচরণ করে। আর যে ব্যক্তি একাদশ দিনে উপস্থিত হলে হবি গ্রহণ করে এবং বারো মাস সর্বদা জাতবেদস অগ্নিতে আহুতি দেয়—

Verse 50

परस्त्रियं नाभिलषेद्‌ वाचाथ मनसापि वा । अनृतं च न भाषेत मातापित्रो: कृतेपि वा

ভীষ্ম বললেন—পরস্ত্রীকে কামনা করবে না—না বাক্যে, না মনেও। আর মিথ্যা বলবে না, মাতাপিতার জন্যও নয়।

Verse 51

अभिगच्छेन्महादेवं विमानस्थं महाबलम्‌ । अश्वमेधसहस्रस्य फल प्राप्नोत्यनुत्तमम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে মহাবলশালী, বিমানে অধিষ্ঠিত মহাদেবের নিকট গিয়ে দর্শন লাভ করে, সে সহস্র অশ্বমেধ যজ্ঞের সমতুল্য অনুত্তম পুণ্যফল অর্জন করে।

Verse 52

जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ प्रति ग्यारहवें दिन एक बार हविष्यान्न ग्रहण करता है

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে প্রতিদিন অগ্নিহোত্র পালন করে এবং প্রতি একাদশ দিনে একবার কেবল হবিশ্যান্ন গ্রহণ করে; যে মন ও বাক্যেও কখনও পরস্ত্রীর কামনা করে না; এবং যে মাতাপিতার জন্যও কখনও মিথ্যা বলে না—সে বিমানে অধিষ্ঠিত পরম শক্তিমান মহাদেবের সান্নিধ্যে পৌঁছে সহস্র অশ্বমেধ যজ্ঞের সমতুল্য সর্বোত্তম ফল লাভ করে। সে নিকটে আগত স্বয়ম্ভূ বিমানের দর্শন পায়, আর কাঞ্চনবর্ণা, রূপসী কুমারীরা তাকে অগ্রসর করে নিয়ে যায়।

Verse 53

विधिं यज्ञफलैस्तुल्यं तन्निबोध युधिष्ठिर । भीष्मजीने कहा--युधिष्ठिर! अंगिरा मुनिकी बतलायी हुई जो उपवासकी विधि है

ভীষ্ম বললেন—হে যুধিষ্ঠির, জেনে রাখো: ঋষি অঙ্গিরা যে উপবাস-বিধি বলেছেন, তা যজ্ঞফলের সমতুল্য ফল প্রদান করে। আমি তা আবার বর্ণনা করছি—শোনো। তার পুণ্য অপরিমেয় বছর ধরে যুগান্তের অগ্নির ন্যায় দীপ্ত হয়ে প্রকাশিত থাকে।

Verse 54

कोटीशतसहस््नं च दशकोटिशतानि च । रुद्रं नित्यं प्रणमते देवदानवसम्मतम्‌

ভীষ্ম বললেন—সে দেব ও দানব উভয়েরই সম্মত ও পূজিত রুদ্রকে নিত্য প্রণাম করে—কোটি-শত-সহস্র সংখ্যায়, এবং আবার দশ-কোটি-শত সংখ্যায়।

Verse 55

स तस्मै दर्शन प्राप्तो दिवसे दिवसे भवेत्‌ | वहाँ वह प्रलयकालीन अग्निके समान तेजस्वी शरीर धारण करके असंख्य वर्षोतक एक लाख एक हजार करोड़ वर्षोतक निवास करता हुआ प्रतिदिन देवदानव-सम्मानित भगवान्‌ रुद्रको प्रणाम करता है। वे भगवान्‌ उसे नित्य-प्रति दर्शन देते रहते हैं ।।

ভীষ্ম বললেন—তার জন্য সেই ভগবানের দর্শন প্রতিদিনই নিশ্চিত হয়। সেখানে সে যুগান্তের অগ্নির ন্যায় দীপ্ত দেহ ধারণ করে অপরিমেয় বছর ধরে বাস করে এবং প্রতিদিন দেব-দানব-সম্মানিত ভগবান রুদ্রকে প্রণাম করে। সেই ভগবানও তাকে নিত্যদিন দর্শন দেন। আর দ্বাদশ দিন উপস্থিত হলে সে হবি (যজ্ঞার্পিত অন্ন) গ্রহণ করে।

Verse 56

आदित्यद्वादशं तस्य विमान संविधीयते

ভীষ্ম বললেন—তার জন্য বারো সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান এক দিব্য বিমান প্রস্তুত করা হয়। অমূল্য মণি, মুক্তা ও প্রবাল তার শোভা বৃদ্ধি করে। হংসশ্রেণীতে পরিবেষ্টিত এবং নাগবীথিতে পরিব্যাপ্ত সেই বিমান কলরবময়; ময়ূর ও চক্রবাক-পক্ষীতে সুশোভিত হয়ে ব্রহ্মলোকে প্রতিষ্ঠিত। তার অন্তরে উচ্চ উচ্চ অট্টালিকা নির্মিত। হে রাজন, সেই চিরস্থায়ী নিবাস বহু নর-নারীতে পরিপূর্ণ। এ কথা ধর্মজ্ঞ মহাভাগ ঋষি অঙ্গিরা ঘোষণা করেছিলেন।

Verse 57

मणिमुक्ताप्रवालैश्न महाहैरुपशोभितम्‌ । हंसमालापरिक्षिप्तं नागवीथीसमाकुलम्‌

মণি, মুক্তা ও প্রবালে এবং মহাহারে তা অতিশয় সুশোভিত ছিল। হংস-মালায় পরিবেষ্টিত এবং নাগবীথিতে পরিপূর্ণ ছিল।

Verse 58

मयूरैश्वक्रवाकैश्व कूजद्भिरुपशोभितम्‌ । अट्टैर्महद्धि: संयुक्त ब्रह्मलोके प्रतिष्ठितम्‌

মধুর কলরবকারী ময়ূর ও চক্রবাক-পক্ষীতে তা সুশোভিত ছিল। বৃহৎ অট্টালিকায় সমন্বিত হয়ে মহাসমৃদ্ধিসহ ব্রহ্মলোকে প্রতিষ্ঠিত ছিল।

Verse 59

नित्यमावसथं राजन्‌ नरनारीसमावृतम्‌ | ऋषिरेवं महाभागस्त्वड्िरा प्राह धर्मवित्‌

হে রাজন, সেই নিত্য নিবাস নর-নারীতে পরিবেষ্টিত ও পরিপূর্ণ ছিল। ধর্মজ্ঞ মহাভাগ ঋষি অঙ্গিরা এভাবেই বলেছিলেন।

Verse 60

त्रयोदशे तु दिवसे प्राप्ते यः प्राशते हवि: । सदा द्वादशमासान्‌ वै देवसत्रफलं लभेत्‌

তেরোতম দিন উপস্থিত হলে যে ব্যক্তি হবি (যজ্ঞের আহুতি) প্রাশন করে, সে বারো মাস জুড়ে সর্বদা দেবসত্রের সমান ফল লাভ করে।

Verse 61

जो बारह महीनोंतक सदा तेरहवें दिन हविष्यात्र भोजन करता है, उसे देवसत्रका फल प्राप्त होता है ।।

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে প্রতি ত্রয়োদশী তিথিতে নিয়মিত হবিশ্য-ভোজন করে, সে দেবসত্রের ফল লাভ করে। সে ‘রক্তপদ্মোদয়’ নামে এক দিব্য বিমান প্রাপ্ত হয়—সুবর্ণে অলংকৃত ও রত্নসম্ভারে ভূষিত। তাতে দেবকন্যারা পরিপূর্ণ থাকে, দিব্য অলংকারে তা দীপ্তিমান; সেখান থেকে সদা পবিত্র সুগন্ধ নির্গত হয়, এবং সেই বিমান বায়ব্য অস্ত্রের জ্যোতিতে শোভিত হয়।

Verse 62

देवकन्याभिराकीर्ण दिव्याभरणभूषितम्‌ । पुण्यगन्धोदयं दिव्यं वायव्यैरुपशोभितम्‌

সে দিব্য বিমান দেবকন্যায় পরিপূর্ণ এবং স্বর্গীয় অলংকারে ভূষিত। সেখান থেকে পবিত্র, মঙ্গলময় সুগন্ধ উদ্ভূত হয়; আর বায়ব্য শক্তি/অস্ত্রের উপস্থিতিতে তা আরও শোভিত হয়।

Verse 63

तत्र शंखपताके द्वे युगान्तं कल्पमेव च । अयुतायुतं तथा पद्म समुद्र च तथा वसेत्‌

সেখানে ব্রতধারী ব্যক্তি অপরিমেয় দীর্ঘকাল বাস করে—দুই ‘শঙ্খ’ ও দুই ‘পতাকা’ পরিমাণ কাল, তারপর ‘যুগান্ত’, ‘কল্প’, ‘অযুতাযুত’, ‘পদ্ম’ এবং ‘সমুদ্র’—অর্থাৎ ব্রহ্মলোকে অতিদীর্ঘ অবস্থান, যা সংযমী ধর্মাচরণের ফল।

Verse 64

गीतगन्धर्वघोषैश्न भेरीपणवनि:स्वनै: । सदा प्रह्लादितस्ताभिवदेवकन्याभिरिज्यते,वहाँ देवकन्याएँ गीत और वाद्योंके घोष तथा भेरी और पणवकी मधुर ध्वनिसे उस पुरुषको आनन्द प्रदान करती हुई सदा उसका पूजन करती हैं

সেখানে গীতের ধ্বনি ও গন্ধর্বসদৃশ মধুর সুর, আর ভেরী ও পণবের মনোরম নিনাদে দেবকন্যারা তাকে সদা আনন্দিত করে এবং নিরন্তর তার পূজা করে।

Verse 65

चतुर्दशे तु दिवसे यः पूर्णे प्राशते हवि: । सदा द्वादशमासांस्तु महामेधफलं लभेत्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পূর্ণ চতুর্দশী তিথিতে হবি (হবিশ্য) গ্রহণ করে, সে বারো মাস ধরে অবিরত ‘মহামেধ’ নামে মহাযজ্ঞের সমতুল্য ফল লাভ করে।

Verse 66

जो बारह महीनेतक प्रति चौदहवें दिन हविष्यान्न भोजन करता है, वह महामेध यज्ञका फल पाता है ।।

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে প্রতি চতুর্দশীতে হবিশ্যান্ন (যজ্ঞের সরল আহার) গ্রহণ করে, সে মহামেধ যজ্ঞের সমান পুণ্যফল লাভ করে। যাদের যৌবন ও রূপ বর্ণনাতীত, সেই সুশোভিতা দেবকন্যারা উত্তপ্ত-পরিশুদ্ধ স্বর্ণের অঙ্গদ ও নানা অলংকার ধারণ করে, বিমানযোগে তার নিকট এসে সেবায় উপস্থিত হয়।

Verse 67

कलहंसविनिर्धोषैर्नूपुराणां च नि:स्वनै: । काज्चीनां च समुत्कर्षस्तत्र तत्र निबोध्यते,वह सो जानेपर कलहंसोंके कलरवों, नूपुरोंकी मधुर झनकारों तथा काउ्चीकी मनोहर ध्वनियोंद्वारा जगाया जाता है

ভীষ্ম বললেন—সেখানে বারংবার কলহংসের কলরব, নূপুরের মধুর ঝংকার এবং কাঁচী (কটিবন্ধ)-র মনোহর ধ্বনির উচ্ছ্বাস অনুভূত হয়।

Verse 68

देवकन्यानिवासे च तस्मिन्‌ वसति मानव: । जाह्ववीवालुकाकीर्ण पूर्ण संवत्सरं नर:,वह मानव देवकन्याओंके उस निवासस्थानमें उतने वर्षोतक निवास करता है, जितने कि गंगाजीमें बालूके कण हैं

ভীষ্ম বললেন—দেবকন্যাদের সেই নিবাসে মানুষটি তত বছর বাস করে, যত গঙ্গা (জাহ্নবী) নদীর বালুকণিকা।

Verse 69

यत्तु पक्षे गते भुडक्ते एकभक्तं जितेन्द्रिय: । सदा द्वादशमासांस्तु जुह्दानो जातवेदसम्‌

ভীষ্ম বললেন—কিন্তু যে জিতেন্দ্রিয় ব্যক্তি পক্ষ (পখওয়াড়া) অতিবাহিত হলে নির্দিষ্ট দিনে একবারই আহার করে এবং বারো মাস সর্বদা জাতবেদ (অগ্নি)-তে আহুতি প্রদান করে, সে মহৎ ফল লাভ করে।

Verse 70

राजसूयसहस्रस्य फल प्राप्नोत्यनुत्तमम्‌ । यानमारोहते दिव्यं हंसबर्हिणसेवितम्‌

ভীষ্ম বললেন—সে সহস্র রাজসূয় যজ্ঞের অনুত্তম ফল লাভ করে এবং হংস ও ময়ূর দ্বারা সেবিত দিব্য বিমানে আরোহণ করে।

Verse 71

मणिमण्डलवकैश्षित्रं जातरूपसमावृतम्‌ | दिव्याभरणशोभाभिरर्वरस्त्रीभिरलंकृतम्‌

ভীষ্ম বললেন—সে বিমানটি ছিল অপূর্ব; মণির বৃত্তাকার নকশায় বিচিত্র এবং স্বর্ণে আচ্ছাদিত। দিব্য বস্ত্র ও অলংকারে দীপ্ত অপ্সরাগণ তাকে শোভিত করছিলেন।

Verse 72

एकस्तम्भं चतुर्द्धारं सप्तभौमं सुमंगलम्‌ । वैजयन्तीसहसैश्न शोभितं गीतनि:स्वनै:

ভীষ্ম বললেন—আমি দেখলাম এক স্তম্ভে প্রতিষ্ঠিত, চার দ্বারবিশিষ্ট, সাত তলা উঁচু, অতি মঙ্গলময় এক প্রাসাদ; সহস্র বৈজয়ন্তী মালায় শোভিত এবং গানের ধ্বনিতে মুখর।

Verse 73

उस विमानमें एक ही खम्भा होता है, चार दरवाजे लगे होते हैं। वह सात तल्लोंसे युक्त एवं परममंगलमय विमान सहस्रों वैजयन्ती पताकाओंसे सुशोभित तथा गीतोंकी मधुर- ध्वनिसे व्याप्त होता है ।।

ভীষ্ম বললেন—সেই বিমানে একটিই স্তম্ভ, চারটি দ্বার; সাত তলা-সমৃদ্ধ ও পরম মঙ্গলময়। সহস্র বৈজয়ন্তী পতাকায় শোভিত এবং গানের মধুর ধ্বনিতে পরিপূর্ণ। দিব্য গুণে সমন্বিত সেই দিব্য বিমানে সে আরোহণ করে; বিদ্যুতের ন্যায় দীপ্ত, মণি-মুক্তা-প্রবালে ভূষিত।

Verse 74

वसेद्‌ युगसहस्नं च खड्गकुञ्जरवाहन: । मणि, मोती और मूँगोंसे विभूषित वह दिव्य विमान विद्युत्‌की-सी प्रभासे प्रकाशित तथा दिव्य गुणोंसे सम्पन्न होता है। वह व्रतधारी पुरुष उसी विमानपर आरूढ़ होता है। उसमें गेंडे और हाथी जुते होते हैं तथा वहाँ एक सहस्र युगोंतक वह निवास करता है ।।

ভীষ্ম বললেন—ব্রতধারী পুরুষ গণ্ডার ও হাতি-যোজিত সেই বিমানে আরোহণ করে সহস্র যুগ পর্যন্ত সেখানে বাস করে। আর যে ষোড়শ দিনে এসে একবারই আহার করে—

Verse 75

सदा द्वादशमासान्‌ वै सोमयज्ञफलं लभेत्‌ । जो बारह महीनोंतक प्रति सोलहवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे सोमयागका फल मिलता है ।। सोमकन्यानिवासेषु सो5ध्यावसति नित्यश:

ভীষ্ম বললেন—সে নিশ্চয়ই বারো মাস সোমযজ্ঞের ফল লাভ করে। এবং সোম-কন্যাদের নিবাসে সে সদা নিত্য বাস করে।

Verse 76

सौम्यगन्धानुलिप्तश्न॒ कामकारगतिर्भवेत्‌ । वह सोम-कन्याओंके महलोंमें नित्य निवास करता है, उसके अंगोंमें सौम्य गन्धयुक्त अनुलेप लगाया जाता है। वह अपनी इच्छाके अनुसार जहाँ चाहता है, घूमता है ।।

সে সোম-কন্যাদের প্রাসাদে নিত্য বাস করে। তার অঙ্গে মৃদু ও মনোরম সুগন্ধি লেপন করা হয়। সে নিজের ইচ্ছামতো যেখানে চায় সেখানে বিচরণ করে। সুন্দরী ও মধুরস্বভাবা নারীরাও তাকে সেবায় নিয়ত পরিবৃত করে॥

Verse 77

अर्च्यते वै विमानस्थ: कामभोगैश्न सेव्यते । वह विमानपर विराजमान होता है और देखनेमें परम सुन्दरी तथा मधुरभाषिणी दिव्य नारियाँ उसकी पूजा करती तथा उसे काम-भोगका सेवन कराती हैं ।।

সে দিব্য বিমানে অধিষ্ঠিত হয়ে বিরাজ করে এবং কামভোগে সেবিত হয়। পরম সুন্দরী ও মধুরভাষিণী দিব্য নারীরা তাকে পূজা করে এবং তার কাম্য ভোগ উপহার দেয়। তার ফল শত পদ্মের ন্যায় দীপ্তিমান, এক মহাকল্প ও তার অতিরিক্ত আরও দশ পর্যন্ত স্থায়ী হয়॥

Verse 78

दिवसे सप्तदशमे य: प्राप्ते प्राशते हवि:

যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে প্রতিদিন অগ্নিহোত্র পালন করে, তারপর ষোলো দিন উপবাস করে এবং সপ্তদশ দিনে কেবল হবিশ্য-ভোজন গ্রহণ করে, সে বরুণ, ইন্দ্র, রুদ্র, মরুত, উশনস্ (শুক্রাচার্য) ও ব্রহ্মার লোক লাভ করে। সেই লোকসমূহে দেবকন্যারা তাকে আসন দিয়ে সম্মান করে ও পূজা করে॥

Verse 79

सदा द्वादशमासान्‌ वै जुह्मानो जातवेदसम्‌ | स्थानं वारुणमैन्द्रं च रौद्रं वाप्पधिगच्छति

যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে নিরন্তর জাতবেদস্ (অগ্নি)-এ আহুতি প্রদান করে, সে বরুণ, ইন্দ্র এবং রুদ্রের লোক লাভ করে॥

Verse 80

मारुतौशनसे चैव ब्रह्मलोक॑ स गच्छति । तत्र दैवतकन्याभिरासनेनोपचर्यते

সে মরুতদের ও উশনস্ (শুক্র)-এর লোক এবং ব্রহ্মলোকেও গমন করে। সেখানে দেবকন্যারা তাকে আসন দিয়ে শ্রদ্ধাভরে পরিচর্যা করে॥

Verse 81

भूर्भुवं चापि देवर्षि विश्वरूपमवेक्षते | तत्र देवाधिदेवस्थ कुमार्यो रमयन्ति तम्‌

ভীষ্ম বললেন—হে দেবর্ষি! তিনি ভূর্লোক ও ভুবর্লোককে পরিব্যাপ্ত করা বিশ্বরূপ দর্শন করেন। সেখানে দেবাধিদেবের সান্নিধ্যে দিব্য কুমারীরা তাঁকে আনন্দিত করে ও রমণ করায়।

Verse 82

चन्द्रादित्यावुभी यावद्‌ गगने चरत: प्रभो

হে প্রভু! যতক্ষণ চন্দ্র ও সূর্য—উভয়েই—আকাশে বিচরণ করবে…

Verse 83

अष्टादशे यो दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम्‌

যে অষ্টাদশ দিনে একবারই আহার করে,

Verse 84

रथै: सनन्दिघोषैश्न पृष्तत: सो5नुगम्यते

আনন্দধ্বনিতে মুখর রথসমেতও তাকে পেছন থেকে অনুসরণ করা উচিত নয়।

Verse 85

देवकन्याधिरूैस्तु भ्राजमानै: स्वलंकृतै: । उसके पीछे आनन्दपूर्वक जयघोष करते हुए बहुत-से तेजस्वी एवं सजे-सजाये रथ चलते हैं। उन रथोंपर देवकन्याएँ बैठी होती हैं ।।

তার পেছনে আনন্দভরে জয়ধ্বনি করতে করতে বহু উজ্জ্বল ও সুসজ্জিত রথ অগ্রসর হয়। সেই রথগুলিতে দেবকন্যারা আরূঢ় হয়ে বসে থাকে।

Verse 86

प्राजापत्ये वसेत्‌ पद्म वर्षाणामग्निसंनिभे | वह मनुष्य तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान्‌ विमान पाता है और अग्नितुल्य तेजस्वी प्रजापतिलोकमें नृत्य तथा गीतोंसे गूँजते हुए देवांगनाओंके महलमें एक पद्म वर्षोतक निवास करता है

ভীষ্ম বললেন—অগ্নিসদৃশ দীপ্তিমান হয়ে সে প্রজাপতি-লোকে ‘পদ্ম’ পরিমাণ বছর বাস করে। সেখানে দেবাঙ্গনাদের গীত-নৃত্যে মুখর প্রাসাদে সে কন্যাদের সঙ্গে সহস্র কল্প পর্যন্ত আনন্দ উপভোগ করে।

Verse 87

एकोनविंशतिदिने यो भुड्क्ते एकभोजनम्‌

যে ব্যক্তি উনিশতম দিনে কেবল একবার আহার করে…

Verse 88

उत्तमं लभते स्थानमप्सरोगणसेवितम्‌

সে অপ্সরাগণের দ্বারা সেবিত এক উৎকৃষ্ট লোক লাভ করে।

Verse 89

तत्रामरवरस्त्रीभिमोंदते विगतज्वर:

সেখানে সকল জ্বর-দুঃখ থেকে মুক্ত হয়ে সে শ্রেষ্ঠ দেবনারীদের সঙ্গে আনন্দ করে।

Verse 90

पूर्णेडथ विंशे दिवसे यो भुड्क्ते होकभोजनम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পূর্ণ বিশ দিন অতিবাহিত হলে কেবল একবার আহার করে, সত্যভাষী থাকে, ব্রত পালন করে, মাংস ত্যাগ করে, ব্রহ্মচর্য রক্ষা করে এবং সর্বপ্রাণীর হিতে নিবিষ্ট থাকে—সে আদিত্যদের, অর্থাৎ সূর্যদেবের, বিস্তৃত ও মনোরম লোকসমূহ লাভ করে।

Verse 91

सदा द्वादशमासांस्तु सत्यवादी धृतव्रत: । अमांसाशी ब्रह्मचारी सर्वभूतहिते रत:

ভীষ্ম বললেন—তিনি পূর্ণ বারো মাস সর্বদা সত্যভাষী ও দৃঢ়ব্রত থাকেন; মাংসত্যাগী, ব্রহ্মচারী এবং সর্বভূতের কল্যাণে নিবিষ্ট থাকেন।

Verse 92

गन्धर्वैरप्सरोभिश्व दिव्यमाल्यानुलेपनै:

ভীষ্ম বললেন—(তিনি/তাঁরা) গন্ধর্ব ও অপ্সরাদের দ্বারা পরিবৃত, দিব্য মালা ও সুগন্ধি অনুলেপনে অলংকৃত থাকেন।

Verse 93

एकविंशे तु दिवसे यो भुड्क्ते होकभोजनम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি প্রতিদিন অগ্নিহোত্রের নিয়ম পালন করে একুশতম দিনে মাত্র একবার নিয়ত (সরল) আহার করে, সে দিব্য লোকসমূহ লাভ করে। সেখানে শ্রেষ্ঠ বিমানে আরূঢ়, উৎকৃষ্ট নারীদের দ্বারা পরিবৃত, সে অমরদের প্রভুর ন্যায় ক্রীড়া করে; শোক তাকে স্পর্শ করে না।

Verse 94

सदा द्वादशमासान्‌ वै जुद्धानो जातवेदसम्‌ | लोकमौशनसं दिव्यं शक्रलोकं॑ च गच्छति

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পূর্ণ বারো মাস অবিরত জাতবেদস্‌ (অগ্নি)-তে আহুতি প্রদান করে, সে দিব্য ঔশনস লোক এবং শক্র (ইন্দ্র)-লোকও লাভ করে।

Verse 95

अश्रिनोर्मरुतां चैव सुखेष्वभिरत: सदा । अनभि्शज्ञिश्व दुःखानां विमानवरमास्थित:

ভীষ্ম বললেন—সে সর্বদা সুখেই আসক্ত থাকে এবং যেন অশ্বিনীকুমার ও মরুদ্গণের আশ্রয়ে থাকে। দুঃখের সঙ্গে অপরিচিত হয়ে সে শ্রেষ্ঠ বিমানে আরূঢ় থাকে।

Verse 96

धर्मपत्नीरतो नित्यमग्निष्टोमफलं लभेत्‌ । जो अपनी ही धर्मपत्नीमें अनुराग रखते हुए निरन्तर तीन वर्षोतक प्रतिदिन एक समय भोजन करके रहता है

যে ব্যক্তি সর্বদা নিজের ধর্মপত্নীতে অনুরক্ত থাকে, সে অগ্নিষ্টোম যজ্ঞের ফল লাভ করে। আর যে বাষট্টিতম দিনে (নির্দিষ্ট সময় পূর্ণ হলে) সংযমসহ একবারই আহার করে, সেও যজ্ঞফল প্রাপ্ত হয়।

Verse 97

सदा द्वादशमासान्‌ वै जुह्मानो जातवेदसम्‌ | अहिंसानिरतो धीमान्‌ सत्यवागनसूयक:

যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে অবিরত জাতবেদস্‌ (অগ্নি)-এ আহুতি দেয়, অহিংসায় নিবিষ্ট, বুদ্ধিমান, সত্যভাষী এবং দোষদর্শনে অনাসক্ত—সে ধর্মসম্মত সংযমী জীবনের আদর্শ।

Verse 98

लोकान्‌ वसूनामाप्रोति दिवाकरसमप्रभ: । कामचारी सुधाहारो विमानवरमास्थित:

সে সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে বসুদের লোকসমূহ লাভ করে। ইচ্ছামতো বিচরণ করে, অমৃতসম আহারে জীবিত থাকে এবং শ্রেষ্ঠ বিমানে অধিষ্ঠিত হয়।

Verse 99

रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरण भूषित: । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ बाईसवाँ दिन प्राप्त होनेपर एक बार भोजन करता है तथा अहिंसामें तत्पर

সে দিব্য অলংকারে ভূষিত হয়ে দেবকন্যাদের সঙ্গে ক্রীড়া করে। আর যে তেইশতম দিনে এসে একবারই আহার করে, সেও এই নিয়মের ফল লাভ করে।

Verse 100

सदा द्वादशमासांस्तु मिताहारो जितेन्द्रिय: । वायोरुशनसश्लैव रुद्रलोक॑ च गच्छति

যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে সর্বদা মিতাহারী ও ইন্দ্রিয়জয়ী থাকে, সে বায়ুর লোক, উশনস্‌ (শুক্র)-এর লোক এবং রুদ্রলোকও লাভ করে।

Verse 101

जो लगातार बारह महीनोंतक मिताहारी और जितेन्द्रिय होकर तेईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह वायु, शुक्राचार्य तथा रुद्रके लोकमें जाता है ।।

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস অবিরত মিতাহারী ও জিতেন্দ্রিয় হয়ে তেইশতম দিনে মাত্র একবার আহার করে, সে বায়ু, শুক্রাচার্য ও রুদ্রের লোক লাভ করে। সেখানে সে ইচ্ছামতো বিচরণ করে, যা চায় তাই পায়; অপ্সরাগণের দ্বারা পূজিত হয়ে বহু গুণিত পুণ্যকাল পর্যন্ত শ্রেষ্ঠ বিমানে অধিষ্ঠিত থাকে।

Verse 102

चतुर्विंशे तु दिवसे यः प्राप्ते प्राशते हवि:

চব্বিশতম দিনে, সময় উপস্থিত হলে, যে হবি (যজ্ঞের আহুতি) গ্রহণ করে…

Verse 103

सदा द्वादशमासांश्व जुह्नानो जातवेदसम्‌ | आदित्यानामधीवासे मोदमानो वसेच्चिरम्‌

যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে অবিরত জাতবেদ (অগ্নি)-তে আহুতি প্রদান করে এবং আদিত্যদের আবাসে আনন্দসহকারে বাস করে, সে সেখানে দীর্ঘকাল অবস্থান করে।

Verse 104

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपन: । जो लगातार बारह महीनोंतक अग्निहोत्र करता हुआ चौबीसवें दिन एक बार हविष्यान्न भोजन करता है

ভীষ্ম বললেন—সে দিব্য মালা ও দিব্য বস্ত্র ধারণ করে এবং স্বর্গীয় সুগন্ধে অনুলিপ্ত হয়। যে বারো মাস অগ্নিহোত্র পালন করে চব্বিশতম দিনে একবার হবিশ্যান্ন ভোজন করে, সে অতি দীর্ঘকাল আনন্দসহকারে আদিত্যলোকে বাস করে এবং হাঁস-যোজিত মনোরম দিব্য স্বর্ণময় বিমানে আরোহণ করে থাকে।

Verse 105

रमते देवकन्यानां सहस्रैरयुतैस्तथा । वहाँ हंसयुक्त मनोरम एवं दिव्य सुवर्णमय विमानपर वह सहस्रों तथा अयुतों देवकन्याओंके साथ रमण करता है || १०४ $ ।। पज्चविंशे तु दिवसे य: प्राशेदेकभोजनम्‌

সে সেখানে সহস্র ও অযুত দেবকন্যার সঙ্গে ক্রীড়া করে। আর পঁচিশতম দিনে যে একবার আহার করে…

Verse 106

सिंहव्याप्रप्रयुक्तैस्तु मेघनि:स्वननादितैः

ভীষ্ম বললেন— তাদের পশ্চাতে সিংহ ও ব্যাঘ্রে যোজিত, মেঘগর্জনের ন্যায় গম্ভীর ধ্বনিতে নিনাদিত অসংখ্য রথ অগ্রসর হয়। আনন্দভরে বিজয়ধ্বনি করতে করতে সেই রথগুলি চলে। সেগুলি স্বর্ণময়, নির্মল ও মঙ্গলপ্রদ; তাতে দেবকন্যারা আরূঢ় থাকে।

Verse 107

स रथैनन्दिघोषैश्न पृष्ठतो हानुगम्यते । देवकन्यासमारूढै: काउ्चनैर्विमलै: शुभै:

ভীষ্ম বললেন— তার পশ্চাতে আনন্দময় বিজয়ধ্বনিতে নিনাদিত, মেঘগর্জনের ন্যায় গম্ভীর ধ্বনিযুক্ত বহু রথ অনুসরণ করে। সেই রথগুলি স্বর্ণময়, নির্মল ও মঙ্গলপ্রদ; তাতে দেবকন্যারা আরূঢ় থাকে। (ইতি শ্রীমহাভারতে অনুশাসনপর্বণি দানধর্মপর্বণি উপবাসবিধির্নাম সপ্তাধিকশততমোऽধ্যায়ঃ।)

Verse 108

विमानमुत्तमं दिव्यमास्थाय सुमनोहरम्‌ | तत्र कल्पसहसंरं वै वसते स्त्रीशतावृते

ভীষ্ম বললেন— পরম উত্তম, দিব্য ও অতিশয় মনোহর বিমানে আরোহণ করে সে সেখানে শত শত নারীতে পরিবৃত হয়ে, নিশ্চয়ই সহস্র কল্পকাল বাস করে।

Verse 109

षड्विंशे दिवसे यस्तु प्रकुयदिकभोजनम्‌

ভীষ্ম বললেন— যে ব্যক্তি ছাব্বিশতম দিনে একবার আহার করে এবং টানা বারো মাস মন ও ইন্দ্রিয় সংযত রেখে মিতাহারী থাকে; যে আসক্তিহীন, জিতেন্দ্রিয় হয়ে প্রতিদিন অগ্নিতে আহুতি দেয়— সেই মহাভাগ্যবান নর অপ্সরাদের দ্বারা পূজিত হয়ে সপ্ত মরুদ্গণ ও অষ্ট বসুর লোক প্রাপ্ত হয়।

Verse 110

सदा द्वादशमासांस्तु नियतो नियताशन: । जितेन्द्रियो वीतरागो जुह्मानो जातवेदसम्‌

ভীষ্ম বললেন— যে ব্যক্তি বারো মাস সর্বদা নিয়মে থাকে, নিয়ত আহার করে, জিতেন্দ্রিয় ও আসক্তিহীন হয়ে প্রতিদিন জাতবেদা (অগ্নি)-তে আহুতি দেয়— সেই মহাভাগ্যবান নর সর্বদা অপ্সরাদের দ্বারা সমর্চিত হয়ে সপ্ত মরুদ্গণ ও অষ্ট বসুর লোক প্রাপ্ত হয়।

Verse 111

स प्राप्नोति महाभाग: पूज्यमानो5प्सरोगणै: । सप्तानां मरुतां लोकान्‌ वसूनां चापि सो5श्षुते

এমন মহাভাগ্যবান পুরুষ—অপ্সরাগণের দ্বারা পূজিত—সপ্ত মরুতদের লোক এবং বসুদের লোকও লাভ করে। যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে মন ও ইন্দ্রিয় সংযত রেখে মিতাহারী থাকে, ছাব্বিশতম দিনে একবার আহার করে, বৈরাগ্যসম্পন্ন ও জিতেন্দ্রিয় হয়ে প্রতিদিন অগ্নিতে আহুতি প্রদান করে—সে-ই মহাভাগ্যবান ঐ দিব্য লোকসমূহে গমন করে।

Verse 112

विमानै: स्फाटिकैर्दिव्यै: सर्वरत्नैरलंकृतै: गन्धर्वैरप्सरोभिश्व पूज्यमान: प्रमोदते

সে সর্বরত্নে অলংকৃত দিব্য স্ফটিক-বিমানে বিচরণ করে; গন্ধর্ব ও অপ্সরাদের দ্বারা পূজিত হয়ে পরম আনন্দে মগ্ন থাকে।

Verse 113

सप्तविंशेडथ दिवसे य: कुयदिकभोजनम्‌,जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर सत्ताईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह प्रचुर फलका भागी होता और देवलोकमें सम्मान पाता है

যে ব্যক্তি প্রতি সাতাশতম দিনে একবার মাত্র আহার করে এবং বারো মাস ধরে প্রতিদিন অগ্নিহোত্র পালন করে—সে এই নিয়মে চলতে চলতে প্রচুর ফল লাভ করে এবং দেবলোকে সম্মানিত হয়।

Verse 114

सदा द्वादशमासांस्तु जुह्मानो जातवेदसम्‌ | फल प्राप्रोति विपुलं देवलोके च पूज्यते

যে ব্যক্তি পূর্ণ বারো মাস অবিরত জাতবেদস্‌ (অগ্নি)-এ আহুতি প্রদান করে, সে বিপুল ফল লাভ করে এবং দেবলোকে পূজিত হয়।

Verse 115

अमृताशी वसंस्तत्र स वितृष्ण: प्रमोदते । देवर्षिचरितं राजन्‌ राजर्षिभिरनुछितम्‌

সেখানে সে অমৃতসম আহার লাভ করে; তৃষ্ণাহীন হয়ে আনন্দে বিভোর থাকে। হে রাজন! রাজর্ষিদের দ্বারা উপদিষ্ট দেবর্ষিদের চরিত্র সে শ্রবণ ও মনন করে; আর উৎকৃষ্ট বিমানে আরূঢ় হয়ে মনোহর সুন্দরীদের সঙ্গে উল্লাসময় রতিতে মগ্ন থেকে, তিন হাজার যুগ ও কল্প পর্যন্ত সেখানে সুখে বাস করে।

Verse 116

अध्यावसति दिव्यात्मा विमानवरमास्थित: । स्त्रीभिर्मनोभिरामाभी रममाणो मदोत्कट:

ভীষ্ম বললেন—দিব্যাত্মা সেই পুরুষ শ্রেষ্ঠ বিমানে আরূঢ় হয়ে সেখানে বাস করেন; মনোহরী নারীদের সঙ্গে ক্রীড়া করতে করতে উল্লাসমদে উন্মত্ত থাকেন।

Verse 117

योडष्टाविंशे तु दिवसे प्राश्नीयादेकभोजनम्‌,जो बारह महीनोंतक सदा अपने मन और इन्द्रियोंको काबूमें रखकर अट्ठाईसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह देवर्षियोंको प्राप्त होनेवाले महान्‌ फलका उपभोग करता है

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে মন ও ইন্দ্রিয় সংযত রেখে অষ্টাবিংশ দিনে একবার মাত্র আহার করে, সে দেবর্ষিদের প্রাপ্য মহান ফল ভোগ করে।

Verse 118

सदा द्वादशमासांस्तु जितात्मा विजितेन्द्रिय: । फल देवर्षिचरितं विपुलं समुपाश्ुते

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস সর্বদা আত্মসংযমী ও ইন্দ্রিয়জয়ী থাকে, সে দেবর্ষিদের আচরিত ব্রতের বিপুল ফল লাভ করে।

Verse 119

भोगवांस्तेजसा भाति सहस्रांशुरिवामल: । सुकुमार्यश्न नार्यस्तं रममाणा: सुवर्चस:

ভীষ্ম বললেন—ভোগসমৃদ্ধ হয়ে সে নিজের তেজে সহস্ররশ্মি নির্মল সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান হয়। কোমল ও কান্তিময়ী নারীরা তাকে আনন্দ দেয়; সূর্যসম, সর্বকামদায়ী দিব্য বিমানে তার সঙ্গে বসে, সেই পুণ্যকর্মীকে অগণিত কল্পকাল ধরে ক্রীড়ায় মগ্ন রাখে।

Verse 120

पीनस्तनोरुजघना दिव्याभरणभूषिता: । रमयन्ति मनःकान्ते विमाने सूर्यसंनिभे

ভীষ্ম বললেন—দিব্য অলংকারে ভূষিতা, পূর্ণস্তনা ও প্রশস্ত নিতম্বা সেই নারীরা সূর্যসম বিমানে বিচরণ করতে করতে প্রিয়তমের মনকে আনন্দিত করে।

Verse 121

एकोनत्रिंशे दिवसे यः प्राशेदेकभोजनम्‌,जो बारह महीनोंतक सदा सत्यव्रतके पालनमें तत्पर हो उन्‍्तीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसे देवर्षियों तथा राजर्षियोंद्वारा पूजित दिव्य मंगलमय लोक प्राप्त होते हैं

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে অবিচলভাবে সত্যব্রতে প্রতিষ্ঠিত থেকে ঊনত্রিশতম দিনে মাত্র একবার আহার করে, সে দেবর্ষি ও রাজর্ষিদের দ্বারা পূজিত দিব্য ও মঙ্গলময় লোকসমূহ লাভ করে।

Verse 122

सदा द्वादशमासान्‌ वै सत्यव्रतपरायण: । तस्य लोका: शुभा दिव्या देवराजर्षिपूजिता:

যে ব্যক্তি বারো মাস সর্বদা সত্যব্রতে পরায়ণ থাকে, তার জন্য দেব ও রাজর্ষিদের দ্বারা পূজিত শুভ ও দিব্য লোকসমূহ প্রাপ্ত হয়।

Verse 123

विमान सूर्यचन्द्रा भं दिव्यं समधिगच्छति । जातरूपमयं युक्त सर्वरत्नसमन्वितम्‌

সে সূর্য ও চন্দ্রের ন্যায় দীপ্তিমান, স্বর্ণময়, যথাযথ সজ্জিত এবং সর্বপ্রকার রত্নে অলংকৃত এক দিব্য বিমান লাভ করে।

Verse 124

अप्सरोगणसम्पूर्ण गन्धर्वैरभिनादितम्‌ | तत्र चैनं शुभा नार्यों दिव्याभरणभूषिता:

তা অপ্সরাদের দলে পরিপূর্ণ ছিল এবং গন্ধর্বদের গীত-বাদ্যে মুখরিত হচ্ছিল। সেখানে দিব্য অলংকারে ভূষিতা মঙ্গলময়ী স্বর্গীয় নারীরা তাকে পরিবেশন করছিল।

Verse 125

भोगवांस्तेजसा युक्तो वैश्वानरसमप्रभ:

সে ভোগসমৃদ্ধ, তেজস্বী, বৈশ্বানর অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান হয়ে রুদ্রদের লোক এবং ব্রহ্মলোকেও গমন করে।

Verse 126

दिव्यो दिव्येन वपुषा भ्राजमान इवामर: । वसूनां मरुतां चैव साध्यानामश्विनोस्तथा

ভীষ্ম বললেন—তিনি দিব্য দেহে দীপ্তিমান, যেন অমরের মতো। সেই জ্যোতিতে তিনি বসু, মরুত, সাধ্য এবং অশ্বিনীকুমারদের সদৃশ প্রতীয়মান হলেন।

Verse 127

यस्तु मासे गते भुड्क्ते एकभक्तं शमात्मक:

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি এক মাস অতিবাহিত হলে কেবল একবার আহার করে, সংযমী ও শান্তচিত্ত হয়ে ধর্মানুষ্ঠানে নিয়মানুবর্তী তপস্যা পালন করে।

Verse 128

सुधारसकृताहार: श्रीमान्‌ सर्वमनोहर:

ভীষ্ম বললেন—তার আহার যেন অমৃতরসের ন্যায় শুদ্ধ ও মধুর; তিনি শ্রীসমৃদ্ধ এবং সর্বজনের মনোহর।

Verse 129

दिव्यमाल्याम्बरधरो दिव्यगन्धानुलेपन:

ভীষ্ম বললেন—তিনি দিব্য মালা ও বস্ত্র ধারণ করেন এবং দিব্য সুগন্ধে অনুলিপ্ত।

Verse 130

स्वयंप्रभाभिनरिीभिर्विमानस्थो महीयते

ভীষ্ম বললেন—তিনি দিব্য বিমানে অধিষ্ঠিত হয়ে, স্বপ্রভায় দীপ্তিমান দেবীসদৃশ নারীদের দ্বারা সম্মানিত হন; তারা নানাবিধ মধুর বাক্য ও বিচিত্র রতি-রসের দ্বারা তাঁর সেবা-সমাদর করে।

Verse 131

रुद्रदेवर्षिकन्याभि: सततं चाभिपूज्यते । नानारमणरूपाभिनननारागाभिरेव च

ভীষ্ম বললেন—রুদ্র, দেবগণ এবং দেবর্ষিদের কন্যাগণ তাঁকে সর্বদা শ্রদ্ধাভরে পূজা করেন; আর নানাবিধ মনোহর রূপে, বহুবিধ রাগ-রুচি ও ভক্তিভাবের নানা প্রকাশে তাঁকে আরাধনা করা হয়।

Verse 132

विमाने गगनाकारे सूर्यवैदूर्यसंनिभे

ভীষ্ম বললেন—এক দিব্য বিমানে, যা আকাশসম বিস্তৃত, সূর্যের ন্যায় দীপ্ত এবং বৈদূর্য-মণির (বিড়ালচোখ) কান্তির সদৃশ জ্যোতির্ময় ছিল।

Verse 133

पृष्ठत: सोमसंकाशे उदर्क चाभ्रसन्निभे | दक्षिणायां तु रक्ताभे अधस्तान्नीलमण्डले

ভীষ্ম বললেন—পশ্চাতে তা চন্দ্রসম কান্তিময় ছিল; উপরে মেঘপুঞ্জের ন্যায় দেখাত। দক্ষিণ দিকে রক্তাভ আভা, আর নীচে ছিল নীলবর্ণ মণ্ডলাকার বিস্তার।

Verse 134

ऊर्ध्व विचित्रसंकाशे नैको वसति पूजित: । जिस विमानपर वह विराजमान होता है

ভীষ্ম বললেন—ঊর্ধ্বভাগে নানাবর্ণের আশ্চর্য বৈচিত্র্যে দীপ্ত সেই দিব্য ধামে এক নয়, বহু সম্মানিত সত্তা বাস করেন। আর যতকাল জম্বুদ্বীপে সহস্র বৎসর ধরে বৃষ্টি বর্ষিত হয়, ততকালই সেই পূজ্য ব্যক্তি সেখানে অবস্থান করেন।

Verse 135

विप्रुषश्चैव यावन्त्यो निपतन्ति नभस्तलातू

ভীষ্ম বললেন—আকাশমণ্ডল থেকে যত অসংখ্য ক্ষুদ্র জলবিন্দু নীচে পতিত হয়…

Verse 136

मासोपवासी वर्षैस्तु दशभि: स्वर्गमुत्तमम्‌

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি প্রতি মাসে উপবাসের ব্রত দশ বছর ধরে পালন করে, সে সর্বোত্তম স্বর্গ লাভ করে।

Verse 137

मुनिर्दान्तो जितक्रोधो जितशिश्रोदर: सदा

ভীষ্ম বললেন—মুনিকে দান্ত, সদা সংযত হতে হবে; যে ক্রোধকে জয় করেছে এবং ইন্দ্রিয় ও উদরের বেগকে বশে রেখেছে।

Verse 138

जुद्वन्नग्नींक्ष नियत: संध्योपासनसेविता । बहुभिननियमैरेवं शुचिरश्षाति यो नर:

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি নিয়তভাবে অগ্নিতে আহুতি দেয়, সন্ধ্যা-উপাসনা করে, এবং এভাবে বহু নিয়ম পালন করে শুচি হয়ে আহার করে—সে ধর্মসম্মত শুদ্ধ আহার গ্রহণ করে।

Verse 139

अभ्रावकाशशीलक्ष्‌ तस्य भानोरिव त्विष: । जो मनुष्य सदा मुनि

ভীষ্ম বললেন—তার দীপ্তি সূর্যের কিরণের মতো হয় এবং তার স্বভাব আকাশের মতো নির্মল ও উন্মুক্ত হয়ে ওঠে। যে ব্যক্তি সদা মুনির ন্যায়—ইন্দ্রিয়সংযমী, ক্রোধজয়ী, কাম ও উদরের বেগ দমনকারী, বিধিমতে তিন অগ্নিতে আহুতি প্রদানকারী এবং সন্ধ্যা-উপাসনায় নিবিষ্ট—এবং শুচি হয়ে পূর্বোক্ত বহু নিয়ম পালন করে তবেই আহার করে; সে আকাশের মতো নিষ্কলুষ হয়, আর তার জ্যোতি সূর্যপ্রভা সদৃশ দীপ্ত হয়। হে রাজন, সে নিজ দেহসহ স্বর্গে গিয়ে দেবতুল্য হয়।

Verse 140

एष ते भरतश्रेष्ठ यज्ञानां विधिरुत्तम:

ভীষ্ম বললেন—হে ভরতশ্রেষ্ঠ, এই তোমাকে যজ্ঞসমূহের উত্তম বিধান বলা হল। এতে উপবাসের ফলও প্রকাশিত; হে কুন্তীনন্দন, দরিদ্র লোকেরাও এই উপবাস-ভিত্তিক ব্রত পালন করে যজ্ঞের ফল লাভ করেছে।

Verse 141

व्याख्यातो ह्ानुपूर्व्येण उपवासफलात्मक: । दरिद्रेर्मनुजै: पार्थ प्राप्त यज्ञफलं यथा

ভীষ্ম বললেন— হে পার্থ! আমি ক্রমানুসারে সেই ধর্মবিধান ব্যাখ্যা করেছি, যার মূল উপবাসের ফল। যেমন যজ্ঞের ফল লাভ হয়, তেমনি দরিদ্র মানুষও এই উপবাস-ভিত্তিক ব্রত পালন করে যজ্ঞফলই অর্জন করেছে। হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যজ্ঞসমূহের সর্বোত্তম বিধান আমি তোমাকে ধাপে ধাপে বিস্তারে বলেছি, এবং তাতে উপবাসজাত পুণ্যও স্পষ্ট করেছি। হে কুন্তীনন্দন! ধনহীনরাও এই উপবাস-ব্রত অনুশীলন করে যজ্ঞের সমান ফল লাভ করে।

Verse 142

उपवासानिमान्‌ कृत्वा गच्छेच्च परमां गतिम्‌ । देवद्विजातिपूजायां रतो भरतसत्तम,भरतश्रेष्ठ) देवताओं और ब्राह्मणोंकी पूजामें तत्पर रहकर जो इन उपवासोंका पालन करता है, वह परमगतिको प्राप्त होता है

ভীষ্ম বললেন— হে ভরতশ্রেষ্ঠ! যে এই উপবাসগুলি পালন করে এবং দেবতা ও দ্বিজদের (ব্রাহ্মণদের) পূজায় নিবিষ্ট থাকে, সে পরম গতি লাভ করে।

Verse 143

उपवासविधिवस्त्वेष विस्तरेण प्रकीर्तित: । नियतेष्वप्रमत्तेषु शौचवत्सु महात्मसु

ভীষ্ম বললেন— হে ভারত! উপবাসের এই বিধি ও প্রক্রিয়া আমি বিস্তারে বর্ণনা করেছি। এটি সংযমী, সতর্ক এবং শুচিতায় নিবিষ্ট মহাত্মাদের জন্য। অতএব এই শিক্ষার বিষয়ে তোমার সন্দেহ করা উচিত নয়।

Verse 144

दम्भद्रोहनिवृत्तेषु कृतबुद्धिषु भारत । अचलेष्वप्रकम्पेषु मा ते भूदत्र संशय:

ভীষ্ম বললেন— হে ভারত! যারা দম্ভ ও দ्रोহ ত্যাগ করেছে, যাদের বুদ্ধি শুদ্ধ ও দৃঢ়নিশ্চয়, যাদের স্বভাব অচল ও অকম্প—তাদের জন্য এই উপবাস-বিধান বিষয়ে তোমার কোনো সন্দেহ থাকা উচিত নয়।

Verse 216

देवराजस्य च क्रीडां नित्यकालमतवेक्षते । उस मनुष्यको देवकन्याओंसे आरूढ़ विमान उपलब्ध होता है और वह पूर्वसागरके तटपर इन्द्रलोकमें निवास करता है तथा वहाँ रहकर वह प्रतिदिन देवराजकी क्रीडाओंको देखा करता है

সে নিত্যকাল দেবরাজ ইন্দ্রের ক্রীড়া ও দিব্য বিনোদন প্রত্যক্ষ করে। এমন ব্যক্তি দেবকন্যাদের দ্বারা পরিবৃত এক বিমানে আরূঢ় হয়ে পূর্বসাগরের তীরে ইন্দ্রলোকে বাস করে; সেখানে থেকে সে প্রতিদিন দেবরাজের দিব্য ক্রীড়া দর্শন করে।

Verse 236

अनसूयुरपापस्थो द्वादशाहफलं लभेत्‌ । जो बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ हर पाँचवें दिन एक समय भोजन करता है और लोभहीन

ভীষ্ম বলেন—যে হিংসা-ঈর্ষাহীন, পাপশূন্য আচরণে প্রতিষ্ঠিত, বারো মাস প্রতিদিন অগ্নিহোত্র করে, প্রতি পঞ্চম দিনে একবার আহার করে, লোভহীন, সত্যবাদী, ব্রাহ্মণভক্ত, অহিংসক ও দোষদর্শন-পরিহারী হয়ে সর্বদা পাপকর্ম থেকে দূরে থাকে—সে দ্বাদশাহ যজ্ঞের ফল লাভ করে।

Verse 273

गवां मेधस्य यज्ञस्य फल प्राप्नोत्यनुत्तमम्‌ । जो बारह महीनेतक सदा अन्निहोत्र करता

যে বারো মাস নিত্য অগ্নিহোত্র করে, তিন সন্ধ্যায় স্নান করে, ব্রহ্মচর্য পালন করে, অন্যের দোষ না দেখে, মুনিবৃত্তিতে জীবনযাপন করে এবং প্রতি ষষ্ঠ দিনে একবার আহার করে—সে গোমেধ যজ্ঞের সর্বোত্তম ফল লাভ করে।

Verse 313

लोम्नां प्रमाणेन सम॑ ब्रह्मलोके महीयते । वह मनुष्य दो पताका (महापद्मा)

ভীষ্ম বলেন—সে লোমের সংখ্যার পরিমাপে ব্রহ্মলোকে সম্মানিত হয়; অর্থাৎ নির্দিষ্ট চর্মসমূহে যত লোম আছে, তত বছর সে ব্রহ্মলোকে পূজিত থাকে।

Verse 353

संख्यामतिगुणां चापि तेषु लोकेषु मोदते । उन सभी स्थानोंमें सफलमनोरथ होकर वह देवकन्याओंद्वारा पूजित होता है तथा जिस यज्ञमें बहुत-से सुवर्णकी दक्षिणा दी जाती है

ভীষ্ম বলেন—সে সেই লোকসমূহে গণনার অতীত পরিমাণে আনন্দ ভোগ করে। তার সকল কামনা পূর্ণ হয়, দেবকন্যারা তাকে পূজা করে; যে যজ্ঞে প্রচুর স্বর্ণ দক্ষিণা দেওয়া হয়, তার ফলও সে লাভ করে এবং অগণিত বছর সে সেই লোকসমূহে সুখ ভোগ করে।

Verse 383

वयोरूपविलासिन्यो लभते नात्र संशय: । वह कमलके समान वर्णवाले विमानपर चढ़ता है और वहाँ उसे श्यामवर्णा

ভীষ্ম বলেন—সে পদ্মবর্ণ বিমানে আরোহণ করে; সেখানে সে শ্যামবর্ণা, স্বর্ণসদৃশ গৌরবর্ণা, ষোলো বছরের ন্যায় বয়সধারিণী, নবযৌবন ও মনোহর রূপ-লাস্যে বিভূষিতা দেবাঙ্গনাদের লাভ করে—এতে কোনো সংশয় নেই।

Verse 523

रुद्राणां तमधीवासं दिवि दिव्यं मनोहरम्‌ । वह अपने पास ब्रह्माजीका भेजा हुआ विमान स्वतः उपस्थित देखता है। सुवर्णके समान रंगवाली रूपवती कुमारियाँ उसे उस विमानद्वारा झुलोकमें दिव्य मनोहर रुद्रलोकमें ले जाती हैं

তিনি স্বর্গে রুদ্রদের সেই দিব্য, মনোহর আবাস দর্শন করেন। তখন ব্রহ্মার প্রেরিত বিমানটি স্বয়ং তাঁর পাশে উপস্থিত হয়। সোনালি বর্ণের রূপসী কুমারীরা সেই বিমানে তাঁকে স্বর্গের দীপ্তিময়, মোহনীয় রুদ্রলোকে নিয়ে যায়।

Verse 556

सदा द्वादशमासान्‌ वै सर्वमेधफलं लभेत्‌ | जो बारह महीनोंतक प्रति बारहवें दिन केवल हविष्यान्न ग्रहण करता है, उसे सर्वमेध यज्ञका फल मिलता है

যে ব্যক্তি বারো মাস ধরে নিয়ম করে প্রতি দ্বাদশী তিথিতে কেবল হবিশ্যান্ন গ্রহণ করে, সে সর্বমেধ যজ্ঞের সমান পুণ্যফল লাভ করে।

Verse 559

उसके लिये बारह सूर्योके समान तेजस्वी विमान प्रस्तुत किया जाता है। बहुमूल्यमणि

তার জন্য বারো সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান এক দিব্য বিমান প্রস্তুত করা হয়। অমূল্য মণি, মুক্তা ও প্রবাল তার শোভা বৃদ্ধি করে। হংসশ্রেণীতে পরিবেষ্টিত এবং নাগবীথিতে ব্যাপ্ত সেই বিমান কলরব করতে করতে ময়ূর ও চক্রবাক পাখিতে সুশোভিত হয়ে ব্রহ্মলোকে প্রতিষ্ঠিত থাকে। তার ভিতরে বৃহৎ বৃহৎ অট্টালিকা নির্মিত। হে রাজন, সেই চিরস্থায়ী নিবাস বহু নর-নারীতে পরিপূর্ণ। এ কথা মহাভাগ, ধর্মজ্ঞ ঋষি অঙ্গিরা বলেছেন।

Verse 773

आवर्तनानि चत्वारि साधयेच्चाप्यसौ नर: । वह पुरुष सौ पद्म वर्षोके समान दस महाकल्प तथा चार चतुर्युगीतक अपने पुण्यका फल भोगता है

যে ব্যক্তি চারটি আবর্তন সফলভাবে সম্পন্ন করে, সে তার পুণ্যের ফল অতি দীর্ঘকাল ভোগ করে—যেন শত পদ্ম-বর্ষ, দশ মহাকল্প এবং চার চতুর্যুগের সমান।

Verse 813

द्वात्रिंशद्‌ रूपधारिण्यो मधुरा: समलंकृता: । वह पुरुष भूलोक

সে ব্যক্তি সেখানে ভূলোকে, ভুবর্লোকে এবং বিশ্বরূপধারী দেবর্ষিকে দর্শন করে; আর দেবাধিদেবের কুমারীরা তাকে আনন্দিত করে। তাদের সংখ্যা বত্রিশ। তারা মনোহর রূপধারিণী, মধুরভাষিণী এবং দিব্য অলংকারে সুশোভিতা।

Verse 823

तावच्चरत्यसौ धीर: सुधामृतरसाशन: । प्रभो! जबतक आकाशकमें चन्द्रमा और सूर्य विचरते हैं, तबतक वह धीर पुरुष सुधा एवं अमृतरसका भोजन करता हुआ ब्रह्मलोकमें विहार करता है

যতদিন আকাশে চন্দ্র ও সূর্য বিচরণ করে, ততদিন সেই ধীর পুরুষ—সুধা ও অমৃতরসের আস্বাদে পুষ্ট—ব্রহ্মলোকে বিচরণ করে।

Verse 833

सदा द्वादशमासान्‌ वै सप्तलोकान्‌ स पश्यति । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रति अठारहवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है

যে ব্যক্তি টানা বারো মাস ধরে প্রতি আঠারোতম দিনে একবার মাত্র আহার করে, সে ভূ-আদি সাত লোকের দর্শন লাভ করে।

Verse 856

विमानमुत्तमं दिव्यं सुसुखी हाधिरोहति । उसके सामने व्याप्र और सिंहोंसे जुता हुआ तथा मेघके समान गम्भीर गर्जना करनेवाला दिव्य एवं उत्तम विमान प्रस्तुत होता है, जिसपर वह अत्यन्त सुखपूर्वक आरोहण करता है

তার সামনে দিব্য ও উৎকৃষ্ট এক বিমান আবির্ভূত হয়—বাঘ ও সিংহে যুক্ত, মেঘগর্জনের মতো গভীর নিনাদে প্রতিধ্বনিত; আর সে পরম স্বস্তিতে তাতে আরোহণ করে।

Verse 863

सुधारयं च भुज्जीत अमृतोपममुत्तमम्‌ । उस दिव्य लोकमें वह एक हजार कल्पोंतक देवकन्याओंके साथ आनन्द भोगता और अमृतके समान उत्तम सुधारसका पान करता है

সেই দিব্যলোকে সে অমৃতসম উৎকৃষ্ট সুধারস পান করে এবং দেবকন্যাদের সঙ্গে সহস্র কল্পকাল আনন্দ ভোগ করে।

Verse 883

गन्धर्वैरुपगीतं च विमान सूर्यवर्चसम्‌ । उसे अप्सराओंद्वारा सेवित उत्तम स्थान--गन्धर्वोंके गीतोंसे गूँजता हुआ सूर्यके समान तेजस्वी विमान प्राप्त होता है

সে সূর্যের ন্যায় দীপ্তিমান এক বিমান লাভ করে—গন্ধর্বদের গানে মুখরিত, অপ্সরাদের সেবায় শোভিত—এবং সেই উৎকৃষ্ট স্থানে অধিষ্ঠিত হয়।

Verse 896

दिव्याम्बरधर: श्रीमानयुतानां शतं शतम्‌ । उस विमानमें वह सुन्दरी देवांगगाओंके साथ आनन्द भोगता है। उसे कोई चिन्ता तथा रोग नहीं सताते। दिव्यवस्त्रधारी और श्रीसम्पन्न रूप धारण करके वह दस करोड़ वर्षोतक वहाँ निवास करता है

দিব্য বস্ত্রধারী, শ্রীসমৃদ্ধ হয়ে সে সেখানে দেবাঙ্গনাদের সঙ্গে স্বর্গীয় আনন্দ ভোগ করে। তাকে না কোনো দুশ্চিন্তা স্পর্শ করে, না রোগ। এভাবে সে দশ কোটি বছর পর্যন্ত সেখানে বাস করে।

Verse 913

स लोकान्‌ विपुलान्‌ रम्यानादित्यानामुपाश्षुते । जो लगातार बारह महीनेतक पूरे बीस दिनपर एक बार भोजन करता

সে আদিত্যদের—সূর্যদেবের গণের—বিশাল ও মনোরম লোক লাভ করে। যে বারো মাস অবিরতভাবে প্রতি বিশ দিনে একবার আহার করে, সত্য বলে, ব্রত পালন করে, মাংস ত্যাগ করে, ব্রহ্মচর্য রক্ষা করে এবং সর্বপ্রাণীর হিতে রত থাকে—সে সূর্যদেবের প্রশস্ত ও সুন্দর লোকসমূহে গমন করে।

Verse 926

विमानै: काज्चनै्ईट्यै: पृष्ठतश्नानुगम्यते । उसके पीछे-पीछे दिव्यमाला और अनुलेपन धारण करनेवाले गन्धर्वों तथा अप्सराओंसे सेवित सोनेके मनोरम विमान चलते हैं

তার পেছনে পেছনে সোনার মনোরম বিমান চলে—শুভ ও দীপ্তিমান—যেগুলি দিব্য মালা ও সুগন্ধি অনুলেপন ধারণকারী গন্ধর্ব ও অপ্সরাদের দ্বারা পরিবৃত ও সেবিত।

Verse 953

सेव्यमानो वरस्त्रीभि: क्रीडत्यमरवत्‌ प्रभु: । जो लगातार बारह महीनोंतक प्रतिदिन अग्निहोत्र करता हुआ इक्कीसवें दिनपर एक बार भोजन करता है

শ্রেষ্ঠ নারীদের সেবায় পরিবৃত হয়ে সে অমরের ন্যায় ক্রীড়া করে। যে বারো মাস অবিরত প্রতিদিন অগ্নিহোত্র সম্পাদন করে এবং একুশতম দিনে একবার আহার করে, সে শুক্রাচার্য ও ইন্দ্রের দিব্য লোক লাভ করে; তদুপরি অশ্বিনীকুমার ও মরুদ্গণের লোকও প্রাপ্ত হয়। সেই লোকসমূহে সে সদা সুখভোগে রত থাকে; দুঃখের নামও সে জানে না। শ্রেষ্ঠ বিমানে অধিষ্ঠিত হয়ে, সুন্দরী নারীদের দ্বারা সেবিত, সে পরাক্রান্ত দেবতার ন্যায় ক্রীড়া করে।

Verse 1013

रमते देवकन्याभिर्दिव्याभरणभूषित: । वहाँ अनेक गुणोंसे युक्त श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो इच्छानुसार विचरता

দিব্য অলংকারে ভূষিত হয়ে সে দেবকন্যাদের সঙ্গে আনন্দে মগ্ন থাকে। সেখানে বহু গুণে সমৃদ্ধ হয়ে শ্রেষ্ঠ বিমানে আরোহণ করে সে ইচ্ছামতো বিচরণ করে—যেখানে ইচ্ছে সেখানেই যায়—এবং অপ্সরাদের দ্বারা পূজিত হয়।

Verse 1053

सदा द्वादशमासांस्तु पुष्कलं यानमारुहेत्‌ । जो लगातार बारह महीनोंतक पचीसवें दिन एक बार भोजन करता है, उसको सवारीके लिये बहुत-से विमान या वाहन प्राप्त होते हैं

ভীষ্ম বললেন—যে ব্যক্তি পূর্ণ বারো মাস ধরে প্রতি মাসের পঁচিশতম দিনে মাত্র একবার আহার করে সংযম পালন করে, তার যাত্রার জন্য বহু বিমান ও নানাবিধ যান লাভ হয়।

Verse 1083

सुधारसं चोपजीवन्नमृतोपममुत्तमम्‌ | वह दिव्य

ভীষ্ম বললেন—অমৃতসম উত্তম সুধারসে জীবিত থেকে সে দিব্য, শ্রেষ্ঠ ও মনোহর বিমানে অধিষ্ঠিত হয়; শত শত সুন্দরীতে পরিপূর্ণ প্রাসাদে সহস্র কল্পকাল বাস করে। সেখানে দেবভোজ্য, অমৃতোপম পরম সুধারস পান করে সে জীবন যাপন করে।

Verse 1126

द्वे युगानां सहस्रे तु दिव्ये दिव्येन तेजसा । सम्पूर्ण रत्नोंसे अलंकृत स्फटिक मणिमय दिव्य विमानोंसे सम्पन्न हो गन्धर्वों और अप्सराओंद्वारा पूजित होता हुआ दिव्य तेजसे युक्त हो देवताओंके दो हजार दिव्य युगोंतक वह उन लोकोंमें आनन्द भोगता है

ভীষ্ম বললেন—দিব্য তেজে দীপ্ত, স্ফটিকমণিময় ও সর্বরত্নে অলংকৃত দিব্য বিমানে সমৃদ্ধ, গন্ধর্ব ও অপ্সরাদের দ্বারা পূজিত এবং দ্যুতিময় হয়ে সে সেই লোকসমূহে দেবতাদের দুই হাজার দিব্য যুগ পর্যন্ত আনন্দ ভোগ করে।

Verse 1203

सर्वकामगमे दिव्ये कल्पायुतशतं समा: । वह भोगसे सम्पन्न हो अपने तेजसे निर्मल सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है और सुन्दर कान्तिवाली

ভীষ্ম বললেন—সর্ব কামনা পূরণকারী সেই মনোরম দিব্য বিমানে সেই পুণ্যবান পুরুষ ভোগসমৃদ্ধ হয়ে নিজের তেজে নির্মল সূর্যের ন্যায় দীপ্ত হয়। দিব্য বস্ত্র ও অলংকারে ভূষিতা, সূর্যসম প্রভাময় কোমলাঙ্গী নারীগণ সেই বিমানে আরোহণ করে লক্ষ লক্ষ কল্পবর্ষ ধরে তাকে আনন্দ দান করে।

Verse 1246

मनो5भिरामा मधुरा रमयन्ति मदोत्कटा: । उस विमानमें अप्सराएँ भरी रहती हैं

ভীষ্ম বললেন—সেই বিমানে অপ্সরারা পরিপূর্ণ থাকে, আর গন্ধর্বদের গানের মধুর ধ্বনিতে তা নিরন্তর প্রতিধ্বনিত হয়। সেখানে দিব্য অলংকারে ভূষিতা, শুভ লক্ষণে সমৃদ্ধ, মনোহর, আনন্দে উন্মত্ত ও মধুরভাষিণী রমণীগণ সেই পুরুষকে রমণ করায়।

Verse 1263

रुद्राणां च तथा लोकं ब्रह्मलोक॑ च गच्छति । वह पुरुष भोगसम्पन्न

সে পুরুষ রুদ্রদের লোক এবং ব্রহ্মলোকও লাভ করে। ভোগ-সমৃদ্ধিতে সমৃদ্ধ, তেজস্বী, অগ্নির ন্যায় দীপ্তিমান, দিব্য দেহে দেবতার মতো জ্যোতির্ময় ও দিব্যভাব-সমন্বিত হয়ে সে বসুদের, মরুদ্গণের, সাধ্যগণের, অশ্বিনীকুমারদের, রুদ্রদের এবং ব্রহ্মার লোকেও গমন করে।

Verse 1276

सदा द्वादशमासान्‌ वै ब्रह्मलोकमवाप्नुयात्‌ । जो बारह महीनोंतक प्रत्येक मास व्यतीत होनेपर तीसवें दिन एक बार भोजन करता और सदा शान्तभावसे रहता है, वह ब्रह्मलोकको प्राप्त होता है

যে ব্যক্তি বারো মাস জুড়ে প্রতি মাসের ত্রিশতম দিনে একবার মাত্র আহার করে এবং সর্বদা শান্তভাব বজায় রাখে, সে ব্রহ্মলোক প্রাপ্ত হয়।

Verse 1283

तेजसा वपुषा लक्ष्म्या भ्राजते रश्मिवानिव । वह वहाँ सुधारसका भोजन करता और सबके मनको हर लेनेवाला कान्तिमान्‌ रूप धारण करता है। वह अपने तेज, सुन्दर शरीर तथा अंगकान्तिसे सूर्यकी भाँति प्रकाशित होता है

সে সেখানে সুধারস আহার করে এবং সকলের মন হরণকারী কান্তিময় রূপ ধারণ করে। নিজের তেজ, সুন্দর দেহ ও অঙ্গকান্তিতে সে রশ্মিসমেত সূর্যের ন্যায় দীপ্ত হয়।

Verse 1313

नानामधुरभाषाभिनानारतिभिरेव च | वह विमानपर आरूढ़ हो अपनी ही प्रभासे प्रकाशित होनेवाली दिव्य नारियोंद्वारा सम्मानित होता है। रुद्रों तथा देवर्षियोंकी कन्याएँ सदा उसकी पूजा करती हैं। वे कन्याएँ नाना प्रकारके रमणीय रूप

সে বিমানে আরূঢ় হয়ে, নিজস্ব জ্যোতিতে দীপ্তিমান দিব্য নারীদের দ্বারা সম্মানিত হয়। রুদ্রদের ও দেবর্ষিদের কন্যারা সর্বদা তার পূজা করে। নানা মনোহর রূপ, বিচিত্র রাগ, নানাবিধ মধুর বাক্‌শৈলী এবং বহুরূপ রতি-ক্রীড়ায় ভূষিত সেই কন্যারা তার সেবা করে।

Verse 1346

तावत्‌ संवत्सरा: प्रोक्ता ब्रह्मलोकेडस्यथ धीमत: । मेघ जम्बूद्वीपमें जितने जलबिन्दुओंकी वर्षा करता है, उतने हजार वर्षोतक उस बुद्धिमान्‌ पुरुषका ब्रह्मलोकमें निवास बताया गया है

জম্বূদ্বীপে মেঘ যত জলবিন্দু বর্ষণ করে, তত সহস্র বছর সেই জ্ঞানী পুরুষের ব্রহ্মলোকে বাস বলে ঘোষিত হয়েছে।

Verse 1353

वर्षासु वर्षतस्तावन्निवसत्यमरप्रभ: । वर्षा-ऋतुमें आकाशसे धरतीपर जितनी बूँदें गिरती हैं, उतने वर्षोतक वह देवोपम तेजस्वी पुरुष ब्रह्मलोकमें निवास करता है

ভীষ্ম বললেন—বর্ষাকালে যতক্ষণ বৃষ্টি ঝরে, ততক্ষণই—অর্থাৎ আকাশ থেকে পৃথিবীতে যত বৃষ্টিবিন্দু পড়ে, তত বছরের সমান কাল—সে দেবসম দীপ্তিমান পুরুষ ব্রহ্মলোকে বাস করে।

Verse 1366

महर्षित्वमथासाद्य सशरीरगतिर्भवेत्‌ । दस वर्षोतक एक-एक मास उपवास करके एकतीसवें दिन भोजन करनेवाला पुरुष उत्तम स्वर्ग लोकको जाता है। वह महर्षि पदको प्राप्त होकर सशरीर दिव्यलोककी यात्रा करता है

ভীষ্ম বললেন—মহর্ষিপদ লাভ করে সে দেহসহ দিব্যলোকে গমন করে। যে ব্যক্তি দশ বছর ধরে প্রতি মাসে উপবাস করে একত্রিশতম দিনে আহার করে, সে সর্বোত্তম স্বর্গলোকে যায়; মহর্ষি হয়ে দেহসহ দিব্যধামে যাত্রা করে।

Verse 1393

स्वर्ग पुण्यं यथाकाममुपभुड्धक्ते तथाविध: । राजन! ऐसे गुणोंसे युक्त पुरुष देवताके समान अपने शरीरके साथ ही देवलोकमें जाकर वहाँ इच्छाके अनुसार स्वर्गके पुण्यफलका उपभोग करता है

ভীষ্ম বললেন—হে রাজন! এমন গুণে গুণান্বিত ব্যক্তি দেবতার সমান হয়ে ওঠে। সে দেহসহ দেবলোকে গিয়ে সেখানে নিজের ইচ্ছামতো স্বর্গের পুণ্যফল ভোগ করে।

Verse 8736

सदा द्वादशमासान्‌ वै सप्तलोकान्‌ स पश्यति । जो लगातार बारह महीनोंतक उन्नीसवें दिन एक बार भोजन करता है, वह भी भू आदि सातों लोकोंका दर्शन करता है

ভীষ্ম বললেন—সে পূর্ণ বারো মাস ধরে সাত লোক দর্শন করে। যে ব্যক্তি একটানা বারো মাস উনিশতম দিনে একবার আহার করে, সেও ভূ-আদি সাত লোকের দর্শন লাভ করে।

Verse 11636

युगकल्पसहस्राणि त्रीण्यावसति वै सुखम्‌ । वहाँ उसे अमृतका आहार प्राप्त होता है तथा वह तृष्णारहित हो वहाँ रहकर आनन्द भोगता है। राजन! वह दिव्यरूपधारी पुरुष राजर्षियोंद्वारा वर्णित देवर्षियोंके चरित्रका श्रवण-मनन करता है और श्रेष्ठ विमानपर आरूढ़ हो मनोरम सुन्दरियोंके साथ मदोन्मत्तभावसे रमण करता हुआ तीन हजार युगों एवं कल्पोंतक वहाँ सुखपूर्वक निवास करता है

ভীষ্ম বললেন—সে সেখানে তিন হাজার যুগ ও কল্প পর্যন্ত সুখে বাস করে। সেখানে সে অমৃতসম আহার লাভ করে; তৃষ্ণা ও আকাঙ্ক্ষাহীন হয়ে আনন্দ ভোগ করে। হে রাজন! সেই দিব্যরূপধারী পুরুষ রাজর্ষিদের বর্ণিত দেবর্ষিদের চরিত শ্রবণ ও মনন করে; শ্রেষ্ঠ বিমানে আরূঢ় হয়ে মনোরমা সুন্দরীদের সঙ্গে উল্লাসমত্তভাবে ক্রীড়া করতে করতে সেখানে তিন হাজার যুগ-কল্প সুখে অবস্থান করে।

Verse 12963

सुखेष्वभिरतो भोगी दुःखानामविजानक: । दिव्यमाला, दिव्यवस्त्र, दिव्यगन्ध और दिव्य अनुलेपन धारण करके वह भोगकी शक्ति और साधनसे सम्पन्न हो सुख-भोगमें ही रत रहता है। दुःखोंका उसे कभी अनुभव नहीं होता है

সুখে নিমগ্ন ভোগী দুঃখকে জানেই না। দিব্য মালা, দিব্য বস্ত্র, দিব্য সুগন্ধ ও দিব্য অনুলেপন ধারণ করে, ভোগের শক্তি ও উপায়ে সমৃদ্ধ হয়ে সে কেবল সুখভোগেই রত থাকে; দুঃখ তার অনুভবে কখনও প্রবেশ করে না।

Frequently Asked Questions

The chapter evaluates what counts as ‘best’ in religious practice: whether purity is primarily achieved through external tīrtha-bathing or through internal ethical purification, and how to rank these without dismissing either.

True ‘snāna’ is the cleansing of mind and conduct—truth, compassion, restraint, and non-attachment—so that ritual acts become meaningful extensions of disciplined character rather than substitutes for it.

Yes: it asserts a results-framework in which success/purification arises from conjunction—inner purity with outer practice—illustrated by the analogy that strength without action, or action without strength, fails, while their union succeeds.