Mahabharata Adhyaya 189
Drona ParvaAdhyaya 18972 Versesअत्यन्त अव्यवस्थित और रक्तरंजित; छोटे द्वन्द्वों से युद्ध का केन्द्र प्रमुख नायकों के निर्णायक संग्रामों की ओर खिंचता है।

Adhyaya 189

Chapter Arc: सहस्रांशु के तप्तकाञ्चन-प्रभ उदय के साथ ही, रात भर के द्वन्द्व-युद्धों की जकड़न टूटती नहीं—जो जहाँ भिड़ा था, वहीँ सूर्य के प्रकाश में भी भिड़ा रहता है। → युद्ध निकृष्ट और सन्निकट हो उठता है—अर्धासि, खड्ग, तोमर, परश्वध; रथों के चक्र कीचड़ में धँसते हैं, घोड़े थककर काँपते हैं, बाणों से विद्ध होकर भी किसी तरह रथ खींचते हैं। हाथों का स्पर्श-भर दूरी पर शत्रु और स्वजन गड्डमड्ड हो जाते हैं; ध्वज, व्यजन, कवच, कटे अंग और कुण्डल-मण्डित मस्तक रणभूमि को भयावह अलंकरण दे देते हैं। → अन्धकार/धूल-धुएँ के आवरण में पहचान मिट जाती है—न कौरव पहचाने जाते हैं, न पांचाल-पाण्डव; दिशा-आकाश-भूमि का सम-विषम भी भ्रमित हो उठता है। इसी कोलाहल के बीच बड़े द्वन्द्व एक साथ फूट पड़ते हैं: दुर्योधन (दुःशासन सहित) नकुल-सहदेव पर टूटता है; कर्ण भीमसेन से भिड़ता है; अर्जुन आचार्य द्रोण से। → रण का प्रवाह छोटे-छोटे द्वन्द्वों से निकलकर प्रमुख नायकों के संग्राम में केन्द्रित हो जाता है। नकुल, युद्ध-प्रणालियों के ज्ञाता, दुर्योधन की चाल/आक्रमण को देखकर उसे रोकने का यत्न करते हैं और अपने पक्ष की पंक्ति को सँभालते हैं। → जब एक ही समय दुर्योधन–नकुल/सहदेव, कर्ण–भीम और द्रोण–अर्जुन के द्वन्द्व जम जाते हैं, तब प्रश्न लटकता है—किसका पराक्रम किसके भाग्य को तोड़ेगा, और किसकी पहचान-भ्रम में हुई चोट अगले विनाश का कारण बनेगी?

Shlokas

Verse 1

- ट्रुपदकुलमें उत्पन्न होनेके कारण धुृष्टद्युम्नका क्षत्रिय होना तो प्रसिद्ध ही है। परंतु याज और उपयाज नामक दो तपस्वी ब्राह्मणोंकी तपस्यासे उनकी उत्पत्ति हुई थी तथा परमेश्वरके मुखसे प्रकट हुए ब्राह्मणस्वरूप अग्निसे उनका प्रादुर्भाव हुआ था। इससे उनमें ब्राह्मणत्व भी था। सप्ताशीर्त्याधिकशततमोब< ध्याय: युद्धस्थलकी भीषण अवस्थाका वर्णन और नकुलके द्वारा दुर्योधनकी पराजय संजय उवाच ते तथैव महाराज दंशिता रणमूर्थनि । संध्यागतं सहस्रांशुमादित्यमुपतस्थिरे

قال سَنجايا: أيها الملك، إن أولئك المحاربين، كما كانوا من قبل، ما زالوا لابسين دروعهم في مقدّمة ساحة القتال، وأقاموا في وقت شفق الصباح شعيرةَ التبجيل لآدِتْيَا—الشمس ذات الألف شعاع. وحتى والذبح وشيك، لم يتركوا طقس السَنْدْهْيا، فبان كيف يُصان الواجب والانضباط في قلب الحرب.

Verse 2

उदिते तु सहस्रांशी तप्तकाञ्चनसप्रभे | प्रकाशितेषु लोकेषु पुनर्युद्धमवर्तत,तपाये हुए सुवर्णके समान कान्तिमान्‌ सूर्यदेवका उदय होनेपर जब सम्पूर्ण लोकोंमें प्रकाश छा गया, तब पुनः युद्ध होने लगा

قال سَنجايا: لما أشرقت الشمس ذات الألف شعاع، متلألئة كذهبٍ مُحمّى، وانتشر النور في جميع العوالم، اندلعت المعركة من جديد. وفي ذلك دلالة على رتابة الحرب القاتمة: فالفجر المحايد الذي يجدّد الحياة يغدو أيضاً إشارةً لتجدّد العنف، إذ تعود عزائم البشر إلى الصدام لا إلى الكفّ.

Verse 3

दन्द्धानि तत्र यान्यासन्‌ संसक्तानि पुरोदयात्‌ | तान्येवाभ्युदिते सूर्ये समसज्जन्त भारत,भरतनन्दन! सूर्योदयसे पहले जिन लोगोंमें द्वन्द-युद्ध चल रहा था, सूर्योदयके बाद भी पुनः वे ही लोग परस्पर जूझने लगे

قال سَنجايا: «يا بهاراتا، يا بهجة آل بهاراتا! إن الأزواج أنفسهم الذين كانوا قد اشتبكوا في مبارزةٍ فردية قبل طلوع الشمس، ما إن أشرقت حتى تقاربوا من جديد واستأنفوا صراعهم.»

Verse 4

रथै्हया हयैरनागा: पादातैश्वापि कुज्जरा: । हयै्हया: समाजग्मु: पादाताश्न पदातिभि:,रथोंसे घोड़े, घोड़ोंसे हाथी, पैदलोंसे हाथीसवार, घोड़ोंसे घोड़े तथा पैदलोंसे पैदल भिड़ गये

قال سَنجايا: في ذلك الاضطراب من القتال، اصطدمت العربات بالخيول؛ واندفعت الخيول نحو الفيلة؛ وواجهت الفيلةُ المشاةَ؛ واصطدم الخيل بالخيل؛ وتصارع المشاةُ مع المشاة. وهكذا التحمت الجيوش، يضرب كلُّ صنفٍ نظيرَه، حتى محَتْ وحشيةُ الحرب كلَّ مسافةٍ وكلَّ كفّ.

Verse 5

रथा रथैरिभैर्नागास्तथैव भरतर्षभ । संसक्ताश्च वियुक्ताश्न योधा: संन्यपतन्‌ रणे,भरतश्रेष्ठ! रथोंसे रथ और हाथियोंसे हाथी गुँथ जाते थे। इस प्रकार कभी सटकर और कभी विलग होकर वे योद्धा रणभूमिमें गिरने लगे

قال سَنجايا: «يا ثورَ آل بهاراتا، اصطدمت العربات بالعربات، واصطدمت الفيلة بالفيلة. وهكذا كان المحاربون—تارةً ملتحمين في قتالٍ لصيق، وتارةً متفارقين—يتساقطون تباعاً على ساحة المعركة.»

Verse 6

ते रात्रौ कृतकर्माण: श्रान्ता: सूर्यस्य तेजसा । क्षुत्पिपासापरीताज विसंज्ञा बहवो5भवन्‌

قال سنجيا: بعد أن قاتلوا طوال الليل وأتمّوا عملهم الكالح في الحرب، أنهك التعبُ المحاربين. ثم لَفَحَتهم حرارةُ الشمس الشديدة، فاستولى الجوعُ والعطشُ على أجسادهم، فسقط كثيرٌ من الجنود فاقدي الوعي.

Verse 7

शड्खभेरीमृदड्नां कुञ्जराणां च गर्जताम्‌ । विस्फारितविकृष्टानां कार्मुकाणां च कूजताम्‌

قال سنجيا: «ارتفع صليلُ الأصداف (الشَّنْخ)، ودويُّ الطبول الكبيرة والمِرْدَنْغا، وزئيرُ الفيلة؛ وارتفع كذلك رنينُ الأقواس وهي تُمدّ على اتساعها وتُشدّ إلى الوراء.»

Verse 8

द्रवतां च पदातीनां शस्त्राणां पततामपि,दौड़ते हुए पैदलों, गिरते हुए शस्त्रों, हिनहिनाते हुए घोड़ों, लौटते हुए रथों तथा चीखते- चिल्लाते और गरजते हुए शूरवीरोंका मिला हुआ महाभयंकर शब्द वहाँ गूँज रहा था

قال سنجيا: «هناك دوّى زئيرٌ واحدٌ، هو الأشدّ رعبًا—مؤلَّفٌ من وقعِ أقدام المشاة المسرعين، وسقوطِ الأسلحة، وصهيلِ الخيل، والتفافِ العربات عائدةً، ومن صرخاتِ المحاربين وهتافهم وزمجراتهم في القتال.»

Verse 9

हयानां ह्वेषतां चापि रथानां च निवर्तताम्‌ | क्रोशतां गर्जतां चैव तदा55सीत्‌ तुमुलं महत्‌

قال سنجيا: عندئذٍ ارتفع ضجيجٌ عظيمٌ مضطرب—صهيلُ الخيل، والتفافُ العربات عائدةً، وصراخُ المحاربين وزمجراتهم—حتى دوّى ميدانُ القتال كأنه زئيرٌ واحدٌ مرعبٌ من الفوضى والتراجع.

Verse 10

विवृद्धस्तुमुल: शब्दो द्यामगच्छन्महांस्तदा । नानायुधनिकृत्तानां चेष्टतामातुर: स्वन:

قال سنجيا: في ذلك الحين ارتفع ضجيجٌ عظيمٌ متزايدٌ مضطربٌ حتى بلغ السماوات. وعلى الأرض سُمِعَت صرخاتُ الألم للمحاربين—وقد قطّعتهم شتّى الأسلحة—وهم يتلوّون في نزعهم الأخير. وكشفت المشاهدُ خرابًا مُفجعًا للمشاة والخيل والعربات والفيلة، يسقطون ويُسقَطون.

Verse 11

भूमावश्रूयत महांस्तदा55सीत्‌ कृपणं महत्‌ | पततां पात्यमानानां पत्त्यश्वरथदन्तिनाम्‌

قال سنجيا: عندئذٍ سُمِعَ على وجه الأرض دويٌّ عظيمٌ مُفجِع. كان ذلك الصراخَ الجليلَ العاجزَ لرجّالةِ الجيشِ والخيولِ وسائقي العجلاتِ الحربيةِ والفيلة—منهم من يسقط ومنهم من يُصرَع—كاشفًا بؤسَ ما تُنزله الحربُ حين تُحطَّم الأجسادُ وتُدفَع الأرواحُ إلى الخراب.

Verse 12

तेषु सर्वेष्वनीकेषु व्यतिषक्तेष्वनेकश: । स्वे स्वाञ्जघ्नुः परे स्वांश्व स्वान्‌ परेषां परे परान्‌

قال سنجيا: لما تشابكت تلك الصفوف القتالية مرارًا في قتالٍ متلاحم، سرت الفوضى في الأرتال. فضرب رجالٌ أهلَ جانبهم، وضرب المحاربون من الجانب المقابل أهلَ جانبهم كذلك. وفي ذلك الاضطراب قتل المقاتلون حتى ذوي قرباهم الذين كانوا في صفوف العدو، وقتلوا الأعداء أيضًا—مُظهِرًا كيف أن الحرب، إذا انقلبت إلى عَراكٍ مختلط، تُعمي البصيرة وتُظلِم الدارما معًا.

Verse 13

वीरबाहुविमृष्टाश्च योधेषु च गजेषु च । राशय: प्रत्यदृश्यन्त वाससां नेजनेष्विव

قال سنجيا: على أجساد المحاربين والفيلة بدت أكوامٌ من السلاح والمقذوفات، ألقتها أذرعُ الأبطال الجبّارة—كأكوام الثياب التي تُرى عند مرافئ الغَسل (الغَهات). وتُبرز هذه الصورة شدة المعركة التي لا تلين، حيث إن قوة الإنسان وفنّ القتال لا يثمران مجدًا فحسب، بل يكدّسان أيضًا أدوات الأذى تكديسًا طاغيًا.

Verse 14

उद्यतप्रतिपिष्टानां खड्गानां वीरबाहुभि: । स एव शब्दस्तद्रूपो वाससां निज्यतामिव

قال سنجيا: إن الصوت الذي تُحدِثه السيوفُ حين تُرفَع عاليًا وتتصادم، بأذرع المحاربين الأبطال القوية، بدا كأنه من ذلك الطراز نفسه—كصوت الثياب وهي تُضرَب وتُغسَل على يد الغسّالين. وهكذا يُصوَّر صليلُ ساحة القتال بصوتٍ مألوفٍ من شؤون البيت، ليُبرز كيف تُحوِّل الحربُ مهارة الإنسان وقوته إلى صدماتٍ لا تنقطع ولا شخصية لها.

Verse 15

अर्धासिभिस्तथा खड्गैस्तोमरै: सपरश्वधैः । निकृष्टयुद्धं संसक्तं महदासीत्‌ सुदारुणम्‌

قال سنجيا: وبأنصاف السيوف والسيوف التامة، وبرماح التومارا وبالفؤوس، انغلق القتال حتى صار على مسافةٍ ملتصقة؛ فغدا مذبحةً عظيمةً بالغةَ الفظاعة. وتؤكد الآية أن الحرب إذا انهارت إلى عنفٍ حميمٍ يدًا بيد، تعاظم مقدار الأذى واشتدت قسوة الفعل الإنساني، حتى تُطمَسَ الكوابح وتُخنَقَ الرحمة.

Verse 16

गजाश्वकायप्रभवां नरदेहप्रवाहिनीम्‌ । शस्त्रमत्स्यसुसम्पूर्णा मांसशोणितकर्दमाम्‌

قال سنجيا: «جَرَتْ هناكَ نَهْرٌ من الدم وُلِدَ من جُثَثِ الفِيَلةِ والخيل، يَجُرُّ معه أجسادَ الرجال. وكان مكتظًّا بـ“أسماكٍ” من السلاح، وكان وَحْلُه لحمًا ودمًا.»

Verse 17

आर्तनादस्वनवतीं पताकाशस्त्रफेनिलाम्‌ | नदीं प्रावर्तयन्‌ वीरा: परलोकौघगामिनीम्‌

قال سنجيا: «أطلقَ المحاربون نهرًا كان صوته عويلَ المعذَّبين، وكانت رغوتُه كأنها راياتٌ وسيوف، وكان تيارُه يندفع نحو العالم الآخر.»

Verse 18

शरशतक्त्यर्दिता: क्लान्ता रात्रिमूढाल्पचेतस: । विष्टभ्य सर्वगात्राणि व्यतिष्ठन्‌ गजवाजिन:

قال سنجيا: «وقد أُصيبَت الفِيَلةُ والخيلُ بمئاتِ السهامِ والرماح، فأعياها التعبُ وبلبلها قتالُ الليل حتى خَدِرَتْ حواسُّها؛ فكانت تقف هناك، تُثبِّتُ وتُقَسِّي جميعَ أطرافِها.»

Verse 19

बाहुभि: कवचैश्रित्रै: शिरोभिश्चवारुकुण्डलै: । युद्धोपकरणैश्षान्यैस्तत्र तत्र चकाशिरे

قال سنجيا: «وكانت ساحةُ القتال تلمعُ في مواضعَ شتّى، كأنها تُضاءُ بأذرعٍ مقطوعة، وبِدُروعٍ مُزخرفةٍ متنوّعة، وبرؤوسٍ مُحَلّاةٍ بأقراطٍ جميلة، وبسائرِ عُدَدِ الحربِ المبعثرة هنا وهناك.»

Verse 20

क्रव्यादसड्घैराकीर्ण मृतैरर्धमृतैरपि । नासीद्‌ रथपथत्तत्र सर्वमायोधन प्रति

قال سنجيا: «كانت ساحةُ القتال مكتظّةً بجماعاتٍ من الكائناتِ الآكلةِ للّحم، ومطروحةً فيها الجثثُ والجرحى الذين هم بين الحياة والموت. ولهذا، في ذلك الميدان كلّه لم يجدْتْ العجلاتُ الحربيةُ موضعًا لطريقٍ خالٍ.»

Verse 21

मज्जत्सु चक्रेषु रथान्‌ सत्त्वमास्थाय वाजिन: । कथंचिदवहडउश्रान्ता वेपमाना: शरार्दिता:

قال سنجيا: حين غاصت عجلات العربات في الوحل، جمعت الخيول ما بقي لها من بأس، فسحبت العربات إلى الأمام على أيّ نحوٍ كان، وهي منهكة ترتجف، معذَّبة بسهامٍ تنهشها. ويكشف هذا المشهد زخم الحرب الكالح: فحتى إذا خارت الأجساد وزلزلها الخوف، ظلّت آلة القتال تمضي قُدُمًا بقوة الاحتمال وحدها.

Verse 22

विह्नलं तूर्णमुद्‌भ्रान्तं सभयं भारतातुरम्‌

قال سنجيا: يا بهاراتا، ما خلا دروناآچاريا وأرجونا، اضطرب سائر الجيش في الحال، فغشيه الذهول والهلع والخوف والضيق. ولم يكن لرجال كل فريقٍ ملجأٌ ومأوى إلا هذان البطلان؛ غير أن مقاتلي الخصم إذا دنوا من أحدهما سِيقوا إلى دار ياما—دار الموت—إذ كانت بأسهما طاغيًا لا يُقاوَم.

Verse 23

बलमासीत्‌ _तदा सर्वमृते द्रोणार्जुनावु भौ । तावेवास्तां निलयनं तावार्तायनमेव च

قال سنجيا: في ذلك الحين بدا كأن قوة الجيش بأسره قد انحصرت في هذين وحدهما—درونا وأرجونا. فهما، كأنهما، ملجأ الجيش ومأواه، وهما كذلك عُدَّته الوحيدة عند الشدة.

Verse 24

आविग्नमभवत्‌ सर्व कौरवाणां महद्‌ बलम्‌

قال سنجيا: اضطربت جموع الكورو العظيمة ولم تهدأ. فقد تصادمت جيوش الكورو والبنشالا—وهي جموع هائلة—ثم اختلطت في فوضى حتى لم يعد يُعرَف صفٌّ من صفّ ولا فريقٌ من فريق. وبدا ميدان القتال كأنه ملعب ياما، ربّ الموت، فلم يزد ضعاف القلوب إلا رعبًا.

Verse 25

पज्चालानां च संसक्त न प्राज्ञायत किंचन । अन्तकाक्रीडसदृशं भीरूणां भयवर्धनम्‌

قال سنجيا: لما التحمت جموع البنشالا وغيرهم التحامًا قريبًا، لم يعد شيء يُستبان—لا صفوف ولا فرق تُعرَف. وبدا ميدان القتال كأنه ملعب الموت نفسه، فلم يزد ضعاف القلوب إلا فزعًا.

Verse 26

पृथिव्यां राजवंश्यानामुत्थिते महति क्षये । नततत्र कर्ण द्रोणं वा नार्जुनं न युधिषछ्तिरम्‌

قال سنجيا: «لما نهض على ظهر الأرض ذلك الهلاك العظيم لسلالات الملوك، لم يُرَ هناك أحد—لا كارنا ولا درونا، ولا أرجونا ولا يودهيشثيرا.»

Verse 27

न भीमसेनं न यमौ न पाज्चाल्यं न सात्यकिम्‌ | न च दुःशासन द्रौणिं न दुर्योधनसौबलौ

قال سنجيا: «لم يُرَ بهيماسينا، ولا توأما مادري، ولا أمير البانشالا، ولا ساتياكي؛ ولا دُحشاسانا، ولا ابن درونا؛ ولا دوريودانا وشكوني—في ذلك الاضطراب القتالي لم يظهر أحدٌ منهم كمن يثبت أو يغلب.»

Verse 28

न कृपं मद्रराजं च कृतवर्माणमेव च । नचान्यान्‌ नैव चात्मान॑ न क्षितिं न दिशस्तथा

قال سنجيا: «لم يستطع أن يُبصر كِرْپا، ولا ملك مادرا، ولا كِرتافَرما؛ ولا غيرهم—بل ولا نفسه. ولم تعد الأرض ولا الجهات تبدو كما كانت من قبل.»

Verse 29

पश्याम राजन्‌ संसक्तान्‌ सैन्येन रजसा5<वृतान्‌ | राजन! भूमण्डलके राजवंशमें उत्पन्न हुए क्षत्रियोंका वह महान्‌ संहार उपस्थित होनेपर वहाँ युद्धमें तत्पर हुए सब लोग सेनाद्वारा उड़ायी हुई धूलसे ढक गये थे। इसीलिये हमलोग वहाँ न तो कर्णको देख पाते थे

قال سنجيا: «يا أيها الملك، كنا نرى المحاربين ملتحمين في قتالٍ متقارب، غير أنّ الغبار الذي أثارته الجيوش كان يلفّهم. فلما قامت تلك الفوضى الرهيبة وارتفع سحابٌ من التراب، خانت الأبصار—فاستوى الصديق والعدو لا يُميَّزان، وكأن ساحة القتال قد ابتلعتها الظلمة والحصى الدقيق.»

Verse 30

न ज्ञायन्ते कौरवेया न पञ्चाला न पाण्डवा:

قال سنجيا: «في ذلك الاضطراب لم يعد يُعرَف الكورافا ولا البانشالا ولا الباندافا—فاستوى الصديق والعدو لا يُميَّزان.»

Verse 31

हस्तसंस्पर्शमापन्नान्‌ परानप्यथवा स्वकान्‌

قال سانجيا: «سواء كانوا أعداءً أم من رجالنا، فما إن بلغوا مدى الذراع—ودخلوا في التحامٍ مباشر، يداً بيد—حتى صُرِعوا بلا تمييز».

Verse 32

उद्धूतत्वात्‌ तु रजस: प्रसेकाच्छोणितस्य च

قال سانجيا: «لأن الغبار قد أُثير بعنف، ولأن الدم كان يُسفَح سَفحاً، غامت الرؤية واحتجب المشهد—إشارةً إلى شدة القتال ووحشيته، وإلى الكلفة الأخلاقية الجسيمة التي ترافق مثل هذا الذبح».

Verse 33

तत्र नागा हया योधा रथिनो5थ पदातय:

قال سانجيا: «هناك اجتمعت الفيلة والخيول والمحاربون—مقاتلو العربات والمشاة معاً—دلالةً على زحمة القتال العمياء التي لا تميّز، حيث تُساق كل صنوف الجيش إلى الخطر نفسه والواجب نفسه».

Verse 34

ततो दुर्योधन: कर्णो द्रोणो द:शासनस्तथा

قال سانجيا: «ثم تقدّم/تحرّك دُريودَهَنَ، وكَرْنَة، ودْرونَة، وكذلك دُحْشاسَنَة على التتابع». وتشير هذه السطر إلى انتقال السرد إلى طورٍ تالٍ من وقائع الحرب، مُبرِزةً قادة الكورو الرئيسيين الذين تدفع اختياراتهم ومشورتهم توتّرات الأخلاق بين الواجب والولاء والعنف في ساحة القتال.

Verse 35

पाण्डवै: समसज्जन्त चतुर्भिश्चतुरो रथा: | उस समय दुर्योधन, कर्ण, द्रोणाचार्य और दुःशासन--ये चार महारथी चार पाण्डवोंके साथ युद्ध करने लगे ।। दुर्योधन: सह भ्रात्रा यमाभ्यां समसज्जत

قال سانجيا: «ثم اشتبك أربعةٌ من فرسان العربات من جانب الكورو في قتالٍ لصيقٍ مع أربعةٍ من أبناء باندو». وواجه دُريودَهَنَ، مع أخيه، توأمَ مَادْرِي (نَكُولا وسَهَدِيفا)، إذ ضاقت الصفوف واشتدّ الالتحام، وغدا الدَّرْمَا (dharma)—نظام الحق—موضع امتحانٍ وسط عصف الحرب.

Verse 36

तद्‌ घोरं महदाश्चर्य सर्वे प्रैक्षन्त सर्वतः

قال سانجيا: «ذلك المشهد المروِّع العجيب—العظيم في دهشته—كان الجميع يرقبونه من كل جانب.»

Verse 37

रथमार्ग॑विचित्रैस्तैविंचित्ररथसंकुलम्‌

قال سانجيا: لقد غدا المشهد متاهةً مُحيِّرة من آثار عجلات العربات، مكتظًّا في كل موضع بعربات شتّى—صورةً لاضطراب الحرب، حيث تُحوِّل مهارة البشر وكِبْرُ السلاح ساحةَ القتال إلى ميدانٍ متشابكٍ محفوفٍ بالمخاطر.

Verse 38

यतमाना: पराक्रान्ता: परस्परजिगीषव:

قال سانجيا: وهم يجاهدون بكل ما أوتوا من قوة، ممتلئين بأساً، كانوا يتسابقون إلى التفوق بعضهم على بعض—كلٌّ منهم لا يبتغي إلا الغلبة على خصمه. ويُبرز هذا السطر توتّر الحرب الأخلاقي: فثمّة انضباط وشجاعة، غير أنّهما مُسخَّران للمنافسة والفتح لا للكفّ عن الأذى ولا للمصالحة.

Verse 39

ते रथान्‌ सूर्यसंकाशानास्थिता: पुरुषर्षभा:

قال سانجيا: أولئك الأبطال، ثيرانُ الرجال، اعتلوا عرباتهم المتلألئة كالشمس—صورةٌ تُعلي جلال القتال وتُعلن دخولهم بعزمٍ إلى واجبات المعركة ومخاطرها.

Verse 40

योधास्ते तु महाराज क्रोधामर्षसमन्विता:

قال سانجيا: أيها الملك، إن أولئك المحاربين—وقد امتلأوا غضباً وكبرياءً مجروحاً—كانوا يتبارون، مجتهدين في طلب الظفر. يحملون أقواساً عظيمة، فتشابك الرماة بعنف، كفيلةٍ من فيلةٍ ملوكيةٍ سكرى قد التحمت في قتال. ويكشف المشهد كيف أنّ الغضب والمنافسة، إذا أُطلقا، يدفعان الرجال إلى عنفٍ لا يلين في ساحة المعركة.

Verse 41

स्पर्थिनश्व महेष्वासा: कृतयत्ना धनुर्धरा: । अभ्यगच्छंस्तथान्योन्यं मत्ता गजवृषा इव

يا أيها الملك العظيم! إن أولئك المحاربين الرماة ذوي الأقواس العظيمة، المتنافسين فيما بينهم، الساعين إلى الظفر بكل جهد، وقد امتلأت صدورهم غضبًا وحنقًا، كانوا يتدافعون ويتصارعون كفيلةٍ ملوكيةٍ هائجةٍ ثملةٍ بالسخط.

Verse 42

न नूनं देहभेदो5स्ति काले राजन्ननागते । यत्र सर्वे न युगपद्‌ व्यशीर्यन्त महारथा:

قال سنجيا: أيها الملك، إن انكسار الجسد لا يقع حقًّا قبل حلول أجله المعيَّن. ولولا ذلك لهلك في تلك المعركة جميع أولئك المقاتلين العظام على المركبات—وإن كانوا جرحى ممزَّقين—هلاكًا واحدًا في لحظة. فمسار الحياة والموت، حتى في قلب المذبحة، يجري على ساعة القدر، لا على عنف اللحظة وحده.

Verse 43

बाहुभिश्चरणैश्छिन्नै: शिरोभिश्व सकुण्डलै: । कार्मुकैर्विशिखै: प्रासै: खड्गै: परशुपट्टिशै:

قال سنجيا: كان ميدان القتال مغطّى بالأذرع والسيقان المبتورة، وبالرؤوس التي لا تزال مزدانة بالأقراط. وكانت الأقواس والسهام والرماح والسيوف والفؤوس وسائر أدوات الحرب مبعثرة في كل مكان، شهودًا صامتين على ضراوة الصدام. ويكشف هذا المنظر ثمن الحرب الأخلاقي: فالشجاعة والمهارة تنتهيان إلى الخراب حين يُحجَب الدارما بسفك الدماء، ويغدو الميدان سجلًّا كئيبًا لكبرياء البشر وفخر السلاح وقد قُطع وأُسقط.

Verse 44

नालीकै: क्षुद्रनाराचैर्नखरै: शक्तितोमरै: । अन्यैश्न विविधाकारैरथोतै: प्रहरणोत्तमै:

قال سنجيا: كان الميدان مبعثرًا بسهام «ناليكا»، وبنصال «ناراجا» الصغيرة، وبمقذوفات كالمخالب، وبالرماح وبحراب «تومارا»، وبغير ذلك من الأسلحة الممتازة المتعددة الأشكال، كلها مصقولة مهيّأة للضرب. ويُبرز هذا المشهد الثمن الأخلاقي للحرب: فالبأس والصنعة اللذان وُجدا لنصرة قضية، يبدوان هنا أدواتٍ مبعثرة للدمار، علامةً على انهيار النظام إلى مجزرة.

Verse 45

विचित्रैविविधाकारै: शरीरावरणैरपि । विचिन्रैश्न रथैर्भग्नैहतैश्न गजवाजिभि:

قال سنجيا: كان الميدان مملوءًا بدروعٍ ووقاياتٍ للجسد شتّى الأشكال—زينةً متنوّعة—وبعرباتٍ غريبة الهيئة قد تحطّمت، وبفيلةٍ وخيلٍ صريعة. وكان المشهد، على ما فيه من بهاءٍ كئيب، تذكرةً بأن مجد الحرب إذا انفصل عن ضبط النفس وحسن السلوك، انتهى إلى الخراب والحزن.

Verse 46

शून्यैश्न नगराकारैरहतयोधध्वजै रथै: । अमनुष्य्यैस्त्रस्तै: कृष्पमाणैस्ततस्तत:

قال سنجيا: «كانت هناك مركبات حربية عظيمة كأنها مدنٌ سائرة، لكنها غدت خاوية—بلا سائق—إذ قُتل فرسانها وسقطت راياتها. وكانت خيولٌ مذعورة، تكاد تكون غير بشرية، تجرّ تلك المركبات المهجورة يمنةً ويسرةً، فتندفع في اضطراب عبر ساحة القتال.»

Verse 47

वातायमानैरसकृद्धतवीरैरलड्कृतै: । व्यजनै: कड्कटैश्वैव ध्वजैश्न विनिपातितै:

قال سنجيا: «بدت ساحة القتال مبعثرة بالصرعى—أبطالٌ مزدانة هيئاتهم قُطعوا مرارًا—وبجانبهم مراوحُ التشريف ودروعُ الصدر والراياتُ مطروحة. وكان المشهد، المكتظ بحطام السلاح والزينة، يُظهر بهاء الحرب الكالح: تذكرةً بأن المجد القتالي إذا انفصل عن الدارما انتهى إلى شاراتٍ متناثرة وجثثٍ هامدة، لا إلى شرفٍ باقٍ.»

Verse 48

छत्रैराभरणैर्वस्त्रैर्माल्यैश्व ससुगन्धिभि: । हारै: किरीटैमुकुटैरुष्णीषै: किड॒किणीगणै:

قال سنجيا: «كانت ساحة القتال مبعثرةً برموز الهيبة الملكية وزينة الدنيا—المظلات، والحُليّ، والملابس، وأكاليل الزهر العطرة، والقلائد، والتيجان، والأكاليل الملكية والعمائم، ومعها عناقيد الأجراس الرنانة. وفي الموضع نفسه تمدّد الوجه الكالح للحرب: أطرافٌ مقطوعة، ورؤوسٌ ما زالت مُحلاة بالأقراط، ومركباتٌ محطمة، وجثثُ الفيلة والخيول. وخيولٌ بلا فرسان، مذعورة، تجرّ مركباتٍ خاوية كأنها مدن، وقد أُبيد محاربوها وسقطت راياتها. وهكذا بدا الميدان، الممتلئ معًا بالترف والخراب، متلألئًا على نحوٍ غريب كسماءٍ مكتظة بالنجوم—غير أن جماله مولودٌ من العنف، كاشفًا المأساة الأخلاقية: أن مجد الدنيا وكبرياء الحرب ينتهيان إلى الفناء والموت.»

Verse 49

उरस्थैर्मणिभिनििष्कैश्वूडामणिभिरेव च | आसीदायोधन तत्र नभस्तारागणैरिव

قال سنجيا: «هناك بدت ساحة القتال مبعثرةً بحُليّ الصدر المرصعة بالجواهر، والقلائد الذهبية المعلّقة، وجواهر القمم على التيجان؛ وكانت تلمع كسماءٍ ممتلئة بعناقيد النجوم. وتُبرز الصورة مفارقة الحرب القاتمة: فما كان يدلّ على الشرف والبهاء الملكي صار متناثرًا بين دلائل المذبحة، فتحوّل الجمال إلى شهادةٍ على الفناء وثمن العنف.»

Verse 50

ततो दुर्योधनस्यासीन्नकुलेन समागम: । अमर्षितिन क्ुद्धस्य क्रुद्धेनामर्षितस्प च,इसी समय क़ुद्ध और असहिष्णु दुर्योधनका रोष और अमर्षसे भरे हुए नकुलके साथ युद्ध आरम्भ हुआ

قال سنجيا: «ثم لقيَ دوريودhana ناكولا مواجهةً مباشرة. وقد اشتعل كلاهما بعدم الاحتمال والغضب، فدخلا القتال—كلٌّ يلقى الآخر بسخطٍ وكبرياء مجروح، إذ غلبت أهواء الحربُ كلَّ ضبطٍ للنفس.»

Verse 51

अपसव्यं चकाराथ माद्रीपुत्रस्तवात्मजम्‌ । किरन्‌ शरशतै्ष्टस्तत्र नादो महानभूत्‌

قال سانجيا: ثم إن ابن مادري (ناكولا) دار عن يسار ابنك، وأمطره بمئات السهام، فارتفع هناك جَلَبَةٌ عظيمة.

Verse 52

माद्रीपुत्र नकुलने आपके पुत्र दुर्योधनको दाहिने कर दिया और हर्षमें भरकर उसपर सैकड़ों बाणोंकी झड़ी लगा दी; फिर तो वहाँ महान्‌ कोलाहल हुआ ।।

قال سانجيا: في خِضَمِّ القتال أرغمه عدوّه الشديد القسوة، الذي لا يعرف الصفح، على أن ينعطف انعطافًا مشؤومًا إلى اليسار. ولمّا لم يطق تلك الإهانة في ساحة الوغى، ردّ بأن ألزم خصمه هو أيضًا أن ينعطف إلى اليسار، مجيبًا المذلّة بضربةٍ مضادّة في عنفٍ تحكمه سنن الحرب.

Verse 53

ततः प्रतिचिकीर्षन्तमपसव्यं तु ते सुतम्‌

قال سانجيا: ثم إن ابنك، إذ همَّ أن يفعل—منعطفًا إلى اليسار على نحوٍ مشؤومٍ ومخالفٍ للمألوف—مضت الوقائع نحو منعطفٍ كئيب، كأنها إرادةٌ متعمَّدة تتحدّى المسار القويم في وطأة الحرب الأخلاقية.

Verse 54

स सर्वतो निवार्यनं शरजालेन पीडयन्‌

قال سانجيا: أحاط به من كل جانب، وضغط عليه وعذّبه بشَبَكَةٍ من السهام—صورةٌ لإتقانٍ حربيٍّ يغدو، تحت وطأة ضرورة قهر الخصم، إكراهًا محضًا.

Verse 55

विमुखं नकुलश्चक्रे तत्‌ सैन्या: समपूजयन्‌ । नकुलने दुर्योधनको अपने बाणसमूहोंद्वारा पीड़ित करते हुए उसे सब ओरसे रोककर युद्धसे विमुख कर दिया। उनके इस पराक्रमकी समस्त सैनिक सराहना करने लगे ।।

قال سانجيا: لقد أجبر ناكولا ابنك على أن يولّي عن القتال، فراح الجنود جميعًا يثنون على بأس ناكولا. ثم إن ناكولا، وقد تذكّر كل ما ذاقه من آلام وتذكّر مسلك ابنك السيّئ المشورة، صاح متحدّيًا: «اثبت! اثبت وقاتِل!»

Verse 76

शब्द: समभवद्‌ राजन्‌ दिविस्पृग्‌ भरतर्षभ । राजन! भरतश्रेष्ठ] उस समय शंख

قال سانجيا: أيها الملك، يا ثورَ آلِ بهاراتا، في تلك اللحظة ارتفع هديرٌ واحدٌ كاسحٌ كأنه يبلغ السماء نفسها—هو اجتماعُ صوتِ الأصداف (الشنك)، وطبولِ الحرب (البهيري) والمِردَنْغا، وصيحاتِ الفيلة العظام في سَوْرةِ غضبها، وطنينِ الأقواس حين تُمدّ وتُجذَب. فدوّى ذلك كلّه في الفضاء.

Verse 186

इस प्रकार श्रीमहाभारत द्रोणपर्वके अन्तर्गत द्रोणवधपर्वमें संकुलयुद्धविषयक एक सौ छियासीवाँ अध्याय पूरा हुआ

وهكذا، في «المهابهارتا الشريفة»، ضمن «دروṇa پرفا»—وخاصةً في قسم «دروṇa-ڤَدْهَ پرفا» المتعلّق بقتل دروṇa—تُختَتَمُ الفصولُ المئةُ والسادسةُ والثمانون، في شأن القتال المختلط المتشابك.

Verse 187

इति श्रीमहाभारते द्रोणपर्वणि द्रोणवधपर्वणि नकुलयुद्धे सप्ताशीत्यधिकशततमो<ध्याय:

ويختم سانجيا: هكذا، في «المهابهارتا الشريفة»، ضمن «دروṇa پرفا»—في قسم «دروṇa-ڤَدْهَ پرفا»—تنتهي الفصولُ المئةُ والسابعةُ والثمانون، في شأن قتال نكولا.

Verse 213

कुलसत्त्ववलोपेता वाजिनो वारणोपमा: । रथोंके पहिये रक्तकी कीचमें डूब जाते थे

قال سانجيا: كانت الخيول—من سلالةٍ كريمة، ذات بأسٍ وقوة، عظيمةَ الجثة كالفيلة—تواصل جرَّ المركبات حتى حين كانت العجلات تغوص في وحلٍ من الدم. ومع أنها كانت تُعذَّب بالسهام، ترتجف وتخور من شدة الكدّ، فإنها كانت على أي حال تتماسك، وتثبت على عزمها، وتحمل العبء إلى الأمام.

Verse 236

तावेवान्ये समासाद्य जम्मुर्वैवस्वतक्षयम्‌ । भारत! उस समय द्रोणाचार्य और अर्जुन--इन दो वीरोंको छोड़कर शेष सारी सेना तुरंत विह्लल

قال سانجيا: «يا بهاراتا، في تلك اللحظة—باستثناء البطلين دروṇاتشاريا وأرجونا—اضطرب سائر الجيش دفعةً واحدة، واعتراه الذهول والخوف والهلع. وكان هذان وحدهما ملجأً لمقاتلي كلِّ فريقٍ من فريقهما، وموئلاً للمكدودين. غير أن مقاتلي الخصم، إذا دنوا من أحدهما، سِيقوا مباشرةً إلى مملكة ياما (الموت).»

Verse 296

द्वितीयामिव सम्प्राप्ताममन्यन्त निशां तदा । वहाँ धूलरूपी मेघकी भयंकर एवं घोर घटा घुमड़-घुमड़कर घिर आयी थी, जिससे सब लोगोंको उस समय ऐसा मालूम होता था, मानो दूसरी रात्रि आ पहुँची हो

قال سنجيا: في ذلك الحين ظنّ الناس أنّ ليلةً ثانية قد حلّت، إذ اندفعت كتلةٌ مروّعة كثيفة—كأنها سحابةٌ من غبار—فتدحرجت وأحاطت بكل شيء.

Verse 313

न्यपातयंस्तदा युद्धे नरा: सम विजयैषिण: । जो हाथकी पकड़में आ गये या छू गये, वे अपने हों या पराये, विजयकी इच्छा रखनेवाले मनुष्य उन्हें तत्काल युद्धमें मार गिराते थे

قال سنجيا: في تلك المعركة كان الرجال، وقد استبدّ بهم طلب الظفر، يصرعون من غير إمهال. فمن وقع في قبضتهم—أو حتى مسّته أيديهم—صديقًا كان أم عدوًا، أُسقط في الحال وسط القتال.

Verse 326

प्राशाम्यत रजो भौम॑ शीघ्रत्वादनिलस्यथ च । उस समय तेज हवा चलनेसे कुछ धूल तो ऊपर उड़ गयी और कुछ योद्धाओंके रक्तसे सिंचकर नीचे बैठ गयी। इससे भूतलकी वह सारी धूलराशि शान्त हो गयी

قال سنجيا: إن الغبار الذي ارتفع من الأرض خمد وعاد فهبط، إذ كبَحته سرعة الريح ودفعتْه إلى الأسفل. فبعضه قُذف إلى أعلى لحظةً، وبعضه تشبّع بدم المحاربين ثم استقرّ على التراب. وهكذا سكن سحاب الغبار الكثيف فوق ساحة القتال.

Verse 336

पारिजातवनानीव व्यरोचन्‌ रुधिरो क्षिता: । तदनन्तर वहाँ खूनसे लथपथ हुए हाथी, घोड़े, रथी और पैदल सैनिक पारिजातके जंगलोंके समान सुशोभित होने लगे

قال سنجيا: إن المحاربين المغمورين بالدم على ساحة القتال كانوا يلمعون—كأنهم بساتين شجر الباريجاتا (pārijāta). وبعد المذبحة بدت الفيلة والخيول والمقاتلون على العربات والمشاة، وقد تلطخوا بالدم، كغابات الباريجاتا في بهاءٍ مرعب.

Verse 363

रथर्षभाणामुग्राणां संनिपातममानुषम्‌ । उन उग्र महारथियोंका वह घोर, अत्यन्त आश्चर्यजनक और अमानुषिक संग्राम वहाँ सब लोग सब ओरसे देखने लगे

قال سنجيا: هناك وقع اصطدامٌ لا يكاد يُنسب إلى البشر، مهيبٌ مُذهل، بين أعتى فرسان العربات وأفذاذهم—مروّعٌ وعجيبٌ إلى حدّ أن الناس من كل ناحية ظلّوا يحدّقون فيه من كل جانب.

Verse 373

अपश्यन्‌ रथिनो युद्ध विचित्र चित्रयोधिनाम्‌ । रथके विचित्र पैंतरोंसे विचरनेवाले तथा विचित्र युद्ध करनेवाले उन महारथियोंका विचित्र रथोंसे व्याप्त वह विचित्र युद्ध वहाँ सब रथी दर्शककी भाँति देखने लगे

قال سانجيا: لقد أبصر فرسانُ العربات تلك المعركة المدهشة—وقد امتلأت بمقاتلين على شتّى الأنواع. كانت العربات تتحرّك بخدعٍ ومناوراتٍ دقيقة متشابكة، وكان أولئك الأبطال العظام يشتبكون بأساليب قتالٍ متنوّعة رفيعة الصنعة، حتى غدا الميدان مزدحمًا بعرباتٍ عجيبة. وهناك أخذ مقاتلو العربات ينظرون إلى تلك الحرب الغريبة كأنها مشهدٌ معروض—وقد أوقفهم لحظةً ما فيها من تعقيدٍ وبهرجةٍ ظاهرة.

Verse 386

जीमूता इव घ॒र्मान्ति शरवर्षैरवाकिरन्‌ । एक-दूसरेको जीतनेकी इच्छावाले वे वीर योद्धा प्रयत्नपूर्वक पराक्रममें तत्पर हो वर्षाकालके मेघोंकी भाँति बाणरूपी जलकी वर्षा कर रहे थे

قال سانجيا: كالسُّحُب التي تتكاثف عند انقضاء القيظ، كان أولئك المحاربون الأبطال—وكلٌّ منهم يتوق إلى قهر الآخر—يبذلون جهدًا مقصودًا ويُقبلون على البأس، ثم يسكبون مطرًا من السهام كما تسكب سحبُ المونسون ماءها. وتُبرز هذه الصورة كيف أن العزم والمنافسة في حُمّى القتال قد يحوّلان الشجاعة المنضبطة إلى قوة تدميرٍ لا تلين، كأنها قوة من قوى الطبيعة.

Verse 396

अशोभन्त यथा मेघा: शारदाश्चलविद्युत: । सूर्यके समान तेजस्वी रथोंपर बैठे हुए वे पुरुषप्रवर योद्धा चंचल चपलाओंकी चमकसे युक्त शरत्कालके मेघोंकी भाँति शोभा पा रहे थे

قال سانجيا: أولئك المقاتلون الأبرار، جلوسٌ على عرباتهم ومتألّقون كالشمس، بدوا في أبهى حلّة—كغيوم الخريف المخططة ببرقٍ وامضٍ متقلّب. وفي خضمّ صخب الحرب كانوا يلمعون ببريقٍ قَلِقٍ خاطف.

Verse 523

पुत्रस्तव महाराज राजा दुर्योधनो द्रुतम्‌ । अमर्षशील शत्रुके द्वारा युद्धस्थलमें अपने-आपको दाहिने किया हुआ देख दुर्योधन इसे सहन न कर सका। महाराज! फिर आपके पुत्र राजा दुर्योधनने भी तुरंत ही रणभूमिमें नकुलको भी अपने दाहिने ला देनेका प्रयत्न किया

قال سانجيا: أيها الملك العظيم، إن ابنك—الملك دوريوذانا—تحرّك سريعًا. إذ رأى في ساحة القتال أن شاتروكيرا (Śatrukera) قد وضع نفسه على الجناح الأيمن بمناورته هو، لم يستطع دوريوذانا الحادّ الطبع أن يحتمل ذلك. ثم، أيها الملك، سعى ابنك دوريوذانا في الحال في ميدان الحرب إلى أن يجلب ناكولا (Nakula) أيضًا إلى يمينه—طلبًا للسيطرة على اصطفاف الصفوف وعلى ميزة الموضع.

Verse 533

न्यवारयत तेजस्वी नकुलश्षित्रमार्गवित्‌ । तेजस्वी नकुल युद्धकी विचित्र प्रणालियोंके ज्ञाता थे। उन्होंने यह देखकर कि धृतराष्ट्रपुत्र दुर्योधन मुझे दाहिने लानेकी चेष्टा कर रहा है, उसे सहसा रोक दिया

قال سانجيا: إن ناكولا (Nakula) المتألّق، الخبير بتمييز المسالك ومكائد الحرب المتشعّبة، أوقفه فجأة. إذ رأى أن دوريوذانا، ابن دريتاراشترا (Dhṛtarāṣṭra)، يحاول جذبه إلى الجناح الأيمن، كبحه ناكولا في الحال—وذلك فعلُ يقظةٍ وانضباطٍ وسط فوضى القتال.

Verse 3036

न दिशो टद्यौर्न चोर्वी च न सम॑ विषमं तथा । उस अन्धकारमें न तो कौरव पहचाने जाते थे और न पांचाल तथा पाण्डव ही। दिशा, आकाश, भूमण्डल और सम-विषम स्थान आदिका भी पता नहीं चलता था

قال سنجيا: في ذلك الظلام الكاسح لم تُدرَك الجهات، ولا السماء، ولا حتى الأرض الفسيحة؛ وكذلك لم يستطع أحد أن يميّز ما كان مستويًا مما كان وعرًا. وفي عمى ساحة القتال ذاك لم يُعرَف الكورافا، ولا البانشالا ولا الباندافا—مما يُظهر كيف يمحو اضطراب الحرب العلامات المألوفة للهوية والاهتداء.

Verse 3536

वृकोदरेण राधेयो भारद्वाजेन चार्जुन: । दुर्योधन अपने भाई दुःशासनको साथ लेकर नकुल और सहदेवसे भिड़ गया। राधापुत्र कर्ण भीमसेनके साथ और अर्जुन आचार्य द्रोणके साथ युद्ध करने लगे

قال سنجيا: إن كارنا ابن رادها اشتبك مع بهيما (فريكودارا)، وأما أرجونا فواجه درونا ابن بهارادفاجا. ودخل دوريودانا، ومعه أخوه دوحشاسانا، في قتال مع ناكولا وسهاديفا. وهكذا قصد أبطال الفريقين إلى خصومهم الذين كأنما قدّرهم لهم المصير، واشتدّت حدّة التوتر الأخلاقي للحرب حين جُرَّ الأقارب والمعلمون إلى صدامٍ مباشر.

Read Mahabharata in the Vedapath app

Scan the QR code to open this directly in the app, with audio, word-by-word meanings, and more.

Continue reading in the Vedapath app

Open in App